VIDEHA

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 4.कथा 2.भारत रत्न

In कथा, कविता, कोष, पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, व्यंग्य, संस्कृत, maithili, music, videha on जुलाई 22, 2008 at 6:51 अपराह्न

4.कथा 2.भारत रत्न

3. भारत रत्न
अपन मित्रकेँ हॉस्टलक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। मुदा हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला ओऽ भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।

भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे हमर मित्र अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह, जे हुनका एहि बजारसँ सस्त आऽ नीक चीज किनबाक लूरि नहि छन्हि। हुनकर ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे हुनकर आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते निपत्ता भय गेल। मित्र महानुभावक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि आऽ बड्ड मुश्किलसँ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएल जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह। “अहाँ कहूतँ ठीक जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”। झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।
हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।
हमर मित्रक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल। विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने स्टुडेंटक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर मुताबिक मूरे-मूर छल, अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।
आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।
“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखीतँ पैरके सरा देल आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन सीढ़ीसँ उतरैत रही, पूरा सोल करेज जेकाँ, बाहर आँखिक सोझाँ आबि गेल। मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ उपर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायकेँ बुद्धिमे गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभतँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे।
फेर बजैत रहल्लाह- “ आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम एहि घटनाक मोनतँ अहाँ नहि पारू यौ भजार”।

आब हमरातँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल आऽ प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ अगिला रविकेँ चोर बजार आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

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