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विदेह वर्ष-1 मास-1 अंक-1 6.पद्य

In कथा, मैथिली, विदेह, maithili on जुलाई 20, 2008 at 7:47 पूर्वाह्न

6.पद्य

1.इच्छा-मृत्यु

हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,
सुनल छल खाइत पान-मखान,
मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,
ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
भीषणताक’ कथा नहि थोड़,
भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,
हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,
केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,
घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,
केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।
एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,
छोड़ल अ’हाँ निसास।
हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,
पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,
बुझल भीष्म हम आब ई बात,
पेलहुँ इच्छा-मृत्युएँ अहाँ निजात।

2.वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,
आइ देखल हम मीत,
डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,
दंभ भरइ छथि,हा’ इष्ट।
साबुन-तेल सभपर टैक्स,
भरइ छथि सभ वासी,
लैटरीन गंदा अछि पुछने,
नर्स बिगरि देखबइ छथि
अपोलोक पगपाती।
जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,
टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ जाऊ बूझाबय।

3.ट्रेन छल लेट

जायब दिल्ली कोना,
अस्पतालक भर्ती कक्ष,
ट्रेन अछि लेट,
डॉक्टर अछि व्यस्त।
पहुँचलहुँ दिल्ली,
दिल्ली दूर अस्त,
दिल्लीक सरकारी डॉक्टर,
आइ,काल्हि,परसू,
भेलहुँ पस्त।
युग बदलल,गणतंत्र आयल,
मुदा ट्रेन दिल्ली जायबला,
आ’ डॉक्टर दूनू फुर्र,
दिल्ली अखनहुँ अछि दूर।

4.सूर्य-नमस्कार

ॐ मित्राय नमः।।1॥
आँखि करताह ठीक मह,
हिनकर लाली’ कत्था-पान,
दाँतक त’रमे जखन चबान,
हनूमानक सूर्यक ग्रहण पड़ल मोन,
लाली देखल चढ़िकय मचान।
सूर्य-ग्रहणक वर्ण अछि,
नहि ई राहुक ग्रास,
विज्ञानक छैक सभ बात,
कहलन्हि कुलदीप काक।
पृथ्वी घुमैछ पश्चिम सँ पूर्व,आऽ,
सूर्य केँ घूमबैत अछि पूर्व सँ पश्चिम।
मुदा कहू जे गर्मीमे उत्तर-पूर्व आऽ

जाड़मे उत्तर-पश्चिम कियै छथि सूर्य।

की नहीं चलैत छथि अपन अक्ष,
ग्रहणक हेतु राहुक नहि काज,
चन्द्रमा बीचमे किरणक करै छथि ग्रास।
सभ गणना कय ठामे देल,
बूड़ि पंडित केलक अपवित्रक खेल।
खेल-खेलमे देश गेल पाछू,
आबहुतँ सभ आगू ताकू।
पुनि-पुनि करि दण्ड हम देल,
स्थिरचित्त नेत्र ई सभक लेल;
राहू-केतु सभक दिन आब गेल।
गंगामे गोदावरी तीरथमे प्रयाग,
धन्यभाग कौशल्यामायकेँ राम लेल अवतार।
स्नानक बादक मंत्रक ई भाग,
खोलत भरत प्रगति-एकताक द्वार।
शक्ति देहु हे भानु मामहः;
ॐ रवये नमः।।2॥

मेरुदण्ड-पग होयत सबल,
सूर्य-नमस्कारक परञ्च पाठ प्रबल।
सूर्यवंशीयोक अहह अभाग,
कर्ण-तर्पणक नहि करू बात।
जाति-कर्मक ज्ञानक ओर,
छल ओतय,
नहि किएक पकड़ल।
राहू-ग्रासक बातक मर्म,
अहह; ॐ सूर्याय नमः॥3॥
सात अश्व-रथक उमंग,
रथमूसल अजातशत्रूक संग,
महाशिलाकंटकक जोड़,
केलक मगध काज नहि थोड़।
जर्मनी-इटलीक एकताक प्रयास,
दुइ सहस्त्राब्दी पहिनहि काश,
रश्मिक सात-अश्वक रहस्य,
बूझल मगध ताहिये पहर।
छोड़ल भाव पकड़लहूँ अर्थ,
हा’ भरतपुत्र केलहुँ अनर्थ।
भरु शक्ति हे सूर्य अहाँ;
ॐ भानवे नमः।

श्वासक-कुंभक केलहूँ अभ्यास,
यादि पड़ल कुन्तीक अनायास।
सूर्यमेल सुफल भऽ गेल,
कवच-कुण्डल भेटल,
सेहो इन्द्रहि संगे गेल।
एकलव्य पहिनहि द्रोण केलन्हि फेल,
अर्जुन, कर्ण-विजय कय लेल?
अखनहुँ ई प्रतियोगितामे अछि भेल,
प्रतिभाक रूप छय विकृत कैल,
अखनहूँ धरि की तू ई सहबह !!
ॐ खगाय नमः॥5॥
सूर्या आश्विन गमनमे फेर,
अछि परस्पर द्वंदक देरि,
गुरु बृहस्पति ठाढ़े-ठाढ़ ,
करतथि ई सभक उद्धार।
अखनहुँ गुरु छथि गूड़,
शूल दैत जोड़ पर हमारा ऋणी,
कहैत जे बनओताह हमरा चिन्नी,
रहताह स्वयं कुसियारक गूड़,
गुरुक-गुरुत्व उष्ण-सुड्डाह हह,
ॐ पूष्णे नमः॥6॥
जकर अंकसँ निकलल विश्व
विश्वक प्राण, आऽ तकर श्वासोच्छवास,
गुरुत्वक खेलकेँ बनेलहूँ अहाँ, काछुक,
सहस्त्रनागक फनि जानि कि-की?
एकटा रहस्य आर गहिरायल,
भरत-पुत्र गेल हेरायल।
तकर ध्यान हेयास्तदवृत्तयः;
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः॥7।।
सूर्यकिरण पसरि छय गेल,
कतेक रहस्य बिला अछि गेल,
तिमिरक धुँध भेल अछि कातर,
मुदा ई की अद्भुत भेल।
रात्रि-प्रहर देखलहुँ सप्त-ऋषिगण,
दिनमे सभ-किछु स्वच्छ अछि भेल,
मुदा नहीं तरेगणक लेल ई भेल।
सत्यक परत तहियायल बनल खेल,
हाऽ विश्ववासी शब्दक ई मेल,
अहाँक दर्शनक स्तंभ किए भेल।
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।
ॐ मरीच्ये नमः॥8।।
अहँक तेजमे हे पतंग प्रभाकर,
सागराम्बरा अछि जे नहायल,
सौर ऊर्जाक नव-सिद्धांत,
नहीं की देलक कनियोटा आस,
मेघा-मास नहि अहाँक अछि जोड़,
तखन मनुक्खक बात की छोड़।
पढ़ल ग्रंथ ब्रह्मांडक बात,
तरणि सहस्त्र एकरा पार,
अंशुमाली तपनसँ पैघगर गाल।
तकर ऊष्णता की हम सहब;

ॐ आदित्याय नमः॥9॥

पिताक बात अछि आयल मोन,
बिना सावित्रीक गायत्रीक की मोल,
दुइ वस्तुक मेल कखनहुँ नीक,
कहुखन परिणाम भेल विपरीत।
कटहर-कोआ खेलाह तात,
देलन्हि ऊपर पानक पात।
पेट फूलल भेल भिसिण्ड,
परल मोन रसायन-शास्त्र।
तीव्रसंवेगानामासन्नः; ॐ सवित्रे नमः॥10॥

मोन पड़ल चोरी केर बात,
चोरक आँखिमे आकक पात,
पातक दूध पड़ला संता चोर,
सोचलक आब आँखि गेल छोड़ि।
कहलक मोने बुद-बुद्काय,
करु तेल नहि देब मोर भाय।
अर्कक दूधक संग करु तेल,
बना देत सूरदासक चेल।
गौवाँ केलन्हि बुरबकी एहि बेर,
चोरक बुनल जालक फेर।
तेल ढ़ारि पठौलन्हि चोरकेँ गाम।

मुदा रसायन भेल विपरीत,
चोरक आँखि बचि गेल हे मीत।
गौआँक काजक हम लेब नहि पक्ष,
बस सुनायल रटन्त विद्याक विपक्ष।
ध्यान धरह आ’ ई कहह;
ॐ अर्काय नमः॥11॥
पोथीक भाष्य आ’ भाष्यक भाष्य,
अलंकारक जाल-जंजाल,
विज्ञानक पाखंड,
ऋतम्भरा बुद्धि कतय छल गेल।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः; ॐ भास्कराय नमः॥12।।
करु स्वीकार हमर ई कविता,
हे दुःखमोचन हे, हे सविता।
दूर करू विकार संपूर्ण;
केलहुँ सूर्य-नमस्कार हम पूर्ण।

5.सन सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,
बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।
मुदा आइ ई की भेल बात,
दुनू छ’हरक बीच ई पानि,
झझा देत किछु कालमे लियऽ मानि।
चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,

नव विज्ञानक बात सुनाय।
बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?
भीषण भेल आर अछि ई।
हृदयमे देलक भयक अवतार,
देखल छल हम गामक बात।
बड़का क’लम आ’ फुलवारीमे,
बड़का बाहा देल छल गेल;
पानिक निकासी होइत छल खेल।
नव विज्ञानी ई की केलथि,
बाहा सभटा बन्न भऽ गेल।
फाटक लागल छहरक भीतर,
बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।
एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,
आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।
पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,
आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।
सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,
उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।
जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,
गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।
नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,
चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।
छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,
छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।
मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,
तकर रूप अछि ई विस्तार।
नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत
एहन नहि छल हम जानल,
मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,
कुसियारक किछु गाछ,
पानिक बीचमे ठाढ़।
माटिक रंगक पानि,
आ’ हरियर कचोड़ गाछ,
छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,
लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।
ठाम-ठाम क़टल छल छहर,
ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।
सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,
टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।
हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,
जतय नहि आयल छल बाढ़ि,
किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।
हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,
भूखल पेट, युवा आ’ वृद्ध।
ओ’ बूढ़ खा’ रहल छथि चूड़ा-गूड़,
बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,
कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,
ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,
गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।
मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,
आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।
सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,
शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?
पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,
विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,…
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,
बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,
सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।
बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,
मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,
पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।
हप्ता दस दिनक बादक बात,
क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;
गाममे स्त्री,वृद्ध आ’ बच्चा,
बंबईमे तँ तरकारी बेचब,
बोझो उठायब;
सभ क्यो केलक ई प्रण,
मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,
अगिलहीक बाद फूस आ’ खपड़ा,
पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।
भने भसल बाढ़िमे भीत,
बनायब कोठाक घर हे मीत।
खसल लागल ईंटा गाममे,
कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।
पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,
जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल ह’म भाय।
आब सुनु सरकारक खटरास,
आर्थिक स्थिति सुधारल ह’म मेहथमे क’ खास।
आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,
कहैत छी जे ह’म बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,
जौं रहैत अस्थिर सरकार,
तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,
विजयनहरम साम्राज्यक हाल,
पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।
धन्यभाग ई मनाऊ,
हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।
प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,
हमर समस्यासँ दूर रहू।
बाढ़ि आयल सत्तासीमे,
तबाही देखलहूँ,
मुदा कहैत छी हम,
देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,
अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,
मेला-ठेला खतम भय गेल,
हुक्कालोली भेल दिवाली,
आ’ जूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा भेल होली।
तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,
कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,
कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,
जे गामकेँ नहि छोड़ल,
मनोरंजनो करैत छी,कमाइतो छी,
खाइतो छी।
आ’ दिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।
6. महाबलीपुरममे
असीम समुद्रक कातक दृश्य,
हृदय भेल उमंगसँ पूरित।
सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग,
आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम।
नूनगर पानि जखन मुँह गेल,
भेलहुँ आश्चर्यित,
गेलहुँ हमारा हेल।
लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय,
अंग-अंग सिहरि-सिहराय।
देखल सुनल समुद्रक बात,
बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास।
सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात,
एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य,
पल्लव वंशक ई छल देन,
भारतवसी बिसरल तनि भेर।
मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर,
राजा खतम भेल बिसरल जन,
हरि-हरि।
टूटल इतिहासक तार जखन,
स्वाति भेल ह्रास अखन;
कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर,
भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित।
आब एखन अछि हम्मर ई हाल,
गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात।
छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर,
प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़।

7.स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहल्मे,
बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आ’ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आ’कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आ’कि हारि मानब,
समस्यासँ,आ’ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर,भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर-खाँटी पारिवारिक।
मुदा फेर भेटल अछि समय,

युगक बाद,
बच्चा नहि,भ’ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल,स्मृति बिसरल,
भेलहुँ एकाकी।
सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल,
फूलि गेल साँस,
हड़बड़ाक’ उठलहुँ हम,
आबि गेल हँसी,
स्वप्नानुशासन,लट्पटाकेँ खसलहुँ नहि,
धपाक;
भ’ गेलहुँ अछि पैघ।
बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आ’ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल, गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत,करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आ’ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आ’ जौं अछि क्यो,त’ ओकर

निर्माता अछि के’, ओह!
नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन,
तोड़ल कलम,
करची आ’ दवात।
के छी ई सहस्त्रबाढ़नि,
घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,
शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आ’ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आ’
तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आ’
सभक स्वामी के?
आ’ तकरो के अछि स्वामी!
भेटल स्वप्नानुशासन,
टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,
तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान ल’ग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।
जेना कोनो भय,कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छतीक धरधरी,
आ’ कि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,
आत्माक डोरी?
आ’ कि किण्वन आ’ विज्ञान
केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आ’ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत,कषाय,क्षार,
अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि
अत्रि, अंगिरा, मरीचि, संग लेने पुलऋतु,पुलस्त्य आ’ वशिष्ठ।
प्राप्त करबालेल अष्टसिद्धि
अण्मिक, महिमाक, गरिमाक, लघिमाक, प्राप्तिक, प्राकाम्यक, ईशित्व आकि वशित्व,
सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज-
पद्म,महापद्म,शंख,मकर, कच्छप, मुकुन्द,कुन्द, नील आ’ खर्व,
बनल आधार दशावतारक।
मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद,
सप्तर्षिकेँ, आ’ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आ’ वासुक व्याल,
आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश,
मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद,
मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल,
दू पगमे पृथ्वी आ’ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आ’ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आ’ बुद्धि बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा,
खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः।क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय,
जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आ’ तेरह विश्वक,
अनबा युग-कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल,
नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन,
ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि,
उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह,
फेर नरसिंह, तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओ’ ताहि द्वारेतँ नहीं एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ’,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,
राजनीति,गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय,
बिहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित,
आ’ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर,
जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,
यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर,
दर्शनकेँ धर्ममे आ’ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आ’ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी
विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर।
तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू,
मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे,भानुमतीयोमे कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख
मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आ’ कला,भूख आ’ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,ब्राह्मण आ’
शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास।
यादि पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,
भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आ’ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आ’ ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यास्जीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ
सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत,
नहीं भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,
सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिनपानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज,कि होयत बंद?
आ’कि एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह पक्का बारहमे,
आ’ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आ’ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आ’
एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ केला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।

दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरनT
खेलेलहुँ देश आ’ प्त्नीक संग।
तैं दैत छी ह’म ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि आबय ठोकर मारि पड़ाय,
सतघरिया; ती-ती –तीतार तार मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ द्विरागमनक बाद
भड़फोड़ी तक कनियाक संग।
वासर-रैन हे युधिष्ठिर-रूपी
भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा,
दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,
दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हमारा गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन,
करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक,
रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।

भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,
गंगा-तनु झामर,
नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केल’क छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम,पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन-अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हमारा जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,
दुइ सहस्त्राब्दिक खेल केलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हमारा तात,
परञ्च जे ज्ञात,
तकर त’ करए दिय’ हिसाब-किताब।

8.फ्रैक्चर

हॉस्पीटलमे आबाजाही
गामक प्रवासीक।
बुझैत छलाह जखन समाचार पिताक भर्त्तीक।
ठामहि दरभङ्गा बस-स्टैंडहिसँ,
गाम जयबाक बदला अबैथ हॉस्पीटल।

की केलहुँ शरीरकेँ,

आ’ नहिये बनेलहुँ जमीन-जत्था।
बच्चा सभक लेल नहि
राखल दृष्टि यैह व्यथा।
की सभ करैत,
कतय नहि पढ़ैत,
चण्डाल किए भेलहुँ हे कक्का।
ओतहि बैसल छलाह टुटियाँ,
पिताक समक्ष,
पहिनहिँ बुझने छलाह जे,
छल ई फ्रैक्चर।
कहल पहिने समाचार तँ पुछिअन्हु,
चाहो आब अबैत होयत,
पैर हाथ धोआय अनिहन्हु।
कहल पैर टुटि गेल की कका,
पिता किछु बजितथि,
बजलाह टुटियाँ,
होइछ टूटब आ’ फ्रैक्चर होयब एक्के,
नहि छलन्हि बूझल से,
कहल नहि चिंता करैत जाउ,
भगवान रक्ष रखलन्हि,
फ्रैक्चरे भेलन्हि,
पैर टूटल नहि बाउ।

9.मरकरी डिलाइट
सोझाँसँ त्रिपुण्ड-चानन,
देने आयल रहथि उदना।

देखल गामक प्रवासी जहिना,
कहल रौ छँ तोँ भाइ उदना।
संग कटलहुँ बाँस,
जड़िमे बान्ही गमछा हम
आवाजकेँ दबेबा लेल,
आ’ टेंगारीसँ दू छहमे काटय छलह तोँ,
पुरनाहाक डबरामे लीढ़क नीचा नुका कय,
करी संपन्न ई काज बिन विघ्न।

हम पश्चात् भेलहुँ प्रवासी,
मरकरी-डिलाइट दयकेँ तोँ,
भेलह गामक वासी।
पंडितक अकाल छल नहि,
छलह कोनो कंपीटीशन,
भेलहुँ अहाँ औ’ भजार,
गामक नव उदयनाचार्य।

10.चोरबजारक जुत्ता
ओह नहि मोन पारू,
बुझल अपनाकेँ बुधियार,
आनल ई जुत्ता ततयसँ,
गेलहुँ जहिया चोर बजार।
सैंत कय राखल एकरा,
थाल कीच नहि लागय देल।
पैर दैत छलहुँ पानिमे आ’
जुत्ताकेँ हाथमे लेल।
दुइये दिन तँ पहिरल एकरा,
सीढ़ीसँ छलहुँ उतरैत,
सोलसँ उखड़ि सोझँहि निकलल,
शरीर आत्मासँ रहित जे भेल।
सीबि-साबि कय ची पहिरि रहल,
पाइ वसूली तैयो हएत।
नहि पूछू जौँ पूछय छथि क्यो,
मोन कनैछ भोकारि-पारक लेल।

11.की-की गछलियन्हि
ट्रेनमे भेटलाह घटक,
यौ फलना बाबू।
मुँह देखाबक जोग नहि छोड़ल,
आगाँ की-की बाजू।
शांत बैसू भेल की।
अहाँक अछैत होइत की,
एहि गरीबक पुत्रीक,
कन्यादान संभव की भाइजी।
औ’ अहाँ गछि लेलियन्हि,
भेल कोजगरा द्विरागमनो,
भेटलन्हि किछुओटा नहि वरागतकेँ,
कोनोटा इज्जत नहि राखलन्हि ओ’।
यौ अहूँ हद्द कएलहुँ।
यादि नहि की-की गछलियन्हि।
ओहि सुरमे छलुहुँ बेसुध,
हँ मे हँ टा मिलेलियन्हि।
कहैत गेलाह ओ’ एक पर एक,
नहि कहि कय बुरबकी करितहुँ।
लक्ष्मीपात्र छथि से लक्ष्मी देलियन्हि,
आबोतँ जान बकसू।
मॉटरसायकिल लय की करतथि,
देहो-दशा ताहि लेले चाही,
चेनक लेल बेचैन किय छथि,
निचेन रहथु, बाकी अक्चि बात ई।
ताकि रहल छी पुत्रक हेतु,
तकैत रही अँहीक आस, औ’
छलहुँ कतय भाँसल,
अहाँ यौ घटकराज।
कोनो मोटगर असामी,
आनि करू उद्धार,
तीनू बेटीक कर्जसँ उबारथि जे,
चाही एहन गुणानुरागी।

12. बेचैन नहि निचैन रहू
दौरि-दौरि कय पोस्ट-ऑफिस,
भेलहुँ जखन अपस्याँत किएकतँ,
मनीऑर्डरक छल आस।
पुछल एखन धरि अछि नहि आयल,
मनीऑर्डर यौ प्रभास।
चिट्ठीयेक संग पठेने छलथि पाइ,
चिठी तँ समयेसँ पहुँचल,
टाका किए नहि बाउ।
पोस्ट बाबू जे कए नेने रहथि,
हुनकर पाइसँ कोनो उद्यम,
कहल चिट्ठी अबैत अछि,
बेटा अछि अहाँक छट्ठु,
पाइ पठबैत समयसँ तँ पहुँचैत,
मुदा पठबैत अछि छुच्छे संदेश।

बेचैन किए छी,
की अप्पन उद्यम करब हम अहाँक टाकासँ,
से बुझैत छी।

दोसर गामक पोस्टबाबू,
फेकैत अछि चिट्ठी कमलाक धारमे,
हम छी बँटैत तेँ कहैत छी जे भेटल अछि संदेश।

13.होइ ची जे हुम लुक्खी नहि छी
देखि हुनका(गारिपढ़ुआकेँ),
देबय लागलथि गारि,
लुखीक नाम लय कय,
सात पुरखाकेँ देलन्हि ताड़ि।
ओ’ अनठेने ठाढ़ बूझल,
दैत अछि ई लुक्खीकेँ गारि।
कहल अन्तमे(गारि पढ़निहार),
हौ की छह होइत ई,
मूँहतँ छह केहन अप्पन,
लुक्खी नहि अपनाकेँ बुझैत छी।

14.क-ख सँ दर्शन
ट्युशन पढ़बय जाइत छँह,
इज्जततँ करैत छौक?
जलखै तँ नहिये परञ्च,
चाहो-पानिक हेतु पुछैत छौह।
ट्युशन कय खाइत छी,
की कहलहुँ हे से नहि बाजू।
द्रोणक नव अवतार छी हम,
से छियन्हि कहि देने,
जाइत देरी करह जलखैक व्यवस्था,
करू नहितँ छी नहि हम द्रोण,
औठाँक नहि कोनो लालसा थोड़।
मात्र पढ़ेबन्हि छओ महिना,
दर्शन नहि होयतन्हि क-ख केर,
नहि से नहि बाजू,
खुआ पिया कय केने अछि ढेर।

15.गाय
लाठी मारबामे कोनो देरी नहि,
बछी भेला पर शोको थोड़ नहि,
परन्तु छी पूजनीया अहाँ,
निबंध लिखैत छी अहाँ पर क्षमा।

16.बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि
यौ बुझलहुँ बुच्चुनक गप्प,
नहि करैत छी खिधांश,
सुनू हम्मर साँच।

समयक छल नहि हमरो अभाव,
कहल हँ सुनाउ किछु भाषण-भाख ।

देखि पुछलियैक बुच्चुनकेँ हौ,
ई की उजरा नाँकसँ सुँघने जाइत छह,
कहलक काका खोखीँ होइत छल,
खोखीँक दवाइ अछि ई।
औ बाबू बाप मरि गेलैक,
मोशकिल रहय नौँसि भेटब,
मुदा देखू बेटा सोँटैत अछि विक्स वेपोरब।

17.पाइ
देखू पाइ नहि लिय’ अहाँ,
बेटा विवाहमे कारण जे,
पुतोहु करत उछन्नड़,
पाइ बाली आयत जौँ।
पूछल अहाँ सभ जे छलियैक लेने,
बेटा विवाहमे पाइ जे,
कहलन्हि अहूमे गप्प अछि दूटा।
पहिल जे पाइ दबबैत अछि लोककेँ।
मुदा दोसर, जे दबा दैत छियैक,
हमरासभ पाइकेँ ।
जे कहलहुँ गुनू तकरे,
हमरा पर नहि आउ दाइ गे।

18.असत्य
हम कक्कर काज नहि कएलहुँ,
बेर पर मुदा काज क्यो आयल?
असत्य नहि कहियो छी बाजल,
सत्यक आस नहि छोड़लहुँ आ’
असत्यक बाट सेहो नहि ताकल।
यौ अहाँ, एहनो क्यो बजैत अछि,
असत्य नहि छी कहियो बाजल,
एहिसँ पैघ कोनो असत्य अछि।
क्यो दुःखी कहलकतँ काज केलहुँ,
अपने जा कय तँ नहि पुछलहुँ,
ओक्कर काज भय जाइत छैक,
तँ उपकरि कय पुछैत छी,
जौँ काजमे भाँगठ होइत छैकतँ,
निपत्ता भय जाइत छी,
बेर पर एहने काज अहाँ अबैत छी।

हम आलांकारिक प्रयोग केलहुँ तेँ,
टाँग पकरैत जाइत छी।

19.मसोमात
मलेमासक मेला-ठेला,
ट्रेनक धक्का मुक्की।
हँसैत-हँसैत पेट छी पकड़ल,
हे यै कनियाकाकी।
कहैइत छलीह एकटा मसोमात,
भीड़मे ओहि गाड़ीमे,
एतेक दुःखतँ ओहू दिन नहि भेल,
भेलहुँ राँड़जाहि दिन,
हौ सवारी।

20. श्राद्ध नहि मरा जाय
एक मृत्यु फेर दोसर मृत्यु,
नेनाक पिताक-काकाक।
कक्काक लोकवेद छलन्हि दबंगर,
से चिन्तित छ्ल छोटका भाइ।
श्राद्धावधिमे दोसर मृत्यु भेने,
एक्के श्राद्धसँ होइछ दोसराक श्राद्ध,
एकक श्राद्ध जायत मराय,
छल चिंतित दूनू भाय।
कमजोरहाक संग पण्डितो देत नहि,
शास्त्र धरि किछुओ कहय,
मामागाम खबरि दियौक,
पिताक श्राद्धने मरा जाय।

21.बानर राजा
सिँह राजसँ भेल पीड़ित वन-जन,
इलेक्शन करायल मिलि सभ क्यो,
संख्या वानरक हरिण मिला कय,
छल बेशी से भेल ओ’ राजा।
सिंहराजकेँ तामस अयलन्हि,
खा’गेल हरिणराजक बच्चा एकदिन।

दाबीसँ हरिण गेल सम्मुख,
वानर राजा कहलन्हि,
बदमाशी अछि सिंहक,
कहि निकलि गेल जंगल बिच।
गाछक डारि पकड़ि छिप्पी धरि,
खूब मचेलक धूम।
तामसे विख भय सिंह राज,
खएलक बच्चा सभटा मृगराजक,
जखन सुनाओल जाय वनराजकेँ,
फेर वैह धूम फेर मचाओल।
मृगराज कहल हे नृप,
एहि हरकंपसँ होयत,
जीवित हमर संतान।
कहल नृप कहू भाय,
हम्मर मेहनतिमे अछि की कमजोरी,
करल प्रयास हम भरिसक मुदा,
बुझू हमरो मजबूरी।

22.समुद्री
संस्कृतक पाठ नहि पढ़ल,
कोन पाठ अहाँ पढ़ने छी,
पंडित कहि बजबैत अछि सभ क्यो,
त्रिपुण्ड धारण कएने छी!
रहथि हमर पुरखा पंडित,
छोड़ू हमरा इतिहास देखू।
मिथिलाक गौरव याज्ञवलक्य,
कपिल कणादक देश छी ई,
जैमिनीक,गौतमक अछैतहुँ,
पुछै छी पण्डित केहन छी।
सामुद्रिक विद्या ज्योतिषिक जनय छी,
नहि सुनल फेर बहस किए छी केने।
फेर छी हँसी करैत अहाँ यौ,
भविष्यक छी हम हाल लेने।

23.मैट्रिक प्लक

हौ सभकेँ सुनलहुँ केने बी.ए.,एम.ए.,
मुदा बुझल नहि छल डिग्री,
दोसरो होइछ आनो-आनो।
आइ एक पकठोस बटुक,
अछि आयल दलान पर पूछल,
कोन अंग्रेजिया डिग्री छी लेने,
मैट्रिक प्लक एहने किछु बाजल।
हौ काका अछि की ओ’ गेल,
ओकर गेलाक बाद हम बाजब,
कारण अछि भेल ओ’ फेल।

24.क्रिकेट-फील्डिंग

हम बाबा करू की पहिने,
बॉलिंग आ’ कि बैटिंग।
बॉलिंग कय हम जायब थाकि,
बैटिंग करि खायब जे मारि।
पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह,
से सुनह हमर ई बात बौआ,
बटिंग बॉलिंग छोड़ि-छाड़ि,
पहिने करह ग’ फील्डिंग हथौआ।

25.गाम
तीस वर्ष नौकरी कइयो कय,
नहि बनल एकोटा मित्र।
आस-पड़ोसी चिन्हैतो नहि अछि,
ऑफिसक पूछू नहि गति।
गाम छोड़ि शहर छी आयल,
हमर मुदा अछि मोन।
सात जनम घूरि नहि जायब,
गाम छोड़ि नगरक कोनो कोन।

26. लोली
एहि शब्द पर भेल धमगिज्जर,
लोल हम्मर अछि नहि बढ़ल,
एतेक सुन्दर ठोढ़केँ छी,
अहाँ लोली कहि रहल।
हँसल हम नहि स्मृतिकेँ,
छोड़ि छी सकलहुँ अहाँ,
फैशन-लिपिस्टिक युगोमे,
लोलीकेँ खराब बुझलहुँ अहाँ।

27.जाति
ऑफिसमे छल काज बाँझल,
किरानी पर एकगोट तमसायल।
कोन जातिक छी अहाँ,
धैर्य आब नहि बाँचल,
दशो लोककेँ कैक दिनसँ छी झुट्ठो घुमाओल।

छाती ठोकिकय जातिक नाम छल ओ’ बाजल,
दसोलोकक दिशि निन्गहारि ताकल,
ताहिमेसँ एक सजाति उठल बाजल,
घोल-आसमर्द्दक बीच कहलक नहि बाजू,
जातिक नाम धय कय,ई यादि राखू।
काज अछि हमरो बाँझल,
मुदा जातिक अछि बात जौँ,
अछि कलेजावला जाति ई,
से काज कतबो लेट हो।

28.काँकड़ु
काँकड़ुगणकेँ छोड़ल एकटा ड्रममे,
नहि बन्न कएलक ऊपरसँ,
पुछल हम छी निःशंक अपने।
यौ मिथिलाक ई अछि काँकड़ु सभ,
एक दोसराक टाँग खींचत,
बक्शा बन्द कर्बाक करू नहि चिन्ता,
खुजलो सभटा सभ ठामे रहत।

29.कैप्टन
वॉलीवॉलमे खेलाइत काल,
पप्पू भाइक होइछ हुरदंग,
खेलायब हम फॉरवार्डसँ,
नहि नीक खेलैत छे नीक,
आगू खेलाय देखैब हम।
सभ सोचि विचार कय,
बनाओल कैप्टन पप्पू भायकेँ,
टीमक हारि देखि कय जिद्द,
खेलाय पाछुएसँ।
फारवॉर्ड बनू अहीं सभ नहि
तँ मैच हारू आगुएसँ।

30.कोठिया पछबाइ टोल

बूढ़ छलाह मरैक मान,
पुत्र पुछल अछि कोनो इच्छा,
जेना मधुर खयबाक मोन,
नीक कपड़ा पहिरबाक मोन,
फल-फूल खयबाक मोन।
कोठाक घर बनयबाक इच्छा,
पूर्ण भय पायत किछु सालक बादे,
कहू कोनो छोट-मोट इच्छा,
पूर करब हम ठामे।

हौ’ कहितो लाजे होइत अछि,
पछिबारि टोल कोठियाक रस्ता,
दुरिगरो रहला उत्तर ओकरे धेलहुँ,
जाइत दुर्गास्थान कारण,
टोल छल ओ’ अडवांस्ड।
मोनमे लेने ई इच्छा जाइत छी,
जे ओहि टोलमे होइत विवाह।
कहैत तावत हालत बिगड़ि गेलन्हि,
ओ’ बूढ़ स्वर्गवासी भेलाह।

31. पुत्रप्राप्ति
लुधियानाक मन्दिर पर रहैत छी,
पूजा पाठ करैत छी।
कहैत छी अहाँ ठकि कय हम खाइत छी,
गाममे तँ एक साँझ भुखले रहैत जाइत छी।
दस गोटेकेँ पुत्र प्रप्तिक आशीर्वाद देल,
पाँचटाकेँ फलीभूत भेल।
पुत्री जकरा भेलैक से हमरा बिसरि गेल,
मुदा पुत्रबला कएलक हमर प्रचार,
मिथिलाबाबाकेँ ठक कहैत छह,
गामक हमर ओ’ दियादी डाह।

32. दि’न

विवाह दिन तकेबाक बात,
युवक बाजल पंडितजी अहूँ,
नहि बुझलहुँ अमेरिकाक प्रगति,
ओतय के दि’न तकबैत अछि कहू।
अहाँ अधखिज्जू विद्वान सुनू।
हमर तकलाहा दिनमे विवाह कय,
झगड़ा-झाँटि करितहु बुझु,
जिनगी भरि पड़ै अछि निमाहय।
ओतय बिनु दिनुक विवाह,
भोरसँ साँझेमे भय जाइछ समाप्त।

33. दूध

महीस लागल छल लागय,
बहिन दाइक ठाम।
पहुँचलहुँ आस लेने,
ठाँऊ भेल बैसलहुँ ओहि गाम।
दूध छल जाइत औँटल,
मुदा बहिन दाइकेँ गप्पमे
होस नहि रहल।
भोजन समाप्ते प्राय छल,
दूध राखल औँटाइते रहल।
कहल हम हे बहिन दाइ,
अबैत रही रस्तामे देखल,
साँप एक बड़-पैघ,
एतयसँ ओहि लोहिया धरि,
दूध जतय औँटाइछ।
ओह भैया बिसरलहुँ हम,
दूध रहल औँटाइत,
मोनमे बात ततेक छल घुमरल,
होश कहाँ छल आइ।

34. बिकौआ
बड़ पैघ भोज उपनयनक,
पछबारि पारक छथि नव-धनिक।
बी.के.झा नाम नहि सुनल,
ओतय ठाढ़ ओ’ धनिक।
आरौ बिकौआ छँ तूहीँ,
दूटा पाइ भेल ओ’ भाइ,
कलकत्ता नगरीक प्रतापे।
नहि तँ मरितहुँ बिकौए बनि,
झा,बी.के. नाम भेल।

35.गद्दरिक भात
गत्र- गत्र अछि पाँजर सन,
हड्डी निकलल बाहर भेल।
भात धानक नहि भेटयतँ,
गद्दरियोक किए नहि देल।
औ’ बबू गहूमक नहि पूछू,
दाम बेशी भेल। गेल ओ’
जमाना बड़का,
बात-गप्प नहि खेलत खेल।

36.एकटा आर कोपर
गप्प पर गप्प, प्रकाण्डताक विद्वताक।
हम्मर पुरखा ई,
हाथीक चर्चा,
सिक्कड़ि-जंजीर टा जकर बचल।
आँगनमे लालटेन नहि वरन् डिबिया टिमटिमाइत,
लालटेन गाममे समृद्धिक प्रतीक।
फेर दलान पर गप्पक छोड़,
एकटा कोपर दियौक आउर।

37. महीस पर वी.आइ.पी.

छलहुँ हम सभ जाइत,
आर मारि लोकसभ पैरे-पैरे।
दुर्गास्थानमे छल कोनो मेला,
देखि हमरा सभकेँ बाट देल।
मारि लोक छल ओतय छलहुँ,
महीस पर हम चारिटा वी.आइ.पी.ये,
ओकर सभक बात छल लौकिक जौँ,
हमरा लोकनिक आध्यात्मिक तेँ,
मूल-गोत्रक प्रभावे!

38.गप्प-सरक्का

नहि गेलथि घूमय बूरि,
बुझैत अछि बड्ड छैक काज।
आइ-काल्हितँ अहाँक चलती अछि,
हमरा सभतँ करैत छी बेकाजक काज।

39.फलनाक बेटा
भोज देलन्हि रेंजरक बाप।
आह कमेने अछि तँ
फलनाक बेटा।
भोज समाप्ति पर लय,
पान सुपारी लय देखल,
रेंजरकेँ जे लोक।
अओ कहू कोन बोनकेँ,
साफ कएल एहि भोजक लेल।

40.ट्रांसफर

नॉर्म्सक हिसाबे ट्रांसफर,
कएल हम अहाँक,
कहल छल एकर कोन,
छल महाशय जरूरति।
कएल सेवा हम अहाँक,
राति-दिन भोर धरि।
अप्पन घरक काज छोड़ल,
अहाँक काजकेँ आगू राखल।
ताहिमे नहि हम लगायल,
नॉर्म्स केर नहि गप्प छल आयल।
ट्रांसफरमे ई कतयसँ,
आबि गेल श्रीमान।
तखनहि रोकल हुनक,
ट्रांसफर, औफिसर तत्काल।

41.अटेंडेंस
लेट किए अएलहुँ अहाँ,
अटेंडेंस लगाऊ।
लाल बहादुर अयलाह जखन,
देखल छल क्रॉस लगायल।
नहि देल ध्यान साइन कएल,
पूछल अफसर लेट छी आयल।
ऊपरसँ कय हस्ताक्षर,
क्रॉस नुकयने नहि अछि मेटायल।
लाल बहादुर कहल सुनू ई,
के करत निर्णय तखन,
हम कएल हस्ताक्षर पहिने,
क्रॉस लगाओल अहाँ तखन।

42.शो-फटक्का
की यौ बाबू शो-फटक्का,
बड्ड देने छी आइ।
पहिने कोनो दिन आबि बुझायब,
नहि जायब पड़ताय।
दहो-दिशा दस दिन काज,
देत चालि संग चालिस साल।
बड़ा देने छी शो-फतक्का,
करू पहिने किछु काज।

43.भारमे माटि

काबिल ठाकुर कहल जोनकेँ,
भारमे माटि उघि लाऊ।
दुहु दिशि भार रहततँ,
बोझ दुनू दिशि जायत।
कम थाकब अहाँ आ’,
माटि सेहो बेशी आओत।
दियाद कलामी ठाकुर देखि ई,

सोचल ओ’ नोकसानक भाँज।
भरिया तोरा जान मारतह,
एके बोनिमे दोबर काज!
पटकि भार भरिया पड़ायल,
काबिल ठाकुर रहलाह मसोँसि।
लंघी मारि पैर खींचि कय,
अप्पन कोन भल भेल हे भाइ।

44.मजूरी नहि माँगह
भरि दिन खटि हम गेलहुँ,
माँगय अपन मजूरी।
कहलन्हि जौँ मजूरी मँगबह,
मारि देबह हम छूरी।
कहल नहि बरू दिय मजूरी,
मारू नहि परञ्च ई छूरी।
जियब जखन हम करब काज,
कय आनो ठाम जी-हजूरी।

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