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विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5http://www.videha.co.in/

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 4, 2008 at 4:45 अपराह्न

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विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008)
संपादकीय
वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5
पिछला पक्षमे हम दरभंगा गेल छलहुँ, अपन भतीजीक विवाहमे। ओतय मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट आ’ संस्कृत विश्वविद्यालयक भ्रमण कएलहुँ।सर्वश्री भीमनाथ झा, मैथिलीपुत्र प्रदीप, रघुवीर मोची(अध्यक्ष,मैथिली अकादमी), विश्वनाथ झा(प्रतिकुलपति का. सि. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय), देवनारायण यादव( अध्यक्ष, मिथिला रिसर्च इंस्टीट्युट) लोकनिक दर्शनक सुअवसर प्राप्त भेल। फेर बिदेश्वरस्थानसँ आँगा गौरीशंकर स्थान( हैंठी बाली) गेलहुँ, आ’ ओतय पालवंशक मूर्त्ति आ’ ओहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल अभिलेखक चित्र खिंचलहुँ(फोटो मिथिलाक खोज स्तंभमे देखू)। ई मूर्ति भव्य अछि, आ’ 1500 वर्ष पूर्व मिथिलाक्षरक प्रभुता देखबैत अछि।एहि पर शोध लेख आँगाक कोनो अंकमे देल जायत। मिथिलाक इतिहासमे एहि स्थलकेँ आइसँ पहिने स्थान नहि देल जा’ सकल छल, आ’ ईहो तथ्य अछि जे इतिहासक विद्वान श्री डी.एन. झा अही गामक छथि, ओना हैठी बाली हमर मामा गाम सेहो छी। हम गेल तँ रही अपन भतीजी डॉ स्वीटी ठाकुर आ’ श्री प्रदीप कुमार झा, भा.प्र.से. केर विवाहमे मुदा बेशी काल अपन स्वार्थमे गाम-गाम घुमैत रहलहुँ, सरिसवक अयाची मिश्रक घरारी(सवा कट्ठा) देखल, नागेन्द्र कुमर जीक ससरफानी(स्वतंत्रतासँ पहिने प्रकाशित) ऊपर कएल, किछु मिथिलाक्षरक पांडुलिपिक इमेज लेलहुँ, मिथिलाक रत्नक पौतीकेँ समृद्ध करबाक हेतु सेहो ढ़ेर रास चित्रक संग्रह कएलहुँ आ’ दिल्ली दू गोट किताबक बोझक संग अएलहुँ। श्री विभूति आनन्द आ’ श्री धीरेन्द्र झा जीसँ भेँटक अवसर एहि हूलि मालिमे हाथसँ निकलि गेल।नेपालक मैथिलीक विद्वान लोकनिसँ संपर्क निरंतर होय तकर प्रयास सेहो शुरू कएलहुँ। जनकपुरमे तीनटा मैथिली एफ.एम. अछि आ, एकटाक निर्देशन श्री महेन्द्र मलंगियाजी कए रहल छथि।
अपनेक रचनाक आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
नई दिल्ली 01/03/08 গজেন্দ্র ঠাকুব
विदेह 01 मार्च 2008 वर्ष 1 मास 3 अंक 5
एहि अंकमे अछि:- 1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
2. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आँगा)
3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा)
4. कथा आर्या
5. पद्य -ज्योति झा चौधरी
-अन्यान्य कविता
6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) चित्रकार उमेश कुमार महतो
8. संगीत शिक्षा
9. बालानां कृते
10. पंजी प्रबंध (आँगा) – लेखक- विद्यानंद झा पञ्जीकार
11. मिथिला आ’ संस्कृत

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
13. रचना लिखबासँ पहिने… (आँगा)
14. प्रवासी मैथिल English मे

1. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
गणेष- ई अध्याय 4000 वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ’ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ’ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ’ गहूमक खेतीक प्रारंभाअ’ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभाअ’ अदल-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल।शिस्न देव पर जल आ’ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ’ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ’ पानिमे भिजा कय आगिमे पकायब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करयबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ’ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल।लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ 3500 ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ’ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पैलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर-आ’ बरदक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ’ जनक लंबवतक अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ’ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।

2.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि
दोसर साल फेर वैह मीटिंग, दुनू गामक स्कूलक मध्य, मुदा एहि बेर दोसर गाम बला टीम रस्ता बदलि लेलक। मारि बझब गाममे एकटा पर्वक जेकाँ छल। दुर्गास्थानमे चॉकलेटक बुइयाम फूटब, आ’ कोनो कटघरा किंवा टाटक खुट्टा उखाड़ि कय मारि-पीट शुरू भय जाइत छल। आ’ बादक जे गप्प होइत छल से मनोरंजक। एक बेर एकटा अधवयसू एक गोट नव-नौतारकेँ दू-चारि चमेटा मारि देलन्हि। बादक घटनाक हेतु हम कान पथने रही तँ हमर पितियौत ओहि गौआँकेँ पुछलखिन्ह जे वैह बात रहय ने। सभ क्यो एकमत रहथि जे वैह बात रहय। एहि बेर हम हारि कय पुछलियन्हि, जे वैह कोन बातअछि जे सभकेँ बूझल अछि, मुदा हमरा नहि बूझल अछि। ओ’ कहलन्हि जे एहि युवा पर बचियाक घटकैतीक हेतु ओ’ अधवयसू गेल रहथि, मुदा कथा नहि सुतरलन्हि। ओहि युवकक विवाह दोसर ठाम भय गेलन्हि, से तकरे कैन ल’ कय कोनो फुसियाहीक लाथ लय आइ ओकरा कुटलन्हि अछि। हम पुछलियन्हि जे जौँ विवाह भ’ जाइत तँ ससुर जमायक संबंध रहैत। तखन एहि फुसियाही गप प मारि बजरैत। सभ कहथि जे अहाँ तँ तेसरे गप पर चलि गेलहुँ। रातिमे नाटक देखैत अकाशमे डंडी-तराजू देखब, खाली डंडी छैक तँ तराजू कियैक कहैत छियैक? फेर ओहि नाटकोमे अनगौँआ सँ मारि बझेबाक हमर संगीक एकटा चालि। भेल ई जे नाटक केखय काल ओ’ एकटा अनगौँआकेँ खौँझा रहल छलाह। मारि अंट-शंट बकैत छलाह। आ’ ओ’ किछु बाजय तँ कहैत छलाह जे अखने नरेण भैयाकेँ बजायब। ताहि पर ओ’ कहलन्हि जे जाओ अहाँक नरेण भैयाक डर हमरा नहि अछि। आब आगू सुनू। हमर मित्र अनायासहि जोरसँ कानय लगलाह, दहो-बहो नोर निकलि गेलन्हि। भोकारि पाड़ैत नरेण लग पहुँचलाह जे एकटा अनगौँआ मारलक अछि, आ’ कहैत अछि जे के नरेण ओकर हमरा कोनो डर नहि अछि आरो अण्ट-शण्ट। आब नरेण भैया पहुँचलाह जे बता के छी। जखने टॉर्च ओहि व्यक्ति पर देलन्हि, बजलाह, भजार यौ। अहाँ छी। जरूर एही छौड़ाक गल्ती छी। अनका विष्यमे कहैत तँ पतिया जयतहुँ। मुदा अहाँक विषयमे। आ’ ईहो नहि जे तमसयलाह अछि, वरन् ई जे मारलन्हि अछि। आ’ नेप की चुआ रहल छल जेना कतेक मारि पड़ल होय। हमरा सँ पुछलन्हि जे भार किछु एकरा कहबो कएलन्हि, तँ हम कहलियन्हि जे नहि। एहि पर हमर मित्रक नोर जतयसँ आयल छलन्हि, ततहि चलि गेलन्हि। फज्झति मूरि झुका कय सुनलन्हि आ’ नरेण भाइक गेला पर सभकेँ कहलन्हि, जे ई नरेण काकाक संगी छथिन्ह, क्यो हिनका किछु कहथिन्ह तँ बेजाय भ’ जायत। आ अस्थिरसँ कहलथि जे बचि गेल आइ ई। (अनुवर्तते)

3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा) ——
2.सभा पर्व
मय दानव छल कय रहल नव निर्माण, सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान। स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल, युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल। ऋषि नारदक आगमन भेल ओतय जाय, देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय।
बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय, कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कय, जरासंध मगधक नरेश रहत गय यावत।
राजसूय सफल नहि होमय देत तावत। बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ’हराय, आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड , हारि द्वारका राजधानी बनाओल जाय ।
युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन, भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन।
क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुके वशमे करय, कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल।
ब्राह्मण वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि, पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति।
सत्कार करय चाहलक जरासंध बुझि विप्र, ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ।
दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध, कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ’शरीर संधिसँ,
भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ, शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर, मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ। जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दय मगध राजक गद्दी, आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति।
पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण , सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर। विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर, धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी, राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक प्रस्थमे बजाही। राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार, भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार। कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज । हस्तिनापुरसँ भीष्म, द्रोणक संग भेल आगमन, धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन।

(अनुवर्तते)

4.कथा 5. आर्या
विवाहक उपरान्त ढ़ेरी-ढ़ाकी लोक हमरासँ भेँट करबाक हेतु सासुरमे आबि रहल छलाह। ताहिमे छलि एकटा नवम् कक्षाक छात्रा आर्या आ’ ओकर पितामही आ’ माय। ओ’ मायक संग नहि आबि असगरे आयल छलीह। खूब कारी, दुबर-पातर, आवश्यकतासँ बेशी अनुशासित आ’ शिष्ट आ’ नापि-जोखि कय बजनिहारि। हमरासँ सभ गपमे उलटा। हमर कनियाँ हुनकासँ हमर परिचय करओलन्हि, आ’ ओकर प्रशंसा सेहो कएलन्हि। किछु कालक बाद जखन ओकर पितामही आ’ माय हमरासँ भेँट करबाक हेतु अयलीह तँ हमरा अनुभव भेल, जे हुनकर पितामहीक तँ लेहाज राखल गेल छल मुदा हुनकर मायक अवहेलना सन हमर कनियाँ आ’ सासु द्वारा भेल छल। गप्पो करबामे ओ’ नीक छलीह आ’ जाइत-जाइत कहि गेलीह, जे हमरा सभ अहाँक ससुरक किरायादार छी, आ’ उपरका महला पर रहैत छी। से भीड़-भाड़ कम भेला पर अवश्य आऊ। ई गप्प जाइत-जाइत हमर सासु प्रायः सुनि लेलन्हि, से हमर पत्नीकेँ अस्थिरेसँ मुदा आज्ञार्थक रूपेँ कहलन्हि, जे ऊपर जयबाक कोनो जरूरी नहि छैक। हम पत्नीसँ पुछलियन्हि, जे बेचारी एतेक आग्रहसँ बजओलन्हि अछि। पत्नी कहलथि जे सुनलियैक नहि, माँ मना कएलन्हि अछि। कारण पुछला पर गप अन्ठा देलन्हि।
किछु दिनुका बादक घटना छी, अन्हरोखेमे गेटक झमाड़ि कय खुजबाक अबाज भेल। लागल जे क्यो पीबि कय बड़बड़ा रहल अछि। हमरा अतिरिक्त क्यो ओहि अबाज पर ध्यान नहि देलक, आ’ अन्ठयबाक स्वांग कएलन्हि। हम बाहर अएलहुँ तँ एकटा अधवयसु झुमैत अबैत दृष्टिगोचर भेलाह। हमरा देखि डोलैत हाथसँ जमायबाबू कहि नमस्कार कएलन्हि। अखन धरि हमरासँ भेँट नहि होयबाक कारण हमर पत्नीकेँ फड़िछओलन्हि आ’ डोलैत ऊपर सीढ़ीक दिशसँ चलि गेलाह। हमर पत्नी हाथ पकड़ि कय हमरा भीतर आनि लेलन्हि आ’ ईहो सूचना देलन्हि जे ईएह आर्याक पिता थीक। अनायासहि हमरा माथमे आयल जे रंग जे आर्याक छैक से पिते पर गेल छैक। बादमे हमर सासु ऊपर जा’ कय भाषण दए अयलीह आ’ एक महिनाक भीतर घर छोड़बाक अल्टीमेटम सेहो आर्याक परिवारकेँ दए देलन्हि। हमर सर कहलथि जे ई दसम अल्टीमेटम छैक, मुदा हमर सासु अडिग छलीह जे किछु भय जाय एहि बेर ओ’ नहि मानतीह। जमाय की भुझताह जे केहन भाड़ादार रखने छी। पहिने ठकिया-फुसिया कय बहटारि लैत छल। पुछला पर पता चलल जे आर्याक पिता डॉक्टर छैक, आ’ सेहो होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक किंवा भेटनरी नहि वरन् एम. बी.बी.एस.। मुदा लक्षण देखियौक। ओना सासु ईहो गप कहलन्हि जे ई पीने रहबाक उपरान्तो गप्प एकोटा अभद्र नहि बजैत अछि, जेना आन पीनहार सभक संग होइत छैक। मनुक्खो ठीके अछि, मुदा यैह जे एकटा गड़बड़ी छैक से बड्ड भारी।अगला दिन नशा उतरलाक बाद पति-पत्नी दुनू गोटे नीचाँ अएलीह आ’ सासुकेँ कहलन्हि, जे आर्याक बोर्डक बाद ओ’ सभ पटना चलि जयतीह से हुनका सभक खातिर नहि मुदा आर्याक खातिर तावत रहय दिय’। घोँघाउजक बाद से मोहलति भेटि जाय गेलन्हि। तकरा बाद हुनकर पत्नीक नजरि हमरासँ मिलल तँ ओ’ कहलन्हि जे अहाँ तँ ऊपर नहिये आयब। आ’ एहि बेर ऊपर अयबाक आग्रहो नहि कएलथि। किछु दिन बीतल आ’ फेर सासुर जयबाक अवसर भेटल। किछु दिनमे पता चलल जे किरायादार बदलि गेल छथि। घरक लोक मात्र एतबे कहलथि जे आर्याक पिताक मृत्यु भ’ गेलन्हि आ’ अनुकम्पाक आधार पर ओकर मायकेँ नौकरी भेटि गेलैक। आब ओ’सभ क्यो पटनामे रहैत छथि। घरक लोक आगाँ किछु नहि कहलन्हि, मुदा कनियाँक एकटा पितयौत भाय आयल रहथि, से कहलथि जे डॉक्टरी रिपोर्टमे विष खा’ कय आत्महत्याक वर्णन अछि। फेर आँगा पति-पत्नीक मध्य मचल तुमुलक चर्च भेल। कनियाँ कहइत रहथिन्ह जे ई डॉक्टर बड्ड पिबैत छथि ताहि लेल झगड़ा होइत अछि, तँ डॉक्टर साहब कहथि जे झगड़ाक द्वारे पिबैत छी। अस्तु मृत्युक बाद हुनकर कनियाँक भाव एहन सन छल जेना मुक्ति भेटि गेल होय- एहि बातमे सभ क्यो एक मत रहथि।
फेर दिन बितैत रहल आ’ बादमे फोन पर समाचार भेटल जे आर्या सेहो आत्म हत्या कए लेलक। फेर बहुत रास बात मोनमे घूमि गेल। आर्या भावुक छलि, किछु बेशी तनावमे रहिते छलि। गपकेँ गंभीरतासँ लइत छलि। एकटा सारि रहथि, हुनकर बात सेहो मोन पड़ल। एक गोट युवकक विषयमे आर्या कहैत छलि, जे ओकर संगीकेँ होइत छैक जे ओ’ युवक ओकरासँ प्रेम करैत अछि। मुदा आर्याक मत छल जे ऊ’ युवक ओकरासँ नहि वरन् आर्यासँ प्रेम करैत छल। हम सारिकेँ कहने रहियन्हि जे आर्या बच्चा अछि, ओहिना हँसी कएने होयत। मुदा ओ’ कहलन्हि, जे नहि यौ। बड्ड भावुक अछि आर्या। कहैत अछि जे ओहि युवकके प्राप्त करबाक हेतु किछुओ करत। एहि बात पर हम तखन कोनो बेशी ध्यान नहि देने रहियैक। मुदा एहि बातक आब महत्त्व बढ़ि गेल छल। हम फोन दोबारा लगेलहुँ। पता चलल जे ओ’ युवक कोनो पुरान महारानीक बेटीक बेटा छी। ओकर माता शिक्षिका अछि, आ’ बाप मेरीनमे काज करैत अछि। साल-छह मास पर अबैत अछि। आ’ जखन अबैत छल तँ जे मास-पंद्रह दिन रहैत छल से मारि_पीटिमे बिता दैत छल। पूरा मोहल्लामे बदनामी छैक। मायक शील-स्वभाव बड्ड नीक, बोलीसँ फूल-झड़ैत छैक। बापकेँ तँ लोक चिन्हितो नहि छैक।खाली झगड़ाक अबाजे सुनैत अछि लोक। आर्याक संगीकेँ स्कूल बससँ उतरबा काल क्यो तंग कएने छल तँ ओ’ युवक सभकेँ मारि-पीटि कय भगा देने छल, आ’ एकर बाद आर्या एहि शहरसँ दूर भ’ गेल। ओ’ मायकेँ कहैत रहलि जे परीक्षा तक रहय दिय’, मुदा माय विमुक्त भेलाक बाद एको पल पुरान कटु-स्मृतिकेँ देखय-नहि चाहैत छलथिन्ह।हम फोन पर पुछलियन्हि जे ओहि युवकक विवाह आर्याक मृत्युसँ पहिने कतय भेल। तँ सासुरक लोक अचंभित पुछलन्हि, जे ओकर विवाह तँ भेल मुदा अहाँ कोना बुझलहुँ। पता चलल जे सिलीगुड़ी-दिशि कोनो कन्यागत छथि, आ’ ओ’ युवक अपन बाप जेकाँ घर-जमाय बनि रहबाक नियाड़ कएने अछि। एहि शहरक लोककेँ तँ विवाहक हकारो नहि भेटल। हम आर्याकेँ एकटा दृढ़ बालिका बुझैत रही। मुदा ओकर ‘किछुओ कड़य पड़त से करब’ केर अर्थ आब जा’ कय बुझलहुँ। ————————————-

5.पद्य (आँगा)

नाम – ज्योति झा चौधरी ;जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८;जन्म स्थान -बेल्हवार मधुबनी ;शिक्षा – स्वामी विवेकानन्द मिडल स्कूल़,टिस्को साकची गर्ल्स हार्ई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी़ आइ.सी.डबल्यू.ए.( कॉस्ट एकाउण्टेन्सी) ;निवास स्थान – लन्दन,यू.के.;पिता -श्री शुभंकर झा,ज़मशेदपुर;माता -श्रीमती सुधा झा़ शिवीपट्टी ;”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी़ नानी़ भाई बहिन सबकेँ पत्र लिखबामे केने छी ।बचपन सँ मैथिली सँ लगाव रहल अछि|-ज्योति

हिमपात
बर्फ ओढ़ने वातावरण !
मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल ,
अपने आप के छिरियाकऽ
सबके एक रंग में रंगि गेल ॥

थरथराबैत सरदी स भयभीत
सब जीव अपन जगह धेलक;
प्रकृति के इहो अवरोध मुदा,
मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥

भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक
विकट परिस्थिति पर विजय लेल;
अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स
मनुष्य अंतत: सफल भेल॥

अन्यान्य कविता
any
90.नव-घरारी

साँप काटल नन्दिनीकेँ, नव घरारी लेलक खून। टोलक घरारी छोड़ू जुनि। ई विशाल जनसंख्या एतय, छल बनल एकटा काल, ई नव-घरारी लेलक प्राण, टोलक घरारी साबिकक डीह, परञ्च अछि छोट आब की। खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज, नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।

91. बुद्ध
हृदय लग अछि जेबी, से जखन रहय खाली, मोन कोना रहत प्रसन्न। बुद्ध सेहो कहि गेल छलाह ई।
मुम्बइमे सूप मँगलहुँ, पुछलक अहाँमे जैनी कैकटा छी। देत लहसुन की नहि रहय तात्पर्य, आपद्काले रहि गेल अछि आइ काल्हि सदिखन।
सेल टैक्समे करैत छी भरि दिन काज, तैँ प्रोननशियेशन भेल अछि मराठी, एक्साइज तँ अछि केन्द्रीय सरकार, संपर्क बाहरीसँ बेशी।
छत्तीसगढ़क छत्तीस घंटाक यात्रा, उत्तर-मध्य क्षेत्रक स्तूपकेँ देखल, बंगाल घूमल पंजाब घूमल, बंगाली कहलन्हि सुनि जे जौँ, बंगाली जायत संग करत कानूनी बात\ सरदारजी कहलन्हि रोड पर, रेड लाइट रहलो क्रॉस करू,
सोझाँसँ अबैत छल एकटा सरदार, कहल करत आब ई झगड़ा। सक्सेना कहलक एक मैथिलकेँ, मैथिल अछि मैथिलक परम शत्रु। हम कहल सक्सेनाकेँ,हे
जुनि करू हुनका दूरि। काज सभटा झट कराऊ जुनि भड़काऊ।
बुद्धक भूमिसँ घुरि आयल छथि, दिल्लीक सड़क पर एहि बेर। पाटलिपुत्र रहय राजधानी, हम छलहुँ ततय पुन फेर,
दिल्ली बनल राजधानी भारतक, कोन जुलुम हम कएल।
कणाद कपिल गौतम जेमिनी देतथि जौँ नहि काज, कहलन्हि ई ठीके हृदय लग, जेबी देने अछि सीबि।
हृदय कोना प्रसन्न रहत जखन,
पेट रहत गय खाली।
जेबीमे पाइ नहि रहत, उपासे करब हम भाइ। बुद्ध सेहो कहि गेलाह ई।

92. रिक्त पाँचम वर्गसँ सातम वर्गमे, तड़पि गेल छलहुँ हम। छट्ठा वर्गक अनुभव अछि रिक्त। बा’ आ’ बाबा जन्मक पहिनहि,
प्राप्त कएलन्हि मृत्यु, वात्स्ल्यक अनुभव भेल रिक्त। माँ एके बहिनि छलि तेँ, मौसी-मौसाक अनुभवो नहि, ईहो रहल रिक्त। क्यो कहैत अछि जे छठामे पढ़ैत छी, बा’ आ’ बाबाक संग घुमैत छी, मौसी-मौसाक काज उद्यममे जाइत छी, तँ हम कहैत छी, जे ई कोन संबंध, कोन वर्ग अछि, छोड़ि सकैत छी।
उत्तर भेटैछ, अहाँ नहि बुझब। मुदा नव संबंध, नब नगर, नव भाषा, नवीन पीढ़ीकेँ, कोना बुझायब, ओ’ कोना बुझत। ओ’ तँ नहि बूझि सकत काका-काकी, नहि बूझत दीया-बाती, खटैत दौड़ैत आ’ नहि घुरि आओत, ककरा बुझायब आ’ के बूझत।

93. चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी, हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ, लागल मंझा बूकल शीसाक, जेना प्रतियोगीक कागज-कलम। कटल चित्रपतङ्ग, देखबैत अछि वास्तविकताक धरा। जतयसँ शुरू ओतहि खत्म, मुदा बीच उड़ानक स्मृति, उठैत काल स्वर्गक आ’, खसैत काल नरकक अनुभूति।

94.प्रवासी
संगहि काटल घास, महीस संगे चड़ेलहुँ, पुछैत छी गहूम ई, पाकत कहिया? दू दिन दिल्ली गेलहुँ, सभटा बिसरेलहुँ, ईहो बिसरि गेलहुँ, जे धान कटाइछ कहिया।

95. वेदपाठी
वेद वाक्य परम सत्य, संस्कृत साहित्य अति उत्तम। करैत छी अहाँ वक्त्तव्य, मुदा अहाँ की अहाँक पुरखा, मरि गेलाह बिन सुनने,वेद वाक्य,
बिन पढ़ने संस्कृत।
यौ अहाँ नहि पढ़लहुँ अहाँ, अनका अनधिकार बनेबाक चेष्टा, कएलहुँ अहाँ।
छी वेदक अप्रेमी, नहि अछि क्षमता, वेदक पक्ष की विपक्षमे बजबाक । वेद वाक्य सत्य एकरा बनेने छी, अहाँ फकड़ा।
96. बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत, जे नहि बिसरब आइ, मुदा गप्प पर गप्प चलल, कृत्रिमता गेल ढ़हाइत। फेर काजक बेर मोन, नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन, कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप, आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।

97. तक्षशिला
तक्षशिला अछि पाकिस्तानमे, इतिहासक उनटबैत पन्ना,
चक्र घूमल टूटल हमर देश, अराड़ि ठाढ़ कएलक दियाद। मुदा सोचैत छी। जे भने दियाद अछि समीप, आ’ कएने अछि अराड़ि, ताहि बहन्ने छी हम सजग,
करैत रहैत छी तैयारी।
1962 धरि हिमालयकेँ बुझल बेढ़, जेना 1498 धरि छल समुद्र, द्वार खोलैत छल खैबर दर्रा। प्ड़ोसीयो पर आक्रमण होइत छल, दूर-दूरसँ अबैत छल अत्याचारी, भने दियाद अछि कएने अराड़ि, जे करैत रहैत छी तैयारी।

98. चोरि
गेलहुँ गाम आ’ एम्हर, आयल फोन, समाचार चोरिक। छुट्टी होयबला छल समाप्त, मुदा चोरक गणना छल ठीक।
आबयसँ एक्के दिन पहिने, लगेलन्हि घात। तोड़ि कय केबाड़, उधेसल घर-बार। नहि पाबि कोनोटा चीज, घुरल माथ पीटि। भोरमे पड़ोसी कएलन्हि डायल सय, पुलिस आयल हारि थाकि कय। पड़ोसीसँ किनबाय दू टा अतिरिक्त ताल, (पुलिस महराज अपन घरक हेतु), चाभी लेलन्हि अपन काबिजमे। चोर हड़बड़ीमे छल चलि गेल, मुदा एहि महाशयक हाथ चाभी गेल, आ’ शो-केशक चानीक नर्त्तकी गुम भेल। चोरकेँ छल डर गेटक दरबानक, से छलाह ओ’ गहनाक आ’ नकदीक ताकक।
मुदा पुलिस महाराज दय राब दौब दरबानहुँकेँ, निकललाह चोरि कय बरजोड़ीसँ।

99. चोरकेँ सिखाबह
यौ काका छी अहाँ खाटकेँ, धोकड़ी किएक बनओने, खोलि नेवाड़ फेर घोरिकेँ,
बनाऊ खाट फेर नवीने। कहलन्हि काका तखन जे हौ, देखह आयत रातिमे जे चोर, पटकत लाठी खाट पर आ’ चोट नहि लागत मोर।
परञ्च काका जौँ ओ’ चलबय, लाठी नीचाँ बाटे, वाह बेटा कहि दिहह चोरकेँ, ई गप तोहीँ जा कय।

100. काल्हि
भोरे उठि ऑफिस जाइत छी, आ’ साँझ घुरि खाय सुतैत छी। कतेक रास काज अछि छुटैत, अनठाबैत असकाइत मोन मसोसैत। जखन जाइत छी चुट्टीमे गाम, आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम। पबैत छी ढ़ेर रास उपराग, तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम। कागजक पन्ना पर नव राग, विलम्बक बादक हृदयक संग्राम। चलैत छल बिना तारतम्यक, बिना उद्देश्यक-विधेयक। कनेक सोचि लेल, छुट्टीमे जाय गाम। विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान, फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ, जे सोचल कएल, नित चलल, जीवनक सुर भेटल आब जाय।
101. मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल, पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत, फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग, छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़, अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी, दिनमे बौआइत रही, कलममे बाँझी तकैत, दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल, बुरबक होयबाक संज्ञा, ईहो छी नहि बुझैत, मोजर होइत तँ खैतहुँ आम, अगिला साल। बाँझीमे नहि कोनो आस, घूरमे होइछ मात्र काज। फेर छे पाड़ैत, अंडीक बीया बीछब, पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल, ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद, राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद, ’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद। महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च, भ’ जायत एक किलो, पाइक माश्चर्ज। कंजूसी नहि, जबरदस्ती ठूसी। मोन पाड़ैत छी धानक खेत,झिल्ली कचौड़ी, लोढ़ैत काटल धानक झट्ठा, ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी। ‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी, बंशीसँ मारैत माछ, खुरचनसँ सोहैत आम काँच। चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद, बडका दलान, दाउन, बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद, बिदेसरक रवि दिनक बूझल, फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल। चूड़ा लय जाइत रही गामसँ, दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद, पुरनाहाक धातरीमक गाछ। साहर दातमनिक सोझ नीक छड़, जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल, गुल्ली डंटा, गोलीक खेल, अखराहाक झमेल। हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती, फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय। छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल, जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष, छोड़ल गाम यौ मित्र। मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत, बैसि बैसि बैसि।
6. संस्कृत शिक्षा (आँगा)
संस्कृत कथा
गंगातीरे एकः साधुः अस्ति। सः सज्जनः। सर्वदा परोपकारम् करोति। दयालुः अपि आसीत। सः यः कोपि आगत्य सहाय्यम पृच्छतेत सः परोपकारम करोति। एकः बालकः आगत्य किमपि पृच्छति। तस्य सहायम् करोति। एकदा सः साधुः स्नानार्थम् गंगां नदीं गच्छति। सः गंगा नद्याम अवतरति। स्नानं करोति। तदा प्रवाहे एकः वृश्चिकः आगच्छति। वृश्चिकस्य स्वभावः दंशनम्। दुष्ट स्वभावः। सः वृश्चिकः तत्र तस्य समीपम् आगच्छति। तदा सः साधुः वृश्चिकः रक्षणीयः इति चिन्तयति। सः साधु वृश्चिकं गृह्णाति। सः वृश्चिकः बहुवारं तस्य हस्तं दशति। एकवारं सः त्यजति, पुनः दशति। पुनः गृह्णाति, पुनः दशति। तथापि सः साधुः वृश्चिकं न त्यजति।सम्यक् गृह्णाति। अत्र तटम् आनयतुं प्रयत्नं करोति। सः साधुः वृश्चिकं त्यजति। पुनः चिंतयति- एषः वृश्चिकः रक्षणीयः इति। सः वृश्चिकं पुनः गृह्णाति। सावधानं नदीतटम् आनयेति। तत्र एकः पुरुषः सर्वं पश्यन् भवति। साधुं किं करोति। इति पश्यन् भवति। तदा सः पुरुषः पृच्छति। भोः। किमर्थं वृश्चिकं रक्षति। सः दशति किल। इति। तदा साधुः वदति। भोः। तस्य स्वभावः सः। दुष्टः स्वभावः। मम् स्वभावः परोपकारः। क्षुद्रः जंतुः सः यथा सः स्वभावं न त्यजति तथा अहं मनुष्यः। मम् स्वभावं कथं त्यजति। इति सः साधुः तम वदति। सज्जनस्य स्वभावः किदृशः भवति किल।
कथायाः अर्थः ज्ञातः खलु। ज्ञातः।
सुभाषितम्
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।
वयं इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवंतः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सिंहः वनराजः इति प्रसिद्धः। किन्तु तस्य कोपि अभिषेकं न करोतु। किमपि संस्कारं न ददाति। तथापि सः वनराजः। कथं सः स्वसामर्थयेन एव स्व प्रयत्नेन् एव वनस्य आधिपत्यं प्राप्नोति। एवमेव सामर्थ्यवान् पुरुषः स्वस्य प्रयत्नेन एव अत्यन्तं पदं प्राप्तुम शक्नोति।

पद्य ( गजेन्द्र ठाकुर)
चटका चञ्चति नृत्यति उड्डयति आकाशे। रचयति नीडं चटका वृक्षे आकाशे।
नगरं ग्रामं क्षेत्रं भ्रमति चटका आकाशे। आहारं प्राप्नोति आगच्छति सायं दृश्टवा, न कोलाहलं करोति गायति सा चटका।
कलहः करोति न चटका तत्र मध्ये आकाशे, कलहः न करोति चटका च क्षेत्रे गृह मध्ये।

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नमोनमः। भवतां सर्वेषाम् अपि स्वागतम्।
जलम् आवश्यकम्।
काफी आवश्यकम्।
मास्तु।
चायम् आवश्यकम्।
मास्तु। मास्तु। पर्याप्तः।
किम् आवश्यकम्। जलम् आवश्यकम्।
किंचित् आवश्यकम्।
आम्।
पुनः किंचित् आवश्यकम्। धनम् आवश्यकम्। चाकलेहः आवश्यकः। मिष्टान्नम् मधुरम् आवश्यकम्। शिक्षणम् आवश्यकम्। मास्तु। संस्कृतम् आवश्यकं वा। आवश्यकम्। ताडनं मास्तु। वस्त्रं धनं आवश्यकम्। द्वेषः कोलाहलः मास्तु। अहं भवतः युतकं ददामि। सर्वे वदंतु। चतुर्वेदस्य युतकम्। भवान युतकम्। मम युतकम्। वदतु। भवतः युतकम्। भवतः नासिका। समीचीनम्। सुनीते। भवति आगच्छतु। अहं भवत्याः आभूषणं वदामि। भवति मम् आभूषणं वदतु। भवन्तः सुनीतायाः आभूषणम् इति वदन्तु। भवत्याः घटी। भवत्याः केशः। साधु-साधु। पुनः एकम् अभ्यासः कुर्मः। कः कस्य मित्रम्। अथवा का कस्याः सखी। इति भवन्तः। लता प्रियङ्कायाः सखी। वदन्तु। उदाहरणं वदामि। इदानीम भवन्तः वदन्तु। रोहितः अभिषेकस्य मित्रम्। उत्तमम्। इदानीं वयं बहुवचनस्य अभ्यासं कुर्मः। छात्रः- छात्राः। दंतकूर्चः-दंतकूर्चा।
उत्तमम्। चशकः- चशकाः। बालकः- बालकाः। सैनिकः- सैनिकाः। वृक्षः- वृक्षाः। शिक्तवर्तिका- शिक्तवर्तिकाः। पेटिका- पेटिकाः। उत्पीठिका- उत्पीठिकाः। लेखनी- लेखन्यः। अङ्कनी- अङ्कन्यः। घटी- घट्यः। कूपी- कूप्यः। पर्णम्- पर्णानि। पुस्तकम्- पुस्तकानि। कङ्कनम्- कङ्कणानि। फलम्- फलानि। सङ्गणकम्- सङ्गणकानि।
अहम् एकवचने वदामि। भवन्तः परिवर्त्तनं कुर्वन्।

छात्रः अस्ति- छात्राः सन्ति। छात्रा अस्ति।– छात्राः सन्ति। दंतकूर्चः अस्ति। – दंतकूर्चाः सन्ति। चमषः अस्ति।– चमषाः सन्ति।
अङ्कणी अस्ति। अङ्कन्यः संति।
पर्णम् अस्ति।पर्णानि सन्ति।
वृक्षः अस्ति।– वृक्षाः सन्ति। बालकः अस्ति।– बालकाः सन्ति। गायकः अस्ति।– गायकाः सन्ति।
लेखकः अस्ति।– लेखकाः सन्ति। बालिका अस्ति। बालिकाः सन्ति। पत्रिका अस्ति। पत्रिकाः सन्ति। पत्रम् अस्ति।पत्राणि सन्ति। पुष्पम् अस्ति।पुष्पाणि सन्ति। मन्दिरम् अस्ति।मन्दिराणि सन्ति। फलम् अस्ति। फलानि सन्ति। पर्णम् अस्ति। पर्णानि सन्ति।
अङ्कणि अस्ति। अङ्कण्यः सन्ति। लेखनी अस्ति। लेखन्य सन्ति।
इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः।
बालिकाः सन्ति। बालकाः सन्ति। बालकः एकवचनं वाक्यं वदति। बालिकाः बहुवचनं रूपं वदन्तु।तस्य वाक्यस्य बहुवचन रूपं वदति।
बालिकाः एकवचनं वाक्यं वदति। बालकाः परिवर्त्तनन्ति। अस्तु वा। अस्तु। पुस्तकम् अस्ति।पुस्तकानि सन्ति। लेखनी अस्ति। लेकण्याः सन्ति। घटी अस्ति। घट्याः सन्ति। सः छात्रः। ते छात्राः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। सः कः। सः पुरुषाः। ते के। ते पुरुषः। कः पुरुषः। सः पुरुषः। ते पुरुषाः। ते के। ते पुरुषाः। के पुरुषाः। ते पुरुषाः। हस्तं दर्शयन्तु। अक्षता उत्तिष्ठन्तु। ताः बालिकाः। सा बालिका। सा पेटिका। ताः पेटिकाः। सा का। ताः काः। का पेटिका। सा पेटिका।
काः पेटिका। ताः पेटिकाः। तत् चित्रम्। ताणि चित्राणि। तत् किम्। ताणि कानि। ते वृक्षाः। एते वृक्षाः। एते छात्राः। ताः घट्यः। ते के। एते के। एताः बालिकाः। एताः घट्यः। ताः बालिकाः। एताः काः। ताः घट्यः। काः घट्यः। तानि फलानि। एतानि फलानि। एतानि पुस्तकानि। तानि पुस्तकाणि। एतानि फलानि। एतानि कानि। तानि फलानि। भवान् बालकः। भवन्तः बालकाः। भवती बालिका। भवत्यः बालिकाः। अहं भारतीया। वयं के। वयं भारतीयाः। वयं भारतीयाः।
अहं देशभक्त्तः। वयं देशभक्ताः। भवन्तः बालकाः। भवन्तः के। वयं बालकाः। भवत्यः बालिकाः। भवत्यः काः। वयं बालिकाः। अहम् एकवचनं वदामि। भवन्तः बहुवचनं वदन्तु। एकम् अभ्यासः कूर्मः। अहं भारतीयः।अहं राष्ट्रभक्तः। अहं चतुरः। अहं मूर्खः। वयं मूर्खाः।
सिद्धिरस्तु।
7. मिथिला कला- चित्रकला (आँगा) मधुश्रावणी अरिपन
चित्रकार- उमेश कुमार महतो, गाम-बहादुरगंज(जिला किशनगंज,बिहार, भारत), उम्र-18 वर्ष, पिताक नाम- श्री केशव महतो।

श्रावन कृष्ण पंचमी (नाग पंचमीसँ) प्रारम्भ भ’ कय श्रावन शुक्ल तृतीया पर्यन्त नीचाँक अरिपन पर विभिन्न नागक पूजा कएल जाइत अछि, आ’ वृद्धा लोकनि एहि अवसर पर कथा सेहो कहैत छथि। नव वर-वधूकेँ संग बैसा कय पूजाक समापन होइत अछि। इइ अरिपन दूटा मेना-पात आ’ पूजा करयबालीक दुनू दिशि भूमि पर बनाओल जाइत अछि। वाम पात पर 101 सर्पिणी सिनूर आ’ काजरसँ आ’ दहिन कातक पात पर 101 सर्पिणी पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। वाम कातक सर्पक मुखिया कुसुमावती आ’ दहिन कातक वौरस नागक पूजा होइत अछि। मेना पातमे सर्प वशीकरण शक्त्ति होइत अछि। संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि।

8. संगीत शिक्षा

शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ’ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।

शुद्ध आ’ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ’ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ’ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। 37 टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ 12, 12, 12 केर तीन सेट आ, अंतिम 37म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ’ पाँचटा विकृत मिला कय 12 टा भेल!
वाम कातसँ 12 टा उजरा आ’ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला 12 टा की मध्य सप्तक आ, 25 सँ 36 धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।

आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ’ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ’ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी ‍ सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ’ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।

वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ’ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।

(अनुवर्तते)

9. बालानां कृते
राजा सलहेस
राजा सलहेस सुन्दर आ’ वीर छलाह। मोरंग नेपालमे रहैत छलाह। ओ’ दुसाध जातिक छलाह आ’ दबना नामक मोरंग राजाक मालिन सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य ओकरासँ प्रेम करैत छलाह आ’ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ’ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहीं छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ओ’ तालुकदारकेँ पसिन्न नहीं पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ’ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहीं लगाऊ। सलहेस कहल्न्हि, जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हमारा चोड़ियो देब लोक तँ कहबे करत।तखन थापा कहलकन्हि जे लोककेँ मना क’ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ’ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतयसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़य लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा’ रहल अछि मोरंग छोड़ि कय। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। कहलक ओ’ सलहेसकेँ जे हम राजाक दरबारमे सात सय सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा क’ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत- रौ सुरहा, बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ।
मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ’ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। राजाकेँ कहलक चूहड़मल जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाय।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार। दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ। चूहड़मल सभटा बकि देलक। सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ’ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल। दबना आ’ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहय लगलाह।

10. पंजी प्रबंध
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया

पुनश्च सप्तसिन्धु सँ प्राच्याभिमुखी यायावर ऋषि लोकनि गंगा ओ’ हिमालयक मध्यक सुभूमि मिथिलामे जाहि आर्यसंस्कृतिक बीज-वपन कएल, तकर मूल छल धर्म, धर्मक मूल थिक जाति, ई जाति होयत एहि जन्मक विशुद्धिसँ, जन्मसँ विशुद्ध संतान होइत अछि तखन जखन विवाहक अधिकार जाहि कन्यासँ हो तकरहिसँ विवाह कएला उत्तर प्राप्त संतान आर्य जातिक विवाहक नियम सभ सर्वप्रथम निबंधित भेल विभिन्न स्मृति सभमे। महान स्मृतिकार मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक अनुसार ओहि कन्यासँ विवाहक अधिकार हो जे- 1. समान गोत्रक नहि होथि, 2. समान प्रवरक नहि होथि, 3. माइक सपिण्ड नहि होथि,
4. पिताक सपिण्ड नहि होथि,
5. पिताम अथवा मातामहक संतान नहि होथि, 6. कठमामक संतान नहि होथि।
एहि वैवाहिक अधिकारक निष्पादनार्थ कमसँ कम मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक समयसँ त निश्चये लोक अपन ‘ यावतो परिचय’ स्वयं अपनहि रखैत आबि रहल छल, मुदा पश्चातक युगमे ई प्रवृत्ति समाप्तप्राय भ’ गेल। विवाहक हेतु वर ओ’ कन्याक सम्पूर्ण परिचय तँ आवश्यके छल, जे आनहु धार्मिक संस्कारक हेतु सपिण्डत्त्वक विचार विवाहक अतिरिक्त श्राद्ध ओ’ अशौच प्रभृतिअहुमे आवश्यक होइत छल, एहि कारणेँ प्रागैतिहासिक कालहिसँ लोक अपन सांगोपांग परिचय रखैत छल। ओ’ ओकरहि अनुसार अपन धार्मिक क्रियाक निष्पादन करैत रहए। ई नियम सभ हमरा लोकनिक प्राचीनतम धर्मग्रंथ सभमे उपलब्ध अछि। स्मृति सभमे कहल गेल अछि, जे जनिकासँ विवाहक अधिकार नहि हो से स्वजना भेलीह। स्वजनासँ विवाहोपरांत प्राप्त संतान चाण्डाल बूझल जाइत छल। ओ’ आर्यत्वक मर्यादासँ बहिष्कृत मानल जाइत छल।
(अनुवर्तते)

11. मिथिला आ’ संस्कृत

कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा त्रैमासिकी संस्कृत पत्रिका ‘ विश्वमनीषा’ निकलैत छल। 1975 ई. सँ 1994 ई. धरि ई पत्रिका प्रकाशित होइत रहल, मुदा 14 वर्षसँ एकर प्रकाशन बंद अछि। हिन्दीमे मिथिलाक इतिहासक अतिरिक्त सात खण्डमे मैथिलीक परम्परागत नाटकक ( 1300 ई. सँ 1900ई. धरिक 16 टा नाटक)प्रकाशन कएल गेल छल। मैथिलीमे पं गोविन्द झा लिखित वातावरण नाटकक संस्कृत अनुवाद श्री पं शशिनाथ झा कएलन्हि आ’ तकरा विश्वविद्यालय प्रकाशित कएलक। ‘ स्मृति-साहस्री’ जे 20म शताब्दीक विद्वान्-साधकक जीवन पर आधारित प्रथम मैथिली महाकाव्य अछि, आ’ जकर रचयिता श्री बुद्धिधारी सिंह’रमाकर’ छथि केर प्रकाशन सेहो विश्वविद्यालय कएने अछि। रूपक समुच्चयः नामक पुस्तकमे चारि गोट रूपक अछि। एहि मे चारिम संस्कृत रूपक म.म.अमरेश्वर कृत धूर्त्तविडम्बन प्रहसनम् मैथिली अनुवादक संदेल गेल अछि। म.म. भवनाथ उपाध्यायक राजनीतिसारः सेहो मैथिली अनुवादक संग देल गेल अछि।

संप्रति विश्वविद्यालयक कार्य सालमे एकबेर पंचाङ बनेबा धरि सीमित बुझाइत अछि।

12. भाषा आ’ प्रौद्योगिकी
देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि। एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ’ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ’ संगीतक नोटेशन लिखबाक सुविधा अछि। विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल। मंद्र सप्तक, तीव्र आ’ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि। ऋ,ॠ आ’ ऌ,ॡ आ’ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद अअर जोड्बाक सुविधा एहिमे सुविधा छैक। अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ’ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि।
ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि। आ’ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि। विदेहक सम्मुख पृष्ठ पर देवनागरीसँ संबंधित तीनटा लिंक राखल गेल अछि। पहिल दू टा लिंक पर जानकारीक संग सॉफ्टवेयर डाउंलोडक लिंक अछि। तेसर लिंक पर ऑनलाइन ताइपिंगक सुविधा अछि, एतय टाइप क’ कय कॉपी कय वर्ड डोक्युमेंटमे पेस्ट कए सकैत छी किंवा ईमेलमे सोझे टाइप केलाक बदला एतयसँ कॉपी कय पेस्ट कए सकैत छी।
(अनुवर्तते)
13. रचना लिखबासँ पहिने…
मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अएलाह वा अयलाह, जाए वा जाय इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, कौआ वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, किनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कय।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ड वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
( ह./ गोविन्द झा/11.08.76 श्रीकांत ठाकुर 11.08.76 सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ 11.08.76
(अनुवर्तते)
14. प्रवासी मैथिल English मे
King Videha of Mithila had his counsellor Mahosadha.Mithila was invaded by Sudhanvan, king of Sankaiya, and much later by Chulani Brahmadatta and Kewatta, king of Kampila both were defeated by Siradhvaja and Videha, respectively. Jataka story of king Videha and Mahosadha,commander. Secret service reported daily ,employed a hundred and one soldiers in as many cities,employed parrots also, great rampart,watchtowers, and between the watctowers,three moats, water,mud and a dry moat. In city old houses were restored and large banks were dug made warter-reservoirs and grain store-houses. The siege of Mithila and the great tunnel have been described in the Jataka.The weapons included,red-hot missiles,javelins,arrows,spears and lances,and showers of mud and stone. The society consisted of Brahmanas, Kshatriyas, Vaisyas. Sirivaddha, father of Mahosadha was an important merchant of Mithila. The Chandala is also referred.A hawk carried off a piece of flesh from the slab of a slau¬ghter-house. A dog fed upon the bones, skins of the royal kitchen. There was a type of education and later Videha students went to Takshsila for education,e.g.Pintguttara. Kahoda Kaushitaki was married to the daughter of his teacher Uddalaka Aruni. Suka visited Mithila to acquire wisdom. Srutadeva was a great scholar of pre-Bharata era. Agriculture and Cattle-rearing was in vogue and Yajur-Veda mentions famous cows of Videha.King Vedeha gave a thousand cows and a bull to Mahasodha. There was a place where foreign merchants showed their goods. Goods from Magadha and Kasi were imported. The conches of Magadha,Kasi-robe and Sindh mares were famous.Krishna visited Mithila to see his devotees Srutadeva and Bahulashva.The Mahabharata says that shaligrama is another name of Vishnu, Shaligrama worship begun. Janakpur had four gates were four market towns distinguished as eastern, southern, western and northern. There was a revival of Mithila after Bharata war which lasted for more than two centuries and in this period the famous sages of the Brahmanas, the Aranyakas and the Upanishads flour¬ished. Vaishali lost its significance. After Bharata War period the Puranas furnish genealo¬gies of Pauravas(Hastinapura-Kosambi), the Ikshvakus (Kosala) and the Barhadrathas (Mag adha).The names of the kings of Videha ia available in the Jatakas.The Upanishads mention one ruler known as Janaka Videha.Videha has been omitted in the sixteen Mahajanapada available in the Buddhist work Aiguttara-Nikaya where we have Vajji.Karala Janaka perished along with his king-dom and relations. Kasi was conquered by Kosala and Anga by Magadha. The Vajji established their republic before the Kosala conquest of Kasi and the Magadh conquest of Anga.Mall, the penultimate sovereign of the Janaka dynasty of Videha, adopted the faith of the Jaina Parsva, the first historical Jaina 250 years before Mahavira(561BC-490BC).Between Bharat war circa.950 BC and Karala Janaka circa 725 B.c Videha monarchy flourished.
Suruchi group consisting of Suruchi I, Suruchi II Suruchi III and Mahapadmanada.
Janaka group consisting of Mahajanaka I, Arittha¬janaka, Polajahak, Mahajanaka II and Dighavu.Then a group of two kings Sadhina and Narada and then Nimi and Karala(father and son).Makhadeva is regarded as the founder of Mithila monarchy.
Angatis was righteous king,had a daughter named Raja. His ministers were Vijaya, Sunama and Alata. Narada set him to right path after the influence he got from the heretical teachings of a naked Guna Kassapa. Purana Kassapa and Maskari Gosala were the contemporaries of Buddha, thus, Guna Kassapa flourished round 6th century B.C. Chulani Brahmadatta of Kampilya conquered 101 princes of India and only Videha had been left. There is reference that Gandhara king and the Videha king met and mystic meditation was taught to Videha King by Gandhara king.There were land owners and Alaras is mentioned in this regard.The Vedic texts mention Uddalaka and Svetaketu as belonging to the age of Janaka of Videha. The Jatakas mention these two scholars connected with Banaras.For MahapanadaVisvakarman, engineer, constructed a palace seven storeys high with precious stones. Mahajanaka II was brought up by his mother in the house of a Brahmana teacher at Kalachampa and after finishing his education at16 sailed for Suvarnabhumi on a commercial enterprise, in order to get mone to recover the kingdom of Videha. The ship perished in the middle of the ocean. He managed to reach Mithila, where the throne had been lying vacant since the death of Polajanak, his uncle, who had left a marriageable daughter Sivalidevi and no son. Mahajanaka II was now married to this princess and raised to the throne. He later renounced the world. A remarkable feature of the character of Mahajanaka II was his spirit of renunciation. He gives utterance to a famous verse :¬ ‘We have nothing own may live without a care Mithila palaces may burn,nothing mine is burned . Mahajanaka-Jataka is sculptured on a railing of the Bharhut Stupa having inscription : The arrowmaker, King Janaka, Queen Sivali.Nimi and Kalara are men¬tioned in Buddhist,Brahmanical and Jaina literature. Ugrasena Janaka revived the greatness of Mithila. Ashtavakra sais as all other mountains are inferior to the Mainaka, as calves are inferior to the ox, so kings of the earth inferior to the king of Mithila (Ugrasena). He is called Janakana varishtha Samrat(Mahabharata),great performer of sacrifices and is compared with Yayati. In one such Yagya Ashtavakra, son of Kahoda and Sujata (daughter of Uddalaka), attended and Ashtavakra defeated Vandin, son of a charioteer and got released his son.Paurava prince, Satanika, the son of Janamejaya, was a Vaidehi. Sathnika married the daughter of Ugrasena Janaka who sought to enhance his influence by means of this matrimonial alliance. Devarata II was contemporary of Yajnavalkya, who took the management of the royal sacrifice where a quarrel arose between Yajnavalkya and his maternal uncle Vaisampayana as to who should be allowed to take the sacrificial fee and in presence of Devala, Devarata, Sumanta, Paila and Jaimini Yajnavalkya took half of that. Devarata I obtained the famous bow of Siva. The Vedic texts mention five Videha kings,Videgha Mathava, Janaka Vaideha, Janaki Ayasthuna, Nami Sepya and Para Ahlara. Janak Ayasthuna in the Brihadaranyaka Upanishad is said to be pupil of Chuda Bhagavitti and a teacher of Satyakama Jabala. Satyakama Jabala is contemporary of Janaka Vaideha and Yajnavalkya. Ayasthuna was a Grihapati of those whose Adhvaryu was Saulvayana and taught the latter the proper mode of using certain spoons. Sayana Ayasthuna is the name of a Rishi. Jatak mentions a city named Thuna between Mithila and the Himalayas, a favourite resort of Ayasthuna. Janakpur corres-ponds exactly with the position assigned by Hiuen Tsang the capital of Vaji. Janaka Vaideha is Kriti Janaka, son of Bahulasva and was contemporary of Janamejaya Parikshita and his son Satanika. Yajnavalkya and Kritis were the disciples of Hiranyanabha Kausalya. Uddalaka Aruni was approached by Janamejaya Parikshita to become his priest. Uttanka instigated Janamejaya to exter¬minate the non-Aryan Sarpas by burning them in a sacrifice.Uddalaka Aruni with his son Svetaketu attended the Sarpa satra of Janamejaya. Yajnavalkya taught the Vedas to Satanika, the son and successor of Janamejaya.Kriti, the disciple of Hiranyanabha, was the son of a king. Janaka Videha was a contemporary of Uddalaka Aruni,Yajna¬valkya, Ushasti Chakrayana. Janaka Vaideha brought centre of political and intellectual gravity from the Kuru country to Videha.The royal seat of the main branch of the Kuru or Bharata dynasty shifted to Kausambi. Aitareya Brahman says that all kings of the are called Samrat. Satapatha¬ Brahman says that the Samrat was a higher authority than a Rajan as by the Rajasuya he becomes Raja and by Vajapeya he becomes Samrat.
The Kuru ¬Panchalas were called Rajan. Janaka Vaideha’s was a master of Agnihotra sacrifice. Yajnavalkya learnt the Agnihotra from this king. Yajnavalkya Vajasaneya, who was a pupil of Uddalaka Aruni.

सिद्धिरस्तु

  1. मान्यवर,
    1.अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भ’ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ’ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ’ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आ’ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ’ भौगोलिक दूरीक अंत भ’ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ’ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ’ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आ’ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ’ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
    2. अहाँ लोकनिसँ ‘विदेह’ लेल स्तरीय रचना सेहो आमंत्रित अछि। कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
    हमर ई-मेल संकेत अछि-
    ggajendra@videha.com

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