VIDEHA

नव-घरारी

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 17, 2008 at 5:12 अपराह्न

नव-घरारी

साँप काटल नन्दिनीकेँ,
नव घरारी लेलक खून।
टोलक घरारी छोड़ू जुनि।
ई विशाल जनसंख्या एतय,
छल बनल एकटा काल,
ई नव-घरारी लेलक प्राण,
टोलक घरारी साबिकक डीह,
परञ्च अछि छोट आब की।
खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज,
नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।

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