VIDEHA

अभ्यास

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 17, 2008 at 4:21 अपराह्न

अभ्यास

पूछल गुरूसँ मृदंगक गति,
भय रहल अछि मंद,
गुरु कहलन्हि से करू तखन,
अभ्यास तखन प्रतिदिन।
प्रतिदिनतँ करितहि छी,
हम एकर सदिखन अभ्यास,
तहुखन हमर घटय अछि,
गति आ’ टूटय लय औ तात।
करू भोर साँझ अहाँ,
अभ्यास बिना करि नागा।
भोर करब अभ्यास जखन,
साँझमे टूटत नहि लय,
साँझमे करब पुनराभ्यास,
होयत भोरमे हाथ गतिमय।
गुरुसँ पूछल कोना जड़,
एहि पाथरसँ हम बनायब,
घोटक गतिमय बनबयमे,
हम माह जखन लगाओल।
कहल गुरू तखन देखू,
एहि जड़-पाथरमे घोटक,
जे बेशी लागय एहिमे,
तोड़ि हटाऊ अहाँ फटाफट।
कहल शिष्य ई काज,
अछि पहिलुक्का काजसँ हल्लुक।
कहल गुरू काज वैह अछि,
सोचबाक अछि ई फेर।
पहिने बेशी काज पड़ल छल,
आब थोड़ अछि भेल।

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