VIDEHA

बेचैन नहि निचैन रहू

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 17, 2008 at 3:47 पूर्वाह्न

बेचैन नहि निचैन रहू
दौरि-दौरि कय पोस्ट-ऑफिस,
भेलहुँ जखन अपस्याँत किएकतँ,
मनीऑर्डरक छल आस।
पुछल एखन धरि अछि नहि आयल,
मनीऑर्डर यौ प्रभास।
चिट्ठीयेक संग पठेने छलथि पाइ,
चिठी तँ समयेसँ पहुँचल,
टाका किए नहि बाउ।
पोस्ट बाबू जे कए नेने रहथि,
हुनकर पाइसँ कोनो उद्यम,
कहल चिट्ठी अबैत अछि,
बेटा अछि अहाँक छट्ठु,
पाइ पठबैत समयसँ तँ पहुँचैत,
मुदा पठबैत अछि छुच्छे संदेश।

बेचैन किए छी,
की अप्पन उद्यम करब हम अहाँक टाकासँ,
से बुझैत छी।

दोसर गामक पोस्टबाबू,
फेकैत अछि चिट्ठी कमलाक धारमे,
हम छी बँटैत तेँ कहैत छी जे भेटल अछि संदेश।

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