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‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिकाक २५-२६-२७ म अंक

In ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका २० म अंक on जनवरी 13, 2009 at 5:18 अपराह्न

अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भऽ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर २७ टा अंक http://www.videha.co.in/
पर ई-प्रकाशित भऽ चुकल अछि। “वि दे ह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका मासक १ आऽ १५ तिथिकेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि, ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। विदेहक सालाना २५ म अंक (०१ जनवरी २००९) प्रिंट फॉर्ममे सेहो शीघ्र आएत।
अहाँसँ सेहो “विदेह” लेल रचना आमन्त्रित अछि। यदि अहाँ पाक्षिक रूपेँ विदेहक हेतु अपन रचना पठा सकी, तँ हमर सभक मनोबल बढ़त।
२.कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
“विदेह” पढबाक लेल देखू-
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आऽ अपन रचना-सुझाव-टीका-टिप्पणी ई-मेलसँ पठाऊ-
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(c)२००४-२००९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक १ आ’ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि, आऽ एहिमे मैथिली, संस्कृत आऽ अंग्रेजीमे मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक नवीन अंक सभ मासक ०१ आऽ १५ तिथिकेँ ई-प्रकाशित कएल जाइत अछि। ताहि द्वारे नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।http://www.videha.co.in/

“विदेह” ई- पत्रिका डाटाबेसक आधारपर प्रकाशित पोथी सभ:-

१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव

५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर

६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”

९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)

स्पॉनसर केनिहार प्रकाशक : श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com

मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि:
http://www.videha.co.in/विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download in Videha Archive.

विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४- part iii

In विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४ on जनवरी 13, 2009 at 5:16 अपराह्न

विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४- part iii

१.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप

डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
इतिहास
फिल्म निर्माणमे सहयोग कयनिहारक सूचीसँ
जे गायब अछि- डमी के रूपमे मारि खाइत
चक्कू आ गोलीसँ वास्तविक रूपेँ प्रहार सहैत

अभिनेत्री संग-संग दर्जनो भरि छौंड़ी सब
जे सुर आ अंगक समन्वित प्रदर्शनमे रहैत अछि अपस्याँत
तकरा सबहक स्थान कतय अछि रजत पटक इतिहासमे?

नायक केर नेनपनक संगी बनबाक निमित्त
जे आयल छल नेना सबहक झुंड रजत पटपर
आइ कतय छथि ओ लोकनि?

भरि-भरि राति जागि कए जे बनौने छल अभिनेत्रीक परिधान
एकसँ एक कर्णप्रिय गीतमे बाजा बजौनिहार वादक सब
कतय अछि आइ सिनेमाक इतिहासमे?
२.
खबरि बनौनिहारसँ लिखनिहार धरिक नाम अछि अखबारमे
मुदा कतहु नहि अछि ओकर सबहक नाम
जे छापलक भरि राति जागि कए उघलक माथपर खबरिक बोझ
आ पहुँचेलक जे घरे-घर, हाथे-हाथ

दुनिया भरिक दार्शनिक सबहक सुदर्शन पोथीक लेल
जे लोकनि कयलनि अपन हाथ आ स्वास्थ्यक नाश,
जाकिर हुसैनक तबलाक लेल जे हाथ सानलक माटि
आ गढ़लक अपन अँगुरीसँ तालजन्मा आकृति
तकर कतय उल्लेख अछि संगीतक इतिहासमे?

मकबूल फिदा हुसेनक लेल ले बनेलक कूँची-ब्रश
बनेलक अनेक तरहक रंग
ओकरा सबहक स्थान कतय अछि करोड़ो टाकामे नीलाम होइत पेंटिंक केर इतिहासमे?
ई सब अनुल्लेखनीय व्यक्ति सब जीवित छथि
जेना जन्म-जन्म के क्षुधित करौट लागल
अपमानित होइत इतिहास नियन्ता द्वारा
…से कहैत छी भाइ
तखन मुइल लोकक इतिहासक कथे कोन?

विलम्बित कइक युगमे निबद्ध
(कन्याकुमारीमे महासागरक मिलन देखैत)
एतय जमीन केर अन्त भऽ गेल अछि
आ अनन्त जलराशिक फेनिल उर्मि-यात्रामे संग भऽ गेल छथि

अस्ताचलगामी सूर्य हमरा मोनक आकाशमे झमारल
कमलामे, कोशीमे, बागमती आ गंडकमे
कोनो माघ कोनो कातिकक पूर्णिमा आ संक्रांतिमे
स्नान-दान, कल्पवास कयनिहार स्वर्गाकांक्षी हमर पूर्वज सबहक
देहगंधी जल आइ कतय, कोन अवस्थामे अछि समुद्र?
हुनका लोकनिक अस्थिपुष्प अहाँक कोन कोषमे अछि
ओ करुण प्रार्थना?
आ ओ आकुल हाक कोन तरंगमे निबद्ध अछि हवा?

युद्धमे हत मनुक्ख आ अश्व-गज केर प्राणांतक स्वर
जे तलवारक टंकारमे मिज्झर होइत कालक प्रवाह बदलैत छल
दलमलित गाम सबहक नोरक टघार जहिया नदीक धार बनल
तँ कतेक बढ़ल छल अहाँक अश्रुगंधी नोनक भंडार
आ हाहाकारी आवाज?

अशेष जलराशिसँ पूरित पृथ्वीक आन-आन भागमे बसल लोकसँ
परिचयक लेल कोलंबसी सफलतासँ पूर्व जे नाविक समा गेलाह
अहाँक विशाल उदरमे
तिनका सबहक असफल यात्राक कलपल स्वर आइ
कोन अवस्थामे बाँचल अछि समुद्र?

विश्व विजय केर निमित्त अश्वमेधक सरंजाम जुटबैत
मनुक्खक निश्चित मृत्युक लेल हथियारी पुष्टिमार्गक निर्माता
सिकंदरी आकांक्षाकेँ सभ्यताक संघर्षमे निबद्ध कऽ रहल अछि

कहियो ईश्वर केर मृत्युक जे लोकनि कयनेँ छलाह घोषणा
आइ इतिहासक अंत के कऽ रहल छथि पुष्टि
पुष्टिमार्गक अंतवादी उत्तर-आधुनिक सिकंदर सबहक खरहू
अश्वमेधी वांछाक लेल निट्ठाह नरमेधी अभियानकेँ नाम देलक अछि-
ईश्वरीय आदेशक पालन

प्रलय-कालक इतिहास-पुरुष समुद्र हमरा कहू
कतेक वर्खसँ कतेक सभ्यता कतेक संस्कृति आ कतेक साम्राज्यक प्रत्यक्ष गवाह अहाँ
कतेक रास सिकन्दर सबहक देखनेँ छी इतिहास!

मनुक्खक प्राण लैत मनुक्ख सभ्य बनैत नगर बसबैत सिकन्दर बनैत
बनबैत रहल अछि पृथ्वीपर इतिहासक अन्हार-घर
जतय कलपैत स्त्रीगणक नोरक टघार अहाँकेँ घीचैत रहल
कलिंगसँ तुगलक आ नादिरशाही धरि
रक्त-रंजित सभ्यताक नोनछाह समुद्र
हमरा इतिहासक कारागारसँ क्यो निरन्तर हाक दऽ रहल अछि

इतिहासक कतेक रास हाक अहाँक हृदयमे हाहाकार बनल
बेटाक लहासपर खसैत माय
पतिक लहासपर खसैत सैनिक सबहक स्त्रीक वेदना समाहित कएनेँ
अहाँक खसैत आबि रहल छी लहरि बनि कऽ कइक सदीसँ कटल गाछ जकाँ

कइक शताब्दीसँ हमरा क्यो हाक दऽ रहल अछि
अत्यंत आकुल स्वरमे बेर-बेर क्यो हमरा
सोर कऽ रहल अछि कहबाक लेल मोनक व्यथा
मुद्रा आ मोंछक कारणसँ मेटायल अनेक इतिहासक कथा
हमरा कहबाक लेल कतेक दिनसँ कतेक रास हाक
हमरा सोर कऽ रहल अछि

साक्षी छथि आइ अस्ताचलगामी सूर्य आ स्वयं अहाँ समुद्र
हम आइ सुनि रहल छी कइक सदीक सबटा हाक
सभ्यताक सबटा मर्मांतक पुकार

अभियान गीत-भवनाथ ‘दीपक’
उठह, उठह, उठह
चलह, चलह, भलह
बढह, बढह, बढह
घरक भेदभाव बूझि शत्रु आबि गेल
बुझा दियौक आन सँग एक बुद्धि भेल
विश्वद मंच मध्यु हम उचित जगह लेल
विशद विविध भेष
हरित भरित देश
जाति–पाँति वर्ण धर्म भेद–भाव हीन
राज–पाट कर्म काज सब अपन अधीन
श्रमिक कृषक बुद्धिजीव, उद्यमी उदार
ग्रथित एक सूत्र मध्यव व्यदक्ति शत प्रकार
भुक्ति मुक्ति हेतु
वृत्त आइ एकताक सेतु
जनैत हित मिलैत माँटि
के सकत अनेर डाँटि !
सब प्रबुद्ध, सब सचेत
पैर पाछु क्योा न देत
देखाय देत शत्रुकेँ भैरवक स्व रुप
के अलच्छत निन्दकमे रहत भसैत चूप ?
तिर्हुतिक माटिपर रहनिहार भाइ !
जन्मह भूमि प्राण हेतु ठाढ हुअह आइ
लाख–लाख कोटि–कोटि केर प्रयाण
के कहैछ, मैंथिलीक पुत्र अल्परप्राण ?
लक्ष्यछ चीन्हिम–लेल आब निधि चीन्हिर लेल
शत्रु–मित्र केर भेद–विधि चीन्हि लेल
उठह, उठह, उठह
चलह, चलह, चलह
बढह, बढह, बढह…..।

अहाँ की छी—मयानन्द मिश्र
अहाँ प्रलोभनक नाक काट’बला मर्यादा नञि छी
नग्न ताकेँ आवरण दैबला नञि छी
सँतुलन राख’बला
ट्रैफिक गाइड जकाँ चौबटियापर ठाढ
दुनू हाथ उठौने अहिँसा नञि छी ।
अहाँ छी
कोडोपैरीन खा–खा कऽ तत्काछल अपन मथदुखी केँ दबबऽ बला क्षुब्धअ हिमालय ।
अहाँ छी अपन खण्डिित रसनाकेँ दाबि
चुपचाप कान’बला सिन्धुन ।
वस्तुपतः अहाँ छी एकटा बिन्दुध
जाहिठामसँ अनेक रेखा तँ खीचल जा सकैछ
किन्तुम ओ सबटा दुर्जेय चट्टानक
कोनो विराट अन्हा र गुफाक अंतहीन घाटीमे
जा क’ समाप्तद भ’ जाइत अछि
सरिपहुँ ई प्रश्नस अछि जे अहाँ की छी?

आत्मा –डाक्टअर सुर्यनाथ गोप,दिघवा, सप्तमरी

मैथिलीकेँ बेचिकऽ
पैन्टी सर्टपर टाईकोट कसिकऽ
माथपर ढाका टोपी चढाकऽ
बगलमे भारतीय दुतावासक झोरा लटकाकऽ
एहि युगक सभसँ बडका विसंगति–
डाक्टुर सुर्यनाथ गोप
एक हाथमे पासपोर्ट–भिसा मुठियबैत
दोसर हाथमे हिन्दीरक झण्डाय फहरबैत
हिनहिनाईत
गिनगिनाईत
जारहल छथि
मौरिसस
अन्तसर्राष्ट्रि य हिन्दीड सम्मे लनमे ।
कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
गजल
धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि।
अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि ।

आहत मोनक घायल तड़पन, पेᆬरो आई कनाबऽ आयल।
जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह के ताकि रहल छि।

दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये बनला ।
याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छि।

बगबाहो अपनहिं हाथें, आई कलम-बाग सभ जारऽ आयल।
तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि।

बिसरि गेल जे याद छलै, से सपना कियैक याद दियौलक?
नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि।

निकलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर, अन्हारेक टा सम्बल केवल।
अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि।
अन्हार- अशोक हेगड़े
कन्नड़मे तीन टा कथा संग्रह आ एकटा उपन्यास। प्रशिक्षणसँ अर्थशास्त्री आऽ व्यवसायसँ वित्त प्रबम्धक श्री हेगड़े अपन दोसर उपन्यासपर कार्य कऽ रहल छथि।
अनुवाद कमलाकर भट्ट (कन्नड़सँ अग्रेजी)- श्री भट्टक अनुवादक अतिरिक्त मूल कन्नड़ कविता संग्रह सेहो प्रकाशित छन्हि जकरा २००६ ई.क पुटीणा कविता पुरस्कार भेटि चुकल अछि।
आऽ गजेन्द्र ठाकुर (अग्रेजीसँ मैथिली)।

कोनो दिन एना शुरू नहि हेबाक चाही, ओकरा सभदिन लगैत छैक। आऽ एकटा आर एहने दिनक प्रारम्भ भेल, प्ररम्भ होएबासँ पहिने हड़बड़-दड़बड़मे कार्य सभ। दूधबला दूध नहि दऽ गेल से ओ बगलमे धरफड़ीमे गेलाह पैकेट बला दूध अनबाक लेल। कमोडपर बैसल ओऽ भोरुका अखबारक सम्पूर्ण रिपोर्ट पढ़लन्हि निकृष्ट भ्रष्टाचारी आऽ हुनकर संगी सभक विषयमे। एकटा विज्ञापन छल जाहिमे एकटा फिल्म अभिनेताक हालमे जनमल बच्चाक नामक सुझाव दऽ कऽ पुरस्कार जितबाक प्रेरणा छल। एहि सभ जल्दीबाजीमे ओऽ अपन पुत्रकेँ नहेलक आऽ ब्लैकबेरीपर किछु कार्य सम्पन्न केलक, जलखै सोझाँ छल आऽ आब एतेक थाकि गेल जे बजबाक इच्छो धरि नहि रहलैक। ओकर पत्नी कहलकाइक जे माँक फोन आयल रहए गप कए लिअन्हु। माँ पुछि रहल छलीह जे ई सभ छुट्टीमे गाम अएताह की? ओकरा आब एतेक धैर्य नहि बचलैक जे ओ माँसँ गप करि सकितए। मनोहर कनियासँ झझकारि कए बाजल- “उत्तर हमरे द्वारा देब जरूरी अछि। फोनपर अहाँ गप नहि सम्हारि सकैत छलहुँ?”

कनियाँ सिन्कमे अपन हाथ धो रहल छलीह, “आइ काल्हि अहाँक संग की भऽ रहल अछि? अहाँसँ अहाँक बिनु हमरापर गुम्हरेने गप नहि कऽ सकैत छी? अहाँ आऽ अहाँ माय..हम किएक बीचमे आऊ? मोन अछि तँ हुनका फोन करू नहि तँ नहि करू। हम काजपर जेबामे देरी भऽ रहल छी”। पत्नी ओकरा जलखै करैत छोड़ि ऑफिस बिदा भऽ गेलीह।
जहिना ओऽ रोड धेलक तँ कनेक घुरमी अएलैक। एफ.एम.पर सुनयना रूट वन होस्ट कऽ रहल छलीह आऽ बड़बड़ा रहल छलीह। तरह-तरहक विज्ञापन, फोनक एनाइ, ई गीत हमरा भाए लेल बजाऊ, ओऽ गीत हमर प्रेमी लेल, ओतेक छुन्दर-मुन्दर माधुरीक तेसर बच्चाक नाम बताऊ, फोरम मालपर सलमान खानक संग आइसक्रीम खएबाक मौका जीतू.. ओकर घुरमी बढ़ि गेलैक। रेडियो बन्न कऽ ओ बाहर देखलक, ट्रैफिक जाम, धुँआ, गरदा, यातायात पुलिस सीटी बजबैत…पिरररर्र, भीतर घुसैत गाड़ी सभ द्वारा अवहेलना सहैत, सभ दस गजपर लाल-बत्ती, बी.टी.एस.बस सभ दौगैत भगवाने जानथि कतएसँ आऽ कोना कए, स्कूटर, रिक्शा, साइकिल, लॉरी, आऽ एहि सभक बीच बूढ़ बरद सभ पुरजोड़ लगा कए भरल कटही गाड़ीकेँ घीचैत, लोक सभ लहराइत पैसैत अबैत.. ओऽ ई सभ खौँझाहटि नहि बरदास्त कए सकल।
डॉ वी.वी.बी.रामाराव (१९३८- ) हिनकर ३४ टा रचना प्रकाशित छन्हि जाहिमे मौलिक अंग्रेजी आऽ तेलुगु रचना सम्मिलित अछि।
अनुवाद मूल लेखक द्वारा तेलुगुसँ अग्रेजी आऽ
गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अंग्रेजीसँ मैथिली।

अभाग

शीतलहरि सरसरा कए बहि रहल छल। घटाटोप बरखा धमगिज्जर मचेने छल। बिर्रोक बाद।
ई बीच रातिक बादक पहरि छल। घुप्प अन्हरियामे हमर माथक ऊपरका करवस्त्र कोनो सुरक्षा नहि छल। कपड़ा बड्ड अबाज कए रहल रहए आऽ हम सुन्न सड़कपर संघर्ष कए आगाँ बढ़ि रहल छलहुँ। सड़कक स्ट्रीट लाइट काज नहि कए रहल छल।
हम अपन कोठली कोनहुना पहुँचलहुँ मुदा ओतए ताला हथोड़िया देलासँ नहि भेटल। हमर थाकल हृदयसँ बान्हल मुट्ठी एड्रीनेलिनक प्रवाह केलक आऽ हम शीत घामसँ नहा गेलहुँ। हम केवाड़ीकेँ धक्का देलहुँ आऽ किएक तँ ई भीतरसँ बन्न नहि छल से कर्रसँ खुजल। हम भीतर गेलहुँ आऽ बत्ती जरेलहुँ। आश्चर्य, बत्ती प्रवासँ जरल। चलू कमसँ कम ई तँ बचल, हम निशास लेलहुँ।

सरोजिनी साहूक ओड़िया कथा “दुःख अपरिमित” केर मैथिली अनुवाद
गोपा नायक (ओड़ियासँ अंग्रेजी) आऽ गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली) द्वारा।
सरोजिनी साहू (१९५६- ), ओड़िया साहित्यमे पी.एच.डी., बेलपहाड़, झारसुगुड़ा, उड़ीसामे अध्यापन। महिला साहित्यक अग्रणी लेखिका, पाँच टा उपन्यास आऽ सात टा कथा संग्रह प्रकाशित। १९९२ मे झंकार पुरस्कार आऽ १९९३ मे उड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार।
गोपा नायकक जन्म भुवनेश्वरमे भेलन्हि आऽ ओतहि आरम्भिक जीवन बितलन्हि। सम्प्रति ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयसँ डी.फिल. कए रहल छथि।

दुःख अपरिमित

कथाक शीर्षक दुःख अपरिमित उड़ीसाक सन्त आऽ कवि भीमा भोइक ऋचासँ लेल गेल अछि।

प्राणीर अरात दुःख अपरिमित
जानु जानु केबा साहु
ये जीवन पाछे नरके पदिथौ
जगत उधार हेउ

जीवनक दुख
जीनाइ, काटनाइ, सहनाइ,
किएक?
हमरा जरए दिअ होमक ज्वालमे
संसार जीबए
दुःख अपरिमित

पेन नहि खसितए यदि सोनाली एकरा हमरा हाथसँ नहि छिनितए। हमर माय बेर-बेर हमरा कहलन्हि जे पेन स्कूल नहि लऽ जाइ, मुदा पेन एतेक सुन्दर रहए जे हम एकरा अपन संगी सभकेँ देखबए चाहैत रही। सभ दिन हम पेनसँ किछु काल धरि खेलाइत रही आऽ फेर ओकरा आपस दराजमे ओद्इया कए राखि दैत छलहुँ। हमर एकटा काकी एकरा विदेशसँ अनने रहथि आऽ हमरा सनेसमे देने रहथि। हमर माय कहलक जे ई पेन सत्ते बड्ड महग रहए। पेन लिखैत काल चमकैत छल। पेनक एक कात एकटा छोट घड़ी रहए। हम पेन स्कूल अनने रही प्रेमलताकेँ देखबए लेल। ओकरा होइत रहए जे हम पेनक विषयमे झूठ बाजल रही। ओऽ कहने रहए जे एहन पेन एहि विश्वमे नहि उपलब्ध छैक। आऽ ताहि द्वारे ओकरा देखबए लेल हम एकरा स्कूल अनने रही। हम ओकरा स्कूलक क्रीडाक्षेत्रक एक कात लए गेलहुँ आऽ ओकरा ई पेन देखेने रही। हम बीचमे टिफिनमे बाहर खेलाइ लेल नहि गेलहुँ कारण ई अंदेशा रहए जे क्यो एकरा चोरा नहि लए। प्रेमलता कहलक जे ई रहस्य ओ ककरो नहि बताएत मुदा सोनालीकेँ ओऽ कहि देलक। स्कूलक छुट्टीक बाद सोनाली हमरा पेन देखबए लेल कहलक।
शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त।

जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन।
तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद
गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)।

पसीझक काँट

बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल
केना ओऽ सभ पसरैतत अछि सोहड़ैत!
चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान।

भीड़-भाड़ सभठाम
सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़
सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह
चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य
वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़
मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप
हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग
आऽ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥

मुनैत, बहत नहि हवा एकताक
तेनाकेँ ठुसैत
सभक आश कोनहुना निकसी आकाश।

मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य?
कतए गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक
हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे?

कतए गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत?
सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतए गेल
छोड़ि मात्र अशोक आऽ साखुक वृक्ष
जे पसारि रहल आकाश मध्य अपन हाथ
नीचाँ देखैत विश्वकेँ
घासक पात सन तुच्छ?
यदि हम मोड़ी आऽ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे
वेधए बला मोथा नहि भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो।
सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे
मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत
परिवर्तित कएलक नगरकेँ सेहो बोनमे।
पसारैत काँट सभ ठाम
परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे
साँसक फुलब पसरैत चारू दिश
दोसराक संवेदना नहि आबए दैछ विचार
जिनगी भेल उसनाइत खेत सन।
इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ।
आश्चर्य, मथि नहि सकैत छी, औँठा धरि।
देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र
भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र।

एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई.मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित।
जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन।
तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद
गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)।

ई सेहो अछि प्रवास

अहाँ नहि छी मानैत
मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास
एकर गुण
षडयन्त्र जेकाँ
मूल जन्मकालेसँ
“तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई?
कोनो पुरुषक हाथमे तँ जएबाके छैक ने एक दिन
प्रवास
मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहिक नहि
नारी सेहो अछि एकटा ई।
अहाँ एकर अवहेलना कए सकैत छी सुविधासँ।
तैयो कतेक कठिन
छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान
पाएब एकटा अनचिन्हारक आँगुर?
अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल
मुदा बनि मात्र पाहुन।
जखने हम पएर राखब
कतेक काल धरि अहाँ रहब पुछब हमर लोककेँ।
“जाऽ धरि हम चाही”
इच्छा अछि कहबाक
मुदा श्रृंखला ससरल हमर इच्छापर बहुत पहिनहि।

प्रवास नहि अछि हर्खक वस्तु।
छोड़ि ई मात्र जे समय बितने
बढ़ैत अछि ई बनैत अछि अभ्यास।

मोहम्मद खदीर बाबू (१९७२- ) नेल्लूर जिलाक कवालीमे जन्म। तेलुगुमे तीन टा कथा संग्रह। भाषा सम्मान आऽ कथा पुरस्कारसँ सम्मानित।
जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन।
तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद
गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)।

हमरा सभक चित्रकला शिक्षक हमरा सभक भगवान छथि

कोनो स्कूलमे सभसँ उत्साही आऽ सभसँ दुष्ट आर क्यो नहि वरन् सीनियर होइत छथि।
की! सोचि रहल छी जे एक्के समयमे हम ककरो उत्साही आ दुष्ट कोना कहि रहल छी! थम्हू अहाँकेँ कहैत छी।
जखन हम सभ अठमामे छलहुँ तँ दू टा क्रिश्चियन छौड़ा सेहो , एबनेजर आऽ डेविड दसमामे। ओ दुनू एतेक नमगर छल आऽ ओकर सभक जाँघ तेहेन रहैक मुदा तैयो दुनू टा हाफ पैंटमे अबैत रहए।

शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल।
जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन।
तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद
गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)।

जुम्मा

हमर मायक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि।
बालानां कृते

देवीजी: ज्योति झा चौधरी
देवीजी :
देवीजी परीक्षाक परिणाम
बच्चा सबहक मेहनत आहि परीक्षाफल के रूपमे घोषित हुअ वला छल।देवीजी आ अन्य शिक्षकगण परिणाम लऽ तैयार छलैथ।प्रधानाध्यापक बच्चा सबके अपन अभिभावक संगे बजेने छलैथ।अर्द्धवार्षिक तथा अन्य टेस्ट सब सऽ बेसी महत्वपूर्ण छल वार्षिक परीक्षाक परिणाम।

देवीजी सबसऽ पहिने सर्वोच्च स्थान पाब वला छात्रक नाम घोषित केली आऽ ओकर प्रशंसा सहित ओकरामे कतऽ सुधारक आवश्यकता अछि ताहि सऽ अभिभावकके ज्ञात करौली।तकर बाद सामान्य विद्यार्थी सबहक परिणाम घोषित भेल।जे सब पहिने सऽ नीक केने रहैथ तिनका सबके आर नीक करैके प्रोत्साहन देल गेल आ जे सब पहिने सऽ खराप केने रहैथ तिनका सबके बहुत निंदित कैल गेलैन।
अंत मे एहेन विद्यार्थीक पारी आयल जे अनुत्तीर्ण भेल छलैथ। देवीजी हुनक अभिभावकके सेहो निंदा केली जे ओ सब प्रोत्साहन आ सुविधा नहि दैत छथिन जाहि लेल हुनक बच्चा अनुत्तीर्ण भेलैन।
कहल गेल छै-
”माता शत्रु पिता बैरी येन बाले पाठित:।
मा शोभते सभा मध्ये हंसमध्ये वको यथा॥
अर्थात्‌ एहेन माता-पिता शत्रु होएत अछि जे अपन बच्चा के नहिं पढ़ाबैत अछि। अनपढ़ बच्चा विद्वानक सभामे ओहिना लागैत अछि जेना हंसक बीच बगुला।
देवीजी एहेन बच्चा सबके हतोत्साहित नहि हुअ कहलखिन।कहलखिन जे असफलता सफलताक सीढ़ी होइत छै तैं अपन असफलता सऽ शिक्षा लिय आ आगॉं मिहनत करू।
तकर बाद विद्यालय बन्द रहक घोषणा भेल।अगिला साल २ जनवरी सऽ सबके आब लेल कहल गेल।बीचक अवकासमे सब बच्चा सबके प्रतिदिन दैनिकी लिखक कार्य देल गेल। तदोपरान्त अपन संगी साथी परिवार संगे सौहाद्रपूर्वक छुट्टी मनाबक शुभकामना दैत शिक्षक सब विदा लेला।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०.विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत
(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् – विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे – देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

English Translation of Gajendra Thakur’s (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor’s choice award from http://www.poetry.com and her poems were featured in front page of http://www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

SahasraBarhani:The Comet
translated by Jyoti
The time spent in my village proved to be very precious memories for me. I was able to run so fast in wooden shoes. I never slipped while running in rain, in muddy ways. When slippers were introduced then many people were falling down and using hot water bags to sooth pain. I often recalled those incidents- fire, standing on queue for kerosene oil, sugar balls, rubber balls, fight between two villages during fishing, crowd to see the flood, gathering of people and discussion for small things, memories of mango groves; would those things change by time?

“Uncle! I have not applied that irritating thing on his skin”. I started crying while giving clarification. Some boys had poured kabkabauch on Banai’s body when he was asleep. Every one was returning from the mango orchard when they saw this plant. Very soon boys started discussing about the affects of Kabkabauch – a plant whose leaves can create irritation if rubbed on skin. No one was ready to try this so when Banai was found sleeping boys tried that on him. All boys ran away and I was caught as I was coming behind them unaware of the fact. Uncle didn’t believe my clarification and he had given me punishment. He had also instructed me to stay with his group and walk around the fields instead of playing with those boys and learning mischief.

It was time of flood. Viewing the sight of flood in a boat and hunting Silli was very adventurous. The Government banned the hunting of that animal later on. But I was missing my friends and I was lost in the imagination of fun my friends would be having by playing and running here and there. That was my first day with my uncle.

Until afternoon, I was in the anticipation that I would have to go with my uncle on the second day too so I tried my best to hide my distress in front of my friends and narrated them the stories of my trip in last day very interestingly. But considering my fainted expression my uncle asked me if I was interested in going with them. I had not denied directly but said that I liked to stay at home. Then uncle showed pity and left me with my friends with the condition that I would not do any mischievous act.
(continued)

९. मानक मैथिली
इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष

इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।

मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।

भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।
ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४- part ii

In विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४ on जनवरी 13, 2009 at 5:14 अपराह्न

1.महेन्द्र कुमार मिश्र2. ज्योति
नेपाल रल्वेनक दुरावस्था आ सरकारक कानमे तेल
- महेन्द्र कुमार मिश्र, पूर्व सांसद
हमरा सब जकाँ भूपरिवेष्ठिरत मुलुकमे यातायातक चारि प्रणली मध्ये् जल मार्गक विकाशकेँ कल्पशना तत्काहल केनाई सम्भाव नहि । वायुमार्ग अति महग यातायातक साधन भेलाक कारणे आम नेपाली जनता, सर्वसाधारणकलेल सम्भनव नहि अछि । सडक मार्ग आशा अनुरुप्नधहियो होइत बहुतहद धरि निर्माणक पूर्वाधार तैयार करबाक चेष्टाभ अवश्यह कऽलेलगेल अछि । अूदा विडम्व‍ना केहन, विश्वकक सबसँ सस्ते, आरामदामयी, सुरक्षित एवं लोकप्रिय यातायात रेल्वेयसेवा प्रणाली नेपालसँ विस्थानपित होयबाक अवस्थापमे अछि । इन्टकरनेट एवं कम्युषित टरक युगमे जनसँख्या‍क वृद्धि भऽरहल अवस्थाथमे एकठामसँ दोसर ठाम शीघ्रातिशिघ्र पहुँचवाक आतुरता, ताहिक लेल रेलसेवा सनक आरामदायी आ सुरक्षित आधुनिक प्राविधिक सुसम्परन्‍न रेल मार्ग उपेक्षित एवं लावारीश अवस्थाेमे अछि ।
अखनो सँसारक दूर्लभ ईन्जिन मार्टिनवर्नद्धारा निर्मित न्याारेगेज रेल्वेि ईन्ज न नेपालमे उपलब्धम अछि, मूदा संचालनमे नहि अछि । बेलायती शासनकालक रेल्वेआ ईन्जटनसन १९३७, विक्रम संवत१९९४ साल सँ संचालित सेवा आई पूर्णरुपेण उपेक्षित बनल अछि । बहुतो नेपाली जनताकेँ जानकारी नहि हैतनि जे नेपालोमे रेल संचालनमे छैक ।१९९०मे सर्वप्रथम सर्भे कऽ १९९२ सँ निर्माण काज प्रारम्भेभेल विदेशकलेल काठ ढुवानीमे प्रयोग कायलगेल, जखन नेपालक हरियोवन समाप्ता होबऽलागल तत्पकश्चाात ई रेल सेवा मानव सेवामे प्रयोग होवऽलागल । आजुक परिवर्तित अवस्थानमे आवागमनक साधनकेँ रुपमे स्थातपित भेल आजुक परिवर्तित अवस्थाेमे आवागमनक साधनकेँरुपमे स्था पित भेल । वैज्ञानिक युगमे अन्यम विकशित देश अचम्भिपत सवकाश कएलक, भारतमे आजुक दिन सबसँ पैघ रेले मन्त्रा लय छैक । भारतक आर्थिक्‍ रीढक रुपमे रेल्वेव स्थाेपित अछि । जापान, फ्रान्सआ आदि देशक रेल सेवामें आश्चार्यजनक प्रगति कएलक अछि । एक घण्टाढमे ४०० किलो मिटरक दूरी तय करैत अछि । भारतमे वेलायति साम्राज्यमद्धारा रेलसेवा प्ररम्भक आ विस्ताढर भेल । प्रय ओही समय वि.सं. १९९४मे युद्ध शम्शेमरक शासनकालमे नेपाल सरकार रेल्वेे( एन.जे.जे.आर.) नेपाल जनकपुर जयनगर रेलसेवा आ (एन.जी. आर.) भारतक रक्सौसल होइत वीरगँज अमलेखगँज तक साचालित रहै, मूदा बहुत पहिने सँ सेवा बन्दआ अछि । आब मात्र ५१ कि.मि. मार्ग जयनगर विजलपुरा सँचालित सेवा जनकपुर सा विजलपुरा, २०५९ साल अषाढ २३ गते आएल भिषण बाढिक प्रकोप सँ बिग्धील नदी पुल क्षतिग्रस्तर भेने यहो रेल सेवा पूर्णरुपेण बन्दा भऽ २९ कि.मि.मे मात्र सिमीत अछि ई सेवा । सरकारक अकर्मन्यदता, लापरवाही तथा उपेक्षाक कारणे लोहाक लीक माटि सँ भरल अछि, घासपात जनमिगेल अछि, ठाम ठाम निर्मित यात्री प्रतिक्षालय सेहो ध्वास्तँ भऽरहल अवस्था छैक । रेलक जमीन सब सेहो अतिक्रमण मात्र नहि लिकेपर तरकारी बजार छानल गेल अछि, मूदा सरकार आ सम्ब्न्धिसत निकाय रेल प्रशासनक ध्याान एम्हपर नहि देखल जा रहल अछि । वेर वेर जानकारी आ तथादा कएलाक बादो कोनो सुनवाइ नहि भऽरहल जनताक सिकायत रहल अछि ।
देशक ऐतिहासिक धरोहर एवं तराई मात्र नहि नेपालक गौरव रेलसेवा जीर्ण अवस्थातमे अछि । बुझना जाइत अछि जे यहि सेवाकलेल कोनो मायबाप नहि रहल । अखन धनुषा महोत्तरी धरि ई रेलसेवा सँचालित भेल अवस्थाछमे एहि मार्ग सँ जतेक यात्री आवत जावत करैत छल ताही अनुपातमे आन कोनो यातायात एवं सवारी साधन सा आवत जावत नहि होइत अछि जकर सत्य् तथ्यत यात्रीक सँख्याु सँ पुष्टीा होइत अछि । पर्यटनक युगमे रेलसेवा एनो उपेक्षित रहल ताहिसँ तराईवासीके जनमानसमे केहन भावना उत्पँन्नय हायत ?
असमान भेदवाभ सँ ग्रसीत मानल जाए की नहि ? आई जौं एहन छोट समस्यान पहाड मे रहितै तहन की एहीना उपेक्षित रहैत रेल सेवा ? जनकपुरधाम धार्मिक्‍ स्थसल तथा पर्यटनकलेल आवऽबला यात्री मध्येक सर्वाधिक भारतिीय नागरिक रहैत अछि, एकदिनमे कमसँ कम पाँच छौ हजारक सँख्याममे यात्री आवत जावत करैत अछि । दूर्भाग्यावस महोत्तरी जिल्लाकक मध्य क्षेत्रमे एकमात्र यातायातक साधन रेले अछि, ओहो अखन बन्दय अछि । अन्यन यातायातक सुविधा नइ रहल क्षेत्रक ई सेवा वन्द भेने जनजीवन कतेक प्रभावित हेतै तकर अनुमान सहजहिँ कायल जा सकैया । अशक्त विमारी, उद्योगव्यामपार, दैनिकजीवनक उपभोग सामग्रीक आभाव तथा क्रय विक्रयक समस्याा सा एम्हवरके जनमानस बहुत प्रभावित भेल अछि । प्राय प्रत्येजकदिनक ई समस्याककेँ कारण रेलसेवा अभिषाप सिद्ध भऽरहल अछि । नयाँ नेपालक निर्मा०ँम्‍ै ज्‍ू६ल्‍ द्यल्‍ त्ँ्ेलस ज्न्ग‍ प््र.तिनिधि सबहक पूर्ण दायित्वभ होइत छन्हिह, की त रेलसेवा फेर सा सञ्चा लन कएल जाय या रेलसेवा बन्दद कऽ वैकल्पिेक मार्ग निर्माणमे ध्यानन देथि । गणतन्त्रिस्थाापनाक महा अभियानमे एहि क्षेत्रक कम योगदान नहि रहल । राजनीति योगदान करऽबला बीर शहीदक पुण्यिभूमि आई उपेक्षित अछि । आर्थिक योगदानमे सेहो रेलसेवा उल्लेनखनिय काज बरबामे सहायक रहल अछि ।
दाता मित्र राष्ट्र्क सरकार तथा जनप्रतिनिधिद्धारा रेलसेवा विस्तालर आ सुव्यकवस्थिकत करबामे उत्सारहजनक आश्वाछसन सेहो भेटल,मूदा अखन धरि ई काज कियाक नहि सफल भऽरहल अछि ? भारतीय जनता, राजनीीत्क्त‍ द्यल्‍? स्ँ्टल्ीज्क् ‍ क्ँअईकर्ता वेरवेर ई सवाल सदन सँ लकऽ सडक धरि उठा रहल अछि, भाषण एवं सार्वजनिक अभिव्यिक्तिस सेहो सँचार माध्यनमसँ जानकारी भेट रहल अछि । तात्काईलिन रेल मन्त्रि रामविलास पासवान, वर्तमान रेल मन्त्रिह लालू प्रसाद यादवजेक अभिव्यँक्तिर सेहो सार्वजनिक भेल अछि कि जयनगर, जनकपुर, विजलपुरा होइत वर्दिबास धरि ब्रोडगेज रेलसेवा विस्ताभर कायल जाएत । भारतीय राजदूतावास सँ सेहो प्रस्ता व आएल कि जनकपुर विजलपुरा रेल्वेरसेवा विस्ताार कऽ काठमाण्डौभ धरि महुँचाएल जाय तकरालेल नेपाल सरकारद्धारा प्रस्ताुप पेश करओ आ ताहिमे भारत सरकार पूर्ण सहयोग करत । किछु साल पूर्व नेपाल भारत बीच रेलसेवा विस्ताररक सन्देर्भमे बिना विष्कार्ष वार्ता भाग भेल एहि वार्ता सा पूर्वो एकटा वार्ता दिल्लीदमे भेल छल । पहिल आ दोसर चरणक वार्तामे सहभागी सरकारक प्रधिनिधिक कथन अनुसार ई वैसार उपलब्धीे मूलक रहल कुटनीतिक माध्यतम सँ निष्क र्षमे पहुँचवाक मे दुनु पक्ष सहमत भेल ,मूदा आश्च र्यक बात जे एतेक वर्ष बित रहल अछि अखनधरिक ब्रोडगेजक बात छारिदी, सँचालित नेरो गेज लिंक आ ३ कडोर लागतक पूल निर्माण क कियाक नहि भऽरहल अछि ।
पंचायतकालमे सेहो जापान सरकार नेपाल रेलसेवाक विस्तािर निर्माण प्रस्तागव रखने छलाह, हुनकर शर्त रहनि जे जापाने सरकारक रेखदेखमे ई काज हायत, मुदा कमिशनक कारणे ओ म्रस्ता व पतन भेल । एमाले सरकारक सभय तत्कारलिन निर्माण तथा यातायात मन्त्रि भरत मोहन अधिकारी जनकपुर रेल्वे आ नेपालक विकाश विषयक गोष्ठीामे हुनकर अभिव्याक्ति् छलन्हिक, जे जनकपुरधाम सनक पवित्र स्थिलक पर्यटकिय विकाशक लेल राष्ट्रि् य सहमतिक आवश्यअकता अछि । निकट भविष्यरमे निर्माण तथा यातायात मन्त्राजलयद्धारा जापान, भारत तथा फ्रान्सट सरकार सपक्ष रेल्वेयसेवाक आधुनिकीकरण एवं विस्ताारकलेल लिखित प्रस्ता्व पठायब जे प्रतिवद्धता जनौने छलाह । नेपाली काँग्रेसक मन्त्रि गणद्धारा वेरवेर निरीक्षण भेल ओ आशाजनक आश्वािसन भेटैत रहल,मूदा समस्या। अखनो यथावते अछि । अवस्थाि दयनिय अछि, पुरान भौतिक सँरचना, रेल्वेद ट्र्याक,स्लीापर, इन्जिनकोच तथा पूलसब जीर्ण अवस्थातमे अछि । कर्मचारी व्यणवस्थाकपन कमजोर रहलाक कारण रेल कम्प नीक आर्थिक अवस्थान सेहो बहुत कमजोर अछि ।
हालहिमे नेपाल आ भारत सरकार बीच भेल सहमति अनुसार जयनगर सँ वर्दीबास धरि ७० किलोमिटर रेल्वे सेवा विस्ता र करबालेल भारतक राइट्स नामक कम्पसनि सन २००७ जुलाईमे सर्भे काज सम्पान्नल कयलक अछि । तत्प्श्चासत भारतीय रेल सरकारक चीफ इन्जिमनियर आ सहायक इिज्नि०यर सबहक टोली पुन सर्वे काज सम्प।न्नप कयलक जे काजक पूर्णता देवऽमे कम सँ कम पाँच वर्ष लागत, मूदा प्रश्नह अछि जे पाँच वर्षक अवधि धरि एहि क्षेत्रक अवस्थाच कि हायत ? यहि अवस्थाँके ध्यालनमे रखैत नेपाल सरकार तत्का ल सँचालित लीक आ पूल निर्माण क रेल सँचालन मे आवओ । बहुत प्रयासकबाद अर्थमन्त्रि ११ कडोर रुपैया देवाक निर्णय कयलथि । यहि प्रयासमे यातायात मन्त्रि क पूर्ण सहयोग रहलन्हिव, मूदा ११ कडोर रुपैया भऽ की रहल छैक ? ११ कडोर मध्येब ५ कडोर जनकपुरसँ पूर्व आ ६ कडोर जनकपुर सँ पश्चि‍म बिजलपुरा धरिक मर्मत निर्माणकलेल छुटियाओल गेल छल तथापि अखन धरि काज प्ररम्भ६क गँधधरि नहि आबिरहल अछि ।
यातायतक प्रणलीमे रेलसेवा एकटा एहन प्रणली प्रमाणित भेल अछि । जे जतेक लम्बाि खूरी धरि विस्ताार करय ततवे वेसी आरामदायी हायत आ सँगहि ओतवे आमदानी होयवाक निश्चिात अछि । सामान ढुवानी, यात्री आवत जावतमे राजश्वमवृद्धिक सँगहि रोजगारीक अवसर सेहो प्राप्त क साथसाथ आहि क्षेत्रक सर्वाङ्गीन विकासक पूर्वाधार सुनिश्चिवत रहत । रेल्वेअसेवा क्रमश रुपान्तारीत होइत संस्था नसँ कम्पेनिमे परिणत भेल ई स्वासयत्तता प्रप्तद कम्परनिमे सात मन्त्रा लयक शेयर अछि, मनोमानी ढँगसँ बिना मूल्यापङ्कन कयल जायत त कैयक असबके सम्प्ति छैक । कम्पिनि चाहे त अपने बलबूत्तापर रेलसेवा सँचालन कऽ सकैत अछि । एकटा सक्षम व्यकवस्थािपन, पारदर्शिताक आवश्यरकता छैक । आशा राखी लोकतान्त्रि्क सरकार एहि शुभकाजमे सहयोग करय, नहि त वोहि क्षेत्रक जनता आब हाथ पर हाथ धऽ बैसल नहि रहत आ देसर विकल्पयक खोजीमे जुटत, जकर परिणाम सरकारमे सहभागी दल एवं सरकारके भोगहिटा परतैक ।
आतंकवाद महत्वा कांक्षाक खेतमे आकुरण होइत अछि
महेन्द्र कुमार मिश्र
पूर्व सांसद

आतँक प्राणी जगतमे आदिम प्रत्यु षा सँ चलैत आवि रहल अछि । प्राणीके अपन अकार, शक्ती आ कार्यक्षमताक कारणे आतँकक परिणम आ प्रकार सभमे विविधता देखल जा सकैत अछि । पुराणादीमे वर्णित देवासुर संग्रामसभ आतँकवादीक श्रृंखलाके महागाथा अछि । महिषासुरक क्रिया कलाप सँ आतँककीत देवतागण शक्तिक आराधनामे लागि नारी द्धारा छल प्रपञ्चा रचना कऽ ओकरा समाप्तप कयलगेल प्रसँग दुर्गा सप्ततशीमे वर्णित अछि । रावणक आतँक समाप्तछ करवालैल राम अनेक जातिक सहयोग ल समाजके मुक्ति देवौलन्हिद । तहिना कंशक उन्माणद अती भेलाक पश्चारत एकटा सामान्य गोपाल कृष्णिक रुपमे अवतरीत भेलाह ।
कहवी छैक, बीनु बीज वृक्षक आकुरण नहि होइत छैक । अमेरिका के जन्म‍ओल सद्दाम आ ओसामावीन लादेन अमेरिका विरुद्ध कियाक आततायी भ प्रगट भेल ? इन्दिकरा गाँधीद्धारा पालीत सन्तद जर्नेल सिंह भिण्डयवाल इन्दि राकै प्राणे ल लेलक । ओसामावीन आ ओमार आजुक युगक विश्व्के सर्वाधिक शक्ति सम्पलन्न‍ अमैरिकाक निन्न आ भूख उडादेने अछि । आतँकवाद कहियो महत्वाककाँक्षाक खेतमे अंकुरण होइत अछि आ अन्यापय अत्या चार, शोषण आ दमनक वर्षामै वढैत या त ताही श्रृंखलाके तोडैत अछि कि त अपने समाप्तन भ जाइत अछि । संसारक आतंकके इतिहास व्यानह परिणम देखवैत अछि । हिंसामे प्रतिहिंसा जकां आतंकवादी सभ मात्र अपने हत्याक हिंसा, लुटपाट आ अगिलग्गीअ नहि करैत छैक दोसर पक्षके सेहो ओहने काज करवालेल वाध्यि करवैत अछि । संसारक द्धन्दारत पक्षके गहींर सं अध्यलयन, मनन कयला उपरान्त एकरा सभहक क्रिया कलापक परिनती याह प्रमाणित होइत अछि ।
आतंक शब्दर सं कोनो हैजाक प्रकोप आ कठोर अत्याकचार आदिसं उत्प न्नर होव बला भयके वोध करवैत अछि । आतंकमे वाद जोडिदेलाक बाद एकर अर्थ मनुष्यआकै डेरा क धमका क या त्रास श्रृजना क क हिंसात्मोक विद्रोहक रुपमे अपन प्रभुत्वा स्थासपित क काज सिद्ध करवाक विचार आ सिद्धान्त बुझना जाइत अछि । दोसरके सम्पभति लुटव, घरमे आगि लगाएव, पर स्त्री संग बलात्का्र करब, समाजमे उत्पा्द मचाएव एहन दुष्क र्मीकै दुराचारी कहल जाइत अछि ।
तानाशाही चाहे जेकर होउक, जर्जबुशक हौउक वा मुसर्रफकै एकरा कौनो दृष्टितए नीक नहि मानल जायत । कानो राष्टछक तानाशाही आ दादागिरीके एक न एक दिन विनाश होयबेटा करैत अछि । आव ओ युग नहि रहिगेल जे लोक बुझौक परमेश्वररक अनुकम्पाासं गर्भ धारण भैल, ई लौक मान लेल तैयार नहि रहिगेल । ककरोलेल तोपक सलामी आ केओ लाठी,बुट आ गरमे गोली खाई, आजुक मानव समाजक चैतना एकरा सह लेल तैयार नहि अछि । विश्वकक कोनो ठाम जे विद्रोह भेलैक तकर समाधान करवाक काजक दायित्वत वाहक अपना आपके विशिष्टि नहि समान्योस्तिरक खण्ड मे राखय तखने ई समस्याएक समाधान भ सकैत अछि । २००७ साल सं पालीत, पोषित आ वढैत आएल समाजिक विद्रोहक स्ततरके माओवादी लगायत तथाकथित प्रजातन्त्रकवादी दलसब तराई समस्याटकै जाइन बुझि क अखनो कार्यान्व‍यन पक्षकै कमजोर बनाविक रखने अछि । पिडीत पक्ष अखनो विश्वसस्तय भ नहि पाविरहल अछि । नेपालक सन्दणर्भमै माओवादी १० वर्षधरि हथियार उठा जनविद्रौह कएलो उपरान्तस सबपक्षके समेट नहि सकल । संगही आन पार्टी सैहो पिडीत,उत्पीबडीत,राज्यरक संरचना सं दर रह बला वर्गक प्रति इमान्दाबर नहि रहल त दौसर विद्रोहक सम्भाहवना अवश्सपम्भारवी अछि ।
विद्रोहक अनेक शैलीआ पद्यती मध्येद कम सं कम जनआतंक आ जनधनक क्षति होइक एहने शैली एवं आचरण मात्र विश्मेि अनादिकालसं समाजिक मान्यरता वपैत अछि । समाजिक रुपानतरण हथियार नहि विचार सं कायल जाइक तखने टिकाउ भ सकैत अछि । आसुरी ताल या वृति एकटा स्व भाविक कमजोरी अछि । सहिष्णुिता संस्काारक उदात्तीकरण अछि । मनोविज्ञान याह तथ्यतके मान्य।ता दैत छैक जकर प्रशस्ति प्रमाणसब छैक ।
३० वर्षे पञ्चानयती शासन स्वै च्छानचारी, हुकुमी, निरंकुश सामन्ती प्रवृतिक छलेैक त २०४६ सालक जनआन्दोतलन व्यारवस्थाजमे परिवर्तन लौलक तथापि प्रवृतिमे कोनो परिवर्तन नहि दैखलगेल । पूर्व राजा ज्ञानेन्द्रखद्धारा फैर सं व्याथह शासन प्रणालीके पुनरावृति कर चाहलक मुदा सफल नहि भ सकल । ज्ञानेन्द्राक महत्वानकांक्षा बढैतगेल जकर फलस्वजरुप देशक जनता गणतन्त्रो न्मुदख होइत आई दैशमे गणतन्त्र स्थावपना भ गेल अछि । आव जौ कोनो प्रकारक वाधा व्य वधान उत्पुन्नत करबाक कोशिश कायलगेल त विद्रोह बढवेटा करत । संविधानसभा मूद्दा नहि समाधाने मूद्दा अछि । संविधान सभाक विर्वाचन पश्चाकत मधैशक साथ कोनो दल धोखा देवाक धृष्टमता करत त परिणाम अनिष्टाकारी हायत । राष्टक दोसर दूगिर्तकै आमन्त्र ण करत । मधेशक जनता अखनधरि उपेक्षित, उत्पीणडित रहल, समान अधिकार आ समान पहिचानकलेल लालाइत रहल मधेशक मूद्दापर यदि राजनीति करबाक धृष्ट ता करत त स्वारभिमानी मधेशी जनता फेर विद्रोहमे उतरत, मधेशी जनता मधेशवादी अछि, मात्र मधेशवादी गणतन्त्रहवादी नहि । गणतन्त्ररवादी कहि जनता भोंट नहि देलक आइ किछु नेता कहैत छथि, “हामी गणतन्त्रीवादी हौं” हुनका “हामी मधेशवादी” कह मे लाज किएक ? आबक संविधान जनआन्दोिलन २०६२।०६३ तथा मधेश आन्दोंलनद्धारा प्राप्तद जनाधिकारक सन्द”र्भमै एकटा एहन संविधानक आवश्यदकता छैक जाहि संविधानक माध्यतम सं नेपालक जनता सही अर्थमै समावेशी लोकतन्त्रक, प्रतिस्पकर्धात्म क बहूदलि, बहूभाषिक, बहूसांस्कृ तिक स्व रुपक संगहि सम्बतन्धि्त अधिकार सबहक उपभोग क सकय । एकरा संगही एहि दैशमे सयकडो वर्ष सं शोषित रहल मधेशी समुदाय, दलित, अल्पससंख्य्क, आदिवासी एवं जनजाती आव निर्माण हौव बला नयां संविधानद्धारा एकटा कण्ठाुरहित समुन्न त, समावेशी आ विकाशशील समाजक निर्माण भ सकै आ तकर यथार्थ अनुभूति अनुभव जनता क सकय ।

ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
भूमिका : एम पी टूर
कहै छै जे एक बेर शेर जॅं मनुषक खूनक स्वाद चखि लैत अछि तऽ ओकरा मनुषक आदत भऽ जाएत छै। सैह हाल छल हमर सबहक।एक बेर जे टिस्कोक शैक्षणिक यात्रामे जाइत छल तकरा सबमे बेर-बेर जाइके अभिलाषा जागि जाइत छलै।अही कारण सऽ लगभग आधा सऽ लऽ कऽ दू तिहाई तक विद्यार्थी तेहेने रहैत छल जे पहिनेहो आयल रहैत छल। तकर बाद एहेनो बड होएत छल जे सब तरहक इण्टर स्कूल कॉम्पीटिशनमे एक दोसर के चिन्हार भेल रहैत छल।से बड कमे लोक एहेन होएत छल जे वस्तुत: नऽब होइत छल।पहिल बेर जॅं कनी अन्तर्मुखी रहितो छल तऽ अगिला बेर सऽ खूब खुलीकऽ मज़ा करैत छल।नब विद्यार्थी सबके सहायक सेहो बनैत छल।
हमहुं आन विद्यार्थी जकॉं बहुत आह्लादित छलहुं।टूर लेल चयन भेल से तऽ पिछला सालक रिजल्ट निकलिते देरी पता चलि गेल छल।लेकिन कत जायब से अहिबेरका वार्षिक परीक्षाके समाप्ति दिन बतायल गेल।जहन पता चलल जे मध्यप््रादेश जायके अछि तऽ बहुत खुश भेलहुं।घरक परिवेशक ई असर छल जे उज्जैन आ अमरकंटक लेल बड उत्साहित छलहुं। ताहिपर सऽ कान्हा नैशनल पार्क के देखक लालसा सेहो कम नहिं छल।पहिल बेर ई अवसर छल। अहिबेरका टुरक लक्ष्य निम्नलिखित छल:
(1) विलासपुर
(2) अमरकंटक
(3) जबलपुर
(4) भेड़ाघाट
(5) कान्हा नेशनल पार्क
(6) पचमढ़ी
(7) उज्जैन
(8) इन्दौर तथा
(9) भोपाल
1.अवैद्य नागरिकताः सिक्क मीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोंलनः लूटमे लटुवा नफ्फास,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्व2विद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टूक विकास
मनोज कुमार मुक्ति-
अवैद्य नागरिकताः सिक्कामीकरणक प्रयास
मनोज मुक्ति

नेपालमे नागरीकता वितरण बहुतो वर्ष पहिने सँ चर्चित विषय बनल अछि । खास कऽ पहिल मधेशवादी दलक रुपमें जानल जाइत नेपाल सदभावना पार्टी अपन स्थाेपने कालसँ नागरीकताके अपन प्रमुख मुद्दाक रुपमे रखैत आएल छल । प्रजातन्त्रलक आगमनकबाद २०४८ सालमे बनल सरकारक समयमे सेहो नागरीकताक प्रश्नर सदन गर्मओने छल ।सदभावना पार्टीक अडान रहैक बहुतो मधेशी जनता नागरीकतासँ बञ्चिमत अछि, सबके नागरीकता देल जाए । सदभावना पार्टीक एहि अडानपर जनमोर्चा लगाएतक दलसब एकरा भारतक विस्तातरवादी नीति कहैत विरोध करैत छल । हूनकर सबहक कहब रहैनि जे मधेशीसबके नागरीकता दऽदेलासँ नेपाल सिक्कलमीकरण भऽ जायत ।
जनआन्दोकलन २०६२/०६३ सँ पहिने सेहो नागरीकता वितरणकलेल आयोग सब बनैत रहल, अपन प्रतिवेदन बुझवैत रहल । कोनो बेर जौं नागरीकता देलोगेल त “सबै भारतीयहरुलाई नागरीकता दियो, देशमा अब विखण्ड न हुन्छो” कहैत, रिट दायर कऽ मधेशमे देल जाचुकल नागरीकताके बदर सेहो कराओल गेल ।
एकटा विदेशी नागरीकके नेपालक नागरीकता देनाई वास्तकवमे बहुत बडका षडयन्त्रे होइत छैक, देशक हीत विपरीत काज होइत छैक । देश हीतक विपरीत काज कयनिहार ककरो नईं छाडल जएबाक चाही । ताहुमे नागरीकता सन सँवेदनशील विषयमें त सबहक नजरि रहब ओतबे जरुरी होइत छैक । मुदा जोर जोरसँ गरजनिहार सबहक मानसिकता एहिबेरक नागरीकता वितरणक समयमे देखागेल । नागरीकता वितरणक तथ्याँतक अनुसार लगभग २४ लाख नागरीकता समुच्चाख देशमे वितरण कायलगेल । जाहिमे लगभग ११ लाख तराई मधेशमे आ १३ लाख पहाड हिमालमें । कि वास्तचवमें नागरीकता प्रप्तय केने चौबिसो लाख व्यछक्ति् नागरीकता लेबाक हकदार रहथि ? ई एकटा पैघ प्रश्न् अछि । हँ सदनमे बहुत हँगामा कायलगेल, अपनाके देशक ठिकदार कहनिहार देखावटी देशभक्तख पार्टीसबद्धारा । अहु हँगामा सबहक एकहिटा कहब छल जे तराई मधेशमे सबटा भारतीय सबके नेपाली नागरीकता द कऽ देशके सिक्कामीकरण करबाक तैयारी कायल जाऽरहल अछि । मुदा कि नागरीकता वितरण कयनिहार अधिकारीमे कएटा व्याक्तिण तराई या मधेशी मूलक रहथि ? आँगुरपर गनल जा सकैया । अवैद्य रुपसँ वितरण कायलगेल नागरीकता मधेशक विरोधमें बहुत पैघ षडयन्त्री अछि । मधेशमें जाऽक गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा जे किछु मात्रामे विदेशी सबके मोटगर पाई ल कऽ नागरीकता वितरण कायलगेल अछि से मधेशीसबके अपने धर्तीमे गुलाम बनयबाक चालि अछि । एकर दू टा पक्ष अछि, जौ नागरीकता लेने विदेशी भुख्खेब मरत त उदारवादी मधेशी अपनो हिस्सा क भोजन देबऽमे पाछा नई रहत, आ मानसिक एवं शारीरिक यातनाक पीडा मेलैत रहत । जौ पाइके बलपर नागरीकता लेने कोनो धन्निपक विदेशी गाममे रहत त गामक जिमदार बनिकऽ सबके फेरसँ कमैया बनालेत जेना पश्चिनमी तराई मधेशमे थारु सबके पहाड सँ विस्थामपित पहाडी सबद्धारा कमैया बनालेल गेल । ताएँ एहि बातपर मधेशीसब सचेत रहथि आ विदेशी सबके नागरीकता लेबऽसँ सकभर रोकलथि । मुदा तैयो पाइयक भुखल आ द्धेष भावनासँ कुटिकुटिकऽ भरल गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा मधेशोमे किछु नागरीकता अवैद्यरुपसँ वितरण कायलगेल ।
दोसर दिश पहाड आ हिमालमे जे जनसँख्योद सँ बेसी नागरिकता वितरण भेल ताइके विषयपर सदनमे ककरो बकार धरि नहि फुटल । कत चलिगेल ओई देशभक्तय नेता सबहक देशभक्तिव ? ई अहिने प्रष्टम कऽदैत अछि जे ओइ खोखला देशभक्तफसबक नियति, ओसब कि चाहैत अछि, आ कत सँ सञ्चाकलित अछि ?
वास्तसवमे अवैद्य नागरीकता वितरण क कऽ नेपालके सिक्क मीकरण करबाक प्रयाश सोंचल समझलरुपमें शुरु भऽगेल अछि । नेपालमे लाखोके सँख्या में तिब्बकती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) नागरीकके नागरीकता द कऽ वैद्य नागरीक बनयबाक खेल शुरु भऽगेल अछि, आ तकरा सब मधेश विरोधी मानसिकताक लोक भितरिया मोन सँ स्वागगत करैत गदगद भऽ रहल अछि । एकर कारण एक्काहिटा अछि जे नागरीकता लेनिहार तिब्बाती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) लोकके मुँहकान आ प्रायःके भाषा नेपालक ओइ बेतुक्काम देशभक्ती नेता सबसँ मिलैत जुलैत अछि । ई सिक्कामीकरण नईं त कि अछि ? देशक सम्पूार्ण सचेत नागरीकके सोंचबाक चाही ।
तराई/मधेशक आन्दो्लनः लूटमे लटुवा नफ्फा
मनोज झा मुक्तिक
सँयुक्त लोकतान्त्रि क मधेशी मोर्चाक नामपर भेल तराई/मधेशक आन्दोचलन अन्तोुगत्वा सातदलक सरकारके फागुन १६ गते वाध्य कऽदेलक आ सातदलक सरकारके तरफसँ प्रधान मन्त्रीर गिरिजाप्रसाद कोइराला, तात्काालीन नेकपा एमालेक मुखिया माधव नेपाल आ नेकपा माओवादीक अध्यकक्ष पुष्पत कमल दहाल “प्रचण्डलक” उपस्थिनतिमे आठबुँदे सम्म झौता पत्रपर हस्ताआक्षर कएलक । सम्मतझौता लागू कायल जाएत ताहि शर्तपर मधेशवादी दलसब तत्कादल आन्दोझलन स्थतगित कएलक आ संविधान सभाक चुनाव संभव भऽसकल ।
तराई/ मधेशक आन्दो लनके विखण्डननकारीक आन्दोऽलन, संविधान सभा विरोधीक आन्दो लन एवं राजावादीक आन्दोईलनके आरोप लगौनिहार, देखावटी कऽरहल आ अपनाके गणतन्त्रकवादी कहऽबला एवं द्वेषक मानसिकतासँ कुटिकुटिकऽ भरल नेपालक सञ्चाारकर्मीके मुँहपर पैघ झापड लागल जखन शान्ति।पूर्णरुपसँ तराई मधेशमे संविधान सभाक चुनाव सम्पसन्नच भेल ।
संविधान सभाक चुनाव सम्परन्नन भेलाकवादमें जहन संविधान सभाक पहिल बैसार भेल त तराई/मधेशक विरोधमे सबदिनसँ मेंहक काज करैत आएल राजतन्त्र क समाप्तिन भेल जे तराई/मधेशक जनताके सबसँ पैघ विजय छल । जखन संविधान सभाक काज आगु बढल त मधेशी जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल मधेशी सभासदसब विगतके सम्मवझौताके सुनिश्चिलत करबाकलेल अन्ततरिम संविधानमे लिखएबाक माँग सहित सदन अवरुद्धक काज करऽलागल । अवरुद्धक काजके फेरसँ, नेपालके अपन बपौटी सम्पआति बुझनिहार विभिन्ना दलक नेतासब आ संकिर्णतासँ भरल प्रयः छोटसँ पैघ सँचारकर्मीसब( अपवादकरुपमे किछु छोडिकऽ) सदन अवरुद्धक काजके विदेशीक ईशारापर कराओल जाऽरहल, देशके विखण्डअनकेलेल कायल जाऽरहल लगाएत नाना प्रकारक आरोप लगेबाक शुरु कऽदेलक । आरो त आरो तराई/मधेशक जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल आन–आन पार्टीक तराई/मधेशक ठिक्का लेने मधेशी नेतासबसँ विरोध करौनाई शुरु कऽ देलक । ओना विरोधक मोहराक रुपमें किछु नेता आगा आबिकऽ अपन मालिकके मन जितबामे सफल सेहो रहलाह आ मधेशीदलक नेता मात्र मधेशक हीत नई सोचत, हमहुँसब मधेशेकलेल लडव, कहिकऽ जितल मधेशवादी दल बाहेकके नेतासब सेहो अपन पद बँचेवाक डरसँ मौने रहऽमे भलमन्सामहत बुझलथि ।
एम्ह र, कहियो अञ्चिलाधिश रहल राप्रपाक नेता नरेन्द्रो चौधरी अध्यिक्ष रहल थारु कल्या णकारिणी सभा थरुहट स्वारयत्त प्रदेशक माँग करैत मधेशीदल आ सरकार सँगभेल सम्महझौताके लागु नई करबाकलेल दबाव स्वहरुप जुलुश,बन्दक आ चक्काकजामके आयोजना करऽलागल । ओना जौ एहि आन्दोसलनक नेता सबहक विगतके पृष्ट भूमि देखि त किछु सोंचबाकलेल विवश भेल जाऽसकैया । अखन एहि आन्दो्लनक अगुवाई कऽरहलछथि– राजकुमार लेखी, जे एमालेमे बहुत दिनसँ लगितो टिकट पएवामे असफल रहल अछि । आब राजनीतिक विश्लेाषकके मानी त एमालेसँ राजकुमार लेखीक टिकट पक्काअ–पक्कीक अछि एहि विरोध प्रदर्शनक बाद । किशोर विश्वाास, जे विशुद्धरुपसँ मधेशीके पार्टीक नामसँ जानल जाएबला नेपाल सदभावना पार्टीसँ अपन राजनीतिक जिवनक शुरुवात कएलक । माघ आन्दो लकबाद मधेशी जनाधिकार फोरममे सक्रिय भेल, फोरमद्धारा निष्कारसित भऽ भाग्यकनाथ गुप्तादके अध्य क्षतामे मधेशी जनाधिकार फोरमक दर्ता करौलक जकर उपाध्य‍क्ष किछुदिन रहल आ पुनः निष्काासित कऽदेलगेल । एहि थरुहटके आन्दोजलनसँ हुनको एकटा प्लेरटफार्म भेंटगेल अछि, आब देखबाक ई अछि जे एहि प्ले्टफर्मपर हूनकर गाडी कतेक दिन धरि रुकत
आरो जे हुए, थारुसब नेपालक आदिवासी अछि एहिमे कोनो शंका नहि । सबके अपन–अपन अधिकार भेंटवाक चाही । मूदा अपन अधिकारकलेल दोसरके अधिकारक हनन कायल जाए, कतेक ऊचीत गप्प। अछि मधेश हुए, तराई हुए, थरुहट हुए या कोनो अन्येछ नाम किया नई दऽदेल जाए ओहि प्रान्त के जनताकेँ समान अवसर, पहिचान, अधिकारक ग्याटरेन्टी् एवं स्वा यत्तता भेंटवाक चाही । एकटा बात जे सबके आश्चआर्य कएने अछि– मधेशी चोर देश छोड, एक मधेश एक प्रदेश नई थरुहट चाही ! ई कहिकऽ कायलगेल विरोध प्रदर्शनमें मगर सँघक व्या।नरके, चुरे भावरक लोक सबके । मानिलेल जाए जे मधेश शब्द के बदलिकऽ तराई या थरुहट राखिदेल जाए त ताईमें मगरके आ चुरे भावरके कोन तरहक फायदा भेटतैक जौं मधेश स्वादयत्त भऽ जएतैक त झलनाथ खनाल लगाएतके कोन श्रीसम्परति हरण कऽदेल जेतैक किया ओ सब एकर विरोध कऽरहल अछि ऊत्तर ताकब जरुरी अछि ।
सबदिन सँ तराई/मधेशके चरणकेरुपमे बुझने, महेन्द्र क फूटक नीति अनुरुप पहाडसँ तराईमें आबि सोझसाझ आदिवासी थारुके सम्पिति हडपिकऽ ओकरा हरुवा आ कमैया बनेने एहि तरहक शोषक मानसिकताके पृष्टूपोषक झलनाथसब किया चाहतैक जे ओतुक्काि थारु लगाएत आन समुदाय सुखी आ सम्पकन्नत बनय आ जाधरि तराई/मधेशके स्वाओयत्तता नई भेटतैक ई सम्भसव नहि से ओकरा सबके बुमल छैक । अन्तनमे संघीयता या स्वांयत्तता देलो जाए तराई/मधेशके त अपना अनुसारके बाँटिकऽ जे कहियो तराई/मधेशक जनता शक्ति सम्पषन्नय आ सामर्थवान नहिं भऽ सकय । ओकरा सबके नींक जकाँ बुमल छैक जे सम्पूरण तराई/मधेश या थरुहट कोनो नामपर एक प्रदेश भऽगेल त हमरा सबहक कोनो चारा नई चलत ओतऽ । दोसरदिस अपनाके जनताके आवाज कहनिहार नेपालक सँचारकर्मी आ नागरिक समाज लगाएत बुद्धिजिबीपर पैघ प्रश्नन उठाओल जाऽरहल अछि– सातदलक शिर्षस्थँ नेताक सहमति/उपस्थिधतिमे,सातदलक सरकारक प्रमुख एवं राष्रान ध्यकक्ष रहल व्य्क्तिकद्धारा हस्तावक्षरित सम्मौसताके लागु करबाकाल आयोग निर्माण आ विभिन्न बहाना कायल जाति छैक से हूनका सबके नई सुमाति छन्हिस आ भेल सम्मौबताके कार्यान्वियनके सुनिश्चियतताक माँगमे हुनका सबके विदेशीक ईशारा आ विखण्डषनके बात सुमाति छन्हिह ।कि सम्मौकताके सँग भऽरहल मजाकक बाद कोनो समूह सरकार या ककरो सँगे वार्ता करत ? माधव नेपालक सम्मौहतामे रहल सहमति एमालेक सहमति छल की माधव नेपालक व्यकक्तिरगत,जे मलनाथ सम्मौिताक पुनःविचारक बात करैत छथि ?जौं से बात छैक त हूनका पार्टीक नाम सेहो बदलि लेबाक चाही ।एहि बातपर किया नागरिक समाजके मूँह बन्द? भऽगेल अछि, किया सँचारकर्मीक कलम ठमहि गेल अछि ? हूनका सबके ई नई बुमल छन्हिक, जे देशक कोन पार्टी आ नेता कत–कतऽसँ सञ्चामलित अछि ?निश्चिनत रुपसँ बुमल छन्हि , मूदा कोनो वर्ग विषेशके पकडमें रहल सँचारकर्मीसब अपना अनुसारे विश्लेाषण करैत अपन मनमर्जी अनुसार नङ्गा नाँच कऽरहल अछि आ आम जनमानसमे मिडियाक छविकेँ तहसनहस कऽ रहल अछि । बजतैक केँ ? जौं एक ठाम कोनो अदना तराई/मधेशक लोक देशक विखन्ड नक गप्पज करैत छैक त सब मिडियाक प्रमुख समाचारकरुपमे ओकरा परसल जाइत छैक,मूदा सदनसन सर्वोच्चऽठाममे जहन एकटा प्रतिष्ठिित मधेशी नेता सरकारमे सहभागि सबके दोष प्रमाणित करैत देशमे विखण्डननके बीजा रोपणक गप्पह करैत छथि त ओ नाहियोंटा समाचार नई बनि सकैया ?
अन्तो गत्वाख जौं राष्ट्रीप्रमुखद्धारा कायलगेल सम्मौओता लागू नईभेल त देशमे केओ ककरो पर विश्वाहस नई करत आ एतेक पैघ सँकटके ई जन्मतदेत से सबके बुमितो मौन अछि । आ दोसर बात तराई/मधेशक जनताके ई बात बुझनाई जरुरी अछि कि तराई/मधेशक जनताके अधिकार सम्पमन्नदता चाही आ स्वाशयत्तता चाही । तराई/मधेशक जनता अधिकार सम्प न्न/ नई भऽजाए आ सबदिन दास बनल रहय से मानसिकतासँ जे अपना घरमे फूट कराओल जाऽरहल अछि तकरा समयेमे बुझनाई जरुरी अछि । ओतुक्कास जनताके एकैहिटा प्रदेश चाही या १०टा, तकर निर्णय ओतहिक जनता करत नई कि फूटाकऽ राज करबाक सोंचनिहारसब । जौं अपनाके मधेशवादी कहऽबला दलसब सेहो कोनो तरहक गलत निर्णय करैत छथि त हूनको सबहक विरोध होबहिक चाही ।
अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ…..

सरकारके ध्या.न छठि पावनिपर देवाक चाही…..डा. राम दयाल राकेश ( सँस्कृेति विद)
छठि पावनि मधेसके संस्कृाति कियाक मानल जाईत अछि ?

–छठि पावनके अपने मौलिक विशेषता छइ,, ई पावनि शुरु होबऽ सँ एकमहिना पहिने सँ पावनि कयनिहार सब तैयारी मे लाईग जाईत छथि । एकर तैयारी आ पुजाके जौं देखल जाय त अईमे विशुद्ध मधेसी संस्कृदति पाउल जाईत अछि । पावनि केनहार सँ लक ओईके तैयारीमे लागल हरेक व्यमक्ति ओ संस्कृदतिमे भिजल रहल पाओल जाइत अछि । ओकर प्रसाद सँ लऽक हरेक सामगी्रमे मधेसक संस्कृरति देखल जाईत छक, ओ पावनिके अवसरमे गावै वाला विभिन्नर धुन तथा गीत सब मैथिल संस्कृ्तिमे गाओल जाईत अछि ।

ई पावनि कियाक मनाओल जाईत अछि ?

–एकर अपने पहिचान आ विशेषता छैक । सब पावनि सँ अई पावनिके अपने इतिहास छैक किया त कोनो पावनि एसगरे अपना घर परिवार मे रहिकऽ मनाओल जाइत अछि मुदा ई एकटा एहन पावनि अछि जे खुला जगहमे सामूहिक रुप सँ मनाओल जाइत अछि । अई पावन के मात्रे लोकतान्त्री क पावनि कहल जा सकैय कियाक त अई पावनि मे कोनो भेदभाव उच्च नीच, जात भात नई देखल जाइत अछि । अई पावनिमे सूर्यके पुजा भेलाके कारण आओर एकर गरीमा के उच्चउ देखल जा सकैय । सूर्य जहिना ककरो पर भेदभाव नई क कऽ सम्पू र्ण जगतके रोशनी प्रदान करैत अछि, तहिना छठि पावनि सब के एक समान रुप सँ देखैत आईव रहल छैक ।
ई पावनि अपना परीवार के सुख समृद्धिके लेल तथा कोनेा रोग व्यसधा नई लागै से मनोकामना सँ मनाओल जाइत अछि । भोर आ साँझक सूर्यके किरणमे एक प्रकारके गरीमा होईत अछि जकरा रोशनी सँ शरीरमे रहल विभिन्नि विमारी फैलाब वाला किटाणु सबके नष्टअ सेहो करैत चर्मरोग सँ बचाबैत अछि । चर्म रोगके अचुक दवाई मानल जाईत अछि छठि पावनि ।

छठि पर्व मे महिला सब अपना आचरा पर नटुवा कियाक नचवैत छैथ ?

–एकरा एकटा श्रद्धाके रुपमे लेल जा सकैय, छठि माताके ध्यारनमे राखि क कोनो किसीमके मनोकमना केला सँ जौं ओ पुरा भ जाईछै त ओई देवता पर आरो श्रद्धा बैढ जाईछै आ ओहि किसीमके कौबुला क क अपना आँचर पर नटुवा नचवैत छैथ ।

छठिक घाट पर चमार जाईत सब ढोल( डुगडुगीया) बजावैत छथि, ओकर कि विशेषता अछि ?

–ओकरो जातिय तथा संस्कृढति परिचयके रुपमे लेल जा सकैय, ओ जाईत सब अपन संस्कृिति आ संस्काौरके बचएबाक लेल ओ काज क रहल अछि । ओ ढोल बजला सँ घाट पर कतेक मधुरता आ रौनक महशुस होईत रहैत अछि, ओना त कते लोक सब अग्रेजी वाजा बाजा क पावैन मानावैत छैथ मुदा जतेक ढोल पीपही के आवाजमे संस्कृ ति के झलक भेटैत अछि ओते कोनो बाजामे नई ।

अई पावनि मे सूर्यके पुजा होईतो पर छठि माता या छईठ परमेश्वारीके नाम सँ कियाक जानल जाईत अछि ?

–सूर्यके अर्थ उषा होईत अछि, उषा भगवतिके रुपमे पुजलाके कारण एकरा छठी माताके रुपमे सम्बोछधन कायल जाइत छैक । ओना त स्पछष्टउ रुपमे कतौ ने अई विषयमे चर्चा भेल अछि लेकीन किछ शास्त्रकमे महाभारत के कुन्तिक शुरुमे छठि पावनि केनेे रहैथ ओही दिन सँ छठि पावनि शुरु भेल अछि से कतौ कतौ उल्ले ख पाएल जाईत अछि ।

दिनकर के आ जलके कि सम्बरन्धस अछि ?

–जल के आ दिनानाथके बहुत गहिर सम्बसन्धि अछि, बिना जलके दिनकरके पुजे नई भऽ सकैय हुनका खुश करबाक लेल जल चाहबेटा करी । छठिएके उदाहरणके रुपमे लऽ लिय, ओ पावनि बिना जल के नई भऽ सकैय कोनो जलासय नई भेला पर अपना घरमे खधिया खनि क ओइमे जल राईख क पावनि सम्पवन्नक करैत अछि, कियाक त दिनानाथे सूर्य छथि । एकटा एहो कहि सकै छि कि सूर्य मे बहूत गर्मी भेला के कारण जल के अर्घ देला सँ ओ किछ ठन्ढाा होइत छैथ ।

लोकतान्त्रिरक गणतन्त्रथमे छठि पावनिके संस्कृ्तिके बारे मे अपने कि कहब अछि ?

– हम गणतन्त्रि नई कहिक लोकतन्त्र के चर्चा करैत ई कहव कि छठि एकटा विशुद्ध लोकतान्त्रििक पावन अछि, समानुपातिक ढगं सँ एकरा मनाओल जाइत अछि । सामूहिक रुपमे मनबाक सँगहि अई मे कोनो भेद भाव नई होइत अछि । गरीब सँ लक धनीक तक सब एकरा समान ढगं मनावैत अछि ।
जनता गणतन्त्रएके रस्ताै चलनाई शूरु कदेलक मुदा सरकार अखुनोे पाछा परल अछि । अखनोे मधेसी पहाडी बीच , दलित गैर दलित बीच, गरीब धनीकके बीच भेदभाव अछि, कि एकरे गणतन्त्र कहबै ? नवका नेपाल बनाबऽ लागल नेेतागण सबके छठि पावनि सँ किछ सिखवाक चाहि ।

अन्त र्वाता …आभाष लाभ

(२०२८ सालमें डा.राजेन्द्रल विमल आ श्रीमति विणा विमलक सन्ताछनक रुपमें जनकपुरक देवीचौकक निवासमें जन्म२ लऽ २२ वर्ष पहिने सँ निरन्तआर मैथिली गीत सँगितक आकाशमें ध्रुवतारा जकाँ चमकैत रहऽबला एकटा मिथिलाक बेटा छथि, गायक आभाष लाभ । बाल्येनवस्थाम सँ विभिन्नआ मँच सबपर अपन आवाज सँ दर्शक श्रोता सबके हृदयमें वास कयनिहार आभाष लाभ, मैथिली आ मिथिला सँ सम्बलन्धन रखनिहारकलेल चीरपरिचीत नाम अछि । प्रस्तुवत अछि, गायक आभाष लाभ सँगक भेल बातचीतक प्रमुख आश )
१. आभाष जी गीत सँगीतमें कहिया सँ लगलहुँ?
कहिया सँ लगलहुँ से त नईं बुझल अछि, मूदा बच्चेस सँ जनकपुर आ लऽग परोसक गाँव सबहक एकौटा मञ्चप हमरासँ नई छुटैत छल ।
२. पहिलबेर आहाँक रेकर्डेड गीत कोन अछि
- पहिलबेर हम नेपाल सँ बहराएल अशोक चौधरीक मैथिली क्यािसेट पानस में गीत गएने छलहुँ ।
३. मैथिली गीत सँगीतक अवस्थाश केहन बुझा रहल अछि?
जतेक होयबाक चाही ओतेक सँतोष जनक नहि अछि । नव नव प्रतिभा जाई तरहें एबाक चाही, नई आबि रहल छैक । दोसर बात अखन प्रविधि एतेक परफेक्टव भऽगेल छैक जे पाइ सेहो वड खर्च होइत छैक ।
४. की बुझाइया, मैथिली गीत सँगीतमें लागिकऽ अखनुक युगमें बाँचल जा सकैया
एकदम नीक जकाँ बाँचल जा सकैया एही क्षेत्रमें लागिकऽ । मैथिलीक क्षेत्र बहुत पैघ छियै । जौं मेहनतिसँ नीक काज कायल जाए त मैथिलीयो सँगीतक क्षेत्रमें बहुत पाई छै । उदाहरण लऽ सकैत छी, हमरे सबहक क्यँसेट “रे छौंडा तोरा बज्जमर खसतौ”के जे १५ लाख प्रति बिकाएल छल । तहिना “गीत घरघर के” जे जहिया सँ बहरायल तहिया सँ आइयोधरि बिकाइते अछि । हँ, काज नीक होयबाक चाही ।
५. प्या रोडीके प्रभाव केहन पडि रहल छैक मैथिली गीत सँगीत पर?
प्या.रोडी मौलीकताके साफ साफ खतम कऽ दैत छैक । गीत सँगीतक क्षेत्रमें लागल श्रष्टा? सबके मनोवलके तोडिकऽ राखिदेने छैक प्याीरोडी गीतसब ।
६. प्या‍रोडी गीत सँगीत सँ पिण्ड छुटबाक उपाय की
देखियौ, जखन अपन सँगीत या गीत नई हुए तखन प्या‍रोडीके किछु हद धरि पचाओल जाऽ सकैया,मूदा मैथिलीमे अपन मौलीक सँगीतक आभाव त कहियो नई रहलै । जहातक प्याँरोडी गीत सँगीत सँ पिण्डर छुटेवाक बात छई त अइमे आम जे श्रोता सब छथि, जे वास्ततविक रुपमें चाहैत छथि की अप्परन मौलीक सँगीतक विकास होइ, हूनका सबके प्याथरोडी गीतके निरुत्सातहीत करबाकलेल ताई प्रकारक क्यामसेट किनऽसँ परहेज करऽ पडतन्हिय आ सँचार माध्य म सबके सेहो ओहन गीत बजेवा सँ बचऽ पडतन्हिव, तखने ई सँभव अछि ।
७. नेपालीय आ भारतीय मिथिलाञ्चीलमें मैथिलीक बहुत रास काज भऽ रहल छैक, की अन्त र बुझाऽ रहल अछि दूनु देशक मैथिलीक काजमे
हम त मात्र एतबा बुझैत छियै जे एकटा हमर सहोदरा विदेशमे कमाऽरहल अछि आ हम नेपालमे । दूनु ठाम अपना अपना तरहें काज भऽरहल अछि एतबे बुझु ।
८. अखन सऽभ भाषाक गीतमे रिमिक्स के बाढि आएल बुझाति छई, एकरा कोन रुप सँ आहाँ देखैत छियै?
बहुत नीकबात छई रिमिक्सष गीत औनाई । समय अनुसार आधुनिकीकरण होयबाके चाही । समाजकलेल आ बजारकलेल गीत गौनाई दूनु दूटा बात छियै, ताहिमें गीत सँगीतक व्यायवसायीकरणमे रिमिक्सज बहुत नीक सँकेत छई । रिमिक्स गीत बहरेवाक चाही बशर्ते अपन सँस्कागर नई लुप्तय भऽ जाई ताइके ध्याँनमें रखैत ।
९. अखनधरि कतेक गीत गएलहुँ जे रेकर्डेड अछि?
अखनधरि लगभग साढे तीनसय गीत हम गाबि चुकल छी जे रेकर्डेड अछि ।
१०. क्याससेटके अलावा कोन फिल्मडमें अपन स्वुर देने छी आहाँ ?
मैथिलीमे दहेज,ममता,प्रितम,आशिर्वाद फिल्मेमे, तहिना भोजपुरी फिल्महसब सजना के आगना, ममता, तहार गलिया आदिमे ।
११. स्टेमज शो के सीलसीलामे कतऽ कतऽ गेलहुँ?
अपन देश नेपालक लगभग सबठामके अलावा, कतार (४बेर),दूवई(२बेर),मलेशिया,पाकिस्ताहन,बंगलादेश, भारतक विभिन्नक शहरमें अखन धरि जाऽचुकल छी ।
१२. नव की आबि रहल अछि मैथिल श्रोता सबहक लेल?
बहुत जल्दिनए निखिल राजेन्द्रैक सँगीतमे भेनस क्यापसेट सँ रिलिज भऽ रहल अछि….
त्रिभुवन विश्व विद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टेक विकास
मैथिली लेखक एवं अन्यष मैथिली भाषी लोकनिक भावनाकेँ सम्माभन करैत त्रिभुवन विश्वरविद्यालय भाषाविज्ञान केन्द्रि य विभाग तथा मदन पुरस्काेर पुस्त कालय भाषा सञ्चामर परियोजना अन्तसर्गत यूनिकोड पर आधारित जानकी नामक मिथिलाक्षर(तिरहुता) फन्टपक विकास कयलक अछि । एहि फन्ट‍क मादे आब सँसार भरि इमेल मिथिलाक्षरमे पढल जा सकैत अछि । सँगहि, वेबसाइट पर मिथिलाक्षरमे पाठ्यसामग्री साखल जा सकैत अछि ।
मुद्रणक कठिनाई सँ मैथिली भाषा देवनागरी लिपिमे सामान्या रुपसँ लिखल जाइत अछि आ मिथिलाक्षरक प्रयोग बहुत सीमित क्षेत्रमे होइत जाऽ रहल अछि । यूनिकोडमे आधारित जानकी फन्टरक आगमन सँ मिथिलाक्षरक प्रयोगक विस्तामर होयबाक सँभावना बढल अछि । ओना दू वर्ष पहिनहिँ निजी स्त रपर श्रविण झा आ गँगेश गुञ्ज्न मिथिलाक्षर फन्टयक निर्माण कयने रहथि ।
मकर सँक्रान्तिर अर्थात तीला सकराँइत-/जितिया पावनि-मनोज झा “मुक्ति”
मकर सँक्रान्तिर अर्थात तीला सकराँइत-मनोज झा “मुक्ति”
मकर सँक्रान्तिा अर्थात तीला सकराइँत माघ महिनाक पहिल दिन, प्रायः माघ मासक १ गतेके मनाओल जाइत अछि । मकर सँक्रान्तिि माघभरि लोक भोरमे स्नाकन करैत अछि । माघ मासक सँक्रान्तिनक दिन लोक उडीदक दालि, चाउर,तिलबा, चुल्लौैर आदि दान करैत अछि । धनवान लोकसब गोदान, उनीवस्त्र , कम्ब,ल, सोन आदि सेहो दान कायल करैछथि । एहि दिनमे खिच्च रि खएबाक चलन चलि आएल अछि । आजुक दिन भगवान भगवतीके चुल्लौुर, तिलबा चढाओल आइत अछि । बहुतो ठाम दिनमें चूडा,दही,चुल्लौ र आ रातिमे भोजन काएल जाइत अछि । आ किछु ठाम चुल्लौठर, तिलबा, चूडा,दही जलपान कऽ दूपहरक भोजन खिच्चअरि सँ सँम्पलन्नल होइत अछि ।
मिथिलाञ्चनलमे भेरे स्ना न कऽ कऽ तीलक डाँठ अर्थात तीलाठीक आगि तापल करैत छथि । जौं तीलक डाँठ उपलब्धल नई होमय सकल त आगिमे तीलक किछु दाना धऽ आगि तापि परम्प राके निर्वाह कायल करैछथि । ताइकेबाद अपना सँ पैघ या कहु श्रेष्ठ द्धारा चाउर, तील आ गुँड मिलाबिकऽ बनाओलगेल तील खुवाबिक अपना प्रतिके कर्तव्यकबोध कराओल जाइत अछि, जकरा “तील बहव” कहल जाइत अछि ।
ई पावनि सँ आयु, आरोग्यइ, सम्प ति, रुप, गुणक प्राप्ति होएबाक सँगहि सब तरहक पापसँ मुक्तिि भेटबाक विश्वाखस कायल जाइत अछि । माघ स्नासनके बृहत मन्त्रि सेहो होइत अछि जे एहि प्रकारक अछि
ॐ माघमासमिमं पुण्यंा स्नालम्य हं देव माधव ।
तीर्थस्यािस्थ जले नित्यंय प्रदीदा भगवन हरे ।
दु ःख दरिद्रयनाशाय श्रीविष्णो स्तो।षणय च ।
प्रातः स्नारनं करोम्यणद्य माघे पाप प्रणाशनम् ।
मकरस्थेर रवौ माघे गोविन्दा च्युअत ।
स्नामनेनानेन मे देव यथोक्ति फदो भव ।
दिवाकर जगन्ननथ प्रभाकर नमोऽस्तुयते ।
परिपूर्ण कुरुष्वेादं माघस्ना्नं महाव्रतम् ।

ओना वैज्ञानिक दृष्टि‍कोणे गुँड खएला सँ शरीरमे गर्मी अएबाक कारणे जाढ मासमे एही पर्वके अति उपयोगी मानल जाइत अछि ।

जितिया पावनि- मनोज झा “मुक्ति”
मिथिलामे बहुतो पावनि बड श्रद्धापूर्वक मनाओल जाइत अछि । मिथिलाके साँस्कृ्तिक रुपसँ धन्निाक कहऽजायबामे एहि पावनितिहार सबहक बहुत पैघ महत्वथ रहल अछि । ओना सब पावनि सबहक अपन हटले महत्वे रहल करैत अछि, सब पावनिके अपन अपन प्रयोजन सेहो ओतबे विशेष भेल करैत छैक ।
मिथिलामे मनाओल जाएबला एकगोट महत्विपूर्ण पावनि सबमे सँ जितिया पर्वके अपने तरहक महत्व रहल अछि । मिथिलाञ्चोलमे प्रचलित अछि जे केओ पुरुष कोनहुँ दूर्घटनासँ बाँचिगेल त कहल जाइत अछि,माय षडजितिया केने छलै ताहिसँ बाँचि गेलै । ई वाक्य स्पघष्टि करैत अछि जे जितिया पावनि एकटा बेटाकेलेल हूनक मायद्धारा कायल जाइत अछि ।
भविष्य पुराणमे सेहो उल्ले ख अछि जे पुत्रक दिर्घायुक कामनासँ ई व्रत कायल जाइत अछि । जितिया पावनि, कृष्णा अष्टलमीक दुनू साँझ उपवास कऽ भोरमे तिथि बदललापर पारणा करबाक विधान रहल अछि । मिथिलाञ्चृलमे जितिया व्रतसँ एक दिन पूर्व अहिवात स्त्रि सब माछ मरुआ अरबधिकऽ खाएल करैत छथि । तहिना पावनि केनिहार विधवा लाकनि अर्वा अर्वाइन खाइत छथि । भिनसरमे जौं अष्टामी नहि पडल रहैत छैक त चूडा दही ल ओंगठन करैत छथि । ताएँ बुझाइया ई कहबी बनल छई, जितिया पाबनि बड ध्या न रखैत छथि । एहि तिथिमे योग विशेष भेलापर षडजितिया मनाओल जाइत अछि, जकरा बहुत पैघ मानल जाइत अछि । जाहि दिनमे प्रदोष कालमे अष्टनमी पडैत छैक ओह दिन व्रत होइत अछि, जौं दू दिन प्रदोष कालमे अष्ट मी पडैत अछि त खोसर दिन जितिया पावनि व्रत करबाक लोकाचार व्या प्त अछि । जाहिबेर उदय कालमे अष्ट मी पडैत अछि तहिया व्रत काएल जाइत अछि आ नवमीमे दोसर दिन पारणा कएल जाइत अछि ।
अष्ट मी जाहि दिन पडैत अछि ताहिदिन व्रत कयनिहार जाहि ठाम स्नारन करैत छथि( पोखरि,नदी या इनारपर ) ओकर प्राँगणमे पूवमुँहे ठाढ भऽ तामक अर्घामे मन्त्रा पढिकऽ सूर्य भगवानके अर्घ दैत छथि, एवं व्रतक सँकल्पँ लइछथि । सँकल्पम कऽ भरिदिन व्रत रहि साँझमे गायक गोबर सँ नीपि आँगनकेँ शुद्ध कऽ एकटा खधिया खुनि पोखरीक निर्माण कायल जाइत अछि । पोखरीक मोहारपर एकटा पाकडिक ठाढि आनि गारि देल जाइत अछि, गाछक डाढिपर गोबर माटिक चिल्हा राखिदेल जाइत अछि । गिदरनीक आकृति बनाबिकऽ डाढिक नीचामे राखि देल जाइत अछि । तकरा लगेमे जलसँ भरल कलश राखल जाइत अछि ।कलशमे कुशक जिमूतवाहनक मूर्तिक निर्माण कऽ राखल जाइत अछि । ताइकेवाद समय अनुसारक फलफूलके नैवेद्यक व्यतवस्थार ककऽ राखल जाइत अछि । नैवेद्यमे केरावक आकुरी आ खीराके राखब आवश्य्क मानल जाइत अछि । सब सामग्रीक ओरियाओन केलाकबाद व्रति महिला सब पूजा करैत छथि ।
जितिया पावनिके बहुत कठीन पावनि मानलगेल अछि । ई पावनि केनिहार व्रति महिलासब पानि त नहिंए पिवैत छथि, एतऽधरि कि ओसब खढोधरि नई खोंटैत छथि ।

धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन।
नव भोर जोहैत मिथिला
—धीरेन्द्रम प्रेमर्षि
राज्यी पुनर्संरचनाक लेल भऽ रहल अभ्यापसक असरि देशक समग्र क्षेत्रक सङहि मिथिलामे सेहो व्या पक देखल जा रहल अछि । जनता जागरुक आ उत्सुलक अछि— नेपालक नव–निर्माणमे मिथिला क्षेत्रकेँ अपन पृथक आ विशेष पहिचानक सङ्ग देखबाक लेल । सौँसे देशमे गणतन्त्रर आ सङ्घीय व्य–वस्थामक माङ जोर पकड़िरहल अछि । एहनमे मिथिलावासीमे सेहो एहन भावना जागब आ तकराप्रति सक्रियता देखल जाएब जतबए स्वामभाविक अछि, ततबए उत्सानहवर्द्धक सेहो । उत्सािह देशक स्व त्व‍ आ स्व तन्त्रएताप्रेमी ओहन नागरिकक लेल जे अपन माटिपानिक प्रति इमान्दा्र छथि, अपन राष्ट्रि य स्वातभिमानपर गर्व करैत छथि, जे मिथिलाक स्वीर्णिम इतिहासकेँ वर्तमान बनएबाक आकांक्षी छथि, आ जे यथार्थमे नेपाली जनताक सर्वतोमुखी विकास आ उन्नततिक पक्षपाती छथि ।
भूगोलसँ मिथिलाक अलोपित होएबाक पीड़ा हमसभ शताब्दिआयोसँ भोगैत आबिरहल छी । खास कऽ कर्णाटवंशीय मिथिला राज्यलक पतनक बाद विभिन्नभ कालखण्डिमे हमसभ यवन, अङरेज, गोर्खाली आदिक प्रहार निरन्त र सहैत आएल अछि । एतबा उत्पीयड़नक बाद जँ कोनो आन सभ्यणता वा संस्कृयति रहितए आ कि कोनो आनठामक लोक रहितए तँ आइधरि छिन्नयभिन्न होइत नेस्त्नाबूद भऽ गेल रहितए । मुदा मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक अस्तिनत्वर निरन्ततर सात सए वर्षसँ चलैत आएल अनेको तरहक कुचक्रक मारि सहितो जीवन्तम अछि । एकरा पाछाँ निश्चिैत रूपेँ मैथिल सभ्याता–संस्कृोतिक सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि । साँस लेबामे पर्यन्तप अशौकर्य भऽ रहल आइधरिक अवस्थाभमे सेहो अपनाकेँ जियाकऽ रखनिहार मैथिलीक एहि गौरवशाली आधारसभक प्रति नतमस्तपक होइत हम किछु पाँति गढ़ने छी—
मानैत छी जे आब रहल नइ दुनियाकेर भूगोलमे
तैयो हमसभ बचाकऽ रखलौँ जकरा माइक बोलमे
सोहर, लगनी, जटाजटिन कि झिझिया–साँझ–परातीमे
एकहकटा मिथिला जीबैए एकहक मैथिल छातीमे
उपर्युक्त काव्यांैश भूगोलविहीनताक घाओमे मलहम लगएबाक आभास दऽ सकैत अछि, मुदा मात्र छातीमे जीवैत भूगोल हमरासभकेँ सम्पूंर्णता नहि दिआ सकैत अछि । एहन–एहन कविता गढ़िकऽ असलमे कही तँ हमसभ अपनाकेँ परतारल करैत छी । एहि तरहेँ अपनाकेँ परतारिकऽ नहि राखल जाए वा जाहि बातपर हमसभ गौरव करैत छी तकरा युग–युगन्तरधरिक लेल जँ चिरस्थारयी करबाक हो तँ आवश्यरक अछि जे खालि छातीमे सैँतल मिथिलाकेँ हमसभ जमीनपर उतारी आ मैथिल भूगोलकेँ पुनः नामकरण करैत उर्वर बनाबी । एकरा लेल देशक एखनुक राजनीतिक वातावरण हमरासभकेँ सर्वोत्तम अवसर प्रदान कएने अछि ।
मुदा देशमे जाहि तरहक क्रियाकलापसभ देखल जा रहल अछि ताहिसँ ई नहि बुझाइत अछि जे हमसभ एहि अवसरक सदुपयोग करबाक दिशामे पर्याप्त सचेत आ गम्भी र छी । सर्वप्रथम तँ ई बात अबैत अछि जे एखनधरिक सरकारसभ वास्तरविक रूपमे सत्ताधारी वर्गसँ बाहरक लोकक लेल सेहो लोकतन्त्रम आएल छैक से मानैत–सन अपन चरित्र देखबिते नहि अछि । ई कटुसत्यस हमरासभक सोझाँ अछिए । वस्तु‍तः देशमे अखनो ओहने राजनीतिक दलक दबदबा अछि जे माघ १९ सँ पहिने संविधानसभाक नामे सुनैतदेरी कोनो बिगड़ैल साँढ़जकाँ भड़कि उठैत छल । वि.सं. २०४७ सालक संविधानमे कऽमा–फुलस्टागॅपधरिमे परिवर्तन करबाक आवश्य कता नहि देखनिहारसभ आइ नव संविधान बनएबाक बीड़ा उठौने छथि । एहनमे ओहि व्‍यक्तिसभक मानसिकता कतेक बदलल होएतैक से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि । जँ माओवादी जनयुद्ध नहि शुरू भेल रहितैक आ एखन जे मुद्दासभ उठल अछि से नहि उठाओल जइतैक तँ निश्चिात अछि जे हमसभ आजुक ई स्वकर्णिम वातावरण नहि पबितहुँ । मुदा जनयुद्धक मार्फत मैथिलीसभमे अधिकारक भूख तँ माओवादी जगा देलकैक, मुदा भुखाएलसभकेँ अन्नह देखैतदेरी जाहि तरहक कछमछी भऽ सकैत छैक, तकरा व्यावस्थि त करबा हेतु कोनो ठोस प्रयत्नभ कऽ सकबाक अवस्थार माओवादीक सेहो नहि छैक ।
मिथिलामे भेल पहिचानक आन्दो लनक क्रममे आयोजित एकटा पत्रकार–सम्मेकलनमे माओवादी नेता बाबुराम भट्टराई बाजल छलाह— ‘मधेशमे जे चेतना जागल छैक तकर वीजारोपण वा गर्भाधान के कएलक ? मधेश आन्दोालनक बाप के ?’ खास कऽकऽ २०४६ सालक परिवर्तनक बादक अवस्थाककेँ देखलापर हमरा जवाबक रूपमे ई कहबामे कनेको द्विविधा नहि होइत अछि जे माओवादी । मुदा एहिठाम ध्या्न देबायोग्या बात ई अछि जे कोनो योग्या नागरिकक सम्पू र्ण निर्माणमे बापक वीर्यक भूमिका अत्यबन्तय न्यूबन होइत छैक । मुख्यो भूमिका रहैत छैक— नओ मासधरि गर्भमे राखिकऽ जन्म‍ देनिहारि आ लालन–पालन कएनिहारि माएक । मुदा दुर्भाग्य्, मिथिलासहित देशक अनेको क्षेत्र, जाति, समुदायमे जागल चेतनाक बाप तँ माओवादी बनल, मुदा आब जखन माए बनबाक समय आएल अछि तँ देखा चाही जे ई भूमिका ओ कतेक कुशलतासँ निर्वाह करैत अछि । एहिसँ पहिने मधेशक पार्टी वा सङ्गठनसभ ओहोसभ खालि बाप बनबाक दम्भक मात्र देखा सकल । ई बात खास कऽ मिथिलाक भाषा–संस्कृ तिजन्यह भावनापर बेरबेर कुठाराघात करैत ओसभ देखा चुकल अछि । जँ मधेशी आन्दो–लन/विद्रोह बाप बनबाक अहङ्कारमे मोँछक लड़ाइ नहि बनितए, एकरा समटिकऽ–सहेजिकऽ चलनिहार एकटा माए भेटितैक, तँ आइ अवस्था् किछु भिन्नह रहितैक ।
अवस्था् तैयो बिगड़ल नहि छैक । सम्पूैर्ण मिथिलावासीक मनोबल अखनो ओतबए उच्चम छैक । एहि मनोबलकेँ सकारात्म‍क आ सार्थक परिणामपर अवतरण करएबाक लेल क्रियाशील होएबाक जिम्मेनदारी हमरेसभपर अछि । संसद आ सड़कसँ जनआवाज बुलन्द कएनिहारसभ बेर–बेर ई बात दोहराओल करैत छथि जे संविधानसभा सभसँ बेसी मधेशी, दलित एवं जनजातिएक लेल आवश्येक अछि । ओहि आवश्यकक संविधानसभा आ तकरा बाद बनल सरकारमे मैथिलसभक उल्लेुख्यज सहभागिता अछि । तेँ संविधानसभाकेँ अपन हकमे उपयोग करबाक दिशामे सभक क्रियाशीलता आवश्येक अछि । रहि गेल बात सशस्त्र आन्दोभलन कएनिहार जनतान्त्रिाक तराई मुक्ति मोर्चासभक, हमर विचारमे ओहोसभ राज्य सत्ताकेँ समदर्शीए बनएबाक लेल ई मार्ग अपनौने छथि । जनभावसँ निरपेक्ष राजनीति हुनकोसभक नहि भऽ सकैत छनि ।
सुदीर्घ राजनीतिक इतिहास समटिकऽ बैसल व्यनक्तिसभ एखन क्रियाशील मोर्चासभमे छथि । हुनकासभक आगाँ इहो चुनौती छनि जे हुनकेसभक देखासिखी कतेको अवाञ्छिकत तत्वीसभ मिथिलामे पएर पसारिरहल अछि । ओ तत्वचसभ हमरासभक मूल मुद्दाकेँ दरकिनार करबाक लेल जी–जानसँ लागल अछि । एहन अवस्थााकेँ विचारैत सेहो अपनाकेँ जनताप्रति उत्तरदायी बुझनिहारसभकेँ अपना–अपना दिससँ सेहो सहमतिक विन्दुअ तलाशैत रहबाक चाही । एम्हँर अन्यर पक्ष सेहो जँ व्याक्तिगत ईर्ष्याद–द्वेषसँ उपर उठि जनताक प्रति इमान्दा।र भऽकऽ आगाँ आबए तँ निश्चि त अछि जे सशस्त्रय समूहसभ सेहो आमिल पीबिकऽ नहि बैसल रहत । एहि काजमे सरकार आ विशेष कऽ माओवादीक भूमिका विशेष महत्वतपूर्ण भऽ सकैत अछि । किएक तँ जेसभ अलग बाट धएने छथि सेसभ अधिकांश माओवादीएसँ बहराएल छथि । जँ माओवादीसभ गम्भी रतासँ ई सोचथि जे जेसभ ओहन विकट–विकराल समयमे सङ्ग छल से आइ किएक अलग भऽ गेल तँ ई समस्याक जल्दीचए सलटि जाएत । ई विशुद्ध रूपसँ दियाद–वादमे होबऽ वला भावनात्मकक प्रहारक कारणे उत्पान्न‍ मतभिन्न ता भऽ सकैत अछि । एहिमे अलग विचार रखनिहार दियादक बात सुनिकऽ ओकर सम्मापन मात्र कऽ देल जाए तँ जतऽ कतौ ककरो अहंकेँ ठेस लागल होएतैक, से शान्तर भऽ जएतैक । शान्तिलक जोरक आगाँ केहनो कड़गर हथियारकेँ घमऽ पड़तैक आ घमि जएतैक से हमर दृढ विश्वा स अछि । रहल मिथिलाकेँ साकार रूप देबाक बात, तँ एहिमे एतबए कहब—
जखन जनजन ई मिथिलाक जागि जेतै भाइ
हेतै सोन मढ़ल भोर, राति भागि जेतै भाइ ।
३.पद्य
३.१. १.राम नारायण देव २.निमिष झा
३.२. १.अमरेन्द्रण यादव २.मनोज मुक्तिे
३.३.-१.ज्योति-२.गजेन्द्र
३.४. १. सच्चिणदानन्दग यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन
३.५. १.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप
३.६. कुमार मनोज कश्यप
१.राम नारायण देव २.निमिष झा
मिथिला राज्यन- राम नारायण देव

उठल मधेशी कयल हुँकार
लऽके रहत, अप्प न अधिकार
जन जनकेँ, एके आवाज
सबहक माँग, मिथिला राज्य
अप्प न भाष, अप्पथन सँस्कृ ति
अप्प न अर्थनीति, अप्प‍न राजनीति
मधेशी आन्दो्लनक यैह सन्देपश
अप्पीन बात, अप्प्न परिवेश
निरँकुश राजतन्त्र क भेल अवसान
भेंटल लोकतन्त्र्क बरदान
मेची—महाकाली उमडिगेल अछि
राज्य शक्तिी मुकिगेल अछि
उठू बन्धून, उठाउ तरवार
भगाउ सामन्ती‍ राजदरवार
गठन करु गणतन्त्र क सरकार
करु राज्यणक पुर्नसँरचना
समावेसी लोकतन्त्रक आ समानुपातिक कल्परना
अप्प न विकार, अप्पेन विचार
आव कियो नहि रहत, शिक्षित वेरोजगार
छोडू आपसी मेल, करु विकासक मात्र खेल
उखाडि फेकू, राजाक ताज
तखन भेटत अप्पहन स्वजराज
जन—जनके एके आवाज
सबहक माँग, मिथिला राज्यआ ।

जीवन एकटा दुरुह कविता

निमिष झा
अर्थहीन शब्द क
अर्थ खोजबाक अभिलिप्साकमे
अनायास थमि जाइत अछि आँखि
फाड़ि दैति छियै
पन्ना क पन्नाँ
चेतनाक शब्दछकोश
आ भोगैत छी
एकटा पराजयक थकान
जतय नहि भेटैत छै
जीवनक यर्थाथक अर्थ
आ ताएँ
बुझाइत अछि
जीवन एकटा दुरुह कविता छै ।

बजैत छै
लयात्मकक गीत
जीवनक मधुर सङ्गीत
आ छम…छम…कऽ नचैत सङ्गीतसँग
असंख्यम कलात्म क पायर
आ प्रस्फु.टित भऽ जाइत छै जीवन उपवनमे
मुदा
अनायास फेर
बन्दा भऽ जाइत छै सङ्गीतक धुन
थाकि जाइत छै पायर
मुरझा जाइत छै उपवनक फूल
आ ताएँ
बुझाइत अछि
जीवन एकटा सारहीन सङ्गीत छै ।

आन्न द छै
माछ जकाँ
जीवन सरोवरमे हेलब
उल्लासस छै
एकटा गुड्डी जकाँ
आकाशमे उड़ब
मुदा उड़ि नहि सकैत अछि
हमर आल्हा दित मोन
आ अनायास
उल्लायसक धरातलसँ
दुर्गतिक चट्टान पर
अनवरत खसैत छै मोन
आ डुबि जाइत छै
सरोवरमे
आ ताएँ
बुझाइत अछि
गुड्डी जकाँ उड़ि नहि सकबाक
आ माछ जकाँ
हेलि नहि सकबाक
नियतिक भोग छै
जीवन ।
हाइकु
निमिष झा
१)गरम देह
छिछैल गेल मोन
अमृत–वर्षा ।

२)रामनवमी
एलै एहू बेर
मुदा राम नै ।

३)नै छै उत्सा ह
कुचाग्रक छुवन
ई शरीरमेँ ।

४)अपन पीडा
आँचरिमे नुकबै
हमर माय ।

५)छाह खोजैछ
ग्‍ााछ काटि काटिकऽ
सभ्यम मानव ।

६)प्‍ाावस राति
गवै उन्मुोक्तक मोन
विरह गीत ।

७)नकली हँसी
कुटील व्य।वहार
आजुक छौडी ।
(१)
पीयर पात
पतझरक बाद
तुत्छ होइछ ।

(२)
लोचन नीर
नहि बुझै जगत
बहैछ स्फूजर्त ।

(३)
प्रेमक द्वारि
बन्दम भऽ जाइत छै
स्वामर्थक आगू ।

(४)
खुलल वेणी
पियाक प्रतीक्षामे
खुल्लेप रहलै ।

(५)

हम भ्रमर
नोचि देलियै फूल
विजेता बनि ।

(६)

पावस राति
गवै उन्मु क्त मोन
विरह गीत ।

(७)

अन्त र नहि
कागज आ हृदय
जखन फटै ।
असमर्पित उन्माकद-निमिष झा

अहाँक वएह नयन, वएह मोन आ वएह तन
हम देखिरहल छी, सुनिरहल छी आ भोगिरहल छी
समयक लम्बा अन्तोरालक बाद सेहो
आँखि खोलैत आ मिचैत सेहो
आ अहाँ हमर शरीरक अदृश्यो सरित प्रवाहमे
सर्वाङ्घ समाहित छी, सज्जिरत छी ।

ई अभीष्ट रूप अहीँक थिक
जकर अनुपस्थि‍तिमे हमर चित्त
शुष्कन सिकतातुल्यह भङ्ग गेल अछि
ई शीतल छाहरि अहीँक थिक
जकर अभावमे
हरेक निमिष हमरा लेल
नीरस आ उदास वसन्ते बनि गेल अछि ।

अहाँ पाइन छी हमर पियासक
अहाँ वसन्ता छी हमर बसातक
तएँ एकटा अतृप्ती उन्माेद
नाचि रहल अछि भैरव बनि
हमर मानसमे ।

हमर स्ना युक रोबरोबमे
एकटा विषाक्त तृष्णार
बहिरहल अछि
आ बहिरहल अछि
हमर धमनीक कणकणमे
एकटा उन्मुकक्त तृषा ।

बहुत बेर उघारि दलियै, फाडि देलियै
नृशंस बनि आवेशसँ
लज्जा क पर्दासभ
आ बन्दब क’ देलियै नैतिक मूल्य सँ
पाशविक उन्माददसभ ।

हँ
आईयो ओहिना स्मृ तिमे लटपटायल अछि
अहाँक गरम साँसमे
गुञ्‍जित हमर जीवन संगीत
अहाँक आँचरिमे ओझरायल हमर सर्टक बट्टम
अनार जकाँ अहाँक दाँत पर
पिछरैत हमर जीह
अहाँक ब्ला उजक हुकसँ खेलैत
हमर दसो आँगुर
आ अहाँक सुन्दहर छाल पर
दौडैत हमर ठोर ।

तथापि किएक नहि मिझाइत अछि
छातिक ई उन्महत्त मोमबत्ति
किएक निष्कामम नहि होइत अछि
मोनक उत्तप्त‍ बोखारसभ
जेना अहाँ
दारुक प्या्ला होई
आ हम चुस्कीत ल’ रहल छी
मदहोस भ’ रहल छी
अहाँक स्वकप्निहल लज्जाीनत तनमे
निमिष निमिषमे ।

मुदा उफ
ई केहन विडम्ब ना
नित्यनशः
एक्केनटा विन्दू पर दुर्घटना होइत गेल
हमर उच्छृडङ्खल वासनासभ
अहाँक दर्शन आ सिद्धान्तवक शिखरसँ
नितदिन एक्केआ रस्ता‍ घुरि जाइत छल
अभिशप्तए अहाँक विचार
हमर अभिशून्य‍ मस्तिाष्काके झकझोरैत छल ।

शायद कमजोरी हमरा मे छल
कि, गिद्ध बनि हम युद्ध नहि क’ सकलौं अहाँक तनसँ
शायद महानता अहाँक छल
माला बनि अहाँ समर्पित नहि भ’ सकलौं हमर गलासँ ।
१.अमरेन्‍द्र यादव २.मनोज मुक्ति
कल्प.ना आ यथार्थ- अमरेन्द्रि यादव- दिघवा, सप्त४री ।
जिनगीक हड़हड़ खटखटसँ दूर
मृत्यु क तगेदासँ अन्जाान बनल
जिनगीक अति व्यकस्तअ समयसँ
किछ पलखति चोराकऽ
अहाँक यादक उडनखटोलामे
उडि जाइ छी हम
प्रेमक अन्तहरिक्षमे ।
नदीक ओहि पार
दू गछिया तऽर
हमर कोरामे औङ्गठल
हमरासँग हँसैत बजैत
खाइत छी अहाँ सप्पतत
खाइत छी हमहूँ सप्पात
अहाँक तरहत्थी केँ चुमिकऽ
खोसि दैत छी हम
एकटा गेनाक फूल
अहाँक खोपामे ।
तखने हमर नाकमे अचानक
ढकैत अछि जरल तरकारीक गन्ध
आ अकचकाइत उठैत छी हम
मिझबय लेल स्टो भ
तखने हमर नजरि पडैत अछि
टेबुलपर राखल चिठीपर
जे काल्हिाए एलै हमर गामसँ
आ हमर आगा नाचय लगैत अछि
भरना लागल खेत
बाबुक फाटल बेमाय
बहिनक कुमारि सिँथ
भायक पढाइ खर्च
आ मायक दम्मा् बेमारी ।

हमर मैथिली-अमरेन्द्रन यादव

डाक्ट र चन्देमश्व रजी,
अहाँक बाबुजी पियौने हेथिन्ह्
उठौना दूध
अहाँकेँ पोसने हेथिन्हन भाड़ापरक माए
लेकिन हमरा नओ महिनाधरि गर्भमे
मैथिलीए केलखिन्हि सम्हाार
सोइरी घरमे सेहो मैथिलीए केलखिन्ह‍ दुलार
हम कनियाँक स्पोर्श विना जीबि सकैत छी
हस्थनमैथुनक उत्क र्ष विना जीबि सकैत छी
लेकिन मैथिलीक आकाश विना नहि
मैथिलीक श्वाथसप्रश्वािस विना नहि
डाक्टीर चन्देवश्वररजी,
हमर खाँडो, खुट्टी आ बलानमे बहै हइ मैथिली ।
हमर दिनाभदरी आ सलहेशक दलानमे रहै हइ मैथिली ।

स्मिभताक लडाई- मनोज मुक्ति
पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्यईभिचार सब भेषमे
आन ठाम त बाते छोडू अबुह लगैया अपनो देशमे ।
प्रकृतिक देल ई आँखि,कान ओ बडका नाक आब दुष्म न प्रतित होइया
सँसारमे अपन अलग छाप छोडने मिथिलावासी,डरपोकक हूलमे सरिक होइया ।
अपना समस्तन अधिकार सऽभसँ बन्चिनत होइतो,बँचल छी काइल्हुवक आशामे
भ्रष्टम प्रशासन ओ नेताक लोभ सँ, जकडा रहल अछि देश, विदेशीक पाशामे ।
एतेक कठीन आ दूर्लभ मनुष्येक जीवन पाओल स्वजर्ग समान एही मिथिलामे
मूदा लगैछ जे जन्मभजाते अभागल थिकहुँ जे दूर्दशा होइत देखैछी, मिथिलाके अपन आगामे ।
सम्पू र्ण श्रृँगार सँ सुशोभित जगतक माय ओ विलक्षणा सीता आई घरसँ निकालल जाऽरहल अछि
मिथिलावासी एम्ह्र ओम्हसरक वात सुनैत, घरक एकटा कोनामे बहादुरी देखाबि रहल अछि ।
भऽरहल अछि सस्ता् रँग सँ शोणीत जाहिसँ सब छथि नहाएल
कतेक दिन सऽब चुप्पे् रहतै, बैसतइ एना नुकाएल?
ताहि सँ,
एहि स्मिहताक लडाईमे बचने मात्र सँ काज नई चलत
सम्पू्र्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लडहिटा पडत ।
१.ज्योति२.गजेन्द्र

जाड़ आयल-ज्योति
जाड़ आयल अछि बदरीक संग
धुन्धक कुहराम सऽसब अछि तंग
दृष्टिक सीमा छोट़ धूमिल सब रंग
शीतलहरी अपन धुनमे अछि मतंग
सूर्यक निष्ठुरता देखि सब अछि दंग
कियैक नहिं करैत अछि शीतक गर्व भंग

बुच्ची सबके छैन माघ नहायक पारी
गाँती बन्हने बच्चा करैत स्कूलक तैयारी
संघर्षरत नवयुवक सबहक के करै पुछारी
चायक चुस्की लैत छैन चौक पर बैसारी
कनिके देर मे करता सायकिल के सवारी
नहिं तऽ पकड़ता कॉलेज दिसका टायर गाडी

दलानपर घूर लागल लोकक जुटान भेल
कोन साल बेसी जाड़ छल से बखान भेल
देश विदेशक समाचार शान्त भऽ सुनल गेल
जखन गीतक कार्यक्रम रेडियो पर आरंभ भेल
विचारक आदान प्रदान फेर सऽ प्रारंभ भेल
भोजनक समय जानि सभाक समापन भेल

पुरोहित- गजेन्द्र ठाकुर
लघु उद्योगक पुरोहितक
घर जेना राजा सभक,
दारू पीबि मँतल,
मुदा सरकारक छन्हि जिद्द,
लघु उद्योगकेँ करताह समृद्ध,
लघु उद्योगकेँ वा लघु उद्योगक पुरोहितकेँ,
बना कय कम्पनी, लए सरकारी ऋण,
बन्द करथि कम्पनी,
कम्पनी मालिक नहि,
निदेशक छी हम,
कम्पनीकेँ होइछ घाटा तँ
मजदूर छथि मरैत,
नहि किछु होइछ निदेशकक,
कम्पनी अछि मरैत।
अर्थशास्त्र बनबैत अछि कम्पनीकेँ मनुक्ख,
आऽ मनुक्ख बनैछ कनमुँह।

वेश्यावृत्तिक संसार
आब नर्तकीक घर नहि,
गेल अछि पैसि राजनीति,
धननीति आऽ पर्यटननीतिम्र्,
आम्रपाली पहिरि चश्मा करैत छथि चालन वाहनक,
नायक मृच्छकटिकक, होटल व्यवसायी,
नव जाति व्यवस्थाक पुरोहित,
आम्रपाली बनलि अनुलोम व्यवस्थाक शकुन्तला,
मुदा गाम एखनो वैह,
विधवा, दलित, गरीबीक खेरहा सैह।
पीयर आऽ लाल होइत
चौबटियाक बत्ती सभ,
लुधकैत, गाड़ीक शीसा पोछैत,
अखबार पत्रिका बेचैत,
नव जाति-व्यवस्थाक दलित,
बचिया-बच्चा सभक पाँती।
कोरामे बच्चा लेने युवा भिखमंगनी,
निरीह आँखि, पैर खञ्जित,
खञ्जित पएरे बढ़ैत आगाँ।
मुदा भने ओहि चौबटियापर
शानसँ भीख मँगैत अछि बालगोविनक झुण्ड,
भीख नहि आशिरवादी,
पाइ देलहुँ तँ ठीक नहि तँ
गारिक प्रसादी।
औद्योगिक क्षेत्रमे सेहो
कोयलाक भट्ठीक धुँआसँ
कारी भूत भेल श्रमिक
ईहो छथि नव जाति व्यवस्थाक दलित।

घृणाक आस्वाद
घृणामे आस्वाद
संवादक अन्त
मतवैभन्यक प्रारम्भ

दिल्ली-मुम्बईक हाट,
तरकारी माँछक बजार,
होटलक बनथि भनसिया,
पुत्र-पुत्रीक विवाह दानोमे जाति गौण,
विधवा-विवाह क्षम्य,
मुदा जखन यैह सभ घुरैत छथि गाम,
नील-टीनोपाल दए नव व्यवस्थाक दलित,
बनि जाइत छथि पुरातन व्यवस्थाक पथिक,
तरकारी बेचनिहार जयबार,
औद्योगिक क्षेत्रक कारी मुरुत,
साबुनसँ रगड़ि चाम,
भए जाथि गामक भलमानुष,
होटलक भनसिया भऽ जाइत छथि सोइत,
सरदारजीक मोहर्रिर कयस्थ,
पासवानजी भऽ जाइत छथि दलित,
घुरैत काल ट्रेनहिमे फेर सभ मिलि
नव व्यवस्थाक आऽ पुरातनक करथि मेल।
ट्रेन अछि साक्षी
एहि मनसि द्वैधक
अमूर्त व्यवस्थाक धँसल आँखिक,
उजड़ा नूआक व्यथाक, युवा विधवाक,
आम्रपालीक आऽ मृच्छकटिक नायक चारुदत्तक,
आऽ बसन्तसेनाक।
१. सच्चिछदानन्दद यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन

आई हम ठाढ़ भेल छी- सच्चितदानन्द यादव,रायपुर– ६, सप्त री

आई हम ठाढ़ भेल छी
चौबटियापर नइँ,
बाट तऽ एक्केँटा छै
मुदा ओकरा रुकय पडतै
जे हमरा एतय अनलकै
हम ठाढ़ भेल छी ठीक ओहिना
जेना कपड़ाक दोकानमे पुतरा
सभदिन नव नव पहिरनमे
ठाढ़ भेल रहै छै
आ, किनयबला देखै छै
उन्टा पुन्टाबकऽ ।

३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक।
हम पुछैत छी

इतिहास साक्षी अछि
आय धरि हम अहां स
कोनो सवाल नहि पुछलहुं
कोनो गप नहि बुझलहुं

मुदा, समय एतेक बदलि गेल
जाहि सं हम पुछैत छी
नहि त जे रहत तटस्थ
समय लिखत हुनको इतिहास

जन्म सं मृत्यु धरि
संस्कार आ समाजिकताक
बंधन स लोकवेद क
जकड़हि छी किया, हम पुछैत छी

हम पुछैत छी, सबकए अपन
तरहै जिबाक छैक अधिकार
तखन अपन कर्तव्य बिसरि कए
दोसरक अधिकारक हनन किया

हम पुछैत छी, अंगरेज चलि गेल
मुदा, अंगरेजियत लबादा किया अछि
किया अछि क्लासक पढ़ईक सिस्टम
जिनका जे नीक लगिते ओ से विषय पढ़िते

हम पुछैत छी, नेना स जीवनक लक्ष्य
निर्धारित किया नहि होइत छैक
समयक पाछु किया हम चलैत छी
समयक आगू चलैक मे कोन तकलीफ़

हम पुछैत छी, सूर्य सेहो उगैक काल बदलैत रहैत अछि
तखन हम अपन सुतबाक, उठबाक आ खाईके
समय किय निर्धारित करैत छी
किया निर्धारित होइत अछि आफ़िसक टाइम

हम पुछैत छी, गाम-घरक लोक
अपन गाम आ अपन जिलाक आगूक दुनिया
किया नहि देखैत अछि
जखन कि चिड़ैय-चुनमुन कतय नहि जाइत अछि

हम पुछैत छी, अठारह साल मे
जकरा देशक नेता चुनैक सूझ छैक
ओ अपन करियर आ अपन भविष्यक सूझ
किया नहि रखैत अछि

हम पुछैत छी, रामायण आ महाभारत अहि ठाम लिखल गेल
एकरा मे जतेक खिस्सा छैक
ओकरा स बाहर किछु नहि भ रहल छैक
तखन आश्चर्य किया होइत अछि

हम पुछैत छी, ई देशक नेता
चुनावक काल मे सेवा करैक शपथ खाइयै
मुदा, समय बीतलाह पर देश कए खाइयै
तखन हिनका लेल अहां तामस किया नहि फ़ूठैत अछि

हम पुछैत छी, जति आ धर्म, गोरि आ कारि
जखन भारत स ल कए अमेरिका तक
झगड़ाक कारण छैक
तखन एकरा खत्म करबा लेल अहांक खून ठंडा किया परि जाइत अछि

हम पुछैत छी, दुनियाक शांति लेल
पूरा दुनिया एक छैक
मुदा, घरक शांति लेल
हम किछु नहि करैत छी

हम पुछैत छी, दुनिया मे बेरोजगारी
महामारिक रूप धरि रहल अछि
मुदा, अपन रोजगार खोलबाक लेल
जर किया भो जाइत अछि

हम पुछैत छी, बाढ़ि आ सूखाढ़ से छी त्रस्त
दू सांझक रोटीक जुगाड़ लेल छी पस्त
तखन ई शासन कए बदलबाक लेल
अहां कए वोट देबा मे दिक्कत की होइत अछि

हम पुछैत छी, चोरी-लूटपाट होइत अछि रोज
पुलिस करि रहैत अछि अपराधिक खोज
तखन अहि सब से सचेत हेबाक मे
किया नहि रहैत अछि आहंक होश

हम उत्पल
जाति-धर्म-भेदभाव से
उपर उठि कए पुछैत छी
अहांक अपन व्यवहार
अहांक अपन आचार
अहांक अपन जति
अहांक अपन धर्म
अहांक अपन स्थान
अहांक अपन कर्म
अहांक अपन पेशा
अहां कए जे लागैत अछि गलत
ओकरा बदलहि मे
की होइत अछि

मुदा, अहि ठाम करैत छी घोषणा
जखैन धरि अहां अपनै नहि बदलब
ताहि धरि नहि बदलत समाज
नहि बदलत राष्ट्र
नहि बदलत दुनिया.

जितमोहन झा घरक नाम “जितू” जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि।
जखन जनता जागि जाइत अछि !

मुम्बईकेँ अपन कहै वला नज़र कियेक नञि आबैत छथि !
मुम्बईक दुश्मन सभ सँ ओ कियेक नञि टकराबैत छथि !!

की ताज, ओबेराय, मरीन हाउस, मुम्बई मs नञि अछि !
या फेर मुम्बईक ठेकेदार अपन मौत सँ घबराबैत छथि !!

दोसर प्रान्तक कहीकेँ अपने सभ लोग कs मारैत छथि !
दोसरे प्रान्तक लोग सभ मुम्बई पर जान लुटाबैत छथि !!

अपने देशक लोग जखन रहैत छैथ तिनका केँ तरहे !
ओ कनियोटा वारसँ लकड़ीक तरह टुईट कs बीखैर जाइत छथि !!

शर्मो नञि आबैत छैन अपन देशक निकम्मा नेता कs !
बजैत छला की पैघ-पैघ शहर मs छोट-मोट हादसा होयते रहैत अछि !!

मुम्बईक जंगमे शहीद तँ बहुत जवान भेला मगर !
शहर मे खाली चंद शहीदक फोटो लगायल जैत अछि !!

जे दुश्मन हमरा देश पर करैत अछि छुप – छुप कs वार !
हमर नेतागन ओकरा कs दावत पर इज्जत सँ बजाबैत छैथ !!

सुइन लिय सभ नेतागन जखन जनता जैग जैत अछि !
तखन कुर्सी खुद – ब – खुद निचा भैग जैत अछि !!
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४

In विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४ on जनवरी 13, 2009 at 5:11 अपराह्न

विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४

‘विदेह’ १५ दिसम्बर २००८ ( वर्ष १ मास १२ अंक २४ ) एहि अंकमे अछि:-
एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१.कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. भ्रमर ३.गजेन्द्र ४.परमेश्वर कापड़ि आ ५.शुशान्त
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
२.५. 1.आलेख-महेन्द्र कुमार मिश्र/ 2.दैनिकी-ज्योति/
२.६. रिपोर्ताज- मनोज मुक्ति- 1.अवैद्य नागरिकताः सिक्कलमीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोंलनः लूटमे लटुवा नफ्फाथ,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्वंविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टजक विकास
२.७. जितिया/ मकड़ संक्रांति-मनोज मुक्ति
२.८. धीरेन्द्र प्रेमर्षि-नव भोर जोहैत मिथिला
३.पद्य
३.१. १.राम नारायण देव २.निमिष झा
३.२. १.अमरेन्द्रण यादव २.मनोज मुक्तिद
३.३.-१.ज्योति-२.गजेन्द्र
३.४. १. सच्चिणदानन्‍द यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन
३.५. १.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप
३.६. कुमार मनोज कश्यप
४. गद्य-पद्य भारती
५. बालानां कृते
६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
8.१.The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti
९. मानक मैथिली
विदेह (दिनांक १५ दिसम्बर २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१२ अंक:२४)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक २४, दिनांक १५ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
४१म आ ४२म ज्ञानपीठ पुरस्कारक घोषणा- हिन्दीक नवीन कविता आन्दोलनक सशक्त कवि श्री कुँवर नारायणकेँ ४१म ज्ञानपीठ पुरस्कार (२००५) आ कोंकणीक श्री रवीन्द्र केलेकर आ संस्कृतक श्री सत्यव्रत शास्त्रीकेँ संयुक्त रूपसँ ४२म ज्ञापीठ पुरस्कार (२००६) देबाक घोषणा भेल अछि।
श्री कुँवर नारायणक जन्म १९२७ ई. मे भेलन्हि। अज्ञेय द्वारा सम्पादित “तीसरा सप्तक”क सशक्त कवि कुँवर नारायणकेँ एहिसँ पहिने साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि।
श्री रवीन्द्र केलेकरक जन्म १९२५ ई.मे भेलन्हि, हिनकर कोंकणी भाषा मण्डलक निर्माणमे प्रमुख भूमिका रहल छन्हि।
श्री सत्यव्रत शास्त्री संस्कृतमे तीन गोट महाकाव्यक रचना कएने छथि। रवीन्द्र केलेकर आ सत्यव्रत शास्त्रीकेँ सेहो साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि।
संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ दिसम्बर २००८) ६८ देशक ६५४ ठामसँ १,३२,७९७ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
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लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00
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फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
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संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00

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अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत

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बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ

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पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८
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२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ’ गेल।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक “नो एंट्री: मा प्रविश” केर ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल ‘विदेह’ केर समक्ष “श्रुति प्रकाशन” केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे -१.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि’(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ’(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे- कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
महत्त्वपूर्ण सूचना (४): “विदेह” केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (५):मैलोरंग २५ दिसम्बर २००८ कें सेमिनारक आयोजन एन.एस.डी. कैम्पस, भगवानदास रोड, नई दिल्लीमे आयोजित कएने अछि।
२.गद्य
२.१.कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. भ्रमर ३.गजेन्द्र ४.परमेश्वर कापड़ि आ ५.शुशान्त
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
२.५. 1.आलेख-महेन्द्र कुमार मिश्र/ 2.दैनिकी-ज्योति/
२.६. रिपोर्ताज- मनोज मुक्ति- 1.अवैद्य नागरिकताः सिक्कलमीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोतलनः लूटमे लटुवा नफ्फाथ,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्वतविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टकक विकास
२.७. जितिया/ मकड़ संक्रांति-मनोज मुक्ति
२.८. धीरेन्द्र प्रेमर्षि-नव भोर जोहैत मिथिला
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

एकटा अंत
समदियाकेँ देखिते माथ ठनकल । कतहु ससुरकेँ ने किछु भऽ गेलनि ! ओ बहुत दिनसँ दुखित रहथि । डाक्टरो जवाब दऽ देने रहनि । हम एक मास पहिने देखि आयल रहियनि । हमर पत्नी सात-आठ मास पहिने गेल छलीह । फेर आनो बेटी सभ भेंट कऽ अयलनि । सभ क्यो हुनक मृत्युक प्रतीक्षामे रहय ।
‘कका खतम भऽ गेलथिन’-समदिया बाजल ।
‘कहिया हौ ?’-पत्नीम चकित होइत पुछलथिन आ जा समदिया ‘चारि दिन पहिने’ बाजल ता पत्नीक क्रंदन शुरू भऽ गेलनि । ओ कनैत रहलीह आ बीच-बीचमे अपन उलहन, अपन पछतावा जनबैत रहलीह । बाकी सब शोकाकुल मौनमे डूबि गेल ।
बुझाइत अछि ससुर देह त्यागि एत्तहि चल आयल छथि आ हमर सभक मन-प्राणमे बसि गेल छथि । चेतनामे हुनक स्मृति निरन्तर चलि रहल अछि ।खाइत-पिबैत, उठैत-बैसैत दिन-राति हुनके चर्चा होइत अछि। हमरासँ पत्नी केँ शिकायत छनि जे हमरे कारणे ओ अपन पितासँ अंतिम समयमे भेंट नहि कऽ सकलीह । हम कहि देने रहियनि जे ठीक छथि । आइसँ एक मास पहिने ओ ठीके नीक रहथि । लेकिन एकटा बात हम नहि कहने रहियनि । ओ कहऽ वला बात नहि रहै । मात्र एकटा पूर्वाभास । जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तऽ हुनकर आँखिमे ताकने छलियनि । ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह । आ हमरा दुनूकेँ बुझायल रहय जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होयत ।
सएह भेल । ओ चल गेलाह । आब नहि भेटताह । लेकिन ओ दृष्टि मनमे अखनो ओहिनाक ओहिना गड़ल अछि आ हुलकी मारैत रहैत अछि । अइ अनुभव दिआ हम पत्नी केँ किछु नहि कहलियनि । गोपनीय नहि होइतो ई ततेक व्यकक्तिगत रहै जे एकरा बँटबाक इच्छा नहि भेल। व्य क्तिक जीवनमे एहन बहुत रास अनुभूति होइत छैक जे ओ ककरो नहि कहैत अछि; जे ओकरे संग चल जाइत छैक।
हमसभ ससुर संग बीतल समय आ प्रसंग मोन पाड़ैत रहैत छी; एक-दोसरकेँ सुनबैत छी। वात्सल्य स्नेह आ प्रेमसँ भीजल क्षणकेँ स्मरण करैत पत्नी भावुक भऽ जाइत छथि, कंठ अवरूद्ध भऽ जाइत छनि आ आँखि नोरा जाइत छनि । ओ बजैत छथि-’बाबू कहियो हमरा बेटी नहि कहलनि; सभदिन बेटा कहैत रहलाह । पछिला बेर चलैत काल भेंट करऽ गेलियनि तऽ पुछलथिन-चूड़ी नहि पिन्हलह ?आब के एतेक निहारि-पिहारि कऽ देखत जे चूड़ी नव अछि कि पुरान ?’ पत्नी सोगमे डूबि जाइत छथि ।
हमसभ हुनक अंतिम अवस्थाक कष्ट, उपेक्षा आ निराशाक चर्च करैत छी । परिवारक के कतेक सेवा केलकनि, के कतेक अवहेलना, तइपर टीका-टिप्पणी करैत छी आ सोचैत छी हमहीं सभ की केलियनि, किछु नहि ।
नह-केशसँ एकदिन पहिने सासुर पहुँचैत छी ।मृत्यु जे शून्यता आ नीरवता छोड़ि गेल अछि, कन्नारोहटि तकरा तोड़ैत रहैत अछि। भोज-भातक गप आ ओरिआन चलि रहल अछि । हमरा लगैत अछि श्राद्धक कर्मकांडमे व्यस्त भऽ कऽ लोक सोग बिसरि जाइत अछि । कर्मकांडक और कोनो सार्थकता नहि छैक ।
हमर एकटा साढू अखने आयल छथि-केश कटेने । जहिया समाद गेल हेतनि, तहिये या अगिला दिन कटेने हेताह । हमरा सन सम्बन्धी लेल तीन दिन पर केश कटेबाक विधान अछि। हमरा चारि दिन पर खबर भेटल रहय आ हम सोचने रही जे केश नहि कटेबा लेल एकरा ढाल बनाओल जा सकैत अछि। लेकिन साढूक मूड़ल माथ देखि बुझायल जेना ई तर्क ठठऽ वला नहि अछि। हम चिन्तित भऽ जाइत छी ।एहि लेल नहि जे बेलमुंड भऽ गेलापर देखऽ मे नीक नहि लागब । केश तऽ हम नहिए कटायब । तँइ बेलमुण्ड हेबाक तऽ प्रश्ने नहि अछि । लेकिन विरोध बहुत होयत । हम उठल्लू भऽ जायब । एकरे चिन्ता अछि ।
नह-केश दिन ठाकुर भोरे चल आयल अछि । केशकट्टी चलि रहल छैक । हम दू-तीन बेर टहलि कऽ एहि कर्मकेँ देखि आयल छी । एकबेर एक गोटय पुछबो केलक—’कटेबै ?’ हम हाथसँ अस्वीकृतिक मुद्रा बना घूमि गेलहुँ । ओ सोचने होयत बादमे कटेताह । हमर एकटा आर साढू आबि गेल छथि। आ केश कटवा रहल छथि । एकटा क्षण एहन अबैत अछि जखन घरक सभ पुरूखक माथ छिलायल अछि आ एकमात्र हम विषम संख्या सन बचल छी । आब कतेको गोटय पूछऽ लागल अछि-’केश नहि कटेबै ?’ ‘की हेतै ?’ कहैत हम टरि जाइत छी ।
आब ककरा-ककरा बुझौने घुरियौ जे हमरा एहि कर्मकांडमे विश्वास नहि अछि। बुझेबो करबै तऽ क्यो बुझऽ लेल तैयार होयत ? लेकिन हमर केश सभक आँखिमे गड़ि रहल छैक ; अनटेटल आ अनसोहाँत लागि रहल छैक ।
हम दाढ़ी बना रहल छी । सोचने छी तकर बाद नह काटि लेब । सासुक नजरि हमरा पर पड़ैत छनि । बेटीसँ पुछैत छथिन-’दुल्हा केश नहि कटेलथिन ?’ हमर पत्नीकेँ खौंत नेस दैत छनि । हमरा दिस तकैत फुफकार छोड़ैत छथि—’आ गय, पापी छै, पापी । पता नहि बाप मरल रहै तबो केश कटेने रहै कि नहि !’
हमरा तामस उठैत अछि; दुख होइत अछि, लेकिन चुप रहि जाइत छी। केश कटा कऽ हमर दुनू साढू निश्चिन्त छथि । एकटा तऽ पी रहल छथि आ कखनो आयोजन तऽ कखनो सारि-सरहोजिक आनंद उठा रहल छथि ।
केश कटा लेने रहितहुँ तऽ हमरो लेल सब किछु आसान आ अनुकूल रहितय ।लेकिन विश्वास आ आत्माक खिलाफ कोनो काज करब हमरा बूते पार नहि लागि सकैत अछि। केश कटेने मृतात्माकेँ मुक्ति आ स्वर्ग भेटि जेतैक आ नहि कटेने नरक ? एहन विचार हमरा लेल हास्यास्पद अछि । तखन केश कटेबाक कोन तुक? की एहि लेल जे देखू हम हुनक सम्बन्धी छी आ शोकाकुल छी ? सम्बन्ध आ सोगक एहन प्रदर्शन हमरा बहुत अरुचिकर बुझाइत अछि । हमर वश चलितय तऽ सब कर्म आ भोज-भात बंद करबा दितियै ।सोचि लेने छी जे लिखि कऽ चल जायब जे हमर मृत्युक बाद ई सभ नहि हो ।
बुझाइत अछि हमर पितिऔत सारकेँ क्यो हुलका देने छनि ।ओ धड़धड़ायल अबैत छथि आ हमर डेन पकड़ि घीचने ठाकुर लग लऽ अनैत छथि—‘ठाकुर, छिलह तऽ ।’ ठाकुर आदेश सुनियो कऽ उठैत नहि अछि। सार हमर कनहामे लटकि जोर लगा कऽ हमरा बैसाबऽ चाहैत छथि । हम बूझि नहि पबैत छी जे ओ चौल कऽ रहल छथि कि गंभीर छथि ।हम छिटकि कऽ एकटा कुर्सी पर बैसऽ चाहैत छी ।लेकिन जा-जा बैसी ताहिसँ पहिनहि ओ कुर्सी खींचि लैत छथि आ हम खसैत-खसैत बचि जाइत छी । लोक हाँ-हाँ ‘ करैत अछि । हम क्रोध आ अपमानसँ तिलमिला उठैत छी—‘बहानचोद, चोट्टा, उल्लू !’
‘ईह रे बूड़ि, बुधियार बनैत छथि !भोज परक पात छीन लेब सार ।’- कहैत ओ चल जाइत छथि।
क्यो कुर्सी पर बैसा दैत अछि । हम बैसि जाइत छी । भीतरसँ खौलैत। ‘की भेलै ? की भेलै?’—पूछैत आँगनसँ कैक गोटय आबि गेल अछि। हम उठि कऽ आँगन चलि दैत छी ।
फ्लैश बैक-रामभरोस कपडि भ्रमर

नरेश पाछां चलि गेल अछि, बहुत पाछां । प्रायः पचास वर्ष पाछां । गामक सहपाठी सभक संगे खेलए ओ । बहादुर नोकर रहैक – वावूजी जंगलकातसं लओने छलाह । एक बोलिआ, आदेश चाही, काम फत्तह कइएक दम लैत छल । से बाबूजीकें आदेश रहैक – गुरुजीलग पढ ल जएबाक छै से बहादुर लाख चिचिऔलो पर नरेशकें कान्हलपर बोकि कन्हा इ साहुक दलान पर गुरुजी लग दइए अबैक । ओत्त गेला पर गुरुजीक कांच करची अथवा खजूरक छडी ओकर सभ जीद हेरा दैक । ओ चुपचाप हाथमहक पाटीपर कारिख पोति कचरासं साफ क चमकाब लागए आ तखन भठासं लिखबाक प्रयास करए – क ख ग घ…।
“इस्सप….” गुरुजीक छडी जखन बांहि पर पडैक तं ओ लोहछि जाए । मन होइ भागि जाइ मुदा… वहादुरक डीलडौल आ पिताक आदेश मन पडितो मनमारि क पाटी पर आंखि गडा कखरा लिखबाक प्रयास कर लगए ।
गुरुजीक ओहिठाम बटखरा कंठस्थथ रहैक । ई कंठस्थब करब ओकर मजवूरी रहैक, ओना हिसावमे ओ ओहुना कमजोरी महशूस करए । चौठचन्दिमे गुरुजीक संग घंटी बजबैत, काठक डंटाकें बजबैत घरे–घरे घुमनाई आ गुरुजीक डेरापर जा गुडचाउरक प्रसाद खएनाईक अपन आनन्दट रहैक ।
आनन्दच तं पानि नहि पडने हर हर महादेव बना गाम घुमबै काल सेहो अबैक । कोनो सहपाठीकें सौंसे देहमे छाउर रगडि देल जाइत छलैक । माथपर आ बांहिमे सेहो अशोक पात सभ लपेटि देल जाइत छलैक । माथ पर जूट आ सनसं जटा ताहिपर टीनकें कैंचीसं काटि चान लटका देल जाइक । हाथमे वावाजीके त्रिशूल आनि क ध देल जाइक । वस–वनि जाइक महादेब । छौडा सभक हेंज पाछां–पाछां हाक परैत जाइक – हर, हर महादेव पानी देऊ अलिकती पुगेन, बढी देउ ! भाव रहैक महादेव पानी दीअ, कम सं नहि भेल, बेसी दीअ…. । जकरा दरबज्जाल पर जाइक पानि उझलि दैक । मान्यढता रहैक पानि देलापर वर्षाक संभावना बढि जाइत छैक । वेचारे महादेव बनल बौआ बादमे थर–थर कांपए, वच्चाव सभ ताली पिटैत हंसैक । वाल सुलभ प्रताडना ओहि समयमे खूब प्रचलित रहैक । नरेश ओहि हेंजमे अगुवा रहय….।
नरेशक ठोढ पर अपने आप मुस्कीक दौडि जाइत छैक । वितलाहा क्षणक स्मैरण कतौसं गुदगुदा दैत छैक ओकरा । वालशोषणक विरुद्ध ओहो कतेक आलेख लिखि चुकल अछि, कतेको सेमिनार मे भाग ल भाषण छांटि चुकल अछि । मुदा नेनामे नेनेद्वारा कएल ई अपराध शोषण नहि रहैक ! नरेश वाल सुलभताक ओ क्षण फेरसं स्मलरण करैत सिहरि उठैत अछि आ कतौ भोतिआ जाइछ पुन…….।
मुश्कििलसं ७–८ वर्षक छल हयत । गामेक स्कूसलमे पढए, मुदा संगति रहैक अपने टोल महल्लालक धीआपूतासं । ताही मंडलीमे एकटा छौरी रहैक इजोतिया । ओकरे लगुआक वेटी । नीक रहैक कि अधलाह ओकरा तहिया ज्ञान नहि रहैक मुदा ओकरा संगे इजोरिया रातिमे अन्हकरिया–इजोरिया खेलैत ओ खूब प्रशन्न् रहल करए । आंगनेमे दुनूपयर आगां पसारि वैसि , वांहिके केहुनी लगसं मोडि आगां पाछां करैत आ ताही लयमे दुनू पयरके सेहो आगां पाछां करैत पाछा मुंहे घुसकैत इजोतिया खेलल करए आ गाओल करए–“आगेमाई ककरी के बतिआ…” त ओकरा नीक लगैक ।
इजोरिया रातिमे चानक चारुकात बनल गोल घेराकें कौतुहल सं देखैत काल माय रहस्यरमय बोलीमे समझबैक – ई हमरा सभक पुरखा सभक वैसार छै इन्दरर भगवान लग । कहै है निचां पानि विना अकाल पडल छै, पानि दिऔ । आब पानि हयबे करत….। नेनामे ई बात सत्य लगैक आ आश बन्हांई जरुर वर्षा हयत ।
तेहने समयमे जट–जटिन गीत होइक । टोलक महिला सभ जटा आ जटिन कनए आ गीत गाबि–गाबि झूमए । ओहिमे पुरुष नहि, नेनाकें छुट रहैक । नरेश नियमित ओकर दर्शक रहए, ओकर संगी इजोतिया ओहि मंडली मे सामेल रहैक, ओ एकटक ओकरा सभकें झूकि क आगां बढैत आ तहिना माथ उठा क पाछां अबैत देखैत रहय….. ।
नरेशकें फेर किछु मोन पडैछै, ठोढ पर हंसी अबैत–अबैत रुकि जाइछै । भतखोखरि बुढिआक अंगनामे वेंग कुटि मैलाक संग पतली फेकि देल जाइ छल आ ओ वुढिआ भरि राति फेकनिहारिकें पुरा खनदानकें उराहि दैत छलैक । वेटी–रोटी करैत रहैत छली । वास्तभवमे वेंट कुटि क तए ओकरे आंगनमे फेकल जाइत छलै जे ओ बेसी गाडि पढि सकैत छलीह । राति भरि जुआन छौडी सभक धुमगज्जमरिक संग वालसुलभ उत्सुउकतासं पाछां – पाछां दौगब महज खुशी दैत छलै । लगै दिनमे बहादुरक घीसिआ क गुरुजी के चटिसारमे ल जएबाक डरसं मुक्त रातुक ई माहौल स्वशच्छलन्दा छैक । ने वावूजीक डर, ने वहादुरके उठा ल जएबाक चिन्ताग । वात वुझौक कि नहि, नरेश रमल रहैत छल ओहि खेलमे ।
ओकरा तं तखनो ने किछु बुझायल रहै जखन इजोतिया ओकर घरक पछुआर बला गाछी आ भुसा घरलग एकटा प्रस्ता व कएने रहैक – नरेश,खेलबे अर्थ त ओकरा ओतेक नै वुझल भेलै मुदा ओकर इशारासं आशय वुझने रहय आ डेरा गेल रहैक – नहि, हम नहि खेलबौ । ठाढे ओ नासकार चलि गेल रहय । जं कि इजोतिया ओकरा उमेर सं बेसीक वुझाइक, ओ वातकें वुझैक, मुदा नरेश….।
पता नहि नरेशकें किए आइ पुरना बात मोन पड लागल छै । ओ भोरेसं अपन पोताक उदण्डेपनीसं फिरिशान भेल अछि । एक तं भोरमे देरीसं उठत, उठि कत्त पडायत ठेकान नहि । स्कूरल जएबाक कोनो जरुरी जेना नहि होइक । कुण्ड लिया छौडा सभक संगत आ पता नहि गुटका, भांग, सिगरेट किंवा आनो कोनो नशा खाइत हो ,त मनमे आशंका उठल छै । खौंझायल मोने वरण्डा क खुरसीपर बैसि गेल । तखने ओकरा वुझएलै – एक ई दिन अछि आ एक ओ दिन रहय ।फेर भसिया गेल रहय । एखनो मोन थीर कहां भेलैए…।
माय जखन ओकरा दुनू मोडलहबा टांगपर लादि दुनू हाथ पकडि घुघुमना खेलबै तं हिल्लाक झुलबाक मजा ओ लेल करए । गीतकलय संगे झुलैत नरेशक वालपन महज देहमे गुदगुदी आ आनन्दड मात्र उठा सकैत रहय वुझए किछु नहि ।
मुदा जखन ओ टेल्हागर भेल त मायक नक्क्ल करबाक मोन होइक । अपन भातिजकें ओहिना टांगपर ध झुलब लागय आ पढ लागय–घुघुमना घुघुमना, बौआकें गढा देब दुनू कान सोना । ओकरो झुलबैत आनन्दर लगैक आ बौआ सेहो हंसि, हंसि क अपन आनन्दनक अनुभूति करबैत छल । ओना ओकर छोट–छोट पयर–हाथ बौआके बेसी काल सम्भाआरबाक अवस्थापमे नहि रहैक, ओ उतारि दैक तुरते ।
अपन नेनपनक उछल–कुदक दूटा घटना मन पडिते सौंसे देह सीहरि जाइत छैक । बड मुश्किछलसं बचल रहैक आंखि ओकर.. । आंगन मे दुनू भाइ खेलैत रहय । भैया तीर धनुष बना चलौल करए । एक बेर भेलै ई जे तीर सोझे नरेशकें आखिएमे लगलै–वाम आंखिमे । सौंसे हाहाकार मचि गेलै, माय त बताह भ गेल छलीह । ओकरा कनैत–कनैत बेहाल रहैक । गामेक टोटकासं आंखि ठीक भेल रहैक । पता नहि माय कोन–कोन दैब पीतरकें एहि लेल मानि देने छलीह । तहिना एकबेर गछुलीमे आम लुट बेरमे अन्धा धुन्धर दौगल रहय नरेश, त गाछीमे गाडल एकटा खुट्टाक नोक सोझे कपारमे गरि गेल रहैक । माथ सुन्न भ गेल रहैक । मायके जखन पता लगलै त ओ हकासल–पिआसल दौगलि रहय घराडी पर आ ओकरा समेटि क गामक बैध लग लजा उपचार करौने रहैक ।
वाल सुलभ जीवन शैली, गामसं जनकपुर धरिक यात्रा, पढाइ आ डिग्री सभक अपन–अपन कथा रहैक । धन–खेती जे होइक, शिक्षामे पछुआएल परिवारक प्रत्येाक ओ संघर्ष ओकरा भोग पडलै जे एकटा सभ्यथ समाजक अंग बनबा ले जरुरी होइत छैक । आइ जखन उमेरक चारिम प्रहरमे जएबा ले तैयार अछि ओकरा लगैछै ओ फेरसं बचपन दिश लौट चाहैए । दिन रातिक षडयन्त्रे, राजनीतिक विद्रुपतता, चन्दाक, अपहरण, हत्यान किंवा दिन दिन बढैत असुरक्षाक भय आ आतंकसं त्रसित समाजमे तनावक जिनगी जीबाक अर्थेकी?
मुदा फेरसं ओ स्वतयं प्रश्नग करैत अछि की ओ नेनपनक स्वुच्छ न्दच, सहज स्नेअहसं भरल किछु साल घूरि सकत ! चलु ओ वितलहा वर्ष नहि घूरत ई सत्य थिक, अपने तं ओहि युगमे जा सकैछी ने ! हं, ई संभव छैक । भ सकैछ एना भेने तनावमे कमि अबैक, मुंहपर चापलुसीक वोल झाडैत, परोक्षमे चरित्र हत्याओले उताहुल सरसमाजक व्य क्तित्वअक दोगला मुंह देखबाक दुर्भाग्यडसं बंचि त सकै छी । हमहीं किएने अपनाकें नेना बनाली !
नरेशकें अपने सोचपर हंसी लगै छी । की ई संभव छैक । ओहुना साठिक बाद लोक नेनपनमे पुनः प्रवेश क जाइए कहांदन । ओकरो अवस्थाक तं आबिए रहल छैक । चलल जाए एक बेर सएह सही….।
नरेशकें जेना सौंसे देह हल्लुहक लगैत छैक । वरण्डाहसं उठैत अछि । आंगन मे अबैत अछि । पोता आबि गेल छै । ओकरा डंटबाक इच्छां रहितो ओ चुप रहैत अछि । प्रारंभ एत्तहिसं हुअए तं हर्जे की?
शिक्षा अभियान- गजेन्द्र ठाकुर
“हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबय चाहैत छी । “ बुछन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे रिक्शा चलबैत छथि । गाममे खेती – बारीमे किछु नहि बचलैक । छोटका भाय सम जनमिते मरि जाइत रहय से डोमक हाथसँ एकटा छोटका भायकेँ जनमलाक बाद माय – बाप बेचलन्हि आऽ फेर पाइ दऽ किनलन्हि । ई समटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक । आऽ छोटका भाय जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहए बचि गेलाह । आऽ ताहि द्वारे ओकरा सम डोमा कहि सोर करए लगलाह । बुधन अपन बाप – मायक संग हरवाही करथि मुदा भायकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि । सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि – लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक । एकरा जरूर पढायब, चाहे ताहि लेल पेट काटय पड़य आकि भीख माँगय पड़य ।
मुदा गाममे जे स्कूल रहय ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नहि पढ़ैत रहथि। सरकार एकटा योजना चलेलक , दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जाऽ कए यादव जी मास्टर साहेब बच्चा सभकेँ स्कूल बजेलन्हि , नाम बिना फीसक , मासूलक लिखओलन्हि । सम हफता – दस दिन अएबो कएल स्कूल दुसधटोलीसँ , चमरटोलीसँ , धोबिया टोलीसँ । सभकेँ किताब भेटलैक आऽ सभ सप्ताहक-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेलाह । देखा –देखी कमरटोली आऽ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़य, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफत, किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नहि छैक ।
“बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आऽ पैघ – पैघे । स्टेटक आइ तकक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ढाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा “ ।
जयराम ठाकुर असीन जीक केश अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर कटैत बजलाह।
“ से तँ बाबू ठीके “ । असीन बजलाह ।
से गाममे फेर ब्राहाण आऽ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़ए बला नहि बँचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह ।
“ हे अदहरसँ बेसीमे नहि देब , मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि “। आऽ दुसध टोली चमरटोली आऽ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल ।
पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि।

अपन अपन माय-परमेश्वटर कापडि
सबके नव नेपाल, समृद्ध आ संघात्म क नेपालक सुन्द र चित्र बनएबाक बेगरता रहनि । उमटुमाएल त’ बहुतो गोटे रहथि धरि चुनुआ बिछुआ, नामी—गरामी सातटा कलाकारके अपन बुमि ई भार देल गेलनि । भार अबधारि सब एहि निहुछल काजमे लागि जाइत गेला ।
केओ धर— मुडी, केओ हाथ त’ केओ टाङ्ग, केओ पयर त केओ बाहिँहाथ बनाबऽमे तन्मिय भ गेलाह ।
देखिते देरि सब सबआग बना बनाक अनलनि ।
आहिरेबा । जखनि जे सबके द्धारा बनाएल नेपाल मायक आगके एकठाम जोडिक देखलनि त ओ आकृति कुरुपे नहि विद्रुप आ राक्षसी लगैत छल । ई चित्र देखिते निर्माणक आग्रही संरचनावादी लोक भडकिक आन्दो लन पर उतारु भगेल ।
असलमें ई नरी चित्र भेलै कि नहि सेहे विवादक विषय बनि गेल ।
भेल कि रहै त जे पयर बनएने रहथि से रहथि माटिक मूर्तिकार आ पएर एहन सुकोमल माने परी रानीक सुन्नार पयरसन रहै । माय माये हाइछै । मायक पयर धरती परक लोकक रेहल खेहल आ कर्मठ पयर होएबाक चाही ने से रहबे नहि करए । मुँह जे बनएने रहथि से अमूर्त पेन्टिरङ्गक रहैक । आँखि किदन त नाक निपत्ताप । केश दोसरे रङ्गके, पश्चिहमी कटिङ्गके । फडफरायल ठाढ, किछु लट ओम राएल बेहाल । हाथ धातु मूर्तिकारद्धारा बनाएल रहैक त धर काठ मुर्तिकारद्धारा बनाएल कोकनल, निरस । लगै जेना मेहन जोदर्डो सभ्यदताक वा पाषणकालक उत्खधनन कएल गेल हो । तहिना कटि आ ओद्रभाग हिन्दीस फिल्ममक आइटम गर्लक कपचि छपटिक ल आएल सनके । बेनङ्गन निर्लज ।
बात निर्विवाद छलै जे समरसताके अभावमे ई मूर्तिपूर्णे नहि भेलै । गढनिसब बेमेल बानि उबानि । बेलुरा रहैक ।
असफलता पर पछताबा कोनो कलाकारके नहि रहैक । अहँकारी हेठी सबके मनमे । आब ऐ बात पर घोंघाउज कटाउँज होइत होइत अरारि आ मारि पीट धरिक नौबत आबि गेलै । से केना त जेना एखनि नेपालक क्षेत्रीय मुद्दाक बलिधिङ्गरोक विवाद ।
काष्ठ कलाबाला कहथि हपरा के अदुस अधलाह कहत, तेकरा हम बसिलेस पाङ्गि देबै । पेन्टपर रङ्गकर्मीके अपन हठ हमर सृजनाके चिन्हठ बुमके एकरा सबके दृष्टि ए दम नै छन्हिम । चित्रकारके अपने राग । पाषाणमुर्तिकारक अपने ठक ठक । सब अपन बातके इर बान्हिृ, गिठर पारि अडल जे मायक चित्र हमरे कल्प।ना भावना अनुसार बनए ।
सह लहके बाते कोन अपना आगूमे सबके सब अदने, निकम्मेड बुमथि । घोल घमर्थन, गेङ्ग छेंटके वैचारिक दर्शन कहैत सब हुडफेर फेरने घुमए ।
अपना अपनीके सब तानहिबला, सुनबाला निठाहे नइ ।
लोकमे सब रङ्गके, सब तौंतके लोक रहैछ ने । ओइमेस एगोटे आगू अएलाह आ थोडथम्हघ लगबैत कालाकार सहित सबके बम्बोकधित करैत कहलन्हिा हमर बात पहिने ध्याइनस सुनैत जाऊ । बात हम पयरस सुरु करैत छी, मूहँस नहि । पहिने पयरेस एहि दुआरे जे हमरासबके सँस्कृ तिमे सबसँ पहिने पयरे पूजल जाइत अछि । पयरे चलिक केओ अबैत अछि । पयरेपर केओ ठाढ होइत अछि । पयरै लक्ष्मीस होइत अछि । आगत अतिथिके पयरे पवित्र मानल जाइत अछि । प्रवेशके पयर देव कहल जाइत अछि । माने पयरे प्रथम अछि । कर्मशील भेने बन्दिनीय आ ई लक्ष्मी पात्र अछि । ताहि दुआरे पयरेस चित्रक निर्माण शुरु हुअओ ।

छोटकी काकी —कुमार शुशान्त्
गामक माटिक सुगन्धि, गामक बसमे बैसिते लागऽलागल । चौबीस वर्षक विछोडक बाद आइ ई सौभाग्यक भेटल । जौं कही चौबीस वर्षक बनवासक बाद तहन कोनो अतिश्योनक्ति नई, हमरालेल त बनवासे अछि गाम सँ दूर । जेना–जेना आन–आन गामके पार करैत बस अपन गामक लगमे अबैत गेल, तहीना–तहीना हृदयमे एकटा हटले प्रकारक उमँगक सँचारके अनुभूति होबऽ लागल । हौजी, गाममे प्रवेश आ अपन घरक दूरी दश डेगक, मूदा दू मिनट पहाड सन लगैत छल ।
उठल डेग रुकिगेल जहिना एकटा आवाज कानके स्पअर्श कैलक, “छोटकी काकी गै, पाइ दहिने धान कुटबऽ ले ।” एहने बिसराह छलथि हमर छोटकी काकी । पुछलाबाद ओहो अपन परिचय “छोटकीए काकी” कहिकऽ दैत छलीह । हूनक नाम त हमरो सबके नहि बुमल अछि, लगतीह दाइ मूदा बजवैत छलियैन्हि “छोटकी काकी” नाम सँ । ओना हमर अपने नई भऽ पटिदारीक दाइ छलीह “छोटकी काकी”, मूदा अप्पोन एतेक कि आँखि खुजिते छोटकी काकीक हँसैत चेहरा देखैत छलहुँ आ बाल सुलभ हठ शुरु भऽ जाए “छोटकी काकी गै ?”
“बउवा ?”
“नीन्नीक( चीनी )बला रोटी बनएने कि नई ?”
“बाबु हमर बिसराह भऽ गेलहुँ, बिसरि गेलऊँ, नेन्ना हमर अखने बना दैत छी ।”
वाह रे शब्दगक अमृत, एतेक मधुरता !
छोटका बबा परदेश कमाइत छलथि, बड सलज लोक । एही पृष्ठाभूमिमे छोटकी काकीक धियापुताक चर्चा नई देखि अपने पाठक लोकनि जरुरे बुमिगेल हायब कि “भगवानो सँ चूक होइत छन्हिछ”, मूदा जौं हमर विचार पुछि त हम एकरा न्याठय कहब भगवानके, छोटकी काकी सन लोक जे उपमा छथि स्ने हक, प्रेमक, हुनकर घेरा सिमीत नई होए ताँए ।
सत्तेक कहबी छैक, बचपनके घटना जे बच्चामके मानस पटल पर आकीत भऽ जाइत छैक ओ मेटौला सँ नई मेटाऽ सकैया ।
प्रित दीदी नइहर आएल छलिह, हमर छोटकी काकी बेचैन, “गै छोटकी काकी किया बेचैन छें ?”
“नेन्ना रे प्रित वऊआ आएल छथिन्हट ।”
“गै छोटकी काकी, ओतेक पैघ आजन, हूनकर माए प्रित दीदी तखन बऊवा कोना भेलखुन्ह ?” मोतीसन बतीसो दाँत छोटकी काकीक चमकल, कहलीह, “हमर त बऊवे छथि ।”
“कि कहलहुन प्रित दीदी ?”
“बऊवा रे जतऽ रहैत छथिन्हर प्रित बऊवा ओतऽ ताजा माछ नईं भेटैत छैक” एहि बातक मर्म तखन हमरा बुमबामे नई आएल छल, मूदा वेसी समय सेहो नई लागल ।
सुतली रातिमे छोटकी काकीके हिंचकी हमरा भित्तर सँ मकमोरिकऽ जगा देलक । छोटकी काकी कनैत छलीह ।
“किया कनैत छें छोटकी काकी ?”
“नई किछ, सोना सुति रहू”
“नईं जो कह नेऽ ?” नोर पोछैत अपन अनुरोध रखलहुँ ।
“नेन्नान रे, प्रित बऊवा काल्हिर जाइ छथिन्ही, हुनका माछ खुअवितहुँ । पैंच नेने छलहुँ, किछु पाई बाकसमे रखने छलहुँ, हरा गेल ।”
“छोटकी काकी गै नई कान, हम कमाएब त तोर खूब पाई देबऊ तू हूनका माछ खुवा दियहुन”, भरि पाँज धऽ कऽ माथ चुमि लेलथि छोटकी काकी ।
वात्य्ेल क छहारीमें समय कोना कटल नई बुमाएल । कखनो काल बाबुजी, माँपर बड तमसाथि, “बिगडि रहल अछि, देखू ध्या न दियऊ”। ई शब्दई, शब्दब नई सँकेत छल, भेंटऽबला सजायके । किछु दिनमे परिणाम देखाई देलक, हम जिद्दपर अडि गेल छलहुँ “नई कि नईं जाएब”, जिद्द निरर्थक नई छल, हमरा हिसाब सँ, बात छल छोटकी काकी सँ दूर होयबाक । पढऽवास्ते बेबी दीदी ठाम जएबाक ।
“बच्चाू के बल कानव ” एहि कहविके चरितार्थ करैत, छोटकी काकीके कोरामें माथ राखिकऽ खूब कानी । नोर नुकवैत छोटकी काकी कहथि,“नई “जाएब त हाकिम कोना बनव ?”
“हमरा नई बनवाक अछि हाकिम”
फेर सँ हिचकी लैत सवाल पुछि बैसियैन,“हमरा कोन जरुरी अछि हाकिम बनऽके ?, नीक बला पैन्टक शर्ट पहिरलाकबाद तोहीं त कहैछें कि हमर नेन्नाब हाकिम सन लगैया”, शब्द नोरक बान्हन तोडि देलक, भरि पाँज कऽ धऽ दुनु गोटा फफक्काछ मारिकऽ कानऽ लगलहुँ । फेर कहलथि,“आहाँके हम्मेर सपत जौं नई गेलहुँ त हम्मरर मरल मुहँ देखब ।” पट सँ कोरा छोडि उठलहुँ आ प्रस्था न कऽ गेलहुँ अपना घर दिस, ओइ घर दिस जकरा काल्हिह धरि हम मदनबाबुक घर कहियैन (हमर बाबुजीक नाम मदनबाबु अछि )।
चारिए डेग आगु बढल छलहुँ की फेर सँ सुनाई परल छोटकी काकीक आवाज “घुरब तखने जखन हाकिम बनि जाएब ।” माँ सँग सूतब माँके आश्चुर्यमे रखने छलन्हिर, बेरबेर पुछथि, “कि भेल बाऊ ?”
“नई किछु, हम जाएब बेबी दीदी ओतऽ पढऽ ।” भ्‍ाोर सँ भोर बाबुजी सँगे तैयार भ कऽ विदाह भेलहुँ पढि लिखिकऽ हाकिम बनवाक लेल । विदाह बेर बाबुजी कहलथि, छोटकी काकीके गोर लागि कऽ आबऽलेल । हम अपन हिसाबक बहन्नाे बना लेलहुँ, मूदा गेलहुँ नई ।
बसमे बैसति काल बाबुजी कहलथि, “देखु वाएह छथि छोटकी काकी”
तका गेल, सत्त्तेब छोटकी काकी छलीह । “किया आएल छथिन्हग एत्त ?” बाबुजी सँ पुछलिऐन्हिि । प्रश्नेक जबाव बाबुजी नई देलथि, हमरा चाहबो नई करैत छल बाबुजीक जबाव, किया त हम बुमैत छलहुँ छोटकी काकीके अएबाक कारण । हँ, ई नई बुमल छल जे छोटकी काकीके अन्तिछमबेर देखि रहल छी । जौं ई बुमल रहैत त जतेक देर बस रुकल छल ओतेक देर कम सँ कम हुनके देखितहुँ ।
“शुश भाई एतऽ किया रुकल छी ?, कखन अएलहु” चचेरा भाईएक ई शब्दि हमर तन्द्रा तोडलक ।
जे नोर छोटकी काकीके सँग रहलापर हमरा सँग छल, हूनका बिदाह भेलाकबाद विदा भऽगेल छल । अखन….. हूनकर याद फेर सँ नेने आबिगेल छल..नो…र… ।
डटके जलपान- कुमार शुशान्तन

एकटा कविताक भाव निश्चिनतरुपसँ स्मपरण हायत,
“सात समुद्रक जलके स्यानही बनादेलजाए,
वनक जँगलके लेखनी,
समस्तँ धर्तीकेँ कागज बनादेलजाए,
तखनो भगवानक महिमा पूर्णरुपसँ नहि लिखल जाऽसकैया”

भगवानक महिमा त छोडि दिय एतबा में त डटकेजलपानेक महिमा नई अटत । डटकेजलपान हूनक वास्तिविक नाम छन्हिक दिबसलाल । जे हुनकर कर्मेन भेटल छन्हिा हूनक किछु महिमा प्रस्तु.त अइछ,
क्‍ीऋ परिक्षाक सेंन्टेर गामसँ ७० कि.मि. दूर एकटा स्कूवल में रहें, आवत–जाबत नई संभव हाएत ई विचार कऽक गामक १० टा जे परिक्षार्थी छल सबगोटे एके ठाम डेरा लेनहुँ । पहिलबेर अभिभावकके नजरसँ दूर स्व च्छंहद लंगोटिया यार–दोस्त संग रहबाक मौका भेटल । उमंग–उत्सालह त एते कि बर्णने उचित नई । ओम्हछर अभिभावकके कि फुरौलनि से भगवान जानथि । देख–रेखलेल संग लगौलनि डटकेजलपानके । एक त राकश मंडलि उपर स न्योौत से भेट गेल, डेरामें समानसब राइखकऽ फ्रेश होयबाकलेल कोका–कोला पिबाक निर्णय भेल मंइलिके । दोकानपर पहुँचिते हुकुम भेल दोकनदारके,
“दसटा खूब ठंढा कोका–कोला दऽ”
डटकेजलपान लगा कुल संख्यात छल एग्या रह, मुदा जानि–बूझकऽ मंगनऊ दशेटा ।
आवशुरु भेल विवेचन
एकटा मित्र “ जा हुनका नइ भेटलनि ”
दोसर “ नई–नई हुनका देबो नइ करबनि ”
तेसर “ से किया ?”
चौथा “ बड़ कडा निशा होइत छैक अइ में”
सब गोटे जाहि मंशासँ गप्पह नारने छलहुँ से पुरा भेल, डटकेजलपान बजलथि ।
डटके “ उबारु सब, माँए बाप परिक्षा देबला पढएने छन्हिा आ ईसब एतऽ दारु पिबइ छथि ”
एक मित्र “ तोहरा अपन ँबतजभच के शपथ छह, कतौ बजिहऽ नई ”
अंगूठा द्दाप, ँबतजभच के मतलब नई बूझलथि ताएँ झगड़ा नई कएलथि, एतबे बजलनि
“ ठिकछई–२ नइ कहब ” ।
किछुदेर सऽबके पिबैत देख नइ रहलगलन्हिल, पूछि बैसलथि,“ कते कड़ा होइछै एकर निशा ?”
मित्र “ नइ पूछह, झूमा देतौ ”
डटके “(मूंह बिचकबइत) हूँह, केहन–२ भाँग–धतूर के त सिधें घोंटि जाइ छियनि त ई कि झूमाओत ?”
मित्र “ कहैत छिओ ने , भूलियोकऽ नई पिविहऽ ”
डटके “ एहन बात छइ तहन लबही तरे ”
लेलथि कोका–कोला; मुश्किँलसँ आधा बोतल पिने रहथि कि लड़बड़ाईत आवाजमें कहैछथि “ हमरा
कान में फहऽहऽहऽ करईया ”
एक मित्र “ हौ, ई कोन बिमारी भेल ”
दोसर मित्र “ बिमारी नई, हिनका निशा लागि गेल छन्हिह ”
हौजी एतवा सुनिते आधा बोतल कोका–कोला हाथमें नेने ओङ्घराए लगलथि रोडपर । आबत भेल भीड़, जे तुरत्ते आएल रहथि हूनक एकैटा प्रश्न रहन्हि–– “ कि भ गेल छन्हि ”
“ निशा लागल छन्हिश ”
“ कि लऽ लेलथि ”
“ कोका–कोला ”
“ बड़ नौटंकियाह लोक छथि, ओइसँ कोनो निशा लगइ छइ ”
जइन एतबे जवाब धिरे–धिरे जम्मास भेल पचासटा लोकसँ सुनलथि तइन ठाढ भऽ क देहपर लागल माटि झाड़ैत बजलथि,“ उबारु सब, झूठे किया बजैजाइत गेले हऽ जे निशा बला चिज छइ से, करा देले ने बेइज्जतति” ।
एकटा मित्र “ तों किया चिंता करैत छऽ बेइज्ज तिके ?, ओकरा करऽ दहक ने जकरा ठाम इज्जेत छई ” ।
“ बोनि निक भेटल” चर्चा करैत सब गोटे पहुँचनऊ डेरामें ।
आब निर्णय भेल भोजन लेल जएबाक ।बेरा–बेरी भोजन कऽक आएल जाए ।
२ रुपैयामे भरिपेट भोजन पहिनहिं एकटा होटलमे तय कऽ क एडभान्सज १० रुपैया जमा सेहो करा चुकल छलहुँ । होटलके नाम कहिकऽ सबसँ पहिने भोजन करबाकलेल पठाओलगेल डटके जलपानकेँ । घन्टाा दू घन्टाम, चारि घन्टाट भऽगेल मूदा डटके जलपान अएलथि नहि । चिन्ताे सँ बेसी कौतुहुलतावश हुनक तलाशमे सबगोटे निकललहुँ । होटल आगा पहुँचलहुँ त फेर सँ नजर पडल किछु लोकक भीडपर । पहुचिते देखैत छी जे डटकेजलपान आओइ होटल मालिक बीच गर्मागरम बहश भऽरहल अछि ।
होटल मालिक “हम कोनहुँ किमतपर नईं खुवा सकैत छी”
डटके– “अपने मने नई खुएबे, पाई देने छियौ, फोकटमे नईं”
बीच बचाव करैत होटल मालिकसँ प्रश्नु पुछि बसिलहुँ–“की बात ”
जबावमे खाना बनाबऽवला महराज बडका हण्डातके करछुसँ पिटैत पहुँचल ओतऽ जतऽ हमसब ठाढ छलहुँ ।
दोकानदार–(खाली हण्डाा दिस ईशारा करैत)“आब बुमाएल बात”
किछुदेरक चुप्पी्क बाद, फेरसँ हाथ जोडिकऽ बजलथि–“सरकार हम मनुख्खटक भोजनके बात कएने छलहुँ”
हमसब कहलियैन्हिक–“ई त ऊचीत नई भेल ! हमसब त एडभान्सज देने छी ”
दोकानदार गल्लाैमेसँ १२ टका निकालिकऽ, लगमे आबि हाथमे पकडा देलक आ कानमें धिरेसँ कहैया–“बारह टका देलहुँ, १० टका जे अपने एडभान्स देने छलहुँ से आ सुनु–ऊ जे सामनेके होटल अछि(सामनेके होटल दिस ईशारा करैत) ओकरा मालिकसँ बड कसिकऽ दू दिन पहिने हमरा मगडा भेल छल, उपरका जे फाजिल दू टका अछि ओ हमरा तरफसँ घूसभेल, अई आदमिके काल्हिमसँ ओही होटलमें पठाऊ”
दोकानदार सँगे सब मित्रके हँसैत–हँसैत पेट दुखाए लागल ।
डटकेजलपान अर्थात दिवसलालजीक एक एकटा काजक वर्णन लिखऽमे जौं समुद्रक पानिके मसी बनादेल जाए त भलेही समुद्र सुखा जाए मूदा दिवसलालजीक कारनामा नई लिखा सकत । धन्यकछथि….दिवसलालजी !

वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल

हठात् अपन दडिभङ्गा आबक प्रयोजनक मोन पडि≥ते हम व्यग्र भद्र गेलहु“ । प्रायः तखन दिनक एगारह बजैत छलैक हएत । शहरबजारक कोलाहल किछु पहरक हेतु शान्त भेल छलैक । स्टेशन शून्यसन छल, सडकपर गाडी वा पैदल यात्री एकाधेटा देखयमे अबैत छलैक आ’ सेहो कखनोकाल । चारुकात प्रचण्ड रौदक साम्राज्य छल । आकाशमे उपर बहुत उपर चीलसभ उडि रहल छल । दोकानक नीम गाछपर कौआसभ कखनो–कखनो आबिकय कुचरि जाइक । कखनो–कखनो एकगोट बिलाडि दोकाने–दोकाने घुमैत छडपैत नजरि पडैक । … हडाहा पोखरिपर सूर्यक प्रखर रौद अनवरत पडि रहल छल, मुदा अखनो मेघक छाह पडिते पानि करिक्का रोसनाई जका कारी भ जाइत छलैक आ’ बसातक छोटको झोंक ओहिमे असंख्य हिलकोरि उठाय पानिके चञ्चल बना दैत छलैक ।
हम मिसरजी लग जा क जीद्द करय लगलहु“ — शहर देखय चलू न. ”
ओ आश्चर्यस बजलाह — बाप रे, एहन रौदमे… ”
हम जीद्दपर उतरि गेलहु तखन ओ दिकिआकय एकगोट एक्का भाडापर लेलन्हि । शहरक पूरा परित्रमाहेतु नहि … नगरदर्शनक पहिल पडावधरिक लेल मात्रहिं एक्का हमरासभके राजदरबारतक पहुचा देलक । ओहिठाम हमसभ उतरि गेलहु आ’ तकरबाद पैदले देखैत–सुनैत आगा बढलहु। बडीटाके विशाल लोहाक फाटक लगस हमसभ ओहि लालदरबारके निहारलहु जकरा बारेमे रेलगाडीमे ओ बूढा कहैत रहथि जे बनाबयमे डेढ करोड लागत पडल छैक । जाधरि ताकि सकलहु तकैत रहलहु ओहि विशाल दरबारके आ’ तहिना ओकर बडकी फूलक बगीचाके जाहिमे रङ्गविरङ्गक शोभा बढबयबला गाछ तथा फूलसभ रोपि सजाओल गेल छलैक । फाटक लग ठाढ बन्दूकधारी सिपाही हमरासभके डपटलक — कथी देखैत छह, भागह एहिठामस की … ”
तकरबाद हमसभ हथिसार, घोडसार, असबाबखाना आदि देखलहु। एकस एक चमत्कारिक वस्तुसभ देखैत सुनैत हमरासभ अन्तमे दडिभङ्गाक बजारदिसि पैसलहु । तहिया दडिभङ्गा शहर एक्के ठाम स्थित नहि रहैक — मोहल्ला–मोहल्ला, टोल–टोल आ’ सेहो सभ अलग–अलग छुटल छिडिआयल जका रहैक । एक ठामस दोसर ठाम जायलेल छोटछीन ग्रामीण खण्डके पार करहिं पडैत छलैक — खेत, बारी, ताडक बडका–बडका गाछक पातिसभ आ’ ओहिमे सटल ताडीखानाक एकचारीसभ बीच–बीचमे बडका–बडका नालीसभमे खदबदाइत गजगज करैत टोल मोहल्लाक गन्दगी । … शहरक बाबूसभ खपडाबला विशाल बङ्गलाक बरन्डामे भारी, चाकर आ’ बडका–बडका आराम कुर्सीपर, जाहिमे आधा शरीर सुताकय आराम कएल जाइत छैक, सुतल दूपहरियाक शून्य निहारि रहल छलाह । कखनो–कखनो एकाधटा एक्का अथवा बैलगाडी सडकक माटिके आओर महीन गर्दा बनबैत पास करैत रहैत छल ।
दडिभङ्गा शहरक दिनभरिक लम्बा भ्रमणस आखिमे विभिन्न नव–नव दृश्यसभ संजोगैत मुदा एकदम थाकल ठेहिआयल साझखन हमरासभ फेरो मोदिआइन लग पहुचलहु। मिसरजी चौकीपर बैसिते ठेहीक कारणे नमहर सास तनलनि । मोदिआइन एक बाल्टीन पानि आ’ लोटा दैित कहलकन्हि — अहासभ थाकि गेल छी । … हात–पयर धो क ठेही उतारु देखू त एहि बौआके, … बेचारा… ”
मोदिआइनक वचन अत्यन्त स्नेहपूर्ण रहैक । ततबे स्निग्धता नजरि आ’ भावमे सेहो छल । मिसरजी उठि हाथमे लोटा लैत बजलाह — हम कनेक पोखरिदिसि जाइत छी । ओतहि सभ त्रियास निवृत भ जल्दीये आयब । तकराबाद हमरा काजस बाहर जयबाक अछि । ”
हमहु पोखरिदिसि जायलेल उठलहु । मुदा मोदिआइन हमरा रोकि लेलकि — एखन पोखरि जयबाक जरुरी नहि छैक । … सेहो कुबेरमे । … आ’ फेर अहा थाकलो छी ”
हम ओही ठाम पीढीयेपर बैसिकय हाथ–पयर धोयलहु आ’ लगेक अखरे चौकीपर जा क पलथी मारि बैसि गेलहु । मोदिआइन एकगोट बडका लालटेन लेसलकि आ’ लोहाक एकगोट पातर कडीमे ओकरा लटका देलकैकि । तकरबाद एक–एक क सभ दोकानसभमे इजोत होइत गेलैक । एक्के रत्तीमे साझ मुन्हारि भ गेलैक । कीडा–फटिङ्गासभक तीख ध्वनि चारुभरिक वातावरणके हडहोडय लगलैक । अन्हारमे हडाहा पोखरि लुप्त भ गेल जेना निस्तब्धताक कारी धुधुर चद्दरि ओहि पोखरिपर चढिक पसरि गेल होइक । ओहि कारी निस्तब्धताक चद्दरिपर असंख्य भगजोगनीसभ भक–भक करैत उडय लगलैक । हमरा लागल किंवा साझक अन्हार हडाहा पोखरिपर कनेक बेशीये मोटगर भ गेल छलैक । हम कनेक डेरायल आ’ शिथिल स्वरमे पुछलिऐक — मोदिआइन, हडाहा पोखरि साझ होइतहिं … सभ दिन साझखन क एहने कारी भ जाइत अछि ? ”
ओ एकबेर हमरादिसि धुमिकय देखलकि । अन्हारक कारणे शायद, हमरा बुझायल जेना ओ बहुत दूर होय आ’ दूरहिंस एकटक हमरा निहारि रहलि होय । कनेक दोसरे रङ्ग लागल । मुदा लगलेक ओकर स्नेहयुत्त स्निग्ध वाणीस हम आश्वस्त भ गेलहु —बौआ, हडाहा एकगोट विशेष प्रकारक पोखरि अछि ”
हम पुछलिऐक — केहन विशेष प्रकारक… ? ”
ओ बाजलि — बहुत प्राचीन पोखरि अछि ई … … महाभारतेक समयक थिक । तहिया एतय आटव्य जङ्गल रहैक जकरा बीचमे रहैक एकगोट छोट डबडा ”
तखन ?”
धीरे–धीरे जङ्गल फडाइत गेलैक । गामक बढैत क्षेत्र आ’ लोकसभ जङ्गलके कटैत ठेलैत गेल । कालान्तरमे अहूठाम वस्ती बैसि गेलैक । बादमे दडिभङ्गाक एखुनका महाराजक पुरखासभ एकरा अपन जिमदारीमे समावेश क लेलन्हि । ”
मोदिआइन एकहि सुरमे सुरआयल बजैति गेलि । हम अत्यन्त थाकल छलहु तथापि ओकर सुरआयल स्वरस सम्मोहित जका होइत गेलहु । ओ बजैति गेलि — जहिया ई चारुकात झारेझारस घेरल एकटा छोट डबडा जका छलैक, नित्य अही पोखरिक मोहारपर बैसिकय एकगोट मलाहिन माछ बेचैति छलि । … मलाहिन नाम, ह्ष्ट–पुष्ट, सुन्नरि आ’ आकर्षक छलि । जेना तहिया प्रचलित रहैक ओकर पूरा देह चानीक गहनास छाडल रहैत छलैक । ओकर घर कतय रहैक, ओ कतय माछ मारैति छलि से ककरो ज्ञात नहि रहैक मुदा ओकर माछ होइक नीक … तैं ओकरा ओहिठाम बैसिते देरी माछ फटाफट बिका जाइक । ओ हमरा चुपचाप निसायल टकटकी लगाकय देखैत आ’ सुनैत देखि बीच्चेमे रुकि गेलि आ’ पुछलकि — सुनैत छिऐक, बौआ ”
हम कहलिऐक — तखन फेर, मोदिआइन ? ”
जेना कि सभ दिन ओ करैति छलि एकदिन ओ माछ ल क पोखरिक मोहारक अपन निश्चित स्थानपर आबिकय बैसलि । ओहि दिन ओकर डालामे एकटा बडका रोहु माछ रहैक । तखने दडिभङ्गा राजाक एकगोट नामी तान्त्रिक पोखरिमे नहाकय दुर्गा कवच पाठ करैत ओही द क जा रहल छलाह । ओ लाल धोती, लाल कमीज आ’ टोपी सेहो लाले पहिरने छलाह । मलाहिनक डालीक बडका जुआयल रोहु हुनका खूब नीक लगलन्हि । ओ ओहि रोहु माछके किनि लेलन्हि । एतेकटा बडका माछ एक्के आदमीके किनैत देखि मलाहिन बड्ड हर्षित भेलि । ओ हसैति अपन खुशी व्यत्त करैति पण्डितजीके कहलकन्हि — आई त अहाक भरि घरक हेतु ई पर्याप्त आ’ भरिपोख हएत । ”
मलाहिन जखन हसलि त ओकर सजल मिलल सुन्नर चमचम करैत दातसभ ओकर सौन्दर्यके आओर चमका देलकैक । ठोरसभ रसायल आ’ लाल भ गेलैक । तान्त्रिक ओहि सुन्नरि नारीके एकटक देखिते रहि गेलाह । तखने एकटा चील तान्त्रिकक हातक माछके झपटिकय छिनि लेलक आ’ उडि गेल । मुदा माछ भरिगर रहैक तैं चील दूर नहि ल जा सकल । पचासे डेगधरि ल गेल होयतैक कि माछ खसि पडलैक । मलाहिन फेर एकबेर हसलि । तान्त्रिक खूब निहारिकय ओहि मलाहिनके देखलन्हि । हुनका लगलन्हि जेना हसीक पाछा नुकायल चेहराक मुख्य भाग वेदनास भरल कोनो प्राचीन नारीक छलैक खाली हसीयेटा ताजा आ’ अखुनकाक … । ”
जेना तान्त्रिकके एकाएक कोनो गम्भीर रहस्य बुझा गेल होइन्ह ओ मलाहिनदिसि तकैत पुछलखिन्ह —मलाहिन, तो किएक हसलह ? … तो के छह ?”
मलाहिन बाजलि — हम केओ होइ ताहिस अहाके की ? हसलहु एहि दुआरे जे कलियुगमे आदमीयेटा नहि खियायल पशुपक्षी सेहो खिया गेल । देखियौक ने, ओहि एकटा रोहुके चील उडाकय नहि ढोऽ सकल । तहियाक मनुखसभ परात्रमी आ’ हाथी जका“ शत्तिशाली होइत छलाह । पशुपक्षीसभ सेहो ओहने बलुआर होइत छलैक । महाभारतक कालमे एकटा चील कुरुक्षेत्रस एकगोट योद्धाक शरीरके उठाकय अही ठाम खधियामे फेंकने छल । … कहा कुरुक्षेत्र आ’ कहा“ दडिभङ्गा कतेक दूर आ’ सेहो एकगोट योद्धाक भारी शरीर उधैत एतय तक उडब कतेकटाक चील होइत छल हएत तहिया । कतेक बलशाली रहल हएत ”
तान्त्रिक फेर पुछलखिन्ह – तो छह के ? तो ईसभ बात कोना बुझलह ? ”
मलाहिनक मुस्कान हठात् हेरा गेलैक आ’ मुह विषादस कारी भ गेलैक । ओ अपन डाला उठा लेलकि — हम केओ होइ ताहिस अहाके कोन प्रयोजन … ?”
तान्त्रिक किंचित अधिकारपूर्वक किछु बाजक प्रयत्न करिते छलाह मुदा मलाहिन अटेरैत आगा बढि गेलि । तान्त्रिक आगास बाट घेरैत रहस्य उद्घाटित करक उद्देश्यस कडकैत बजलाह — मलाहिन, थमह तो के छह से बिना बतओने नहि जा सकैत छह तोरा हम नहि जाय देबह ।”
मुदा ताधरि मलाहिन बिला गेलि छलि । ने त ओतय कोनो मलाहिन रहैक ने ओकर डाली । खाली तान्त्रिकक कडकैत ध्वनि किछु कालधरि वातावरणमे गुञ्जैत रहल आ’ किछुअे आगा खसल पडल ओ रोहु माछ बीच–बीचमे चमकैत रहलैक । ”
हम अत्यन्त व्यग्रतास“ पुछलिऐक — तखन फेर की भेलैक, मोदिआइन ? ”
की होइतैक ? ओतयस तान्त्रिक धडफडाइत सोझे राजदरबार गेलाह, राजाके सम्पूर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड भेटतैक की से सोचि पाच हजार जन छौ
(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
रहमान नामक बडीगार्ड बोतल सँ आधा गिलास स्कॉ च ढारलकफेर थर्मस सँ बर्फ निकालि कमिलेलक आ गिलास विधायकजीक हाथ मे पकड़ा देलक। किछु काल पहिलका झंझट सँ विकल विधायकजी सम्पू्र्ण गिलासक पेय केँ एकहि सांस मे घोंटि गेलाह। फेर पूर्ववत अपन सुरमादार आँखि केँ युवतीक मनचुम्भीँ मारूक स्था6न पर केन्द्रि त कनिश्चिफन्त भेलाह।
हम तहरिद्वार जा रहल छी।
स्वाकमीजी पलथी पर राखल मोटका किताब सँ नजरि हटा कयुवती केँजबाब देलथिन आ फेर प्रश्न6 केलनिमुदा ओ अइ मैनाअहाँ काकेक संग अहि अतिकाल मे कतविदाह भेलऊँ अछि
अर्थात युवतीक नाम मैना आ युवकक नाम काके। ओहि तीनूक बीच वार्तालाप होबय लागल। ट्रेन अपन फुल स्पीाड अर्थात पाँच-छः किलोमीटर प्रति घंटाक गति मे जा रहल छल। अँग्रेजक बनाओल पटरी आ बिनु बजाओल प्रत्येयक वर्षक कोशीक जानलेबा बाढ़ि। समस्तप इलाका मे अभाव आ दरिद्रताक साम्राज्यप। भविष्यल मे कोनो परिवर्तन होयत तकर दूर-दूर तक कोनो आशा नहि। धहधह जरैत बाध बोन। कतौ-कतौ गाछ वृक्षक दर्शन। ओना चारू कात तअकाले पसरल रहै।
सत्य वा झूठ। स्वापमीजीकाके आ मैनाक गप-सप सँ पता चलल जे ओ सब भारदाक सटल कटकी ग्रामक निवासी छलाह। काके मेडिकल टेस्ट दिअ पटना जा रहल छल। मैना जिद्द पसारि देलक आओर काकेक संग विदा भगेलीह। ओ सब मौसीक डेरा पर दू दिन रहि वापस होयत। स्वानमीजी समस्तीओपुर सँ हरिद्वारक बोगी पकड़ि कप्रस्थाओन करताह।
ट्रेन एक-दू टीसन रुकैत आगाँ बढ़ल। ओहि फस्ट -क्लावसक डिब्बाे मे धीरे-धीरे आलस्यो पसरि गेल छलै। सब कियो गुमसुम। मैना काकेक गरदनि पर मूड़ि रखने चुपचाप पड़ल छलीह। हुनक काजर पोतल आँखि बन्दब छलनि। काके कखनोकाल एम्ह र-ओम्हखर ताकि लैत छल। स्वाहमीजी एकाग्र भकिताबक पन्ना मे अध्यायत्मिक तत्त्व केँ ताकि रहल छलाह।
मुदाविधायकजी मे कोनो परिवर्तन नहि भेल। हुनक समस्तै वासना जे हुनक साठि वर्षक उमेरक कारण आँखियेटा मे रहि गेल छलनिमैनाक सौन्द र्यक निर्लज्ज अवलोकन मे व्यकस्तन छल।
बारम्बाहर विधायकजीक चर्चा भरहल अछि। ताहि कारणें हुनक जीवनक देदीप्य मान इतिहास जानब आवश्यबक।
लार्ड कर्नवालिसक चलाओल जमींदारी व्यतवस्थाा बहुतो प्रथाक जन्मप देलक। ओहि मे भेल खबास-खबासिनक प्रथा। भखरांइवाली अपन समयक प्रसिद्ध खबासिन छल। ओकरा दूटा बेटी छलै चानो आ मानो। चानो सासुर मे बसैत छल। मानोक बियाह पछिला अगहन मे भेलै बियाह कपाहुन कलकत्ता गेलाह से आब एगारह मासक बाद एकटा बैरन चिट्ठी पठौलनि बाद समाचार जे कोठीक मलकाइन बिस्वाास देलक हें जे अगिला मास फागुन मे एक महीनाक छुट्टी देत। हम भरिसालक दरमाहा आ जिनिस-पत्तर लकफगुआ तक आयब।
भखरांइबालीक करेज खुशी सँ फाटलगलैक। ओ हिसाब जोड़लकआब तफगुआक दिन बीस दिनक भितरे। ओ अपन बेटी मनियाँक केश मे गमकौआ तेल देलककाजर केलक आ स्नोआ-पाउडर लगा कओकरा परी बना देलक। फेर मनियाँ केँ बुझबैत कहलकजोजाके बाबू साहेब सँ एक सय मंगने आ। मास भरिक सिदहा एखने कीनि लेब से ठीक। पाहुन कलकत्ता सँ पहिने एतहि औताह। हुनका अबिते की कोनो वस्तुनक कमी रहत!
मनियाँ जखन बाबू साहेबक दलान पर पहुँचलि तओ मसनद पर ओंगठल अखबार पढ़ैत रहथि। आंगन सँ हुनकर तेसर पत्नीसजे भागलपुर जिलाक बौंसी सँ आयल छलखिनतिनकर कर्कश आबाज आबि रहल छलै। ओ अपन दुनू सौतीन संगे वाक्‌युद्ध करहल छलीहगइतोहें की बजै छौहमे छी राजाक बेटी आ तोहें छौंदरिदरक बेटी। चुपे रहौंनहि तआबि केँ झोंटा नोचि लेबहौं।
बाबू साहेब अर्थात ठाकुर त्रिलोकीनाथ सिंह। भारत स्व तंत्रा भचुकल छलैमुदा जमींदारी नहि गेल रहैक। बाबू साहेब तीस-पैंतीस तौजीक मालिक। महराजक सम्बसन्धीरदुमहला भवनचारूकात कइएक बीघा मे पसरल आमलीचीकटहरजामुन आ फूलक बगान। अपन पोखरि आ पिराभिट महादेव मन्दिहर। तीन बिआह केलनि मुदा सन्तासनक मुँह एखन तक नहि देखि सकल छलाह। आब चारिम बिआहक जोगार मे रहथि कि भखरांइबाली खबासिनक छोटकी बेटीमनियाँ सोझा मे ठार भगेलनि।
अच्छानएक सय टाका चाहीबाबू साहेब आँखि सँ मनियाँ केँ तजबीज करलगलाहमुदा कान पथने रहथि आंगन मे। समय आ अवसरक पारखी बाबू साहेब केँ निश्चसय भगेलनि जे आंगन मे पसरल वाक्‌-युद्ध जल्दीआ समाप्ते होबबला नहि। ओ मनियाँ केँ दलानक भीतरबला कोठरी मे लगेला। ओकरा हाथ पर सय टाका राखि देलनिसंगहि चारिम बियाहक कल्पाना मे कंपैत संतानक सम्पू र्ण इच्छाह केँ सेहो मनियाँक कोखि मे उझील देलनि।
मनियाँ छिड़िआयल टांग केँ समटैतआँचर सँ आँखिक काजर केँ पोछैत आ माथक बिन्दीइ केँ तकैत जखन अपन आँगन मे पहुँचलि तओकर माय भखरांइबाली सूप मे चाउर फटकै छलै। पुछलकैटाका देलकौ
हँकहैत मनियाँ मायक हाथ मे सय टाका राखि देलकै आ फेर फूटल चूड़ी आ मसकल आंगी दिस सेहो इशारा केलकै।
भखरांइबाली टाका केँ खूट मे बन्है त कहलकैजे भेलौ से बिसरि जो। डिगडिगिया पिटैक कोनो काज नहि। ई सब कने-मने होइते रहै छै। मुदा ध्या न दकसुन। ओहि कोढ़ियाक दलान दिस फेर मुँह नहि करिहएँ। पाहुन केँ कलकत्ता सँ आबै मे आब दिने कतेक छैक। पाहुन केँ अबिते सब किछु सरिया जेतौकनिश्चिदन्तर रह।
मुदापाहुन कोनो कारणें नहि आबि सकलाह। बाबू साहेबक सन्तािनक चरम इच्छाो मानियाँक पेट मे परिलक्षित होबलागल। आबएहन अवस्थास मे कयले की जा सकैत छलै।
मनियाँ ठीक समय पर गोर-नारएकटा सुन्नर बेटा केँ जन्मे देलक। मुदाबेटाक जन्मटकाल ओकरा किछु भगेलैक। बंगाली डाक्टबर बाद मे कहलकै जे मनियाँ टिटनस बिमारीक चलते मरि गेल। टिटनसक कोनो दबाइ नहि छै।
भखरांइबाली जेना-तेना ओहि नेनाक सेवाक-खेबाक इन्तटजाम केलक। नेना टनमनाइत पाँच-छह वर्षक भेल। भखरांइबाली आब शरीर सँ लचरि गेल छल। ओ हिम्मात हँसोति कएक दिन बाबू साहेबक ओहिठाम पहुँचलि।
ओहि दिन ठाकुर त्रिलोकीनाथ सिंह अपन सतमायक सराधक जयवारी भोज मे बाझल रहथि। हजारो नोतहारी पंघति मे बैसल सटासट जीम रहल छल। बासमती अरबा चाउरक भातआमिल देल राहरिक दाइलसात तरहक तरकारीबेस फूलल-फूलल बड़ी आ ओरिका सँ परसल देशी घी। बुझू बहुत दिनक बाद एहन रमनगर भोज हाथ लागल छल।
की हल्ला भेलै। भखरांइबाली हाथ नचबैत चिचिया-चिचिया कबाजि रहल छलैऔ बाबू साहेबहम सत्यु बजै छी। ई अहींक जनमाओल बेटा छी।
भोज मे लूटन झा अदौरी-भाटा परसैत छलाह। ओ दालिक बारीक बिलट झा केँ रोकि पुछलनिकथिक हल्ला छैअँए हौकी बात छै
बिलट झा सविस्ता र सब बात लूटन झा केँ बुझबैत जवाब देलकनि जे बाबू साहेब एकर प्रमाण माँगि रहलखिन अछि।
उचिते की ने। बिना प्रमाणक ई गप्पू सिद्ध कोना हैत। हौप्रमाणे सँ अदालत चलै छै ने।
बारिक अपन काज में व्यमस्तू भगेलाह। भखरांइबाली लोहछल नेनाके पहुँचा पकड़ने वापस भगेलीह। ओ टोले-टोलगाम-गाम सबकेँ सविस्ताेर सूचना दएलै। मुदाओ प्रमाण नहि जुटा सकलि।
प्रमाण तकैत-तकैत भखरांइबाली एक दिन अहि धरती केँ त्यातगि देलक। ओनेना आब टोल-पड़ोस मेफेर गाम-गाम घुमि भीख मांगि कसमय बितबलागल। ओ प्रायः सदिखन नांगट रहै छल। ताहि कारणे कियो ओकर नामकरण कदेलकै ठाकुर नांगटनाथ सिंह।
किछु समयक बाद भीख मांगैक क्रम मे नांगटनाथ झंझारपुर पहुँचल। झंझारपुर मे बिर्रो अधिआइ छलै। दू वर्षक बाद बटेर सिंहक दिलबहारनौटंकीक आगमनक सूचना झंझारपुर केँ अपन गिरफ्तध मे लनेने छलै।
सब ठाम एकेटा गप्पं। दालमण्डींक तीन आओर चतुर्भुज स्थाकनक दूकुल पाँच नवकी नर्तकी इजोतक पूरा इन्ताजामनवका परदाजंगल-सीन अलग आ महल-सीन अलग। आब आरो की चाहीअइ बेर चौआनियाँ टिकटबला पाछाँ बैसत आ अठनियाँ आगाँ। सबसँ आगाँ ठीक हरमोनियम आ तबला मास्टमरक बगल मे थोड़ेक कुर्सी रहतै जाहि पर जिलाक हाकीम फ्री मे नौटंकी देखताह।
बटेर सिंह पहिल दिन �लैला-मजनूंखेलायत। फेर सिरी-फरहादनल-दमयन्तीचकटी पतंगआदि खेलाइत अन्तर मे सुल्ता ना डाकू। नौटंकीक महीना भरिक प्रोग्राम झंझारपुरबला केँ हर्षित आ प्रफुल्लिसत केने रहत।
ओही हरबिर्रो मे नांगटनाथ भीख मंगैत-मंगैत बटेर सिंहक सोझा मे आबि ठार भगेल।
बटेर सिंहक उमिर साठिक धक मे। छपरा दिसका रहनिहार। ओ चौकी पर बैसल छल। ओकर खास नोकर झरोखिया ओकर घुट्ठीक मटर फोड़ि रहल छलै। बटेर सिंह किछु काल तक अपलक नांगटनाथ केँ देखैत रहल। फेर झरोखिया केँ हुकुम देलकैलौंडा को नौटंकी मे भर्ती कर लो।
नांगटनाथ बटेर सिंहक दिलबहार नौटंकी मे की भर्ती भेल जे ओकर नसीबक पेटार खुजि गेलैक। नीक आ भरिपेट भोजनसाल-दू साल जाइत-जाइत नांगटनाथ केँ पुरुष बना देलकै।
बटेर सिंहक जवानीक प्रेमिका छलै पटोरमणि। आब पटोरमणि कोनो पाट नहि करै छैमुदा रहै छै नौटंकीए मे। कखनहुँ काल जखन बटेर सिंह मूड मे आबय तँ पटोरमणि सँ हँसी-मजाक कलिएबस। नांगटनाथ पटोरमणिक दुलरुआ बनि गेल। तकर कारण छलै पटोरमणिक गठिया दर्द। नांगटनाथ मोन लगा क घंटो पटोरमणिक गठियाबला स्थालन केँ जाँत-पीच करै छल आओर पटोरमणिक हिस्सां सँ सेर भरि दूध ओकरे हाथे पिबैत छल।
परिवर्तन तसमयक विधान थिक। सालक साल समय बितैत गेल आगाम-गामनगर-नगर घुमैत दिलबहार नौटंकी पूसा रोड सँ कनिकबे पश्चिथम कटोरिया गाम मे अपन खुट्टा गाड़लक। नांगटनाथक नौटंकीक प्रत्येिक विभाग पर पूर्ण आधिपत्यक रहैकमुदा आमद खर्च पर एखनो बटेर सिंहक कब्जाी छलैक। पांजरक हड्डी जागलकोहासन पेटचोटकल गालआ कंकाल बनल बटेर सिंह जखन सबकेँ महिना बाँटय तनांगटनाथक मिजाज मे पसाही लागि जाइकहे परमेसर! कहिया बटेरबा मरत।
बटेर सिंह मरल। नांगटनाथक मददगार भेलैक झरोखियाक बेटा ननखेसरा।
ननखेसरा नांगटनाथ केँ बुझबैत कहलकैकहिया तक बाट तकब। ई बटेरबा तनेने मे कौआक जी पीस कपी नेने अछि। बाप रौ बाप। एतेक दिन कियो मनुक्खि जीबए।
रातिक अन्तिाम पहर छल। मसनद सँ चांपिबटेर सिंहक इहलीला केँ समाप्तन कदेलक आ कन्तोेर सँ लगभग बीस हजार टाका लए नांगटनाथ आ ननखेसरा सरपट भागल। भगैत-भगैत गंगाकात जा कसाँस लेलक।
गंगाकात मे एकटा मलाह चिचियाति छलैपाँच रुपैया खेबा मेगंगा पार जेबा मे। आबि जाउनाव खुजैबला छै।
बीच गंगा मे लहरि भौर मारै छलै। नांगटनाथ आ ननखेसरा केँ डर सँ घिग्घीं उठि गेलैक। ओकरा दुनू केँ अपन पाप कर्मक बोध होमलगलैक। बटेर सिंहक बहरायल आँखिक पीड़ा डिम्हाठ आगाँ मे नाचलगलै। आब जे करथि गंगा माता।
वाह रे गंगा माइ। हिनकहिं असीम कृपा सँ दुनू गोटे पटनाक रानीघाट पर सकुशल पहुँचि गेल। दुनू स्नामन केलकफेर भरिपेट जिलेबी खेलक। एक कात एकान्तट मे जा कआधा-आधा रुपैया बँटलक। फेर ननखेसरा नांगटनाथ सँ बाजलहम एक कात जाइत छी। तों दोसर दिस जो। आब एकर आगाँ अपन-अपन नसीबक भरोसा।
ननखेसराक गेलाक बादनांगटनाथ बिदा भेल। जेम्हजर-जेम्ह र सड़क ओकरा लगेलैक ओ जाइत रहल। पैघ शहरचौड़ा रस्ताएलोकक भीड़मोटरक पीं-पां। नांगटनाथ केँ किछुओ ने पता रहैक जे कोन पूव आ केम्हपर पश्चिआम। बसचलैत गेल।
विधाता मनुक्खलक कपार पर भाग्यरेखा अंकित केने छथिन्ह । सब काल आ सब दशा मे भाग्यर संगे रहैत छैक। नांगटनाथ बौआइत-ढहनाइत एकटा पैघ मैदान मे पहुँचल। ओतलोकक अपार भीड़। सबहक हाथ मे दूरंगा झंडामाथ पर दूरंगाटोपी आ पयर हलचल। नांगटनाथ केँ भान भेलैकहो न हो इहो कोनो नौटंकिए ने होअए।
किछु कालक बाद लोकक भीड़ पंक्तिोबद्ध भएक कात सँ सड़क पर प्रस्था न केलक। देश का नेता कैसा होगुलाब मिसिर जैसा होमेरा छाप कबूतर छापआदिक नारा आरम्भो भेल। नांगटनाथ ओहि लोकक झुण्डल मे सन्हिकया गेल।
थोड़ेक कालक बादनौटंकीक माजल बटेर सिंहक लौंडाअपन समस्त् प्रतिभा केँ उजागर करलागल। किछुकालक बाद नांगटनाथ गुलाब मिसिरक बिन हुडबला जीप पर उल्टाल मुंहे ठार छल आ गरदनिक सिरा केँ फूलौने आगाँ-आगाँ बाजि रहल छलैदेश का नेता कैसा होफेर समग्र भीड़ बजैत छलैगुलाब मिसिर जैसा हो!
राति मे एरिगेशन डिपार्टमेंटक रेस्टब हाउस मेएकटा पलंग पर थाकल-चूड़ल गुलाब मिसिर पट पड़ल छलाह। आओर नांगटनाथ पूर्ण मनोयोग सँ हुनका जाँति रहल छल। पोटरमणिक गठिया जाँतपीच करैत-करैत नांगटनाथ केँ जाँतैक पूर्ण दक्षता प्राप्तन भचुकल छलैक। जीवन मे प्राप्ता अनुभव कहियो व्‍यर्थ नहि होइत छैक। नांगटनाथ गुलाब मिसिरक प्रत्येषक मांसपेशी मे सन्हिपआयल तनाव केँ विश्रामक स्थितति मे आनि देलक। गुलाब मिसिर केँ निन्न भएलै।
गुलाब मिसिर प्रातःकाल जखन उठलाह तपूरा फ्रेस छलाह। हुनका आगाँ नांगटनाथ चाहक कप नेने ठार छल।
गुलाब मिसिर मे नेताक गुण। एकहि नजरि मे ककरो चिन्है।क निपुणता। बिना कोनो प्रश्न पुछनेबिना कोनो परिचय प्राप्ते केने ओ अपन नजरि सँ नांगटनाथक अवलोकन केलनि आ मोने-मोन बजलाहसालावर्णशंकर लगता है। मेरे काम का है। इसे साथ मे रखना ठीक होगा।
नांगटनाथ गुलाब मिसिरक खासम-खास खबास बनि गेल। नांगटनाथक जाँतैक कला मे दक्षता ओकर जीवन केँ उच्च शिखर पर पहुँचेबा मे मुख्यस कारण बनल।
गुलाब मिसिर जखन मुख्यरमंत्राीक कुर्सी पर आसीन भेलाह तनांगटनाथ आओर प्रभुताबला बनि गेल। पी. ए. केँ के कहएगुलाब मिसिरक पत्निीयो केँ भेंट करैक परमिशन नांगटनाथ सँ लिअ पड़ैक।
एक समयक गप थिक। गुलाब मिसिर पानक पाउज करैत कुर्सी पर बैसल छलाह। हुनक नजदीकी सम्बनन्धी जे पार्टीक महामंत्राी सेहो छलअगामी इलेक्शीनसँ पार्टीक कैन्डि डेटक फाइनल लिस्टप बना रहल छल। तइमे एक सीट पर जीच भगेलै। गुलाब मिसिर अपन बादशाही लहजा मे कहलनि�शास्त्रा ी को टिकट नहीं देना है। वह पाजी है।
महामंत्राी झुंझला कबजलातककरा टिकट देबैककियो कटगर व्य्क्तिो अहि सीटक दाबेदार नहि अछि। कही तनांगटनाथ के टिकट ददिअनि।
महामंत्राीक व्यंटग्यद नांगटक लेल वरदान बनि गेलै। गुलाब मिसिर महामंत्राी केँ जबाब देलनिठीक तो है। इसी साले को टिकट दे दो।नांगटनाथ सहजहि विधायक बनि गेल।
नांगटनाथक गात मे ठाकुर त्रिलोकीनाथक सोनितभखरांइबालीक पालन-पोषणमुँह पर बटेर सिंहक नौटंकीक डायलॉगहाथ मे पटोरमणिक गठियाक अजमायल कलाक प्रवीणता आ ताहू पर विधायकक कुर्सी। सभ बात विलक्षण। ओ मात्रा किछुए वर्षक भीतर ट्रान्सयफरपदोन्नतिठीका पर जान लेबठीका पर पुल बनबैकअर्थात्‌ शासनक प्रत्येओक दाव-पेंच मे माहिर भगेल।
मुदा नांगटनाथ मंत्राी कहिओ ने बनि सकल। विधायक बनलोक बाद ओ गुलाब मिसिरक खबासी मे जीवन यापन करैत रहल।
आब खिस्सा क आदि मे आउ। ओहि दिन एकांत मे गुलाब मिसिर नांगटनाथ केँ कहलनिजरूरी भी है और मेरी मजबूरी भी है। इस काम के लिए इच्छा नहीं रहते हुए भी तुम्हाारा चुनाव करना पड़ा। इस तारीख को भारदा से आकर तीन जन तुम्हेंे सूटकेश देगा। उन तीनों सूटकेसों को ट्रेन से तुम झंझारपुर लाओगे। वहाँ स्टेोट प्लेबन रहेगा। उसमें तुम तीनों सूटकेस लेकर पटना आओगे और सीध्‍ो मेरे पास पहुँचोगे। तुम दिन-रात पीते हो और लफन्द।री में भी तुम्हाोरा अच्छान नाम है। मैं तुम्हें सचेत करता हूँ कि काम के वक्त न शराब छुओगे और न ही लफंगा बाला काम करोगे। सुरक्षित तीनों सूटकेस मेरे पास आना हैबस। समझे या फिर से समझावें।
नांगटनाथ नतमस्तकक भगुलाब मिसिर केँ विश्वाैस दियौलक-हजूरकनिओ चिन्ता नहि। हम अहाँक आदेशक अनुसारे काज करब। हम तीनू सूटकेस संगे सुरक्षित अहाँक सेवा मे उपस्थिसत होयब से निश्चझय बुझल जाए।
मुदा नांगटनाथ केँ अपन नेताक आदेश बिसरा गेलनि। वैह विधायक नांगटनाथबर्थ पर चित पड़लगिलासक गिलास स्कॉनच पिबैतमैनाक अद्‌भुत सौन्दार्यक पान करबा मे बेकल छलाह। तीनू सूटकेस ऊपरका बर्थ पर राखल छलै।
नांगटनाथक बुढ़ायल शरीर मे सहस्त्रानो पंचर छलै। मात्रा शिकोहाबादक झुम्ममन मियांक सुरमाक प्रतापे ओकर आँखिक रोशनी ठीक छलै। संविधान साधारणतः विधायक केँ सम्पू र्ण प्रान्त आ खास कअपन क्षेत्रक सेवाक कार्यक हेतु आदेश देने छल। मुदा नांगटनाथक एक मात्रा लक्ष्यस छलै जे कहुना मैना केँ अपन आलिंगन मे लजीवन सार्थक करी।
नांगटनाथक इच्छाश पूर्तिक सुअवसर तुरंते उपस्थिलत भेलै। काके उठि कडिब्बा क बाथ रूम मे प्रवेश केलक कि नांगटनाथ चिचिया उठलैरहमान।
अपन नाम सुनिते रहमान केँ कर्तव्यन बोध भगेलैक। ओ स्टे नगन नेने ठार भेल। बाथ रूमजाहि मे काके भीतर गेल छलैकेँ बाहर छिटकी लगा कबन्द् कदेलक आ जोर सँ दोसर बडीगार्ड केँ सम्बोाधन करैत बाजलबूढ़े महात्माि को कवर करो।
अगिला जे घटना भेलै से मात्रा किछु सेकेण्ड मे सब किछु घटित भगेलै। नांगटनाथ जोश मे आबि मैना के अपन पाँज मे समेट लेलक। दोसर बडीगार्ड स्वा मीजीक कनपटी मे स्टेेनगनक मुंह सटा कनिशाना फिट केलक आ सतर्क भगेल।
मुदा नांगटनाथक दुनू बाँहि सँ मैना छिहलैत नीचा खसलि आ फेर छिहलैत रहमानक दुनू पैरक बीच सँ बाथ रूमक फाटक तक पहुँचलि। मैना फाटकक छिटकिनी केँ खोलि देलनि। काके बिहारि जकाँ बाहर आयल तअपन दुनू हाथक गफ्फाु सँ रहमानक गरदनि पकड़ि ऊपर मुंहे झटका देलकैक। काकेक झटका मे एतेक ने बल छलैक जे रहमानक माथ भराम दडिब्बारक छत सँ जा टकरायल। ओकर हाथक स्टेझनगन नीचा खसि पड़लै। रहमानक माथक हड्डी चकनाचूर भगेलैक आ ओ बेहोश भकफर्श पर पसरि गेल। एम्ह र मैनाक हाथक कराटेक चाप नांगटनाथक गरदनिक नीचा आ कालर बोनक ऊपर पड़लैक। एकटा शब्दत भेलैक कड़ाक। बुझा गेलैक जे नांगटनाथक गरदनिक हड्डी दू फाँक मे टूटि गेलैक।
अहि सभ क्रियाक बीचहि मे स्वापमीजीक किताब सँ फायर भेलैक। ओहि मे सँ निकलल बुलेट दोसर बडीगार्डक दहिना हाथ केँ विदीर्ण कदेलक। सोनितक धार बहि गेल। स्टेेनगन फेकैत ओ बफारि तोड़ैत नीचा बैसि गेल। स्वा मीजी एतबे सँ निश्चिान्ति नहि भेलाह। ओ उठि कओहि पुस्तरक केँ अतिवेग सँ दोसर बडीगार्डक माथ पर प्रहार कदेलनि। ओकर चिचिएबाक प्रलाप बंद भगेलैक आ ओ मूर्छित भकफर्श पर चित भगेल।
एक क्षणक लेल स्वाेमीजीकाके आ मैना ठहरि कतीनू बेहोश केँ निहारलनि। ट्रेन अपना गति सँ जा रहल छलै। फस्टव किलासक डिब्बाल मे भेल घटना सँ ककरो कोनो मतलब नहि छलैक।
आश्व स्ता भकाके नांगटनाथक ऊपरका बर्थ सँ तीनू सूटकेस केँ अपन बर्थ पर अनलनि। स्वागमीजी अपन झोड़ा सँ मूठ लागल एक इंचक फलबला ब्लेसड केँ बाहर केलनि। ब्लेथड एहन ने तेजगर छलै जे कनिकबे प्रयासे गोहिक चमरा सँ बनल तीनू सूटकेस दू फाँक भकओदरि गेल।
सूटकेस मे सौ-सौ बला डॉलर केँ नोट बंडल मे पतियानि सँ सैंतल छलै। स्वानमीजी अपन झोड़ा सँ दूटा मजगूत प्लाेस्टि कक बोड़ा निकालि तीनू सूटकेसक तमाम अमेरिकन डालर भरि लेलनि। सूटकेसक पेंदी सँ एगो कागज निकलल जाहि पर लिखल छलैटोटल टेन मिलियन। अर्थात्‌ एक करोड़ डॉलर।
स्वालमीजी फेर अपन झोड़ा सँ फाटल पुरान ओ माटि मे लेटायल बोड़ा बाहर केलनि आ क्रमशः दुनू प्लालस्टि कक बोड़ा केँ ठूसि मजबूत जौउर सँ बनहन दकबान्हिम देलनि।
आब तीनू अपन-अपन वस्त्राड परिवर्तन मे लागि गेलाह। मैना बाथरूम गेली। तीनूक नवीन ड्रेस देखल जाए। स्वाीमीजी केँ ठेहुन तक फाटल धोती माथ पर डालर बला एकटा बोड़ा आ बगल मे मझोला मैल झोड़ा। काकेक डांर मे धरियादेह मे हरियर गंजीगला मे तामक तगमा। मैनाक ड्रेस सबसँ लाजवाब। श्या़म रंग मे रंगल हुनक सर्वादेहडांर मे ठेहुन सँ बित्ता भरि उठल घघरीउनटा मुंहे बान्ह्ल केस और कन्हा पर एकटा छोट सन लग्गाप जाहि मे घोंपल एकटा बिज्जी।
ओ तीनू अपन-अपन असबाब संगे इत्मी नान सँ चलती ट्रेन सँ उतरि गेलाह। स्वाहमीजी अपन झोड़ा सँ अपन किताब निकालि एक विशेष पन्ना उनटौलनि। ओहि पन्ना मे कम्पाँस फिट छलैक। ओ पश्चिहम-दक्षिण कोनक ठेकान करैत आंगुर सँ काके आ मैना केँ इशारा केलनि। तीनू सामनेक पगडंडी पकड़ि द्रुत गति सँ बिदा भेलाह।
जेठक प्रखर आ प्रचंड रौउददुपहरियाक समय। रौउद मे चिलमिलिया चमकैत रहअए। मनुक्खद संगे चिड़ै-चुनमुनियोक दरस नहि। चारू कात जीवबिहीन सुन्नाहट। एतेक बिकराल रौदक सामना के करितयसभ छांह मे नुकायल। खेत-खरिहानगाछी मे चलबाक एकटा सरसराहटि।
ओ तीनू बेग सँ चलैत रहल। आगू मे काकेबीच मे बिज्जीस घोंपल लग्गाे कन्हास पर लेने मैना आ सतर्क स्वानमीजी सबसँ पाछाँ।
करीब तीन-चारि घंटा चललाक ऊपरांतआमक गाछीक कात मे एक ठूठ गाछक नीचाएकटा औंघायल चापाकल केँ देखि तीनू ठहरि गेलाह। काके माथक बोरा केँ एक कात राखि हुमैच-हुमैच कचापाकलक हेण्डिपल केँ चलोलनितखन भुभुआकपानि खसलगलै।
तीनू चुरुके-चुरुके चापाकलक पानि पिलनि आ हाथ-पयर धोलनि। मैना अपन डाँरक बटुआ सँ बिस्कुहट निकालि कस्वाचमीजी आ काके के देलनि आ अपनो खेलनि। तीनू बिस्कुअट खा कफेर सँ पानि पिबैत गेला। फेर आबि कएक झमटगर गाछक छाया मे बसैत गेलाह।
स्वामीजी अपन झोड़ा सँ मोटका किताब निकालि ओहि मे सँ विभिन्न तार केँ जोड़लनि। एक बहुत छोट सन हेडफोन कान मे फिट ककसांकेतिक भाषा मे रिपोट पढ़लगलाह।
रिपोट केलाक बाद सांकेतिक भाषा मे हुनका चमेलीरानीक संदेश आ आदेश प्राप्ता भेलन्हि । ओ ध्याेन सँ सभ सुनिवायरलेस सेट केँ पूर्ववत किताब मे समेटि झोड़ा मे राखि लेलनि। संदेशक भावार्थ काके आ मैना केँ कहलथिन्ह जे जखन ओ सभ नट-नटिन बनि ट्रेन सँ उतरि बिदा भेलाह तखने बगलक कम्पामटमेन्टन सँ एक व्य क्तिी उतरि पाछाँ करब शुरू केलक। ओ बराबर पाछाँ करैत आबि रहल अछि। ओ व्यिक्तिह उज्ज्र पेन्टनकारी कोट आ नम्ह र जुल्फीे रखने अछि। अन्दाबजन ओ व्ययक्तिक अपन काज मे माहिर आ होशियार बुझि पड़ैत अछि। ओकरा सम्ब न्धु मे अधिक जानकारी नहि अछि।
स्वा मीजीक बाजब स्थिीर आ शान्ती छलनि। ओ फेर आगाँ कहलनिहमर सभहक एखुनका मंजिल मात्रा कोस भरि आगाँ अछि। रस्ता क डाइरेक्शथन सेहो ठीक अछि। मुदा चमेली बिटिया केँ कहब छन्हिस जे ओहि करिया कोटबला सँ फरिया ली। या तभौकी दओकरा भुतिया कआगाँ बढ़ी वा आवश्यसकता भेला पर ओकरा समाप्ता केलाक बादे अपन ठेकाना मे प्रवेश करी।
भय आ चिन्ताअ नामक कोनो भाव ओहि तीनूक लेल नहि छलै। केवल कर्तव्यआक पूर्ति आ चमेलीरानीक आदेशक पालन अभीष्टा छलै। ओ तीनू आगाँ अपन मार्ग पर बिदा भेलाह।
कनिए आगाँ एकटा पैघ गाछी छलै। गाछीक आरम्भन मे एकटा विशालकरीब दू कट्ठा मे पसरल पुरान बड़क गाछ छलै। तीनू ओहि बड़क गाछतर आबि अपना मे मंत्राणा केलनि आ अपन-अपन मोटरी संगे ओहि बड़क गाछ पर चढ़ि गेलाह। गाछ वेश झोंझरिबला छलैक। ओ तीनू उपयुक्तन स्थालनक तजबीज कअदृश्यप भगेलाह। पाछाँ करैबला आगाँ बढ़ि जाए तठीकअन्यतथा अही गाछतर ओकरा खतम कदी सैह हुनक निर्णय भेल छलनि।
किछुए मिनट बितल रहैक की उजरा पेन्टलकरिया कोटबला ओहि विशाल बड़क गाछ तर पहुँचि गेल। गाछक नीचा पहुँच कओ अकबका गेल। नाकक थुथना सँ चारू कात सुंघलक आ फेर अचम्भि त होइत ओ बड़ेक नीचा ठार भगेल। गाछक झोंझरि मे नुकायल तीनू गोटे दम सधने निचलका व्य क्तिि केँ देखि रहल छल कि एकटा अजीब घटना घटित भगेलैक।
बड़क एकटा मोटगर डारि पर स्वािमीजी आ काके अपन-अपन बोड़ा केँ टेकने ठार छल। ओहि डारिक छीप पर लग्गाा मे बिज्जीि घोंपने मैना दोसर झोंझरि मे नुकायल छलीह। हुनक बिज्जीछबला लग्गाअ ओहि सँ ऊपरका डारिक झोंझरि मे ठेकि गेल रहैक। ऊपरका झोंझरि मे एक जोड़ धामन साँप छलैक। दुनू साँप लग्गा। आ लग्गाप मे घोंपल बिज्जी केँ देखिते खोंखिया कझपटा मारलक। धामन साँप विशाल आकृतिक होइत अछि आ ओहि मे एक छोड़ि दूटा। मैनाक हाथक लग्गाे साँपक वजनक कारणे छुटि गेलनि। हुनका अपन देहक बैलेन्सआ सेहो गड़बड़ा गेलनि।
बड़क गाछक नीचा ठार व्य क्ति क दायां ओ बायां दुनू कात ओ साँप खसल। साँपक भयंकर आकृति देखि ओ बाप-बाप करितय कि तखने ओकर माथ पर मैना खसली। मैनाक घघरी हुनक सम्पू र्ण मूड़ी केँ झाँपि देलक। ओ मैना केँ नेने-देने मुँहे भरे आगाँ खसलाह। मैना फुर्ती सँ अपन घघरी केँ हुनक मूड़ी सँ अलग कउचकि कआगाँ कूदि गेलीह।
मैनाक हालत देखिस्वादमीजी आ काके अपन बोड़ा संगे धपाधप कूदि गेलाह। स्वा मीजीक हाथ मे कतौ सँ पिस्तौहल आबि गेल।
अरेदादा रे दादा। ई कीया हो गया�
बाजब आ उच्च रण सँ स्पोष्ट� भगेल जे पाछाँ केनिहार बंगाली छथि। स्वाामीजीक हाथ मे पिस्तौौल देखि ओ घिघिया उठलहमारा जान लेने से पहले साँप को मारो।
स्वायमीजी अनिश्चसयक स्थि ति मे छलाहपहिले बंगाली केँ मारी कि साँप केँमारी। ओहि काल मैना चिचिया उठलीहस्वाजमीजी साँप पर फायर करू।
स्वाहमीजीक हाथक पिस्तौसल दू बेर ठाँयठाँय केलक आओर ससरैतफुफकारैत दुनू धामनक मूड़ी चिथड़ा उड़ि गेलै।
आब स्वाउमीजीक पेस्तौिल ओहि करिया कोटबला दिस घुमल। ओ साँप मरलाक बाद थोड़ेक अपना केँ सुभ्यवस्तज अनुभव कयने छल। ओ पेस्तौबल केँ अपना ऊपर तानल देखिबिना कोनो भय केँ बाजलहमारा पास सभ खबर है। थोड़ा देर पहले तुमको बायरलेस पर मुझे जान से मारने का अॉडर मिला है। तुम्हािरा कोडेड मैसेज अनकोड होकर मुझको मिल चुका है। ठीकतुम हमको मारेगा और हम मरेगा। वैसे हम भी तैयार है। हमारा पास इतना ताकत है कि हजार आदमी भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। लेकिन नहींतुम मारेगा आउर हम मरेगा। मरने के पहले हम थोड़ा बात तुमको कहना चाहता है। उस बात को सुन लो। तुम्हांरा पास टाइम जास्तीम नहीं है। फिर भी हमारा बात सुन लो। हमारा बात तुमको लाभ देगा। हम तुम्हा रा दोस्तर हैनहीं तो तुम्हांरा आखरी मेसेज के बाद हम तुम्हा रा पिछु-पिछु नहीं आता।
स्वाामीजी पेस्तौाल केँ हिलबैत बंगाली केँ अपन बात कहबाक इशारा केलनि। काके आ मैना अत्यतधिक सावधान भकओहि बंगालीक बात सुनलगलाह। बंगाली जल्दी -जल्दीै बाजब शुरू केलकमेरा नाम विश्वकनाथ भट्टाचार्य है। हम बंगाली मानुष है। निर्मली मे मेरा रेडीमेड कपड़े की दूकान हैनिहारिका। कपड़ा का दूकान मेरा मुखौटा है। असल मे हम पक्काल जासूस है। हम केजीबी के लिए काम करता है। बैंकॉक से सूटकेस चलाभरदा पहुँचाउसमें कैसा माल हैसभी कुछ का खबर हमको है।
हमको इनटरफेयर करने का अॉडर नहीं है। फिर भीहमारा इलाका मे क्याह कुछ होता है उसका खबर रखना हमरा काम है। तुम तीनों का हम निर्मली से फौलो करता है। तुम उस एमएलए आउर उसके दोनों बडीगार्ड को घायल कियाबेहोश कियामाल लियाट्रेन के नीचे आया तो हम भी ट्रेन का नीचा आया। फिर जब तुम तीनों जहाँ थोड़ी देर रुका था वहाँ पहुँचा आउर नाक से तुम सबका गन्धी सूंघा। हमको गन्धा सूंघने का स्पे शल ट्रेनिंग है।
उसके बाद हम सारा मैसेज को ट्रान्सँमीट कर दियाफिर तुम्हाआरा छोड़ा गन्ध को सूंघते-सूंघते तुम्हा रा पीछा किया। हमने जो मैसेज मास्कोट ट्रान्सीमीट किया उसमे तुम्हासरा हुलियातुम्हाूरा ड्रेस सभी कुछ का कर दिया। हमारा मैसेज मास्कोोरिसीभ किया आउर उसका कनफरमेशन आ गया। मास्कोस उस मैसेज को दिल्लीी भेजा होगा आउर दिल्लीम पटना को। पटना का इनटेलिजेन्सन अॉपरेशन थोड़ा कमजोर है। फिर भी खतरा तो बढ़ गया है। तुम्हाारा पास टाइम बहुत कम है।
तुम्हामरा पिछु-पिछु आया। दादा ओ दादाइस घाम में तुम लोग कितना तेज चलता है जिराफ का माफिक। हमको तो ट्रेनिंग है लेकिन तुम्हा रा कैसा ट्रेनिंग हैसोचने की बात है।
हम सोचाफिर कीया हुआ सो सुनो। हम काली माँ का पूजा करता है। काली माँ मेरा सब कुछ है। माँ ने दिमाग में झटका मारा। मेरा दिमाग ने सोचना छोड़ दियाफिर ठीक होकर सोचने लगा। दिमाग में माँ बोलता हैअरे! तुम किसको पिछु करता हैतुम किसका नुकसान करता हैये लोग अपना वतन का दिवाना है। देश को वास्तेमअपना प्रान्तो को वास्तेजजान हथेली पर रखकर निकला है। मेरा माथा में सब बात साफ हो गया। फिर माथा बोलाभट्टाचार्य तुम इनका कितना बड़ा नुकसान कर दिया। अरे! अभी तक तो सभी पुलिसकुत्ता का माफिकइसको पकड़ने वास्तेय निकल चुका होगा। ये हमने कीया किया
भट्टाचार्य केँ निर्मलीक लोक भाटाजी कहैत छलैक। भाटाजी फूटि-फूटि ककानय लगलाह। हुनक आँखि सँ अश्रुधार बहय लगलनि। तकरा बाद भाटाजी जे कहलनि तकर भाव छलभाटाजीकलकत्ताक एकटा धाकर कम्यूधनिस्ट नेताक पुत्रा छलाह। इलेक्ट्रॉानिक इन्जीएनियरिंग पढ़ै लेल ओ रूस देश गेलाह। मेधावी छात्रा छलाह। हुनका रूस देश मे अनेको स्कॉदलरसीप भेटलैन्ह । ओ संचारक क्षेत्रा मे अनेको किस्मं आ उपयोगी यंत्राक आविष्काूर केलनि। फेर ओ एकगोट रसियन कन्या् सँ विवाह केलनि आ ओही देशक नागरिक बनि रूसहि मे रहए लगलाह। हुनक प्रतिभा सँ प्रभावित भकेजीबी हुनका अपना मे समेटि लेलक। अति कठिन ट्रेनिंग भेल आ ओ केजीबीक पैघ अॉफिसर बनि अनेको देश मे कार्यरत रहलाह। उमिर बढ़ला पर आ विशेष कबंगाली रहलाक कारणें हुनका अपन मूल देशक प्रेम जागृत भेलनि। केजीबीक प्रधान लग अपन आरजू पठौलनि तखन निर्मली मे हुनक पोस्टिं ग भेलनि। निर्मली मे ओ बारह वर्ष सँ रहि रहलाह अछि एवं परिवार कलकत्ता मे रहै छथिन। मोटगर तनखाह भेटैत छनिआर्थिक दृष्टि सँ सम्पहन्न छथि।
भाटाजी अपना पर नियंत्राण करैत बजैत गेलाबाबातुम लोग कीया करता हैकिसके वास्तेन करता हैहम अभी नहीं जानता है। लेकिन तुम्हाैरा संचार बहुतकमजोर है। आज के युग मे तुम्हाारा काम बहुत अच्छामबहुत सफोस्टीनकेटेड संचार सिस्टसम का मांग करता है। संचार को इम्प्रू भ करने मे हम तुम्हाररा मदद करेगा। काली माँ का भी अॉडर है आउर जीवन के अन्तं मे कुछ अच्छाम काम करने का इच्छाा रखता है। इसी वास्तेा तुमसे मिलने का हम रिस्कह लिया। नहीं तो तुम्हामरा आखिरी अनकोडेड मैसेज के बाद हम कभी भी अपना लाइफ को डेनजर मे नही डालते। माँ काली का शपथ खाकर बोलता हैमेरा फेथ करो। तुम्हाैरे वास्तेक काम करेगायह मेरा अॉफर है।
स्वाेमीजी पिस्तौकल केँ काकेक हाथ मे पकड़ा वायरलेस सेट केँ ठीक केलनि। फेर चमेलीरानी केँ सभटा सविस्तामर रिपोट दअपन मन्तकव्य देलनिबिटिया रानीभाटाजी अपन जरूरत केँ पूर्ति करताह से हमर सोचब अछि।
प्रायः चमेलीरानी स्वी कृति देलथिन। स्वाामीजी भाटाजी दिस घुमैत बजलाहकन्टेलक्टन फिरिक्वेिन्सीम
फ. म. अस्सीी हजार दसमलव फोर।
ठीक। वेशअहाँ वापस जा सकैत छीभाटाजी।
भाटाजीक मोन प्रफुल्लिवत भगेलनि। ओ मैना दिस तकलनि आ फेर गरदनि हँसोथि बजलाबाबायहाँ रास्ताा में मुरही का भी दूकान नहीं है। पूरा एरिया बंडल है।
मुस्कीर छोड़ैत मैना अपन बटुआ सँ छोट-छोट बिस्कुदट निकालि भाटाजी केँ देलनि। भाटाजी प्रसन्न होइत वापस अपन रस्ता पकड़ि लेलनि।
भाटाजीक कारणे बिलम्ब़ आ हुनकर सूचनाक कारणे अन्देकसा। तें ओ तीनू बहुत तेज गति सँ अपन गंतव्य स्थाजनक हेतु बिदा भेलाह।
एकटा छोटपुरान आ चहरदिवारी सँ घेरल महादेवक मंदिर। गाम सँ हटल आ आमक गाछ सँ घेरल। मंदिरक आगाँ पोखरि आ पाछाँ दूटा खोपड़ीनुमा घर। मंदिरक प्रांगण साफ-सुथराफूल पत्ती सँ सजल आ परम पवित्रा।
नट-नटिन केँ अबिते पुजारी हड़बड़ा कठार भेलाह। आवश्य-क निर्देश देलनि। निर्देश देबाक आतुरता अहि बातक संकेत दैत छल जे सतर्कता अनिवार्य बनि गेल अछि।
किछुए कालक बादस्वा मीजी पिअर धोतीउज्जवर कुर्ता आ लाल गमछा संगे त्रिपुण्ड चानन आ पैघ सिनुरक ठोप केने मंदिरक अगिला हन्नाा मे वैह मोटका किताब केँ अपना आगाँ राखि दूर्गा पाठ करहल छलाह।
अन्दकर खोपड़ीनुमा घरक एक कोठली मे काके बरक परिधान मे तथा मैना नव कनिआँक भेषभूषा मे एकटा खाट पर बैसल गप-सप करहल छलीह। डालरबला दुनू बोरा हुनक खाटक नीचा जाजीम सँ झांपल राखल छल। ओ सभ कियो कोनो अनहोनी घटनाक प्रतीक्षा मे पूर्ण तैयार ओ साकांच छलाह।
सूर्यास्त क समयअतिशय गर्मी आ उमसक कारणें पुजारीजी गमछा सँ घाम पोछै मे व्यजस्तप छलाह। मंदिरक दक्षिण बरिया दुआरि पर पुजारी जाहि पटिया पर बैसल रहथि ओकर आगाँ दूटा थार राखल छलै। पहिल थार मे फूलफूलक माला आ घसल चानन तथा दोसर थार पेड़ा सँ भरल।
ओहीकाल आशाक अनुरूप एकटा भीसण्डन मोट दरोगा तथा ओकरा संगे एकटा दुब्बसरपांजरक हड्डी जागलसिपाही हहाइत ओतए पहुँचल। दरोगाक फूलल पेटक वामा कात पिस्तौबल लटकल छलै। सिपाहीक हाथ मे ओकरे सन हकन कनैत बेंतचेहरा पर पसीना तथा आँखि मे एहन भाव जे ओ एक पन्द्रटहिया सँ अन्नक दरस नहि केने होअय।
दरोगा अबिते गरजि उठलहई पुजारी बाबा! रौआ बताँई जे इहाँ के सब आयल बा
पुजारीजी दुनू हाथ जोड़ैत ठार भेलाह आ कलपैत स्व र मे बजलासरकारएतए तकियो नवीन लोक नहि एलाह अछि। हम पुजारीपाठ केनिहार महात्माआ एतए महिनो सँ रहै छी। भीतर हमर खोपड़ी मे हमर बालक आ हुनक कनिआँ। बस आओर किओ नहि।
दरोगा अपन आबाज केँ औरो कर्कश बनबैत बाजलका बोले तारहो पुजारी बाबा। हमरा घसबैनी सँ खबर मिलल बा जे दू जन नट आ एक जन नटिन एम्हजरे आईल बा। उपरका अरजेन्टर हुकुम बानी। हमरा के ओ नट-नटिन के एरेस्टे करै के बा।
पुजारी औरो नम्र होइत चुचकारीबला स्व्र मे दरोगा केँ उत्तर देलनिसरकारहम अहाँ केँ चिन्हैहत छी। अहाँ सन इमानदार हाकिम केँ के नहि चिन्ह्तजहिया सँ अहाँ थाना पर एलहूँ अछिचोर-उचक्काह लापता भगेल। मुदा सरकारहमरा पर विश्वािस करूहम अहाँक शपथ खा ककहैत छी जे कोनो नट-नटिन एम्हार पयर नहि देलक हेंए। ओहुना एतए नट-नटिनक कोन काजएततमात्रा एकटा काज भोलेनाथक पूजा।

(अगिला अंकमे)
सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
1
सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा) आयोजक- तीन वा बेशी बेर
प्रभास कुमार चौधरी कमलेश झा प्‍ा्रदीप बिहारी श्यापम दरिहरे रमेश
1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.बहेरा 21.01.1995 1.बेगूसराय 13.01.1991 1.पटना 10.10.1998 1.महिषी (सह) 13.4.1997
2.वाराणसी 18.7.1992 2.सुपौल 08.04.1995 2.बेगूसराय 13.09.1997 2.धनबाद 21.10.2000 2.सहरसा 18.7.1998
3.कोलकाता 28.12.1996 3.अन्दौ ली 28.10.1999 3.खजौली 04.04.1998 3.देवघर 08.01.2005 3.पूर्णियाँ 24.6.2005
4.पटना 18.07.1997 4.बेनीपुर 20.09.2003 4.बेगूसराय 09.04.2005
5.बेगूसराय 10.02.2007
सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा )-अध्यसक्षता/उदघाटन मे तीन वा बेशी बेर
पण्डिात गोविन्द0 झा राजमोहन झा रमानन्द4 रेणु डा.धीरेन्द्रद डा.रमानन्द0 झा ‘रमण‘
1.दरभंगा 07.07.1990 1.पटना 03.11.1990 1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.काठमाण्डू 23.09.1995 1.काठमाण्डूो 25.06.2000
2.बिराटनगर 14.04.1992 2.घोघरडीहा 22.10.1994 2.खजौली 04.04.1998 2.राजविराज 24.01.1996 2.कोलकाता 22.01.2003
3.बोकारो 24.01.1993 3.पटना 10.10.1998 3.कोलकाता 22.01.2003 3.जनकपुरधाम 25.03.2000 3.राँची 02.01.2004
4.जनकपुरधाम 09.10.1993 4.मधुबनी 24.07.1999 4.सहरसा 21.07.2007
5.सुपौल 08.04.1995 5.धनबाद 21.10.2000 5.राँची 19.07.2008
6.कोलकाता 28.12.1996
7.दरभंगा 21.01.2004
8.पटना 03.11.2005
सगर राति दीप जरयक अवसर पर आलेख पाठ
डा.रमानन्दव झा ‘रमण‘ डा.भीमनाथ झा डा.तारानन्द वियोगी
1.शैलेन्द्र् आनन्दठक
कथा यात्रा
1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.मैथिली कथाक समस्या बिट्ठो 21.01.2001 मैथिली कथाक वर्तमान
समस्यात
कोलकाता 22.01.2003
2.विभूति आनन्द0क
कथा यात्रा
2.कटिहार 22.04.1991
3.नेपालमे मैथिली
कथा
3.विराटनगर 14.04.1992
सगर राति दीप जरयक अवसर पर पठित
कथाक संग्रह
जतय एक सँ बेशी बेर आयोजित भेल अछि
नाम सम्पा दक वर्ष 1.पटना 2.जनकपुरधाम 3.बोकारो 4.दरभंगा 5.राँची
1.श्वे‍त पत्र तारानन्दन वियोगी/रमश 1993 1. 03.11.1990 09.10.1993 24.04.1993 07.07.1990 13.04.2002
2.कथा कुम्भा बुद्धिनाथझा/तुलानाथमिश्र 1994 2. 18.10.1992 25.03.2000 28.03.2001 21.02.2004 02.10.2004
3.कथादिशा महा
विशेषांक
प््रषभासकुमार चौधरी/गंगेश
गुंजन
1997 3. 18.07.1997 12.08.2006 19.07.2008
4.भरि राति भोर के..डी.झा/श्या1म दरिहरे प्रदीप
बिहारी
1998 .4. 10.10.1998 6.काठमाण्डू0 7.कोलकाता 8.बेगूसराय 9.सहरसा
5एकैेसम शताब्दी8क
घोषणा पत्र
रमेश/श्या म
दहरहरे/मोहनयादव
2001 5. 01.12.2001 23.09.1995 28.12.1996 1.13.01.1991 18.7.1998
6.संधान-4
कथा विशेषांक
अशोक 2000 6. 16.11.2002 25.06.2000 22.01.2003 2.13.08.1997 21.07.07
7.कथा सेतु प्‍ा्रशान्त0 2002 7. 03.11.2005 3.09.04.2005 सुपौल
4.10.02.2007 09.01.1993
01.12.2007
एहि अवसरपर पठित कथाक कतेको व्यरक्ति0गत संग्रह छपल अछि तथा समस्त4 पठित कथाक संख्यार 1500 सँ अधिक होएत ।
2
विभिन्नर नामे आयोजित सगर
राति
सगर राति दीप जरय- संचालक
1.कथा रैली डेओढ स्थाजन नाम स्था‍न नाम
2.क्थार सम्वा‍द दरभंगा 1.मुजफफरपुर 1.प्रभास कुमार चौधरी 20.भागलपुर 20.अशोक
3.कथाचेतना रैली घोघरडीहा 2.प्‍ैाटघाट 2.अशोक 21.कोलकाता 21.रामलोचनठाकुर/नवीन चौधरी
4.सृजनकेरदीपपर्व सुपौल 3.इसहपुर 3.शैलेन्द्र. आनन्द1 22.बेनीपुर 22.अजित कुमार आजाद
5.गंगासँ हिमालय कठमाण्डू 4.सरहद 4.शिवशंकर श्रीनिवास 23.नवानी 23.मोहन भारद्वाज
6.कथा कुम्भम पर्व बोकारो 5.झंझारपुर 5.शिवशंकर श्रीनिवास 24.दरभंगा 24.डा.भीमनाथ झा
7.कथा कौमुदी बोकरो 6.घोघरडीहा 6.शिवशंकर श्रीनिवास 25.देवघर 25.प्रदीप बिहारी
8.कथा गंगा पटना 7.काठमाण्डूी 7.रमेश रंजन 26.पूर्णियाँ 26.अजित कुमार आजाद
9.कथा कारिख खुटौना 8.राजविराज 8.रमेश 27.पटना 27.डा.देवशंकर नवीन
10.कथा पर्व राँची 9.राँची 9.अजित कुमार आजाद 28.जनकपुर 28.रमेश रंजन
11.भरि राति भोर पटना 10.मधुबनी 10.सरस 29.जयनगर
30.बेगूसराय
29.प्रदीप बिहारी
30. अजित कुमार आजाद
12.कथा लोरिक बेनीपुर 11.राँची 11.सरस 31.जमशेदपुर 31.डा.अशोक अविचल
13.कथा अमृत कोलकाता 12.महिषी 12.शिवशंकर श्रीनिवास 32.सहरसा 32.अजित कुमार आजाद
14.कथा सेतु भागलपुर 13..तरौनी 13.प्रदीप बिहारी 33.सुपौल 33.अजित कुमार आजाद
15.स्व र्ण दीप दरभंगा, 14.बलाइन 14.शिवशंकर श्रीनिवास 34.राँची 34. कु.मनीष अरविन्दा/सरस
16.कथा कमला-कथा
सलहेस
जयनगर 15.काठमाण्डूद 15.रमेश रंजन
17.कथा बहुरा बेगूसराय 16.धनबाद 16.अशोक
18.कथा संगम ज्माशेदपुर 17.बिट्ठो 17.अशोक
19. कथा वर्षा राँची 18.हटनी 18.डा.फूलचन्द्रश मिश्र‘रमण‘
19.पटना 19. अजित कुमार आजाद
सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी लोकार्पित पोथीक लेखक/सम्पा्दक
1.पण्डिजत श्री गोविन्दल झा 2.रमेश 3.डा.तारानन्दर वियोगी
पोथीक नाम स्थारन तिथि पोथीक नाम स्थाीन तिथि पोथीक नाम स्थाकन तिथि
1.सामाक पौती दरभंगा 07.07.1990 1.स्मा‍ड़ नवानी 21.07.1991 हमर युद्धक
साक्ष्या
बेगूसराय 13.01.1991
2.विद्यापतिक
आत्मस कथा
प्‍ैाटघाट 10.07.1993 2.श्वे.तपत्र (सहसम्पास) जनकपुरधाम 1993 2श्वे.ादातपत्र
(सहसम्पा्)
जनकपुरधाम 1993
3.नखदर्पण काठमाण्डू0 23.09.1995 3.समानान्त(र पटना 18.07.1997 3.अतिक्रमण महिषी 13.04.1997
4.प्रलाप पटना 01.12.2001 4.प्रतिक्रिया सहरसा 18.07.1998 4.हस्ता8क्षर महिषी 13.04.1997
5.आत्मापलाप कोलकाता 22.01.2003 5.मण्डान मिश्र अद्वैत
मीमांसा(सहसम्‍पा
काठमाण्डूत 25.06.2000 5.शिलालेख महिषी 13.04.1997
6.अतीतालाप पटना 6.एकैसम शताब्दीहक
घोषणा पत्र (सह सम्पा6
पटना 01.12.2001
7.पाथर पर दूभि दरभंगा 21.02.2004
8.कोशी घाटी सभ्यरता दरभंगा 21.02.2004
4.डा.रमानन्द झा ‘रमण 5.श्या9म दरिहरे 6.प्रदीप बिहारी
1.मिथिला दर्पण
पुण्यापनन्दसझा-सबोकारो
25.08.2001 1.भरि राति भोर सहसम्पासपटना
10.10.1998 1.भरि राति भोर
सह.सम्पारपटना
10.10.1998
2.बेसाहल दरभंगा 21.02.2004 2.एकैसम शताब्दी.क
घोषणा पत्र-सह सम्पा2
पटना 01.12.2001 2.मकड.ी काठमाण्डूस 25.06.2000
3.यदुवर
रचनावली
दरभंगा 21.02.2004 3.सरिसब मे भूत दरभंगा 21.02.2004 3. सरोकार ब्‍ेागूसराय 09.04.2005
4.सगर राति
दीप जरयक
इतिहास
दरभंगा 21.02.2004 4.कनुप्रिया-अनुवाद दरभंगा 21.02.2004 4. अक्षर
आर्केस्ट्रा -अनुवाद
बेगूसराय 21.07.2007
5.भजारल बेगूसराय 09.04.2005
3
सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी बेर लोकार्पणकर्ता
1.पण्डिजत श्री गोविन्द झा 2.प्रभास कुमार चौधरी
पोथी ल्‍ेाखक स्था्न तिथि पोथी ल्‍ेाखक स्थासन तिथि
1.साहित्याेलाप डा.भीमनाथ झा सकरी 22.10.1991 1.मोम जकाँ बर्फ
जकाँ
अमरनाथ दरभंगा 07.07.1990
2.गामनहिसुतैत अछि महेन्द्र मलंगिया जनकपुाधाम 09.10.1993 2.विद्यापतिकआत्म कथा गोविन्द झा पैटघाट 10.07.1993
3.कथा कुम्भै सं-बुद्धिनाथ झा घोघरडीहा 22.10.1994 3.कथाकल्प् डा.देवकान्त झा कोलकाता 28.12.1996
4.निवेदिता स्‍ुाधांशुशेखर‘चौधरी कोलकाता 28.12.1996 4.समानान्त‍र श्रमेश पटना 18.07.1997
5.अतिक्रमण डा.तारानन्दध वियोगी महिषी 13.04.1997 5.कुकूरू.कूआकसौटी चन्दे्तरश ब्‍ेागूसराय 19.09.1997
6.प्रतिक्रिया श्रमेश सहरसा 18.07.1998 3.सोमदेव
7.युगान्तरर विश्व नाथ पटना 01.12.2001 1.प्रलाप गोविन्दक झा पटना 01.12.2001
8.एक फाँक रौद योगीराज पटना 16.12.2002 2.तीन रंग तेरह
चित्र
डा.सुधाकर चौधरी पटना 16.11.2002
9.यात्री समग्र स.ंषोभाकान्त2 पटना 16.12.2002 3.उदयास्तन धूमकेतु पटना 16.11.2002
10.मैथिलीबालसाहित्य डा.दमन कुमार झा पटना 16.12.2002 4.अभियुक्तत राजमोहन झा पटना 16.11.2002
11.दिदबल प्रभास कुमार चौधरी दरभंगा 21.02.2004 5.सर्वस्वा2न्तभ सकेतानन्दा पटना 16.11.2002
12.गंगा प.ं यन्त्र नाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004 6.लाखप्रश्नभअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर खुटौना 07.06.2003
13.गाछ झूल झूल जीवकान्त् दरभंगा 21.02.2004 7.चितकावर हंसराज दरभंगा 21.02.2004
14.हम भेटब मार्कण्डेनय प्रवासी दरभंगा 21.02.2004 5.डा.रमानन्द0 झा ‘रमण‘
15.यदुवर रचनावली डा.रमानन्दर झा ‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004 1.अदहन डा.शिवशंकर
श्रीनिवास
कटिहार 22.04.1991
16.कनुप्रिया अनु.श्यारम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004 2मिथिलांचलक लोक
कथा
डा.गंगाप्रसाद अकेला काठमाण्डूद 25.06.2000
17लोरिक मनियार चन्द्रे श दरभंगा 21.02.2004 3.शिरीषक फूल अनु.डा अकेला काठमाण्डूह 25.06.2000
4.राजमोहन झा 4.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा ‘सरस‘ दरभंगा 21.02.2004
1.मनकआडनमेठाढ़ डा.भीमनाथ झा धनबाद 21.10.2000 5.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्र1मिश्र‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004
2..एकैसमशताब्दी क
घोषणा पत्र
रमेष/श्या मदरिहरे/मोहनयादव
.
पटना 01.12.2001 6.स्वारस स्वायसमे
विश्वापस
विवेकानन्द. ठाकुर राँची 02.10.2005
3 पृथा नीता झा भागलपुर 24.08.2002 7.अक्षर आर्केस्ट्रा अनुवाद- प्रदीपबिहारी बेगूसराय 21.07.2007
4.सरिसब मे भूत श्‍याम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004
5.हाथीचलय बजार डा.देवशंकर नवीन दरभंगा 21.02.2004
6.चिन्तलन प्रवाह डा.धीरेन्द्रगनाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004
7.सरोकार प्‍ा्रदीप बिहारी ब्‍ेागूसराय 09.04.2005
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३-part iii

In विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३ on जनवरी 13, 2009 at 5:10 अपराह्न

विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३-part iii
बालानां कृते
1.प्रकाश झा- बाल कवित 2. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर 3. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
1.प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत।
( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा । मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक लेल किछु गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे जाहिसँ बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । )
१. प्रकाश झा
बाल-बुदरुकक लेल कविता
बाल कवित :

1. फूलडाली में फूल छै,
पूजा हेतैन देवान के।
गेंदा, गुलाब, कनैल छै,
माला बनतैन भगवान के।

2. लाल लाल गुलाब छै,
अड़हुल सेहो लाल ।
तीरा सेहो लाल छै ,
माधुरियो होए छै लाल ।

3. सुन्दर फूल कनैल के,
पीयर ओकर रंग ।
फर तोड़ि क’ खेलै छै ,
बच्चा बुच्ची ओकर संग ।

2. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर
१.गरीबन बाबा
कमला कातक उधरा गाममे तीनटा संगी रहथि। पहिने गामे-गामे अखराहा रहए, ओतए ई तीनू संगी कुश्ती लड़थि आऽ पहलमानी करथि। बरहम ठाकुर रहथि ब्राह्मण, घासी रहथि यादव आऽ गरीबन रहथि धोबि। अखराहा लग कमला माइक पीड़ी छल। एक बेर गरीबनक पएर ओहि पीड़ीमे लागि गेलन्हि, जाहिसँ कमला मैय्या तमसा गेलीह आऽ इन्द्रक दरबारसँ एकटा बाघिन अनलन्हि आऽ ओकरासँ अखराहामे गरीबनक युद्ध भेल। गरीबन मारल गेलाह। गरीबनकेँ कमला धारमे फेंकि देल गेलन्हि आऽ हुनकर लहाश एकटा धोबिया घाटपर कपड़ा साफ करैत एकटा धोबि लग पहुँचल। हुनका कपड़ा साफ करएमे दिक्कत भेलन्हि से ओऽ लहाशकेँ सहटारि कए दोसर दिस बहा देलन्हि।

चित्र ज्योति झा चौधरी
एम्हर गरीबनक कनियाँ गरीबनक मुइलाक समाचार सुनि दुखित मोने आर्तनाद कए भगवानकेँ सुमिरलन्हि। आब भगवानक कृपासँ गरीबनक आत्मा एक गोटेक शरीरमे पैसि गेल आऽ ओऽ भगता खेलाए लागल। भगता कहलन्हि जे एक गोटे धोबि हुनकर अपमान केलन्हि से ओऽ शाप दैत छथिन्ह जे सभ धोबि मिलि हुनकर लहाशकेँ कमला धारसँ निकालि कए दाह-संस्कार करथि नहि तँ धोबि सभक भट्ठीमे कपड़ा जरि जाएत। सभ गोटे ई सुनि धारमे कूदि लहाशकेँ निकालि दाह संस्कार केलन्हि। तकर बादसँ गरीबन बाबा भट्ठीक कपड़ाक रक्षा करैत आएल छथि।
२.लालमैनबाबा

चित्र ज्योति झा चौधरी
नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आऽ लालमैन बाबा। दुनू गोटे चमार जातिक रहथि आऽ संगे-संगे महीस चरबथि। ओहि समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतहि एक दिन लालमैनक महीसकेँ बाघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबएमे बाघिनसँ लड़ए तँ लगलाह मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नहि केलन्हि आऽ मारल गेलाह। मनसारामकेँ ओऽ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो नहि ई गप कहलन्हि। एहिसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आऽ ओऽ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कए लालमैन बबाक दाह संस्कार कएलन्हि आऽ हुनकर भगता मानल गेल, एखनो ओऽ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करैत छथि।

3. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
देवीजी :
देवीजी राजेन्द्र प्रसाद जन्मदिवस
परीक्षाक समाप्ति भेलापर सब बच्च सब बहुत निश्चिन्त छल।लेकिन देवीजी परिणाम घोषित हुअ तक के समय के व्यर्थ नहिं बिताबऽ चाहैत रहैथ।ताहि पर सऽ बिहारके महान स्वतंत्रता सेनानी एवम्‌ देशके प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के जन्मदिवस छल ३ दिसम्बर कऽ।तैं ओ बच्चा सबके विद्यालय बजेली।

चित्र ज्योति झा चौधरी
देवीजी सबके बतेलखिन जे डॉ राजेन्द्र प्रसादके बच्चेसऽ धार्मिक एकताक ज्ञान भेटल छलैन।माय हुनका रामायण पढ़िकऽ सुनाबै छलखिन आ पिता मौलवी लग पठा फारसी सिखाबई छलखिन।बारह साल तक गणतंत्र भारतके प्रथम राष्ट्रपतिक पदके सम्मानित केलाक बाद ओ स्वेच्छा सऽ २८ फरवरी १९६३मे पद सऽ इस्तिफा दऽ देलैथ।ओ अति विलक्षण बुद्धिक स्वामी छलाह आ गॉंधीजीक विचारसऽ प्रेरित भऽ अपन वकालत छोड़ि स्वतंत्रता संग्राममे कुदि गेलाह।
धार्मिक एकताक बात उठल तऽ सब बच्चा सब अपन-अपन धर्मक विषेशता पर तथा अपन पाबनिके मनाबक ढ़ंग पर अपन विचार व्यक्त केलक।अहि तरहे सामुदायिक एकता पर विचारविमर्श कऽ सब अहि महान नेताके श्रद्धांजली देलक।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)

जय गणेशाय नम:

(1)

प्रथ पत्र पन्जीन लिखते: अथ सरिसब ग्राम: देवादित्यण रतनाकपत्य् छादन प्रजाकरापत्यन बनौली रम समेत निविकर सन्तुति केशव पत्यक दनाद गंगश्वनरा पत्या गौरि शौरि कुलपति बधवाम् महिपाणि सन्तिित खांगुड़ गयड़ा समेत ग्रहेश्वशरापत्यप जोंकी गणेश्व रा पत्यन सकुरी सोने सन्‍‍तति कटमा ओ सकुरी भवदित्यौ पत्या सतैढ़ रघुनाथापत्यु उल्लूग कौशिक उल्लूा गिरीश्वजरापत्यस सतैढ़ वास्तुस सुत ऋषि सवेढ़ सम्प्रनति फरकीया शिवादित्याीपत्यि रवाल मतहनी हरादित्याघपत्य् बलिवास श्री करापत्यश ननौरे शुचिकरा पत्य‍ जगन्ना‍थ पूर हल्लैरश्विर रूद्र पुर पैक टोल केवब बागे वसुन्धार नरघोघ रामदेवापत्‍य सिंडोला काम देवापत्य़ डीगरी गढपति सन्तिकत गौर वोड़ा दाश नजिबाक ग्राम भासे सन्तिल वनिआ रातु दिगल्धन कान्हम सन्तिलत गोविन्द श्राड़ाम सोय सन्तितति नाटस सुपन वालू देहथि नारायण पुराइ ब्रहमपुर मिश्र रामापत्यत अचौही शु‍चिकरा पल लिया ब्रह्म पुर छीतू पारू पीलखा शिवाई महु लिया जहरौली ईवश्वसर नारू नोटड़ श्री धरापत्यू दिमन्दररा एते जजिवाल गान अय स्वािन्दल पल ठ हराइ सन्‍‍तति भखराइन सोमेश्वौरा पत्य‍ बुल्लडन कधुंवा समेत ठ. अनन्तु हरि लखनौर भोगीश्वार पत्यव गोपल सन्तिवत बथई हरड़ी गढाघरा पल्टाख पौराम रतनाकरापत्य‍ हलधर ते तरिआ हरिड़ी खाडबसा ठ; इबे सन्तअति भौर लाखू महिमकति बेहर यमुगाम योगीश्वयरापत्य् सोन्द़पुर सरपना कुरहनी वासी श्रीर स्प‍ष्टधता शुभद्रका पत्या देशुआल झाम सन्ति्त हैयाश गुरदी सोन करमे वास्तुग लागू हिस्‍ देउरी गोपालपत्या गढ़ देने सन्ति् चतुआरी पक्षधरा पल तेतरिआ दिन करायल्पठ प्रोराग बधरी बिहारी अगय गोरदी साधु सन्तिग बधयी लक्षमीमति सन्ति त सरसा गणेश्वररा पत्यन गुलदी हल्ले श्वतर पत्य केलारी जीवेश्वगर पत्या आलय

(2) ”अ”

पोमकंठ सरपरब रबि सन्त ति गौर ब्रह्मपुर जयकर सन्त ति सजनी भासे डीह देवेश्वतरापत्यु देशुआल पक्षीश्वपरा पत्यल यमुगाम गिरीश्वतर मत्यं देशुआल विन्येग श्वरर पत्य वैकुण्ठ पुर शितिकंठसन्तलति खुली। रतनेश्व्र परन गुलदी अथ गंगोली ग्राम महामहो सुपट सन्तिगत गोम कटमा होरे सन्तदति बिसपी हारू सन्ति‍त देशुआल हरि सन्ति‍त डुमरा दिवाकरापत्यक दिगुन्धत गौरीश्व्र सन्त ति जगनाथा पत्य धर्मपुर कुमर गंगोली वासी कमल पानि वैगनी 93 ग्राम डालू सन्‍‍तति सकुरी गयन सन्ति् खरसौनी एते गंगोली ग्राम ग्राम पबौली ग्राम रवि सन्तिगत बिरौलि उदयकर सन्ति सपता देशुआल महिपति सन्ततति कोशीपार डुमराही हरियाणि सन्तिसत गोधनपुर लक्ष्मीमदत्तापत्य् गोनोली नारू सन्तिि मतौनी डहुआ रूद सन्‍‍तति बछौनी रूद सुत पाठक भीम मीरगोआ जागू सन्त ति रथपुरा विशो सन्त्ति चणौर बासु गौरि सन्‍‍तति महरैल केशव गोविन्दानपत्य राजे दामोदरापत्य राजे शिवदत्ता पत्य‍ बढ्यिाना गोगे सन्तिपति सहुड़ी यशोधरापत्यग मेयाम दामू सन्‍तति सम्माह पुण्यादकरपत्य‍ पैकटोल पनिहथ उँदयी सन्तेति धेनु मधुकर तनाकर प्रजा कर दियाकर पत्यत जगति एबे पर्वमललीगा्रम अथ सोदपुर ग्राम:-ग्रहेश्वयरापत्या धउल :दे्रवश्पतरापत्यत विरपुर धीरेश्वयरापत्यए सुन्दमर विश्व्श्रारपत्यि माधव टसौली रामापत्यग रमौली बाटू बड़साम रूचि बासुदेव कुसौली यताधरापत्यय पचही गयनापत्यप: रोहाड़ बहेड़ा रति हरि टाटी वास्तु् सन्तुति तेतरिहार रूपे सन्तरति सिमर वाड़ बसाडनापत्या कन्हौतली कामेश्वयर सुरेश्विर राम

(3)

नाथापस: भौआल कान्हारपत्यन सुखैत त्रिपुरे अकडीहा रतिनाथा पत्य‍ डालू कटका बाटू हलधर केडटगामा सुधावरा पत्य गौर म म रविनाथ सुत मामतुर जीवानापत्य् दिगुन्धत म म उठ भवनाथ प्र अयाचीयुत ममडा शंकर मटो महादेव महो मासे महोदारी सन्तिड सरिसन अपरा भवनाथ प्र अचाचीसुत शम्भुडनाथ रूद्रनाथापत्यठ बालि महामही देवताधापत्य दिगानुन्धह महो रघुनाधापात्यप रैयाम जोर सन्तनति विठौली मिसरौली गोपीनाथा पत्यथ मानी, जगौर म स उ जीनेश्वतर सुत गणपति हरिपति महिया लोकनाथापत्यप माझियाम खोरि। हरदन्तत माधदापत्यग राहड़ सुहगरि देवे सन्त,ति मयि एते साद पुर ग्रामा जुथ गंगोरग्राम बीनू बालू कुरूम भैआल केशवापत्यझ भुहियारी पोनद सनाथ सन्ताति विरनी वासी भारे सन्तेति महिन्द्र पुर विटू फदि बेकक

अय पल्ली ग्राम:-हलधर सन्तीति = बनाइनि।। मह यहां उँमापति समौलि, वारी, जरहरिया।। रूपनाथ सन्त ति गिरपति = समौलि। पशुपति = समौलि।। महाप्रबंधक।। रघुनाथापत्यत: दड़मपुरा नरहरि, रघुपति सन्त ति = समोलि।। देवधरापत्यत = कछरा, देउरी।। गांगु सन्ततति=दोउरी।। दिवाकरापत्यु=देउरी, सकुरी, मोहरी=कटैया घोटक रवि सन्त ति=कटैया।। ग्रहेश्व‍रापत्य : कछरा।। रामकरापत्यो=भालय।। जितिवरापत्यय राजेसतिश्वदरापत्यम=सिम्मुेनाम ।। कान्हासपत्यह= पड़ौतिन।। विरममिश्रापत्यत=ततैल।। रामदत्त सुत केशव सन्तयति=कान्हत=हाटी।। महार्ड सन्तिति=अतयी।। वंशधरा पत्यु=अलय।।गोविन्दाय पत्यथ=रैयम।। कीखे सन्त‍ति राम सन्ताति वाटू सन्त ति=नंगवाल मिमाकरापत्यय= पर्जुआरि हिताई सन्तरति विरूपाक्षा पल कैसुता =बैकुंठपुर।। हारू सन्त्ति= नैकंधा।। कविराज

(4) ”आ”

सन्तिसत=मछैटा।। सिंहश्‍ेवरापत्यह=ननौर।। मित्रकरापत्य =ननौर-राजखड़, पाली ।। जयकरापत्य =पिण्डाजघर, क रहता, रनाहास पानी कछरा।। माधका।। पत्यग गौरीश्व्रापत्या अहियारी, दूपामारी।। गणपति गांगु सन्तिनत=अहियारी।।यशु, डगरू सन्तैति=कुरूम।। बागू सन्त।ति=रोहाल, कटैया।। गोविन्दा‍।। पत्य हचलू सुत दिवाकरा पत्यस=सुदई षनिहथ।। होराइ सन्तीति=अडि़यारी।। रूद्रश्वूरा पत्य।=भड़गामा। बाटू सन्तितत=सन्द‍साही, परली पाली, विशानन्दय पत्यन=ब्रहमपुर थेतनि सन्ति=त= जलकौर पाली।। चन्दौरत पाली दुर्गादित्या पत्या=भड़गामा।।बाटू सन्त्ति=सन्दयसाही, पाली पाली।। विशानन्द् पत्य ब्रहमपुर।। थेतनि सन्तितत=जलकौर पाली।। चन्दौित पाली दुर्गादित्य‍ पल =महिषी देवादित्यटपत्यत= बिहार महिषी समेत।। रतनू प्रजना दित्यन पपत्यत महिषी।। रतनाकरापल=यशी।।ततो जलकौर पाली।। चन्दौयत पाली दुर्गादित्यवपल=महिषी देवादित्सद पत्यी= बिहारा महिषी समेत।। रतनू प्र तनादित्यष पत्रूस=महिषी।। रतनाकरा पत=याशी।। ततो धोधनि सन्ततति=याशी।। दिशो, झीकर शुचिकए पल=पुरोठी।। जीवे सन्तमति=मोनी।।बाद ऋतति आठी ससुधारापत्य। मागु सन्तधति=मोनी भवदन्ता।पत्यस=पुरोही (100/105) शुभकर। पत्यर=जमदौली।। पौथू सन्तोति=परसौनी, जरहटिया सकुरी।। कसमाकर सन्तगति जमदौसी ।।यहा धरा पत्यो =सकुरी।। जीवधर वशीधरापत्यह=सकुरी।। बु‍द्धिघर। पत्य‍=ततैस।। कान्हा।पत्यत=अलय, सकुरी।। इन सन्ताति सकुरी।। मुरारी सन्तयति समापत्यर=महिन्द्र वाड़ विशो सन्‍‍तति रूद्रवश्वयरपत्य। कोलहट्टा गणेश्वयर नन्दीाश्वयर पत्य =महिन्द्र वाड़ गोविन्दाीपत्यत=हरिपुर।।विरश्वसर नरसिंहापत्य्=रादी।। श्रीधरापत्यि बेहउँठ राढ़ी।। गुणीश्वयर पत्यर। कोउलाव।। ग्रहेश्व‍रापत्या चहुँटा।। शोपालापत्यह=समैया हरिपाणि सन्तरति=समैया।। बाहरे सन्तसति होरेश्वतर मतिश्वार मंगरौनी।। बाट सन्तेति=कटउना ।।जसू, रातू सन्तनति=अकुरी।। गणपति सन्तिति भगवसन्त ति=पचाढ़ी।। गुणाकरा पत्यि बरेहता सोन्द।वाड़।। पुरदित्यात पत्ये=मृगस्थउनी एते पल्लीप ग्राम

(5) हरड़ी।।धनेश्व र-मझियाम, कनईल, लोटना समेत।। लाखू सन्तवति-कनइल।। चाण सन्त।ति रतिश्वदर छामू।। रामकर कृष्णािकर थुगाम बाहरी।। भोड़ो सन्तनति शंकर गूढ़-दिवड़ा।। इबे-जरहटिया ।।देवे सन्तमति-रहड़ा।। गोढ़े-रहड़ा।। गोन्दकन चाण-।। पुरोहित गोपाल सन्ति।त माह वरूआड़ सुपे संखवाड।। श्रीकर पेकटोल गौरीश्विर -तेकुना।।भगव -पुरामनिहरा।। चक्रेश्वनर सन्त ति-दुहुड़ा कटरा। देहरि ततैत।। सोम-तेतेल सान्हि सन्तिक गोधनपुर।। देवे सन्तदति-कादिक पूर। (ताइ-तत्रेव ।। ।। गोना एकराढ़ी-थितिकएपत्यद-आड़ावासी-मझियाम समेत।। बुधौरा सकरादी, दूबा-सबुराढ़ी अन्हापर बरगामा समेत।। एके सेकराढ़ी ग्राम।। अथ ढरिहरा ग्राम:-त्रिपुरारि सन्तेति-सिंहाश्रम।। हरिकर बु‍द्धिकर सपनादि विजनपुर।। यशस्पाति सन्तकति गणपति गड़ैली गुणपति सन्त्ति-पठोड़ी)।। विद्यापति = पुडरीक=मछली। केशव-अमरावती। शिरू-कुरूम सोने सन्तुति औजाल।। शिव-यमुग्राम ।। गुणाकर पद्यकर मधुकरपट्टो प्रजाकररापत्या कुसुमाक 9उगाम ।। मित्रकरापत्यव=जरहरिआ।। प्रसाद गौरीश्वारपत्या-भाडड़ सन्ह समेत।। दिवाकरापत्यर= असई। दिनकरापत्रूक सोनतौला।। रतिशर्म्माय वस -सकुरी।। इन्द्ररपति= हरिनगर। आग्नेाय।। झोंटपाली दरिहर सिमसिक कोइला विश्वरनाआपत्यत-महिसान-कोइलख समेज।। दिघुपति-तत्रैव।। होरे उराढ़ वासी।। गांगू-कघरा।। रघुपति सेठय कठरा।। कान्ह = कटैया।। जादू सरहरा वाही कृष्ण पति-गुणीश्विर=फूलमती।। सुन्द र-गांगू=तत्रैव।। मतीश्व रापत्यद= सुन्दार असई समेत।। सुरपति=गोलहटी, अलय समेत।। गिरीश्वबरापत्यम-उडिसम।। पण्डोहलि दरिहरा=हरिकर सन्तंति सिहौली शंक मरनामक गोढ़े-नवहथ।। कान्हाव पत्यह=आसो-चिलकौरि।। भादू सन्‍‍तति=ततैल, तेतरिआ, सिमार

(6) ”उ”

कनसम।। गोढि़ सन्त’ति=बढि़याम। सुपन सन्तिति=गांगू मिट्टी।। विशो=तत्रैव।। हिक सावे=दीघीया।। धीरेवश्वतर सन्तमति=तारडीह जलकौर=तरिहोश। मिश्र कान्हा=पत्यु= मतडना।। गंगेश्विर सन्तलति मिश्र दुर्गादित्‍यापत्यश=चदुआल।। देवधरापत्या।। अग्निहोत्रिक महामहोहरि सन्तिति= नेतवाड़ ।। नारू सुत रूचि=मठुआल।।विभाकारापत्यव=सिंधिया।। प्रभाकर सुत जुधे= पटसा।। नोने-जगवाल।। नारू सुत बाटू प्रभृति=अन्दोाली।। गोढि सन्तरति= धनकौलि मिश्र हरि सुत चण्डेंश्वभर= चंटुगामा।। नारायण=उने।। मिस मतिकर= बघोली।। धामू सन्‍‍तति= पोजारी।। शूलपाणि=रतौली नीलकंठ=पोखरिया रूपन=रतौली।।खांतर=बड़गाम।। बासू सन्तमति=बाली मुनि विरश्वूरपत्यक दिवाकर=राजनपूरा।। रविकर=छत्रनध राजनपुरा, सीसब समेत।। गुणाकर सिढि़बाला।। हरिकर=जरहटिया, ततैत समेत।। समेत।। ब्रहमेश्‍वरपत्यक रजनाकरापत्य। पभ्रारी।। विश्वजरूपसन्तरति=पनिहारी।। शूलपाणिभ्राता नीलकंठ= बोथरिया।। रूपन सुत भोग गिरी=रतोली।। यवेश्विर= जरहरिया=ब्रहमेश्विर तत्रैव।।एते दरिहए ग्राक।। 112 पथ माण्डार ग्राम:-गढ़ माण्डनर कामेश्वीरापत्य =बथया।। महत्तक जोर सन्तकति= बघांत।। सुइ भवादित्रूुया पत्यथ= कनैल, बुठौली समेत।।दिवाकरापत्य्= जोंकी, मढिझमना।। हरदत्त सन्त्ति सनतिया।। गुणाकर, जयकर खनतिया।। माधवापत्यप=अरडि़या।। रति,डालू-भौखाल, दोलमान पुर।। बेगुडीहा।। खांतू। ठाकुर, सरवाइ, कउटू सन्तयति=भौआल।। गदाई=दोलमानपुर=केशवापत्यप=असमा।।कानहापत्य।=आसमा।। सूपे, विभू= कटमा विभू, भानुकर दिलरवा।। कविराज शुभंकराएल = कटमा।। वागीश्व।रापत्यु=महिषी, गांगे।।रूपधरा पत्यय=मड़रौनी।। रविदन्ता=पत्यि विशो= देउरी।।

(7)

हरिकर=विजहरा।।खांत=जरहटिया।। हरि=मडरौना।। हौरे= केउंट गामा।। सुधाकर=वारी।। शुभंकर=सकुरी।। पशुपति सन्तूति गुणपति=ओकी।। (18/09) शिवपति इन्द्रहपति=रजौर। कृष्णएपति=पतौनी।।रघुपति=जगौरा।।प्रजापति=अमरावती।। छीतर= जगौर।। आड़नि सन्तकति कुलपतिक कटैया।। नशपति =दहुला।। रविपति=कटका।।महादेव=सिर खडि़या (श्रीखंड)।। रतिपति (18/03) =सिहौलि)। दूबे=दुबौली।। पौखू= बिठुआला।। धनयात्यांक =सरहद।। विधूपति=पतनुका।। सुरपति, रतन=कनखम।। सोम=बेहद।। भवे, महेश= कटैया ।। गुणीश्वलर=कटाई ।। पीताम्ब।रा पत्यय= कटाई, जमुआल।। देवनाथ शीरू=जरहरिया, मकुरी।। लक्षमीकांतापत्यद= त्रिपुरौली।। हरिकान्ता।पत्य। दहिला।। उमाकन्ता। पत्यन ब्रहम्पुरर सुगन्धा सन्तपति=कनसी।। हमेश्वररातस्यम मझौली।। गुणे मिश्रा पत्यप=थुबे, खरका ।। सोरि मिआपत्यत=ब्रहमपुर।। गयन मिश्रा पत्यय, वीरमियापत्य = वारी, सकुरी।। हरिशर्मापटन सुधाकरादि= मृगस्थ ली छेद मिश्रायटन=अन्दौुली।। सुरेश्व्रापत्श्=‍ ग्रहेश्व‍रापत्य्=कटउना।।हरि मिश्रा पत्यव=कटउना।। ऋषि मिश्रायत्म = बेलउजा।। यति मिश्रा पत्य = कल्डौना ।। कीर्ति मिश्राा ममीश्व=रपत्य = गोआरी।।गिरीश्वयर पट=मिथरौली।। हरे मिश्रा पत्यय= खपरा ।। बाढंमिथापत्यत=टखौली।। हेसन, नरदेव= लेखटिया।। शिवाई सन्त्ति=वत्ययास, धमपुरा।।

सर्वानन्दत= दलवय, सकुरी।। दलवय स्थित=असगन्धी ।। चन्द्ररकरायस=केवड़ा।। कुलधर, रमरायस= दिपेती, बेतावड़ी।। चोचू मोचू= पीहारपुर गोआरी समेज गोपाल सज्जौन= ब्रहमपुर, जगतपुर।। मित्रकरापत्यच, रूपनापत्ये= महिषी, सकुड़ी ।। सुधमय सन्त=ति= अपोरवारि, जहरौली।। रतिधरशुमे= कमपोरकी तरौनी ।। ही सन्तितति= निकासी, मुगाम।। एते माण्डहर ग्राम:

(8) ”ऊ”

अथ बलियास ग्राम:-।। भिखे, चुन्जीप, नितिकारपत्यर= चुन्नीप।। दूबे सकुरी ।। सुरानन्द।=बैकक वासी।। रति सन्ततति=खढ़का।। शिवादित्याग पत्यौ मुराजपुर, ओगही, यमुधरि।। शुभंरापत्यि=ततैत, कमरौली 11 नन्दी‍ सन्तकति= भौजाल, अलप, सतलखा।। सुधारकरापत्य‍=जरहरिमा।। राम सझपिप्त =जादू धरौरा।। केशव=यमसम।। शक्ति श्रीधर=सकुरी मटि समेत ।। मद्ध सन्तनति नारायण सिमरी, जालए, कड़का।। महन्थि सतृति माडर शिरू सप्त।ति=रूद्रादित्याीपत्यु=विसौली।। रूचि सप्तदति उदयकरापत्या नरसाम।। एते बलियास ग्राम:।।

अथ सतलखा ग्राम: गुणाकर=डोक्ट रवासी ।। विभूसप्ति।त भाष्कमरापत्या= सतौषिा दिवाकरापत्यू= सतौलि।। चन्द्र।श्विर पत्यय= कमोली।। शंकरापत्या=सतसरवा लोहरा पत्य , नन्दीतश्वारापत्यप, यवेश्वौरा पत्य्=कछरा।। अथ एकहरा ग्राम:-श्रीकर=तोड़बय।। जादू सन्तीति= सरहद ।। शुभेसन्त ति= मैनी।।सोने सन्त्ति=मण्डयनपुरा लक्षमीकरापत्यप=संग्राम।। रूद सन्तापित=आसी।। धाम=नरोध,जमालपुर।। गढकू=कसरउढ़।। बाटू= सिंधाड़ी।। थिते=खड़का ।। मिते=कन्हौाली।। गणपति पतउना।। जाने= ओड़ा।। कोचे=रूचौलि।। शुचिकरापत्य। मुराजपुर।। चित्रश्विरपत्य =नरौंछ।। एते एकहरा ग्राम।। अथ विल्पलचंक (बेलउँच) ग्राम: धर्मदित्याकपत्यु=सिसौनी ।। रामदत्त हरदत्त नोना दित्या‍ सन्त्ति= रतिपाढ़।। सुधे सन्तीति= सुदई।। शिरू=द्वारम।। गयादित्यापत्यय= ओगही।।महादिस कर्म्मतपुर बछौनी समेत।। जीवादित्यर=उजान।। रूद्रदित्‍य=दीप सुदई।। सर्वादित= तडि़याड़ी।। देवादिल= ब्रह्मापुर।। स्तीनादित्य्= काको।। मिचादियात्म्का काको वासू=देड़ारिया प्रजादित्यद हरिगयन=कन्हो।ली।। शुपे=कोलहट्टा।। रूकमादित्यि=ओझौली।। केन्द्रस सकुरी।। महथू= सकुरी।। चौबे सन्तरति= सतसरना

(9)

अथहरिअम ग्राम -लाख सन्तदति=रखबारी।। केशव-दामू=मंगरौना।। मांगू-नरसिंह=शिवां।। हारू (18/09=शिवा।। (27/05 नरहरिसन्त्ति ज्वचतिरराजपुर चाण दिन कटमा।। परम लाख= आहिल।। रति गुणे=कटमा।। माधव सुत सन्तदति=अच्छी। ।। अते हरिजन ग्रामा अप संकर ग्राम कविराज लक्ष्मीरपाणि=नीमा।। सुरेशपल, दामोदरापत्या=पटनिया गंगोली।। रवि शर्मा वंग लक्ष्मीी शर्मा ब्रहमापुर।। पतरू, शीरू= पटनियॉं पोरबरौनी और सकुरी ।। जागे सन्तकति= रतनपुरा।। महाई सन्त ति=परिहार।। देवतन्ताषपत्य =पीलरवाड़ा।। इविन्द ता पत्य = बहेड़ा।। पॉंरबूसन्त।ति=सिरखंडिया (श्री खंड) ।। सुपन, मारू सन्तषति= नरधोध।। हराई, शुचिकर, प्रतीकएपल= अकुसी।। हरिप्रश्नत= पोराम।। दोमोदर पत्यस=बेहरा।। उँमापति सनतति= ततैत।। खंड तक वाल गामा ।। अथ धोसोत ग्राम रति कानह=पचही।। रूचिकरापत्य्= नगवाड़।।रूद्र सन्‍‍तति=यमुथरि।। रूद सन्ततति= गन्ध राइनि।। गणपति सन्ततति=धनिसमा।। कृष्णधपति सन्तीति= खगरी।। पृथ्वी धारापत्य्- सकुरी।। रूद्र चन्द्र =डीह।।एते धोसोत ग्राम:

अथ करन्व‍ल ग्राम इन्द्रीनाथ पल कोई लख।। शोरि नाथा पत्यत=दीघही।। रामशम्पदतित्यि= प्ररनापुर।। रतिकरापत्य।= मफियाना बुद्धिक रैव।। बुद्धि का सन्त्की कष्का् पत्यख ककरोड़।। हचलू सन्तघति=कनपोखरि।। गणेश्वयरापत्यर=केडरहम।। लान्हीर सन्ताबते=गोंढिं=शैतत्लए वायी।। सदु=रूचि अन्तकनि हरस्तापत्यर=धनकौलिनिक्तन परन बछांत ।। नोनं सन्तेति=बेला।। लान्हि सन्तडति मुरदी।। सादू सन्ति।=ककरौड़।। मांगू स्तु्ति=सोन, कोलखू, मछेवा समेत।। मधुकरादोलमानुा गिरीश्व्र सन्तहति नरसिहं नडुआर श्री वत्सद सन्तिति=बेस्ट़।। सदु केशव=सिरखंडि़या (श्रीखंड)।। वराह सनतति=तरोजी।। रामाध्य्रीश= तरौनी कान्हर श्रीधर=तरौनी।। रघुदन्त। रूचिस्तस रूचौलि।। नदुपाध्याटद

(10) ”इ”

माधवापत्यु=सझौरा।। सटु रामापत्यय= झंझारपुर।। गुणीश्व)रपत्यत=झंझारपुर।। गुणीश्वयरपत्यत=झंझापुर।। सतु भवेश्वहरापत्या= हरवंशापात्य् मुजौनिआ।। शिवशापत्यू=रोहड़।। धूर्त्तराज म प पु गोनू सन्तोति=पिण्डोपखडि़।। एते करम्बुहा ग्राम:।। अथ बूधवाल ग्राम: रविकरापत्यश=खड़रटन सुरसर समेत ।। सुए सन्तजति=ब्रहमापुर।। राम चाण=मझियाम।। ढोढ़े=बेलसाम।।उगरू= सतलखा कान्हापपत्र= वेतसाम दूबे हरिकर=हरिना।। दामोदर= सकुरी।।राम दिनू= सुन्दुर पाल।। गंगादित्य। विकम सेतरी।। सदु भानुसुत गणेश्व रपत्यह=परिणाम ।। गुणीश्वेरापत्यि जजान।। कोने=पीलखा।।गंगेश्वूर=मलिछाम।।रूचिकर रतिकर=गंगौरा।। महेश्वुर फरहरा।। गौरीश्वपर=मदिनपुर।। विशो सुधकर=डुमरी ।। सूर्यकर सन्तिोत=सिउरी।। ग्रहेश्वमर=महिषी ।। भोगीश्वगर=चिलकौलि बालू बोधाराम।। उदयकर आड़ी।। पौथे धरम= मुठौली।। कान्हारपत्यो=बुधवाल।। जगन्पाहपत्यन=सिंधिया।। एके कुछ वात ग्राम।। अथ सकौना ग्राम-वाटन सन्तडति सिधियाना हरिश्वुर पत्यौ=दिवड़ा।। सोमेश्व=रापत्यन=बघांत।।बाबू सन्तिति डीहा।। रति गोपाल दिनयति=तरौनी।। रूद सन्तित=जगन्नावथपुर।। गणे महिपति=सरिरम।। शुचिनाथपत्यर परसा।। गुणे मासे ततैल।। एते सकौना ग्राम: अथ निसउँत ग्राम: पणित सुपाइ सन्तमति=तरनी तरौनी।। रघुपति=पतउना।। जीडसर सजाति कुआ।। इतितिसॉं अथफनन्दएह ग्राम: श्रीकरापत्य्= बथैया।। कुसुमाकर, मधुकर, किठो सन्तीन्ति विठो प्रहनपुर।।हाठू=चाण।। बसौनी=ब्रहमपुर 11 सुखानन्दश गुणे=सिसौंजी गांगू=सकुरी।।सदु गोंढि़=खनाम।। मतीश्वसर, पौखू=चोपता शंकर=शंकर=रवयरा।। महेश्विर=डीहा सोम गोम माधव केशव= भटगामा।। विशेश्वगरसहा सिंहवाड़, सिन्हु वार 11लक्ष्मीत सेवे =सकुरी।। भवाईरूद=बोरबाड़ी, भदुआल, दरिअरा, सिमरवाड़ मुजौना समेत अनन्हसह राम:

(11) अथ अलय ग्राम।। प्रलय, उसरौली, बोड़वाड़ी, सुसैला, गोधोण्डीवच।। शंकरापत्यि=गोधनपुर समेत।। श्रीकरापत्यस=उजरा।। हेतू सन्ति1त=सुखेत मिश्र (मिमांशक) हरि देवधरापत्यड=सिंधिया।। बासू सन्त ति: जरहटिया बाढ़ वाली। रविशर्म्मप=जरहटिया।। धारू सन्तिति=बेहरा।। शिरू=धमडिहा, कादेपूरा गोविन्द‍ सन्तिध बेहद।। म. म. उ. गदाघर=उमरौली।। परम बुद्धिकर=बैगनी।। रतनघर सन्तिति भवदत्त= भटपूरा।। शिवदत्त=अजवन्ताे।। मिश्रा राम वाड सुधार मात्यब उसरौली।। लक्ष्मीचधएपत्यब हलधर सन्तौति यमुगम।।शशिधर, रघु, जाटू=अलयी।।यवेश्व्र=अलयी।। गंगाधरापत्यय=यमुगाम।। लाख मूड़ी गणेश्वतर=परम गढ़।। सिधू=वाड़वन।। दो दण्डश अल्प यी लोआमबाती गसाई= डीह।। रूद= खड़हर।। रमाई=राजे वासी विश्वेाश्वीर मतिश्वरर उसरौली।। वेद सन्तयति=मलंगिया नान्य्पुर अलई, सिमरी, रोहुआ समेत गंगुआल बाथ राजपुर वासी।। किचिधरापत्यई=सकुरी जयकरापत्यख= कड़रायिनि।। सुधाकरापत्य कड़रायिनि, मुराजपुर।। गोनन-कटमा गंगोली बेकक समेत। कोठों कतमा।। साठ विशाही दोलमानपूर।। रूद्र=गंगोली।। कुशल गुणिया= जरगाना जालय समेत एते बभनियाम ग्राम:।।

अथ खौआल ग्राम: श्रीकरापत्यत=महनौरा।। रतिकर सुधाकरपत्यव=महुआ।। चन्द्र कर पत्यग= महुआ।।रूचिकरपत्यि=महुआ मतिनुपुर।। स्थितिकारासं महिन्द्राग दिवाकरापत्यय=कोबोली।।हरिकरापत्य -महुआ।।आदावन=परसौनी।।बाधे ढोढ़े सन्तिमत=सोहुआ।। वेणी सन्तमति रोहुआ।। उमापति सन्त्ति=नाहस ।। विश्वहनाथस अहित।। बुद्धिनाथ रूचिनापात्यु=खड़ीक।। रघुनाथापत्ये=द्वारम।। विष्णु सन्ति।त=द्वाछगम।। नोने जगनाथापत्यि=बुसवन।। राम मुरारी शुक्र सन्तिुत= पण्डोथली।।

(12) ”ई”

बाटू सन्तमति=ब्रहनपुर तिरहर मोडु।। साधुकरापत्यन=दडि़मा।। हरानन्दत, सन्तपति=अहियाई।। भवादित्यािपत्य =नाहस देशुआल।। पॉंखू=बेहटा।। भवे सन्तबति धर्मकरापत्यध=देशुआल।।डालू सन्तहति=दडि़मा।। दामोदरा पत्यत= तरहट ब्रहमपुर।। राजनापत्य्=ययुआल।। प्रितिकरा पत्य =पचाडीह (पचाढ़ी।। पतौना खौआल दिवाकरापल = घुघुआ।। भवादित्यादपत्यि=ककरोड़ स्वंरगरैठा समेत।। बैद्यनाथ प्रजाकारक रघुनाथ कामदेव-मौनी, परसौनी।।गोपालायह कृष्णा पत्यन =कुर्मार, खेलई।। शशिघरापत्य नरसिंहपत्यव= बोढ़वाड़ी कोकडी, छतौनिया।। दामोदरपत्यद=कोकडीह ।। नयादित्याा पत्य =बेजौली।। दूरि सन्तरति जयदित्या।पत्यि सुखेत, सर्दसीमा।। शुचिकरापत्या=दिगुन्धी।। आड़ू सन्तयति रघुनाथ पत्यत= मुराजपुरब्रहपुर।। जीवश्‍ेवरपत्यय= दिगुम्धद।। भवेसन्ति‍त= मिट्टी, सतैढ़, बेहर।। इबे=सन्त‍ति=ब्रहमपुर।।हेलु सन्त्ति =सतैढ़ रविकर सन्‍तति तत्रैव प्रसाद मधुकर सन्त‍ति बेहदा।। दिवाकरापत्यर पिथनपुरा।। गंगेश्व‍र पत्यक=कुरमा, लोहपुर।। लम्बो दर सन्ततति=कुरमा।। नादू सन्ततति= पिथनपूा।। राजपण्डित सह कुरूमा रामकर सन्त‍ति मिट्ठी खंगरैठा गनाम।। आड़नि सन्ति्त=सौराठ।। मनि गहाई, के उँदू सन्तसति=सिम्बतरवाड़।। एते खैआल ग्राम:।

अथ संकराढी ग्राम:-महामहोकारू सन्तिम भगद्धर गोविन्दद सकुरी।। प्रितिकर=कादिगामा।। शुमे सन्ततति=अलय महाम्होा हरिहापत्यत= सुन्दकरे गोपालपुर।। जयादित्यार पत्सई=मतुनी सरावय।। परमेश्विर=नेयाम।। सदु सुपे हरडी।। रामधरापत्यत= अलय ।। हरिशर्मा सन्तदति=सिधन मुरहदीन रे कोरा संकखढ़ी-होरे-चांड़ी-परहट।। सोम-गोम=शक्रिरायपुर।। हरिश्व्र=सकराढ़ी वासी।। जीवेश्व र 1 पत्यद=बेला अधगाठ।। शयन इरिकादि

(13)

नोने विभू सिंधिया=गढ़ बेलउँच=सुपन भकुनौली।। कौशिक=कुसौली 11 लक्षमीपाणि=सुशरी।। पॉंपू=देयरही।। एते बेलउँच ग्राम: अथन नरउन ग्राम: बेलमोहन नाउन ज्य टाधरातल=मदनपुर।। रातूसनतति=कडियन।।। गर्ब्बेीश्वुरापत्ये:सिंधिया ।। डालू सन्तिव रूचिकर: मलिछाम।। चन्द्रगकर टुने सन्तमति =सुलहनी।। विशोसन्तिन= त्रिपुरौली।। हेनसन्त्र।ति भखरौली।। दिवाकर पता: सुरसर, कवयी।। दिनकरापत्यन=पुड़े।। खांतू कोने=वत्ससवाल।। शक्रिरायपुर नाउन=दामोदरपत्य।=जरहटिया। मुरारी=तेघरा।। योगीश्वररापत्य =अवेश्विरा पत्यर नयगामा भरवरौलीसमेत।। एते नाउन गाम:।। अथ पनिचोभ ग्राम:-मधुकरापत्यम=तरौनी, झाौआ, पदमपुर।। शिवपति, गुणेश्वतरापत्यव=सुलहनी।। विशो हातू सन्तनति= असौली भवेश्व‍रापत्यन मैलाम।। जौन सन्तिक=आहिता।। पशु आदितू= डीह आहिल।। बाबू पाठकादि= मैलाम, कटउना विसपी समेत।। कामेश्वोरापस पौनी, सकियाल। देहरि सन्‍‍तति= कनौती, तरौनी लान्ह सन्त ति=उल्लूर।। जगन्नााथपत्यप हरदत्त= खड़का, बगड़ा बयना समेत।। आउनिसुत पदमादितपत्यल= मंगनी, सिररूडि़या, महालठी, लोही, चकरस्ट्, कर्नमान तरकीस समेत ।। हरिनाथपत्यद मखनाहा कमोली।। चण्डेेश्वार पत्यु हरिवंश सुत रतनाक रायपत्यग=बथैया ।। चक्रेश्व र= कुरमा।। बाटू सन्तरति=चक्रहद, सिउली बाठी।। विरपुर पनिचोम= रातू सन्तिह= सुन्दतवान।। हारू सन्तरति करियन।। वास्तुु सन्त ति=मिट्टी।। महेश्वनरापत्य।= देशुआल।। दिनकर मधुकरापत्यु=जरहरिया ।। रामेश्वहर सन्त्र ति चन्द्र करापत्य्=अलदाश।। विर सन्‍‍तति केशवापत्यत = भरौर, शहजादपुर, वलिया समेत।। वासुदेव सन्तपति ददरी।। सोने सन्त।ति= ब्रहमौलि।। धराई सन्‍‍तति=अमरावती = रात सन्त‍ति= करहिया, उसरौली आदित्य डीह।। हरिश्वेरापत्य =डीहा।।सोमेश्वतर=बधांतडीह।। रधु: रामपुर डीटा रवि गोपाल=तरौनी।। हरिशर्मापत्य,= महुआ।। बाटनापत्यह=तरौनी, बैगनी।। रूचिशर्म्मार= जगन्ना थ, मटिराम।। शुचिनाथा यत्यर= ततैल ।। शीशधर= ब्रहमापुर नेहरा, भवनापापत्या पुरसौली।। देवादित्यारपत्य।=पुरूषौली।। ऐते पनिचोभ ग्राम:।। अथ कुजौली ग्राम:-गोपाल सन्ति त= यशोधर= बेहटा।। सुपन, नाँथू लक्ष्मी कर=मरबहरौलीं।।जीवे, जोर= मलंगिया।। मेधाकर=वनकुजौली।। रातू सिम्मुानाम कन्धिराइन।। सुरपति।। गणपति=दिगउन्धा।। दिगउन्धम।। लक्ष्मी् पति महिन्द्र बाड़।। चण्डेगवर हरि=दिगउन्दी साने-लोड़ाक, महारनी।। विष्णु।कर=परसौनी।। रूपन कनधरानि।। सोम=लोआम।। राजूसन्तहति सुधाकर= सरावय।। लक्ष्मी।कर सुत प्रजाकर अमृतकर=बजौली।

(14) ”14”

अथ गोत्र पन्जीक लिखाते।।:-शाण्डिल्येप दिघोष: सरिसन, महुआ, पर्वपल्ली‍ (पबौली) खगुबला, गंगोली, समुगाम, करियन, मोहारी, सझुआल, भंडार:।। पण्डो:ली जतजवाल, दहिमत, तिलई, माहब, सिम्मुलनाम सिहांश्रम, ससारव: (सोठारपुर) स्तरलित कड़रिया, अल्लातरि, होईया, समेत तल्हानपुर, परिसरा, परसंड, वीर नाम, उन्तहमपु कोदरिया, धतिमन, बरेबा मधवाल, गंगोरश्रय, भटौरा, बुधौरा ब्रहमपुरा कोइगार, केरहिवार, गंगुआलश्चस, धोसियाम, छतौनी, मिगुआल ननौती, तपनपुरश्वापइति शक्ति अथ वत्सम गोत्र:-पल्लील (पाली) हरिअम्बत, तिसुरी, राउढ़ टंकबाल धुसौत, जजुआल, पहद्दी जल्लरकी (जलाय) मन्दतवाल, कोइयार, केरहिवार, ननौर, उढ़ार प्रथि करमाहा बुधवाल, भड़ार लाही, सोइनि सकौना फनन्दबह, मोहरी, बढ़वाल तिसउँत वह आली पण्डोशलि, बहेरादी, बरैवा, भण्डाारिसम, बमनियाम, उचित, तमनपुरा, बिढुआ नरवाल, चित्रपल्ली , जरहटिया, रतवाल, ब्रहमपुरा सरौनी।। एते वता गोत्रा अपकार्यक गोत्र-दानशौर्य प्रतापैक्ष प्रसिद्ध यत्र पर्थिका ओडनिसा सर्वत: श्रेष्ठाम स्वतस्व‍ र्ध्म् प्रर्तिका ओइनि, खौआला संकराढ़ी, जगति, दरिहरा, माण्ड्र बलियास, पचाउट, कटाई, सतलखा पण्डुसआ, मानिद्व मेरन्दीट मडुआल सकल पकलिया बुधयल, पिमूया मौरि जनक मूलहरी महा काशमे छादनश्च, थरिया, दोस्तीर, मरेहा, कुसुमालंच, नरवाल, नगुरदहश्रय ।। एते काश्यलय शोत्रा।।

(15)

अथ पराशरं गोत्र:-नरउन सुरगन सकुरी सुइरी पिहवाल, नदाम महेशरि सकरहोन सोइनि तिलै करेवा का का पिभाएते पत्रशर गोत्रा अथ कात्या यन गोत्र: कुर्जीली, ननोत, जल्लसकी, व्रतिगामध्यत।। एते कात्यावयन गोत्रा:।। अध सावर्ण गोत्र: सोन्द्पुर पनिचोभ करेवा नन्दोतर मेरन्दीत।। अय अलाम्बु्काक्ष गोत्र:वस्मामम्प्रसलाम्बुवकाक्ष कटज्ञई ब्रहमपुरा आदि। ।।अथ कौशि गोत्रे-निखति अथ कृष्णासत्रय गोत्र लोहना बुसवन सान्द्रन पोदोनी च ।। अथ गौतम गोत्र:-ब्रहमपुरा उचितमपुर कोइयां चादि गौतमो।। अथ भादद्वाज गोत्र: एक हरा बेलउल (विस्वदपंचक) देयामश्रयापि कलिगाम मूतहरी गोढ़ार गोधोलिन्दा एते भारद्वाज गोया अथ मोडल्यह गोत्र: कौशिल्ये- पुनश्चण को थुआ विष्णुनव़द्धि वाल ।। एते वशिष्ठ गोत्रा:। अद कौण्ड़ल्यन गोत्र:-एक द्रयर्यूपश ल्युर पाउन रूपी गोत्राजन्य‍ एते कौण्डिल्यो गोत्र।। अथ परसातंडी गोत्रे=कटाई।।

16 ”ऐ”

17

विशाद कुसुम तुष्टाव पुण्ड री कोप विष्टार धवल वसन वेषा मालती वद्ध केशा।। राशिघर कर वर्णा शुभ्रजा तुड़ वस्त्रु जयति जीत समस्ताक भाखी वेणु हस्ता्।। सरस्वपती महामायै विद्याकमल लोचिनी। विश्व रूप विशालाक्षि विधान्दे्रि परमेश्व री।। एक दन्ति महावु‍द्धि सर्वाजोगणनाय: सर्वसिद्ध करादेवों गौरीपुत्र विमानन गंगोली सँ बीजी गंगाधर: ए सुतो वीर (110511040) नारायणों। तत्र नारायण सुत: (111811021) ए सुतो हाले शॉंई कौ।। थरिया संकान्हध दौ।। खण्ड बला गा्रमोपार्यक: साउँक: शकर्षण परनामा ए सुता भद्रेश्वार दामोदर 1105/06।। बैकुण्ठं नील कंठ श्री कंठ ध्याकनकंठा ।। तत्र 1109/010 दामोदर एकमावासी बैकुण्ठय सन्ताति पाठक वासी।। नीलकंठ संतित संसारगुरदी वासी।। श्री कंठ संतति गुरदी, हरड़ी सरपरब, और वासिन्यल:।। श्री कंठ सुता ध्या नकंठा।। तत्र 1109/01 दामोदर एकमावासी बैकुण्ठ सन्ति।त पाठक वासी नीलकंठ संतति संसार गुरदी वासी।। श्री कंठ संतति गुरदी, हरड़ी सरपरक और वासिन्यं:।। श्रीकंठ सुता श्या‍मकंठ हरिकंठ नित्याीन्दि गंगेश्वसर देवानन्दि हरदत्त हरिकेशा: तत्रादयो पन्चाज्ये्ष्‍ठ सकराढ़ी में डालू सुत दौपतौनाखामासॅ गणपित छोणा। अन्यों पतऔना खौआल सँ गणपरति दो।। तत्र गंगेश्वसर सुता हल्लें वर चक्रेवश्रर पक्षीवरा: सँ सुत दो सँ छो तल्लेम श्वोरों गुरदीवासी।। चक्रश्वलरों हड़री वासी।। ए सुतो पदमनाम: डीह भण्ड‍रिसम सँ शोरि दौ।। तत्र पदमनाम सुतो पुरूषोतम: गढ़ बेल उँच अभिन्नोद हौ

18

पुरूषोत्तम सुतो ज्ञानपति: मांडबेस्टद स हरिकर सुत बाटू दो।। ज्ञान पति सुतो उँमापति सुरपति एकमा बलियास सँ आडनिसुत बाढ़ दौ।। एकमा बब्यिास सँ बीजी वरणीधर। एक सुता पदमनाम श्री निधि श्री (1115/0411) नाया:।।

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भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।
ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब

.VIDEHA FOR NON RESIDENTS

.1.Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR

.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti.
Ramlochan Thakur (1949- ) Senior Poet, theatre artist ,editor and critic of Maithili language. “Itihashanta” and “Deshak nam chhal son chrai”, “Apoorva”, “Mati Panik Geet”(collection of poems), “Betal Katha”(Satire), “Maithili Lok Katha (Folk Literature), “Ankhi Munane Aankhi Kholane” (Essays).
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in
Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR
To younger brother/ its your work

While eating
May be sour in taste
These medicines
The result always good
Tell the diseased
Explain the fact
Its your work.
Sh. Krishnamohan Jha (1968- ), “Ekta Herayal Duniya”, collection of poems in Maithili, “Samay Ko Chirkar” collection of poems in Hindi. For Hindi poems “Kanhaiya Smriti Samman” in 1998 and “Hemant Smriti Kavita Samman” in 2003.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in
Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR
To both

Women see Fish
Fish sees women
I’m watching you both.
English Translation of Gajendra Thakur’s (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor’s choice award from http://www.poetry.com and her poems were featured in front page of http://www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

SahasraBarhani:The Comet
translated by Jyoti
The drama of Danveer Dadhichi was started on the scheduled date. We had reached school before the opening time. On a corner of corridor a bed sheet was hung to make the screen of the stage. The rope couldn’t be tied properly so it was decided that screen would be pulled up and down manually. After that artists started dressing up. Dressing up was very easy. They put dhoti and gamacha on and put powder on face as a make up. Additionally, some other accessories were worn too. The teacher responsible for directing the drama had suddenly remembered some urgent work and had not attended school that day. The elder boys of the village came to know that artists are students of primary school so they started teasing them by passing comments. I warned the artists that they would destroy our drama but younger brother resisted that he would manage even if he was in drama dress he would not mind fighting when it was needed. He shouted that he would take the drama dress off and start reacting if people would keep on doing so but that threatening couldn’t stop the excited boys. Then younger brother had declared that the drama would not be played any more on that day. To teach the lesson to the disturbing elements he ran towards them with a stick. And very soon the environment was filled with the noise of fighting and defending voices. By drama that was to be played by us and was to be directed by me came to an end without completion. I was crossed with the younger brother for a while and he used to say that he just lost my temper but he also insisted that it was not his fault but the environment made by those naughty boys made him to do so. Time passed and my anger was cooled down too. I too lost the enthusiasm of doing Ramleela and other drama.
I never read any subject repeatedly except Maths and Science. Nor did my teacher suggest me to do so. If any student was caught reading History and other subjects twice or thrice then he was given the name of that subject. Whenever such students were seen reading Maths then they had to listen to the comment passed by the teachers that Math was not History so he shouldn’t try it to learn by heart. During rainy days making umbrella from the mat and murmuring countdown while running towards home; in holidays while playing Kabaddi if Master Saheb was seen passing by on cycle then greeting him by continuing game- Kabaddi kabaddi master sahib pranaam kabaddi kabaddi etc. are memories to be treasured. And in one of such incidents I was caught by the opposition team as I breathed in order to greet Master Sahib which was against the rule. That Mater Sahib of Koilakh was so happy that he talked about that incident in the school.
(continued)

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३- part ii

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विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३- part ii

ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति

उपसंहार :
कलकत्ता शैक्षणिक यात्रा, १९९० – ९१:
टिस्को स्कूल सऽ जे एजूकेश्नल टूर अर्थात्‌ शैक्षणिक यात्राक व्यवहार छल से किताबी ज्ञानके वास्तविक रूपसऽ सिखाबऽमे सहायक तऽ छल। संगे अहि सऽ अपन चरित्रनिर्माण मे सेहो सहायता होइत छल।सब संगे मिलिकऽ रहैमे बहुत किछु सिखैके सेहो अवसर भेटै छल।उदाहरणार्थ किछु विद्यार्थी एहेनो छलैथ जे अपने मे मस्त रहैत छलैथ। हुनका सबके विद्यालय सऽ घरक रस्ता के अतिरिक्त आर किछु बाहरी दुनियाक खबरि नहि रहैत छलैन।एहेन लोकसब जखन ऑल राउण्डर विद्यार्थी सबसऽ भेंट करैत छथि तऽ हुनका सबके आन कार्यमे र रुचि बढ़ै छैन।किछु विद्यार्थी सबके अपन अभिभावक पर आश्रित रहैके अतिशय अभ्यास होएत छैन । एहेन बच्चासबमे आत्मनिर्भता आबैत छै।अपन कैरियर आदिक चयन स्वयम्‌ करैके क्षमता आबैत छै।तथा आकस्मिक आब वला विषम परिस्थिति सऽ भीड़क आत्मविश्वास आबै छै।
ई तऽ भेल शैक्षणिक यात्राक विशेषता। आब हम अपन अनुभव कहै छी।हमरा अहिबेरका टूर वास्तव मे शैक्षणिक यात्रा लागल। इण्डियन म्यूज़ियम सऽ इतिहासमे, बॉटेनिकल गार्डेन सऽ वनस्पति विज्ञानमे, चिड़ियाखाना सऽ जीवविज्ञानमे, बिरला म्युज़ियम सऽ तकनीकमे, तथा पलैनेटोरियम सऽ खगोलशास्त्रमे जानकारी बढ़ल।हमरा सबके भोजनमे कोनो दिक्कत नहि भेल।जॅं कोनो छात्र छात्राके स्वास्थ्य खराब होएत छलैन तऽ शिक्षक सब पूरा ध्यान राखै छलखिन।ओ सब कखनो अभिभावक सऽ दूर हुअ के अनुभूति नहिं हुअ दैत छलैथ।शिक्षक सबके जीवनमे तऽ कतेक छात्र सब आबैत छैन।लेकिन हम विद्यार्थी सब लेल ई शिक्षकसब अविस्मरणीय छैथ।हुनकर सबसऽ जे मार्गदर्शन हमरासबके भेटैत अछि से आजीवन याद रहैत अछि आऽ काज आबैत अछि।

अनाम कथा- प्रेमचन्द मिश्र
पी. सी. मिश्र गामक एकटा कम प्ढ़ल-लिखल युवक छथि, उम्र करीब २४ वर्ष। ६ साल पहिने गामसँ दिल्ली आयल छलाह। संघर्षरत जीवनसँ सफर करैत आब ठीक-ठाक अवस्थामे छलाह यानि ताहि समयमे एकटा मध्यम् वर्गक युवककेँ तनख्वाह जे हैत से तनख्वाह पावैत छलाह आ संगे गामसँ अयलाक बाद दिल्लीमे किछु नीक लोकक संपर्कमे रहलासँ अंग्रेजी फर्राटेसँ बजैत छथि यानि कि अंग्रेजी बजैत काल कियो नहि कहि सकैत छनि जे ओ पढ़ल-लिखल कम छथि। ताहि कारण लोककेँ कहैत छथिन सत्यता- जे हम पढ़ल-लिखल कम छी- तँ लोक मजाक बुझैत अछि। एकटा प्राइवेट कम्पनी, जे ट्रैवेल एजेन्टक काज करैत अछि, मे पी.सी.मिश्र रंजीतक, जे हुनकर रिश्तामे भागिन छथिन मुदा कम्पनीमे उच्च पदपर छथिन्ह, केर संग कज करैत छथि। पी.सी.मिश्र विवाह योग्य भऽ गेल छथिन, पिताजी बुढ़ापामे प्रवेश कऽ लेने छथिन। ओऽ चाहैत छथि जे जहिना पैघ भाई सभक विवाह भऽ गेल छनि, हुनको विवाह कऽ देल जाय। कारण एकटा छोट भाई सेहो छनि, रुपैय्या पाइ कमा लैत छथि आऽ अपन आब कोन भरोस। कखन छी कखन नहि छी। चुंकि जमाना बदलि गेल छैक, ताहि हेतु पी.सी.मिश्रासँ संपर्क केलन्हि जे लोक सभ बहुत परेशान करैत छथि अहाँक विवाह लेल, से की कहैत छी। हुनकर जवाब छलनि, जे पिताजी हमर किछु शर्त अछि विवाहमे। तँ पिताजी कहलखिन- ठीक छै, रातिमे भौजीसँ गप्प करायब, ठीक छै। रातिमे भोजनक बाद पी.सी.मिश्रा जी भौजीक द्वारा अपन शर्त पठेलन्हि- एक विवाहमे रुपैय्या पैसाक आदान-प्रदान नहि, यानि बिना पैसाक विवाह-आदर्श विवाह। दोसर लड़की पढ़ल-लिखल आऽ अंग्रेजी बजनाय अनिवार्य ताकि बच्चाक शिक्षा उच्च होय। तेसर द्विरागमन जल्दी होय ताकि साल भरि जे अपन संस्कार यानी विध-विधानमे कम खर्च होयत। चारिम जिनका ओहिठाम विवाह होय ओ हमर तुलनामे गरीब होय ताकि हुनका ओहिठाम सम्मान बेसी भेटत।

ई सभ शर्त सुनि हुनकर पिताजी कहलनि- हम शर्तसँ बहुत प्रसन्न छी, लेकिन सभ शर्त हमरासँ भऽ सकत मुदा दोसर शर्त हमरा विश्वास नहि अछि की गामक लोक पूरा करए देत वा नहि। ताहि हेतु कहबनि जे एहन कुनू भेट जानि तँ ओऽ हमरा कहि देत। ई बात रंजीतकेँ पता लगलनि, तँ ओहो सोचलन्हि जे कोनो सम्पर्कक आदमीसँ पी.सी.मिश्राक विवाह करल जाय तँ उत्तम। ई दू-चारि ठाम बजलाह जाहिमे “श्रीमति महारानी मिश्रा” जे रंजीतक भाभी आऽ पी.सी. मिश्राक रिश्तामे भौजी छलथिन केँ सेहो पता लगलन्हि। अपन छोट बहिन अनीता झाक ननदि छलथिन सोनी आ हुनकर उम्र १९ साल रहनि। ओऽ अपन बाबूजी श्री भरत झाकेँ कहलथिन जे ई कथा मुफ्तमे भऽ जाएत। ओऽ अपन जमाय दिलीप झाकेँ फोनसँ संपर्क केलन्हि। दिलीप झाक बाबूजी १० साल पहिने स्वर्गवासी भऽ गेल छथिन, ताहि हेतु बहिन सोनीक विवाह दिलीप झा आऽ विनय झाकेँ करबाक छनि। ई सभ बात सुनि दिलीप झा अपन पत्नी अनीताकेँ कहलथिन जे ई काज बुझू मँगनीमे भऽ जाएत। ई बात सुनिते अनीता कहलथिन जे अहाँ देरी नहि करू आऽ जयपुर जाऊ। बुझू लक्ष्मी चलि कऽ आबि गेल छथि। ई बात ओऽ विनय झाकेँ सेहो कहलन्हि आऽ सोनीक दूटा नीक फोटो लऽ जयपुर आबि गेलाह। आब महारानी रंजीतक द्वारा पी.सी.मिश्राकेँ जयपुर बजेलन्हि। होलीक बहन्ना बना कय अपन दफ्तरसँ रंजीत आऽ पी.सी.मिश्रा जयपुर गेलाह। साँझक हवाई जहाजसँ जयपुर पहुँचलाह। पहुँचलाक उपरान्त चाय-पानिक बाद महारानी पी.सी.मिश्रासँ बजलीह- बौआ विवाह कहिया करब, आब तँ लगन आबय बला छैक आऽ विवाह योग्य भय गेल छी। हम काकासँ बात करू? पी.सी.मिश्र हँसैत कहलन्हि- जे भौजी हमर किछु शर्त अछि, से जँ पूरा भय जायत तँ हम विवाह एखन कय लेब। ई गप सुनि महारानी कहलथिन बुझू बौआ जे अहाँक विवाह भऽ गेल आऽ अपन बातसँ पलटब नहि। पी.सी. एकरा एकटा मजाक बुझि ठहक्का लगा कऽ हँसऽ लगलाह। तावत लगभग रातिक ११ बाजि गेलैक। महारानी कहलथिन- चलू खाना खाऽ लिअ, रुकू हम खाना लगावैत छी। रातुक भोजनमे दू तोर भेल, एक बेर भोजनक लेल बैसलाह पी.सी.मिश्रा, रंजीत ठाकुर आऽ रामानन्द मिश्रा। भोजनक उपरान्त ओऽ तीनू गोटे पहिल तलपर गेलाह सुतक लेल। दोसर बेर फेर भोजन लागल जाहिमे भरत झा, दिलीप झा, राजू झा व नूनू झा – राजू आ नूनू झा महारानीक छोट भाई छथिन-, फेर सभ अपन-अपन बिस्तरपर सुतक लेल गेलाह। भोर भेल चायक आयोजन भेल। सातू गोटे भरत झा, दिलीप झा, रामानन्द मिश्रा, राजू झा, नूनू झा, रंजीत ठाकुर, पी.सी.मिश्रा व महारानी चायक पश्चात् गप्प करए लगलाह। महारानी बजलीह-बौआ विवाह कहिया तक करब। मजाकक स्वरमे पी.सी.मिश्रा बजलाह- देखियौक आब जल्दी करब, कारण जे बाबूजीक फोन आयल छल जे लोक सभ परेशान करैत अछि विवाहक लेल, तँ आब जल्दी भऽ जाएत। ई सुनिते भरत झा बजलाह जे कतेक पैसा लेताह। पी.सी.मिश्रा कहलथिन जे एहन कोनो बात नहि छैक। ई शब्द पूरा होइसँ पहिने बीचेमे रंजीत बजलाह- लड़की जँ नीक भेटत तँ कोनो पाई-रुपैया नहि। ई शब्द सुनिते पाछूसँ महारानीक माय बजलीह- जे कही तँ अनीताक ननदिसँ करा दियौन, लड़की तँ बड़ भव्य छथिन, सज्जन-भव्य व धार्मिक प्रकृतिक घरक, सभटा काज आ लूरि-व्यवहार जनैत छथिन्ह। ई बात पूरा भेलाक बाद महारानी बजलीह जे ओझा ओतेक पाई कतएसँ देथिन्ह। ताहिपर रंजीत बजलाह- पाइक कोनो प्रश्न नहि छैक, हुनकर किछु शर्त छन्हि ओऽ चारूटा शर्त दोहरेलन्हि। ताहिपर दिलीप झा बजलाह- हम चारू शर्तसँ परिपूर्ण छी। ई बात सुनि रामानन्द मिश्र बजलाह जे जल्दीमे काज नहि होयबाक चाही। पहिने ई शर्तपर चिन्तन कैल जाऊ। कारण जे सवाल दू टा जिनगीक अछि आ शर्तक कोनो जवाब नहि अछि। एहन सोच तँ बहुत कम लोकक होइत छनि, ताहि हेतु पुनर्विचार करू।
ई बात पूरा भेलाक बाद दिलीप झा बजलाह जे लड़कीक फोटो देख लेल जाओ आऽ हमहु पढ़ल-लिखल छी आऽ पेशासँ एकटा प्राइवेट शिक्षक छी ताहि हेतु शिक्षाक महत्व बुझैत छी। ई बात सुनिते भरत झा बजलाह- रंजीत ई (फोटो दैत) लिअ आऽ अहाँ सभ देख लिअ। हम भीम बाबू (समधि) सँ बात कऽ लैत छी। बिच्चेमे रंजीत फोटो लैत आऽ पी.सी.मिश्राक हाथ पकड़ैत पहिल तलसँ ऊपर छतपर गेलाह आऽ मजाकक तौरपर बजलाह जे देखू भाई जँ अहाँ नहि करब तँ हमही दोसर विवाह कय लेब। हमरा तँ लड़की बहुत पसन्द अछि। ई कहैत पी.सी.मिश्रकेँ हाथ फोटो पकड़ेलन्हि। फोटो बहुत आकर्षक छल। पी.सी.मिश्र कहलथिन- फोटो तँ बहुत आकर्षक अछि, हमरा किछु सन्देह भऽ रहल अछि। रंजीत उत्तर देलन्हि- भाभी झूठ नहि कहतीह। संदेहक मतलब अछि भाभीपर शक करब। ताहिपर पी.सी.मिश्रा जवाब देलन्हि- हम शकक नजरिसँ नहि देखैत छी, चलू जे छथि, ई तँ हमर शर्तमे नहि शामिल अछि। लेकिन लड़की पढ़ल-लिखल अवश्य चाही। सुन्दर-खराब कोनो बात नहि अछि ई बात करैत दुनू नीचाँ अएलाह। एतबामे महारानी पुनः चाह अनलन्हि, फेर चाहक चुश्की लैत रंजीत बजलाह- देखू सभ बात बुझू भऽ गेल। आगू बात जे बरियाती ६५-७५ तक जाएब आऽ सत्कारमे कोनो तरहक शिकायत नहि। ई बात सुनैत दिलीप झा बजलाह जे सरकार हम गरीब छी, हमरासँ संभव नहि अछि ७५ टा बरियाती, हमरा किछु छूट देल जाऊ! लेकिन सत्कारमे कोनो त्रुटि नहि होएत। ई बातक बिच्चेमे महारानी बजलीह जे लड़काकेँ एकटा अंगूठी आऽ दू भरीक सोनाक चेन (सीकरी) आऽ लड़कीक नामसँ ५१,०००/-क फिक्स डिपोजिटक कागज ओझाजी दऽ देथिन, बरियाती ५१ टाक बात फाइनल, बस आब ने बौआ। ने ई किछु बजताह आऽ ने ओझा किछु बजताह! आर खान-पीन दिन घरक प्रत्येक सदस्यकेँ नीक आऽ ५ टूक कपड़ा। बस रंजीत आब किछु नहि बाजू आऽ ओझाजी अहूँकेँ एतेक तँ करए पड़त। रंजीत किछु बजैक उत्सुकता देखबैत छलाह की बिचमे भरत झा बजलाह जे फेर विवाहसँ एक साल तक दुनू दिस लड़की वलाक काज छैक, रंजीत ताहि हेतु आब बुझू जे ई बहुत महग भऽ गेल।

(अगिला अंकमे)
१. नवेन्दु कुमार झा पटनासँ आऽ २. ज्योति लन्दनसँ
नवेन्दु कुमार झा (१९७४- ), गाम-सुवास, भाया-केवटसा बरुआरी, जिला-मुजफ्फरपुर। समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना।

शिक्षा दिवस समारोह-छात्र-छात्रा आ बाल वैज्ञानिक देखौलनि अपन प्रतिभा

देशक पहिल शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलामक १२०म जन्म दिवस बिहारमे शिक्षा दिवसक रूपमे मनाओल गेल। मौलाना आजादक जन्म दिवस मनेबाक लेल सरकारी स्तरपर कतेको कार्यक्रम सम्पन्न भेल। राजधानी पटनाक गाँधी मैदानमे दू दिवसीय शिक्षा दिवस सेहो सम्पन्न भेल। दू दिनक एहि कार्यक्रमक अन्तर्गत सरकार द्वारा शिक्षाक क्षेत्रमे कएल जाऽ रहल काज आऽ सरकारक उपलब्धि जनताक सोंझा आनल गेल। स्कूली छात्र सभक कला सांस्कृतिक कार्यक्रमक माध्यमसँ आऽ हुनक प्रतिभा एहिमे लागल विज्ञान प्रदर्शनीमे दृष्टिगोचर भेल। आकर्षक ढंगसँ बनल कतेको पैवेलियनमे विभिन्न संस्थान अपन प्रकाशन आऽ पाठ्यक्रमक जानकारी सेहो उपलब्ध करौलक।
सरकार द्वारा एहि कार्यक्रमक आयोजनक उद्देश्य पछिला तीन सालक सुशासनमे शिक्षा क्षेत्रकेँ प्राथमिकता दऽ जे सभ काज कएलक अछि ओहिसँ बिहार जनताकेँ अवगत करा प्रदेशमे शिक्षाक नव वातावरणबनाएब छल। एहि अवसरपर विविध क्षेत्रमे अपन उत्कृष्ट प्रतिभासँ देश-विदेशमे बिहारक नाम रौशन कएनिहार छात्रकेँ सम्मानित कएल गेल जाहिमे आइ.आइ.टी.क टॉपर शिति कंठ, सी.एल.टी.क पी.जी.मे प्रथम स्थान प्राप्त भावना सिंह, ए.आइ.आइ.एम.एस.मे सफल मधुकर दयाल, आइ.आइ.टी. जमशेदपुरक परीक्षामे तेसर स्थान प्राप्त प्रणव कुमार सिंह, निफ्टमे तृतीय स्थान प्राप्त रोहित कुमार, यू.पी.एस.सी. सी.पी.एफ.२००८क परीक्षामे द्वितीय उत्तम कश्यप आऽ अन्तर्राष्ट्रय ज्योतिष ओलम्पियाडमे स्वर्ण पदक विजेता शांतनु अग्रवाल “बिहार गौरव सम्मान”सँ अलंकृत भेलाह। एकर अतिरिक्त बिहार संयुक्त प्रवेश परीक्षामे एकसँ तीन रैंक प्राप्त करऽबाला छात्र, आइ.आइ.टीमे नामांकित तेरह टा छात्र आऽ माध्यमिक परीक्षामे प्रदेश आऽ जिला स्तरपर टॉपर नौ टा छात्रकेँ सेहो प्रशस्ति-पत्र आऽ टाका दऽ सम्मानित कएल गेल। एहि वर्षक माध्यमिक परीक्षाक टॉपर कुणाल प्रतापकेँ सरकार पचीस हजार टाका दऽ सम्मानित कएलक। सभकेँ शिक्षा देएबाक लेल चलाओल जाऽ रहल सर्व शिक्षा अभियानमे उत्कृष्ट काजक लेल “प्रथम मौलाना आजाद शिक्षा पुरस्कार” श्रीमती रुक्मिणी बनर्जीकेँ देल गेल। माध्यमिक आऽ इंटरमीडिएट परीक्षाक एहि वर्षक सभ संकायक टॉपरकेँ प्रशस्ति पत्र आऽ २५-२५ हजार टाका दऽ सम्मानित कएल गेल। दू दिनक एहि कार्यक्रमक क्रममे गोटेक १५० सँ बेसी आयोजित शैक्षिक गतिविधि आऽ प्रतियोगिता सभमे चयनित डेढ़ दर्जन छात्रकेँ स्मृति चिन्ह आऽ प्रशस्ति-पत्र दऽ पुरस्कृत कएल गेल। एहि मेलामे आयोजित राज्य स्तरीय विज्ञान प्रतियिगिताक विजेता नीतेश, क्वीज प्रतियोगिताक विजेता शिवानन्द गिरी आऽ अनुराधा कुमारीकेँ पुरस्कार स्वरूप लैपटाप प्रदान कएल गेल।
एहि समारोहक अवसरपर ३६म राज्य स्तरीय जवाहर लाल नेहरू बाल विज्ञान प्रदर्शनीक आयोजन सेहो कएल गेल जाहिमे बाल वैज्ञानिक सभ द्वारा बनाओल गेल गोटेक १०० मॉडलक प्रदर्शन कएल गेल। राज्य शिक्षा शोध आऽ प्रशिक्षण परिषद् द्वारा आयोजित एहि प्रदर्शनीक विषय छल “वैश्विक संपोषणीयता के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी”। विज्ञानक प्रति छात्र-छात्रा आऽ जनसामान्यमे सहज आऽ स्वाभाविक अभिरुचि उत्पन्न करैत एहि प्रदर्शनीमे बाल वैज्ञानिक सभ खूब उत्साहित छल। एहि माध्यमसँ सर्वश्रेष्ठ तीन मॉडलक बाल वैज्ञानिकक चयन पूर्वी भारत विज्ञान मेला आऽ राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी लेल कएल गेल। एहि ठाम लागल मैथिली, भोजपुरी, हिन्दी, मगही आऽ उर्दू अकादमीक स्टॉलपर लोक सभ भाषा अकादमी सभक प्रकाशन आऽ गतिविधिक जानकारीक संग किताबक खरीद सेहो कएलनि। चाणक्य लॉ युनिवर्सिटी, चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना विश्वविद्यालय, इग्नू, माइक्रोसाफ्ट, इंटेल, एडुकैम्प आदि कतेको संस्थान अपन पाठ्यक्रम आऽ गतिविधिक जनतब देलक। बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक स्टॉलपर माध्यमिक आऽ इंटरमीडिएटक कला, विज्ञान आऽ वाणिज्यिक टॉपर छात्रक उत्तरपुस्तिका सेहो पैघ संख्यामे छात्र सभ खरीदलनि।
पछिला किछु वर्षसँ प्रदेशक शिक्षा-व्यवस्था ध्वस्त भऽ गेल छल। प्रदेशमे नीतीश सरकारक सत्तारूढ़ भेलाक बाद एहिमे सुधारक आश बनल छल, जाहिमे प्रगति देखल जाऽ रहल अछि। प्रतिभासँ भरल एहि प्रदेशक छात्रकेँ शिक्षा दिवसक अवसरपर सरकारक उपलब्धि आऽ कार्यक्रमसँ एकटा किरण देखाई पड़ल अछि, मुदा ई उपलब्धि मात्र कार्यक्रमक आयोजन धरि सीमित नहि रहए एकर ईमानदारीसँ सरकारी स्तरपर प्रयास चलैत रहल तँ शिक्षाक क्षेत्रमे बिहार गौरव फेरसँ लौटि सकैत अछि।

३२म राष्ट्रीय पुस्तक मेला-पुस्तक प्रेमीमे भेल नव उत्साहक संचार

बिहार सरकार आऽ पटना जिला प्रशासनक सहयोगसँ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित ३२म राष्ट्रीय पुस्तक मेलामे उमरल पुस्तक प्रेमी सभक भीड़सँ एक बेर फेर साबित भेल जे प्रदेशक जनतामे पढ़बाक जिज्ञासा एखनो बनल अछि। ई पुस्तक मेला छात्र-युवा नेनासँ बुजुर्ग धरि सभ पुस्तक प्रेमीमे एकटा नव उत्साहक संचार कएलक। जखन कि पहिनहिसँ एकटा आन पुस्तक मेला एहि गाँधी मैदानमे चलैत छल तथापि एहि पुस्तक मेलामे जाहि तरहक भीड़ उमड़ल ओहिसँ लगैत छल जे पाठक कतेक दिनसँ किताबक भूख मेटेबाक लेल बेचैन छलाह। एहि मेलामे लागल स्टॉल सभपर पुस्तक प्रेमीक भीड़ देखि प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयीक ई टिप्पणी जे “साहित्यक पाठक आऽ रसिक एखनो बिहारमे छथि आऽ बिहार नहि होइत तँ हमरा सभमे सँ कतेकोकेँ ई पता नहि चलैत जे हमरा सभक लिखल केओ पढ़बो करैत अछि” स्पष्ट करैत अछि जे गरीब बिहार शैक्षणिक रूपसँ एखनो अमीर अछि। एहि मेलामे विविध विषयक पुस्तक प्रकाशक द्वारा तँ उपलब्ध कराओल गेल संगहि एन.बी.टी. हिन्दी, उर्दू, मैथिली आऽ आन भाषाक कतेको लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारसँ सोझां-सोझी अनौपचारिक गप-सप करा पाठक आ लेखकक बीच संवाद स्थापित करा लेखक साहित्य रचना, प्रक्रिया आऽ हुनक साहित्यिक यात्रा आऽ पाठकक मनक जिज्ञासाकेँ शान्त करौलक। ट्रस्ट अधिकारी देवशंकर नवीन जनतब देलनि जे एहि मेलामे देशक गोटेक १५० प्रकाशकक पुस्तक १७५ स्टॉलपर पुस्तक प्रेमीक लेल उपलब्ध कराओल गेल।
एहि मेलामे सभक लेल हुनक मन पसन्दक पुस्तक उपलब्ध छल। महान् विभूतिक जीवन यात्रा हो कि आत्म-कथा, नव-पुरान साहित्यकारक संग कालजयी साहित्यकारक कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, उपन्यास सभ एक संग मेलामे पुस्तक-प्रेमीकेँ अपना दिस ध्यान आकृष्ट कएलक। पाठक सेहो एहि अवसरक पूरा लाभ उठौलनि आऽ अपन रुचिकर पुस्तकक खरीददारी कएलनि। मेलामे आधा आबादीक प्रतिनिधित्व सेहो पैघ संख्यामे देखल गेल। महिला साहित्यकार आऽ लेखकक साहित्यिक कृति तँ उपलब्ध छल संगहि हुनक रुचिवाला खान-पान, सौंदर्य आदिसँ संबंधित पुस्तक लेनाई प्रकाशक नहि बिसरल छलाह। प्रतियोगी छात्र आऽ नेना सभक लेल सेहो पुस्तक पर्याप्त उपलब्ध छल। जहिना साहित्य प्रेमी एहि मेलाकेँ गंभीरतासँ लेलनि तहिना प्रकाशक सेहो साहित्यिक पुस्तकक पूरा सेटक प्रदर्शन कएलनि। मेलामे विज्ञान संकायक पुस्तकक अभाव विशेष रूपसँ छात्र सभकेँ खटकल।
मैथिली भाषीक लेल ई पुस्तक मेला पुस्तक खरीदबाक लेल नीक अवसरपर रहल। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक अकादमीक स्टॉलपर पचास प्रतिशत छूटक संग उपलब्ध रहल आऽ एकर लाभ उठबैत मैथिली प्रेमी पैघ संख्यामे पुस्तकक खरीद कएलनि। मैथिली अकादमीक सेहो नव रूप एहि मेलामे देखल गेल। एहि सभक मध्य हरियाणा पुलिस अकादमीक स्टॉल आकर्षणक केन्द्र बनल रहए जतए संवेदी पुलिस सजग समाजक नारा बुलन्द करैत अकादमीक अधिकारी पुलिस आऽ जनताक मध्य संवाद स्थापित करबाक लेल कएल जाऽ रहल अभ्यास आऽ विभिन्न कानूनक जानकारी उपलब्ध कराओल गेल।
प्रकाशक सभक लेल सेहो ई पुस्तक मेला एकटा नव अनुभव दऽ गेल। मेलामे भेल बिक्रीसँ उत्साहित प्रकाशक कहलनि जे जतेक पाठक बिहारमे छथि ओतेक आर कतहु नहि अछि। गरीबी आऽ अशिक्षाक बावजूद पुस्तकक प्रति भूख अपना आपमे एकटा मिशाल अछि। ओऽ आशा जतौलनि जे अगिला साल एहि ठाम अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेलाक आयोजन भऽ सकैत अछि।
एहि पुस्तक मेलामे बंग्ला भाषाक साहित्यकार नजरुल इस्लाम, तेलुगु कवि बरबर राव, हिन्दीक अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, गंगा प्रसाद विमल, अशोक वाजपेयी, उर्दूक हुसैनुल हक, अब्दुस्समद, मैथिलीक मोहन भारद्वाज, पं गोविन्द झाक अलावा जुबैर रिजवी, कीर्ति नारायण मिश्र, अवधेश प्रीत, कर्मेन्दु शिशिर आदि कतेको साहित्यकार पुस्तक प्रेमी सभसँ संवाद कएलनि। मेलाक समापनक अवसरपर बहुभाषी कवि गोष्ठीमे हिन्दी, मैथिली उर्दू आऽ भोजपुरीक कतेको कवि अपन कविताक पाठ कएलनि।

२. ज्योति लन्दनसँ

लन्दनक चित्रकला प्रदर्शनी
लन्दनक एक प्रसिद्ध आर्ट गैलेरीमे ईलिंग आर्ट ग्रुपक ९३म वार्षिक चित्रकला एवम्‌ हस्तकला प्रदर्शनीमे माननीय सदस्यगण सहित हमहुं अपन चित्रकला शामिल केने रही।हम तीनटा मधुबनी मिथिला चित्रकला आ एकटा महाकवि स्वर्गीय विद्यापतिजीक पेसिंल स्केच प्रदर्शित केने रही।ओतय २०० सऽ बेसी अनेको प्रकारक उत्कृष्ट नमूना उपलब्ध छल।अहिमे लगभग ३’ बाइ ५’ के विशाल आकारक कैनवास पर बनल ऑयल पेण्टिग एक्रिलिक पेण्टिग आदि मिडियासऽ बनल आकर्षक चित्र सब उपस्थित छल। किछु मात्र प्रदर्शनी लेल छलै आ बेसी विक्रय हेतु उपस्थित छलै। न्युनतम दाम £ ५० छल।
देखनाहरक भीड़ सेहो खूब छल।अंग्रेज सब सेहो मिथिला पेण्टिग लग रूकै छलैथ आ हमरा सऽ किछु जानकारी प्राप्त करैके कोशिश सेहो केलैथ। विदेशमे अहि कलाक प्रति लोकक रूचि सराहनीय अछि।
मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८.
मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता।
मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)।
प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”।
भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)।
अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल।
सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)।
मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित।
अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)।
व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)।
चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)।
वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।
मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल

भारतीय सनातन समाजमे प्रत्येक आनुष्ठानिक सत्कर्मक आरम्भ पंचदेवताक पूजनसँ होइछ। ओ पंचदेव छथि- दुर्गा (शक्ति), शिव, विष्णु, सूर्य एवं गणेश। पंचदेवताभ्यो नमः। परब्रह्म परमात्माक प्रत्यक्ष पूजोपासना सूर्यसँ होइछ। श्रुति, स्मृति, पुराणादि सम्मत सूर्यसँ जीव सभ उत्पन्न होइछ। हिनकेसँ यज्ञ, मेघ, अन्न ओ आत्मा अछि। अतः हे आदित्य, अहाँकेँ नमस्कार! आदित्ये प्रत्यक्ष ब्रह्म छथि, साक्षात् विष्णु छथि, प्रत्यक्ष रुद्र छथि। हिनकेसँ भूमि, जल, ज्योति, आकाश, दिक्, देवगण एवं वेद उत्पन्न होइछ। अतः आदित्य ब्रह्म छथि (वृहदारण्यकोपनिषत् ३.७९)। “आदित्य हृदय” (श्लोक ३६, ४४-५३) मे सूर्यकेँ सर्वयज्ञ स्वरूप, ऋक्, यजु एवं सामवेद, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रधारी, ओ सर्वतंत्रमय कहल गेल अछि।
“आदित्य हृदय” (श्लोक ५९-६१) मे द्वादश आदित्यक उल्लेख भेल अछि- विष्णु, शिव, ब्रह्मा, प्रजापति, महेन्द्र, काल, यम, वरुण, वायु, अग्नि, कुबेर एवं तत्वादिक स्रष्टा ओ स्वतः सिद्ध अधीश्वर। उदयकालमे ओ ब्रह्मा, मध्याह्नमे महेश एवं अस्तवेलामे विष्णु स्वरूप सूर्य त्रिमूर्ति छथि। जेना शिवस्वरूप त्रिमूर्तिमे सदाशिवक संगे सौम्य ओ रौद्र रूप (भैरव) उत्कीर्ण होइत छथि। शिवलिंग ओ विष्णुलिंग जकाँ सूर्यक पूजोपासना ब्रह्म लिंगक रूपमे कयल जाइछ। सूर्यकेँ गगनलिंग सेहो कहल जाइत छनि। सूर्यमण्डलमे गायत्रीक ध्यानक विधान अछि।
विष्णु सेहो एकटा आदित्य छथि- भगवत आदितश्च। सूर्यक लाक्षण (चक्र) विष्णुक सुदर्शन चक्र बनि गेल। प्राचीन सिक्का (वृष्णि ओ गणराज्यक) पर अंकित चक्रक अभिप्राय सूर्यसँ अछि। प्रायः देवी-देवताक प्राथमिक लक्षण प्रतीक रूपेँ अभिव्यंजित भेल। कालान्तरमे बोधगम्यताक दृष्टिसँ हुनक स्वरूपक विधान कयल गेल। तदनुसार सूर्य सप्ताश्वक रथपर ठाढ़ छथि। आगाँमे सारथि अरुण बैसल छथि। माथपर उन्नत किरीट (मुकुट) शोभित छनि। दुनू हाथमे कमल पुष्प अछि। डाँरमे तरुआरि लटकल छनि। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्युषा उत्कीर्ण छथि। सूर्यक देह जिरह बख्तरसँ अलंकृत अछि। कोनो कोनो मूर्तिमे पार्श्वदेवताक रूपमे कलम लेने पिंगल ओ दण्ड लेने दण्डी सेहो ठाढ़ छथि। सूर्य पैरमे नमहर बूट पहिरने छथि। ई सभ शक-ईरानी लक्षण मानल जाइछ। भारतीय सूर्य मूर्ति विज्ञानपर कुषाण कालमे इरानी प्रभाव बढ़ि गेल छल। बोधगयाक पाथरक बेष्टन वेदिका (रेलिंग) पर एवं कुम्हरार (पटना) क माँटिक पट्टी (मृण्फलक) पर सूर्यक सबसँ प्राचीन प्रतिमांकन भेल अछि। बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण सूर्य चारो दिशा सभक सूचक चारिटा अश्वक रथपर आरुढ़ छथि। सूर्यक दुनूकालमे उषा ओ प्रत्युषा हाथमे धनुष-वाण लेने अंधकारक बेधन करैत छथि। आलोच्य सूर्यक प्राचीनतम मूर्ति “अंधकार पर सूर्यक विजय” सूचक अछि। सूर्यक पाछाँ वृत्ताकार आभामंडल बनल अछि। एहिसँ संकेत प्राप्त होइछ जे सूर्यक पूजा शकस्थानसँ भारतमे आयल।
मुदा बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण उदीच्य वेषधारी सूर्य मूर्ति विदेशी परम्परासँ भिन्न ओ प्राचीन (शुंगकालीन) अछि। इरानी प्रभावसँ पहिने एहि ठाम सूर्य मूर्तिक भारतीय अवधारणा सुनिश्चित छल (भारतीय कला को बिहार की देन, बी.पी.सिन्हा, पटना, १९५८, पृ.८१-८३)। कुम्हरार (पटना) क सूर्य (मूर्ति) चारिटा घोड़ाक रथपर आरुढ़ छथि। माटिक गोल पट्टीपर बनल एहि सूर्यकेँ भारतीय सूर्य मूर्ति परम्परामे सर्वप्राचीन मानल जाऽ सकैछ। शाहाबाद एवं मुंगेरसँ प्राप्त सूर्य उदीच्य वेषधारी छथि। पार्श्वदेवता कलमधारी पिंगल त्रिभंग मुद्रामे ठाढ़ मनुष्यक सुकृत्य ओ कुकृत्यक लेखन कऽ रहल छथि एवं दहिन दिस विधर्मी सभकेँ दण्डित करबाक लेल हाथमे दण्ड लेने दण्डी तत्पर छथि। वाम भागमे सूर्यक पत्नी उषा ओ दहिनमे प्रत्युषा अंधकारक बेधन कऽ रहल छथि। शाहाबाद जिलासँ प्राप्त सूर्यमूर्ति संभवतः गुप्तकालीन कलाकृति थिक। गरामे एकावली (माला) शोभित छनि एवं कृपाण वाम भागमे लटकल छनि। दक्षिण बिहारमे सूर्य मन्दिर, सूर्यमूर्ति ओ सूर्योपासनाक केन्द्र उत्तर बिहारक अपेक्षा अधिक अछि।
सत्यार्थीक सर्वेक्षणक अनुसार सांस्कृतिक मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक प्राचीन ऐतिहासिक केन्द्रक रूपमे विष्णु बरुआर (मधुबनी) क द्वादश आदित्यक रूपेँ पूजित पालकालीन सूर्यमूर्ति अछि। मूल सूर्यमूर्तिक प्रभावलीमे बारहटा आदित्यक स्वरूप उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक अन्यान्य सूर्यमूर्ति जकाँ सूर्यक देहपर जिरह-बख्तरादि नहि छनि। ओ भारतीय भेषभूषा ओ आभूषणसँ विन्यस्त छथि। यद्यपि स्थलक नाम विष्णु बोधक अछि। एहि ठाम सूर्य विष्णु रूपेँ पूजित छथि।
सत्येन्द्र कुमार झाक अनुशीलन (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) क अनुसार मधुबनीक झंझारपुर-मधेपुर पट्टीक कोशी-बलानक पुरान प्रवाह क्षेत्रक सूर्य नाहर-भगवतीपुर ओ भीठ भगवानपुरक अतिरिक्त राजनगर, पस्टन एवं पटलामे प्राप्त अछि। एहि पट्टीसँ कनेक हटिकऽ एकटा सूर्यमूर्ति जगदीशपुर (मनीगाछी प्रखण्ड, दरभंगा)सँ सेहो उपलब्ध भेल अछि। एहि सूर्य पूजन पट्टीक सर्वाधिक आकर्षक ओ प्रभावशाली सूर्य मूर्ति (आकार ४८ इन्च गुणा २४ से.मी.) परसा (झंझारपुर, मधुबनी) क अछि। तेरहम सदीक बनल ई मूर्ति सूक्ष्म अलंकरणसँ भरल अछि। एहिसँ एकटा धारणा ई बनैत अछि जे सूर्य मूर्तिक पूजन एकटा सीमित क्षेत्र धरि छल। मुदा हिनक अवधारणाक खंडन देवपुरा (बेनीपट्टी प्रखण्ड, मधुबनी), रघेपुरा (असगाँव-धरमपुर), डिलाही, कोर्थ, देकुली, अरई, रतनपुर, छर्रापट्टी, कुर्सो-नदियामी, हाबीडीह (दरभंगा), भोज परौल, भीठ भगवानपुर, अकौर, अन्धराठाढ़ी, रखवारी, गाण्डीवेश्वर, झंझारपुर (मधुबनी) एवं वीरपुर, बरौनी, नौलागढ़ (बेगुसराय), सवास (मुजफ्फरपुर), कन्दाहा (सहरसा), बड़ीजान (किशनगंज) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थल सभसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्तिसँ भऽ जाइछ। लौकिक स्तरपर सूर्योपासनाक परिदृश्य गाम-गाममे पसरल छठ पर्व सर्वाधिक लोकप्रियताक उदाहरण अछि।
अजय कुमार सिन्हा (बड़ीजान का पुरातात्विक महत्व, कोशी महोत्सव २००३ ई.) किशनगंज जिला मुख्यालयसँ प्रायः पचीस कि.मी.उत्तर-पश्चिम दिशामे अवस्थित बड़ीजान दुर्गापुरक विशाल सूर्यमूर्ति (५फीट ७ इन्च गुणा २ फीट ११ इन्च) क अपन शोधपत्रमे उल्लेख कयने छथि। बड़ी जान दुर्गापुर पुरातात्विक भग्नावशेषसँ भरल अछि, जाहिमे दसम शताब्दीक भव्य मन्दिरक स्थापत्य प्रमुख अछि- सूर्यक विशाल दू खण्डित पाथरक मूर्ति, मन्दिरक अलंकृत चौखट, बहुतरास शिवलिंग, पाथरक एकटा सोहावटी (लिन्टेल) मध्य गणेश एवं दोसरक केन्द्रमे उत्कीर्ण त्रिशूल। दुर्गापुर नामक संलग्नता आदिकेँ देखैत बड़ीजान पंचदेवोपासक क्षेत्र छल। बहुतरास मन्दिर सभ भग्नावशिष्ट अछि। मूर्ति विज्ञानक दृष्टिसँ एहि ठामक सूर्य मूर्तिकेँ अजय कुमार सिन्हा एगारहम सदीक कहने छथि। एहि क्षेत्रमे शैवमतक प्रधानता छल। मुदा सीमान्त क्षेत्रमे अवस्थित भेलाक कारणे एहिठाम सूर्य मन्दिरक होएब स्वाभाविक अछि।
कोशी क्षेत्रक (सुविदेह, अंगुत्तर आदिक रूपेँ ख्यात) दोसर सूर्य मन्दिरक साक्षात कन्दाहा (सहरसा) मे कयल जाऽ सकैछ। कन्दाहाक सूर्यमन्दिर सहरसा जिला मुख्यालयसँ चौदह कि.मी. पश्चिम वनगाँव-महिषी क्षेत्रमे अवस्थित अछि। वनगाँव, महिषी एवं कन्दाहाकेँ जँ त्रिभुज बनाओल जाय तँ ओऽ सभ स्थल समकोणपर अवस्थित अछि। हवलदार त्रिपाठी सहृदय (बिहार की नदियाँ)क मतेँ एहि ठामक बुद्धक समकालीन कोणियवाहक जटिल ब्राह्मण छल।
कन्दाहाक सूर्यमन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित भगवान सूर्यक मूर्तिकेँ भवादित्य (द्वादश आदित्यक एकटा प्रकार) कहल गेल अछि। सूर्यक संग उषा एवं प्रत्युषा सेहो उत्कीर्ण छथि। मन्दिरक द्वार स्तंभ (चौखट) पर उत्कीर्ण शिलालेखक अनुसार (१४५३ ई.) वर्तमान सूर्यमन्दिरक निर्माता ओइनवार वंशीय हरसिंहदेवक पुत्र नरसिंहदेव छलाह। शिलालेखक प्रशस्तिमे नरसिंहदेवकेँ भूपतिलक, महादानी, धीरवीर आदि कहल गेल छनि। विद्यापतिक पदावलीक भणिता (सुभद्र झा द्वारा सम्पादित पदांक ४४-४५)सँ नरसिंहदेवक ऐतिहासिक अवस्थितिक सेहो पुष्टि होइछ। सूर्यमन्दिर लगक कूपजलक सेवनसँ चर्मरोग समाप्त भऽ जाइछ। सूर्योपासनासँ चर्मरोग, कुष्टादि रोगसँ मुक्तिक अनेक पौराणिक अनुश्रुति अछि। एहि तरहेँ कन्दाहाक सूर्य मन्दिर सूर्योपासनाक प्रसिद्ध केन्द्र बनल अछि।
नाहर भगवतीपुर (मधुबनी)क प्रसिद्धि जतेक महिषासुर मर्दिनी भगवतीक तेजस्विताक कारणे अछि ओतबे ख्याति पाथरक अनेक सूर्यमूर्ति (मध्यकालीन)क कारणे अछि। मूर्ति सभमे धनुष धारिणी पार्श्वदेवीक अपेक्षा पैघ पार्श्वदेवक रूपेँ पिंगल ओ दण्डी उत्कीर्ण अछि। सिरोभूषणक स्थान सिमरौनगढ़ (घोड़ासाहन, चम्पारणसँ उत्तर नेपालक तराइक सीमान्त क्षेत्र) क सूर्यमूर्ति जकाँ अलगसँ मुकुट लगयबाक स्थान खाली छोड़ल गेल अछि। नाहर भगवतीपुरक सूर्यमूर्ति कर्णाटकालीन थिक। सिमरौनगढ़सँ प्राप्त एवं काठमाण्डूक राष्ट्रिय संग्रहालयमे संरक्षित एकटा अभिलेखांकित कर्णाटकालीन सूर्यमूर्तिक सूचना तारानन्द मिश्र (प्राचीन नेपाल -२४- काठमाण्डौ, नेपाल) देने छथि।
एहि सभसँ किंचित भिन्न ओ विशिष्ट सूर्यमूर्ति सवास, गायघाट प्रखण्ड (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त अछि। सूर्यमूर्ति पाँच फीट नमहर अछि, जे ओहिठामक एकटा मन्दिरमे स्थापित एवं लक्ष्मीनारायणक नामे पूजित छथि। सूर्यक प्रतिरूप विष्णुकेँ मानल गेल अछि। सूर्य सप्ताश्वक रथपर स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। ठेहुनधारी अधोवस्त्र ओ वामकंधसँ आवक्ष बन्हैत उत्तरीय एवं वस्त्राभूषणसँ सूर्य आच्छादित छथि। कान्हपर यज्ञोपवीत एवं डाँरमे कटार छनि। कर्णाटवंशी राजा लोकनि सूर्यवंशी क्षत्रिय छलाह। अतः पंचदेवोपासक भूमि मिथिलाक अनेक कर्णाट शासित क्षेत्रसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्ति स्वाभाविके मानल जायत। कर्णाटकालीन तिरहुतक राजधानी सिमरौनगढ़ (सिमरौनगढ़ को इतिहास, मोहन प्रसाद खनाल, काठमांडौ, नेपाल, २०५६ वि.), अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थान (मधुबनी), भीठ भगवानपुर (मधुबनी) मूर्तिया (नेपाल तराइ), कुर्सो नदियामी (दरभंगा), कोर्थ (दरभंगा) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थान सभसँ प्राप्त अछि। सिमरौनगढ़क सूर्य मूर्तिक निर्माण याज्ञिक श्रीपतिक लेल हरसिंहदेवक मंत्री गणेशक आदेशपर कयल गेल छल (प्राचीन नेपाल-२४)। कर्णाटवंशी राजालोकनि पंचदेवोपासक छलाह।
मिथिलांचलक बरौनी-बेगुसराय क्षेत्रमे सूर्योपासनाक ऐतिहासिक अवशेष सभ उपलभ्य अछि। वीरपुर-वरियारपुर ओ कैथसँ सूर्यक अलावा हुनक पुत्र रेवन्तक पाथरक प्राचीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि। बरौनी ओ चकबेदौलियाक सूर्य मन्दिर दर्शनीय अछि। एहि भूभागक किछु सूर्यमूर्ति जी.डी.कॉलेज, बेगुसरायक संग्रहालयमे संरक्षित अछि। डॉ. सत्यनारायण ठाकुर ( मिथिला में मंदिरों का प्रादुर्भाव एवं स्वरूप, मिथिला की लोकसंस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई.) मिथिलांचलक अकौर, झंझारपुर, राजनगर ओ कंदर्पीघाटक सूर्य मन्दिर सभक उल्लेख कयने छथि। मुदा सत्येन्द्र कुमार झाक अनुसार नाहर भगवतीपुर सूर्योपासनाक पैघ केन्द्र छल जाहि ठाम चारिटा महत्वपूर्ण सूर्य मूर्ति उपलभ्य ओ पूजित अछि।
उपर्युक्त सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे सांस्कृतिक मिथिलांचलक पूर्वी छोड़ बड़ीजान दुर्गापुर (किशनगंज)सँ पश्चिममे अकौर (मधुबनी), उत्तरमे सिमरौनागढ़ (मिथिला नेपाल सीमान्त) एवं दक्षिणमे बरौनी-बेगुसराय धरि सूर्यमन्दिर ओ सूर्योपासनाक क्षेत्र विस्तृत छल। ओकरा राजकीय संरक्षण एवं लोकाश्रय प्राप्त छल। आर्य सूर्यप्रतिबद्ध लोक छलाह। मिथिलांचलक दक्षिणी सीमान्तक गंगातटवर्ती क्षेत्र (जढुआ, हाजीपुर, वैशाली)क सूर्योपासना यदुवंशी लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदाय अवशिष्ट अछि। एहि जनपदक ज्योति एवं कारिख पंजियार सन लोकदेवता सूर्योपासक छलाह। हुनक स्वरूप वेदनिष्ठ ब्राह्मणक अछि। हुनक पैरमे खराम, अधोवस्त्रमे धोती, कान्हपर जनेउ, माथपर तिलक, हाथमे पोथी-पतरा एवं सोनाक चाभुक (किरणक प्रतीक) शोभित छनि-
पैर खरमुआ हो दिनानाथ, हाथ सटकुन।
देह जनेउआ हो दिनानाथ, तिलक लिलार॥– मैथिली प्रकाश, (शोध विशेषांक, मैथिली लोकसाहित्यक भूमिका, प्रो. मौन, कलकत्ता, जनवरी-फरवरी १९७६)।
मैथिली लोकसाहित्यक संदर्भमे सूर्य पूर्वदिशाक अधिपति छथि।
बिहारक धरतीपर सूर्यक प्राचीनतम स्वरूप कुम्हरार (पटना) सँ प्राप्य अछि जाहिमे सूर्य एकचक्रीय अश्वरथपर सवार (ई.पू. पहिल सदी) छथि। एकर विकास बोधगया रेलिंग (शुंगकालीन) पर उत्कीर्ण चारि घोड़ावाला रथपर आरुढ़ सूर्य मूर्तिमे भेल अछि, जाहिमे पार्श्वदेवी उषा ओ प्रत्युषा सेहो अभिशिल्पित छथि। कुषाणकालक सूर्य मूर्तिक विशिष्ट पहचान पैरमे इरानी बूट, देहमे जिरह-बख्तर ओ माथपर किरीट बनि गेल। एहिमे सूर्य सप्त अश्व रथी छथि। मुदा गुप्तकालमे सूर्यक स्वरूप क्रमशः भारतीय वस्त्राभूषणमे बदलैत गेल। मिथिलांचलक पाल, कर्णाट ओ ओइनवार कालीन शासनकालमे समानरूपेँ सूर्यमूर्ति ओ मन्दिरक निर्माण होइत रहल। सूर्य मूलतः अश्वारोही देव छथि, जनिक प्रभुत्वसूचक रथक चारिटा अश्व दिक् दिगन्त बोधक अछि त सप्ताश्व सप्तलोकक विस्तारकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। एतबे नहि सप्ताश्व सप्तरंगी किरणक द्योतक सेहो बनि गेल अछि। सूर्य आर्य लोकनिक वैद्इक देवता छथि। अतः मिथिलांचलमे निर्मित सूर्यमूर्ति भारतीय परम्परा (वस्त्राभूषण) मे अछि। ओ वैष्णव धर्मी तिलक मण्डित छथि, अर्थात् आदित्य ब्रह्म ओ वेदज्ञ ब्राह्मणक प्रतीक बनि गेल छथि। हुनक हाथक कमल सृष्टि मूलक थिक। कमल फूल सूर्योदयक संग प्रस्फुटित होइत अछि एवं सूर्यास्तक संग सम्पुटित होइत अछि। दुनू हाथक कमल सूर्योदय एवं सूर्यास्तक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे नवोदित सूर्य ओ अस्ताचलगामी सूर्यदेवकेँ अर्घ्य देल जयबाक परम्परा अछि। एवं प्रकारें मध्यकालीन मिथिलामे सूर्य पूजन एकटा प्रबल धार्मिक प्रवृत्ति छल। कमल सभ देवी देवताक आसन बनल अछि।
भारतीय मूर्तिकला परम्परामे सूर्य अपन शक्तिद्वय उषा एवं प्रत्युषा, पार्श्वदेवता पिंगल एवं दण्डीक अतिरिक्त सूर्यपुत्र रेवंतक एकटा मूर्ति पचम्बा (बेगुसराय) एवं देवपुरा (मधुबनी) सँ प्राप्त भेल अछि। मिथिलांचलमे सूर्य मूर्तिक निर्माणक्रममे शास्त्रीयतासँ किंचित् भिन्न अभिनव प्रयोग सेहो देखना जाइछ, जकरा जनपदीय आस्थाक अभिव्यक्ति कहल जाऽ सकैछ। उदाहरणार्थ विष्णु बरुआरक द्वादश आदित्य (सूर्य)क मूर्तिक पाछाँ अग्नि शिखा सभक प्रत्यंकनकेँ देखल जाऽ सकैछ। सूर्य अग्निक प्रत्यक्ष प्रतिरूप छथि।
सूर्यक गणना नवग्रहमे होइत अछि। दिकपालमे ओ पूर्वक दिग्पति छथि। भारतीय मूर्तिकलामे नवग्रहक अवधारणा गुप्तकालीन परिवेशमे मूर्त भेल मुदा मिथिलांचलक धरतीपर हुनक पूजन परम्पराक पुरातात्विक अवशेष पाल ओ सेनकालमे विशेष देखना जाइछ। मध्यकालीन शिवमन्दिरमे प्रायः नवग्रहक मूर्ति अवशेष प्राप्त होइछ। वीरपुर (बेगुसराय) एवं चेचर (वैशाली)सँ नवग्रहक पालकालीन प्रस्तर पैनेल प्राप्त भेल अछि जाहिमे सूर्य प्रथम अनुक्रममे छथि। हुनक दुनू हाथमे कमल पुष्प शोभित छनि। मुदा लखीसरायक अष्टग्रह पैनेलमे सूर्य कमलासनपर प्रतिष्ठित छथि। बिहारशरीफ, नालन्दाक नवग्रह पैनेलमे सूर्य दण्ड ओ पिंगलक संगे उत्कीर्ण छथि। अंतीचक (विक्रमशिला, भागलपुर)क नवग्रह पैनल सबसँ पैघ (११८*६२ से.मी.) अछि। नवग्रह क्रम एवं प्रकारेँ निर्मित होइछ- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु एवं केतु। कोनो कोनो पैनेलक आरम्भ उलटाक्रम (केतु, राहु…)सँ होइछ। मिथिला लोकचित्रकलामे नवग्रहक प्रतीकांकन हरिशयन एकादशीक अरिपनमे देखना जाइछ। मांगलिक अनुष्ठानमे नवग्रहक पूजन आवश्यक मानल जाइछ।
शिवलिंगमे सूर्य: कन्दाहा (सहरसा)क चतुर्मुखी शिवलिंग सूर्य प्रमुख छथि एवं अन्यान्यमे ब्रह्मा, विष्णु ओ शिव छथि। तहिना रानीघाट (पटना)क दुधेश्वर मन्दिर (शिव) क पंचमुखी शिवलिंगमे ब्रह्मा, सरस्वती, सूर्य ओ गणेशक अलावा शीर्षपर नृत्यमूर्ति उत्कीर्ण (नवम-दसम सदी) अछि। अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वर शिव मन्दिरक प्रांगणमे स्थापित चतुर्मुखी शिवलिंगमे एकटा सूर्यक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ ई स्पष्ट होइछ जे प्रत्येक शिवलिंगमे देवस्थानक मुख्य मूर्तिक अनुरूप एकटा देवता प्रमुख होइछ। उदाहरणार्थ कन्दाहाक शिवलिंगमे सूर्यक, भच्छीमे ब्रह्माक (त्रिमूर्ति)क इत्यादि।
एहि तरहेँ कन्दाहा (सहरसा), बड़ी जान दुर्गापुर (किशनगंज), बरौनी (बेगुसराय), झंझारपुर, कंदर्पीघाट, अकौर, चकबेदौलिया, परसा, अन्धराठाढ़ी, राजनगर (मधुबनी) आदिक सूर्य मन्दिर एवं अन्यान्य स्थल सभसँ प्राप्त प्राचीन सूर्यमूर्ति सभक उपलब्धता मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक महत्ताकेँ रेखांकित करैत अछि।
आर्य लोकनिक अभिजात्य संस्कृतिक समानान्तर लोकक अपन सम्प्रदाय अछि, अपन देवी-देवता, पूजोपासना पद्धति, पावनि-तिहार आदि छैक। आभीर लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदायक सूर्योपासक लोकदेवता ज्योति ओ कारिख, उषा-प्रत्युषाक समानान्तर गहिल षष्ठी आदिक पूजोपासना प्रकारान्तरसँ सूर्योपासना थिक। सौर संस्कृतिक केन्द्रीय देवता सूर्य छथि। आर्यलोकनिक सूर्य प्रतिबद्धताक उदाहरण अछि सूर्यक वाहन सप्ताश्व रथ। आर्य अश्वप्रिय छलाह आर अश्व हिनक संस्कृतिक संवाहक देवी-देवताक वाहन बनल अछि। छठि व्रतक परम्परा पुराणयुगसँ पहिनेक थिक। सुकन्या एहि कठिन व्रत साधनासँ अपन पति च्यवन ऋषिक नेत्रक ज्योति घुरौने छलीह। षष्ठी वा छठी मइया लोकजीवनक आंचरमे संतति, आरोग्य व सुख-समृद्धि देइत छथि।
सूर्यक सम्बन्ध ऋतुचक्रसँ अछि। बारह मास (द्वादश आदित्य), छह टा ऋतु (षष्ठी माता) एवं सात दिन (सप्ताश्व रथ) सभटा सूर्यसँ सम्बद्ध। हिनक गति प्रक्रिया अयन (गति क्रिया) मे विभाजित अछि- उत्तरायण एवं दक्षिणायन। सूर्यक दुनू अयनमे अर्थात् कार्तिक एवं चैत्रमे छठि मइयाक पूजोपासना कयल जाइछ। अश्वारोही सूर्यकेँ जलाशयक तटपर हस्तिकलश, चौमुख दीप, मौसमी फल-फूल, मेवा-मिष्टान्न आदिसँ अर्घ्य देल जाइछ (लोकायत और लोकदेवता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, मुजफ्फरपुर, १९८६ ई.)। हिनक पूजोपासनाक लेल लोक श्रद्धावनत भऽ ठाढ़ रहैत अछि- ब्राह्मण बेटी जनेऊ, अहीर बेटी गायक दूध, कुम्हार बेटी हस्तिकलश आदि, तेली बेटी तेल, माली बेटी फूल-पात आदि लऽ कऽ उदयाचल दिस सूर्योन्मुख भऽ अर्घ्य देइत छनि। जापानकेँ सूर्योदयक देश ओ अरुणाचलकेँ उदयाचलक प्रदेश कहल जाइत अछि। मिथिलांचलमे उगैत एवं डुबैत (अस्ताचलगामी) सूर्यकेँ लोकपूजन परम्परित अछि। सूर्यक छठी व्रतानुष्ठान बहुत कठिन मानल जाइछ। एहि ठामक स्त्रीगण सूर्यक अर्घ्यक केराक रक्षाक लेल ब्रह्मास्त्र धरि उठयबाक लेल कृतसंकल्पित रहैत अछि- “मारवउ रे सुगवा धनुष से, ई घउर, रौना माइ के जाए”। छठी माइकेँ मिथिलांचलमे रौना माइ सेहो कहल जाइछ। षष्ठी लोकायत संस्कृतिक देन थिक मुदा सूर्य वैदिक संस्कृतिक। अतः रौनामाइ सूर्यक सतरंगी अश्वरथपर सवार भऽ कऽ मिथिलांचलक धरतीपर अबैत छथि एवं लोकजीवनक दुख-दारिद्र्यक हरण कऽ अपन “लोक”मे घुरि जाइत छथि। एवं प्रकारेँ सूर्योपासना सम्पूर्ण लोकजीवनकेँ श्रद्धाभिभूत कयने अछि। वैदिक एवं लोकायत संस्कृतिक समाहार एहि ठाम प्रत्यक्ष देखना जाइछ।
३.पद्य
३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा
३.२. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर
३.३.-एक युद्ध देशक भीतर-ज्योति
३.४. १.भालचन्द्र झा 2.विनीत उत्पल
३.५. 1. पंकज पराशर 2.अंकुर
३.६. कुमार मनोज कश्यप
३.७. रूपेश झा “त्योंथ”
1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा
श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)।

अनुजक नाम/ काज अहींक थिक

खएबामे जत्ते
किएक ने होउक तीत
औषध
फल होइते छैक नीक
रोगी कें
बुझा देब ई बात
काज अहींक थिक
कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन।
दुनूकेँ

माछकेँ देखैत अछि स्त्री
स्त्री केँ देखैत अछि माछ

अहाँ दुनू केँ देखि रहल छी
बुद्ध चरित

बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर

माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक,
ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक,
भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ,
मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आस्वस्त दुनू गोटे पाबि कए।
महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म,
चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त,
वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक,
बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत,
राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक।
बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर,
देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर,
बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल,
उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब।
वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक,
भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि।
दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार,
फेर ढ़ेर रास होम जाप,
करि गायक दान सिघ स्वर्णसँ छारि,
घुरि नगर प्रवेश कएल माया,

हाथी-दाँतक महफा चढ़ि।
धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य,
अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग,
सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ।
मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता,
मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा।
उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर,
अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक,
शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक।
सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह,
समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म।
उत्सवक संग बितैत रहल दिन किछु दिन,
सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक,
सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक,
सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक,
क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बट ने घाट।
एक युद्ध देशक भीतर- ज्योति
एक युद्ध देशक भीतर
अन्तर की
लड़ैवला सैनिक संग सामान्य जन
सीमाक जनजीवनक बदले
अहिमे उच्चवर्ग भुक्तमभोगी
उपाय की
कनिक त्याचग आ संयम सऽ
प्रमाणकेँ जगजाहिर कऽ
समस्याक समूल नाश करी
अन्यथा
सदैव आशंकित रही
एक एहेन शत्रु सऽ
जे निरन्तर पीठ पर
छुरी चलाबैत रहल
सीधे सामनाक जकरामे
ताकत नहिं
चिन्हो कऽ जकरा दोषी
कहक हमरा सबके अधिकार नहिं
जान लुटाबैत सेना
मान लुटाबैत राजनेता
प्रजातंत्रक शानमे
अधीर होएत जनता
एहेन भयावह समयमे
बनल रहै देशमे शान्ति आ एकता
शब्द सऽ अति दरिद्र
कोना सान्त्वदना दिअ
शहीद आ’ निर्दोष मृतकक परिवारकेँ
बस इर्श्वरक असीम कृपा होए
सैह अछि प्रार्थना
आवश्यक अछि
सुरक्षाकेँ आर दृढ़ करी
हर नागरिक केँ तैयार करी
अहिंसक दानवक दमन लेल
कानूनकेँ कठोर करी
सीमाक नियम ठोस करी
नरसंहारकेँ रोकैलेल
१. भालचन्द्र झा २.विनीत उत्पल
ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो),

टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)।

लेखन-

बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)।

थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन।

श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि।
दू गो कविता

१.अपन अस्तीत्वक असली मोल

बुझबाक हुअए
यदि अपन अस्तीत्वक असली मोल
त पुछियौक सुकरातकें
देखबियौक ओकरा
विश्वक नक्शा पर
पहिने अपन “देसक” अस्तीत्व
ओहि देस मे अपन “राज्यक” अस्तीत्व
राज्य मे अपन “जिलाक” अस्तीत्व
जिला मे अपन “गामक” अस्तीत्व
गाम मे अपन “घरक” अस्तीत्व
आ तहन घर महुक “अपन” अस्तीत्व
आ ई सभ
“विश्वक नक्शा” पर
से बूझि लियौक…

२. हमर माय

गर्भगृहक सुखासन सँ बहरेलहुँ
त हमर जन्मदात्री अपसियाँत रहय
भनसिया घर मे
तीतल जारैन कें धूआँ मे
करैत रहय धधराक आवाहन
देहक धौंकनी कऽकऽ
आ तहिया सँ लऽ कऽ आइ धरि
ओकरा आन कोनो ठाम नहिं देखलियैक
देखलियैक
त बस कोनटा घरक ऐंठार पर
सभक ऐंठ पखारैत
कखनो अँगना बहारैत
त कखनो जारैन बीछैत
कखनो कपड़ा पसारैत
त कखनो नेन्नासभक परिचर्या करैत
खिन मे जाँत पर, त खिन मे ढेकी पर,
चार पर, चिनमार पर
अँगनाक मरबा पर, घरक असोरा पर
दिन-दुपहर, तीनू पहर जोतल
कखनो दाईक चाइन पर तेल रगड़ैत
त कखनो छौंरी सभक जुट्टी गूहैत
राति मे पहिने दाईकें
आ तहन बाबूकें पएर दबबैत
एहि तरहें ओकर जीवनक आध्यात्म
भनसिया घर सँ शुरू भऽ कऽ
भनसिये घर मे समाप्त भऽ गेलैक
झुलसैत देखलियैक चूल्हिक आगि मे
नारीक स्वतंत्रता, ओकर अस्मिता
ओकर मान आ स्वाभिमानकें
कहाँ भेटलैक पलखतियो ओकरा
एहि सभ दिसि ताकहो कें
आइ सोचै छी सेहो नीके भेलैक
अगिलुका पीढ़ी सचेत भऽ गेलैक
भलमनसियत सँ जँ नहिं भेटलैक
त छिनबाक ताकति भेटि गेलैक
मुदा ताँहिं की हमर मायक त्याग आ बलिदान
ईब्सेन कें नोरा सँ अथवा गोर्कीक माय सँ
रत्तियो भरि कम कहाओत?
हमरा जनितबे रत्ती भरि बेसिये बूझू

३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक।
सपना अधूरे रहि गेल

आकाश मंडल साफ़
सूर्यक तापमान मध्यम-मध्यम
लोक नीक कए एक अलगे
रोमांसक भाव आबैत रहैत

ओहि दिन जखन
हम आउर अहां
एक-दोसर कए
आगोश मे सिमैट गेलिह

सूर्यक ताप कम भए गेल
वायुक वेग उद्वीग्न भए गेल
एक-दोसर कए निहारैत, निखारैत
दूई सांस एक भए गेल

एक दोसर मे
पूर्णरुपेण समाबईक लेल
रोआं-रोआं
पुलकित छल

मुदा,
जना सूर्य आ चांद,
आसमान आ धरती
एक नहि होइत

तहिना हमर सपना
अधूरे रहि गेल
और सभ लोग
चिर निद्रा मे आलीन भए गेल.

सामाजिक प्राणी
पहिलुख बेर
अहां सं भेल जखन भेंट
नहि अहां मे किछु
एहन गुण भेटलाह
जकरा याद करतियैथ

मुदा,
धीरे-धीरे सबंध
प्रगाढ़ भेल
नहि रहलों
हम आउर अहां अनजान

कनि-कनि कए
एक दोसरा कए चिनलहुं
सुख-दुख मे संग
काज-बेकाजक गप
सेहो शेयर भेल

दिन होइत
या राति
जखन मोन परत
तखने फ़ोन सं गप
भए जाइत छैक

जीवनक यात्रा कखन तक साथ चलत
कियो नहि जानैत छैक
मुदा, एक टा गप मानैये परत
जे मोन कए कोनो कोन
एक-दोसरक बिना खाली छैक

अरस्तु कहलक रहैक
“मनुख एक टा सामाजिक प्राणी छैक”
तहि सं सामाजिकताक ख्याल करि
हम दूर-दूर छी
नहि तए कहिया एक भेल गेल रहतियै.

जीवनक पथिक
हम जीवनक पथिक छी
जहिना रेलगाड़ी चलैत काल
अपन पाछं प्लेटफ़ार्म कए
छोड़ित चलैत छैक
तहिना जीवन मे पड़ाव आबैत रहैत छैक

अहां हमरा लेल
जीवनक कोनो पड़ाव पर
नीक करलहुं या अदलाह
हम अहांक लेल
अदलाह करलहुं या नीक

जखन हम वा अहां
एक बेर शांत दिमाग
आ शांत दिल सं सोचबै
या सोचब जखन
विकट परिस्थिति कए सामना करै परत

तखन जे दोषी होइत
ऊ अपन चेहरा आइना मे
नहि देखि सकत
अपना कए कहियो
माफ़ नहि कए सकत

मुदा, हे पथिक
ओहि काल हुनकर हाथ मे
किछु नहि रहत
नहि ओहि ठाम
नहि हाथ मे समय.
1.डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
खयाल
श्मशानमे फुलायल फूलक गंध मिज्झर होइत
रातरानी फूलक गंधमे पसरैत अछि दहो-दिस
तीव्रगंधी चिरायंध गंध जकां

भैरवी केर तान जकां तबला मिलबैत काल क्यो हमरा
हाक दऽ रहल अछि कइक युगसँ ओलतीमे ठाढ़ घोघ तानसँ

उतप्त श्वास केर परागकण सन्हियाइत अछि
मोनक कोनमे उठैत बोल खसैत अछि स्मृतिक तीव्र धारमे
आ भसियाइत चलि जाइत अछि हमर अधजरु लहास
सरगम केर तान जकां कपरजरू केर विशेषण सुनैत-सुनैत

अहाँक एहि यमन-कालमे
हम नहि क सकलहुँ नीक जकां संगत से ठीके भेल बहुत असंगत
कहरवा बजबैत ठोह पाड़िकेँ कनैत एहि मरुभूमिमे
मुखड़ा केर मृगतृष्णाक पाछाँ बौआइत रहि जाइत छी संतापित
संलापित कइक योजन धरि अवरोहणक प्रवाहमे।

2. अंकुर काशीनाथ झा- गाम कोइलख, जिला मधुबनी। नेपाल-1 टेलीविजनक मैथिली समाचार वाचक
पश्चाताप

असत्यक धार मे,
पापक पथ पर,
अधर्मक दिशा मे,
अविरल चलैत रहलौं ।

किछु करबाक आश मे,
आगू निकलबाक प्रयास मे,
सैदखन लड़ैत रहलौं ।

दोसरक दुख दर्द सऽ दूर,
सफलता के नशा मे चूर,
जीतबाक लेल,
की – की नहि केलौं ।

मुदा जखन हम धारक पार पहुंचल छी,
असगर थाकल छी,
शरीर सऽ हारल छी,
अंतःवेदना सऽ ग्रसित पड़ल छी,
तऽ आत्मा पूछि रहल अछि,
जे उपर संग की लऽ जैब,
हम निरूत्तर,
पश्चातापक संग नोर बहा रहल छी॥
कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

गजल

आदमी छल – छद्मक मोहरा बनल ।
आब गामो पर शहरक पहरा पड़ल ।

मनुक्खे रहल, मनुक्ख्ता लुटि गेलई।
लट पांचाली के फेर सँ खुजले रहल ।

रंग अपनहुँ के आब जर्द सन भऽ गेलई।
जिनगीक महल आई खंडहर सन ढ़हल।

आब ककरा सँ कहतई मोनक व्यथा।
कान मालिको के तऽ छई पाथरे बनल।

अपनो पर कोना आब कोई भरोसा करय।
सांस-सांसो मे माहुर आछ भरल पड़ल।

बाटक धूरा जकाँ उड़िते रहि गेलहुँ।
आँखि कानल मुदा मोन नहिये भरल।

रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ’,ग्राम+पत्रालय-त्योंथा,भाया-खिरहर, थाना-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी,सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक स्तर मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सेहो सक्रिय, दर्जन भरि रचना पत्र-पत्रकादि मे प्रकाशित।
बूथ कैप्चरिग

कोन पाप लागल से ने जानि
घुरि अयलहुँ मोनक बात मानि
नोकरी सँ ने भेटैत अवकाश
ने करितहुँ हम ई गाम वास
अयलहुँ तऽ लागय सभटा नीक
अछि ने मुदा किछुओ ठीक
आब गामक हवा अछि बिगड़ल
अछि स्वार्त जल सँ सभ भीजल
तथापि रहैत छलहुँ हर्षित
भेल समाजक हेतु समर्पित
मुदा आयल बइमनमा चुनाव
बढ़ल लोक सभक आब भाव
ग्रामीण सभ मिलि कयलक बैसार
भेल ओ जे छल ने आसार
सभ क्यो कयलक आग्रह प्रगाढ़
जे होऊ अहाँ एहि बेर ठाढ़
सोचल दी कोना लोकक बात काटि
सेवाक अवसर देलक आइ माटि
बनि एहि पंचायतक हम मुखिया
रहय देबै ने ककरो दुखिया
सोचि बनल मुखियाक प्रतिनिधि
कल जोड़ि पोस्टर छपओलहुँ सविधि
प्रचार मे जुटलहुँ दिन-राति
विरुद्ध मे ठाढ़ भेल कतेको पछाति
भेल शुरू मारामारी-गड़ागड़ौवल
कएक ठाम भेल लठा-लठौवल
भेटल सभ केँ दू-चारि गोट नोट
खसलहि दोसरेक हक मे वोट
तइयो नहि भेटलै संतोष
छपलक बूथ मिलि सभ दोस
परिणाम सुनि भेलहुँ स्तब्ध
भऽ गेल छल हमर जमानत जब्त
घर सँ निकलैत आब होइछ लाज
किएक कयलहुँ हम एहन काज
बैसब ने मुदा निश्चित आब
हेबे करतै फेरो चुनाव
होयब ठाढ़ हम फेर जा
पोसब गुंडा आब कएकटा
उगि गेलैछ हमरो दू गोट सिंग
करब हमहुँ आब बूथ कैप्चरिग
कला आ संगीत शिक्षा
हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त।

लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत

प्राती ,गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा,सोहर,खेलउना, कुमार,परिछन ,चुमान, डहकन ,बिषहारा गीत , झूमरि ,बटगमनी,मलार चैमासा ,लगनी ,समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि । जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ बाचल अछि तकरा संग्रहित कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि । संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक संस्कार ,रीति रिवाज , पर्व त्योहार ओ )तु पर आधारित गीतक समृ( परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि । मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक प्रशंसा में वृहद्विष्णुपुराणक उक्ति अछि
धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने । विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः ।।
सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता । तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता ।।
अर्थात् हे मुनीश्वर ! ओ धन्य छथि जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम
घूमइ छथि । ई मिथिला सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसि( अछि । ते तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल ।
पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी , पिप्पलीवन , फुलहर ,गिरिजास्थान , विलावती , हरित्वेकी , कूपेश्वर ;कुशेश्वरस्थान द्ध , सिंहेश्वर , जनकपुर ,वनग्राम ,सिन्दूरेश्वर , त्रपनायनवन , विषहर , मंगला, मंगलवती विरजा , पापहारिणी , सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक मिथिला माहात्म्य में वर्णन कएल गेल अछि ।
मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि । ब्राह्मवेलाक, पराती , श्रमगीत;लगनीद्ध ,गोदना , भगवतीक आवाहन गीत ;गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध , कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि ।
ओहि लुप्तप्राय गीत सभक शब्द रचना ,धुन ,स्वर ,लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि । सब तरहें ज्ञान कें बढ्ऱाब बला , संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक अछि ओ गीत सभ । एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि । प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में -
अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन अजहु भजन चित चेत ।।
बालापन तरूणापन बीतल , केस भये सभ सेत मुगुध मन । अजहुॅ ।।
जा मुख राम नाम ने आबत , मानहु सो जन प्रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।।
हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ , परए नरक के रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।।
साहेबदास तोहि क्या लागत , राम नाम मुख लेत मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत ।।
परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि – जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल । परातीक भास आ भाव लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल । ओहि भासक पराती केहन होइत अछि ,देखल जाय -
प्राण रहत नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।।
काहि पुछओ कोई मोहि ने बताबए , कहाॅ गेल नन्द किशोर । श्याम बिनु ।।
छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन , नैन झझाइछ नोर । श्याम बिनु ।।
साध्यौ मौन कानन पशु पंछी , कतहु ने कुहुकए मोर । श्याम बिनु ।।
हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब , साहेब जीवन दि न थोर । श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।।

मधुबनी में श्री दुर्गास्थान ,कोइलख में भद्रकाली,श्री दुर्गाशक्तिपीठ , मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे
राजराजेश्वरी ,जितवारपुर मे सि(काली पीठ ,ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान , खोजपुर में तारामंदिर , सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा , विराटपुर मे चण्डिका ,बदलाघाट मे कात्यायनी , पचगछिया मे श्री कंकाली , पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या ,देवनाडीह मे वनदुर्गा , दरभंगा मे श्यामामंदिर , म्लेच्छमर्दिनी , गलमा मे तारास्थान ,पचही मे चामुण्डा , अहल्यास्थान ,ककरौल मे शीतला स्थान , पूर्णियां मे पूरनदेवी , अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर , मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी , सखरा मे सखलेश्वरी , उच्चैठ मे छिन्नमस्तिका , चम्पारन मे वैराटी देवी , चण्डी स्थान , सहोदरा स्थान सन कतेको देवी तीर्थ सॅ सम्पन्न मिथिलाक जन जन मे देवी शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि ।
मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल। संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ । कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत । यथा
1पारंपरिक
जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी ।
सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी ।।
कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे ।
घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे ।।
2 म0म0मदन उपाध्याय
जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर माले ।
परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले । ।
पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले ।
त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले ।।
शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले ।
अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले ।।
मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे ।
हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे ।।
रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे ।
श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे ।।
अतिशय हासिनि कमल विलासिनि तिमिर विनासिनि वर सारे ।
हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे ।।
जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले ।।
3 पारंपरिक
करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार ।
के मोरा नैया के मोर खेबैया के मोरा उतारत पार हे जननी ।।
अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी ।।
के मोरा माता पिता मोर के छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी ।।
अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी ।।

4 कालिकान्त
अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी ।।
अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा , नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी ।।
रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा , प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी ।।
विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी ।।
विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी ।।
5 पारंपरिक
सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा ।।
जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी , आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा ।।
केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल , हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा ।।
दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए , सुखमय जग करू दान हे मा ।।
काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ , मुक्तिक देहु वरदान हे मा ।।
6 पारंपरिक
हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे ।।
प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।।
नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे ।
अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।।
विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे ।
सबटा अहाॅ जनै छी हे माता ,हम त किछु ने जनै छी हे ।।
मात पिता हित मित कुल परिजन माया जाल बझल छी हे ।
जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे ।।
7 पारंपरिक
हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय ।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय ।।
युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।।
दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय ।।
अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी ,एहन ने जिनगी सोहाय ।।
8 महाकवि विद्यापति
आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।।
सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष ।।
बाम लेल खपर दहिन लेल काति , असुर के बधए चललि निशि राति ।।
आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।।
तुअ भल छाज देवि मुण्डहार , नूपूर शबद करए छनकार ।।
भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि ।। आदि भवानी
9 कवीश्वर चन्दा झा
तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान ।।
जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान ।।
परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान । मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब आन ।।
जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम । नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम ।।
शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे थिर पति अनुराग । तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग ।।

इ नवो गीत नौ धुन मे अछि । एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक बेवहार नहि देखल जाइछ । परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन
मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि ।
एकर अतिरिक्त गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृ( परंपरा रहल अछि । मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि । नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी
प्रगट होइत छथि । बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि । बतहू यादव सन भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाॅचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत

अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे ।
मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाॅस जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे ।।
गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा आइ मइया गहबर अबियउ हे ।
मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाॅ पड़इ छी हे ।।
जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे , भवानी माता के गोदिया हे ।
मइया जी हे तहिना खेलाबहु जग बीच जगदम्बा आब मइया गहबर अबियउ हे ।।
नामो ने जनइ छी मइया पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे ।
मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे ।।
गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे मइया अद्या जलामुखी हे ।
मइयाजी हे राखि लिअउ अरज केर लाज जगदम्बा सेवक कलजोड़इए हे।।
(अगिला अंकमे)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३

In विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३ on जनवरी 13, 2009 at 5:04 अपराह्न

विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३

‘विदेह’ १दिसम्बर २००८ ( वर्ष १ मास १२ अंक २२ ) एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.५.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
२.६. दैनिकी-ज्योति/ कथा- प्रेमचन्द्र मिश्र
२.७. रिपोर्ताज- नवेन्दु झा/ ज्योति .
२.८. मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल-मौन
३.पद्य
३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा
३.२. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर
३.३.-एक युद्ध देशक भीतर-ज्योति
३.४. १.भालचन्द्र झा 2.विनीत उत्पल
३.५. 1. पंकज पराशर 2.अंकुर
३.६. कुमार मनोज कश्यप
३.७. रूपेश झा “त्योंथ”

४. मिथिला कला-संगीत-लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत-हृदय नारायण झा
५. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
६. भाषापाक रचना लेखन- पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
७.१.Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR
७.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti
विदेह (दिनांक १ दिसम्बर २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१२ अंक:२३)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक २३, दिनांक १ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
ई अ‍ंकक समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि।
केसर श्वेत हरित त्रिवार्णिक
मध्य नील चक्र अछि शोभित
चौबीस कीलक चक्र खचित अछि
अछि हाथ हमर पताका ई,
वन्दन, भारतभूमिक पूजन,
करय छी हम, लए अरिमर्दनक हम प्रण।
अहर्निश जागि करब हम रक्षा
प्राणक बलिदान दए देब अपन
सुख पसरत दुख दूर होएत गए
छी हम देशक ई देश हमर
अपन अपन पथमे लागल सभ
करत धन्य-धान्यक पूर्ति जखन
हाथ त्रिवार्णिक चक्र खचित बिच
बढ़त कीर्तिक संग देश तखन।
करि वन्दन मातृभूमिक पूजन,
छी हम, बढ़ि अरिमर्दनक लए प्रण।
समतल पर्वत तट सगरक
गङ्गा गोदावरी कावेरी ताप्ती,
नर्मदाक पावन धार,सरस्वती,
सिन्धु यमुनाक कातक हम
छी प्रगतिक आकांक्षी
देशक निर्माणक कार्मिक अविचल,
स्वच्छ धारक कातक बासी,
कीर्ति त्रिवार्णिक हाथ लेने छी,
वन्दन करैत माँ भारतीक,
कीर्तिक अभिलाषी,
आन्धीक बिहारिक आकांक्षी।

१.एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन्
२.ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े
३.अशोक कामटे
४.इंस्पेक्टर विजय सालस्कर
५.एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह “बिष्ट”
६.इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे
७.इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले
८.सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे
९.कांस्टेबल विजय खांडेकर
१०.ए.एस.आइ.वी.अबाले
११.बाउ साब दुर्गुरे
१२.नानासाहब भोसले
१३.कांसटेबल जयवंत पाटिल
१४.कांसटेबल शेघोष पाटिल
१५.अम्बादास रामचन्द्र पवार
१६.एस.सी.चौधरी

संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ २९ नवम्बर २००८) ६६ देशक ६३० ठामसँ १,२७,०८० बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in

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मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00
राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00
पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00
स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00
अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00
जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00

पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी ।

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत

अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,

आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू।

बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ

संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,

आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें।

पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-6475212
मोबाइल नं.9868380797,
9891245023
ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in,
antika.prakashan@antika-prakashan.com
http://www.antika-prakashan.com

(विज्ञापन)

२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ’ गेल।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक “नो एंट्री: मा प्रविश” केर ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल ‘विदेह’ केर समक्ष “श्रुति प्रकाशन” केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि’(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ’(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (४): “विदेह” केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि।
मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि।
२.गद्य
२.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.५.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
२.६. दैनिकी-ज्योति/ कथा- प्रेमचन्द्र मिश्र
२.७. रिपोर्ताज- नवेन्दु झा/ ज्योति .
२.८.पाबनि-तीर्थ-मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल-मौन
कथा
१. सुभाषचन्द्र यादव
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
ओ लड़की
एक-दोसराक सोझा-सोझी बनल तीन टा होस्टल रहै, दू टा लड़काक आ एकटा लड़कीक । ओहि तीनूक बीचोबीच एक टा छोट सन मकान रहै ।ओहि मकान मे छात्र-छात्राक मनोरंजन लेल टेबुलटेनिस, चाइनीज चेकर, शतरंज सन खेलक व्यवस्था रहै । मकानक अगुअइत मे चाह, पान अफलक एक-एक टा दोकान रहै ।
होस्टल शहर सँ हटि क’ एक टा सुरम्य पहाड़ी पर बनायल गेल रहै । ओहिठामक वातावरण एकदम शांत आ अध्ययन-मनन के अनुकूल रहै । ओतय अबाध स्वतंत्रता रहै । कोनो चट्टान पर बैसि कए अहाँ घंटाक घंटा चिन्तन मे लीन रहि सकैत छलहुँ या प्रेमिका संगे रभसल सपनामे डूबल रहि सकैत छलहुँ ।
मुदा एहि आधिदैविक आ रूमानी वातावरण पर दिनकें उदासी पसरल रहैत छलै । लड़का-लड़की पढ़ै-तढ़ै लए निकलि जाइ अ होस्टल भकोभन्न आ सून पड़ि जाइ ।मुदा साँझ पड़िते ओहिमे जीव पड़ि जाय । लड़का-लड़कीक चहल-पहल आ गनगनी कोनो पाबनि-तिहार सन लगै ।हैलो, हाय आ हाउ आर यू सन कथनी हवामे उड़ैत रहै ।धनीक घरक ईलड़का-लड़की बेसी कए अंगरेजी बाजइ आ तखन एहन लगै जेना अहाँ हिन्दुस्तान मे नहि, लंदन या न्यूयार्क मे होइ ।
साँझ पड़िते होस्टलक्क बीच ओह छोटका मकानक चारूकात लड़का-लड़कीजमा हुअय लागै। किछु ठाढ़े ठाढ़ आ किछु सिमटी वला बेच पर बैसि कए गप्प करै आ बहस करै । कोनो-कोनो बेंच पर खाली प्रेमीक जोड़ा बैसल रहै ।ए ई क्रम बड़ी राति धरि चलैत रहै । एहनो होइ जे साँझ पड़िते मोटरसाइकिल आ कार सँ शहरक लड़का आबै आ अपन –अपन प्रेमिका के ल’क’कतहु निकलि जाइ आ दू-चारि घंटामे छोड़ि जाइ । क्यो-क्यो होस्टले लग कार लगा क’ कारे मे अपन प्रेमिका सँ गप्प करैत रहैत छलै ।
एहने कोनो साँझक गप्प छियै । ओहि दिन नवीन भरि दिन होस्टलक अपन कोठलीमे बैसल पढ़ैत रहल छल । पढ़ैत-पढ़ैत ओकर माथ भारी भ’ गेलै ।गोसांइ डूबि गेल रहै आ पछबरिया क्षितिज पर ओकर लाली पसरल रहै ।नवीन बिना स्वेटर पहिरने चाह पीबा लेल निकलि गेल । होस्टलक मेसमे खाली भोरे टा कें चाह भेटै । तें नवीन धीरे-धीरे अहि मकान दिस बढ़य लागल, जतय चाहक दोकान रहै । होस्टल सँ बाहर निकलिते ठंढा हवाक झोंक सँ ओकर देह सिहरि उठलै । मुदा स्वेटर पहिरय ल’ ओ छूरल नहि । दलकी वला जाड़ नहि रहै । हवा सँ ओकरा ताजगी भेटलै आ माथ जे भारी रहै से हल्लुक होब’ लगलै। मकानक आसपास अखन भीड़ नहि रहै । बेंच पर किछु जोड़ा रहै आ दोकान पर किछु लोक । एकटा कार लागल रहै ।कारमे एकटा लड़का आ एकाटा लड़की बैसल चाह पिबैत रहै । भरिसक चाह खतम भ’गेल रहै आ ओ दुनू खलियाहा कप थामने बैसल रहै । बुझेलै जेना लड़काकें एकाएक ई बोध भेलै ज ओ अनेरे हाथमे खलियाहा कप ल’क’ बैसल अछि आ ओहि बेकारक बोझ हटाब’ लेल कपकें कारक सीटपर राखय चाहलक । लेकिन लड़की ओकरा एना करय नहि देलकै । ओ लड़का वला कप ल’ क’ अपन कप पर राखि लेलकै । नवीन कें लगलै जेना ओलड़की आब कार सँ निकलतै आ अँइठ कप राख’ चाहक दोकान पर जतैक । मुदा ओ ओहिना बैसल रहल । जखन कि सम्हारय कातिर ओ बेर-बेर कप दिस देखै आ एना कयलासँ ओकर ध्यान गप दिस सँ हटि जाय, तइयोजानि नहि कते रसगर गप्प चलैत रहै जे छोड़ल नहि जाय ।
कार लग पहुँचि क’ नवीन उड़ती नजरि सँ दुनूकें देखलक आ उदासीन भावें आगू बढ़ि गेल ।
’एक्सक्यूज मी !’- पाछूसँ लड़कीक आवाज आयल।ओ नवीनकें बजबैत रहै ।आवाज सुनि क’ नवीन कें आश्चर्य भेलै । कियैक बजा रहल छैक ई अपरिचित लड़की ? ओ पाछू घूमि क’ आश्चर्य सँ लड़की कें देखलकै । लड़की जींस आ उजरा कुरता पहिरने रहै ।घूमिते लड़की पुछलकै-’अर यू गोईंग टू दैट साइड ?’
सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़्कीक चेहरा सँ उतरि क’ ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल । ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै । की ओ ओहि दुनूक अँइठ् कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै-’नो’ ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा एहि बातक खौंझ हुअय लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै ।ओ कियैक नहि कहि सकलै-निम्नवगीयि दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै । नवीन पान वला दोकान पर जा क’ ठाढ़ भ’ गेलै । ओ ऊपर सँ शांत बुझाइतो भीतरे-भीतर बहुत उत्तेजित रहै । ओ खाली ठाढ़ रहै । बाहरी दुनिया सँ निर्लिपृ ।
’क्य लोगे साहब ?’-विचित्र नजरि सँ तकैत पानवला पुधलकै त’ ओ अकबका गेल ।ओकरा की लेनाइ रहै ? कनी काल धरि ओ किधु सोचिये नहि सकल । ’हँ, सिगरेट।’-ओ दोकनदार कें कहलकै । सिगरेट ध्राए क’ नवीन सोचय लागल ओकरा त’ चाह पिबै लेल जेनाइ रहै फेर एतय कियैक रूकि गेल। की ई देखाब’ लेल जे देख हम ठीके ओम्हर नहि जा रहल छी ? कते फोंक आ डेरबुक अछि ओ ? तोरा हिम्मत कोना भेलौ ? कियैकनहि कहि सकलै ओ! की ओ ठीके दब्बू अछि ? आदब्बूपनीए कारणे ओकरा मुँह सँ निकलि गेलै-नो भरिसक ई बात नहि छैक । मरजाद आ शालीनताक लेहाज नहि होइतै त’ चाहक बदला ओ पानक दोकान पर किए ठाढ़ होइत । मुदा ई शालीनताक ढोंग नहि भेलै ?
नवीन बेचैन रहै आ जल्दी-जल्दी सिगरेटक सोंट मारैत रहै ।ओकरा ई बात परेशान कयने रहै जे लड़कीक मनमे एहि तरहक प्रस्ताव करबाक विचार अयलै कियैक । की ओ अपनाकें श्रेष्ठ आ हमरा नीच आ तुच्छ बूझि लेने रहै ?हँ, साइत यैह बात रहै । नवीन सोच मे पड़ल रहै । सिगरेट जरि क’ आब ओकर अंगुरी जरबय लागल रहै । सिगरेट फेकि क’ ओ चाहक दोकान पर चलि गेल ।
नवीन ढील भेलै आ लड़कीक ओहि समयक चेहरा ओकर बिधुआयल मुहेंठक लेल नवीन कें अफसोस भेलै ।ऊ सोचय लागल जँ कप लइये लितियै त’ की भ’ जइतियै । एहि सँ ओकर चरित्रक उदारता आ भद्रते सोझाँ अबितै । ओ छोट नहि भ’ जाइत, ई ओकर बड़प्पन होइतै । ओहिठमक जीवनमे ककरो कोनो छोट-मोट मदति करब आम बात रहै आ ई ककरो खराब नहि लागै । सहयोगक एहन भावना सँ नवीन अपरिचित नहि रहय । तइयो पता नहि की रहै जे ओ भड़कि गेल रहै ।
नवीन कें लगैत रहै ओकर दुनिया अलग छै आ ओहि लड़कीक दुनिया अलग । दुनूमे कोनो मेल नहि छैक । ओहि लड़कीक दुनिया चाहियो क’ नवीनक दुनिया नहि भ’ सकैत छलै आ नवीनक दुनिया लेल ओहि लड़की मे कहियो कोनो चाहत नहि भ’ सकैए । नवीन कें बुझेलै साइत सम्पन्नताक चिक्कन चाम आ रौद-बसातक सुक्खल चामक अन्तरे ओकरा भड़का देने होइ । ओ निश्चय नहि क ‘ पाबैत रहै । कही एहन त ‘ नहीं जे ओ लड़की अकारण ओकरा नीक नहीं लागल होइ आ ओ भभकि उठल हो ? मुदा से बुझाइत नहीं रहै । भरिसक ओकर भंगिमा, ओकर स्वरमे किछु रहै । ओकर अनुरोध मे अधिकारक भाव रहै, याचनाक नहीं ।
नवीन ओकर आकृतिकें मोन पाड़्य लागल । ओकर चेहरा मरदाना रहै । जनीजाति मे जे लाज आ कोमलता होइ छै, ओकरामे से नहि रहै । ओहि लड़कीमे किछु एहन रहै जे कठोर रहै आ विकर्षित करैत रहै । नवीन सोचैत रहल । ककरो ने ककरो गलती जरूर रहै । या त’ ओहि लड़की के प्रस्ताव ठीक नहि रहै या नवीनक प्रतित्र्किया उचित नहि रहै । दुनूमे क्यो दोषी रहल हएतै या दुनू दोषी हेतै या दुनूमे क्यो नहि । कोनो कारणो जरूर रहल हेतै । कारण आरो भ’ सकैत छल । ठीक-ठीक किछु नहि कहल जा सकैए । खाली एतबे साँच छै जे लड़की उदासभ’ गेल छलै आ नवीन दुखी रहैआ सोचने चल जाइत रहै ।
वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट«ीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
स्टेकशनसँ बाहरक दृश्यरकेँ घुरिघुरि कऽ देखैत हम मिसरजीक पाछँा चलय लगलहुँ । अनगिन्तील एक्काा, सम्पात्तिक लेखे नहि । बुझाइत छलैक जेना बैलगाड़ीसभक तोड़ सड़कपरसँ कखनो समाप्तऽ नहि होयत । स्टेलशनक हत्तासँ सटले उत्तर–दक्षिणदिसि गेल सड़कपर सुर्खी आ’ माटिक गर्दा निरन्तथर उड़ि रहल छलैक ।तखने एकगोट गाढ़ हरियर पेन्टे कयल चमकैत फिटिन आयल जाहिमे पयरसँ दबादबाकय टन–टन घण्टीम बजाओल जाऽ रहल छलैक । सड़कपर चलैत यान–वाहन आ’ लोकसभपर गर्वसँ टनटनाइत धड़फड़ाकय कात होइत मिसरजी हमरो पिचायसँ बचबैत कहलाह — “ कात होउ, कात होउ राजदरबारक फिटीन गाड़ी छैक । ”
दड़िभङ्गा ठीके बहुत बड़का छल, बहुतो नहि सोचल चीज–वस्तुय देखि हम उत्सुटक आ’ भयग्रस्ता भऽ गेल छलहुँ । स्टेहशनसँ सटले बाहर ओहिपार एकगोट विशाल पोखरि रहैक जकर स्टे शन दिसुका कातमे एकलाइनसँ मोदीसभक दोकानसभ छलैक ।दोकानसभ अर्थात फूसक झोपड़ीसभ । आगाँमे काठक चौकी तैपर ढ़ाकीसभमे भरल छल चूड़ा, भुज्जाी, बदाम (चना) अथवा गहुँमक सतुआ, गुड़ आ’ किछु पुरान लड़ू, नोन, मिरचाई, आ’ कोनो–कोनो दोकानमे दही सेहो सजाकय राखल रहैक । हमसभ ओही दोकानसभमेसँ एक कातक एकगोट दोकानमे पैसलहुँ जकर कर्त्ताधर्त्ता एकगोट नाम आ’ हृष्टईपुष्ट कदकाठीक सुन्नअरि आकर्षक मोदिआइन छलि । मोदी छल दुब्बोर–पातर प्राणी । नीच्चाग असोराक ओरीयानीमे बीच–बीचमे खोकैत नारियलक गट्टावला हुक्का् सुड़कैत रहैत छल । मोदिआइन अपन दोकानक भोज्यजसामग्रीसभक ठीक पाछाँ पलथी मारि बैसलि व्य ग्र आ’ चिन्ति्त स्व्रमे पिताकय बाजि रहलि छलि — “ वैद्यलग जा कऽ दवाई लाबक छह कि नहि ? कयबेर कहलियैक जे हुक्कामसँ दम आओर फुलतैक मुदा धनसन ”
मोदिआइन बीच–बीचमे अपन बड़का डण्टाईबला ताड़क पंखासँ एक हाथेँ अपन देहकेँ होंकैत भोज्योसामग्रीसभपर झिनकैत माछी आ’ बिढ़नीसभकेँ सेहो भगा रहलि छलि । मिसरजी ओकर पतिप्रतिक एकाग्रताकेँ भङ्ग करैत जोरसँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन ”
दूगोट गहिंकी ( हमरासभकेँ ) देखि ओकर स्वगर एकदम कोमल भऽ गेलैक — “ आउ, आउ बहुत दिनपर अयलहुँ ”
ओकर उज्ज र सुन्नसर दाँतसभ चमकि उठलैक । मुँहपरक मुस्कीम आत्मीहयताक भावक सङ्केत प्रेषित कऽ रहल छलैक । हमरा देखिते अत्य न्तउ भावपूर्ण सिनेहसँ ओ बाजलि — “ बौआकेँ बड्ड भूख लागल हएतन्हिह । ़़़ देखू तऽ, ठोर कोना सुखा गेल छैक ”
हम चट्ट दऽ अपन ठोरकेँ जीभसँ चाटि भिजयबाक प्रयत्न— कयलहुँ । मोेदिआइन हमरासभक स्वा्गतमे चौकीसँ उतरलि । ओकर नमहर काठी तखन खुलि कऽ स्पनष्टभ भ कऽ आयल । स्थूिल नमहर शरीर, ढ़ोढ़ीसँ उपरेक बिना बटमबला बड़का गलाक छिटक बलाउज पेटक कनेक नीच्चे‍ एकगोट गिरहपर अँड़ल एगारह हाथक नील साड़ी, चाकर–चाकर तथा विभिन्नड आकार–प्रकारक कानमे, गड़मे आ’ पएरमे चानीक गहनासभ, हातमे बरोबरि नीच्चाद सड़कैत बाजुबन्दथ आ’ बेरबेर फुजैत खोपा सम्हाैरयलेल उठैत हाथ — एहन रहय मोदिआइन । एहन नाम मौगी प्रायः नहिये भेटत । सेहो विहारक उत्तरी भागमे जतय मनुखक आकार सामान्यकतया मझोल होइत छैक भेटक तऽ गप्पेह व्य र्थ । कनेक काल हम टकीटकी लगाकय देखिते रहलहुँ । ओ झुकलि आ’ हमर काँखतरक मोटरी लऽ लेलकि । ओकर बडका–बड़का कारी–कारी आँखि, सुन्नलर आ’ समटल कारी भौं तथा पपनी, मुँहक रंग तऽ कारिये मुदा गढ़नि अत्येन्तड नीक रहैक । स्व‍स्थ ताक चमकिसँ भरल–पूरल चमकैत मुँह बीच–बीचमे ओकर हँसनाईसँ आओर निखैरि जाइत छलैक । मोदिआइनक सामान्यड मुस्कीैयोमे ओकर पातर लाल ठोर आओर लाल भऽ जाइत छलैक जाहिसेँ ओकर सौन्दचर्य आओर बढ़ि जाइक । हाथ–पयर, बाँहि सभ पुष्ट आ’ आकर्षक छलैक । ओतहि नीचा खोंकैत चोटकल गाल घोकचल कल्लााबला बैसल आदमीक धँसल छाती आ’ हड्डी–हड्डी देखाइत शरीरकेँ देखि बुझाइत छलैक जेना ओ दुनू सँयबहु नहि भिन्नत काल तथा स्थाानक प्राणीसभ होय । हमरा एखन मोन पड़ैयऽ, ओकरासभकेँ धियापुता नहि रहैक । किएक तऽ हम ओतय कोनो नेनाभुटकाकेँ नहि देखलहुँ । शायद तैं मोदिआइनपर उमेरक तेहन प्रभाव नहि पड़ल छलैक । पता नहि, मोदिआइनक उमेरे कम छलैक अथवा बेशी होइतो बुझयमे नहि आबि रहल छलैक । इहो भऽ सकैछ जे ओकर उमेर यथार्थमे कम रहल हेतैक मुदा देखयमे कनेक बेशीये बुझाइक । बात चाहे जे होउक मुदा ओकरामे दुनू चीज देखाइक — परिपक्व तो आ’ जुआनीक कोमलतो ।
हमराप्रतिये ओकर व्यसवहार अत्यमन्त’ आत्मीकय छलैक । ओ हमरा पुछलकि — “ बौआ, दड़िभङ्गा पहिलबेर अयलहुँ अछि ? ”
हम मुड़ी डोलबैत ‘ हँ ’ कहि देलिऐक ।
एखनतक मिसरजी अपन मोटरीसँ धोती बाहर निकालि कोंचिया नेने छलाह । मोदिआइन हमरो कहलकि — “ अहूँ नहायलेल चलि जाउ उ लगेक हड़ाहा पोखरिमे चलि जाउ । पानि शीतल आ’ निर्मल छैक, मुदा कातेमे नहायब उ बेशी दूर नहि जायब । बड्ड गहींर अछि हड़ाहा ”
मोदिआइनक बातपर अनायासे हमर मुँह फुजि गेल । हम गर्वसँ कहलिऐक — “ हमरा हेलय अबैत अछि । ”
ओ हमरा समझओेलकि — “ हेलय अबैत अछि से घमण्डो पोखरि, नदी, मोन्हिा, बड़का खधिया, दह लग नहि करी ।एहिसभमे देवताक वास रहैत छैक । गर्वक बोली पसिन्नफ नहि होइत छन्हिि हिनकासभकेँ उ अही हड़ाहा पोखरिमे कतेक अपनाकेँ बुझयबला ”
मिसरजी ओम्हकर पहुँच गेल छलाह, हमरा सोर कएलन्हिह — “ कतेक अबेर करैत छी, बौआ जल्दीड आउ । ”
मोदिआइन बाजलि — “जाउ, नहाकय जल्दील आउ उ तावत हम चूड़ा, दही, गुड़ आ’ मिठाई परसिकय राखि दैत छी । हे, कातेमे नहाएब उ कातेमेऽ ”
ठीकेमे ओहन पोखरि हम कहियो नहि देखने रही । पूर्वरिया भीड़पर ठाढ़ भऽ पछबारी भीड़दिसि तकलापर ओम्हु रका लोककेँ ठीकसँ चिन्ह नाई मुश्किपल छलैक । ओहिपार आम आ’ सिसोक एकटा घन फुलवारी रहैैक । हड़ाहा वास्तेवमे अथाह आ’ गहींर छल होयत । पूर्वरिया भीड़ स्टेकशनदिसि भेलाक कारणेँ प्रयोगमे छल । उतरबरिया भीड़पर दने सड़क भेलाक कारणेँ ओम्हेरो घाट बनल रहैक, मुदा पछबरिया आ’ दछिनबरिया भीड़पर जङ्गल–झार आ’ फुलवारीयेटा छलैक ।
घाटपर अङ्गा निकालैत काल हमरा मोदिआइनक चेताओनी मोन पड़ि गेल । ओ स्पीष्टे ईहो झलकोने छलि जे बहुतो आदमी एहिठाम डुबि कऽ मरि गेल अछि । हेलयमे तेजसभ सेहो । ओ एहिमे बसल देवतासभक बारेमे सेहो चेतओेने छलि । हमहुँ एहि अपरिचित स्थाकनमे कातेमे नहाएब उचित ठनलहुँ । आकाशमे एकबेर मेघक छोटका टुकड़ी पोखरिपर छाहरि दैत ससरलैक । पोखरिक पानि अनायास ककरो तमसायल मुँह जकाँ कारी भऽ गेलैक । तखने बसातक झोंकसँ सेहो ओहि पोखरिक अथाह जलराशि आन्दोअलित जकाँ भऽ गेल । लाखों लघु लहरिसभ पूरा पोखरिमे व्या प्तथ भऽ हिलोरि मारय लागल जेना केओ ककरो एकाग्रता भङ्ग कऽ देने होइक आ’ तैं केओ विक्षुब्धघ भऽ गेल होय ।साँचे, हमरा डर लागि गेल । कातेमे चटपट नहाकय हम सोझे मोदिआइन लग फिरि अयलहुँ ।
मोदिआइन प्रसन्न मुद्रामे भोजन–सामग्री ओड़िओने ओकर रखवारी करैति हमर प्रतीक्षा कऽ रहलि छलि । पातर पितरिया थारीमे धोअल फुलायल चूरा तथा ओहीमे दूगोट लड्ड़ू नोन आ’ गुड़ सेहो राखल छल । दही छाँछिमे छलैक ।
मोदिआइन बाजलि — “ लियऽ, नीकसँ बैसि कऽ खाउ उ मिसरजीक रस्ताा देखब आवश्य क नहि । ओ सन्याीमे कऽ कऽ अओताह । देरी लगतन्हिआ । बच्चाटसभमे एकर विचार आवश्यमक नहि । ”
ओ फेरो बाजलि — “ हड़ाहा पोखरि कतेक नमहर अछि उ ़़़ नहि ? केहन लागल बौआ, अहाँकेँ ? आ’ फेरो पानि कतेक कञ्चेन तथा शीतल छैक नहि ? ”
हम पुछलिऐक — “ मोदिआइन, हड़ाहा पोखरिमे देवता रहैत छथिन्हौ ? घमण्डी पर तमसा जाइत छथिन्ह ? कतेक आदमी डूबल हएत एखनतक ओहि पोखरिमे ? ”
“ कतेक ने कतेक के कहि सकत ? ओ कोनो हलहा आ’ नवका पोखरि अछि से ओहिमे बड्ड उग्र देवतासभक वास छन्हि । एहि जिल्ला मे एहन दोसर पोखरि नहि छैक ”
हमहुँ उत्सुहकतापूर्वक समर्थन करैत कहलिऐक — “ हँ, से तऽ ठीके । एहन नमहर पोखरि हमहु कतहु नहि देखने छलहुँ उ ”
हमरा खाइत देखि मोदिआइन अत्यतन्तथ सिनेहपूर्वक देखैति आगाँ बाजलि — “ बौआ, अहाँ की करैत छी ? पढैत छी कि नहि ? ”
हम कहलिऐक — “ पढ़ैत छी ।”
ओ घुसकिकय लग आबि फेर पुछलकि — “ की पढ़ैत छी, बौआ ?”
“ ए़ बी़ सी़ डी़ ”
“ पढ़िकय की करब ? ”
घरमे जेना हम अखनतक कहैत आयल छलिऐक तहिना निर्भिक भावेँ हम ओकरो कहलिऐक — “ बड़का आदमी बनब । ”
ओ फेरो पुछलकि — “ केहन बड़का आदमी ?”
हमरा एहन प्रश्ननक उत्तर ज्ञात नहि छल । चुपचाप खाइत रहलहुँ । ओ लगेमे स्थि रसँ बैसलि रहलि आ’ बाजलि — “ बडका आदमीसभ नहि जानि कतेक किसिमक होइत अछि ? मुदा नीक आदमी सभतरि एक्के। प्रकारक भेटत उ बड़का बनय दिसि नहि जाउ । बौआ, नीक बनक कोशिश करु । नीक ”
कातसँ खोंकैत मोदी नकिआइत कहलकैक — “ मोदिआइन, ई तोहर कोन आदति छौक ? सभकेँ ई उपदेशे देमय लगैत अछि उ ”
तावत मिसरजी सेहो नहा–धो कऽ आबि गेल छलाह । मोदिआइन फुरफुराकय उठलि आ’ हुनका सम्बो धित करैत बाजलि — “ बौआ भूखायल होयताह से सोचि हम हिनका दही चूरा खायलेल देलियन्हिु । अहाँ भानस अपने करब तऽ चाउर, दालि, घी, तेल, जारनि आदि सभ ठीकठाक कऽ कऽ राखि देने छी । चुल्हिा सहो फुकि दैत छी । आ’ नहि तऽ दहीये चूड़ा खा लियऽ ”
मिसरजी कहलखिन्हद — “ आब अखन हमरा भानस करक आँट नहि रहि गेल अछि । ”
हुनकालेल दही–चूराक व्यहवस्थाख करयहेतु मोदिआइन चौकीपर चढ़लि ।
मिसरजीकेँ खुआ–पीआकय ओ भीतर अपन घरमे गेलि । तखने मोदी सेहो खों–खों करैत ओकरहि पाछाँ भीतर गेलैक । प्रायः ओहोसभ दिनुका भोजन करय लागल छल । मुँहमे कौर देनहिं मोदिआइन भीतरसँ बाजलि — “कौआ–चील ने कहीं आबि जाई । कने देखबैक । हम तुरत्ते अबैत छी । ”
(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
कष्टी भेलनि तकर हाल की कहल जाय। सुपती गाँथबला बनबिलाड़ बनल।
मुदा ओहि सभ काज मे दू वर्षक समय बीति गेलनि तखन चिनगारीजी केँ एकाएक मोन पड़लन्हिदशनिचरी। शनिचरी मोन पड़िते ओ ब्यााकुल भमोदियानिक अड्डाक हेतु प्रस्थािन केलनि।
कनही मोदियानि हुलास सँ चिनगारीजीक स्वा्गत करैत बाजल�रे चिनगारी! तोहर अमानत केँ हम ओरियाकराखल। मुदा गारल असर्फी केँ लेबा सँ पहिने अगिला-पिछला हिसाब चुकता कदे।�
चिनगारीजी भावुक भउठलाआँखि सँ नोर टपकय लगलनिकंठ अवरुद्ध भगेलनि। ओ गड्डीक गड्डी नोट कनही मोदियानिक पयर पर पसारि देलनि। फेर एकटा पैघ सूटकेश केँ आगाँ करैत बजलाह�अहि मे अगेली-पिछेली सोनाक गहना आ वस्त्रान भरल अछि।�
कनही मोदियानिक आँखि फाटि कबाहर निकललगलै। ओ आश्च-र्य सँ चिनगारी केँ निहारय लागलि। चिनगारी अत्यकन्ता नम्र वाणी मे बजला�हम जे किछु छी से अहाँक परसादे। अहाँ ई किएक बुझलियैक जे हम अहाँक स्वा‍गत मे खाली हाथे आयब। हयै मोदियानि! चिनगारी अहाँक सेवकअहाँक अज्ञाकारी।�
कनही मोदियानि केँ सुइद-मूर सँ कइएक गुणा बेसि भेटि गेलै। ओ हँसैत बाजलि�एकटा औरो बात जानल जाए हे मनीस्टरर साहेब! गंगा-कात सँ एकटा मनुक्खक केँ आनिजकर नाम छियै कीर्तमुखशनिचरीक बियाह करा देलियैक अछि। आखिर समाज सँलोक-लाज सँ अहाँक रक्षा करब आवश्यटक छल। कीर्तमुख केँ सहवास करैक लूरि नहि छैक। शनिचरी सँ बच्चाक अहाँ जन्मा उ आओर बाप बनत कीर्तमुख।�
हेएकरा कहै छैक बुद्धि। कनही मोदियानिक सोचबभविष्यच केँ काया-कल्पम बनेबा मे के सकत।
चिनगारीजीक विभागक गाड़ीबडीगार्ड आ पीए आदि सभ कियो पटना वापस भेल। चिनगारीजी बहुतो दिन तक कनही मोदियानिक अड्डा मे अटकल रहलाह। मध मे घोरल शुद्ध शिलाजीतक बुकनीमिसरी देल ललका अरहुलक मोरब्बाज आओर गिलासक गिलास बकरीक दूध मे बादामकेसर आ हफीम फेंटल पेय केँ चिनगारीजी उदरस्तस करैत रहलाह एवं कनही मोदियानिक व्यगवस्थार मे जमकल रहलाह। परिणाम भेलयुधिष्ठिफरक आगमनक सूचना।
बिदाह हेबाकाल चिनगारीजी कनही मोदियानि केँ बुझा ककहलनि जेशनिचरीक खरचाहोइबला बच्चा‍क खरचाकीर्तमुखक खरचा आ आन सब खरचा मासे मास पटना सँ आयल करत। कोनो बातक चिन्तान जुनि करब। सत्त्ोमनीस्टइर की ने कसकैत अछि
कालक्रमे युधिष्ठिपरक अहि भूलोक मे पदार्पण भेलनि। मुदा हुनक जन्मखक बाद चिनगारीजी फेर कनही मोदियानिक अड्डा पर वापस नहि आबि सकलाह।
पटनाक नेतागणक बीच यद्यपि चिनगारीक कीर्ति-पताखा बड़ उच्चम मे फहराइत रहैन्ह मुदा ओ एकटा पैघ पाप कबैसलाहतकर प्रायश्चिँतो नहि कसकलाह। सबटा नसीबक दोष।
पहिल केबिनेटक मीटिंग। सीएम गुलाब मिसिरक भाषण भेल�भाइ लोकनिहम जो कुछ बोलता हूँ उसको आप सभी धियान से सुनने का कष्टन करें आऊरो सचेत हो जायें। हमरा एक मंत्रा हैसातू खाते रहोराज करते रहो। कँग्रेसिया सातू छोड़ाखाने लगा पोलाव। नतीजा क्याक हुआसब मैटर आपके सामने है। हम फिर दोहराता हूँ सातू जिन्दाबाद! सातू जिन्दा बाद!�
मुदाचिनगारीजी अपन नेताक गुरुवाणी बिसरि गेलाह। पोलावबिरयानीमूर्ग-मोसल्लाम कटिया भरल ठर्रा। पहिने हुनका ब्ल्ड प्रेसर धक्काो देलकनिफेर डाइभीटिज। डाक्टुर भेटलनि चाइबासाक सेडूल्डत ट्राइब्सबक नम्बार दूक डा. पी. के. मूरमूर।
डाक्टिर मूरमूर जखन पहिल मेडिकल परीक्षा मे दाखिल भेल छलाह तकुल मार्क्सब एलनि एगारह। हुनकर सहोदर भ्राता हेल्थर मनीस्टनर छलथीन। हुनका परम आश्च र्य भेलनि�कुछ होएग्गाकरह नम्बार तो लाया। अब मेरा भाई डाक्टहर बनकर रहेगा।�
डाक्ट र मूरमूर चिनगारीजीक जाँच केलथिन्हा आओर उपदेश देलथिन्ह �बड़ा आदमी का निसानी है ब्लोड प्रेसर और डाइबीटिज। दवा लिख दिया हैखाते रहिए और देश का काज करते रहिए।�
एलोपैथी दवाइ खाइबला केँ जँ भोरुका उखराहा मे मुँह मे खटमिट्ठीक स्वाशद अबैक तसचेत भजेबाक चाही। मुदाचिनगारीजी मनीस्टहर। हुनका चेतबाक फुर्सति कहाँ
ओहि दिन चिनगारीजी रतुका खुमारी तोड़ैक लेल पहिने ललका रमक एक गिलास पिलनि। फेर ब्रिटानिया बिस्कु़ट केँ चिकेन सूप मे भिजा कमुँह मे रखलनि की पेट मे हूक उठलनि। कनिएँ कालक बाद पेट मे मरोड़। पेटक वस्तुा बाहर हेबालेल भगवान मनुक्खाक शरीर मे दूटा द्वार देने छथिन्हट। चिनगारीक दुनू द्वारक पट एकहि संग खुजि गेलनि। पछिला रतुका खेलहाअखरोटछहोड़ाकिसमिस साबुत निकलय लागल। डा. मूरमूर एलाह आ चिनगारीजी केँ देखिते बजलाह�इसको तुरंत अस्परताल भेजो। मरीज बहुत गन्दाा है।�
अस्पातालक नाम भेल अभावक पराकाष्ठाअ। चिनगारीजी अस्प तालक अव्यावस्थारक कौतुहल मे फंसि गेलाह आ मुँह-बाबि दम तोड़ि देलनि। कियो कहलक हार्ट फेल हो गया। दोसर कहलक�नहीनहीपेट मे भुरकी हो गया।�कियो किछु तकियो किछु।
किछु होउकमनीस्ट।र बला बात। आध दर्जन डाक्टनर गहन छान-बीन केलाक बाद निर्णय देलक�चिनगारीजी मर चुके हैं। सच तो यह है कि अस्प ताल आने के मार्ग में ही इनकी मृत्युर हो चुकी थी।�
संध्याोकाल सीएम रेडियो पर भाषण देलनि�चिनगारीजी एक करमठइमानदारत्यादगी और प्रान्तग के महान नेता थे। हमलोगों को भवसागर में छोड़कर चले गए। उनके रिक्त स्थािन की पूर्ति कोई नहीं कर सकता है। हम उनके आत्माक की शान्ति का प्रार्थना करता हूँ।�
कनही मोदियानि केँ जखन चिनगारीक मृत्यु क समाचार भेटलै तओ आकुल भकबफारि तोड़ब शुरू केलक। नवका नोटक फरफराइत गड्डी ओकरा आँखि मे स्वँप्नीवत घुमलगलै। मुदाबहुत जल्दी ए ओ अपन ध्‍ौर्य केँ बाकुट मे समेटलक। अरे! विधाताक बनाओल विधि व्योवस्थाग सबसँ ऊपर।
कनही मोदियानि शनिचरी केँ बजा ककहलकै�चूड़ी नहि फोड़रहदेसेनूर नहि पोछललका-पिअरका नुआ पहिरते रह। आइ तक तूँ परतंत्रा छलह। आब हे रूपवती शनिचरी! तूँ स्वचतंत्रा छह। सौंसे संसार मे उड़। अपनो प्रसन्न रहआ हमरो प्रसन्न करैत रह।�
शनिचरी केँ स्वआतंत्रा होइत देरी कनही मोदियानिक आमदनी मे इजाफा भेलैक। ओम्हेर आमदनी बढ़ैत गेल आ एम्हनर शनिचरी क्रमशः चारिटा आओर बेटाक जन्मआ देलक। मुदाअन्तिनम बेटाक जन्मल-कालबुझू धरती फाटि गेलै आ शनिचरी ओहि मे समा गेलि।
कीर्तमुख आब पाँच सन्तादनक पिता छल। कनही मोदियानि जामे तक जिअल ओकर सिनेहओकर देख-भाल मे कोनो कमी नहि आयल।
कीर्तमुखक नकुलवाबला गप सुनि कअर्जुन केँ प्रचण्डम तामस भेलैक। क्रोधसँ ओकर आँखि लाल भउठलै। पिछला दू अन्ह।रियाक पाँच हजार टाका थानाक बाँकी छैक। कतेक नेहौरा केलाक बाद थाना प्रभारी एक आओर अन्हलरिया उधार देलक। डकैतीक काज मे की कोनो लज्ज त रहि गेलै हेंट्रकबला सब पलटनक गाड़ी जकाँ कतार मे चलैत छै। इलाका ओहिना दरिद्दर। तखन तबाहरक कोनो भुतिआयल मुसाफिर फँसल तकिछु झड़ल।
अर्जुन आइ एक घंटा चूल्हासइक महावीर मंदिर मे मनौती केलकतखन डकैतीक धन्धा पर विदा भेल छल। बीचहिं मे टोक। हे महावीर! एहन निर्दयी बाप ककरो ने हो।
�रे हे अरजुनमा! किछु बाजै नहि छएँ। टुकुर-टुकुर तकला सँ की हेतौकपोसि-पालि कसबकेँ पैघ केलिऔक। आब नकुलबा के रास्ताय पर अननाइ तोहर फर्ज बनै छौ। छोटकासहदेवा एखन चरबाही करै अछिठीके अछि। आब हम बूढ़ भेलिऔ। अपन जिम्मे दारी केँ कम करचाहैत छी।�
अर्जुन फेर घूमि केँ बाप दिस तकलकबाजल�बेसी टेएँ-टेएँ करबने तअखुन्तेछ आबि कगर्दनिक हड्डी तोड़ि देब।�
कीर्तमुख अपन गरदनि पर हाथ रखलक तओकरा मोन पड़लै जे ओकरा गरदनि छलैहे नहि। सही मेकीर्तमुखक शरीरक बनाबट अजीब रहैक। लग्गाम सन नम्ह र-नम्हबर दुनू टांगघोंकचल पेट आ छातीकन्हाी पर पौड़ल मूड़ी गरदनि नदारत। पीठ पर कुब्ब र। तें भीख मंगै काल कियो ओकरा घेंचू त कियो ढेँचू कहैक। कीर्तमुख केँ कनिओ बुझल नहि रहैक जे ओकर माय-बाप केगंगा-कात मे भीख मंगैत ओ पैघ भेल आ गंगा-कातक पण्डा। ओकर नामकरण केलकैकीर्तमुख।
भगवान सबकेँ देखै छथिन्हक। सभहक इन्त जाम करैत छथिन्हज। कीर्तमुख जखन चेस्टगर भेल तगंगा नदीक कछेर मे माँछ पकड़ए लागल। आध-आध मनक रहु आ भाकुर ओ हाथे सँ पकड़ि लिअए। ई गुण ओकरा अपने-आप आबि गेल छलै। ओही माँछ के बेचैक क्रम मे ओकरा कनही मोदियानि सँ परिचय भेलै।
आ एक दिन कनही मोदियानि कीर्तमुख केँ बुझा-सुझा ककहलकै�कतेक दिन तक बौआइत रहब। आब ठेकाना पकड़ि लैह।�
ठेकाना भेल कमचीबला मचानपत्नी- भेटलै शनिचरी आ बेटा भेलै पाँच। कोनो चीजक मिसियो भरि कमी नहि। बुझल जाउपूर्व जन्म क कमायल नीक कर्मक भोग कीर्तमुख केँ अनायास प्राप्तग होबलगलै।
मुदाआइ अर्जुनक गरदनिक हड्डी तोड़ै बला गप सुनि कओकरा बड्ड दुख भेलै। एहन मर्माहत बला दुख ओकरा कहिओ ने भेल रहैक। ओ चारू कात नजरि खिरौलकओकर बतारीक कियो नहि छैक।
अर्जुन केँ ओ निहारि कदेखलक। कीर्तमुखक आँखि मे चोन्हाि-मोन्हाभ लागि गेलैक। साँस सेहो ठमकि गेलैक। असल मेकीर्तमुख अइँठ कमुँह बाबि देलक।
खैरकीर्तमुख केँ की भेलैक से तसहदेवा जखन राति मे ओकर खेनाइ लकआओत तखन पता चलतैक। सहदेवाकीर्तमुखक सबसँ छोट नेनाचिनगारीजीक असलिका बेटाक ओहिठाम चरबाही करैत छल। भोरका पनपिआइदिनका कलउ आ रतुका खेनाइ ओकरा जे भेटैक ओहि मे सँ आधा ओ खाइ छल आओर आधा कीर्तमुख केँ खुआबै छल। मजाल की जे कीर्तमुख एको साँझक भूखल रहि गेल हो। सहदेवा केँ अपन बापक प्रति जे ममता छलै से संसार मे व्याखप्त सिनेहक उत्तम उदाहरण छल।
आब सब किछु केँ छोड़ू। चलू अर्जुनक संग डकैतीक अभियान पर।
अर्जुन सबसँ पहिने गोपियाक पसिखाना पहुँचल। जाहि दिन सँ ताड़ी पर सँ एक्सारइज हटलैताहि दिन सँ डिबियाक स्थाकन पर पेट्रोमेक्स् जड़ैत अछि। चारू कात भकभक इजोत।
अर्जुनक शागिर्द मे पहिल नम्ब र पर छल भूल्लास। अर्जुन केँ देखिते भूल्लाै बाजि उठल�आह! ओस्तारद आबि गेलाह।�
भूल्लाक एक गिलास मे उज्जनरफफनाति ताड़ी लकअर्जुन लग पहुँचल आ रिपोट देबलागल�बेगुसराय बला उधार गोली नहि देलक। कहलक पिछला उधार चुकातखन अगिला उधार ले।�
अर्जुनक गिरोह मे सात नौजवान छलै। मुदाताहि मे कुल पाँच देशी रिभालवर आ तकर मात्रा तीनटा गोली। आब अहीं कहूडकैतीक काज कोना हैतसब काज मे पूंजी चाही। पूंजीक अभाव अर्जुन केँ पनपै मे महाबाधक छल।
�तखन�अर्जुन ताड़ीक गिलास भूल्ला क हाथ सँ लैत प्रश्नछ केलकै।
�तखन की। सरपट मुसरीघराड़ी पहुँचलहुँ। अहाँक भैयाक गोर छूलऊँ। दुखड़ा कहलियै। ओ भरल एक पॉकिट गोली दविदा केलनि आ कहलनि�अर्जुन से कहनाउसका भतीजा पैदा हुआ है। फुर्सत मिले तो आकर देख जाय।�
अर्जुनक मोन गदगद भउठलैक। ओ भूल्लापक पीठ ठोकलक। ताड़ी केँ चुरुक मे लआचमनि केलकएक घोंट ताड़ीक कुरुर केलक आ थोड़ेक ताड़ी हाथमे लय सम्पूीर्ण देह पर छिटि लेलक।
अर्जुन ताड़ी नहि पिबैत अछि। असल मे अर्जुन कोनो निशा करिते ने अछि। मुदाडकैतीक काज मे भभकैत ताड़ीक गन्धा जरूरी होइत छैकतेँ ई टोटमा।
अर्जुन हाथ मे लागल ताड़ीक चिपचिपाहटि कात करोट मे पोछैत भूल्लाअ सँ कहलक�तों सब तैयार रह। हम हेड अॉफिस केँ खबरि ककतुरंत वापिस आबि रहल छी।�
हेड अॉफिस यानी चमेलीरानीक अड्डा।
कनही मोदियानि अपन एकमात्रा सन्तापन चमेली केँ बरौनी रिफाइनरीक इंगलिस स्कूैल मे नाम लिखा कहॉस्टिल मे राखि देने छलैक। ओ जखन मरल तचमेली दसमाक परीक्षा ददेने छलै।
कनही मोदियानिक मृत्यु क बादचमेली पुरना डीह-डाबर केँ बेचि हाइवे पर फैल जगह देखि नवका अड्डा बनेलक। नवका जमानानवका विचार। चमेलीक पक्काय दूमंजिला मकान। रहैकसूतैकखाइ-पिबैक आ गुलछर्ड़ा करैक अलग-अलग कमरा। सब इन्तवजाम फस्ट -क्लाकस। किछुए मास मे हाकिम हुक्कायममंत्राी-संतरीचोर-उचक्काेपंडित-कसाइ सबहक माइ डियर �चमेली।
चमेलीक माथ पर भूखन सिंहक बरदहस्त। रिफाइनरी सँ हथिदह तकसबसँ खूंखार डकैत भूखन सिंहचमेलीक धर्म-पिता छल। दिआराक चन्हाकईक्यूलक बच्चाी भाइ आ मोकामाक धोहरलाल तोपबालासब भूखन सिंहक मातहतमानू भूखन सिंहक आगू खपटा।
चमेली केँ ककरो परबाहि नहि। ओकर जवानी अंगार भकदहकि रहल छलै। ऊपर सँ पढ़ल-लिखलफटाफट अँग्रेजी बजैबालीतेज-तर्रार आ मुँहफट। परगना भरिक डकैत पहिने चमेलीक अड्डा पर जेबे करतहरी झण्डीप लेतफेर आगाँ पयर उठाओतसैह नियम छलैक।
अर्जुन जखन चमेलीक अड्डा पर पहुँचल तखन मात्रा सात बाजल रहैक। ओना अन्हतरियाअन्हाीर केँ झंपने किछु बेसिए अन्हाबर भचुकल छलै।
दू टा पावरफूल लैम्पडक बीच बैसलि चमेली। कान मे झुमकानाक मे नथियागरदनि मे सोनाक हारनहि किछु नहिएकोटा गहना चमेली नहि पहिरने छल। ने पाउडरने स्नोे आ ने काजर। किछु नहिमात्रा एकटा बिन्दीख ललाट पर दमकैत रहैक।
अर्जुन चमेलीक सपाट चेहरा पर नजरि अँटकेलक। ओकर नजरि पिछड़िगेलै। मुदाओकरा स्परष्टद भान भेलै जे एकटा हँंसीक लहरि चमेलीक आँंखि मे काँपि गेल होइक। ओना अर्जुन केँ धोखा सेहो भसकैत छै। किंतुचमेलीक बिन्दीर सँ एकटा ज्योकति पसरि रहल छलैअहि मे कोनो धोखा नहि छलै।
अर्जुन दिस चमेली एकटक निहारि रहल छलीह जाहि मे कोनो विशेष निमंत्राणक अन्दाकज छलै। चमेली बजलीह�कौन हैरेकुकुरमुत्ता तुम हो�
�कुकुरमुत्तासम्बोछधन अर्जुनक लेल छलै। कनही मोदियानि जीबिते रहै। चमेलीक उमिर तेरह-चौदह। अर्जुन बुझू पन्द्र ह-सोलह। ओहि काल बज्र दुपहरिया रहैक। चमेली कनखी मारि अर्जुन केँ इशारा केलकै। फेर पछबरिया अन्हाीर कोठरी मे एसगरे लगेलैकबिलैया सेहो चढ़ा देलकै। तकरा बादभीतर कोठरी मे की भेल से तप्रायः देवतो केँ पता नहि लगलनि। बाहर आबि चमेली बिहुँसैत अर्जुन दिस ताकि कबजलीह�कुकुरमुत्ता।�
कुकुरमुत्ता सम्बोीधन सुनि अर्जुनक नजरि झुकि गेलैक। ओ चुपचाप ठार रहल।
�तुम्हाारे वास्तेिकुकुरमुत्तादूसरा अॉडर है। कुछ देर पहले हुकुम आया है। आज रात को सेभेन्टीह वन अप के स्ली�पर में डकैती का कार्यक्रम है। तुमको उसमें जाना है। हाइवे डकैती में कुछ माल नहीं है। थाना को भी खबर है कि दो अन्हअरिया का पहुँचौआ तुमने नहीं पहुँचाया है। तुम पर बड़े साहब ददू की आँख है। तुम युधिष्ठिकर के सगे भाई होजवान होदिलदार होतभी तो चान्सप मिला है। इस काम में तुम्हा रा टेस्टप है। सफल होने पर एक धाकड़ मर्डर का काम मिलेगा। समझो तुम्हािरे किस्मथत का दरवाजा खुल गया है।�
चमेलीक मुँह सँ फहरी लाबा बनल शब्दो निकलय लागल। एम्हर अर्जुनक माथ मे घंटी बाजब शुरू भगेल। मर्डरबला चान्सह बड़ कठिने भेटैत छैक। भूखन सिंहक एहन कृपाक लेल सैकड़ों लाइन मे ठारे रहि जाइत अछि।
�बोलोतैयार हो�
�एकदम सँ तैयार छी। कहू तगोपियाक पसिखाना सँ हम अपन गिरोह केँ बजा लाबी।�
�फिर कुकुरमुत्ता जक्तील बात बोलता है। अरेट्रेन डकैती का काम अलग हैजोखिम का है। सड़क डकैती करने वाला उसमें फेल हो जाएगा। यहाँ जथ्थाक तैयार है। छोकड़ा-छोकड़ी मिलाकर बीस और तुम आ गया तो एक्कीकस। रात के बारह बजे रबाना होना है। अभी चार-पाँच घंटा का देरी है। तुम अन्दथर जाओ औरतैयारी मे जुट जाओ।�
अर्जुन भीतर प्रवेश केलक। विशाल आंगन। साफ-सुथराइजोत मे झलकैत। चारू कात काज भरहल छैक। एके सैंतालिस राइफलक ढेरी एक कात। एक गोटे ओकर चेकिंग मे लागल। दोसर कात छोटका-बड़का बमक नुमाइस। खेबा-पिबाक सामग्री दिस थोड़ेक छौंड़ा-छौंड़ी बैसल खा-पी रहल अछि। बहुत कात मेमुदा पूर्णतः इजोत मे एक जोड़ा अपन बैटरी चार्ज करमे मस्तर छल।
अर्जुनक मददिक लेल एकटा छौंड़ी आयल। ओकरा अपन काज सँ मतलब। �कपड़ा बदलना हैहथियार कहाँ रखना हैएक्सछट्रा मैगजीन जरूरी है।
सबटा काज केँ निष्पाकदन ककवैह छौंड़ी एकटा मुँह झँपना आनि कअर्जुन केँ देलकै आ ताकीत केलकै�इसको इस तरह टाइट बाँधो कि आँख छोड़कर पूरा चेहरा ढक जाय।�
ठीक बारह बजे राति। सन-सन बहैत हवा अन्हकरियाक छाती केँ विदीर्ण करहल छल। चमेलीक टाइट पेन्टन-सर्ट मेपाँछा लटकल चमड़ाक चमौटी मे रिवाल्बिर। चमेली अर्जुनक मुआयना करैत बाजलि�मेरे पीछे बैठ जाओ।�
अर्जुन मोटर साइकिल पर चमेलीक पाँछा बैसल। ठीक ओहीकालवैह छौंड़ी जे पछिला चारि घंटा सँ अर्जुनक देहक समस्तक पूर्जा केँ टीप-टाप ककओकरा तैयार केने छलअर्जुनक पाँछा मे आबि मोटर साइकिल पर बैसि गेलि। चमेली अर्जुन केँ फेर टोकलक�कुकुरमुत्तामुझे कसकर पकड़ लो।�
मोटर साइकिल फरफरा कस्टाेर्ट भेल। संगहि औरो मोटर साइकिल स्टा र्ट भेल। अर्जुन कृष्णाज आ कावेरीक बीच फँसल जा रहल छल।
अर्जुन पजिया कचमेली के ध्‍ोने छल आ सोचै छल। की कहलियैअर्जुन ट्रेन डकैती दसोचै छल जी नहिओ एतबे सोचै छल जे जखने चमेली अवसर देत ओ कुकुरमुत्ता सँ छोड़ि घोड़मुत्ता बनि कदेखा देतैक। पछिला छौंड़ी अलगे अर्जुनक देह मे घुसियेबाक बियोंत मे छल। मुदाअर्जुन कइये की सकैत छलचुपे रहल।
जमाना बदलल जा रहल छल। सब काज मे छौंड़ा सँ छौंड़ी आगू। ओ सब जखन कटवासाक गुमती लग पहुँचल तअर्जुन सबटा मोटर-साइकिल केँ गनलककुल दस टा।
गुमती मैन रेलवेक लालटेनक ललका बत्ती केँ तेज करैत बाजल�बसपाँच मिनट। ट्रेन आने ही वाली है।�ट्रेन आयल। आस्ते भेल। फटाफट सब चढ़ि गेल।डकैती शुरू भेल। तीनटा स्लीँपर लुटल गेल। केवल कैशगहना आ दामिल असबाव। पाँच बोड़ा में सबटा पैक। कुल बीस मिनट लागल। कोनो बिरोध नहिकोनो अवरोध नहि। पसिन्जगर सब डेरायलनुकायलऔंघायल आ चुपचाप। मात्रा चमेलीक रिभाल्वारक खलिया फायरक प्रतिध्वननि चारूकात पसरल छल। फेर ट्रेन आस्ते् भेलबहुत आस्तेे भेल। एकैसो व्यचक्तिर उतरि गेल। ट्रेन स्लोफ सँ फास्टक भेल आ आँखि सँ ओझल भगेल।
उतरै काल चमेलीक वामा पायर मे मोच पड़ि गेलैक। ओ नंगराए लागलि। अर्जुन केँ अपन वीरता देखेबाक सुअवसर भेटलैक। ओ चमेली केँ कन्हाक पर लदलक आ फूल-सन सुकुमारि केँ नेने दुलकी चालि मे चलैत वापस कटवासा गुमती लग पहुँचल। सब जा चुकल छल।
गुमती मैन अर्जुनक कन्हाआ पर चमेली केँ देखि बिफरि कहँसि पड़ल। ओकर अगिला दाँत में सोनाक कील ठोकल रहै। बिना किछु कहने अर्जुन मोटर-साइकिल स्टाआर्ट केलक। चमेली पाँछा मे बैसि अर्जुन केँ पजिया कपकड़ि लेलक। ओहि मोटर-साइकिलक तेसर सवारी पहिने जा चुकल छलै। डकैतीक कानून�वापसी मे किसी के लिए रुको नहींभागकर अड्डा पर पहुँचो।
चमेलीक शरीर सँ एकटा अत्यंफत अजूबा मादक सुगंधि विसर्जित भरहल छलैक। अर्जुन केँ ताड़ीक भभकैत गन्धहक कतौ अत्ता-पत्ता नहि रहलैक। ओ आपसी मे मोटर-साइकिल बहुत तेज चला रहल छल। चमेलीक गर्म सांस ओकर पीठक हड्डी केँ छलनी केने जाइत छलै।
जखन अर्जुन आ चमेली अड्डा पर आपस आयल तभोर भेल नहि छलैभोर होबहिबला छलै।
चमेली एकटा कोठरी मे जा कटेलीफोन सँ ककरो पूरा रिपोट पहुँचौलकफेर आदेश ग्रहण केलक आ आपस अर्जुन लग आयल।
�यह है दस हजार रुपैयातुम्हानरा हिस्साप। साहेब यानी ददू का हुकूम है वापिस घर जाओ। अगिला आदेश का इन्तअजार करो।�
अर्जुन रुपैया केँ दहिना पेन्टक जेबी मे ठुसलक आ टकटकी लगा कचमेली दिस ताकय लागल। अर्जुनक नजरि मे एकटा पैघ नजरिया साफ देखमे आबि रहल छलै।
भोरुका समयपुरबा बसात मे सिहरनअतृप्त। कामक प्रचण्डद वेग। ताहि पर सँ कामदेव देशी पिस्तौरल सँ ताबड़तोड़ फाइरिंग करहल छलाह। चमेली एकटकअर्जुनक आँखि मे देखि रहल छलीह। प्रकृति पुरुष मे समर्पणक लेल आतुर भरहल छलीह। एक क्षण तएहनो अभास भेल जे डकैतीक सरदारीनचमेली बेबस भरहलीह अछि।
मुदावाह रे चमेली! ओ कामक वेग केँ मूलाधर चक्र पर बजारि एक अद्‌भुत विवेकक परिचय देलनि। हुनक मुखाकृति पर आभाक विस्ताार होमय लागल। शायद भविष्य क गर्त मे नुकायल कोनो पैघ कार्यक सम्पापदन होयत तकर आभास सहजहिँ दृष्टिरगोचर होबय लागल। चमेली अँटकल ओ फँसल अबाज मे बजलीह�जानते हो अर्जुनमैं तीन वर्षों से डकैती का काम कर रही हूँ। सैकड़ों डकैती का अनुभव मुझे बतला रहा है कि यहाँ के लोग आलसी किंतु शांतिप्रिय हैं। मैं भी इन्हीं लोगों के बीच से आई हूँ। इस तरह के लोगों की भलाई इन पर शासन करके ही किया जा सकता है। और यह भी सच है कि इन पर शासन करना कुछ भी कठिन नहीं है।�
चमेली पढ़लि-लिखलिअर्जुन मूर्ख। चमेली की बाजि रहल छथिअर्जुन केँ बुझै मे किछु नहि ऐलैक। चमेली फेर बजलीह�इस सपाट मैदान मे सिर्फ घास ही घास है। लेकिनबहुत जल्द एक विशाल पेड़ उगने वाला है। वह पेड़ मैं बनूँगी। सभी मेरी छाया में आयेंगे। मैं सबका भाग्या लिखूँगी। सच पूछो तो मैं इस प्रान्ते की रानी बनने वाली हूँ। जिस रास्तेप मैं चल रही हूँ और चलने वाली हूँमुझे अच्छीय तरह पता है कि वह कहाँ तक पहुँचता है। हाँयह भी सच है कि मुझे एक मर्द की जरूरत होगी। समय आने पर मैं तुमको अपने पास बुला लूंगी। मेरी आवाज सुनकर तुम आओगे क्योंीकि मैं तुमसे प्या र करती हूँ। तुम ही मेरा पहला और आखिरी प्यामर हैसमझे।�
एखन अर्जुन किछु नहि बुझलक। ओकर समझक आगाँ एकटा पाथर छलपियासल ओ पसरल। ओकर कान मे चमेलीक आबाज फेर टकरेलै�और अभी की बात जान लो। तुम औरत के गले का गहना नहीं छीन सका। डकैती के उसूल के विरुद्ध। इसी से तुमको मर्डरवाला काम नहीं दिया जाएगा। तुम इस काम को करने की योग्यँता नहीं रखते हो। तुमको अभी और निडर-निष्ठुरर बनना पड़ेगा। तुम्हा रे अंदर कोई देवता है जिसे मारपीट कर भगाना पड़ेगा। सफलता के लिए जो भी काम करो उसमें इमानदारी का होना जरूरी है।�
अर्जुन के मोन पड़लैकट्रेन मे डकैती काल ओहि नववधुक गरदनि मे सोनाक गहना पर हाथ देलक तओ बाजि उठल छलै�ई मंगल सूत्रा थिक। एकराजुनि लैह।
फेर ओहि नववधुक आँखि सँ करुणाक इनहोर नोर ओकरा हाथ पर खसलैक। ओ हाथ छीप नेने छल।
अर्जुनक मोने ई बात कियो ने देखलक आ ने बुझलक। मुदासे नहि। डाकूक मुखियाचमेलीक नजरि सँ किछु नुकायल नहि रहि सकैत छलै। अर्जुन केँ अपन गलतीक एहसास भेलैक। ओकर आँखि आओर कातर भउठलैक।
अर्जुनक दयनीय दशा देखि चमेलीक हृदय मे कतहु सँ एक आना दयाक भाव जगलैक। ओ चुचकारी दैत बजलीह�खैरजो हुआ सो हुआ। तुम दुखी मत होओ। एक बैंक लूटने का प्लाकन बन रहा है। अभी फाइनल नहीं हुआ है। फाइनल होते ही मै उसमें तुमको शामिल करने का प्रयास करूँगी। अब तो खुश! अब सीध्‍ो घर जाओ।�
खिसिआयल महादेव केँ परचारैत अर्जुन अपन गाम मिरचैया लेल विदा भेल। आकाश मे चकमैत भोरुकवा तारा दिस तकैत ओ सोचि रहल छल जे चमेलीक अन्तिकम बात जँ सत्यप हेतैक तखने ओकर भाग्य जगतै। तामे बहुत रास दुख ओकरा छपने रहत।
पहिल दुख जे बहुतो प्रयास केलाक बादो ओ कुकुरमुत्ता सँ घोड़मुत्ता नहि बनि सकल।
दोसर दुख जे मात्रा एकटा मंगलसूत्राक कारणें ओकरा मर्डरबला काजक चान्सत हाथ अबैत-अबैत खिसकि गेलैक।
आओर तेसर दुख! गाम पहुँचि कतेसर दुख परिलक्षित भेलैक। कमचीवाला मचानक नीचाउत्तर मुंहें सिरमा केनेकीर्तमुख मुँह बौने मरल पड़ल छलाह। उज्ज्र नवका कपड़ा सँ हुनक देह झाँपल छल आ सिरमा लग गोइठाक धुआँ आकाश मे बिलीन भरहल छल।
अर्जुन केँ देखिते नकुल आ सहदेवा�भैयाहोउ भैयाकहैत ओकरा सँ लेपटा गेलै। अर्जुनक ठोर पटपटा उठलै�बापबाप मरि गेल। आइ हम टुअर भगेलहुँ।

अदू

�रघुपति राघव राजा रामपतित पावन सीताराम। अजीओ महाराज जीतनी हटू। हमारा अन्द र जाए दिअ।�
कहबला व्यमक्तित गेरुआ वस्त्रा धारीट्रेनक फस्टँ-किलास डिब्बा‍ मे चढ़ैक प्रयत्नँ करहल छथि। मुदा डिब्बा क दरबज्जाद लग एक व्य क्तित हाथ मे स्टेरनगन नेने ओहि महात्माि केँ चढ़ै सँ रोकि रहल अछि।
अभागल प्रान्तघक अति अभागल टीसननिर्मली। भोरुका करीब आठ बजेक समय। जेठक रौद्र सूर्यआकाश मे फनैत आगि उझील रहला अछि। एखन एहन गर्मी तदुपहरिया मे केहन रौद तकर मात्रा कल्पकना सँ देह काँपि उठैत अछि।
अठबज्जीन ट्रेन निर्मली सँ खुजय लेल तैयार। ट्रेन मे लार्ड डलहौजी समयक बनल एक मात्रा फस्टउ किलासक डिब्बाा। डिब्बाझक एक बर्थ पर एकटा स्मा्र्ट करीब बीस वर्षक युवकटाइट पेन्टा-शर्ट मे। हुनका संगे करीब चौदह वर्षक परम रूपवती एकटा नवयुवती। ओहो टाइट पेन्टब-शर्ट मेमुदा शर्टक ऊपरका दूटा बटन खुजल। दोसर बर्थ पर एकटा केचुआयलकरीब साठि वर्षकमोटरी जकाँ तोंद आ लगातार तीन एसेम्बओलीक इलेक्श न जीतै बला विधायकउज्जोर जाजीम पर लम्बाप-लम्बीष पड़ल। विधायकजीक समग्र ध्याून सामने टाँग पर टाँग रखने नवयुवतीक सौन्द र्य मे केन्द्रि त छल।
विधायकजीक बर्थक ठीक नीचाहुनक राजस्थालनी कमानीदार जूताक बगल मेहुनकर बडीगार्ड एक हाथ मे गिलास तथा दोसर हाथ मे तौलिया मे लपटाओल स्कॉीचक बोतल नेने बैसल छल। बडीगार्डक हथियार यानी स्टेलनगन ओहि ठाम ओकर बगल मे पड़ल छलै।
विधायकजीक दोसर बडीगार्डडिब्बा क दरबज्जाड लगस्टेटनगन तनने आगन्तुपक महात्मानजीक रास्ताा रोकने कहि रहल छलै�देखता नहीं हैयह फस्टा क्लाबस हैदूसरे में जाओ।�
नवयुवतीक ध्यारन महात्माक दिस गेलै। ओ मूड़ी झुका खिड़की सँ महात्मा केँदेखबाक प्रयास केलक। मुदा अही प्रयास मेओकर उपरका दूटा खूजल बटनबला कमीज सँ गोल-मटोलचिक्कडनविधायकजीक करेज मे बरछी भोंकैबलाविद्यापतिक जुगल कुच छहलि कबाहर आबि गेलनि। नवयुवती झपटि कअपन वस्त्राग दुरुस्तक केलनि आ खिड़की सँ मुँह सटा कजोर सँ बाजि उठलीह�स्वाछमीजी!�
जेना वीणाक सब तार एके बेर झंकृत भउठल होअयतहिना ओहि युवतीक स्व र-ध्वकनि सम्पूठर्ण निर्मली टीसनक प्लेूटफार्म केँ झनझना देलक।
टीसन पर लोकक भीड़ जमा भगेलै। लोक सबहक एक बिताक गरदनि मे तुलसीक कण्ठीसठरका चाननफहराइत टीक आओर फाटल आँखि। सब कियो ओहि फस्ट किलास डिब्बाल दिस ताकय लागल। ओहि विरान टीसन पर एहन अजगुत बात।
विधायकजीक बडीगार्ड अपन कर्तव्यक वहन करैत ओहि स्वातमीजी केँ डिब्बाी मे चढ़ै मे पूर्ण बाधा उपस्थित केने छल। युवतीक खिड़की दिस घुमलाक कारणे विधायकजीक तंद्रा एकाएक भंग भगेलनि। जखन सँ ओ अहि डिब्बास मे आयल छलाहहुनक समग्र चिंतनसांख्यकमार्गी जकाँओहि युवतीक उठैत-खसैतनोकदार खूंटी मे टाँगल छलन्हिब। व्यूवधानक कारणे प्रान्तथक महान आ यशस्वीय नेता केँ क्रोध भउठलनि। ओ खिसियाति बजलाह�काहे रोकते होआने दो।�
स्वायमीजी डिब्बााक भीतर आबि खाली तेसर बर्थ पर पलथी मारि कबैसि रहलाह। गाड़ी सीटी देलक आ धकधका कधक्काा दैत विदा भेल।
�स्वा‍मीजीकतके यात्राा में प्रस्थाँन कलियै अछि�प्रश्नक पुछैत युवती सुभ्य स्ति भकसोझ भेलीह। विधायकजीक आँखिक दूरबीन ठीक एंगिल मे आबि गेल। आब कोनो चिन्ताक नहि। ओ नीचा मे दाँत निपोरने बैसल बडीगार्डजे किछु काल पूर्व विधायकजी सँ आँखि बचा केँ स्कॉएचक बोतल सँ पैघ दू घोंट उदरस्ति कचुकल छलसँ कहलनि�रहमानदवा दो।�

(अगिला अंकमे)
१.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
१.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मैथिली भाषा आ साहित्य
मिथिलाक भाषा मैथिलीक एहि व्यापकताकेँ सर्वप्रथम डॉ. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन लक्ष्य कयलनि। १८८० ई. मे अपन “बिहारी भाषा”क व्याकरणक भूमिका ओऽ लिखलनि जे “निकट भूतमे मिथिलाक भाषापर पश्चिमसँ भोजपुरी अधिकार कऽ लेलक अछि आऽ बदलामे ई गंगा पार कऽ गेल अछि आर उत्तर परगना तथा मुंगेर एवं भगलपुरक ओहि भागपर अधिकार कऽ लेलक जे गंगाक दक्षिणमे पड़ैत अछि। ई कोशीकेँ पार कऽ पूर्णियाँ धरि पसरि गेल अछि”। ओऽ पुनः १९०३ ई. मे गंगाक दक्षिण भागलपुर एवं मुंगेरक अतिरिक्त संथाल परगनाक पश्चिमोत्तर भागकेँ मैथिली कहलनि।
अतएव मैथिल संस्कृति आऽ मैथिली भाषा मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ विशेष व्यापक अछि। मैथिली भाषा सम्बन्धी सीमापर जखन विचार करब तखन पायब जे मैथिलीक पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी तथा दक्षिणी सीमापर क्रमशः भोजपुरी, बाङला, नेपाली आऽ मगही भाषा स्थित अछि। अपन निजी क्षेत्रमे मुण्डा आऽ संताली एहि दुनू अनार्य भाषासँ मिलैत अछि। ई कहब निरर्थक अछि जे अपन पड़ोसक भाषासँ सीमापर ओहिसँ मिश्रित भऽ जाइत अछि आर ओहि क्षेत्रमे ई कहब कठिन अछि जे बाजल गेनिहार भाषा ओहि भाषादिसँ प्रभावित मैथिलीक उपभाषा थिक वा नहि।
मैथिली मुख्यतया उत्तर-पूर्वक बिहारक आदिवासी लोकनिक मातृभाषा थिक। बिहार प्रान्तक मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण, बेगुसराय, खगड़िया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णियाँ, किशनगंज, कटिहार, मुंगेर, भागलपुर, लखीसराय, शेखपुरा, बाँका, आर झारखण्ड प्रदेशक संथाल परगना, गोड्डा, देवघर, जामताड़ा इत्यादि जिलामे ई भाषा बाजल जाइत अछि। एहि भाषाकेँ ई श्रेय छैक जे ई अन्तर्राष्ट्रीय भाषाक रूपमे नेपालक रोतहट, सरलाही, सप्तरी, महोत्तरी आऽ मोरंग आदि जिलामे बाजल जाइत अछि। एहि भाषा-क्षेत्रक उत्तरमे मगही आर ओड़िया तथा पश्चिममे हिन्दी अछि। प्राचीन कालसँ लऽ कए आधुनिक काल धरि भाषातत्वविद् लोकनि एकर बोली उपरूपक तालिका प्रस्तुत कएलनि अछि। एकर निम्नांकित उपरूप अद्यापि उपलब्ध अछि: मानक मैथिली, दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, पश्चिमी मैथिली, छेका-छीकी मैथिली, जोलही बोली आऽ केन्द्रीय वर्त्तात्मक मैथिली।
(अगिला अंकमे)

२. डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
मैथिली तँ आब संविधान स्वीकृत भाषा भ’ गेल अछि, सन्‌ १९५७मे,
जहिआ ई उपन्यास लिखल गेल छल, से बात नहि छलै; मैथिली भाषाक अधिकार लेल खूब-बर्चा होइ छलै। प्रवासी मैथिल लोकनि शहर-शहरमे भाषाई समिति बनबै छलाह। ओही समितिक माध्यमे किछु गोटए अस्तित्व रक्षा करै छलाह, किछु अस्मिता निर्माण; किओ अपन राजनीतिक उत्थान करै छलाह, किओ अकादमीक उन्नति; किओ कुण्ठा मेटबै छलाह, किओ रास-विलास; मुदा थोड़े लोक लेल धन्न सन। किऐ तँ ओ भूखसँ व्याकुल रहै छल। कहाँ दन कुरुक्षेत्रामे भूख लगला पर गान्धारी अपन बेटा सभक लहासक ढेरी पर चढ़ि फल तोड़ए लागल छलीह। भूख, मनुष्यक विवेक आ सम्वेदनाकें एहि तरहें आन्हर करैत अछि। एहना स्थितिमे भाषाक लड़ाइ लड़’ लेल के जाएत? सोलह आना सत्य वचन थिक जे हरेक एहि तरहक आन्दोलनमे मुख्य रूपें लोक अपन-अपन लड़ाइ लड़ैत रहल अछि। संयोग थिक जे ई भाषाई आन्दोलन छल। जँ नहिओ रहितए तँ लोक कोनो आओर बाट ताकि लितए, जेना एखन लोक ताकि रहल अछि। भारतीय स्वाधीनताक बाद भारतीय नागरिकक विवेक एते बेसी आत्मकेन्द्रित भ’ गेल, जे ओ समस्त आन्दोलनमे अपनाकें जोड़ि कए अपन लिप्सा आ कुण्ठामे तल्लीन भ’ गेल। अपन स्थान तकबामे आ सुरक्षित करबामे लीन भ’ गेल। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय लेखक मनुष्य जातिक अही वृत्तिकें उजागर करबामे लागल रहलाह अछि।
कलकत्ताक मैथिल समितिक भाषाई आन्दोलन, एहने आन्दोलन थिक, जाहिमे भुवनजी सगरो समाजमे बेस प्रतिष्ठित आ निविष्ट मानल जाइ छथि; मैथिल, मैथिली, आ मिथिलाक हित लेल बेस उदारतासँ काज करै छथि; लोक सब खूब मान-आदर करै छनि। मुदा ओएह लोक सभ जहिना सभा सोसाइटीक प्रेमिका, उदात-यौवना निर्मलाजीकें भुवनजी संग उठैत बैसैत देखै छथि कि सगरो मैथिल समाज चर्चा कर’ लगैत अछि जे हुनकर अपन स्त्राी महान कुरूपा छथिन तें निर्मलाजीक आँचर कसि क’ धएने छथि।
नीलू, विष्णुदेव ठाकुर संग सिनेमा देखब पसिन नहि करै छथि, मुदा अन्हार रातिमे जखन देह व्याकुल करै छनि, तँ निर्वस्त्रा भेल कमलजीक अन्हार कोठलीमे पहुँचि जाइ छथि। सामाजिक यथार्थ आ दैहिक यथार्थक एहि तरहक निरूपण आन्दोलन उपन्यासकें ठोस, आ महत्त्वपूर्ण साबित करैत अछि। उपन्यासक कथाभूमि कलकत्ता थिक, मुदा कथाक जीवन पूर्ण रूपें मैथिल थिक। जीवन-यापन आ आत्म-स्थापन हेतु कलकत्ता शहरमे संघर्षरत मैथिलक स्वभाव, जागरूकता, आलस्य, उदारता, राग-द्वेष, मनोवेग, उन्माद, भाषा-प्रेम, स्वार्थ-सिद्धि हेतु चलाओल भाषाई आन्दोलनक र्छंि, आत्मविज्ञापन हेतु यत्रा-कुत्रा पाँखि पसारबाक ललक, फैंटेसी… समस्त स्थितिकें सूक्ष्मता आ मार्मिकतासँ एतए रेखांकित कएल गेल अछि। मैथिलीमे एहि कृतिकें पहिल राजनीतिक उपन्यास घोषित करबामे कोनो कोताही नहि हेबाक चाही। उपन्यासकार स्वयं एकरा प्रथम राजनीतिक उपन्यास अथवा राजनीतिक पर्यवस्थितिमे लिखल गेल प्रथम वृतान्तक उपन्यास’ कहलनि अछि।

समाज-व्यवस्थाक नियम अछि जे मनुष्य ÷प्रभुत्व’ आ ÷प्रतिष्ठा’ अर्जित करए चाहैत अछि। अही दुनूमे कतहु ÷चरित्रा’ सेहो नुकाएल अछि। ÷प्रभुत्व’, ÷प्रतिष्ठा’ आ ÷चरित्रा’–ई तीनू पद व्यावहारिक जीवनमे बड़ अमूर्त्त सन अछि। ई तीनू वस्तुतः की थिक? केहन चरित्राक मनुष्यकें केहन प्रतिष्ठा भेटतनि? कतेक प्रतिष्ठा अर्जित केलासँ मनुष्यकें कतेक प्रभुत्व हएत? कतेक प्रभुत्व आ प्रतिष्ठाधारी व्यक्तिक चरित्रा केहन हएबाक चाही?–अइ प्रश्नावलीक उत्तर कोनो समाजक आचार संहितामे स्पष्ट नहि अछि। मुदा लोक निरन्तर फिल्मिस्तानक ÷मुन्ना भाइ’ जकाँ लागल रहै’ए। अपन आचरणक श्रेष्ठताक व्याख्या अपना तरहें करैत रहै’ए। आन्दोलन उपन्यासक कमलजी, भुवनजी, निर्मलाजी, सुशीला, नीलू, हेम बाबू… सबहक आचरण देखि उपन्यासकार राजकमल चौधरीक मोनमे जे ओझराहटि उपजै छनि, तकरे उघार करबाक प्रयास एहि उपन्यासमे कएल गेल अछि। धन्य छथि ओ समीक्षक, जिनका अइ उपन्यासमे एकसूत्राताक अभाव बुझाइ छनि।…वस्तुतः मनुष्यक मूल प्रवृत्ति थिक जिजीविषा; आ तकर प्राथमिक शर्त थिक–रोटी, सेक्स, सुरक्षा। एहि तीनू आश्यकताक पूर्ति हेतु दुनियाँक प्रत्येक प्राणी चुट्टीसँ बाघ, बाघसँ नढ़िया, नढ़ियासँ मनुक्ख भ’ जाइए। जीवनक समस्त छल, र्छंि, ईर्ष्या, द्वेष, उदारता, ईमानदारी, त्याग, तल्लीनता, भय, साहस, स्पष्टता, प्रवंचना, खोशामद, ललकार, टोप-टहंकार, धर्म-पाखण्ड, नीति-विचार, दान-दक्षिणा, लूट-बटमार… आदिक स्वांग अही निमित्त करै’ए; सफल-असफल होइ’ए। सफलताक अहंकारमे उन्मादित रहै’ए, असफलताक कुण्ठामे गन्हाइत रहै’ए। बिसरि जाइ’ए जे अइ सफलातक मार्गमे ओ कतेक हीन भेल अछि, अथवा असफल होइत केतक नमहर भेल अछि। सम्पूर्ण ÷आन्दोलन’ उपन्यास मानव जीवनक अही जटिल-गुत्थीक गाथा थिक। हमरा जनैत अइ उपन्यासक आश्रय-वृक्ष ÷मैथिल समिति’ टा नहि रहितए तँ भाषा परिवर्त्तन क’ कए एकरा सम्पूर्ण संसारक अथवा सम्पूर्ण मानवीय वृत्तिक कोनहुँ भाषाक उपन्यास कहल जा सकै छल।
मैथिलीमे तँ निश्चिते आन्दोलन उपन्यास एकटा नव शुरुआत थिक। आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल जएबाक अछैत एहिमे कतहु आत्मश्लाघा अथवा आत्मसंकोचक स्वाभाविक त्राुटि नहि आएल अछि। कथावाचक कमलजी कलकत्ता महानगरमे आत्म-स्थापनरत छथि, भाषाई आन्दोलनमे सहभाग-सहकार द’ रहल छथि, आन्दोलनी परिवारक हरेक व्यक्ति लेल तटस्थ आ ईमानदार आचरण रखै छथि। सम्पूर्ण उपन्यासमे कतहु स्पष्ट नहि होअए दै छथि जे ओ स्वयं किनका पक्षमे छथि। जे भुवनजी हुनका कलकत्ता महानगरमे पैर रोपबाक आधार देलकनि, नैतिक समर्थन देलकनि, स्नेह-प्रेम देलकनि, मान-सम्मानक मार्ग प्रशस्त केलकनि, तिनकहु लेल ओ कतहु पक्षपातक स्थिति अपन कथावाचनमे नहि आबए देलनि। नीलू, निर्मला, सुशीला… तीनू तीन आचणक स्त्राी छथि; तीनूक खोंइचा छोड़ा क’ राखि देलनि, मुदा किनकहु पर अपन निर्णायक वक्तव्य नहि देलनि। स्वयं बदनाम गली धरि गेलाह, तकरहु उजागर करबामे संकोच नहि केलनि। लक्ष्य संधान छलनि मानवीय वृत्तिक स्पष्ट नक्शा उतारबाक, से अइ तटस्थ भावे टासँ सम्भव छल। इएह कारणो थिक जे आइ आ आइसँ पहिनहुँ अइ उपन्यासमे मूल मानवीय वृत्तिक एते रास छवि देखाइत अछि, देखाइ छल। महानगरीय परिवेशक प्रवासी मैथिल द्वारा चलाओल जा रहल भाषाई आन्दोलन एहि उपन्यासक आश्रय-वृक्ष भने रहल हो, मुदा सम्पूर्णतामे ई मिश्रित चित्रा खण्डक कथ्य-बहुल उपन्यास थिक, जाहिमे क्षुधा, आत्म-सुरक्षा आ यौन-पिपासाक चारू भर चित्राखण्डक समायोजन भेल अछि। तथापि कथ्य एकटा सुगठित कौशलसँ रचल यथार्थ उद्बोधित, समाज सम्मत, विश्वसनीय वृत्तान्तक रूपमे सोझाँ आएल अछि।
रचनाकालक दृष्टिएँ ÷आन्दोलन’ ÷आदिकथा’सँ पूर्वक उपन्यास थिक, मुदा विषय आ शिल्पक दृष्टिएँ ई बेसी प्रगतिशील, आधुनिक, आ ऊर्ध्वोन्मुखी अछि।
कोनो उपन्यास मनुष्य, मानवीय जीवन, जनजीवनक सामाजिक व्यवस्था आ ओकर वातावरणक कथा कहैत अछि। एहि अर्थमे उपन्यासमे ठाढ़ मनुष्यक क्रिया-कलापहिसँ उपन्यासक गरिमाकें चीन्हल-बूझल जा सकैत अछि आ उपन्यासकारक रचना-दृष्टिक मूल्यांकन कएल जा सकैत अछि। अर्थात्‌ चरित्रा-चित्राण जाहि कृतिमे जतेक सन्तुलित आ स्पष्ट हएत ओहि कृतिक उद्देश्य आ वातावरणकें ओतेक स्पष्टतासँ बूझल जा सकत। सामान्यतया रचनाकार लोकनि अपन सृजित पात्राक चरित्रा पर समग्रतामे अपन टीका दै छथि। केहन लोक छथि, कते पढ़ल छथि, कोना कमाइ छथि, कोना खाइ छथि, की करै छथि…। चाही तँ सुविधा लेल एकरा व्याख्यापरक चरित्रा-चित्राण कहल जा सकैत अछि, मुदा एहिसँ बेसी सुविधा होइत अछि, पात्राक आचरण आ कथोकथनक आधार पर ओकर चरित्रा बुझबामे। एहिमे भावक लोकनि पात्राकें अपना नजरिएँ चिन्हबाक चेष्टा करै छथि। प्रायः इएह कारण थिक जे नाटक, अथवा नाटकीय शैलीक कृतिमे चरित्रा चित्राणक सुविधा बेसी भेटैत अछि। खास क’ कए मनोविश्लेषणात्मक चरित्रा-चित्राण करबाक पर्याप्त सम्भावना रहैत अछि। इहो कहब समीचीन होएत जे राजकमल चौधरीक रचनामे अकारणे एते कथोपकथन नहि रहैत अछि। नाटकीय शैलीक एहि उपन्यासमे पात्राक मनोविश्लेषणक प्रभूत व्यवस्था अछि। रचनाक नायक-नायिका आ सहयोगी लोकनि पारस्परिक वार्तालाप आ अपन क्रिया-कलापसँ जते तरहें अपन चारित्रिाक सीमा अंकित करैत’छि रचनाकार स्वयं टीका द’ कए ओते विस्तारसँ कहिओ नहि कहि सकै छथि। एहिसँ कृति संक्षिप्त, दीप्त आ प्रभावकारी सेहो होइत अछि। सम्भवतः इएह कारण थिक जे राजकमल चौधरीक उपन्यास आकारमे एते छोट होइत अछि आ प्रभावमे एते विराट। वार्तालापसँ मनुष्यक सम्पूर्ण व्यक्तित्व ठाढ़ भ’ जाइत अछि। शिल्प, शैली, वाक्य-संरचना, शब्द-चयन, सम्बोधन-अभिवादन, विषय आ विषयानुरक्तिसँ कोनहुँ व्यक्ति अपन सम्पूर्ण सोच-समझ-आचरण, कौलिक आ व्यावहारिक संस्कार, आर्थिक-शैक्षिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करैत अछि। जेना आन्दोलन उपन्यासक पात्रा सब कएने छथि।
भाँगक निशाँमे मातल कमलजीक कोठलीमे अल्पवयस नीलू अर्धनग्न अवस्थामे पहुँच जाइत अछि। ओहि अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे नीलू, कमलजीकें ÷भैया’ कहैत अछि, मुदा सर्वस्व अर्पित करए चाहैत अछि। स्पष्ट अछि, जे किशोर वयक उन्माद आ उत्तेजनामे नीलू ÷सम्बोधन’ आ ÷क्रिया’क बीचक समन्वय बिसरि गेल अछि। जे कमलजी यौन पिपासा मेटएबा लेल देह-व्यापारमे लिप्त स्त्राीक खोली धरि पहुँचि जाइ छथि, से कमलजी भाँगक घनघोर निशाँमे मातल छथि, आ अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे समर्पित नीलूकें बुझा-सुझा क’ आपस क’ दै छथि (आन्दोलन/पृ. ५०-५१)। मैथिलानी वेश्याक ताकमे जखन कमलजी बनगामबालीक खोलीमे पहुँचै छथि तँ सम्पूर्ण नक्शा उनटि जाइत अछि, हुनक विषय-वासना करपूर जकाँ बिला जाइत अछि (पृ. ३५-३७)। अइ वार्तालापमे आ एहने कतोक वार्तालापमे व्यक्ति, समाज, व्यवस्था, वातावरण आ मनोवेगक जतेक स्पष्ट छवि अंकित भेल अछि, ततेक स्पष्ट करब आन कोनो माध्यमे
असम्भव छल।
एतए नीलूक किशोरावस्था आ काम-पिपासा नीलूकें आन्हर क’ देने अछि। ÷भैया’ सम्बोधनक बादहु यौनाचार प्रतिवेदन अनर्गल थिक, मुदा एतए नीलूक वयसोचित उन्माद आ अपरिक्वतामे उचितानुचितक विवेक नुका गेल अछि, जे सहज अछि, सम्भाव्य अछि। मुदा तें, नीलूक चरित्रा घृणित नहि कहल जा सकैत अछि। अपरिपक्व रहितहुँ ओ सर्वस्व-अर्पण हेतु पात्रा-चयनमे असावधान नहि अछि, भुवनजीक आवासीय परिसरमे आओर कतोक पुरुख, मैथिल पुरुख बिलमल छथि, तिनका संग ओ एना नहि केलनि; महानगरीय वातावरणक विकृतिमे ओ निर्मलाजी अथवा सुशीला नहि बनि गेलीह। नीलूक समर्पणकें अस्वीकार करबाक अर्थ कमलजीक नपुंसकता अथवा निष्काम वृत्ति नहि थिक। से रहितथि तँ कमलजी वेश्यालय नहि जैतथि। मुदा कमलजी कामातुर राक्षस नहि छथि। से रहितथि तँ ओ सुशीलाक राति किनलनि, हुनका संग सब किछु कइए क’ आपस होइतथि। समस्त मानवीय दुर्बलताक अछैत मनुष्यक विवेक ओकरा नैतिक रूपें विराट बनबैत अछि। समस्त दुर्बलता आ सबलताक सीमा बूझब समयक नायककें वास्तविक स्वरूप दैत अछि आ ओकर चारित्रिाक वैशिष्ट्य समकालीन समाजकें जीवन जीबाक दृष्टि आ नैतिक बल अनुसंधानक बाट देखबैत अछि। आन्दोलन उपन्यासक चरित्रा चित्राण तकरहि उदाहरण थिक।
(अगिला अंकमे)
1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
21.01.1990-पहिल सगर राति दीप जरय,मुजफ्‌फरपुर
64म-सगर राति दीप जरय
मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्तिे
रहुआ-संग्राम-11 नवम्बार, 2008
डा.रमानन्दष झा ‘रमण‘
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) संकलन-डा.रमानन्दअ झा ‘रमण‘
क.सं. स्थापन तिथि संयोजक अध्यसक्षता/उदघाटन पेाथी लेाकार्पण ल्‍ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्यल
1 2 3 4 5 6 7 8 9
1 मुजफ्फ8रपुर 21.01.1990 प्रभास कुमार चौधरी रमानन्दन रेणु – - शैलेन्द्रल आनन्दनक कथा
यात्रा-डा.रमानन्द0झा रमण’
2 डेओढ़ 29.04.1990 जीवकान्तर प्रभास कुमार चौधरी – - – -
3 दरभंगा 07.07.1990 डा.भीमनाथ झा/प्रदीपमैथिली पुत्र,
व्य्वस्थाद-विजयकान्तन ठाकुर
गोविन्द झा
1.सामाक पौती
2.मोम जकाँ बर्फ जकाँ
गोविन्द झा
अमरनाथ
डा.मुनीश्वार झा
प्रभासकुमारचौधरी
4 पटना 03.11.1990 गोविन्द् झा
व्यभवस्था.-दमनकान्तत झा
उपेन्द्र नाथ झा‘व्या-स’
एवं राजमोहन झा
- – - -
5 बेगूसराय 13.01.1991 प्रदीप बिहारी प्रो.रमाकान्तथ मिश्र 3.हमर युद्धक साक्ष्ये मे डा.तारानन्द वियोगी उपेन्द्रे दोषी -
6 कटिहार 22.04.1991 अशोक उपेन्द्र दोषी 4.ओहि रातुक भोर
5.अदहन
अशोक
शिवशंकर श्रीनिवास
डा.भीमनाथ झा
डा.रमानन्दझझा रमण
विभूति आनन्दरक कथा
यात्रा-डा.रमण
7 नवानी 21.07.1991 मोहन भारद्वाज प्रो.सुरेश्वतर झा 6.समाड. रमेश कुलानन्दड मिश्र -
8 सकरी 22.10.1991 प्रो.सुरेश्व्र झा
व्य्वस्था.-डा.राम बाबू
ए.सी.दीपक 7.साहित्या.लाप डा.भीमनाथ झा गोविन्दर झा
-
9 नेहरा 11.10.1992 ए.सी.दीपक मन्त्रे श्‍वर झा – - – -
10 विराटनगर 14.04.1992 जितेन्द्रा जीत डा.गणेश प्रसाद कर्ण
उद- गोविन्द1 झा
- – - नेपालमे मैथिली कथा -
डा.रमण
11 वाराणसी 18.07.1992 प्रभास कुमार चौधरी मायानन्दनमिश्र/गंगेश गुंजन
उद-ठाकुर प्रसादसिंहएवं
पं.रमाकान्तर मिश्र
- – - -
12 पटना 18.10.1992 राजमोहन झा स्‍ुाभाषचन्द्रझ यादव – - – -
13 सुपौल 09.01.1993 केदार कानन बुद्धिनाथ झा 8.पुनर्नवा होइत ओ छौंड़ी विभूति आनन्दस महाप्रकाश -
14 बोकारो 24.04.1993 बुद्धिनाथ झा गोविन्द झा – - – -
15 पैटघाट 10.07.1993 डा.रमानन्दद झा‘रमण‘ प्रो.उमानाथ झा 9.विद्यापतिक आत्मनकथा गोविन्दर झा प्रभासकुमारचौधरी -
16 जनकपुरधाम 09.10.1993 रमेश ंरंजन गोविन्दा झा
उद-डा.रामावतार यादव
10.श्वेडतपत्र
11.मिथिलावाणी-पत्रिका
12.गामनहि सुतैत अछि
13.मर्सिनी-उपन्या्स
स.ंवियोगी एवं रमेश
मिलाप,जनकपुरधाम
महेन्द्र मलंगिया
डा.अरुणकुमार झा
डा.धीरेन्द्र
धूमकेतु
गोविन्दआ झा
डा.रामावतार यादव
-
17 इसहपुर 06.02.1994 डा.अरविन्दन कुमार ‘अक्कू ‘ डा.भीमनाथ झा – - – -
18 सरहद 23.04.1994 अमियकुमार झा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ – - – -
19 झंझारपुर 09.07.1994 श्याेमानन्द‘ चौधरी जीवकान्त – - – -
20 घोघरडीहा 22.10.1994 जीवकान्तय राजमोहन झा 14.कथा कुम्भ सं.बुद्धिनाथ झा गोविन्दा झा -
21 बहेरा 21.01.1995 कमलेश झा श्याामानन्दन ठाकुर
उद-चन्द्रहभानु सिंह
15.सत्यच एकटा काल्पसनिक
विजय
सारस्वदत जीवकान्तक -
22 सुपौल,दरभंगा 08.04.1995 कमलेश झा प्रो.रामसुदिष्टर राय ‘व्या.धा
उद-गोविन्दा झा
- – - -
23 काठमांडू 23.09.1995 धीरेन्द्रश प्रेमर्षि डा.धीरेन्द्र 16.नख दर्पण गोविन्दि झा डा.यादव -
24 राजविराज 24.01.1996 रामनारायण देव डा.धीरेन्द्रा
उद-डा.योगेन्द्र6 प्र.यादव-
मुख्यव-गजेन्द्र नारायणसिंह,
मन्त्रीआ, नेपाल सरकार
- – - -
25 कोलकाता
रजत जयंती
28.12.1996 प्रभास कुमार चौधरी गोविन्दर झा
उद-यमुनाधर मिश्र
17.निवेदिता
18.कथाकल्पा
सुधांशु‘शेखर’ चौधरी
डा.देवकान्त‍ झा
गोविन्द9 झा
प्रभासकुमारचौधरी
-
26 महिषी 13.04.1997 डा.वियोगी/रमेश-
प्रायोजित
मायानन्दत मिश्र 19.अतिक्रमण
20.हस्त‍क्षेप
21.शिलालेख
22.परिचिति
डा.तारानन्द वियोगी
डा.तारानन्द वियोगी
डा.तारानन्द वियोगी
सुस्मि्ता पाठक
गोविन्दद झा
कुलानन्द‍ मिश्र
सुभाषचन्द्रच यादव
मोहन भारद्वाज
-
2
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
कसं.
स्थारन तिथि संयोजक अध्यएक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्‍ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य‍
1 2 3 4 5 6 7 8 9
27 तरौनी 20.06.1997
यात्रीजन्मौदिन
शोभाकान्तम जीवकान्त1 – - – -
28 पटना 18.07.997 प्रभास कुमार चौधरी हरिनारायणमिश्र/रामचन्द्रण खान 23.समानान्तरर रमेश प्रभास कुमार चौधरी -
29 ब्‍ेागूसराय 13.09.1997 प्रदीप बिहारी प्रफुल्लर कुमार सिंह ‘मौन’ 24.कुक्केरूकू आ कसौटी चन्देवश प्रभास कुमार चौधरी प्रभास कुमार चौधरीक
अन्तिसम सहभागिता
30 खजौली 04.04.1998 प्रदीप बिहारी रमानन्दह रेणु – - – -
31 सहरसा 18.07.1998 रमेश डा.महेन्द्र 25.ओना मासी डा.देवशंकर नवीन कुमारी ऋचा -
उद-गोविन्दा झा 26.चानन काजर डा.देवशंकर नवीन मायानन्दण मिश्र -
27.प्रतिक्रिया रमेश गोविन्द झा -
32 पटना 10.10.1998 श्या म दरिहरे राजमोहन झा
उद-गोविन्द झा
28.भरि राति भोर के.डी.झा,श्यारमदरिहरे एवं प्रदीप
बिहारी
उपेन्द्र नाथझा‘व्याडस’
33 बलाइन, नागदह 08.01.1999 पदम सम्भेव जीवकान्ति – - – -
34 भवानीपुर 10.04.1998 डा.जिष्णुम दत्त मिश्र कामिनी 29.काल्हि. आ आइ डा.धीरेन्द्रर जीवकान्त‍ -
35 मधुबनी 24.07.1999 सियाराम झा ‘सरस‘
व्यनवस्थाु-डा.कुलधारी सिंह
राजमोहन झा
उद-डा.जयधारी सिंह
30.काजे तोहर भगवान शैलेन्द्रं आनन्दु विभूति आनन्दि -
36 अन्दौ ली 28.10.1999 क्म लेश झा चन्द्रशभानु सिंह – - -
37 जनकपुरधाम 25.03.2000 रमेश रंजन डा.धीरेन्द्रर
उद-डा.राजेन्द्र. विमल
- – - -
38 काठमांडू 25.06.2000 .धीरेन्द्रम प्रेमर्षि डा.रमानन्दभ झा‘रमण‘ 31.मकड़ी प्‍ा्रदीप बिहारी महेन्द्रव मलंगिया
उद-महेन्द्र कुमार मिश्र, सांसद 32.मिथिलांचलक लोक क्रथा डा.गंगा प्रसाद अकेला डा.रमानन्द्झा‘रमण‘
33.शिरीषक फूल-‘अनुवाद अकेला डा.रमानन्देझा‘रमण‘
34.हम मैथल छी-कैसेट सियाराम झा‘सरस‘ डा.रामावतार यादव
35.मंडनमिश्र अद्वैतमीमांसा रमेश/दीनानाथ/सुरेन्द्रानाथ डा.रामावतार यादव
39 धनबाद 21.10.2000 श्यानम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास राजमोहन झा
उद-कीर्तिनारायण मिश्र
36.मनक आड.नमे ठाढ़ डा.भीमनाथ झा राजमोहन झा
40 बिटठो 21.01.2001 डा.अक्कू बलराम 37.मातवर अशोक डा.धीरेन्द्रर म्‍ैाथिली कथाक
व्यमवस्थान-प्रो.विद्यानन्द् झा उद-कुलानन्दअ मिश्र 38.दृष्टिरकोण सुरेन्द्रकनाथ डा.भीमनाथ झा समस्या डा.भीमनाथ झा
41 हटनी,घोघरडीहा 19.05.2001 प्रो.योगानन्द- झा/अजित कुमार
आजाद
सोमदेव – - – -
42 बोकरो 25.08.2001 गिरिजानन्दनझा‘अर्धनारीश्वडर दयानाथ झा 39.निष्प्रा ण स्व प्न‍ दयाकान्तश झा हरेकृष्‍ण मिश्र
व्यदवस्थान-मिथिला सां.परिषद उद-हरेकृष्णश झा,भा.आ.सेवा 40मिथिलादर्पण(1925/2001) पुण्यारनन्दभझा
स.डारमानन्दा झा ‘रमण‘
फूलचन्द्रा मिश्र ‘रमण‘
43 पटना
किरण जयन्तीा
01.12.2001 अशोक सोमदेव 41.प्रलाप गोविन्दि झा सोमदेव
च्‍ेातना समिति, पटना 42युगान्तषर विश्वृनाथ गोविन्द, झा
43एकैसम शताब्दीतकघोषणा पत्र रमेश/श्या‍म दरिहरे/मोहन यादव राजमोहन झा
44 राँची 13.04.2002 कुमार मनीष अरविन्दउ साकेतानन्द‍ 44चानन घन गछिया विवेकानन्द4 ठाकुर मोहन भारद्वाज
उद -परमानन्दी मिश्र 45.शुभास्तेर पन्थाकनः परमानन्दय मिश्र साकेतानन्दव
45 भागलपुर 24.08.2002 धीरेन्द्र् मोहन झा योगीराज 45.कथा सेतु सं.प्रशान्त‍ डा.बेचन
उद-डा.बेचन 47.प्‍ृाथा नीता झा राजमोहन झा
48.आउ, किछु गप्प7 करी कुलानन्दथ मिश्र डा.करुणाकर झा
3
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थापन तिथि संयोजक अध्य‍क्ष पेाथी लेाकार्पण ल्‍ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्यत
1 2 3 4 5 6 7 8 9
46 विद्यापतिभवन,
पटना
16.11.2002 अजित कुमार आजाद मोहन भारद्वाज
उद.राजनन्दतन लाल दास
49.काठ विभूति आनन्द‍ डा.तारानन्दअ वियोगी -
50.एक फाँक रौद योगीराज गोविन्दा झा -
51.तीन रंग तेरह चित्र डा.सुधाकर चौधरी सोमदेव -
52.उदयास्त धूमकेतु सोमदेव -
53.सांझक गाछ राजकमल,
सं.डा.दे.नवीन
रामलोचन ठाकुर -
54.सर्वस्वां त सकेतानन्दी सोमदेव -
55.अभियुक्तं.. राजमोहन झा सोमदेव -
56.यात्री समग्र सं.शोभाकान्तह गोविन्दव झा -
57.मैथिलीबाल साहित्या डा.दमन कुमार झा गोविन्दद झा -
58.ज्‍ीम ब्वंसवदपंस च्म तपचीमतलरू
प्उंोहपदह डपजीपसं ; 1875.1955द्ध
डा.पंकज कुमार झा डा.हेतुकर झा -
59.मैथिल समाज
पत्रिका, नेपाल
स.ंधीरेन्द्रु प्रेमर्षि – -
47 कोलकाता 22.01.2003 कर्णगोष्ठीप, कोलकाता डा.रमानन्दि झा‘रमण‘
उद-रमानन्द रेणु
60.आत्मामलाप गोविन्दु झा रमानन्दठ रेणु मैथिली कथाकवर्तमान
समस्याा-.डा.वियोगी
48 खुटौना 07.06.2003 डा.महेन्द्र नारायण राम सोमदेव/उद-खुशीलाल
झा एवं रामलोचन ठाकुर
61.लाख प्रश्नुअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर सोमदेव
49 बेनीपुर 20.09.2003 कमलेश झा डा.फूलचन्द्रर मिश्र‘रमण‘
उद-प्रो.रामसुदिष्टो राय ‘व्यानधा‘
- – - -
50 दरभंगा
स्वएर्ण जयन्तीा
21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्दम झा
उद-चन्द्रयनाथ मिश्र‘अमर‘
62.दिदबल प्रभास कुमार चौधरी गोविन्द‘ झा -
63.चितकावर हंसराज सोमदेव -
64.गंगा यन्त्ररनाथ मिश्र गोविन्द‍ झा -
65बाबाक विजया उमाकान्ता मार्कण्डे य प्रवासी -
66.सरिसब मे भूत श्यानम दरिहरे राजमोहन झा -
67.गहवर डा.महेन्द्र नारायण राम जयनारायण यादव -
68.हाथी चलय बजार डा.देवशंकर नवीन राजमोहन झा -
69.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा‘सरस’ डा.रमानन्दन झा‘रमण‘ -
70.आदमी के ँ जोहैत कीर्तिनारयण मिश्र मोहन भारद्वाज -
71.ओना कहबा लेल बहुत
किछु हमरा लग
कुलानन्दा मिश्र कीर्तिनारयण मिश्र -
72.गाछ झूलझूल जीवकान्त् गोविन्दर झा -
73.खंजन नयन निरंजन अनंत बि.लाल.इन्दुज’ चन्द्र नाथ मिश्र‘अमर‘ -
74.हम भेटब मार्कण्डेनय प्रवासी गोविन्दा झा
75.चिन्तटन प्रवाह डा.धीरेन्दिनाथ मिश्र्र राजमोहन झा
76.दुर्वासा जयनारायण यादव गोपाजी त्रिपाठी
77.पाथर पर दूभि रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास
78.कोशी घाटी सभ्यमता रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास
79जागि गेल छी डा.महेन्द्र ना.राम डा.रामदेव झा
4
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थापन तिथि संयोजक अध्यरक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्‍ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्यम
1 2 3 4 5 6 7 8 9
50 दरभंगा 21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्दे झा
उद-चन्द्र नाथ मिश्र‘अमर‘
80.हमरा मोनक खंजन चिडैया फूलचन्द्र मिश्र प्रवीण‘ मार्कण्डेाय प्रवासी
81.जयमाला जयानन्द मिश्र चन्द्रशनाथ मिश्र ‘अमर‘
82.माटिक आबाज मंजर सुलेमान मोहन भारद्वाज
83.इजोरियरक अंगैठी मोर स.ं माला झा अशोक
84.बेसाहल डा.रमानन्द झा‘रमण मार्कण्डेशय प्रवासी
85.यदुवर रचनावली डा.रमानन्दा झा‘रमण गोविन्दा झा
86सगरराति दीप जरयक इतिहास डा.रमानन्दा झा‘रमण रमेष
87.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्र् मिश्र‘रमण‘ डा.रमानन्दव झा‘रमण
88.विमर्श डा.भीमनाथ झा डा.देवेन्द्रम झा
89.स्मररणक संग डा.विभूति आनन्दर रतीष चन्द्रम झा
90.कथा काव्या आ द्वादशी डा.अरुण कुमार कर्ण रमानन्द् रेणु
91.तात्पार्य डा.अशोक कुमार मेहता अंजलि मेहता
92हेमलेट प्‍ा्रेा.रमाकान्ता मिश्र नीलमणि बनर्जी
93.लोरिक मनियार चन्दे्ेरश गोविन्दर झा
94.कनुप्रिया अनु.श्यादम दरिहरे श्याामसुन्दनर मिश्र
95.मन्दारकिनी प्रभास कुमार चौधरी चन्द्र नाथ मिश्र ‘अमर‘
96.सीता व्य‍था कथा अनन्ता बि.लाल दास‘
इन्दु ‘
डा.रामदेव झा
97.नागार्जुन के उपन्या स मोहित ठाकुर डा.सुरेश्वरर झा
98.ैमसमबजमक च्व मउे वि ।उंत रमम म्‍ुारारि मधुसूदन ठाकुर .
99.अंतरंग हिन्दीउ पत्रिका.मैथिली
विशेषाक
स.ंप्रदीप बिहारी रमानन्द रेणु
51 जमशेदपुर 10.07.2004 डा.रवीन्द्र कुमार चौधरी स्‍ुारेन्द्र पाठक
उद-राजनन्दरनलाल दास
मु.अति..सत्यलनारायण लाल
- – - -
52 राँची 02.10.2004 विवेकानन्दा ठाकुर डा.रमानन्दण झा‘रमण 100.स्वारस स्वामस मे विश्वा)स विवेकानन्दन ठाकुर डा.रमानन्द झा‘रमण
उद-राजनन्दरन लाल दास 101.सम्प‍र्क-4 स.-सियाराम झा ‘सरस‘ राजनन्द न लाल दास
53 देवघर 08.01.2005 श्याकम दरिहरे एवं
अविनाश
दयानाथ झा
उद-यन्त्रदनाथ मिश्र
- – - -
54 बेगूसराय 09.04.2005 प्रदीप बिहार रामलोचन ठाकुर
उद-सत्य नारासयण लाल
102.भजारल डा.रमानन्दण झा‘रमण कीर्तिनारयण मिश्र
103.सरोकार प्रदीप बिहार राजमोहन झा
104.औरत म्‍ेानका मल्लि क ज्यो‘त्सिना चन्द्रचम
105.अन्तमरंग पत्रिका स.ं प्रदीप बिहारी डा.आनन्दरनारायण शर्मा
55 प्‍ूार्णियाँ 24.06.2005 रमेश साकेतानन्द्
56 पटना 03.11.2005 अजीत कुमार आजाद उद.गोविन्द् झा 106.अतीतालोक गोविन्दस झा राजमोहन झा
डा.फूलचन्द्र3 मिश्र ‘रमण’ 107.गामक लोक शिवशंकर श्रीनिवास डा.रमानन्दवझा‘रमण’
108.मैथिली कविता संचयन सं.डा.गंगेशगुंजन छठज्‍ गोविन्दर झा
109.मैथिली कथासंचयन छठज्‍ स.ंशिवशंकरश्रीनिवास राजमोहन झा
110.बड अजगुत देखल शरदिन्दुर चौधरी फूलचन्द्रक मिश्र ‘रमण’
111.किछ ुपुरान गप्पर ,किछु
नव गप्पझ
कीर्तिनाथ झा गोविन्द झा
57 जनकपुरधाम 12.08.2006 रमेश रंजन महेन्द्रशमलंगिया,उद-डा.रेवतीरमण
लाल वि.अ.-डा.रमानन्दुझा‘रमण‘
- ‘ – -
5
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थापन तिथि संयोजक अध्यदक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्‍ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्यी
1 2 3 4 5 6 7 8 9
58 जयनगर 02.12.2006 श्री नारायण यादव
अध्य3.-डा.कमलकान्ता झा
उदघाटन-रामदेव पासवान
मु.अ.-भगीरथप्रसाद
अग्रवाल
. . . .
59 बेगूसराय 10.02.2007 प्रदीप बिहारी नवीन चौधरी 112.स्ने हलता डा.योगानन्दअ झा डा.तारानन्दद वियोगी
60 सहरसा 21.07.2007 किसलय कृष्णर उद.डा.मनोरंजन झा
अध्य..डा.रमानन्दक झा‘रमण‘
113.अक्षर आर्केस्ट्रा अनु-प्रदीप बिहारी डा.रमानन्द. झा ‘रमण‘
61 सुपौल 01.12.2007 अरविन्दब ठाकुर उद-डा.धीरेन्दड धीर
अध्य.. अंषुमान सत्यनकेतु
114.अन्हाुरक विरोध मे अरविन्दन ठाकुर अजित कुमार आजाद
62 जमष्‍ोदपुर 03.05.2008 डा.रवीन्द्र कुमार चौधरी उद-विद्यानाथ झा‘विदित’
अध्य.क्ष-विवेकानन्दअ ठाकुर
- – - -
63 राँची 19.07.2008 कुमार मनीष अरविन्दु उद-.डा.विदित
अघ्य . विवेकानन्दअ ठाकुर
एवं डा.रमानन्दक झा‘रमण’
115.समय षिला पर सुरेन्द्रानाथ डाविद्यानाथझा‘विदित’
64 रहुआ संग्राम 08.11.2008 डा.अषोक कुमार झा‘
अविचल’

(अगिला अंकमे)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२-part iii

In विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२ on जनवरी 13, 2009 at 4:59 अपराह्न

विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२-part-iii

धर्मेन्द्र विह्वल-जन्म विक्रम सम्वत २०२३-१२-०४, बस्तीपुर सिरहा,शिक्षा : एम ए ( मैथिली/राजनीतिशास्त्र ),डिप्लोमा ईन डेभलपमेन्ट जर्नालिज्म,प्रकाशित कृति : एक समयक बात (वि स २०६१ मैथिली हाईकु संग्रह ),रस्ता तकैत जिनगी (वि स २०५०/ कविता संग्रह ),एक सृष्टि एक कविता (२०५७/ दीर्घ कविता ),हमर मैथिली पोथी ( कक्षा 1 सं ५ धरिक पाठय पुस्तक ),सम्प्रति : सभापति, नेपाल पत्रकार महासंघ

किछु छौंक

१) बदनामी–

प्रेम आ सिनेहकेँ
सरेबजार
निलाम नहि करू
गौरवमय इतिहासकेँ
एना बदनाम नहि करू ।

२) विज्ञापन

जानि नहि
आदमीक जंगलमे
हम कतय
हेरा रहल छी
अखवारक ढ़ेरमे
हम जिनगीक विज्ञापन
ताकि रहल छी ।

३) इज्जत

खुलेआम इज्जत
बिका रहल अछि
दाम दऽ
झट कीनि दिअ
जल्दि करू
स्टक सीमित अछि ।
जितमोहन झा घरक नाम “जितू” जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि।
दुनियाँक सभ फूल,खुशबू, आर बहार !
अपनेक मिले इ सभ उपहार !!
आसमाँ के चाँद, आर सितारा !
एय सब सँ अपने करू श्रृंगार !!
अपने खुश रही, आवाद रही !
ख़ुशी के एहेंन हुवे फुहार !!
हमर एहेंन दुवा अछि हजार !
दामन अपनेक कम परे ….
जीवन मेंs अपनेक मिले एतेक प्यार !!
मंजिल आसान सभटा, मुस्किल बेनूर हुवे !
दिलक जे भी अछि तम्मना ओ हमेशा दूर हुवे !!
होठ पर होथक बात हुवे, ख़ुशी मेंs समटल जिन्दगी !
गम भरल परछाई अपनेक आँचल सँ लाखो दूर हुवे !!
फूलक तरह मह्कैत रहू, सितारा के तरह चमकैत रहू !
हमर एतबे दुवा अछि अपनेक लेल ….
अपने जाते भी रही, हरदम चाह्कैत रहू !!
लौटक आयब एक दिन, जरुर हमर यकींन करब !
हमर याद आबे तँ आइख अपन नै कहियो नम करब !!
दुनियाँ साजिश केs कs जुदा नै के दिए हमरा !
कियो किछ भी कहे अपने भरोसा नै करब !!
फुरसत के लम्हा मेंs ख़त लिखब अपने कs मुदा !
हर दिन अपने हमर खतक इंतजार नै करब !!
हाथ मेंs पहिरने कंगना छी, आर कान मेंs पहिरने बाली !
हम विदेहक लेल अहिना लिखेत रहब, चाहे नव वर्ष होई या दिवाली !!

१.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी
श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ – ०७ – १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ”हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन।
(१०/०२/९१)
चलू देखैब अपन गाम अय
ये बम्बई के कनियाँ देखल अहाँ दुनियाँ
चलू देखैब अपन गाम अय- गाम ये
तूबय जतय महु-आम ये। ये बम्बई…
पहिरी तऽ बेल बाँट ओढ़ी नई ओढ़नी
घोघमे अहाँ सँ सुन्नर नोकरनी
वैह थिक सीताक गाँम अय-गाँम ये।
तूबय…
भेटत जौं पोखरि मन्दिर देखू ओतय
भावहु भैंसुरसँ छुआई छै जत्तय
लै नञ पतिक केउ नाम अय- नाम ये।
तूबय जतय…
भैंसुर ससुर देवर बुझि नञ पड़ै एतय
देखबै पुरनियों मरौतो काढ़ै ओतय
पीबै छै भाँग, नई जाम अय, भाँग अय।
तूबय..
जकरा कही रोटी ओ छै सोहारी
तीमन कही हम अहाँ तरकारी
पहिरै छै पुरुख खराम अय- खराम अय।
भरिमन कनियाँ घुमू अहाँ बम्बई
आँगनसँ ओतय त कोनटामे जे बई
चलबै निहुरि नई, उदाम अय, उदाम अय!
तूबय…

सिनेमा २०.०९.९१
अछि प्रभाव पसरल सगरो, डिस्को धुनमे नाचय नङरो।
भारत भूषण के रोल एखन, होइछ पसन्द, ककरो-ककरो।
अछि प्रभाव…
अछि देखा रहल अमिताभ नाच, गाबय जहिना हो झूठ साँच।
अभिनेत्रीक कपड़ा बनल नाप, दू-दू मिलि कय भय जाइछ पाँच।
मुक्का , लोटा, सोटा सँ नई बाँचि कय होय आब झगड़ो
अछि..
भारत नाट्यम बिसराय रहल, बाजा एहनो केकियाय रहल
स्रोताकेँ कान उड़ाय रहल, बुझू ओहिना जे वज्र खसल
मुदा सुनत के अहाँक बात? भय रहल प्रशंसा तऽ ओकरो।
अछि प्रभाव…
हमर सभ्यता जाय रहल, पाश्चात्य सभ्यता छाय रहल,
संग एक टेबुलपर बैसि देखू , अछि खाय रहल भावहु भैंसुरो।
अछि प्रभाव..

दहेज १८.०९.९१
प्रण तऽ कयल बार-बार, पाओल अहाँक मधुर प्यार।
संग छोड़ि मझधार, गेलउँ कतय, कतय गेलउँ।
कतय गेलउँ कतय गेलउँ
गेलउँ कतय कतय गेलउँ
रे जो हवा तोँ कहि कऽ आ, संवाद किछु जरूर ला,
छी अवला तऽ नारी हम, की यैह छी हमर बला?
कहब ई दर्द ककरा हम, कहब सुनत हँसत भला।
कहिहैं ई जरूर तूँ, एहन केना निठुर भेलउँ।
निठुर भेलउँ निठुर भेलउँ
कतय गेलउँ कतय गेलउँ
दहेज तऽ दहेज छै, की प्रेमसँ प्रहेज छै।
कमलकेँ रौँदि कऽ कतउ , की वीर केउ बनल ओ छै।
बालु के दिवाल जौँ बनल, ढहल ओ छै।
करू प्रयास खुद अपन, दहेज लय की प्रण केलउँ।
कतय गेलउँ कतय गेलउँ
गेलउँ कतय कतय गेलउँ
होइछ विवाह प्यार लय, उठबय घरक तऽ भार लय,
सोचनहुँ नञ छल हमर तऽ मन, छोद्अब अहाँ तँ कार लय,
हवा ठिठकि मुसकि कहय, नञ छल असल प्रणय।
दोष अछि तँ ई कार केँ, जगत के भार हम भेलहुँ
कतय गेलउँ कतय गेलउँ
गेलउँ कतय कतय गेलउँ

परदेश- २७.१२.८९ एवं ८.१.९०
पाहुन बनि निज गृह त्यागि अहाँ
कतबा दिन रहबै परदेशी।
बाबा बाबू सब छला वैह
होयत बेटा पुनि परदेशी॥
निज उद्यमके उत्थान करू,
मिलि शासक लग अभियान करू।
होयब गरीब नईं कोना हम?
हमरो श्रमपर अभिमान करू॥
भूमिक महिमा गुणगान केने
दुनियाँमे ककरा की भेटल?
गुणगान आर श्रमदान करू
वनि वीर जगतमे नाम करू।
सब किछु रहैत हम छी गरीब,
की बनल रहत एहिना नशीब?
पढ़ि-पढ़ि बच्चा ठोकर खायत
लय नाम अयाचिक जल पीब?
दुनियाँमे ककरा के देलक?
यदि देलक तऽ ओ भिक्षा थिक।
आश्रित बनि रही अगर सब दिन
थिक नई यथार्थ, नईं शिक्षा थिक॥
जागू-आ’ जगा दियौ सबकेँ
सुनू आ सुना दियौ सबकेँ।
निज पौरुष जे नईं चीन्हि सकल
ओऽ तऽ जगमे कायरता थिक

सड़क १९.०९.९१

हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक
मिथिला हो मद्रास मगध मथुरा
मदुरै मुम्बई (बम्बई) रोहतक। हम छी
कानी हकन्न मीलि कऽ हम सब
ढेकरि-ढेकरि ओ पीबय आशक,
मना रहल अधिकारी उत्सव।
जकरा घर लागल छल फाटक,
उड़ा रहल ओ मजा तऽ महलक,
हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक।
के देखैत अछि हमर ई दशा
टायर हो या लोकक आँगुर-
फटि-फुटि कय भय रहल दुर्दशा।
जनताकेँ तऽ अछि ई शोचक,
हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक।
परतन्त्र देश छल हमर मान छल,
छी चिक्कन हमरा गुमान छल,
स्नान करी नित हमर शान छल
अस्सी प्रतिशत भाग एखन
हमरा बनबयमे अछि चोरक।
हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक।
घरबैया जौं जागि जाईत अछि,
चोर फुर्र सँ भागि जाइत अछि,
आन्हरो बाजी मारि जाईत अछि।
जनतामे हिम्मत नई शोरक,
हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक।
२.हिमांशु चौधरी-पिता : स्वर्गीय कामेश्र्वर चौधरी,माताः श्रीमती चन्द्रावती चौधरी,जन्मः वि स २०२०/६/५ लहान, सिरहा,शिक्षाः स्नातकोत्तर(नेपाली),पेशाः पत्रकारिता (सम्प्रति : राष्ट्रिय समाचार समिति ),कृति : की भार सांठू ? (मैथिली कविता संग्रह ),विगत दू दशकसं नेपाली आ मैथिली लेखन तथा अभियानमे निरन्तर क्रियाशील आ विभिन्न संघ संस्थासं आबद्ध ।
की भार सांठू ?………
लाते लातसं घायल
लाशे लाशसं गन्हाएल
सङक्रान्तिक पीडामे
की भार सांठू ?………
थुराएल चानी
फ़ुफ़डिआएल अहिबक फ़ड
शोकाएल चाउर, पीपाएल आंजुर
दन्त्यकथाक पात्र जकां
कचोट द’ रहल अछि
गत्र गत्रमे बेधल भाला-गडांस
टीसे-टीसे द’ रहल अछि
फ़ाटल चिटल कपडा-लत्ता
मूंह कतहु, हाथ कतहु स्ट्रेमे राखल सिगरेटक ठुट्टीसन
लावारिस भ’ गेल इतिहासमे बहल नोर
फ़ेर एहिबेर सेहो बहि गेल
गन्हाएल लाशक भार कोनाक’ साठू ?………
अनिष्टकारी अमरौती पीने अछि
ओकरा लेल सत्यम,शिवम आ सुन्दरमक सर्जक बाधकतत्व
बाधकतत्व मरि जाए/माहुरे माहुर भ’ जाए
अन्यायक अमरलत्ती/द्रोपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए
एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती
कखनो बारुद फ़ेकैए/कखनो धराप रखैए
बारुद आ धरापमे पोस्तादाना कत’ ताकू
जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब
क्यानभासमे फ़ाटल गाछ देखि
अन्हडि-बिहाडि अएबे करत
विश्र्वासक जयन्ती अङकुरित भेल अछि
परन्च बहुतो धोएल सींथक सेनुरक
कारुणिकताक भार कोनाक’ साठू ?………

नियति
बिछानरुपी मशानमे अर्थहीन भ’
अपन लाशक कठियारी स्वयमसन भ’ गेल छी
इच्छासभमे पूर्णविराम लागि गेल अछि
तें
एकटा नियति भ’ गेल छी
हंसलासं मात्र नंहि
कनएटा पडैत अछि
कनैत कनैत थाकि जाइत छी
तखनो
शान्ति नहि
किछु मनोविनोद करएटा पडैत अछि
बनाबटी मुस्की छोडएटा पडैत अछि
धन्य कथा !
धन्य यथार्थ !!
तें
जीवन मृत्युमे लीन होइत जा रहल अछि
जीवन आ मॄत्यु मन्जिल होइत जारहल अछि
मैथिली साहित्य आ रंगमंच क्षेत्रक महिला विभूति
अणिमा सिंह
(१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका।
लिली रे
जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त।
शांति सुमन
जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य।
शेफालिका वर्मा
जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।
इलारानी सिंह
जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह।
नीरजा रेणु
जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो।
उषाकिरण खान
जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास।
प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’
जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित।
आशा मिश्र
जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह।
नीता झा
जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा।
ज्योत्स्ना चन्द्रम
मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान : मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता: श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र : अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,।
सुस्मिता पाठक
जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित।
बालानां कृते
१.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर
३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत।
( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा । मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक लेल किछु गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे जाहिसँ बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । )
१. प्रकाश झा
बाल-बुदरुकक लेल कविता
छैठ परमेसरी
आइ छै खड़ना खीर रातिमे, दादी सबके देतै
ढाकी, केरा,कूड़ा ल’ क’, घाट पर हमहू जेबै
भोरे – भोर सूरज के ,अरघ हमहू देखेबै
ठकुआ, मधूर, केरा, भुसवा हाउप हाउप खेबै .

२. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर
छेछन

चित्र ज्योति झा चौधरी
डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज बड्ड बलगर छलाह। मुदा हुनकर संगी साथी सभ कहलकन्हि जे जखन ओ सभ सहिदापुर गेल छलाह, बाँसक टोकरी आऽ पटिया सभ बेचबाक लेल तखन ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलन्हि। ओ एकटा अखराहा बनेने रहथि आऽ ओतए एकटा पैघ सन डंका राखल रहय। जे ओहि डंकापर छोट करैत छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, जकर नाम चटिया छल तकरासँ लड़ए पड़ैत छलैक। मानिकचन्द प्रण कएने रहथि कि जे क्यो चटियासँ जीत जाएत से मानिकचन्दसँ लड़बाक योग्य होएत आऽ जे मानिकचन्दकेँ हराएत से मानिकचन्दक बहिन पनमासँ विवाहक अधिकारी होयत। मुदा ई मौका आइ धरि नहि आएल रहए जे क्यो चटियाकेँ हराऽ कए मानिकचन्दसँ लड़ि सकितय।

दिन बितैत गेल आऽ एक दिन अपन पाँच पसेरीक कत्ता लए छेछन महराज सहिदापुर दिश विदा भेलाह। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि माँगलन्हि आऽ अपन चिलममे आगि आऽ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेलाह आऽ झुमैत डंकापर चोट कए देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आऽ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कए आयल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आऽ मानिकचन्द ओकरा ललकारा देलन्हि तँ चटिया दौगि कय छेछनपर झपटल मुदा छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि देलखिन्ह। फेर मनिकचन्द आऽ छेछनमे दंगल भेल आऽ छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि।
दिन बितैत गेल आऽ आब छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटए लगलाह। एहिना एक बेर यादवक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ ओऽ बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि अएलाह आऽ आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि। सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आऽ छेछनक गरदनिपर राखि देलक आऽ अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक।

३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
देवीजी :

चित्र ज्योति झा चौधरी
देवीजी : परीक्षाक तैयारी
परीक्षा लऽग आबि गेल छल।सब विधार्थी सब सचेत भऽ रहल छल। लेकिन ओहिमेसऽ किछु तेहेनो छल जे अतिशय चिन्तित छल जाहि कारण ओकरा सबके स्वास्थ्य सेहो बिगड़ि रहल छल। जखन देवीजीके अहि बातक जानकारी भेलैन तऽ ओ सबके परीक्षाक तैयारी करैके उचित तरीका सिखाबक निर्णय लेली।एक बड़का कोठलीमे सब बच्चा सबके बजौली आ अपन पाठन शुरू केली।पहिने तऽ ओ कहली जे साल भरि बैसल रहिकऽ अंतिम समय मे अधीर भेने किछु नहिं होइत छै।तकर बाद ओ मुख्य रूपसऽ तीन शीर्षक मे अपन विचार रखली :
1 परीक्षाक समय स्वास्थ्यक ध्यान: अहिलेल देवीजी निम्नलिखित परामर्श देली-(1) पर्याप्त भोजन करू।पढ़ाई के चिन्तामे खेनाइ-पिनाइ नहि बिसरू।समय बचाबै लेल दोसर काज बन्द करू जेनाकि कतौ घुमनाई, अनेरो लोक स गप करैमे समय बितौनाई।(2) बाहर के कीनल समान नहिं खाऊ।(3) बीच-बीच मे चलनाई-फिरनाई करैत रहू।भऽ सकैतऽ योग आ ध्यान करू।(4) हमेशा आशावादी रहू।मनुष के मस्तिष्क के क्षमता अपार छै।तैं किछु असम्भव नहिं छै मनुष लेल। (5) पर्याप्त मात्रामे सूतू।छऽ सऽ आठ घंटा जरूर सूतू।नींदके कमीसऽ एकाग्रतामे कमी आबैत छै।
२ पाठ स्मरण करक तरीका: (1) पाठके स्मरण करैलेल ओकरा बुझनाई आवश्यक अछि।अहिलेल शिक्षक सऽ सहायता लिय।एक दोसर के सेहो सहायता करू।गणित लेल अभ्यास आवश्यक छै। (2) स्मरण कैल पाठके बेर-बेर दुहराऊ तऽ ओ बिसरत नहिं। (3) एकरसता हटाबै लेल कनिक काल एकटा विषय पढ़लाक बाद फेर दोसर विषय पढ़ु।
३ अंतिम कालक पढ़ाई: (1) सब पाठके संक्षिप्त नोट बनाकऽ राखू आ परीक्षा लेल जायसऽ पहिने ओकरा पढ़ू, (2) जे प्रश्न कठिन लागैत अछि तकरा एक जगह लिखिकऽ राखू आ जायकाल पढ़ू, (3) रस्तामे सुरक्षाक ध्यान राखू , आ (4) कक्षामे बैसिकऽ कनिक काल ऑंखि मुनिकऽ वा अपन हाथ दिस ताकि ध्यान करू।अहि सऽ एकाग्रता आबैत छै।
देवीजीक अहि परामर्श सऽ सब बच्चाक बढ़िया मार्गदर्शन भेल।सब आगामी वार्षिक परीक्षाक तैयारीमे लागि गेल।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष
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भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा’ ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा “सुमन” ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।
ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल च