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विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १०http://www.videha.co.in/

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विदेह १५ मई २००८ वर्ष १ मास ५ अंक १०
‘विदेह’ १५ मई २००८ (वर्ष १ मास ५ अंक १०)एहि अंकमे अछि:-
१.नो एंट्री: मा प्रविश श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’
मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि। सर्वप्रथम विदेहमे एकरा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि। पढ़ू नाटकक दोसर कल्लोलक पहिल खेप।
२. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ)
३. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)
४. महाकाव्य महाभारत (आगाँ) ५. कथा(फूसि-फटक)
६. पद्य अ. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी,
आ. श्री गंगेश गुंजन, इ.ज्योति झा चौधरी
आ’ ई. गजेन्द्र ठाकुर
७. संस्कृत –मैथिली शिक्षा(आगाँ)
८. मिथिला कला(आगाँ)
९.पाबनि ( जानकी नवमी पर विशेष)- नूतन झा
१०. संगीत शिक्षा 1११. बालानां कृते- बगियाक गाछ
१२. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी )
१३. संस्कृत मिथिला १४ भाषापाक १५. रचना लेखन (आगाँ)
१६VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS
VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT..
महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर मैथिली-अंग्रेजी आऽ अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश (संपादक गजेन्द्र ठाकुर आऽ नागेन्द्र कुमार झा) प्रकाशित करबाओल जा’ रहल अछि। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना(४): श्री आद्याचरण झा, श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ श्री कैलाश कुमार मिश्र (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र), श्री श्याम झा आऽ डॉ. श्री शिव प्रसाद यादव जीक सम्मति आयल अछि आऽ हिनकर सभक रचना अगिला १-२ अंकक बादसँ ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित होमय लागत।

महत्त्वपूर्ण सूचना(५): २० म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मिथिला रत्न श्री रामाश्रय झा ‘रामरंग’ जिनका लोक ‘अभिनव भातखण्डे’ केर नामसँ सेहो सोर करैत छन्हि, ‘विदेह’ केर हेतु अपन संदेश पठओने छथि आऽ ताहि आधार पर हुनकर जीवन आऽ कृतिक विषयमे विस्तृत निबंध विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे ई-प्रकाशित करबाक हमरा लोकनिकें सौभाग्य भेटल अछि।
विदेह (दिनांक १५मई, २००८)
संपादकीय
वर्ष: १ मास: ५ अंक:१०
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक १० दिनांक १५ मई २००८) ई पब्लिश भ’ रहल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भ’ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर १० टा अंक http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित भ’ चुकल अछि। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ’ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ’ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आ’ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ’ भौगोलिक दूरीक अंत भ’ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ’ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ’ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आ’ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ’ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि। एकर अतिरिक्त संपर्क खोज स्तंभमे विदेह आ’ आन-आन मिथिला आ’ मैथिलीसँ संबंधित साइटमे सर्च हेतु सर्च इंजिन विकसित कए राखल गेल अछि। ओहि पृष्ठ पर मिथिला आ’ मैथिलीसँ संबंधित समाचारक लिंक विकसित कए सेहो राखल गेल अछि। संपर्क-खोज पृष्ठ पर मिथिला आ’ मैथिलीसँ संबंधित साइटक संकलनकेँ आर दृढ़ कएल गेल अछि। विदेहक सभ पृष्ठकेँ १० लिपिमे देखल जा’ सकैत अछि आ’ ताहि हेति सभ पृष्ठ पर लिंक देल गेल अछि। भाषा मैथिलिये रहत मुदा आन भाषा-भाषी मैथिलीक आनंद अपन लिपिमे पढि कए लए सकैत छथि।
नचिकेताजी अपन २५ सालक चुप्पी तोड़ि नो एंट्री: मा प्रविश नाटक मैथिलीक पाठकक समक्ष विदेह ई-पत्रिकाक माध्यमसँ पहुँचा रहल छथि। धारावाहिक रूँपे ई नाटक विदेहमे ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
३ जूनकेँ एहि बेर वट सावित्री अछि। एहि अवसर पर एहिसँ संबंधित निबंध देल जा’ रहल अछि।एहि निबंधक लेखिका छथि श्रीमति नूतन झा।
बालानां कृतेमे बगियाक गाछ शीर्षक लोककथाकेँ ज्योतिजीक चित्रसँ सुसज्जित कएल गेल अछि।
श्री गंगेश गुंजन जीक कविता पाठकक समक्ष अछि।
श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन, श्री आद्याचरण झा आऽ डॉ. श्री शिव प्रसाद यादव जीक सम्मति आयल अछि आऽ विदेहमे एक-दू अंकक बाद हिनकर सभक रचना विदेहक पाठकक लोकनिक समक्ष आबय लागत।
मिथिलाक रत्न स्तंभकेँ नाम आ’ वर्षसँ जतय तक संभव भ’ सकल विभूषित कएल गेल अछि। एकर परिवर्द्धनक हेतु सुझाव आमंत्रित अछि। मिथिला रत्नमे बैकग्राउन्ड संगीत सेहो अछि, आ’ ई अछि विश्ववक प्रथम राष्ट्रभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत आशीश मंत्र सेहो कहल जाइत अछि, एकर अर्थ विदेह आर्काइव स्तंभमे अभिनव रूपमे देल गेल अछि, आ’ ग्रिफिथक देल अर्थसँ एकर भिन्नता देखाओल गेल अछि। मुख्य पृष्ठक बैकग्राउन्ड संगीत विद्यापतिक बड़ सुख सार तँ अछिये पहिनेसँ।
‘विदेह’ ई पत्रिकाक प्रचार सर्च इंजिन द्वारा, गूगल आ’ याहू ग्रुप द्वारा, वर्डप्रेस आ’ ब्लॉगस्पॉटमे देलगेल ब्लॉग द्वारा, फेसबुक, आउटलूक, माय स्पेस, ओरकुट आ’ चिट्ठाजगतक माध्यमसँ कएल गेल। मुदा जखन डाटा देखलहुँ तँ आधसँ बेशी पाठक सोझे http://www.videha.co.in पता टाइप कए एहि ई-पत्रिकाकेँ पढ़लन्हि।
अपनेक रचना आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि।
गजेन्द्र ठाकुर
389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०.
फैक्स:०११-४१७७१७२५
१५ मई २००८ नव देहली
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(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ’ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ’ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

१. नाटक

श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-1951 ई. कलकत्तामे।1966 मे 15 वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | 1971 ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| 1974 मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। 1976-77 ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। 1978मे जनक आ’ अन्य एकांकी। 1981 ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। 1988 ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। 1997-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। 1998 ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। 1999 ‘अश्रु ओ परिहास’। 2002 ‘खाम खेयाली’। 2006मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। 14 टा पी.एह.डी. आ’ 29 टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
दोसर कल्लोलक पहिल भाग जारी….विदेहक एहि दसम अंक १५ मई २००८ मे।
नो एंट्री : मा प्रविश

दोसर कल्लोल पहिल खेप

दोसर कल्लोल
[पश्चाद्पट मे स्वर्ग-द्वारे लखा दैछ मुदा मंचक एक दिसि द्वारक बाम भागक देबार लग एकटा भाषण देबा जोकर कनेक ऊँच भाषण-मंच आ ताहि पर एकटा माईक देखल जायत। भाषण-मंच पर तीनटा नीक कुर्सी देखल जायत। ओमहर दरबज्जाक सामने आ भाषण-मंचक लग बाईस-चौबीस-टा भाड़ा केर कुर्सी सेहो राखल रहत जाहि पर चारि-टा मृत सैनिक सँ ल’ कए चारि-गोट बाजा बजौनिहार आ प्रथम कल्लोल मे देखल सब गोटे – नंदी– भृंगी केँ ल’ कए चौदहो गोटे बैसल प्रतीक्षा करैत छथि। लगैछ सब क्यो प्रतीक्षा करैत-करैत परेशान भ’ गेल छथि।]

अनुचर-1 :(नेताजी एखनहु धरि नहि आयल छलाह। हुनक दूटा अनुचर मे सँ एक गोटे कहुना माईक पर किछु ने किछु बजबाक प्रयास क’ रहल छल – जाहि सँ लोग ऊबि कए कतहु सरकि ने जाय!) त’ भाई – बहिन सब ! जे हम कहै छलहुँ… आजुक एहि अशांतिमय परिवेश मे एकमात्र बदरीये बाबू छथि जे शांतिक दूत बनि कए मथिले मात्र नहि, समस्त भारतक आतंकवादी, कलेसवादी, उग्रवादी, अत्यूग्रवादी, चंडवादी, प्रचंडवादी सँ ल’ कए सब तरहक विवादीक झगड़ा-विवादकेँ मेटैबाक लेल द्विचक्रयान सँ ल’ कए वायुयान धरि , सभ तरहक वाहन मे अत्यंत कष्ट आ जोखिम उठा कए सफर करैत रहलाह। आ अहिना सब ठाम… सगरे, अपन बातक जादुई छड़ीकेँ चलबैत सभक दुःख- दर्द केँ दूर करैत रहलाह। मिथिलाक महान नेता एक बद्री-विशाल सिंहे छथि जे…

बाजारी : (परेशान भ’ कए) हौ, से सबटा त’ बुझलियह मुदा
ई त’ बताब’ जे बद्री बाबू छथि कत’?
बीमा-बाबू : आर कतेक देर प्रतीक्षा करय पड़त ?
अनुचर 2 : (जे भाषण-मंचक कोना पर ठाढ़ रहैत अछि आ
बीच-बीच मे उतरि कए बाहर जा कए झाँकि कए
देखबाक प्रयास क’ कए घुरि-घुरि आबैत छल।) हे,
आब आबिये रहल हेताह !
बाजारी : हे हौ! इयैह बात त’ हम सब बड़ी काल सँ सुनि
रहल छियह ! “आब आबिये रहल छथि…”
बीमा-बाबू : आ बैसल बैसल पैर मे बघा लागि रहल
अछि…हमरा सँ त’ बेसी देर धरि बैसले नहि
जाइत अछि।
अनुचर 1 : (सब केँ शांत करैत) हे…बात सुनू… बात सुनू
भाइ-सब ! बैसै जाउ, कने शांत भ’ कए बैसल ने
जाइ जाउ!
अनुचर 2 : (बजबाक भंगिमा सँ स्पष्ट भ’ जाइत छनि जे फूसि बाजि रहल छथि-) कनिये काल पूर्व ओ धर्म-शिला हैलिकॉप्टर पर सँ उतरल छथि। आब ओ रास्ता मे छथि– कखनहु पहुँचि सकै छथि… !
अनुचर 1 : आब जखन ओ आबिये रहल छथि, प्रायः पहुँचिये
गेल छथि, आजुक समय-समन्वय-सामान्यजन
आ चारुकात चलि रहल अनाचार दय बद्री बाबूकेँ
की कहबाक छनि, से सुनैत जाय जाउ !
बाजारी : अच्छा त’ कह’ ने कोन नव बात कहब’!
अनुचर1 : ओना अहीं कियैक हम सब चाहै छी जे सब किछु
नव हो… ! रास्ता नव हो, ओ पथ जतय पहुँचत से
लक्ष्य नव हो, एहन पथ पर सँ चलनिहार हमरा-
अहाँ सनक पुरनका जमानाक लोग मात्र नञि –
नवीन युगक नवतुरिया सब हो ! पुरातन ग्लानि,
पुरना दुःख-दर्द सब, प्राचीने इतिहासक पृष्ठ पर
हमसब ओझरायल जकाँ मात्र ठाढ़ नहि रही,
किछु नव करी… !

बीमा-बाबू : ई बात त’ ठीके कहि रहल छी।
भद्र व्यक्ति : (दुनू गोटे) ‘ठीक, ठीक ! एकदम ठीक”,आदि।
अनुचर1 : आ इयैह बात बद्री विशाल बाबू सेहो बाजैत छथि-
विशाल जनिक हृदय, श्रम-जीवी मनुक्खक लेल
जनिक हृदय सँ सदिखन रक्त झरै छनि, जनिका
लेल पुरनका लोक, रीति-रेवाज ततबे महत्वपूर्ण
जतबा नवयौवनक ज्वार, नवीन पीढ़ीक आशा-
आकांक्षा – ई सब किछु। आजुक युग मे वैह एकटा
राजनेता छथि जे नव आ पुरानक बीच मे एकटा
सेतु बनल स्वयं ठाढ छथि आ ओ सेतु जेना
कहि रहल हो—
आउ पुरातन, आऊ हे नूतन।
हे नवयौवन, आऊ सनातन ।।
प्राण-परायण, जीर्ण जरायन।
बज्र-कठिन प्रण गौण गरायन।।
सुतनु सुधनु सुख सँ गायन।
जीर्ण ई धरणी तटमुख त्रायन ।।
अघन सधन मन धन-दुख-दायन।
जाऊ पुरातन, आऊ नवायन।।

[एहन उत्कृष्ट काव्य-पाठ सुनि रद्दी-बला आ भिख-मंगनी प्रशंसा सूचक “वाह-वाह” कहैत ताली बजाब’ लागै’ छथि। त’ हिनका दुनू केँ देखि अनुचर 2 आ नंदी-भृंगी केँ छोड़ि बाकी सब सोटे ताली बजाब’ लागैत छथि।]

चोर : (लगमे बैसल रद्दी-बला केँ) हे… किछु बुझलह
एकर कविता कि आहिना ? (रद्दी-बला आँखि उठा
कए मात्र देखैत अछि, जिज्ञासा आँखि मे…) हमरा
त’ किछु नहि बुझ’ मे आयल।
रद्दी-बला : नव किछु भरि जिनगी कैने रहित’ तखन ने? एहि ठामक
माल ओम्हर…आ ओहि ठामक एम्हर… !
भिख-मंगनी : ठीके त’! तोँ कोना बुझबह ?
चोर : पहिल दूटा पाँती त’ बुझिये गेल छलहुँ। मुदा तकर
बाद सबटा कुहेस जकाँ अस्पष्ट…एत्तेक नवीन छल
जे बुझ’ मे नहि आयल !
अनुचर 2 : हे! के हल्ला क’ रहल छी ?
भिख-मंगनी : हे ई चोरबा कहै छल…

चोर : (डाँटैत) चुप! भिख-मंगनी नहितन…हमरा ‘चोर’
कहैये!
भिख-मंगनी : हाय गौ माय! ‘चोर’ केँ ‘चोर’ नहि कहबै त’ की
कहू ? कोन नव नामे बजाऊ ?
अनुचर 1 : (माईक सँ, कनेक स्वर केँ कर्कश करैत) हे अहाँ
सब एक दोसरा सँ झगड़ा नहि करु! जे किछु
बतिआबक अछि, हमरे सँ पुछू ! (भिख-मंगनी केँ
देखा कए) हे अहाँ… (भिख-मंगनी एम्हर-ओम्हर
देखैत अछि) हँ,हँ – अही केँ कहै छी ! बाजू…की
बाजै छलहुँ ? पहिने बाजू- अहाँ के छी ?
चोर : (बिहुँसैत) भिख-मंग- (वाक्य अधूरे रहि जाइत
छनि, कियैक त’ भिख-मंगनी झपटि कए चोरक
मुँह पर हाथ ध’ दैत अछि-बाँकी बाजै नहि दैछ।)
(तावत् दुनू अनुचर झपटा-झपटी देखि कए,
“हे…हे…!” कहैत मना करबाक प्रयास मे अगुआ अबैत अछि।)
भिख-मंगनी : (चोरक मुँह पर सँ अपन हाथ केँ हँटाबैत, ठाढ़
भ’ कए अपन परिचय दैत, कने लजबैत…) हमर
नाम भेल ‘अनसूया!’
अनुचर1 : अच्छा, अच्छा! त’ अहाँ अवश्ये श्रमजीवी वर्गक
छी…सैह लागैत अछि !
भिख-मंगनी : हँ!
अनुचर 2 : कोन ठाम घर भेल ?
भिख-मंगनी : घर त’ भेल सरिसवपाही…मुदा,
अनुचर 2 : मुदा?
भिख-मंगनी : रहै छलहुँ दिल्ली मे… असोक नगर बस्ती मे…
अनुचर 1 : आ’ काज कोन करैत छलहुँ बहिन ?
भिख-मंगनी : गेल त’ छलहुँ मिथिला चित्रकलाक हुनर ल’ कए,
अपन बनायल किछु कृति बेच’ लेल… मुदा,…
(दीर्घ-श्वास त्यागि) के जानै छल, जे ओ शहरे
एहन छल जत’ कला-तला केर कोनो कदर नहि… अंतत: हमरा कोनो चौराहाक भिख-मंगनी बना कए
छोड़ि देलक।
अनुचर 2 : आ-हा-हा,ई त’ घोर अन्याय भेल अहाँक संग। घोर
अन्याय… अन्हेर भ’ गेल!
अनुचर 1 : (प्रयास करैत प्रसंगकेँ बदलैत छथि– गला
खखाड़ि कए) मुदा ई नहि बतैलहुँ जे अहाँ कह’
की चाहैत छलहुँ ?
भिख-मंगनी : हमरा लागल, अहाँ जे बात कहि रहल छलहुँ ताहि
मे बहुत किछु नव छल, तकर अलावे-
रद्दी-बला : हमरा सब केँ त’ बुझ’ मे कोनो दिक्कति नहि
भेल, मुदा
अनुचर 2 : मुदा ?
भिख-मंगनी : (चोर केँ देखा कए) हिनकर कहब छनि जे मात्र
पहिल दूटा पाँतीक अर्थ स्पष्ट छल, आ तकर
बाद…
अनुचर 1 : ओ…आब बुझलहुँ। भ’ सकैछ…ई भ’ सकैछ जे
किनको-किनको हमर सभक वक्तव्य कठिन आ
नहि त’ अपाच्य लगनि। ई संभव अछि जे हिनका
लेल नव-पुरानक संज्ञा किछु आरे…
[बात पूरा हैबाक पूर्वे रद्दी-बला आ भिख-मंगनी हँसि दैत अछि…संगहि उचक्का आ बाजारी सेहो। अनुचर-
द्वय बुझि नहि पबैत छथि जे ओसब कियैक हँसि रहल
छलाह।] कियैक ? की भेल ? हम किछु गलत कहलहुँ
की ?
रद्दी-बला : अहाँ कियैक गलत वा फूसि बाजब?
भिख-मंगनी : अहाँ त’ उचिते कहलियैक।
बाजारी : मुदा हिनका पूछि कए त’ देखू-ई कोन तरहक सेवा
मे नियुक्त छथि !
अनुचर 2 : [अनुचर-द्वय बूझि नहि पबैत छथि जे की कहताह।]
क.. कियैक?
अनुचर 1 : (चोर सँ) की सब बाजि रहल छथि ई-सब?

[चोर शांत-चित्तेँ उठि कए ठाढ होइत अछि आ भाषण–मंचक दिसि आगाँ बढैत जाइत अछि। अंत मे मंच पर चढ़ि कए बजैत छथि…]

चोर : (अनुचर 1 केँ) जँ ई चाहै छी हमर उत्तर सुनब,आ जँ सत्ते
किछु नव सुन’ चाहै छी तखन हमरा कनीकाल माईक सँ
बाजै देमे पड़त।
(अनुचर-द्वय केँ चुप देखि) कहू की विचार!
अनुचर 1 : (नर्वस भ’ जाइत छथि) हँ-हँ, कियै नञि?
चोर : [माईक हाथ मे पाबि चोर कुर्ता केर आस्तीन आदि समटैत एकटा दीर्घ भाषणक लेल प्रस्तुत होइत
छथि।] अहाँ सब आश्चर्यचकित हैब आ भरिसक परेशान
सेहो, जे हम कोन नव बात कहि सकब। [अनुचर-
द्वय केँ अपन परिचय दैत] आखिर छी त’ हम एकटा सामान्य चोरे, छोट-छीन चोरि करैत छलहुँ, मुदा भूलो सँ ककरहु ने जान नेने छी आ ने आघाते केने छी। चोरि केँ हम अपन कर्म आ धर्म बुझैत छलहुँ – ई जेना हमर ढाल जकाँ छल हमरा कोनो बड़का अपराध सँ बचैबाक! सोचै छलहुँ जे चोरि, माने तस्करता – एकटा ऊँच दर्जा केर कला सैह थिक। सामान्य भद्र व्यक्तिक लेल एतेक सहजे ई काज संभव नहि भ’ सकैत छनि। (दुनू भद्र व्यक्तिकेँ देखा कए) हिनके दुनू केँ देखिऔन ने…त’ हमर बात बूझि जायब।(हँसैत) हिनका दुनूक समक्ष कोनो लोभनीय वस्तु राखि दियनु… तैयहु, इच्छा होइतहु ई लोकनि ओहि वस्तु केँ ल’ कए चम्पत् नहि भ’ सकैत छथि। (गंभीर मुद्रामे) कहबाक तात्पर्य ई जे जेना मिथिला चित्रकला एकटा कला थिक, चोरि करब सेहो चौंसठि कलाक भीतर एकटा कला होइत अछि।

अनुचर 2 : मानलहुँ। ई मानि गेलहुँ जे चौर्यकला एकटा
महत्वपूर्ण वृत्ति थिक, मात्र प्रवृत्ति नहि। मुदा…
चोर : (हुनक बात केँ जेना हवा मे लोकि लैत छथि) मुदा ई
प्रश्न उठि सकैत अछि जे हम चोरि करिते किएक छी ?
विशेष…तखन, जखन कि परिवारमे क्यो अछिये नहि.. तखन एहन कार्य अथवा कलाक प्रयोगक कोन प्रयोजन छल?
बाजारी : ठीक !
चोर : जँ आन-आन वृति सभ दय सोची त’ ई बूझब
कठिन भ’ जाइत अछि जे चोरी वा तस्करी कत’ नहि अछि ? आजुक संगीतकार पछिलुका जमाना केर गीत-संगीतसँ ‘प्रेरणा’ लैत छथि। तहियौका संगीतकार पुरनका संगीतकेँ नव शरीरमे गबबै छलाह। हुनकर सभक ‘प्रेरणा’ छलनि कीर्तन आ लोक-संगीत। आ कीर्तनिञा लोकनि केँ कथी लेल हिचकिचाहटि हैतनि अपनहु सँ प्राचीन शास्त्रीय संगीत सँ कनी-मनी नकल उतारबामे ? (थम्हैत सभक ‘मूड’ केँ बुझबाक प्रयास करैत) सैह बात सनीमा मे थियेटर मे … कथा, कविता मे सेहो….!
बाजारी : तोँ कहैत छह आजुक सभटा लेखक कल्हुका साहित्यकारक नकल करैत अछि, आ कल्हुका लोक परसुका कवि लेखकक रचनासँ चोरी करै छल…?
अनुचर 1 : माने चोरि पर चोरि…?
अनुचर 2 : आ चोरिये पर टिकल अछि दुनियाँ ?
बाजारी : हे… ई त’ अन्हेर क’ देलह हौ…!
चोर : अन्हेर कियै हैत ? कोनो दू टा पाँति ल’ लिय’ ने-
‘मेघक बरखा….
बाजारी : ई त’ रवीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता भेल, नेना-भुटका सभ
लेल लिखल…

भद्र व्यक्ति 1 : (असंतुष्ट स्वरमे) एहिमे चोरी केर कोन बात भेल ?
बाजारी : ओ ककर नकल उतारि रहल छलाह ?
भद्र व्यक्ति 2 : हुनका सन महान कविकेँ चोर कहै छी ?
चोर : (जेना हिनका सभक बात सुनतहि नहि छथि-हाथसँ सभटा बात केँ झारैत…) विद्यापतियेक पाँति लिय—“माधव बहुत मिनती करी तोय !”
उचक्का : एकरा लखे तँ सभ क्यो चोर…
पॉकिट-मार : (हँसैत) आ सबटा दुनियाँ अछि भरल फुसिसँ…सबटा महामाया…
बाजारी : हे एकर बातमे नहि आउ ! (अनुचर द्वयसँ) अहाँसभ कोन नव बात कहै दय छलहुँ…सैह कहु ।
चोर : (उच्च स्वरमे) कोना कहताह ओ नव बात ? विद्यापतिक एहि एक पाँतिमे कोन एहन शब्द छल जे ने अहाँ जानै छी आ ने हम ? ‘माधव’… ‘बहुत’… वा ‘मिनती’… अथवा एहन कोन वाक्य ओ बाजैत छलाह जे हुनकासँ पहिनहि क्यो नहि बाजि देने छल ? आ शतेको एहन कवि भेल हेताह जे मेघक बरिसब दय बजने हेताह आ एहन सभटा शब्दसँ गढ़ने हेताह अपन कविता केँ ?

(सभ क्यो एहि तर्क पर कनेक चुप भ’ क’ सोच’ लेल बाध्य भ’ जाइत छथि।)

अनुचर 1 : माने…?
चोर : माने ई जे दुनियाँ मे एहन कोनो वाक्य नञि भ’ सकैछ जकर एकटा बड़का टा अंश आन क्यो कखनहु कतहु कोनो ने कोनो उद्देश्यसँ वा मजबूरीसँ बाजि नञि देने होथि ! भ’ सकैछ अहाँ तीन व्यक्तिक तीनटा बातक टुकड़ी- टुकड़ी जोड़ि कय किछु बाजि रहल होइक ! एहिमे नव कोन बात भ’ सकैछ ?
बाजारी : हम सदिखन नव बात कहबा लेल थोड़े बाजै छी ? हम त’ मोनक कोनो ने कोनो भावनाकेँ बस उगड़ि दैत छी….।
चोर : आ तैँ आइ धरि जे किछु बजलहुँ से सभटा बाजारमे…. माने एहि पृथ्वीक कोनो ने कोनो बाजारमे क्यो ने क्यो अथवा कैक गोटे पहिनहुँ बजने छल ?
अनुचर 1 : तखन अहाँ कह’ चाहै छी जे….
चोर : (पुन: बातकेँ काटैत) ने अहाँ किछु नव बात कहि सकै छी आ ने अहाँ केर नेता…।

(तावत नेपथ्यमे शोर होइत छैक ..”नेताजी अयलाह”, “हे वैह छथि नेताजी” कतय, कतय यौ ! हे देखै नञि छी ? आदि सुनबामे अबैत अछि। क्यो नारा देम’ लागैत अछि—‘नेताजी जिन्दाबाद’ देशक नेता बदरी बाबू जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! आदि सुनल जाइछ। मंचपर बैसल सब गोटामे जेना खलबली मचि गेल होइक। सभ उठि कय ठाढ़ भ’ जाइत छथि। क्यो-क्यो अनका सभक परवाहि कयने बिनु अगुआ ऐबाक प्रयास करैत छथि।
तावत गर मे एकटा गेंदाक माला पहिरने आ कपार पर एकटा ललका तिलक लगौने कुर्ता – पैजामामे सभकेँ नमस्कार करैत नेताजी मंच पर अबैत छथि…पाछू- पाछू पाँच-सात गोटे आर अबैत छथि आ सब मिलि कए एकटा अकारण भीड़क कारण बनि जाइत छथि। “नमस्कार ! नमस्कार ! जय मिथिला… जय जानकी माता..कहैत ओ मंच पर उपस्थित होइत छथि आ बगलहिमे माईक पर चोरकेँ पबैत छथि।
धीरे-धीरे सब क्यो अपन-अपन आसन पर बैसि जाइत छथि, अनुचर दुनू कोना की करताह नेताजीक लेल से बुझि नहि पबैत छथि, कखनहु लोककेँ शांत करैत छथि त’ कखनहु “नेताजी जिन्दाबाद” ! कहि छथि त’ फेरो कखनहुँ हुनक पाछू-पाछू आबि कए कुर्सी आदि सरिआब’ लगैत छथि। अतिरिक्त लोक सभ तावत् बाहर चलि जाइत छथि।)

(क्रमश:)
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२.शोध लेख
मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा)
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ’ स्त्री-धन केर संदर्भमे
श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।

मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध
प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ’ स्त्री-धन केर संदर्भमे

द्वितीय मण्डलमे राजाक समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओऽ नहि कएलन्हि।अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आऽ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आऽ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आऽ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आऽ वैश्य कर्म करैत छथि, मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आऽ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमय लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति चलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओऽ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आऽ अनास दस्यु ओकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आऽ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आऽ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि।

तृतीय मण्डल

अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आऽ महीँसक बलि केर चर्च अछि।
माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि, मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि।

चतुर्थ मण्डल
राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आऽ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह।
’अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल!’ एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जनि ऋगवेदिक युगमे कोन कए देलन्हि।

पञ्चम मण्डल

अश्वारोहन प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आऽ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आऽ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि।

षष्ठ मण्डल

महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि, आऽ ओऽ सभ पशुपालन आऽ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आऽ एक्र अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छालाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि।
सप्तम मण्डल
बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जाऽ कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जाऽ कए बूझि सकलाह आऽ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल, फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझड़ायल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि।

अष्टम् मण्डल

ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आऽ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आऽ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आऽ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आऽ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आऽ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आऽ हेलमन्द तटक युद्ध आऽ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आऽ क्षत्रियक कर्मक फराक होयब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आऽ अपन नाम रखबाक प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल।
नवम् मण्डल
वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पीक पात्रक उपस्थिति आऽ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनल्क वस्तु जात- जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आऽ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि।

दशम् मण्डल
श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग ज्न द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जायब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आयब आऽ ओतुका लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आऽ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा क्ष्ण लोकनि दीर्घकाय छलाह आऽ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आऽ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आऽ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि।
अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल, आऽ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल आदिक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपनाऽ सकल।
(अनुवर्तते)

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

आब ओऽ छौड़ा कानय खीजय लागल, आऽ पैघ वर्गक कोनो बदमाश विद्यार्थीकेँ बाजाबए हेतु गेल। फेर घुरि कए जे आयल तँ ओकर कानब-खीजब बन्न भए गेल छलैक, हमरा कहलक जे हमर भाग्य नीक अछि जे जकरा ओऽ बजाबए गेल छल से आइ स्कूल नहि आएल अछि।
दू तीन दिन धरि हम ई गुन-धुन करैत रहलहुँ जे ओऽ ओहि बदमाशकेँ बजाऽ कए नहि आनि लए। ओहिना किछु दिनुका बाद ओकरा फेर कोनो दोसर छौड़ासँ झगड़ा भेलैक आऽ ओहि दिन ओऽ हीरो छौड़ा स्कूल आएल छल। हमरे सोझाँमे ओऽ हमर कक्षामे आएल आऽ एक फैट पेटमे दोसर विद्यार्थीकेँ मारलकैक। क्यो बचबए लेल तँ नहि गेलैक मुदा बादमे जखन एकटा क्लासमे शिक्षक नहि अएलाह आऽ विद्यार्थी सभ खाली गप शप कए रहल छल तखन एहि बातक निर्णय भेल जे आब ओहि विद्यार्थीसँ क्यो गप नहि करत आऽ क्लास टीचरसँ एहि गपक शिकाइत कएल जायय जाहिसँ ओऽ ओहि बदमाश विद्यार्थीक क्लास टीचरकेँ एहि घटनाक विषयमे बताबथि। आब ओऽ पिनकाह विद्यार्थी शुक-पाक करए लागल।फेर ओहि विद्यार्थीक लग गेल ओकरा कान भड़ि कए आयल जे सभ ओकरा विरुद्धमे चालि चलि रहल अछि। ओऽ बदमाश आबि कए सभकेँ उठबाक लेल कहलक, मुदा क्यो नहि उठल। तख्न ओऽ हमरा कहलक जे उठू। हम उठि गेलहुँ आऽ तखन ओहिना एक-एक कऽ कए तीन चारि गोते केँ उठेलक आऽ फेर सभकेँ उठबाक लेल कहलक। सभ उठि गेल। तखन सभकेँ धमकी देमय लागल। मुदा एहि बेर हमर सभक क्लास मोनीटर किछु हिम्मतसँ काज लेलक आऽ ओकरा ओहि छौड़ाक विषयमे कहए लागल। हमरा देखाय कए कहलक जे एकरा देखैत छी? कनियो बदमाश लगैत अछि, एकरो अहाँक नाम लऽ कए दबाड़ि रहल छल। ओऽ छौड़ा तँ हुण्ड छल से ओकर पारा चढ़ि गेलैक आऽ हमर वर्गक पिनकाहा छौड़ाकेँ चेतौनी देलकैक जे आइ दिनसँ कनैत खिजैत ओकरा लग नहि आओत आऽ ओकर नाम लऽ कए ककरोसँ झगड़ा नहि करत।
एहिना स्कूल चलि रहल छल आकि एक दिन एकटा छौड़ा वर्गमे पिहकी मारि देलकैक। ओऽ छौड़ा बीचहिमे बम्बई भागि गेल छल बाल कलाकार बनि कए। घुरि कए आयल तँ वर्ग शिक्षक पुछलन्हि जे किएक घुरि अएलहुँ तँ कहलकन्हि जे सभ कहलक जे एतय तँ सभ बी.ए., एम.ए. अछि, अहाँ कमसँ कम मैट्रिको कए लिअह। आब पिहकीक बाद वर्ग शिक्षक पढ़ाइ छोड़ि कए ओकर अन्वेषणमे लागि गेल। पिहकी कोन दिशिसँ आयल। बहुमतक आधार पर एक कातकेँ छाँटि देल गेल। आब आगूसँ आयल आकि पाछूसँ। ताहि आधार पर सेहो एकटा बेंच निर्धारण भए गेल। ओहि बेंच पर छह गोटे छलाह। आब ई निर्धारण होमए लागल जे बाम कातसँ आयल आकि दहिनसँ। फेर छहमे सँ दू गोटेक निर्धारण बहुमतक आधार पर कएल गेल। ओहिमेसँ एकटा हमरा लोकनिक बम्बइया हीरो छलाह, जनिकर बम्बइक खिस्सा टिपिनसँ लऽ कए लीजर क्लास धरि चलैत रहैत छल। मुदा एहि दुनू गोटेमे १:१ केर टाइ भए गेल कारण क्यो मानए हेतु तैयार नहि जे पिहकी के मारलन्हि।
एकर बाद डायरी खाली छल। नन्द बेटाकेँ बजा कए डायरी दए देलन्हि आऽ मात्र ई कहलन्हि जे पढ़ाई पर ध्यान दिअ। एहि बात पर लज्जित होएबाक कोनो बात नहि छल मुदा आरुणिकेँ हुनकर भाए बहिन एहि गपक लेल बहुत दिन धरि किचकिचाबैत रहलाह। अस्तु एक दिन ओऽ डायरीकेँ फाड़ि देलन्हि, आऽ ई आत्मकथात्मक उपन्यास पूर्ण होएबासँ पहिनहि खतम भए गेल।
(अनुवर्तते)
४.महाकाव्य
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ——
३. वन पर्व

पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन,
पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन।
तूणीर आऽ धनुष हुनकर संगमे छल,
साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल।
ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो,
अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल।
तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि,
प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।
माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्ना छी हम,
शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटय एहि क्षण।
अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होयत मुदा,
जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ।
फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ,
ई शस्त्र सभ मानव पर चलायब अछि वर्जित,
कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई।
शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव,
कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च,
नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम।
इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक,
शिव तपस्या कठोर छल होमय लागल।
तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि,
अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण,
वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल।
जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक,
किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल।
दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल,
एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल।
अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात,
अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल,
परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक,
अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल।
मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी,
भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी।
मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन,
उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ;,
पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओऽ माला,
किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन।
किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन,
पाशुपत अस्त्र माँगल छोड़ब रोकब सीखल पुनि।
शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे,
मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि।

तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे,
पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ।
एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक,
अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक।
माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर,
आयल छी हम एतय शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक,
तपस्या नृत्यक आऽ संगीतक करए भोग नहि,
ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु।

उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा,
कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ,
वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता,
शाप ई पुनि बनत वरदान नुकि सकब अहाँ।

पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा,
समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल आएत,
लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत।
किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए,
कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे,
अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल,
नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ
लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजमसँ।

तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ,
लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग।
प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल,
पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल।
स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ,
बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ,
सरस्वती पार कए कश्मीर आऽ गंधमादन पर्वत,
पार कए चढ़ल पर्वत एक वर्षा आऽ शिलापतन बिच।
पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि।
ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ,
छल जाऽ रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए,
पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन।
बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ,
नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल,
रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ।
आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल,
तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल,
युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओऽ,
जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल,
भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ,
द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा।
शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल,
जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई,
नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि।
कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबाले,
इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओऽ,
हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओऽ छल।
सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल,
देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत अर्जुन,
आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई,
कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओऽ।
कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण,
प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए।
तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल,
ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आयल,
काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि,
इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ,
अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए,
मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर आयत।

शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना,
एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल,
विचारि युधिष्ठिर रहल भाय आऽ द्रौपदीक संग,
तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल,
कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल,
हरिण एक आबि कुरयाबय लागल ओहिसँ,
जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर,
विस्मित भागल ओऽ लए हमर लकुड़ी,
कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी।
विप्रक संग पाँचो भाँय हरिणकेँ खेहारल,
मुदा छल ओऽ चपल भए गेल ओझल।
वरक गाछक नीचाँ ओऽ सभ लज्जित पियासल,
ठेहिआयल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए।
एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी,
उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई।
नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पियासल,
पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओऽ खसल।
सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल,
अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल,
शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल,
पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल।
युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए,
पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए।
युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल,
मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल।
वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब,
होएत एहि तरहक परिणाम जौँ धृष्टता करब।
ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल,
पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष।

मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू,
धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू।
यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा?
दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा।
वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु?
मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु ।
प्रवासीक संगी अछि के एकेटा?
विद्याक इतर नहि संगी एकोटा।
ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति?
अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति।
कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित?
क्रोधक हरएलासँ किए होयय क्यो शोकित।
कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक?
लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ।
ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित?
शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु।
धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे?
उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ।
कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान?
सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान।
सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे?
मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा,
एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की?
प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू,
कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब।
तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित,
सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ,
जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा।
धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा,
कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी,
माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित।
सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र,
पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु।
पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक,
पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह।

४. विराट पर्व
(अनुवर्तते)
५. कथा
१०.फूसि-फटक
“कोनो काज भेला पर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझ बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।
“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि से प्रशांते कहैत छन्हि”।
“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।
“अच्छा तँ फेर सैह होय। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँ लिखल रहैत छैक”।
“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”।
मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल। ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक तँ यैह उत्तर भेटैत छैक-
“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि, से जानि कचोट भऽ रहल अछि”। आऽ जखन ओऽ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-
“फलनाक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।
भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ हिनका सोँझा एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-
“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।
“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।
“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो कजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नै अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि कएलहुँ। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से बुझबामे आबि जएतन्हि तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, हगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी। भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।
“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।
“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।
“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय”।
“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।
फेर भाष्कर एकटा खिस्सा सुनबए लगलन्हि मीत भाइकेँ।
तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।
पहिने एकटा कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल। दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।
“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।
“ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर महादेवक दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे माहदेव हुनका हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि। आब कहितहुँ जे नहि पीबि रह्ल छथि तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि, से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू”। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।
दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि तँ पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि। जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।
“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भ्ल होएतैक जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू। बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ, माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?
मीत भाइ मूरी गोतने हँ मे मूरी डोलओलन्हि।
६. पद्य
अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)
आ.पद्य गंगेश गुंजन
इ.पद्य ज्योति झा चौधरी
ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर
अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)
विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य ।
जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि:
1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि।
मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि।
प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:-
4.
भजन विनय

प्रभु बिनु कौन करत दुःख त्राणः।।
कतेक दुखीके तारल जगमे
भवसागर बिनु जल जानः॥
कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल,
स्वर नञ सुनए छी कानः।।
अहाँके तौँ बानि पड़ल अछि,पतित उधारण नामः।
नामक टेक राखु अब प्रभुजी हम छी अधम जोना।
कृपा करब एहि जन पर कोन खबरि लेत आन।
रामजी पतितके नाहि सहारा दोसर के अछि आनः॥

5.
विहाग

भोला हेरू पलक एक बेरः॥
कतेक दुखीके तारल जगमे कतए गेलहुँ मेरो बेरः॥
भूतनाथ गौरीवरशंकर विपत्ति हरू एहि बेरः॥
जोना कृपा करब शिवशंकर कष्ट मिटत के औरः॥
बड़े दयालु जानि हम एलहुँ अहाँक शरण सुनि सोरः॥
रामजीके नहि आन सहारा दोसर केयो नहि औरः॥

6.

भजन महेशवाणी

भोला कखन करब दुःख त्रान?
त्रिविध ताप मोहि आय सतावे लेन चहन मेरो प्राण॥
निशिवासर मोहि युअ समवीने पलभर नहि विश्रामः॥
बहुत उपाय करिके हम हारल दिन-दिन दुःख बलबान,
ज्यौँ नहि कृपा करब शिवशंकर कष्ट के मेटत आन॥
रामजीके सरण राखू प्रभु, अधम शिरोमणि जान॥भोला.॥

7.
विनय विहाग

राम बिनु कौन हरत दुःख आन
कौशलपति कृपालु कोमल चित
जाहि धरत मुनि ध्यान॥
पतित अनेक तारल एहि जगमे,
जग-गणिका परधान।।
केवट,गृद्ध अजामिल तारो,
धोखहुषे लियो नाम,
नहि दयालु तुअ सम काउ दोसर,
कियो एक धनवान।।
रामजी अशरण आय पुकारो, भव ले करू मेरो त्राण॥रामबिनु॥

(अनुवर्तते)
(अनुवर्तते)
आ.पद्य गंगेश गुंजन
गंगेश गुंजन(1942- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ’ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
2.परिवर्त्तन

बदलू आंखि बाट बदलू
गाछक छाहरि मार्ग चलू
बहुत गोटय भेटत ओहि ठाम
आदर्शक बाना त्यागू
मात्र शब्द धरि ल’ ओढ़ू
मनपसिन्न सुविधा लोढ़ू
बेमतलब थिक गुंजन जी,
बाकी बेश रहओ सिद्धान्त
पोथी मे किछु अवसर पर
मंच, सभामे किन्तु ने घर
सगरे शीतल-शीतल छैक
रौद नहि बेश इजोरिया हैत
ठहाठही उज्जर मखमल
हरियर घनगर गाछे गाछ
मंद पवन सुरभित सब बात
जुनि झरकाउ, रहू सुस्थिर
बड़ अमूल्य थिक इहो शरीर
आत्मा तं पौतीक समान
सन्नुक मे जाँतल सामान

इ.पद्य ज्योति झा चौधरी

ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) आ’ हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्र्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
विकास
विकासशीलताक उच्चतम्‌ शिखर
कतऽ आऽ कतेक दूर पर भेटत।
ई एकमात्र मृगमरीचिका तऽ नहि
जे लग गेला पर बिला जायत ।
प्यासलकेँ लोभ दऽ बजाबए लेल
फेर कनिक दूर पर देखायत।
मनुष विज्ञान आर तकनीकक नशामे
आर कते दिन ओकरा खिहारइत रहत।
यात्रा मात्रसॅं प्रकृति दूषित भेल
भेटऽ मे की जानि कतेक हानि हएत।
परन्तु अपन ज्ञानक सीमा संकुचित कऽ
बुद्धिकेँ स्थूल तऽ नहि कएल जायत।
गति निर्धारण आ’ सामनजस्य चाही
जतऽ विकासक मार्ग नहि रोकल जायत।
संगहि प्रगति आऽ प्रकृति दुनुक भैयारी
विज्ञानक नाम पर नहि तोड़ल जायत।
ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर
अखण्ड भारत
धीर वीर छी मातु बेर की,
अबेर होइत सङ्कल्पक क्षण ई,
बुद्धि वर्चसि पर्जन्य बरिसथि,
सभा बिच वाक् निकसथि,
औषधीक बूटी पाकए यथेष्ठा,
अलभ्य लभ्यक योग रक्षा।
आगाँ निश्चयेण कार्यक क्रमक,
पराभव होए सभ शत्रु सभक,
वृद्धि बुद्धिक होऽ नाश शत्रुत्वक,
मित्रक उदय होऽ भरि जगत।
नगर चालन करथि स्त्रीगण,
कृषि सुफल होए करू प्रयत्न।
वृक्ष-जन्तुक संग बढि आब,
ठाढ होऊ नहि भारत भेल साँझ,
दोमू वर्चसिक गाछ झहराऊ पाकल फलानि,
नञि सोचबाक अनुकरणक अछि बेर प्राणी।
वर्चस्व अखण्ड भरतक मनसिक जगतमे,
पूर्ण होएत मनोरथ सभक क्यो छुटत नञि।

७. संस्कृत शिक्षा
(आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
काचित् वृद्धा आसीत्। तस्याः चत्वारः पुत्राः आसन्। ते पुत्राः अतीव सूराः आसन्। माता वृद्धा सर्वदा अपि तान् मातृभूमेः विशये कथाः श्रावयति स्म। अतः ते सर्वे अपि राष्ट्र विषये, अस्माकम् देश विषये बहु श्रद्धालवः आसन्। एकदा देशस्य उपरि शत्रूणाम् आक्रमणं भवति। तदा सर्वस्मिन् गृहे अपि एकैकः युद्धार्थं गच्छति। तदा वृद्धा माता प्रथम् पुत्रम् आह्वयति। तिलकं धारयति- भवान् युद्धार्थं गच्छतु- इति वदति। अनन्तरं प्रथमः पुत्रः युद्धार्थं गच्छति- तत्र शौर्येन युद्धं करोति, किन्तु वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा एषा वृद्धा माता प्रथमः पुत्रः मृतः- इति वार्त्तां श्रुणोति। वृद्धा माता द्वितीय पुत्रं आह्वयति- तमपि युद्धार्थं प्रेषयति। सः अपि शौर्येन् युद्धं करोति। सः अपि वीर स्वर्गं प्राप्नोति। तदा वृद्धा माता तृतीय पुत्रं आह्वयति। तृतीय पुत्रम् आलिङ्गति-प्रीत्या वदति। पुत्र, भवान् अपि युद्धार्थं गच्छतु। देशस्य रक्षनं करोतु। अस्माकं देशस्य कर्त्तव्यं अस्ति, अतः भवान् गच्छतु- इति वदति। तृतीयः पुत्रम् अपि युद्धार्थं गच्छति। वीरं स्वर्गं प्राप्नोति। तृतीयः पुत्रः अपि युद्धार्थं गतवान्। तत्राभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। किंचित् दिनानन्तरं वार्त्ता आगता- तृतीयः पुत्रः अपि मृतः। तदा ग्रामस्ताः सर्वे अपि वृद्धायाः समीपम् आगतवन्तः। ते सर्वे वृद्धाम् उक्त्तवन्तः- मातः- भवत्याः तृतीयः पुत्रः अपि रणरंगे मृतः अस्ति। भवत्याः अंतिम समये सः भवत्याः रक्षणार्थं भवत्याः कर्त्तव्यपालनार्थम् आवश्यकम् अस्ति। अतः भवती चतुर्थं पुत्रं मा प्रेषयतु। तदा वृद्धा माता तेषां वचनं न श्रुणोति। वृद्धा माता चतुर्थं पुत्रम् आह्वयति। वीर तिलकं धारयति- वदति अपि। पुत्रः भवान् गच्छतु- विजयं प्राप्यम् आगच्छतु। अस्माकं देशस्य रक्षनम् अस्माकं कर्त्तव्यम्। अतः भवान् गच्छतु। इति चतुर्थ पुत्रम् अपि प्रेषयति। एवं रणरंगेभि कर्मयुद्धं प्रवृत्तम्। अनन्तरं वार्त्ता आगच्छति- चतुर्थ पुत्रः अपि मृतः अस्ति। तदा मातुः नेत्रे अश्रुणि आगच्छति। तदा ग्रामस्य अधिकारी वृद्धायाः समीपम् आगच्छति। सः मातरं वदति- भोः मातः- वयं पूर्वमेव उक्त्तवन्तः- भवती चतुर्थं पुत्रं न प्रेषयेतु। परन्तु भवती न श्रुतवती। चतुर्थम् अपि पुत्रं प्रेषितवती। वयम् इदानीं किम् कुर्मः। भवती इदानीं रोदनं करोति चेत्- किम् प्रयोजनम्- इति पृच्छति। तदा माता वदति- भो महाशया। मम् चतुर्थः पुत्रः मृतः इति रोदनं नास्ति। दुःखं नास्ति। मम् मातृभूमेः रक्षणम् अवश्यं करणीयम्- इति इच्छा भवति। किन्तु देशस्य रक्षणार्थं प्रेषयितुम् मम् पञ्चमः पुत्रः नास्ति खलु इति दुःखं भवति। एवम् अस्माकं देशस्य रक्षणाय कतिचन् मातरः शत् पुत्राणां बलिदानं कृतवत्याः- अतएव इदानीम् अपि अस्माकं देशः सुरक्षितः अस्ति।

सुभाषितम्

वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।
षड् दोषाः पुरुषेणेह ह्यातव्या भूतिमिच्छिता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्य दीर्घसूत्रता॥

वयम् इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। यः पुरुषः ऐश्वर्य्यम् इच्छति, समृद्धिम् इच्छति, अभिवृद्धिम् इच्छति, संपदाम् इच्छति, सः एतान् सर्वान् दोषान् दूरी क्रियात्। के के दोषाः। निद्रा- सर्वत्र निद्रा न करणीयम्। तंद्रा- सर्वदा निद्रावस्थायामेव भवति तथा न भवेत- तंद्रा न भवेत। भयम्- सर्वेषु विषयेषु भयं न भवेत्। क्रोधः/ कोपः- यत्र-यत्र आवश्यकता अस्ति, तत्र कोपः करनीयः- यत्र कोपस्य आवश्यकता नास्ति, तत्र क्रोधः न दर्शनीयः। आलस्यम्- वयं तु सर्वदा विद्यार्थिनः एव। जीवने सर्वस्मिन् क्षणे अपि वयं शिक्षणं प्राप्नुमः, अतः अस्माषु कदा आलस्यं न भवेत्। दीर्घसूत्रम्- कार्यम् अद्य करोमि न श्वः करोमि परश्वः करोमि परश्वः सायंकाले करोमि एवं विलम्बः न भवेत् अद्यतन् कार्यम् अद्य करोमि, इदानीमेव करोमि इति एवं भवेत्।

सम्भाषणम्

रामः प्रीतिम्/ लतां पृच्छति।
रामः काम् पृच्छति।

अहं विज्ञानं जानामि।
अहं गृहतः आगच्छामि।
अहं विदेशतः/ विद्यालयतः/ मार्गतः/ कार्यालयतः/ हिमालयतः/ वाटिकातः/ नदीतः/ मन्दिरतः/ पुष्पतः
अहं पेटिकातः उपनेत्रं स्वीकरोमि।
कूप्यां जलम् अस्ति।
अहं कूपीतः जलं स्वीकरोमि।
अहं संचिकातः पत्रं स्वीकरोमि।
अहं शारदातः लेखनीम् स्वीकरोमि।
अहं गजेन्द्रतः करवस्त्रं स्वीकरोमि।
अहं कोषतः लेखनीं स्वीकरोमि।
अहं नदीतः जलम् आनयामि।
भवन्तः कुतः किम् आनयन्ति।
गङ्गा हिमालयतः प्रवहति।
गङ्गा कुतः प्रवहति।– प्रश्नं कुर्वन्।
रामः विद्यालयतः आगच्छति।
रामः कुतः आगच्छति।
अहं गच्छामि। अहम् आपणं गच्छामि।
आपणतः गृहं गच्छामि। गृहतः विद्यालयं गच्छामि। विद्यालयतः गृहम् आगच्छामि।
रमानन्दः कुतः कुत्र गच्छति।
रमानन्दः लखनऊ गच्छति। लखनऊतः अहमदाबादं गच्छति।
अहमदाबादतः बेङ्गलुरु गच्छति।
ज्ञानार्थं रामायणं पठामि।
अहं पाठनार्थं पठामि।
आनन्दार्थं नृत्यं करोमि।
आनन्दार्थं गीतं गायामि।
पठनार्थं ग्रंथालयं गच्छामि।
ओषधार्थम् औषधालयं गच्छामि।
अहम् उत्तरं वदामि।भवन्तः प्रश्नं वदन्तु।
राधाकृष्णः किमर्थं विद्यलयं गच्छति।
राधाकृष्णः पठनार्थं विद्यालयं गच्छति।
रामः ध्यानार्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं मंदिरं गच्छति।
रामः किमर्थं दूरदर्शनं पश्यति।
रामः आनन्दार्थं दूरदर्शनं पश्यति।
भोजनार्थम् उपहारमन्दिरं गच्छति।
रवीन्द्र उत्तिष्ठति। आदित्यः अपि उत्तिष्ठति।
रवीन्द्र उपविशति। आदित्यः अपि उपविशति।
शारदा लिखति। चित्रा अपि लिखति।
नाटकं पश्यति। चित्रम् अपि पश्यति।
अहं वाक्यद्वयम् अपि वदामि।
भवन्तः वदन्तु। वदन्तिवा।
अस्तु- अस्तु आगच्छामि।
अस्तु पिबामि।
विद्यां ददातु। तथास्तु। देवः किम् वदति।
देवः प्रत्यक्षः भवति। सः भवान्/ भवती पृच्छति।

पूर्वः- प्राची- इन्द्रः
दक्षिणः- अवाची- यमः
पश्चिमः-प्रतीची- वरुणः
उत्तरः-उदीची- कुबेरः
पूर्व-दक्षिण कोणः- आग्नेयकोणः-अग्निः
दक्षिण-पश्चिम कोणः- नैर्ऋत्यकोणः-नैऋत्य
पश्चिम-उत्तरकोणः- वायव्यकोणः- मरुतः
उत्तर-पूर्व कोणः- ईशानकोणः- ईशः शङ्करो

पद्य
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्,
असत्य वचनं न वदनीयम्,
पापकर्म न करणीयम्,
क्रोधलोभ मम त्ययणीयम्।
विपत्तिकाले शत्रु आगता,
तत्र स्थापिता मम सहनीयम्,
पूर्णविजय मम करणीयम्,
सत्कार्यं प्रति रमणीयम्।

(अनुवर्तते)

८. मिथिला कला (आगां)
श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर, उम्र 60 वर्ष, ग्राम- हैँठी-बाली, जिला मधुबनी।
कोजगराक अरिपन
कोजगरा मिथिलामे आश्विन पूर्णिमाक रातिमे मनाओल जाइत अछि।संध्यामे लक्ष्मीक पूजा कए मखानक भोग लगैत अछि। रत्रि जगरण कए चन्द्रमाक देखबाक आनन्द लेल जाइत अछि। नीचाँक लंब अरिपन पार कए देवता घरमे प्रवेश करैत छथि।कमलक फूल आऽ पद चिन्ह एहि निमित्त देल गेल अछि।

(अनुवर्तते)
९. पाबनि नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा – बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, निफ्ट, जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ’ मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ’ आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।”

निबंध – नूतन झा
वटसावित्री
मिथिलांचल में वटसावित्री ज्येष्ठ मासक अमावस्या तिथि केर मनौल जाइत अछि।अहि पाबनि के अहिबाती स्त्री स्वयम्‌ के वैधव्य सॅं मुक्त राख लेल मनाबैत छथि। अहि दिन नब वस्त्र , सामयिक फल, आम, अंकुरि, बड़क गाछ, बॉंसक बियनि आदिक बड़ महत्त्व अछि।सब सधवा स्त्री भोरे-भोर स्नानादि कऽ नव वस्त्र धारण कऽ फूल, नैवेद्य, बियनि, अछिंजल, सूत, धूप-दीप लऽ बड़क गाछ लग जाइत छथि।ओतऽ नियमपूर्वक पूजा करैत छथि। तदोपरान्त जल आ’ अन्न ग्रहण करैत छथि। व्रत करनिहारि अहि दिन अनून खाइत छथि ।
नवव्याहता के लेल ई पाबनि विशिष्ट अछि। पहिल बेर पाबनि बड विस्तृत रूप सॅं मनाओल जाइत अछि। इक दिन पहिने पबनौतिन अड़बा अड़बाइन खाइथ छथि ।ओहि दिन राति कऽ भगवतीक गीत नाद संगे हड़दि के गौर आ’ उड़दि के बड़ बनाक राखि लेल जाइत अछि।माटिक बिसहरा बना ओकरा चून सॅं ढौरकऽ रंग सॅं रॉंगि लेल जाइत अछि।पाबनि के दिन तीन पात अड़िपन पड़ैत छै। बिषहरा गौरी समेत सावित्रीक पूजा होति अछि।बड़क गाछ के त्रिपेक्षण कैल जाइत अछि जाहि में गाछक जड़ि में आम स लगाक जल ढारि सूत लपेट क बियनि डोलैल जाइत अछि।आरतीक बाद कथा कहल जाइत अछि आ पबनौतिन के हाथे पॉंच टा अइहब के अंकुरि आ नवेद पड़ोसाइल जाइत अछि।अहि पाबनि में कहल जाइ वला कथाक सारांश यैह अछि जे पतिव्रता स्त्री में यमराज के पराजित करके शक्ति होइत अछि।
१०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर
एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि।

तालक परिचय
ताल कहरबा
४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम।
धागि
नाति
नक
धिन।

तीन ताल त्रिताल

१६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि।
धा धिं धिं धिं
धा धिं धिं धा
धा तिं तिं ता
ता धिं धिं धा
झपताल
१० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,३,२,३ मात्राक होइत अछि।
१ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ३,८ पर ताली रहैत अछि।
धी ना
धी धी ना

ती ना
धी धी ना

ताल रूपक
७ मात्रा। ३,२,२ मात्राक विभाग।
पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि।
पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि।
धी धा त्रक
धी धी
धा त्रक

११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर
बालानां कृते

-गजेन्द्र ठाकुर
बगियाक गाछ
चित्र ज्योति झा चौधरी
एकटा मसोमात छलीह आ’ हुनका एकेटा बेटा छलन्हि। ओ’ छल बड्ड चुस्त-चलाक।
एक दिनुका गप अछि। ओ’ स्त्री जे छलीह, अपना बेटाकेँ बगिया बना कए देलखिन्ह। ओहि बालककेँ बगिया बड्ड नीक लगैत छलैक। से ओ’ एहि बेर ओ’ एकटा बगिया बाड़ीमे रोपि देलक। ओतए गाछ निकलि आएल। बगियाक गाछ, नञि देखल ने सुनल।
माय बेटा ओहि बगियाक गाछक खूब सेवा करए लगलाह। कनेक दिनमे ओहि गाछमे खूब बगिया फड़य लागल। ओ’ बच्चा गाछ पर चढ़ि कए बगिया तोड़ि कए खाइत रहैत छल।
एक दिनुका गप अछि। एकटा डाइन बुढ़िया रस्तासँ जा’ रहल छल। ओकरा मनुक्खक मसुआइ बना कए खायमे बड्ड नीक लगैत रहैक। से ओ’ जे बच्चाकेँ गाछ पर चढ़ल देखलक, तँ ओकर मोन लुसफुस करए लगलैक। आब ओ’ बुढ़्या मोनसूबा बनबए लागल जे कोना कए ई बच्चाकेँ फुसियाबी आ’ एकरा घर ल’ जा कए एकर मसुआइ बना कए खाइ।
बच्चाकेँ असगर देखि ओ’ लग गेल आ’ बच्चाकेँ कहलक-

“ बौआ एकटा बगिया हमरा नहि देब। बड्ड भूख लागल अछि।
बच्चा ओकर हाथ पर बगिया देबय लागल।

“बौआ हम हाथसँ कोना लेब बगिया हथाइन भ’ जायत”।
बच्चा बगिया माथ पर राखए लागल।
“हँ हँ माथ पर नहि राखू। मथाइन भ’ जायत”।
बच्चो छल दस बुधियारक एक बुधियार। खोइछमे बगिया देबए लागल।
”ई की करैत छी बौआ। बगिया खोँछाइन भ’ जायत, अहाँ झुकि कए बोरामे दए दिअ”।
मुदा बच्चा तँ छल गोनू झाक बुझू जे गोनू झाक मूल-गोत्रेक।
बाजल-
“नञि गए बुढ़िया। तोँ हमरा बोरामे बन्द कए भागि जेमह। माय हमरा ठग सभसँ सहचेत रहबाक हेतु कहने अछि”।

मुदा बुढ़ियो छल ठगिन बुढ़िया। ठकि फिसिया कए बोली-बाली दए कए ओकरा मना लेलक। जखने बच्चा झुकल ओ’ ओकरा बोरामे कसि कए चलि देलक। बुढ़िया रस्तामे थाकि कए एकटा गाछक छहरिमे बैसि गेलि।
कनेक कालमे ओकरा आँखि लागि गेलैक। बच्चा मौका देखि कोनहुना कए ओहि बोरासँ बाहर बहरा गेल आ’ भीजल माटि, पाथर आ’ काँट-कूस बोरामे ध’ कए ओहिना बान्हि कए पड़ा गेल।
बुढ़िया जखन सूति कए उठल आ’ बोरा ल’ कए आगू बढ़ल तँ ओकरा बोरा भरिगर बुझएलैक। मोने-मोन प्रसन्न भ’ गेलि ई सोचि जे हृष्ट-पुष्ट मसुआइ खएबाक मौका बहुत दिन पर भेटल छैक ओकरा। रस्तामे भीजल माटिसँ पानि खसए लागल तँ ओकरा लगलैक जे बच्चा लगही कए रहल अछि। ओ’ कहलक जे-
”माथ पर लहुशंका कए रहल छह बौआ। कोनो बात नहि। घर पर तोहर मसुआइ बना कए खायब हम”।

कनेक कालक बाद काँट गरए लगलैक बुढ़ियाकेँ। कहलक-
”बौआ। बिट्ठू काटि रहल छी। कोनो बात नहि कतेक काल धरि काटब”।
बुढ़्याक एकटा बेटी छलैक। गाम पर पहुँचि कए बुढ़िया ओकरा कहलक, जे आइ एकटा मोट-सोट शिकार अछि बोरामे। माय बेटी जखन बोरा खोललक तँ निकलल माटि, काँट आ’ पाथर। कोनो बात नहि।

बुढ़िया भेष बदलि पहुँचल फेरसँ बगियाक गाछ तर।
एहि बेर बच्चा ओकरा नञि चीन्हि सकल। मुदा जखन ओ’ झुकि कए बगिया बोरामे देबाक गप कहलक तँ बच्चाकेँ आशंका भेलैक।
”गए बुढ़िया। तोँही छँ ठगिन बुढ़िया”।
मुदा बुढ़िया जखन सप्पत खएलक तँ ओ’ बच्चा झुकि कए बगिया बोरामे देबए लागल। आ’ फेर वैह बात।
एहि बेर बुढ़िया कतहु ठाढ़ नहि भेल। सोझे घर पहुँचल आ’ बेटी लग बोरा राखि नहाए-सोनाए चलि गेल।बेटी जे बोरा खोललक तँ एकटा झँटा बला बच्चाकेँ देखलक। ओ’ पुछलक-
”हमर केश नमगर नहि अछि किएक”।
”अहाँक माय अहाँक माथ ऊखड़िमे दए समाठसँ नहि कुटने होयतीह। तैँ”।बच्चा तँ छल दस होसियरक एक होसियार तैँ।

बुढ़ियाक बेटी अपन केश बढ़ेबाक हेतु अपन माथ ऊखड़िमे देलन्हि, आ’ ओ’ बच्चा ओकरा समाठसँ कॉटए लागल। ओकरा मारि ओकर मासु बनेलक। बुढ़िया जखन पोख्रिसँ नहा कए आयल तँ बुढ़ियाक आगू ओ’ मासु परसि देलक।
जखने ओ’ खेनाइ पर बैसलि तँ लगमे एकटा बिलाड़ि छल से बाजि उठल-
”म्याँऊ। अपन धीया अपने खाँऊ।म्याँऊ”।
”बेटी एकरा मासु नहि देलहुँ की।तँ बाजि रहल अछि”।
ओ’ बच्चा बिलाड़िक आँगा मासु राखि देलक मुदा बिलाड़ि मासु नहि खएलक।
आब बुढ़ियाक माथ घुमल। ओ’ बेटीकेँ सोर कएलक तँ ओ’ बच्चा समाठ ल’ कए आयल आ’ ओकरा मारि देलक।
फेरसँ बच्चा बगियाक गाछ पर चढ़ि बगिया खए लागल। बड्ड नीक लगैत छल ओकरा बगिया।
——————————

२.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्तितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥

करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ’ संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ’ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ’ संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
महाराजाधिराज ५ मान् मिथिलेशक आज्ञानुसार पछबारिपारक लौकिक आऽ श्रेणिक व्यवस्था पञ्जीकार लोकनि जे स्थिर कएलन्हि से प्रकाशित भेल छल आऽ ईहो प्रार्थना छल जे ताहि मध्य जनिका किछु वक्त्तव्य होइन्ह से प्रार्थना पत्र द्वारा श्री ५ मान् मध्य निवेदन करथि, ततः निदान विशिष्ट सभा मध्य एकर परामर्श कए पुनः प्रकाशित कएल जायत।
एतएसँ १ सँ १५ धरि श्रेणी बना देल गेल। ढेर विवाद उठल जे पाइ लए कए उच्च श्रेणी देल गेल।
पछबारिपारक लौकिक नाममे कतहु लौकिक तँ कतहु असल नाम छल।
किछु उदाहरण अछि-
१. सिंहवाड़-मथुरेश ठाकुर
२. मनियारी- मधुपति मिश्र
३. अमौन-बालकराम पाठक
४. भराम- धीतरी
५. बसन्तपुर- माधव मिश्र
६. कोकडीही- रामेश्वर मिश्र
७. नित्यानन्द चौधरी- पिण्डारुछ
८. एडु- भैय्यो मिश्र
९. खुटौनियाँ- भवानीदत्त झा
१०. लक्षमीपति मिश्र- धगजरी
११. कन्त झा- चानपुरा
१२. टङ्कवाल महिधर झा-पेकपाड़
१३. विष्णुदत्तपुरचिकनौट (मुजफ्फरपुर)
१४. चान पाठक- गजहरा
१५. काकठाकुर- धमदाहा
१६. खाशी ध्यामी- रंगपुरा(पूर्णियाँ)
(अनुवर्तते)
१३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर
म.म. शंकर मिश्र

शंकर मिश्रसँ संबंधित बहुत रास जनश्रुति प्रसिद्ध अछि। अयाची वृद्ध भए गेल छलाह, परन्तु पुत्रविहीन रहथि। पत्नी भवानी दुःखसँ काँट भए गेल छलीह। तखन अयाची मिश्र बाबा वैद्यनाथसँ पुत्रक याचना कएलन्हि आऽ हुनकर मनोकामना पूर्ण भेलन्हि-स्वयं शंकर भगवान अवतरित भेलाह आऽ ताहि द्वारे बालकक नाम शंकर पड़ल। जन्म पर गामक आया किंवा चमैन इनाम मँगलखिन्ह, मुदा परिवारक लगमे किछु नहि छल आऽ ताहि हेतु भवानी वचन देलखिन्ह जे बालकक प्रथम कमाइ अहाँकेँ दए देब। से जखन एक बेर राजा शिव सिंह खुशी भए बालककें कहलखिन्ह जे अहाँ जतेक सोना-चाँदी लए जा सकी लए जाऊ। बालक मात्र धरिया पहिरने छलाह तेँ मात्र किछु सोनाक छड़ लए जाऽ सकलाह, आऽ सेहो भवानी अपन वचनक अनुरूपें आया-चमैनकेँ दए देलखिन्ह। चमैन ओहि पाइसँ एकटा पोखरि सरिसवमे खुनबएलन्हि, जे चमनियाँ पोख्रिक नामसँ एखनो विद्यमान अछि।
१४.मैथिली भाषापाक (२)- गजेन्द्र ठाकुर/ नागेन्द्र कुमार झा

मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

1.तग्गर: क. खाट ख. बाट. ग. पेय पदार्थ घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
2. दोमब: क. हिलायब ख. यत्नपूर्बक सोचब ग. सोचि कए करब . घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
3. ओधि: क. बाँसक जड़ि ख. गाछ जरायब ग.गाछ रोपब घ. डारि खण्ड करब।
4. पेटाढ़: क. कान काटब. ख. गँहीर बासन. ग. ध्यान नहि देब. घ. कान पाथब ।
5. दौरा: क. देखब. ख. ध्यान राखब. ग. उपेक्षा करब. घ. उत्थर् पात्र।
6. मेघडम्बर: क. छाता ख. भुजब. ग. सुखायब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।।
7.बँसबिट्टी: क. सरियायब ख.फेंकब. ग. बाँसक बोन घ. गेंटब।
8. जाबी: क. लड़ब. ख. झगड़ा होएब. ग. जालाकार पात्र. घ. मिलान होयब।
9. कनसुपती: क. नुआ बीनब-बनाएब. ख. नुआ सुखायब. ग. नुआ जराएब. घ. सुखायल बाँसक पात।
10. छिट्टा: क. कोड़ब ख. चास देब. ग. पथिया. घ. जोतब।
11. दाबि: क. कपड़ा बीनब. ख. पैघ कत्ता. ग. तूर तुनब. घ.भाड़ घोंटब।
12. बोनि: क. बीआ बाउग करब ख. बीआ उखाड़ब.ग. बीआ दहाएब. घ. मजदूरी।
13. छोँपब: क. अरबधब. ख. सोहड़ि जाएब. ग. ऊपरसँ काटब घ. दुलार करब।
14.करची: क. अवश्य करब. ख. ऊपरसँ काटब. ग. बाँसक पातर शाखा. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
15. भालरि: क. तिरोधान होएब. ख. केराक पात. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब।
उत्तर
मैथिली भाषापाक (२) केर उत्तर:
1. ग. पेय पदार्थ ।
2. क. हिलायब ।
3. क. बाँसक जड़ि ।
4. ख. गँहीर बासन ।
5. उत्थर् पात्र।
6. क. छाता ।
7. ग. बाँसक बोन ।
8. ग. जालाकार पात्र ।
9. घ. सुखायल बाँसक पात।
10. ग. पथिया ।
11. ख. पैघ कत्ता ।
12. घ. मजदूरी ।
13. ग. ऊपरसँ काटब ।
14 . ग. बाँसक पातर शाखा ।
15. ख. केराक पात ।
मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

१५. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर
व्यञ्जन ४२ टा अछि।
क् ख् ग घ् ङ्
च् छ् ज् झ् ञ्
ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्
य् र् ल् व्
श् ष् स्
ह्
य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आऽ निरुनासिक।
एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आऽ विसर्जनीय वा विसर्ग।
ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि।
विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आऽ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आऽ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आऽ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आऽ फ सँ पूर्व।
अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आऽ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि।
उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि।
कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति)
पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल।
यम सेहो अयोगवाह होइत अछि।
(अनुवर्तते)
मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20.
ग्राह्य अग्राह्य
1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
किछु आर शब्द
मानक मैथिली_३
तका’ कए तकाय तकाए
पैरे (on foot) पएरे
ताहुमे ताहूमे
पुत्रीक
बजा कय/ कए
बननाय
कोला
दिनुका दिनका
ततहिसँ
गरबओलन्हि गरबेलन्हि
बालु बालू
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
जे जे’
से/ के से’/के’
एखुनका अखनुका
भुमिहार भूमिहार
सुगर सूगर
झठहाक झटहाक
छूबि
करइयो/ओ करैयो
पुबारि पुबाइ
झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
पएरे-पएरे पैरे-पैरे
खेलएबाक खेलेबाक
खेलाएबाक
लगा’
होए- हो
बुझल बूझल
बूझल (संबोधन अर्थमे)
यैह यएह
तातिल
अयनाय- अयनाइ
निन्न- निन्द
बिनु बिन
जाए जाइ
जाइ(in different sense)-last word of sentence
छत पर आबि जाइ
ने
खेलाए (play) –खेलाइ
शिकाइत- शिकायत
ढप- ढ़प
पढ़- पढ
कनिए/ कनिये कनिञे
राकस- राकश
होए/ होय होइ
अउरदा- औरदा
बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
चलि- चल
खधाइ- खधाय
मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
कैक- कएक- कइएक
लग ल’ग
जरेनाइ
जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
होइत
गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
चिखैत- (to test)चिखइत
करइयो(willing to do) करैयो
जेकरा- जकरा
तकरा- तेकरा
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
हारिक (उच्चारण हाइरक)
ओजन वजन
आधे भाग/ आध-भागे
पिचा’/ पिचाय/पिचाए
नञ/ ने
बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
तखन ने (नञ) कहैत अछि।
कतेक गोटे/ कताक गोटे
कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
लग ल’ग
खेलाइ (for playing)
छथिन्ह छथिन
होइत होइ
क्यो कियो
केश (hair)
केस (court-case)
बननाइ/ बननाय/ बननाए
जरेनाइ
कुरसी कुर्सी
चरचा चर्चा
कर्म करम
डुबाबय/ डुमाबय
एखुनका/ अखुनका
लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
कएलक केलक
गरमी गर्मी
बरदी वर्दी
सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
एनाइ-गेनाइ
तेनाने घेरलन्हि
नञ
डरो ड’रो
कतहु- कहीं
उमरिगर- उमरगर
भरिगर
धोल/धोअल धोएल
गप/गप्प
के के’
दरबज्जा/ दरबजा
ठाम
धरि तक
घूरि लौटि
थोरबेक
बड्ड
तोँ/ तूँ
तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
तोँही/तोँहि
करबाइए करबाइये
एकेटा
करितथि करतथि
पहुँचि पहुँच
राखलन्हि रखलन्हि
लगलन्हि लागलन्हि
सुनि (उच्चारण सुइन)
अछि (उच्चारण अइछ)
एलथि गेलथि
बितओने बितेने
करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
करएलन्हि
आकि कि
पहुँचि पहुँच
जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
से से’
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
फेल फैल
फइल(spacious) फैल
होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
फेका फेंका
देखाए देखा’
देखाय देखा’
सत्तरि सत्तर
साहेब साहब

१६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS
VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT—

Uruvela Kassapa is said to have been, in a previous birth,, a king of Videha.
Mahavira spent no less than six rainy seasons at Mithila. Buddha did not spent any rainy season in Videha.
Ajlvika, Guna Kassapa , views like Maskarin Gosala lived in a deer park adjoining Mithila.
Videha had a long tradition of Brahmanical learning. Upanishadic philosophy and expensive sacrifices.
The conquest of Videha by Magadha was accomplished by Mahapadma Nanda, the founder of the Nanda dynasty, which possessed immense wealth and a huge army capable of frightening a formidable foreign invader like Alexander the Great (356 B.c.- 323 B.c.) in the reign of his son.s.

TIRABHUKTI CIRCA 347 B.C.-A.D. 319
Videha under the Magadhan empire was successively ruled by kings of three dynasties, the Nandas (347 b.c.-325 b.c.), the Mauryas (325 b.c.-188 b.c.) and the early Sungas (188 B.C.¬circa 120 b.c.). The Maithila king (i.e., the king of Mithila) had been defeated. By Nandas . Kautilya mentions a word Vaidehaka. `trader’ or `merchant’ ,`product of a Vaishya male and a Brahmana female’. Panini knows the Vrijis only. By the time of Kautilya (last quarter of the fourth century B.c) there was a partition between the Lichchhavis Vrijis .
Pushyamitra Sunga (188 b.c.-152 b.c.), his contemporary the great grammarian Patanjali mentions Videha in his Mahahhashya .

Agnimitra, the son and successor of Pushyamitra, continu¬ed to rule over North Bihar including Videha, the discovery of a terracotta sealing (in grey colour, circu¬lar in area) in the Garh area of Basarh . Vaisali became indepen¬dent under the resurgent Lichchhavis; and soon they freed Videha too and governed it for themselves till the second Magadhan empire (Guptas).
(c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।
सिद्धिरस्तु

  1. मान्यवर,
    1.अहाँकेँ सूचित करैत हर्ष भ’ रहल अछि, जे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ’ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ’ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आ’ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ’ भौगोलिक दूरीक अंत भ’ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ’ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ’ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आ’ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ’ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
    2. अहाँ लोकनिसँ ‘विदेह’ लेल स्तरीय रचना सेहो आमंत्रित अछि। कृपया अपन रचनाक संग अपन फोटो सेहो अवश्य पठायब। अपन संक्षिप्त आत्मकथात्मक परिचय, अपन भाषामे, सेहो पठेबाक कष्ट करब, जाहिसँ पाठक रचनाक संग रचनाकारक परिचय, ताहि प्रकारसँ , सेहो प्राप्त कए सकथि।
    हमर ई-मेल संकेत अछि-
    ggajendra@videha.com

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