VIDEHA

विदेह वर्ष-1मास-1अंक-2 (15.01.2008)5.पद्य 45 सँ आगाँ

In कथा, मैथिली, विदेह, maithili, videha on जुलाई 21, 2008 at 2:54 अपराह्न

5.पद्य 45 सँ आगाँ
45.दोषी

दोषी छह तोँ।
नहि छी मालिक।
देलक दू सटक्का।
हम छी दोषी बाजल,
तखन बता संगीक पता।
साँझ धरि पड़ल मारि,
परञ्च नहि बता सकल ओ’,
नाम सङ्गीक।
कारण छल नहि ओ’दोषी,
नाम बतायत तखन कथीक।

46.कंजूस
तीमन माँगल भनसियासँ,
सूँघा रहल छल गमक।
कहियोतँ अयबह हमरा लग,
देबह तखन उत्तर।
शहर भगेलग पाइ कमेलहुँ,
माँगल पाइ किछु दैह,
बदला पाइक झनक सुनाबह,
गमकसँ नहि अछि मोन भरैत।

47.लंदनक खिस्सा
लन्दनक साउथ हॉलमे शहीद भिंडरा,
लेस्टरमे शहीद सतवंत-बेअंत,
नहि मानब हम गुरुकुलकेँ,
होयत खिधांश सुनू तखन।
लेस्टरमे सभ अपने लोक,
नहि भेटैछ अंग्रेज एकोटा।
भेटने हमही मँगैत जाइत छी,
वीसा,पासपोर्ट सेहो सभटा।

48.रिपेयर
ऑफिसक तालाक रिपेयर केलक,
बिल मोटगर जखन देलक कारीगर,

हम पूछल एहि ड्रॉवरक तँ,
ताला नहि मह्ग छल,
रिपेयरसँ सस्तमे तँ,
नव ताला आयत गय।
औ’ बाबू तखन कमीशन,
अहीं जाय आऊ द’।

49.अंध विश्वास

सुमेर पर्वतक चारू-कात,
निशान देखाय कहलक गाइड,
सर्पक चेन्ह ई जे,
भेल समुद्र-मंथन एहिसँ,
सर्प-रस्सा अछि चेन्ह छोड़ि गेल,
चारू-कात तहीसँ।

संगी हमर हँसल कहलक,
कोनो पहाड़ पर जाऊ,
पहाड़ ऊपर चढ़य लेल,
गोलाकार रस्ता बनबाऊ।
नहितँ सोझे ऊपर चढ़ब,
सोझे खसय नीचाँ लय,
हओ गाइड तोहूँ विश्वासक,
छह अंध-काण्ड सुनेबा लय।

50.गुड-वेरी गुड
भारतीय वाङमय केर,
व्याख्या एहि तरहेँ भेल,
जौँ किछु नीक भेल तँ नीक,
आ’ जौँ उलटा तँ सेहो ठीक।
प्रारब्धक भेल मेल,
आ’ लिखलहाक भेटबाक बात,
नीक भेल तँ गुड आ’
वेरी गुड जौँ भेल अधलाह।

51. दूध
प्रथम जनवरी देखल एक,
भोरे-भोर दूधक लेल,
लागि लाइन जखन आयल बेर,
खुशी-प्रफुल्लित पाओल फेर।
मुदा रस्ताक बीचहि खसल दूध,
ओह भेल अपशकुन बहुत।
सुनि खौँजाइ कहल नहि से,
पता नहि शकुने होअय जे।
कहल हँ-हँ शकुने थीक,
माँ पृथ्वीकेँ लागल अर्घ्य,
प्रथमे पायल प्रथमक भोग,
हरतीह सभटा दुःख आ’ रोग।

52.अभ्यास

पूछल गुरूसँ मृदंगक गति,
भय रहल अछि मंद,
गुरु कहलन्हि से करू तखन,
अभ्यास तखन प्रतिदिन।
प्रतिदिनतँ करितहि छी,
हम एकर सदिखन अभ्यास,
तहुखन हमर घटय अछि,
गति आ’ टूटय लय औ तात।
करू भोर साँझ अहाँ,
अभ्यास बिना करि नागा।
भोर करब अभ्यास जखन,
साँझमे टूटत नहि लय,
साँझमे करब पुनराभ्यास,
होयत भोरमे हाथ गतिमय।
गुरुसँ पूछल कोना जड़,
एहि पाथरसँ हम बनायब,
घोटक गतिमय बनबयमे,
हम माह जखन लगाओल।
कहल गुरू तखन देखू,
एहि जड़-पाथरमे घोटक,
जे बेशी लागय एहिमे,

तोड़ि हटाऊ अहाँ फटाफट।
कहल शिष्य ई काज,
अछि पहिलुक्का काजसँ हल्लुक।
कहल गुरू काज वैह अछि,
सोचबाक अछि ई फेर।
पहिने बेशी काज पड़ल छल,
आब थोड़ अछि भेल।

53.टी.टी.

मजिस्ट्रेट चेकिङ भेल।
वीर सभ भागल बाधे-बाधे,
खेहारलक पुलिस जखन।
चप्पल छोड़ल ओतय बेसुध तन।
मुदा बुरबक लाल एकटा,
चप्पल लेलक उठाय,
दोसर चप्पल छोड़ि पड़ायल,
आयल गाम हँफाइत।
सभ हँसि पुछलक हौ बाबू,
एकटा चट्टी लय कय,
कोन पैरमे पहिरब एकरा,
दोसर खाली होयत।
ई बुरबकहा बुरबके रहल।
हँसि भेड़ सभ भेल।
दोसर दिन बाध सभ गेल ओतय,
देखल सबहक दुनू चट्टी भेल निपत्ता,
बुरबकहाक एक चट्टिये छल बाँचल,
नहि लेलक सोचि करब की एकटा।
मुँह लटकओने सभ घूरल आ’
नाम बदललक बुरबकहाक,
टी.टी. बाबूकेँ ठकलक ई,
नाम होयत सैह एकर आब।

54.आँखि
दादा पहुँचलाह डॉक्टर लग,
पुछल होइछ की बाबा,
मर्र डॉक्टर अहाँ छी,
बताऊ भेल की हमरा।
औँठासँ कय शुरू,
बताऊ पहुँचा धरिक समचार,
कहल पहिने करू ठीक,
आँखिकेँ ओ’ सरकार।
कोनो चश्मा नहि फिट पड़ल,
दूरबीनक शीशा जखन लगाओल,
कहल हँ अछि आब कोनहुना,
भाखय अक्षर चराचर।
सड़ही आम देखि बजलाह,
बूढ़ भेलहुँ हम अहाँ बुझय छी बच्चा,
बैलूनसँ खेलायब हम से वयस नहि अछि अच्छा।
यौ दादा ई सड़ही छी,
हम पड़ि गेल छी सोँचहि,
सड़ही आम अहाँ की देखब,
चश्माक नंबरे गलत पड़ल अछि।

55.हर आ’ बरद

मोन गेल भोथियायल,
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।

56.नरक निवारण चतुर्दशी
भुखले भरि दिन दिन बिति गेल,
नरक निवारण लय हम रहलहुँ,
साँझमे मंदिर विदा सभ भेल।
दुर्गापूजा लगमे आयल,
सिंगरहार केर चलती भेल।
माटि काटि गोबरसँ नीपि कय,
भोरे-भोर फूल लोढ़ि लेल।
सरस्वती पूजाक समय बैर,
अशोकक-गाछ-पात गोलीक लेल,
बोने-बोन महुआक फरक लेल,
घूमि-घामि अयलहुँ भेल-भेर।
अण्डीक बीया तेलहानीमे दय कय,
तरुआ ओकर तेलक खएल,
कुण्डली मिरचाइक फरमे अंतर,
बुझैत-बुझैत दिन कत’ गेल।
सुग्गोकेँ ई खोआय रामायण,
सुनला कत्तेक दिन भय गेल।

57.नौकरी

नौकरी नहि करी तखन,
भेटय तनखा तन खायत,
वेतन भेटत बिना तनहि,
आब कते बुझायब।
गाम घूरि जौँ जायब,
खायब की कमलाक बालू,
औ गुलाब काका पहिने,
हमरा ईएह बुझाऊ।
भरि दिनका ठेही अछि जाइत,
जखन जाइत छी सूइत।
भोर उठला संता अखनहुँ,
समस्यासँ अछि नहि छूटि।

58.तीने टा अछि ऋतु
पुछल स्कूल किएक नहि अयलहुँ।
मास्टर साहेब होइत छल बर्खा,
जाइतहुँ हम भीगि।
बर्खामे जायब अहाँ भीगि,
गर्मीमे लागत लू-गर्मी,
आ’ जाड़क शीतलहरीमे,
हाड़-हाड़ होइत जायब यौ,
बौआ होइत अछि ई तीनियेटा ऋतु,
सालमे पढ़ाई-पढय कहिया जायब यौ।

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