VIDEHA

अखण्ड भारत

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 17, 2008 at 5:33 अपराह्न

अखण्ड भारत
धीर वीर छी मातु बेर की,
अबेर होइत सङ्कल्पक क्षण ई,
बुद्धि वर्चसि पर्जन्य बरिसथि,
सभा बिच वाक् निकसथि,
औषधीक बूटी पाकए यथेष्ठा,
अलभ्य लभ्यक योग रक्षा।
आगाँ निश्चयेण कार्यक क्रमक,
पराभव होए सभ शत्रु सभक,
वृद्धि बुद्धिक होऽ नाश शत्रुत्वक,
मित्रक उदय होऽ भरि जगत।
नगर चालन करथि स्त्रीगण,
कृषि सुफल होए करू प्रयत्न।
वृक्ष-जन्तुक संग बढि आब,
ठाढ होऊ नहि भारत भेल साँझ,
दोमू वर्चसिक गाछ झहराऊ पाकल फलानि,
नञि सोचबाक अनुकरणक अछि बेर प्राणी।
वर्चस्व अखण्ड भरतक मनसिक जगतमे,
पूर्ण होएत मनोरथ सभक क्यो छुटत नञि।

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