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विदेह वर्ष-1 मास-1 अंक-1 2.उपन्यास

In कथा, मैथिली, विदेह, maithili on जुलाई 20, 2008 at 7:31 पूर्वाह्न

2.उपन्यास

1.सहस्रबाढ़नि
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सन~~ 1885 ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एक बालकक जन्म भेल। एहि वर्षमे कांग्रेस पार्टीक स्थापना बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमयवला छल। अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कए चुकल छल।राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह।शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रअहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भय गेल। मिलाजुलाकेँ कांग्रेसी लोकनि अंग्रेजीराज आ’ भारतीय रजवाड़ा सभक सम्मिलित शासनकेँ स्थायित्व आ’ यथास्थिति निर्माणकर्त्ताक रूपमे स्थान भेटि चुकल छल। कांग्रेस अपन यथास्थितिवादी स्वरूपकेँ बदलबाक हेतु भविष्यमे एकटा आन्दोलनात्मक स्वरूप ग्रहण करयबला छल। संस्क़ृतक रटन्त विद्याक वर्चस्व छल। परंतु सरकारी पद बिना आङ्ल सिखलासँ भेटब असंभव छल। सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आ’ ओतबहि धरि सीमित छल। मुदा किछु समयापरान्त अंग्रेजक किरानीबाबू लोकनि सेहो अस्तित्वमे अयलाह।

तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ’ ताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक कलिकतियाबाबूकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भ’ गेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आ’ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त क’ रहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ’ ओ’ बेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओ’ मुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल।
“एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा’ रहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आ’ पैर पर आगू बढ़य लगलाह” , पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि।
“एक दिन हम देखलहुँ जे ओ’ देबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आ’ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ’ ठाढ़ भ’ गेलाह” , झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि।
“एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”।
“ एक दिन खेत परसँ एलहुँ आ’ नहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहा’ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहा’ केलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओ’ गेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना”।
“ हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छ’ आ’ कि सात मास”। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-‘गप सुनलहुँ’ वा’ ई करू वा’ ओ’ करू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आ’ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात क’ रहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आ’ चूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आ’ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भ’ गेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ ल’ कय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता द’ देल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आ’ भोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ’ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ’ पत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। ‘परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब’ , ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल।
॥श्रीः॥
स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम~ कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ’ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आ’ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वा’ शोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ’ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भ’ जायत। इति शुभम~।
बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ’ तकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आ’ पूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ’ हायाघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भ’ एकर धारकेँ रोकि देलक आ’ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आ’ कमला मेंहथ , गढ़िया आ’ नरुआर दिशि। बलान गहींर आ’ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आ’ सभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल।
कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह,,,, , तखन हुनका ल’ कय एकौर जायब। बेचारे बहुत दिन तपस्या कयलन्हि। एहि बेर मामा गाम, दीदीगाम सभ ठाम घुमा देबन्हि। सभकेँ मोन लागल छैक।

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पिता-पुत्र एकौर पहुँचलाह। ई गाम कोनो तरहेँ आन जेँकाँ नहीं लगलन्हि। जेना जमघट लगला पर शास्त्रार्थक परम्परा रहल अछि, तहिना विद्वतमण्डलीमे विभिन्न विषय पर चर्चा होबय लागल। चर्चामे अंग्रेजी शासन आ’ भारतवासीक सैन्य अभियान रहल। मँगरूबाबू लाल कोट पहिरि कय कतेक लड़ाई लड़ल छलाह। 1867-68क अबीसीनिया युद्धमे सर चार्ल्स नेपियरक संग कोनाकेँ अभियानमे ओ’ गेल छलाह, तकर वर्णन विस्तृतरूपमे देबय लगलाह मँगरूबाबू। द्वितीय अफगान-युद्धमे कोना समयक अभावमे सेनाकेँ लालक बदला मलिछह वर्दी लगबय पड़्लैक तकर वर्णन सेहो देलन्हि। यैह वर्दी बादमे खाकीरंगक रूपमे प्रसिद्ध भय गेल। एनफील्ड रायफालक खिस्सा जे 1857क स्वतंत्रता संग्राममे परिणत भेल केर बदलामे बेश नमगर स्नाइडर रायफल जे 1887मे देल गेल। मँगरू बाबू कांग्रेसक चर्चा सेहो केलन्हि।ओम्हर झिंगुर बाबू भोज-भातक फेहरिस्ट आ’ एस्टीमेट बनबय लगलाह। कलित सेहो अपन तुरियाक विद्यार्थी सभक संग मगन भय गेलाह। ओहि भीड़मे राजे गामक फन्नू बाबू सेहो आयल छलाह। एकौरमे हुनकर बहिन-बहनोइ रहैत छलखिन्ह। ताहि द्वारे एतय एनाइ-गेनाइ ओ’ किछु बेशी करैत छलाह। कलितकेँ एहिसँ पहिने ओ’ नहीं देखने रहथि। अनायासहि उत्सुकता भेलन्हि आ’ कलितक विषयमे पूछ्पाछ केलन्हि। ई जानि कि कलित झिंगुरबाबूक सुपुत्र छथि, क्षणहिमे झिंगुरबाबू लग घुसकि कय चलि गेलाह। वार्त्तालाप क्रममे झिंगुर बाबू सँ ईहो पता चललन्हि जे जमीन्दारीक पर्मनेंट सेटलमेंटक बाद दरिभङ्गा राजकेँ वसूलीक हेतु परगनाक आधारपर मिथिला क्षेत्रक वसूलीक हेतु अधिकार प्राप्त भेलाक बाद कलित कटिहारमे वसूलीक कार्यक हेतु जयताह। एम्हर फारसी आ’ अंग्रेजीक शिक्षा कलित पूरा क’ लेने छलाह। विवाहक संबंधमे पता चललजे फन्नू बाबू अपन बचियाक हेतु योग्य वरक ताकमे छथि। तखन विचार भेल जे परतापुरक सभागाछीमे अगिला महिनामे फन्नू बाबू आबथि आ’ झिंगुर बाबूकें आतिथ्यक अवसर भेटन्हि। मुदा बीचहिमे दियाद सभ झिंगुर बाबूकँ तेनाने घेरलकन्हि जे कलितक विवाह फन्नू बाबूक बचियासँ थीक करैत आ’ भराममे सिद्धांत करेनहि गाम पहुँचलाह। ड’रो होइन्हि जे कनियाँ ने कहीं रपटा दय देथिन्ह। मुदा विवहक बात सुनितहि, कनियाँ खुशीसँ बताहि जेकाँ भय गेलीह। पिछला चारि दिनसँ जतेक गुनधुनी लागल रहन्हि सभटा खतम भ’ गेलन्हि।
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पैरे किंवा कटही गाड़ी यैह छल यातायातक साधन। महफा सेहो बेश नक्काशी बला आ’ भरिगर। वर महफा पर आ’ बरियातीमे जे युवा रहथि से पैरे आ’ जे कनेक उमरिगर रहथि से कटही गाड़ी पर विदा भेलाह। संगमे सेवकक लश्कर। दरबज्जा पर स्वागत भेलन्हि। हजाम पैर धोलकन्हि, पुनः इत्र-सेंट, फूल, नाश्ता। गप्प सरक्का। शास्त्रर्थ आ’ चुटक्का। अँगनामे परिछनि आ’ विधि-व्यवहार तँ दलान पर गप्पक फूहारि। बीच-बीचमे क्यो आबि कय कहीं जाथि जे गहना कतय छैक। घोघट के’ देथिन्ह। घोघटाही नूआ नहीं भेटि रहल अछि। एहिसँ विवाहक क्रम आ’ प्रगतिक विषयमे बरियाती लोकनिकेँ सेहो पता चलैत छलन्हि। एवम् प्रकारे आँगन आ’ दरबज्जा दुनू ठाम विवाहक कार्यक्रम भोरक पाँच बज्वए तक चलैत रहल। वर आ’ कनियाक हाथमे ब्रह्मचारी डोरी बान्हि देल गेल, जे चारि दिन धरि रहल। तकरा बाद विवाह पूर्ण भेल। विदाइक दिन’ तका कय झिंगुर बाबू पठेलखिन्ह आ’ कलित अपन गाम आ’ कलित अपन गाम आबि गेलाह। कटिहार जयबाक तैयारी भेल। अश्रुपूरित नेत्रसँ माय आ’ ग्रामीणसँ विदा लेलाक बाद कलित अपन रोजगार पर विदा भेलाह।
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कोशीक विभीषिकासँ त्रस्त क्षेत्र होइत कटिहार पहुँचि कय कलित अप्पन काजमे शीघ्रहि पारंगत भय गेलाह। काजक अधिकता भेलापर अपन पितियौत भाय आ’ भातिजकेँ सेहो बजा लेलथिन्ह। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे बहुत थोरबेक दिनमे अपन प्रतिष्ठा बढ़ा लेलथि कलित। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे जमीन्दारीक परमानेंट सेटलमेन्टक विषयमे पुराण अनुभव बहुत खराब छल। वसूली पदाधिकारीक भ्रष्ट तरीका सभकेँ कलित बदलि देलखिन्ह। मुदा कालक गालनमे किछु आरे छल। कलितक द्विरागमनक पहिनहि हुनकर माय गुजरि गेलखिन्ह। बड्ड रास सौख-मनोरथ लेने चलि गेलीह माय। कखनो कलितकेँ कहैत छलखिन्ह जे तोरा कनियाँसँ खूब झगड़ा करबौक तखन देखबौक जे तूँ हमर पक्ष लैत छँह कि कनियाक।
झिंगुर बाबू सेहो अन्यमनस्क रहय लगलाह। कलित कहबो केलखिन्ह जे सँगहि चलू, मुदा भरि जन्म जतय रहलाह ओहि ठामकेँ छोड़थु कोना।
तेसर साल कलितक द्विरागमन भेलन्हि आ|तकरा बादे ओ| निश्चिंत भ| सकलाह। जाइत-जाइत कलितकेँ कहैत गेलखिन्ह जे तोँ तँ बेशीकाल गामसँ बाहरे रहलह। हमरा सभहक सेवा तँ ई बुचिया केलक। अपन बहिनक भार आब तोहिँ उठाबह। हमारा सोचने छलहुँ जे एकर विवाह दान करबाइये कय निश्चिंत हैब। मुदा तोहर माय हमरा तोड़ि देलन्हि। आब तूँ अपना जोगर भइये गेल छह। पाँच बरखक बेटा रहैत छैक तखनो लोक केँ लोक कहैत छैक जे अहाँ केँ कोन बातक चिंता अछि, पाँच बरखक बेटा अछि। तूँ तँ आब पढ़ि लिखि कय अपन जीवन यापन करैत छह। फेर पुतोहुकेँ सेहो बुचियाक हाथ पकड़ा कय एहि लोकसँ छुट्टी लेलन्हि झिँगुर बाबू। कलित हुनका एतेक हड़बड़ीमे कहियो नहि देखने छलथिन्ह।स्थिर, शांतचित्त आ| फलक चिंता केनिहार किसान सेहो अपन जीवन-संगीक संग छुटलाक बाद अधीर भ| गेल।

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कलितकेँ कटिहार अयलाक बादो एकेटा चिंता लागल रहैत छलन्हि। से छल बुचियाक विवाह। पिताक रहैत ओ’ कोनो परेशानीसँ चिंतित नहि भेल छलाह। मुदा हुनका गेलाक बाद आब लोकोकेँ देखेबाक छलन्हि जे क्यो ई नहि कहय जे बापक गेलाक बाद बहिन पर ध्यान नहि देलन्हि कलित। पिताक बरखी तक विवाहक प्रश्न उठेबो कोना करितथि। मुदा समय बितबामे कतेक देरी लगैत छैक। पूरा गामक बारहो वर्णक भोज कय, कलित बुचियाक विवाहक हेतु वर ताकयमे लागि गेलाह। परतापुरक सभागाछीमे गेलाह मुदा कोनो वर पसिन्न नहि पड़लन्हि जे बुचियाक हेतु सुयोग्य होय। पन्द्रह दिनक छुट्टी बेकार गेलन्हि। पुनः कटिहार पहुँचि गेलाह। कार्यक क्रममे गिद्धौर,बाढ़ इत्यादि गंगाक दक्षिण दिशक मैथिल ब्राह्मण परिवार सभसँ सेहो परिचय भेलन्हि। ओहिसँ हुनका बाढ़क एकटा लड़काक विषयमे पता चललन्हि जे गिदद्धौर स्टेटमे कार्य कय रहल छलाह।
चोट्टहि ओ’ लड़कासँ भेँट करबाक हेतु गिद्धौर पहुँचि गेलाह। बालक अत्यंत दिव्य छलाह। पता लय बाढ़ पहुँचि कय बालकक पितासँ गप केलन्हि। पंचकोशीक कथा कतबा दिनक बाद बाढ़क क्षेत्रमे आयल छल से एकरा काटब मुश्किल छल। सभटा गपशप कय पुनः भराममे सिद्धांत करेने मेहथ पहुँचलाह। बूढ़- पुरान जे क्यो सुनलन्हि से आश्चर्यचकित रहि गेलाह। बढ़य पूत पिताक धरमे- झिंगुर बाबू जेना कलितक सिद्धांत करेनहि पहुँचल छलाह तहिना कलित केलन्हि, वाह…। कथा ओनातँ दूरगर भेलन्हि, मुदा कलित स्वयम् नेनेसँ दूरदेशक बाशी छलाह, ताहि द्वारे हुनका सभचीजक अनुभव छलन्हि , यैह सोचि सभ संतोष कएलक। पूरा टोल विवाहक तैयारीमे लागि गेल। बुचियाकेँ कोनो दिक्कत नहि होएतैक। सर्वगुण संपन्न अछि बुचिया। गीत-नाद लियऽ आ’कि सराय-कटोरा, दसो हजार महादेव सुगढ़ पातर-पातर छनहिमे बना दैत अछि। जाहि घरमे जायत तकरा चमका देत।
विवाह विधि-विधानसँ संपन्न भय गेल। वरपक्ष संगहि द्विरागमनक प्रस्ताव राखलन्हि, मुदा कलित तैयार नहि भेलाह, तखन बुचियाक हाथक छाप लऽ कय वरपक्ष केँ जाय पड़लन्हि। कलितक पत्नी छलीह पूर्ण शुद्धा। बुचियासँ बहिनापा छलन्हि। बुचियो भौजी-भौजी कहैत नहि थकैत छलीह। तेसर साल द्विरागमनक दिन भेलैक। बुचियाक संग जे खबासनी गेल छलीह से आबि कय गंगा आ’ गंगा पारक दृश्यक वर्णन करय लगलीह तँ भाउजक आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लागलन्हि। कलितसँ कतेक बेर पुछलथिन्ह जे ई बाढ़ छैक कतय। समयक सँग सभ किछु सामान्य भाय जाइत अछि। बुचिया जखन एक-दू बेर एलथि-गेलथि तखन भाउज आरो निश्चिंत भय गेलीह। एवम् क्रमे कलित पुनः एकाकी भय गेलाह। सन् चौंतीसक भूकम्पमे महादेव पोखरि पर पत्नी आ’ दुहु पुत्री आऽ
एकटा पुत्रक संग बितायल रातिक बाद परिवार सहित किछु दिनका बाद कटिहार गेलाह। कारण छल महीना भरि चलल छोट-छोट भूकंपक तरंग। मुदा पत्नीकेँ घरक पीड़ा सतबय लगलन्हि। घरतँ भूकम्पमे ढहि गेल छलन्हि, से कलित भूमिक ओहि टुकड़ाकेँ छोड़ि फुलवरीक कातमे नव घरक निर्माण केलन्हि। अपन पुरान डीह अपन दियादकेँ दऽ एहि नबका डीह पर घरहट कएल। तकरा बाद एकटा पुत्र एवम् एकटा पुत्रीक प्राप्ति आओर भेलन्हि। पुनः एकटा पारिवारिक चक्रक प्रारंभ भय गेल। समय बितैत कतेक काल लगैत अछि। अपन बचिया सभ सेहो आब विवाह योग्य लागय लगलन्हि। अपन बच्चातँ सदिखन बच्चे लगैत छैक मुदा तँ की। पहिल बचियाक विवाह कछबी आऽ दोसरक खरख करेलखिन्ह। कछबीक परिवार सेहो राज-दरबारक कर्मचारी छलाह। घोड़ा, महफा, चास-बास….। मुदा बच्चा होयबाक क्रममे कलितक प्रथम पुत्रीक देहांत भय गेलन्हि मुदा ननकिरबी बचि गेल आऽ ओ’ मातृके मे रहय लागल। मुदा ओहो पाँचे वर्षक होयत कि एक दिन पेटमे दर्दक शिकायत भेलैक आऽ ओहो भगवानक घर मायक सेवामे चलि गेल।कलित जीवन आ’ मृत्युक एहि संग्रामकेँ देखैत रहलाह। कहियो गाममे हैजाक प्रकोप पड़य लागल तँ कहियो प्लेग आ’ कि की ? एक गोटाकेँ लोक जरा कय आबय तँ दोसर गोटाक मृत्युक समाचार भेटय। मुदा कलितक परिवार अक्षुण्ण रहलन्हि।

कलितक कटिहारमे पदोन्नत्ति आ’ प्रतिष्ठा बढ़ैत रहलन्हि। भातिज सभ पूर्वरूपेण ओतय रहैत छलाह। दुहू पुत्र केजरीवाल हाई स्कूल, झंझारपुरममे पढ़य लागल छलथिन्ह। कालक मंथर गतिमे कखनो काल गति आबि जाइत अछि। अपन तेसर पुत्रीक विवाह तमुरिया लग आमारूपी गाममे करबाय कलित जेना निश्चिंत भय गेलाह। अपन पैघ पुत्रक विवाह करेलन्हि, आऽ छोट पुत्रक अकादमिक प्रतिभाक प्रति निश्चिंत भेलाह। मुदा छोट पुत्रक अंधविश्वाशी होयबामे सेहो हुनका कोनो संदेह नहि छलन्हि। कारण एक दिन हल्ला उठलैक, जे घनगर चन्ना-गाछीमे, जतय दिनोमे अन्हार रहैत छैक, कोनो गाछक नीचा चाटी उठैत छैक, तखन हुनकर ई पुत्र चाटी उठाबय ओतय पहुँचि गेलन्हि। से जखन आठम वर्गमे विज्ञान वा कला चुनबाक बेर अयलैक, तखन पुत्रक विज्ञान विषय लेबाक निर्णयमे हाँमेहाँ मिला देलखिन्ह कलित बाबू। कतेक गोटे कहलथिन्ह जे सत्यनारायण बाबू आ’ के-के साइंस लय फैल कए गेलाह, बादमे पुनः आर्ट्स विषय लेबय परलन्हि। मुदा नन्द नहि मानलथि। साइंसोमे गणित लेलन्हि। कलित सोचलथि जे विज्ञान विषय पढ़ि अदृश्यक प्रति स्नेहमे नन्दक रुचि कम हेतन्हि। पता नहि किएक एकर बाद कलित निश्चिंत जेकाँ भय गेलाह। कटिहारसँ एक बेर आयले रहथि कि भोरमे नित्यक्रियासँ निवृत्त भय कलित हाथ मटियाबय लेल चिकनी माटिक ढ़ेर दिशि बढ़ि रहल छलाह कि पता नहि कि भेलन्हि, हाथक लोटा दूर फेंका गेलन्हि। ओ’ नीचाँ खसि पड़लाह। कनिया दौड़ल अयलीह, मुदा जीवनक खेल एक बेर भेटैछ आ’ एक्के बेर चलियो जाइछ।नन्द पिताक मृत्युक साक्षी छलाह। मृत्युक ई प्रकार हुनका लेल सर्वथा नवीन आ’ सर्वथा रहस्यमयी छल। अदृश्यक शक्ति विज्ञानक सर्वोच्चताकेँ नन्दक जीवनमे दबाबय लागल।
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वृत्तक गोलाकार आकृति केंद्रक परिधिमे घुमैत एकटा चक्र पूरा केलक। अदृश्य केंद्रक फाँसमे फँसल।
नन्द अपन यशोदा मैयाक छत्रछायामे बढ़य लगलाह, उम्रोमे आ’ पढ़ाइयोमे। अप्पन शिक्षक लोकनिक प्रिय पात्र भय गेलाह नन्द। हुनकर प्रैक्टिकलक कॉपीक साफ-सुथरा रूपक चर्चा सर्वत्र शिकक्षहु वर्गमे होमय लागल। फूल-सन अक्षर हुनकर शारीरिक सौन्दर्यसँ मेल खाइत छल।
एहि बीच एकटा आर घटना घटित भेल। यशोदा मैय्याक दुहु पुत्र भगवत्ती घरक सोझाँमे नीचाँमे सुतल छलाह। भोरमे माय देखलन्हि जे गहुमन साँप चारि टुकरा भेल पड़ल अछि आ’ बिज्जी माथ लग ठाढ़ पहरा दय रहल अछि। प्रायः बिज्जीक मारि पड़लैक गहुमनकेँ आ’ दुहु पुत्र सुरक्षित रहलन्हि यशोदा मैयाक। नन्द एहि घटनाक स्मृतिक संग आगू बढ़य लगलाह।
बीचमे बँटवारा भेल। घरारी सभ, निकहा खेत सभ सभटा दू-दू टुकड़ा होमय लागल। बाहरी लोक सभ कहैत छल, जे दुनू भायक संग अन्याय भय रहल अछि। स्कॉलरशिप प्राप्त कय नन्द आर.के.कॉलेज मधुबनीमे अंतर-स्नातक विज्ञान(गणित)मे नामांकन लेलथि। शुरूमे गणित बुझबामे दिक्कत भेलन्हि तँ रटय लगलाह। गणितकेँ रटबाक बुद्धि ई सोचिकेँ लगेलथि जे बादमे लोक ई नहि कहय, जे की सोचि कय विज्ञानक चयन कएल। मुदा किछु दिनका बाद रटैत क्रममे बुझबामे सेहो आबय लगलैन्ह। गामक फुटबॉलक मैदानक स्मृतिये शेष रहलन्हि, खेलेबाक अवसरे नहि भेटन्हि। गणितक शिक्षक तीन सय प्रश्नक सेट परीक्षाक पहिने दैत छलखिन्ह आ’ कहैत छलखिन्ह जे, जे क्यो साठि प्रतिशत प्रश्नक सही-सही उत्तर बना लेताह, ओ’ प्रथम श्रेणीमे निश्चित रूपसँ उत्तीर्ण होयताह। नन्द सत्तरि प्रतिशत प्रश्नक उत्तर तैयार कय शिक्षककेँ देखा देलखिन्ह। आशानुरूप बादमे परीक्षाक परिणाम अयला पर प्रथम श्रेणी भेटलन्हि। 1959 इंजीनियरिंगमे नामांकनक हेतु आवेदन दय देलखिन्ह। अंकक आधार पर सर्वोच्च अंक अयला उत्तर मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे नामांकन लय लेलथि। ओहि समय मात्र सिविल इंजीनियरिंग शाखाक पढ़ाई ओहि संस्थानमे होइत छलैक, से ओहि शाखामे नामांकन लय धोती-कुर्त्ता पहिरि कय पहुँचि गेलाह।दीक्षित साहेब वर्कशॉपक मशीन देखाय कहलखिन्ह, जे एहिमे धोती फँसि जायत, से फुलपैंट आ∙ शर्ट पहिरि कय आऊ। दू टा फुलपैन्ट आ∙ शर्ट कीनय पड़लन्हि नन्दकेँ। कपड़ा कीनि सियबितथि तँ ढ़ेर दिन लागि जयतन्हि से रेडीमेड कीनय पड़लन्हि। मुदा गाम जाथितँ बिदेसरे स्थानमे फुलपैन्ट-शर्ट बदलि कय धोती कुर्त्ता पहिरि लैत छलाह। कहियो गाम फुलपैंट पहिरि कय नहि गेल छलाह। सन् 1959 सँ 1963 धरि इंजीनियरिंगक पढ़ाई चललन्हि आ’ तखन बिहार सरकारमे इंजीनियरिंग असिसटेंन्ट आ’ एक सालक बाद 1964 सँ सहायक अभियन्ताक रूपमे बहाली भेलन्हि। इंजीनियरिंग पढ़ाई विशेष खर्च बला छल से एहि शर्त्तनामाक संग विवाह भेलन्हि जे पढ़ाइक खर्चा ससुर उठेथिन्ह। गर्मी तातिलक एक मास आ’ दुर्गापूजाक पंद्रह दिनक छुट्टीक पाइ ससुर काटि लैत छलथिन्ह। जौँ सासुरक लोक कहियो ई उपराग दैत छलैन्ह, जे हमही सभ इंजीनियरिंग करबेलहुँ अछि, तँ नन्द सेहो हँसि कय उपर्युक्त बातक खुलासा कय दैत छलखिन्ह। वृत्तक परिधि जेना पैघ भेल जा रहल छल। कालक परिधि पहिने पूर्ण चक्र पूरा कएलक आ’ आब परिधिक विस्तार शुरु भय गेल। दुःख-सुख आ’ उत्थान-पतनक खिस्सा। स्वतंत्रता दिवसक दिनक उमंग, झंडा ल’कय स्कूलक बच्चाक संग 15 अगस्त 1947 केँ घुमैत छलाह। कांग्रेसक भक्ति संगमे रहलन्हि। मुदा 1962क चीनी आक्रमणक बाद भारतीयसेनाक पाछू हटबाक दुःस्वप्न वायुसेनाक उपयोग नहि करबाक भारतक आश्चर्यजनक निर्णयक बादक मनःस्थिति छल पलायनक,हारिक । ऑल इंडिया रेडियोक घोषणा जे हमर सेना गर्वसँ पाछू हटि रहल अछि-सुनि नन्दक हृदय रुकि सन जाइन्ह। से जखन 1965क युद्धक बेर इंजीनियरक भर्त्ती सेनामे कैप्टनक रूपमे शुरु भेल तखन नन्द आ’ साहा साहब आवेदन दय देलखिन्ह। साहा साहेबक कनियाँतँ कानय लगलीह आ’ साहा साहेबकेँ रुकि जाय पड़लन्हि। नन्दक पत्नी एको बेर प्रतिरोध नहि कएल। मुदा ओजनमे छँटा गेलाह नन्द। मसोसि कय रहि गेलाह। तकर बाद जे शरीर घटेबाक सूर चढ़लन्हि, से बढ़िते गेलन्हि। एकेटा सपना छलन्हि-गाममे कोठाक घर। से सभटा सर्वे सभक नक्शा ऊपर कय घरक कुर्सी देलन्हि जे सड़कमे घरक कोनो भाग नहि जाय। मकानक डिजाइनक मात्र आधे भाग पूरा भय सकलन्हि। जतय-जतय ट्रांसफर होइन्ह एकटा नव अनुभव भेटन्हि।ओहि समय कनियाँकेँ तृतीय पुरुषक रूपमे संबोधित करबाक प्रचलन छलैक, मुदा नन्द द्वितीय पुरुषमे संबोधन शुरु केलन्हि। एकर आलोचना होयबाक बदला गाममे आनो लोक सभ ई संबोधन अपना घरमे शुरु कए देलन्हि। डेहरी-ऑन-सोनमे विकास कार्यमे ग्रामीण आदिवासीक पूर्ण सहयोग भेटलन्हि। कहियो पाइ देखि कय अंतरात्मा नहि डिगलन्हि। जी-जानसँ जीप जीप उठा कय अपन कार्यकेँ पूर्ण करथि। कखनो जीप तेज होइन्हतँ यादि पड़न्हि जे कोनो बच्चा ने पिचा जाइ।मुदा कहियो कोनो दुर्घटना नहि भेल। गामक सभ जातिक लोककेँ कतहु ने कतहु मस्टरे रॉल पर नोकरी देलन्हि। स्थानीय लोककेँ सेहो नोकरी करबाक हेतु प्रोत्साहित करैत छलाह। स्थानीय गरीब आदिवासी नन्दकेँ देवता बुझैत छलाह। एतहि दमाक पहिल बेर अटैक भेलन्हि नन्द पर। स्थानीय वैद्य दिन-राति एक कय जंगलसँ बीटी आनि कय देलकन्हि। दमाक इलाज एलोपैथियोमे नहि अछि, मुदा एहि बूटीक एकमात्र खोराकी सँ अगिला कतेक साल तक नन्द दमासँ दूर रहलाह। सँगी सभ भोलेनाथ नाम राखि देलथिन्ह। कतेक कमाइ-धमाइक गुर सभ सिखेबाक प्रयास सेहो केलन्हि। मुदा ग्रामीण-जनक लाचारीकेँ ततेक ल’ग सँ देखने छलाह नन्द, जे एहि सभ गप्प दिशि ध्यानो नहि जाइत छलन्हि। ताहुमे गरीबीक बादो जे आपकता स्थानीय जनसँ भेटैत छलन्हि, तकरा बाद?
एहि बीच एक पुत्रीक प्राप्ति सेहो भेलन्हि। दोसर बेर पुत्रक प्राप्ति भेलन्हि। पुत्री मामा गाममे जन्म लेलथिन्ह आ’ पुत्र अपन गाममे। बच्चा सभक स्थितप्रज्ञ भाव, फेर हँसबफेर ठेहुनिया,—। बच्चाक बढ़बाक प्रक्रियाक दर्शन ओहिना अछि, जेना विश्वक निर्माण ओ’ ओकर चेतनाक विकास।हुनकर भातिजक देहांत नेनेमे भेलाक बाद एहि दुनू बच्चाक प्रति स्थितप्रज्ञताक भाव, न्हि सुखमे सुखी नहि दु:खमे दुखीक अवतरण भेल नन्दमे। नन्द दिल्ली कोनो ट्रेनिंगमे गेल छलाह।एक राति सपना देखलखिन्ह, जे नवीन हुनकर गामक फूसक ओसारा पर बैसल छथि।ओ’ नेना जकरासँ नन्दकेँ बड्ड आपकता छलन्हि, उठि कय खेलाइ लेल जाइत अछि। कनेक कालक बाद पेटमे दर्दक शिकाइत करैत अछि। सभ क्यो जमा भय जाइत छथि।बूढ़-पुरान अपन-अपन नुस्खा देबय लगैत छथि।मुदा कनिये कालक बाद बच्चाक मृत्यु भ’ जाइत अछि। नन्दक आँखि खुजि गेलन्हि।हुनका अपन बड़की बहिनक बचियाक मोन पड़लन्हि। एहने घटना छल ओहो।बचियाकेँ क्यो बूढ़ी पेट पर हाथ दय देने छल, आ’ ओ’ कनेक कालक बाद संयोगवश पेट दर्दसँ काल कवलित भय गेल छलीह। नन्दकेँ अदृश्य, भूत-प्रेत, राकश आ’ डाइन जोगिन पर असीम विश्वास छलन्हि। ई सभ सोचिते ओ’ जोर-जोरसँ कानय लगलाह। संगी सभ हड़बड़ा कय उठैत जाइत गेलाह। जखन सभ समाचार ज्ञात होइ गेलन्हि त’ किछु गोटे कहलखिन्ह, जे भातिजक अउरदा बढ़ि गेल। नन्दक मुँह लटकल देखि कय, क्यो-क्यो हुनक अभियंताक वैज्ञानिक दृष्टिकोणकेँ मोन पाड़य कहलकन्हि। मुदा नन्दकेँ बोल-भरोस क्यो नहो दय सकलाह। नन्द ट्रेनिंग छोड़ि कय सपनेक गप पर गाम विदा ब’ गेलाह। तेसर दिन गाम पहुँचलाह, तँ भैयाकेँ केस कटेने देखि कय सशंकित भय गेलाह। गामक सीमांतेसँ जे क्यो भेटन्हि से कनेक दु:खी स्वरमे गप करन्हि।आँगन पहुँचलाह तँ माय जोर-जोरसँ कानय लगलीह।सपनाक सभ्टा गप सत्य बुझेलन्हि, अक्षरसः सत्य। भातिज हुनका केश कटाबय हेतु सही समय पर बजा लेलखिन्ह। नवीनक फोटोक पाँछामे अंग्रेजीमे ओकर जन्मक आ’ मृत्युक तिथिक संग ओकर तोतरायल बोलीमे काका-कका कहबाक बात फाउंटेन पेनक सियाहीसँ नन्द लिखलन्हि। कोठा घरकेँ बनयबाक पहिनहि ओ’ चल गेलाह, गेलाक बादो मुदा स्वप्नमे काकाकेँ नहकेशक दिन मुदा बजा कय।

पुत्रीक जन्मक बाद कोठाक घरो बननाय शुरु भय गेलन्हि। पुत्री जखन पैघ भेलन्हि, तँ यादि करबाक क्रममे कहैत छलीह, जे कुर्सी पड़बाक लेल जे खधाइ खुनल गेल छल से बड्ड गँहीर छल।मुदा पिता यादि पाड़लखिन्ह जे काका अहाँकेँ हाथसँ पकड़ि कय खधाइमे पात सभ साफ करबाक लेल नीचाँ दैत छलाह, तखन खधाइ बहुत गँहीर कोना भेल। पुत्री बा’ केर कोरामे एकर समाधानक हेतु पहुँचि जाइत छलीह, जे खधाइतँ बहुत गँहीर बुझाइत छल , तखन ईहो बात सही जे काका हाथेसँ खधाइमे उतारि दैत छलाह। नन्दक माय बच्चा सभक बा’ भय गेलीह।नन्दक पुत्रकेँ बा’ नन्दक नन्द कहैत छलीह। कखनो गोपाल तँ कखनो राजकुमार, ओकर हँसी, औँठिया कारी घनगर केश। बा’क कोठाक घर बनि गेलन्हि तँ पेटक दर्द सेहो शुरु भेलन्हि। मुदा नन्द एहि बेर अपन घरक पेटक दर्दक दू टा मृत्युकेँ अदृश्यक निर्देशपर होइत देखलाक उत्तर मायकेँ इलाजक हेतु कैक ठाम एलोपैथिक डाक्टरक ल’ग पैघ-पैघ शहरमे लय गेलाह। डायगनोस भेलन्हि कैंसर नामक दु:खदायी रोग। एहि बीमारीक इलाज रोगोसँ बेशी दुःखदायी छल। रेडियमसँ ट्यूमरकेँ जरेनाइ। बा’ टूटि गेलीह। पटनेमे मृत्यु भय गेलन्हि। ओतहि दाह संस्कार गंगा-तट पर भेलन्हि, कारण ओतय मान्यता छल जे गंगा तट पर गायक बोली जतेक धरि सुनाइ पड़ैत अछि, ततेक दूर मगहक क्षेत्र नहि मानल जायत। तदंतर श्राद्ध कर्म गाममे भेलन्हि। बा’ चलि गेलीह नन्दक द्वितीय पुत्रक जन्मक पहिनहि। मुदा बा’क चर्चाघरमे होइते रहल। बा’ केर फोटो बा’ केर नाति सभक प्रेरणा श्रोत बनल रहल। जे सपेताक गाछ बा केर श्राधमे उसरगल गेल छल, तकर आम हुनकर नाति-नातिन नहि खाइत छलन्हि।जे आम खसैत छल से बाबाक सारा पर राखि देल जाइत छल।गोदान आ’ वैतरणी पार करेबाक विधिमे जे गायकेँ दागल गेलैक तकरा देखि बा’ केर दुहु पुत्र प्रण लेलन्हि जे आब ई काज भविष्यमे कहियो नहि केल जायत। बा’ अपन धैर्यसँ मरैत काल तक अपन परिवारकेँ पुनः अपन पूर्व प्रतिष्ठा आ’ सरस्वतीक भक्तक रूपमे प्रतिष्ठित करबामे सक्षम भेलीह। मरैत काल बुचिया सेहो बाढ़सँ अपन भौजीकेँ भेंट करय लेल अयलीह।दुनू ननदि आ’ भौजी पुरान-पुरान गप सपमे अपना- अपनाकेँ बिसरबैत गेलीह। भौजी भय गेल छलीह बच्चा सभक बा’ आ’ ननदि भय गेल छलीह बच्चा सभक बुढ़िया दीदी। बुढिया दीदीक खिस्सा बच्चा सभक मध्य बड्ड लोकप्रिय भय गेल छल। बृहत्यकथाक खिस्सा सन नमगर- कैक रातिमे खतम होयबला। खिस्सा सुनबाक क्रममे एक बच्चा सुति जाइत छल, फेर ओहिसँ पैघ बच्चा आ’ सभसँ पाँछाँ सभसँ पैघ बच्चा सुति जाइत छल।अगिला राति मारि शुरु, सभसँ पैघ बच्चा कहन्हि, जे जतयसँ खतम केलहुँ ततयसँ शुरु करू, ई सभ पहिने सुति गेलथितँ ई सभ अपन जानथि। मुदा बुढ़ियो दीदी कम नहि छलीह। अपन खिस्सा कनेक आओर आगूसँ शुरू करैत छलीह।जखन सभसँ पैघ बच्चा कहय, जे एकर पहिनेक खिस्सा हम कहाँ सुनलहुँ तँ बुढ़िया दीदी कहथिन्ह, जे हम बताहि जेकाँ खिस्सा कहिते रहि गेलहुँ आ’ अहूँ सुति गेल छलहुँ।तखन हम खिस्सा कहब बन्द कए देलहुँ।तखन निर्णय भेल जे जतयसँ सभसँ छोट बच्चा चाहैत अछि, ततहिसँ खिस्सा शुरु कएल जाय।

बड़काकोला बला खेतमे नन्द बोरिंग गरबेलन्हि, जे पानिक हेतु ललायल ई बाध सिंचित भय जाय।मुदा कतेको दिनका परिश्रमक बाद ई पता चलल जे नीचाँमे पानिक अभाव छल। लेयर नहि भेटबाक कारणसँ पाइप खेतेमे लागल रहल, आ’ सुखा गेल।बच्चा सभक हेतु ई खेत बोरिंग बला खेतक नामसँ प्रसिद्ध भेल।बादमे सरकारी बोरिंग गाममे लगबाक घोषना भेल, मुदा नन्दक भैयाकेँ पता चललन्हि, जे ई बोरिंग ओहि पानि विहीन बाधमे नहि गरायत, वरन् ओहि बाधमे गरायत जाहिमे बारहोमास पानि लागल रहैत अछि। किछु गोटेकेँ ल’क’ पटना पहुँचि, मुख्यमंत्रीकेँ आवेदन देलन्हि। तखन जा कय ओहि सुखायल बाधक जीर्णोद्धार भेल। सात हाथक उज्जर अंग्रेज इंजीनियर कोन-कोन मशीन ल’कय आयल आ’ दुइये दिनमे बोरिंग गारि कय चलि गेल। मुदा बादमे क्यो कहलन्हि जे ओ’ अमेरिकन छल आ’ कारण सेहो देलन्हि जे सभटा उज्जर लोक अंग्रेज होय से जरूरी नहि।फेर कमला बलानक दुनु कात छहरक निर्माण भेल। किछु दिन तक ठीक रहल, मुदा किछु दिनका बाद हाल ई भेल जे दुनु छहरक बीचमे बालु भरैत गेल, जतेक छहरकेँ ऊँच करू ततेक कम। झंझारपुर पुलक नीचाँ तक बालू भरि गेल। कनियो पानि आबय तँपानि खतराक चेन्हसँ पार आ’ फाटकसँ बाहा बाटे पानि पोखरि-खेतकेँ डुबा दैत छल। जे खेत बहुत ऊँच आ’ दू पाइक मोलक छल से नीक भ’ गेल आ’ निकहा खेतमे खेती बन्द भय गेल। दुनू छहरक बीचक बलुआही जमीनमे तीन-तीन बेर रोपनी करय पड़ैत छल। लोककेँ आब परोर आ’ अल्हुआक खेती एहि बलुआही जमीनमे शुरू करय पड़ल। डकही पोखरिक चारू कातक बढ़मोतरमे छिटुआ धान करय पड़ल, कारण रोपनी महग भय गेल। पूर्णाहा बाध पानिसँ भरल रहैत छल। कोठिया-मेहथक बीचमे भोरहा छल-गँहीर पट्टी- प्रायः कोशीक कोनो पुरनका छिटकल धार। मुदा अखुनका कोशीक भौगोलिक दूरीक कारण एहि पर संदेह करनिहारक संख्या सेहो बेश। एहि भोरहा कातमे मेहथक आ’ कोठियाक संघर्षक खिस्सा….पछिमा-भुमिहार टोलक एकटा आन्हर बूढ़क करतब। बूढ़केँ सभ बान्हि कय रखलकन्हि,जे ओ’ मारि करय नहि पहुँचि जाथि।मुदा केबाड़ी तोड़ि आ’ बड़का बाँसमे फरसा-भाला लगा कय पहुँचि गेलाह लड़बाक हेतु।सवा मोन चूड़ि कोठियामे फूटल ओहि मारिमे। आ’ मारि कोन गप पर..सूगरक सीराक हेतु।……एकटा आर कथा-बूढ़ा काकाक झठहाक कथा, सभटा बानर सभ डरक लेल कलम-गाछी छोड़ि पड़ा गेल छल। आइ काल्हिक छौरा सभकेँ देखियौक, झठहा कियो मारि कय देखाबय जे जोमक फुनगीकेँ छू लय। सभटा अखराहा लोक सभ जोति लेलक तखन शरीर कोना बनैत जयतन्हि।

नन्दक डेरा पर बुढ़िया दीदी एक बेर बाढ़सँ अपन बेटाकेँ ल’ कय अयलीह, बेटाक नोकरीक लेल। बाढ़क लाइ केर स्वाद सभ बच्चा सभ बुढ़िया दीदीक पटना आकि गाम अयले पर चिखैत जाइत छल।जमीन्दारी प्रथाक समाप्तिक बाद नौकरीक चलती भय गेल छल आ’ दिक्कत सेहो ताहिमे सरकारी नोकरीक। जयराम नौआ तखनने कहैत छथि, जे नन्द सभ जातिकेँ सरकारी नोकरी देलखिन्ह, मुदा नौआ-ठाकुर टा बचि गेल। से नन्द नहितँ हुनकर बेटेसँ अपन बेटाक लेल नोकरी माँगताह। सभकेँ नोकरी भेटलैक मुदा बुढ़िया दीदीक बेटाकेँ नोकरी नहि भेटलैक।किछु समय-साल सेहो बदलल नहितँ पहिनेतँ लोक नोकरी करैयो नहीं चहैत छल। पुबाइ टोलक गुलाब झा कहैत छलाह,जे नोकरीक माने भेल नहि करी, आ’ करीतँ की पाबी-वेतन माने बिना तन आ’ तनखा माने तनकेँ खा।

बुढ़िया दीदीक आनल लाइ आ’ कतेक राति धरि चलय बला खिस्सा। गाम घरमे कखनो काल शुरु भय गेल आन आन प्राकारांतरक खिस्सा, इनार, पोखरि,करीन,बाहा,खत्ता,गाछी- पोखरिक बीच, आ’ एहि सभक हेतु होबय बला छोट-मोट झगरा-झाँटि आ’ कि रमन-चमनक मध्य नन्दक नन्द सभ बढ़य लगलाह।
नन्द अपन बच्चा सभकेँ गामसँ दूर नहि कयलन्हि। गर्मी तातिल, होली आ’ दशहरा, तीन बेर कमसँ कम साल भरिमे समस्त परिवार गाममे जयबेटा करैत छल। बच्चा सभ आम खयबाक हेतु दीदीक गाम जाइत छल। पैरे-पैरे दूर-दूर धरि, कहियो कमलाक रेतक बीच तँ कहियोआमक गाछीक मध्य चलैत चलबाक अनुभवे किछु भिन्न छल। आमक मासमे रात्रिक माछ-भातक आमक कलममे बनभोज,खुरचनसँ आमक खोइचा हटयबाक अनुभव, ती-ती- ‘जकरे नाम लाल छड़ी’ –सतघरिया खेलेबाक अनुभव,संठीमे आगि लगा कय धुँआ निकालबाक अनुभव आ’कि काँच आममे चून लगाकय खयबाक उपरांत ओकर मीठ भ’ जयबाक अनुभव हो; ई सभ अनुभव आइ काल्हिक बच्चाकेँ कोना भेटतैक यावत ओकरा सभकेँ गाम एनाइ जेनाइ नहि करायब। नन्द तँ एकबेर अपन जमायकेँ कहनहियो रहथि जे आगाँक सात जन्म शर दिशि घुरि कय नहीं आयब।

सन् 1975क पटनाक बाढ़िक समय नन्द गंगाक उत्तर गंगा पुल परियोजनामे आबि गेल छलाह। नन्द दुइ पुत्र आ’ एक पुत्रीक संग अपन परिवार चला रहल छलाह।तीनू बच्चा स्कूलमे पढ़ाइ-लिखाइ करैत जाइत छलाह। तखन ककरा भुझल छलैक जे ई सन् 1975 नन्द आ’ हुनकर बच्चा सभक जीवनक एकटा विभाजन रेखा बनत आ’ जीवनक धारकेँ बदलि देत।

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आरुणिक वृत्तांतक सारांश यैह अछि,जे हुनक जन्मक समय हुनकर पिताकेँ क्यो कहीं देलकन्हि, जे बचिया भेल अछि। दू-तीन दिन धरि हुनका दिमागमे छलन्हि जे बेटिये भेल अछि। छठिहारिक एक दिन पहिने हुनका पता चललन्हि जे बेटा भेल अछि। एहि अनिश्चितताक उपरांत यैह सिद्ध भेल, जे यावत सत्यक जे रूप बूझल अछि ,सैह तावत धरि सत्य रहत। सत्यक विभिन्न रूप , जे असत्यतँ नहीं अछि तकरे प्रतिकीर्तिक रूपमे आरुणिक व्यक्तित्वक प्रादुर्भाव भेलैक। जन्मेसँ एहि आभासित सत्यक विभिन्न रूपक साक्षी रहलाह आरुणि। आरुणिक जन्मक पहिनहि बा’ केर देहांत भ’ गेलन्हि। बादो मे जखन-जखन बा’ केर चर्चा अबैत छल, आरुणि ध्यानसँ सुनैत छलाह,आ’ अपन जिज्ञासा बढबैत छलाह। एवम क्रमे बा’ हुनकर जीवनक अंग भ’ गेलीह। बा’ हुनकर जन्मक पहिनहि सँ शरीररूपे नहीं छलीह, मुदा हुनकर अवस्थिति एहि घरमे सदिधन छलन्हि।
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आरुणिक कथा आ’ नन्दक कथा आ’ नन्दक कथाक बीचक तारतम्य पहिने तँ नहीं बुझि पड़ि रहल छल। मुदा प्रकृतिक संगहि आरुणि सेहो अपन प्रतिभा देखाबय लगलाह। मनुष्यक प्रवृत्तिये होइछ समानता आ’ तुलना करबाक, साम्य आ’ वैषम्यक समालोचना आ’ विवेचनमे कतेक गोटे अपन जिनगी बिता दैत छथि। आरुणि आ’ नन्दक बीच सेहो अनायासहि साम्य देखल जा’ सकैत अछि। दुहु गोटेक ऊपरी प्रतिभा आ’ तथाकथित वैचारिक मतभेदाक रहितहु, जे मूल व्यक्तित्वक साम्य होइत छैक, से दुनू गोटेमे वर्त्तमान अछि। एअहन सन बुझना जाइत छल।
भार्तीय मध्य वर्गक बच्चाक लालन-पालन आ’ पोषण, जाहि आशाओ’ आकांक्षा सँ होइत अछि, तकर अपवाद आरुणि नहीं छलाह। जेना सभ माता-पिता अपन नेनाक छोटो छोट बातमे प्रतिभाक छप देखैत छथि,तहिना आरुणिक माता-पिता विशेष कय पिता, आरुणिक व्यक्तित्वमे विशेष प्रतिभा देखय लगलाह।
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आरुणि केँ खूब स्वप्नसभ अबैत छलन्हि। तहिना दाँत सेहो सूतलमे कटकटाइत छलन्हि। सपनामे नीक आ’ अधलाह दुनू प्रकारक तत्त्व रहैत छलन्हि, मुदा डराओन तत्त्व विशेष रहैत छलन्हि। बहुत दिन तक आरुणि एहि प्रयासमे रहथि, जे कोना कय सपना आ’ कि दुःस्वप्न अयनाइ बन्द भय जायत। बीच रातिमे ओ’ घामे-पसीने भय जाइत रहथि, आ’ जखन निन्न खुजनि त’ देखथि जे माता-पिता पंखा होँकि रहल छथि। सभसँ पहिने ककर जन्म भेल, आ’ तकर पहिने ककर, आ’ सभकेँ भगवान बनओलन्हि तँ भगवानकेँ के बनोलकन्हि। ई सभ सोचि-सोचि कय आरुणि चिंतित भय जाइत छलाह। रातिमे स्वप्नमे हुनका होइत छलन्हि, जे इनाररूपी प्रकृतिमे ओ’ गामक छतपर घूमि रहल छथि। फेर ओ’ छतक कातमे जाय लगैत छथि। फेर जेना पोखरिक कछेर अछि, तहिना छतक काते कात बिन इच्छेक जाइत रहैत छथि, फेर चाहैत छथि, जे कातसँ हटि कय बीच छतपर आबि जाइ। किंतु इनार रूपी प्रकृतिक गुरुत्वमे ओ’ खिचाइत चलि जाइत छथि। आ’ खसि जाइत छथि। अनायासहि निन्न खुजैत छन्हि तँ खुशी आ’ दुःख दुनू प्रकारक भावना मोनमे अबैत छन्हि। खुशी एहि बातक जे स्वप्ने छल ई, यथर्थ नहि। दुःख एहि बातक जे फेर ने कतहु एहि प्रकारक दःस्वप्न फेर आबय। एहि बीच आरुणि कखन निन्न अबैत अछि आ’ कखन स्वप्न, एहि सभ पर जेना शोध करय लगलाह। फेर अगिला दिन मोन पाड़थि, जे नौ बजे धरि जागल छलहुँ, दसो बजे यावत जागले छलहुँ, तखन कखन सुतलहुँ। फेर किछुए दिनमे ओ’ अपना मोनके बहटारि लेलन्हि, जे जौँ हुनका ई यादि पड़ि जाइन्हि जे निन्न कखन आयल, तखन तँ ओ’जागले रही जयताह। हुनकर नाम कतेक बेर बदलल गेल। पुरातन ग्रंथ सभक अध्ययन नंद एहि हेतु कएलन्हि। फेर हुनक पढ़ाइ-लिखाइक कार्य शुरु भेलन्हि। श्री गणेशजीक अंकुश लिखनाइ सिखाओल गेल आरुणिकेँ, आ’ एहि आकृतिक संग गौरीशंकरक अभर्थना-सिद्धरस्तु।
“साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादांतस्य धूर्जटेः जाह्णवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥“

पशुपतिः पतिः कहीं आरुणि खूब हँसथि। एहिसँ हुनकर तोतरेनाइ सेहो समाप्त भय गेलन्हि। एक सँ सय तकक पाठमे आरुणिकेँ पशुपतिःपतिः बला तारतम्य यादि पड़ैत छलन्हि। दस सँ उन्नैस आ’ फेर बीस सँ उनतीस। नन्दक छोट पुत्र आरुणि शुरुअहिसँ नन्दक आशा आ’ आकांक्षाक प्रतीक बनय लागल छलाह। एकर किछु कारण सेहो छलैक । एकसँ सय धरि लिखब नन्द हुनका सिखा रहल छलाह।नन्द हुनका एकसँ दस धरि लिखनाइ आ’ बजनाइ सिखेलखिन्ह आ’ एगारहसँ आँगाँ सेहो सिखाबय लागलखिन्ह ।पुनः ई सिचि कय जे बालक पर एतेक बोझ लदनाइ ठीक नहीं अछि ओ’ रुकि गेलाह। परंतु बालककेँ एगारहसँ बीस, फेर एक्कैससँ तीस जयबा धरि,एहि बातक पता भ’ गेलन्हि जे ई तँ एक सँ दस तकक पुनरावृत्ति मात्र छैक। ओ’ एकर औचित्यक अपन पितासँ चर्चा के देलन्हि,तँ पिता हुनका एकसँ सय तक लिखबाक चुनौति दय देलखिन्ह। बालक से लिखि कय जखन देखा देलखिन्ह, तकरा बाद प्रत्येक शब्दकेँ कोन नाम देल जाय तकर समस्या आयल। नन्द एगारह,एक्कैस,उन्नासी आ’ नबासीक विशेष रूपसँ चर्चा केलन्हि। माँ जखन आधा घंटाक प्रगतिक समीक्षाक हेतु अएलीह, तखन हुनका पता चललन्हि जे पाठ्यक्रमतँ पिता-पुत्रक बीच पूर्ण भ’ चुकल अछि। पिता गदगद भय गेलाह आ’ माँ एहि घटनाक चर्चा बहुत कम गोटेसँ केलन्हि, जे कतहु ककरो नजरि नहीं लागि जाय। एहने-एहन ढेर उदाहरण पिताक हृदयमे पुत्रक कोनो गलती नहीं केनहारक छवि अंकित करबामे सक्षम भ’ गेल। ——————————————————————————————————–

आरिणिकेँ अप्पन पुरना बात सभकेँ यादि रखबाक धुनि जेकाँ छलन्हि। कोन ईस्वी मे की भेल , कोन ईस्वी सँ की-की भेल से कोना यादि होयत। हम बच्चामे की सभ कएलहुँ –अप्पन पिता-माता आ’कि आनो बूढ़-पुरान सभक जीवनक घटनाक्रमक सभ गप बुझबाक लालसा हुनकामे छलन्हि। कखनोकालकेँ हुनका एहि गपक छगुंता होइत रहन्हि जे बिना हुनकर देखनो, एहि विश्वमे सभ गोटे सभ काज कोना कय रहल अछि। मने ई जे जखन आरुणि सुतल छथि तखनो विश्व चलि कोना रह्ल अछि। बच्चाक हुनका दुइ-चारिटा घटनाक यादि मात्र रहन्हि। जेना कि सिनेमा हॉलमे बॉबी सिनेमाक स्मरण,स्टुडियोमे माता-पिताक संग मुंडनक पहिने केशबला फोटो खिचेबाक स्मृति। फेर कोनो गप पर माँ द्वारा धयान नहि देलाक उपरांत भरि घरक चाभीक झाबाकेँ सोँझाक डबरामे फेंकि देबाक स्मृति।गाममे कोनो काज-उद्यमक भीड़क दृश्य।फेर आरुणि एहि सभपर सोचलाक बाद यैह निष्कर्ष निकाललन्हि, जे 1976 ई.सँ हुनका सभ किछु यादि छन्हि, कारण तखन ओ’ 5-6 वर्षक होएताह आ’ एहि वर्षसँ माँ हुनका अखबार पढ़बाक हिस्सक धरा देने छलखिन्ह।नन्दक हाथमे आरुणिक डायरी हाथ लागि गेलन्हि, जाहिमे आरुणि अपन स्मृतिक घटनाक्रमक इतिहासकार जेकाँ वर्णन देने रहथि।
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हम ,आरुणि,सन्1976 ई.केँ अपन जीवनक विभाजन रेखा मानैत छी। कारण एहिसँ पहिने हमरा अपन जीवनक घटनाक्रम किछु टूटल कड़ीक रूपमे बिना तारतम्यक बुझना जाइत अछि। कखनोकेँ हमरा ईहो होइत अछि जे एहि मे सँ किछु पूर्व जन्मक कोनो घटनाक्रमतँ नहि अछि?
सन् 1976 ई.। हम गंगाब्रिज प्रोजेक्टक गंगाक उतरबारी कातमे हाजीपुरमे बनायल कॉलोनीमे अपन माता-पिता आ’ पैघ भै-बहिनक संग रहि रहल छी। पिताजी व्यवसायसँ सरकारी अभियंता छथि, मुदा होम्योपैथिक चिकित्सामे सेहो एम.डी.(गोल्ड मेडेलिस्ट) छथि, आ’ हुनकर ई एक तरह सँ हॉबी छन्हि। भरि कॉलोनीक लोक चंदा एकत्र कय होम्योपैथिक दबाइ कानपुरसँ मँअगबैत छथि। बाबूजीक संग एकाध गोटे कानपुर जा’ कय दवाइ सभ लेने अबैत छथि। हमरा सभक सर्कारी क्वार्टरक ड्रॉइंग रूममे एकटा अलमीरा, दू टा कुर्सी आ’ एकटा टेबुल चिकित्सकीय कार्यक हेतु समर्पित अछि। हमर एकटा छोटका टेबुल सेहो एहि रूपमे रहैत अछि, जाहिमे तीस पाइक आर्यावर्त्त अखबार हम अप्पन माँकेँ पढ़ि कय सुनबैत छियन्हि।जतय धरि हमरा यादि अछि, एहि कॉलोनीक दूटा भाग छल। चारू दिशि चहरदिवारी कछल, जे एहि कॉलोनीक बीचमे सेहो एकटा दिबारि छल, जे एहि कॉलोनीकेँ ‘रहयबला’ आ’ ‘गोदामबला’ एहि दू हीसमे बँटैत छल। गोदामबला इलाकामे मारि रास लोहाक छड़, जोखय बला मशीन आ’ ट्रक सभक संग एकटा कदम्बक गाछक स्मृति हमरा अछि। जोखय बला एकटा मशीन ततेक पैघ छल, जाहि पर हम जखन ठाढ़ होइत छलहुँ, तँ ओकर काँटा हिलबो धरि नहि करैत छल।हमरा बताओल गेल छल जे एहि पर भरिगर चीज सभ मात्र जोखल जा सकैत अछि। पन्द्रह-सत्रह किलोक पाँच सात बर्षक बच्चाक भार एकरा हेतु नोँसिक समान अछि।
एहि गङ्गा-ब्रिज कॉलोनीक रहयबला क्षेत्रमे एकटा पैघ आ’ एकटा छोट मैदान छल।दुनूक बीच एकटा पैघ पानिक टंकी आ’ पम्प हाउस छल।पम्प हाउसमे पानि जाहि बाटे अबैत छलैक ,से बेस मोटगर पाइप छलैक आ’ हमरा अखनो यादि अछि, जे ओ ओहिना खुजल रहैत छलैक। हम ओहिमे आँखि दय कय तकनहियो रही मुदा दोसर बेर डरसँ पाछू हँटि गेलहुँ जे कतहु खसि पड़लहुँ तखन की होयत। ओ’ पाइप मात्र एकटा बोरासँ झाँपल रहैत छल। पैघ क्रीडांगनक उतरबारी कातमे एकटा कोटाबला दोकान रहैक। ओहिसँ पछबारी कातमे एकटा हनुमानजीक मूर्त्ति आ’ मंदिर बनि रहल छल,जे बहुत पहिनहि बनि गेल रहैत,मुदा कारीगर हनुमानजीक नाँक ठीकसँ नहि लगा पाबि रहल छल। हनुमांजीक नाँक चाहेतँ सामग्रीक समुचित मत्राक अनुपात नहि रहलाक कारण वा ककरो बदमाशीक कारण टूटि जाइत रहय,किंतु किछु दिनुका बाद हनुमानजीक मूर्त्ति बनि कय तैयार भ’ गेल रहय।मंगलकेँ आर्ती होमय लागल छल, पूरा कॉलोनी जेना भक्ति-भावसँ भरि उठल। किछु दिनुका बाद सभक उत्साहमे कनेक कमी आबय लागल, जेना आन संस्थाक संग होइत अछि, प्रारम्भिक क्रमशः कम होइत गेल आ’ मंदिरक सँग जुटल सभटा सामाजिककार्यक्रमक योजना योजने रहि गेल।

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हम कॉलोनीसँ दूर एकटा स्कूलमे पढ़बाक हेतु जाय लागल छलहुँ। हमर पैघ भाइ आ’ बहिन सेहो ओहि स्कूलमे पढ़ैत रहथि। एक दिनका गप्प अछि, जे स्कूलमे हमरा कोनो दोसर बच्चाक संग झगड़ा भय गेल।दुनु गोटेक संग स्लेट रहय। हम आ’ ओ दोसर बच्चा एकरा हथियारक रूपमे प्रयोग करय लागलहुँ। हम सोचय लगलहुँ जे जौँ स्लेटकेँ दोसर बच्चाक माथ पर मारबैक तँ शोनित निकलय लगतैक। ताहि द्वारे हम स्लेटकेँ रक्षात्मक रूपे प्रयोग केलहुँ। मुदा ओ’ दोसर बच्चा मचंड छल…….खच्च….हमर माथसँ शोनितक धार निकलय लागल।टीचर सभ हमरा प्रिंसपलक रूममे लय गेलथि। रुइयामे सेवलोन वा डिटॉल ओकर रंग आ’ सुगंध हमरा अखन धरि यादि अछि। फर्स्ट-एडक बाद साँझक होयबाक आ’ छुट्टीक बेर नहि ताकल गेल। स्कूलक रिक्शा जाहि पर “सावधान बच्चे हैं” लिखल छलकेर बाट नहि जोहि एकटा दोसर रिक्शामे हमरा दीदीक(बहिनक) संग घर पठा देल गेल। हम दीदीकेँ पुछलियैक, जे “सावधान बच्चे हैं” केर अर्थ की भेल। हमरा लगैत छल जे एकर अर्थ छल जे सभटा बच्चा जे ओहि रिक्शामे बैसल अछि, से सभ सावधान अछि, आ’ एहि बातसँ ओ’ दोसर छौड़ा असहमति देखा रहल छल आ’ ताहि गप्प पर झगड़ा बजरि गेल छल। दीदीक उत्तर जे इइ लिखबाक उद्देश्य चेतावनी छैक, जे कोनो दोसर गाड़ी पाछू सँ ठोकर नहि मारि दैक आ’ सम्हरि कय चलय।
“मुदा किएक”- हम संतुषट नहि होइत पुछलियन्हि।
एहने प्रश्न आ’ उत्तरक संग हम बढ़य लागल छलहुँ। आ’ बढ़ैत- बढ़ैत कहियो काल खिसियेला पर माँ कहथि, जे सोचैत रही जे कहिया पैघ होयत आ’ पैघ भेलतँ नाकमे दम कए देने अछि।
कॉलोनीक बाहरक क्रिश्चियन संतक नाम पर बनल स्कूलमे हम सभ भाइ-बहिन जाइत रही।स्लेटसँ कपार फोरबयलाक बाद बाबूजी कॉलोनीमे ऑफिसर सभक मीटिंग करबओलन्हि। फैसला भेल जे खेलाक मैदान आ’उत्तरबरिया सीमंतक देबालसँ सटल कोटाक दोकान(सार्वजनिक वितरण प्रणालीक दोकानकेँ कोटाक दोकान कहल जाइत छल) अपन आवश्यकतासँ बेशी पैघ घरमे छल। ओहि कोटाबलाक लाइसेंस सेहो कोनो कारणसँ समाप्त भय गेल छलैक, से ओहि एसबेस्टस बला 3-4 कोठलीक घरकेँ प्राथ्मिक विद्यालय बनयबाक निर्णय लेल गेल,आ’ दू-चारिटा शिक्षकक बहाली कय , दू चारिटा लोकक क्मेटी बनाय स्कूल शुरु कय देल गेल। पड़ोसक गंडक कॉलोनीकेँ सेहो छह महीना बाद नोत देल गेल, जे अहूँ अप्पन कॉलोनीक बच्चा सभकेँ एतय पढ़ा सकैत छी। उत्तरबड़िया देबाल पर बाहर दिशिसँ स्कूलक नाम लिखल गेल, जे किछु दिनक बाद मलिछोँह होइत गेल। मुदा स्कूलक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेल छल।क्यो गोटे जौँ अप्पन बच्चाक नाम लिखाबय अबैत छलाह,तँ हुनकर बच्चाकेँ एक किंवा कखनोकालकेँ दुइ वर्ग नीचाँ नामांकन लेल जयबाक गप्प शिक्षकगण करैत छलाह।अप्पन स्कूलक स्तर कनेक ऊँच होयबाक गप्प करइत छलाह।बेशी जिद्द केला पर हमरा बजा कय टेस्ट लैत छलाह, आ’ जाहि प्रश्नक उत्तर तेसर वर्गकनामांकनक अभिलाषी नहि दय पाओल छलाह, से प्रश्न हमरा सँ पुछैत छलाह, आ’ हम्मर सही उत्तर पर ओ’कुटिल मुस्कान दैत नामांकनक हेतुक आयल बालक अभिभावक दिशि मुँह करैत छलाह।मोटा-मोटी बुझु जे ओहि स्कूलक हम सभसँ उज्जवल विद्यार्थी छलहुँ-जकर प्रतियोगितोमे ,ओहि गामसँ आयल विद्यार्थीक अयलाक पहिने, क्यो थाढ़ नहि भय सकल छल।पढ़ाइक प्रति एकटा विशिष्ट लगाव छल हमरामे,जे बादमे क्रमशः उदासीनतामे बदलय लागल। से एक बेर जखन बोखारसँ बरबड़ाइत छलहुँ,तहिया परीक्षाक दिन रहैक। बड़बड़ा रहल छलहुँ जे परीक्षा ने छूटि जाय। घर पर प्रश्न आ’कॉपी आयल आ’ तखन अप्पन परीक्षा दय सकलहुँ हम।स्कूल छल छोट-छीन, मुदा ओकर सभ गतिविधिमे कॉलोनीक निवसीगण सोत्साह भाग लैत छलाह।क्रीडाक्रिया होय आकि सांस्कृतिक। क्रीड़ामे दू विद्यार्थी एक-एक पैर डोरीसँ बान्हि कय तीन टाँग बनाय दौड़ैत छलाह। दौड़ि कय मैदानक दोसर छोड़ पर राखल ब्लैक बोर्ड पर लिखल हिसाबकेँ बनाय दौड़ि कयाअपस अयबाक खेल मे शारीरिक आ’ मानसिक दुहुक परीक्षा होइत छल जाहिमे हम अग्रणी अबैत छलहुँ।

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