VIDEHA

पहरराति

In पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, maithili, music, videha on जुलाई 18, 2008 at 4:18 पूर्वाह्न

पहरराति

 

“सुनू। प्रयोगशालाक स्विच ऑफ कए दियौक”। चारि डाइमेन्शनक वातावरणमे अपन सभटा द्वि आऽ त्रि डाइमेन्शनक वस्तुक प्रयोग करबाक लेल धौम्य प्रयोगशालामे प्रयोग शुरू करए बला छथि। हुनकर संगी-साथी सभ उत्सुकतासँ सभटा देखि रहल छथि।

“दू डाइमेन्शनमे जीबए बला जीव तीन डाइमेन्शनमे जीबए बला मनुक्खक सभ कार्यकेँ देखि तऽ नहि सकैत छथि, मुदा ओकर सभटा परिणामक अनुभव करैत छथि। अपन एकटा जीवन-शैलीक ओऽ निर्माण कएने छथि। ओहि परिणामसँ लड़बाक व्यवस्था कएने छथि। तहिना हमरा लोकनि सेहो चारि डाइमेन्शनमे रहए बला कोनो सम्भावित जीवक, वा ई कहू जे तीनसँ बेशी डाइमेन्शनमे जिनहार जीवक हस्तक्षेपकेँ चिन्हबाक प्रयास करब”। धौम्य कहैत रहलाह।

एक आऽ दू डाइमेन्शनमे रहनहारक दू गोट प्रयोगशालाक सफलताक बाद धौम्यक ई तेसर प्रयोग छल।

एक विमीय जीव जेना एकटा बिन्दु। बच्चामे ओऽ पढ़ैत छलाह जे रेखा दू टा बिन्दुकेँ जोड़ैत छैक। नञि तऽ बिन्दुमे कोनो चौड़ाइ देखना जाइत अछि आऽ नहिये रेखामे। रेखा नमगर रहैत अछि, मुदा बिन्दुमे तँ चौड़ाइक संग लम्बाइ सेहो नहि रहैत छैक। एक विमीय विश्वमे मात्र अगाँ आऽ पाछाँ रहैत अछि। नञि अछि वान दहिनक बोध नहिये ऊपर नीचाँक। मात्र सरल रेखा, वक्रता कनियो नहि। आब ई नहि बुझि लिअ जे अहाँ जतय बैसल छी, ओतए एकटा रेखा विचरण करए लागत। वरण ई बुझू जे ओऽ रेखा मात्र अछि, नहि कोनो आन बहिः।

द्वि बीमीय ब्रह्माण्ड भेल जतए आगू पाछूक विहाय वाम दहिन सेहो अछि, मुदा ऊपर आऽ नीछाँ एतए नहि अछि। ई बुझू जे अहाँक सोझाँ राखल सितलपाटीक सदृश ई होयत, जाहिमे चौड़ाइ विद्यमान नहि अछि।

मुदा श्रीमान् ई चलैत अछि कोना। गप कोना करत एक दोसरकेँ संदेश कोना देत

आऊ। पहिने एक विमीय ब्रह्माण्डक अवलोकन करैत छी

धौम्य एक विमीय प्रयोगशालाक लग जाइत छथि। ओतए बिन्दु आऽ बिन्दुक सम्मिलन स्वरूप बनल रेखा सभ देखबामे अबैत अछि। ई जीब्व सभ अछि। एक विमीय ब्रह्माण्डक जीव, जे एहि तथ्यसँ अनिभिज्ञ अछि जे तीन विमीय कोनो जीव ओकरा सभकेँ देखि रहल छैक।

देखू। ई सभ जीव एक दोसराकेँ पार नहि कए सकैत अछि। आगू बढ़त तँ तवत धरि जाऽ धरि कोनो बिन्दु वा रेखासँ टक्कर नहि भए जएतैक। आऽ पाछाँ हटत तावत धरि यावत फेर कोनो जीवसँ भेँट नहि होयतैक। एक दोसराकेँ संदेश सेहो मात्र एकहि पँक्त्तिमे दए सकत, कारण पंक्त्तिक बाहर किछु नहि छैक। ओकर ब्रह्माण्ड एकहि पंक्त्तिमे समाप्त भए जाइत अछि।

आब चलू द्वि बीमीय प्रयोगशालामे

सभ क्यो पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि।

एतय किछु रमण चमन अछि। पहिल प्रयोगशाला तँ दू तहसँ जाँतल छल, दुनू दिशिसँ आऽ ऊपरसँ सेहो। मात्र लम्बाइ अनन्त धरि जाइत छल। मुदा एतय ऊपर आऽ नीचाँक सतह जाँतल अछि। ई आगाँ पाछाँ आऽ वाम दहिन दुनू दिशि अनन्त ढरि जा रहल अछि। ताहि हेतु हम दुनू प्रयोशालाकेँ पृथ्वीक ऊपर स्वतंत्र नभमे बनओने छी। एतुक्का जीवकेँ देखू। सीतलपाटी पर किछुओ बना दियौक। जेना छोट बच्चा वा आधुनिक चित्रकार बनबैत छथि। एतय ओऽ सभ प्रकार भेटि जायत। मुदा ऊँचाइक ज्ञान एतए नहि अछि। एक दोसरकेँ एक बेरमे मात्र रेखाक रूपमे देखैत अछि ई सभ। दोसर कोणसँ दोसर रेखा आऽ तखन स्वरूपक ज्ञान करैत जाइत अछि। लम्बाइ आऽ चौड़ाइ सभ कोणसँ बदलत। मुदा वृत्ताकार जीव सेहो होइत अछि। जेना देखू ओऽ जीव वाम कातमे। एक दोसराकेँ संदेश ओकरा लग जाऽ कए देल जाइत अछि। पैघ समूहमे संदेश प्रसारित होयबामे ढ़ेर समय लागि जाइत अछि

श्रीमान, की ई संभव अछि, जेना हमरा सभक सोझाँ रहलो उत्तर ओऽ सभ हमरा लोकनिक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ अछि तहिना हमरा सभ सेहो कोनो चारि आऽ बेशी विमीय जीवक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ होञि

हँ तकरे चर्चा आऽ प्रयोग करबाक हेतु हमरा सभ एतए एकत्र भेल छी। अहाँने सँ चारि गोटे हमरा संग एहि नव कार्यक हेतु आबि सकैत छी। ई योजना कनेक कठिनाह छैक। कतेक साल धरि ई योजना चलत आऽ परिणाम कहिया जाऽ कए भेटत, तकर कोनो सीमा निर्धारण नहि अछि

पाँच टा विद्यार्थी श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा एहि कार्यक हेतु सहर्ष तैयार भेलाह। धौम्य पाँचू गोटेकेँ अपन योजनामे सम्मिलित कए लेलन्हि।

“चारि बीमीय विश्वमे तीन बीमीय विश्वसँ किछु अन्तर अछि। तीन बीमीय विश्व भेल तीन टा लम्बाइ, चौड़ाइ आऽ गहराइ मुदा एहिमे समयक एकटा बीम सेहो सम्मिलित अछि। तँ चारि बीमीय विश्वमे आकि पाँच बीमीय विश्वमे समयक एकसँ बेशी बीमक सम्भावना पर सेहो विचार कएल जायत। मुदा पहिने चारि बीमीय विश्व पर हमरा सभ शोध आगाँ बढ़ायब एहिमे मूलतः समयक एकटा बीम सेहो रहत आऽ ताहिसँ बीमक संख्या पाँच भए जायत। समयकेँ मिलाकए चारि बीमक विश्वमे हमरा सभ जीबि रहल छी। जेना वर्ण अन्धतासँ ग्रसित लोककेँ लाल आऽ हरियरक अन्तर नहि बुझि पड़ैत छैक, ओहिना हमरा सभ एकटा बेशी बीमक विश्वक कल्पना कए सकैत छी, अप्रत्यक्ष अनुभव सेहो कए सकैत छी”। धौम्य बजलाह।

सभा समाप्त भेल आऽ सभ क्यो अपन-अपन प्रकोष्ठमे चलि गेलाह। सैद्धांतिक शोध आऽ तकर बाद ओकर प्रायोगिक प्रयोगमे सभ गोटे लागि गेलाह। त्रिभुज धरातल पर खेंचि कए एक सय अस्सी अंशक कोण जोड़ि कए बनएबाक अतिरिक्त्त पृथ्वीकार आकृतिमे खेंचल गेल त्रिभुज जाहि मे प्रत्येक रेखा एक दोसरासँ नब्बे अंशक कोण पर रहैत अछि, मुदा रेखा सोझ नहि टेढ़ रहैत अछि। ओहिना समय आऽ स्थानकेँ तेढ भेला पर एहन संभव भए सकैत अछि जे हमरा सभ प्रकाशक गतिसँ ओहि मार्गे जाइ आऽ पुनः घुरि आबी। प्रकाश सूर्यक लगसँ जाइत अछि तँ ओकर रस्ता कनेक बदलि जाइत छैक।

श्वेतकेतु आऽ रैक्व एकटा सिद्धान्त देलन्हि- जेना कठफोरबा काठमे वृक्षमे खोह बनबैत अछि, तहिना एकटा समय आऽ स्थानकेँ जोड़एबला खोहक निर्माण शुरू भए गेल। अपाला एकटा ब्रह्माण्डक डोरीक निर्माण कएलन्हि, जकरा बान्हि कए प्रकाश वा ओहूसँ बेशी गतिसँ उड़बाक सम्भावना छल। सत्यकाम एकटा एहन सिद्धान्तक सम्भावना पर कार्य शुरू कएने छलाह, जकर माध्यमसँ तीन टा स्थानिक आऽ एकटा समयक बीमक अतिरिक्त्त कताक आर बीम छल जे बड़ लघु छल, टेढ छल आऽ एहि तरहेँ वर्त्तमान विश्व लगभग दस बीमीय छल। घोषा स्थान समयक माध्यमसँ भूतकालमे पहुँचबासँ पूर्व देशक विधिमे ई परिवर्त्तन करबाक हेतु कहलन्हि जाहिसँ कोनो वैज्ञानिक भूतकालमे पहुँचि कए अपन वा अपन शत्रुकेँ जन्मसँ पूर्व नहि मारि दए। घोषा विश्वक निर्माणमे भगवानक योगदानक चरचा करैत रहैत छलीह। जौँ विश्वक निर्माण भगवान कएलन्हि, एकटा विस्फोट द्वारा, आऽ एकरा सापेक्षता आऽ अनिश्चितताक सिद्धांतक अन्तर्गत छोड़ि देलन्हि बढ़बाक लेल, तँ फेर समयक चाभी तँ हुनके हाथमे छन्हि। जखन ओऽ चाहताह फेरसँ सभटा शुरू भए जायत। जौँ से नहि अछि, तखन समय स्थानक कोनो सीमा, कोनो तट नहि अछि, तखन तँ ई ब्रह्माण्ड अपने सभ किछु अछि, विश्वदेव, तखन भगवानक कोन स्थान? घोषा सोचैत रहलीह।

आब धौम्यक लेल समय आबि गेल छल। अपन पाँचू विद्यार्थीक सभ सिद्धांतकेँ ओऽ प्रयोगमे बदलि देलन्हि। आऽ आब समय आबि गेल। पहरराति।

पुष्पक विमान तैयार भेल स्थान-समयक खोहसँ चलबाक लेल। ब्रह्माण्डीय डोरी बान्हि देल गेल पुष्पक पर। धौम्य सभसँ विदा लेलन्हि। प्रकाशक गतिसँ चलल विमान आऽ खोहमे स्थान आऽ समयकेँ टेढ़ करैत आगाँ बढ़ि गेल। ब्रह्माण्दक केन्द्रमे पहुँचि गेलाह धौम्य। पहरराति बीतल छल। आगाँ कारी गह्वर सभ एहि समय आऽ स्थानकेँ टेढ़ कएल खोहमे चलए बला पुष्पकक सोझाँ अपन सभटा भेद राखि देलक। भोरुका पहरक पहिने धौम्यक विमान पुनः पृथ्वी पर आबि गेल। मुदा एतए आबि हुनका विश्व किछु बदलल सन लगलन्हि। श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा क्यो नहि छलाह ओतए। विमानपट्टी सेहो बदलल सन। विश्वमे समय-स्थानक पट्टी सभ भरल पड़ल छल।

“यौ। समय बताऊ कतेक भेल अछि”।

“कोन समय। सोझ बला वा स्थान-समय विस्थापन बला। सोझ बला समय अछि, सन् ३१०० मास…”।

ओऽ बजिते रहि गेल छल मुदा धौम्य सोचि रहल छलाह जे स्थान-समय विस्थापनक पहररातिमे हजार साल व्यतीत भए गेल। ककरा बतओताह ओऽ अपन ताकल रहस्य। आकि एतुक्का लोक ओऽ रहस्य ताकि कए निश्चिन्त तँ नहि भए गेल अछि?

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