VIDEHA

मोन पाड़ैत

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 17, 2008 at 5:26 अपराह्न

मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल,
पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत,
फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग,
छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़,
अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी,
दिनमे बौआइत रही,
कलममे बाँझी तकैत,
दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल,
बुरबक होयबाक संज्ञा,
ईहो छी नहि बुझैत,
मोजर होइत तँ खैतहुँ आम,
अगिला साल।
बाँझीमे नहि कोनो आस,
घूरमे होइछ मात्र काज।
फेर छे पाड़ैत,
अंडीक बीया बीछब,
पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल,
ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद,
राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद,
’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद।
महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च,
भ’ जायत एक किलो,
पाइक माश्चर्ज।
कंजूसी नहि,
जबरदस्ती ठूसी।
मोन पाड़ैत छी धानक खेत,
झिल्ली कचौड़ी,
लोढ़ैत काटल धानक झट्ठा,
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी।
‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी,
बंशीसँ मारैत माछ,
खुरचनसँ सोहैत आम काँच।
चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद,
बडका दलान,
दाउन,
बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद,
बिदेसरक रवि दिनक बूझल,
फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल।
चूड़ा लय जाइत रही गामसँ,
दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद,
पुरनाहाक धातरीमक गाछ।
साहर दातमनिक सोझ नीक छड़,
जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल,
गुल्ली डंटा, गोलीक खेल,
अखराहाक झमेल।
हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती,
फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय।
छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल,
जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष,
छोड़ल गाम यौ मित्र।
मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत,
बैसि बैसि बैसि।

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