VIDEHA

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 5.पद्य (आँगा)

In कविता, पद्य, मिथिला, मैथिल, मैथिली, maithil, maithili, maithils on जुलाई 23, 2008 at 8:24 अपराह्न

5.पद्य (आँगा)

नाम – ज्योति झा चौधरी ;जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८;जन्म स्थान -बेल्हवार मधुबनी ;शिक्षा – स्वामी विवेकानन्द मिडल स्कूल़,टिस्को साकची गर्ल्स हार्ई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी़ आइ.सी.डबल्यू.ए.( कॉस्ट एकाउण्टेन्सी) ;निवास स्थान – लन्दन,यू.के.;पिता -श्री शुभंकर झा,ज़मशेदपुर;माता -श्रीमती सुधा झा़ शिवीपट्टी ;”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी़ नानी़ भाई बहिन सबकेँ पत्र लिखबामे केने छी ।बचपन सँ मैथिली सँ लगाव रहल अछि|-ज्योति

हिमपात
बर्फ ओढ़ने वातावरण !
मानू आकाश टूटि क बिखरि गेल ,
अपने आप के छिरियाकऽ
सबके एक रंग में रंगि गेल ॥

थरथराबैत सरदी स भयभीत
सब जीव अपन जगह धेलक;
प्रकृति के इहो अवरोध मुदा,
मनुष्य के नहि बॉंधि सकल ॥

भॉंति प्रकारक साधन जोगारलक
विकट परिस्थिति पर विजय लेल;
अपन सर्वश्रेष्ठ बुद्धिबल स
मनुष्य अंतत: सफल भेल॥

गजेन्द्र ठाकुर

90.नव-घरारी

साँप काटल नन्दिनीकेँ,
नव घरारी लेलक खून।
टोलक घरारी छोड़ू जुनि।
ई विशाल जनसंख्या एतय,
छल बनल एकटा काल,
ई नव-घरारी लेलक प्राण,
टोलक घरारी साबिकक डीह,
परञ्च अछि छोट आब की।
खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज,
नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।

91. बुद्ध
हृदय लग अछि जेबी,
से जखन रहय खाली,
मोन कोना रहत प्रसन्न।
बुद्ध सेहो कहि गेल छलाह ई।
मुम्बइमे सूप मँगलहुँ,
पुछलक अहाँमे जैनी कैकटा छी।
देत लहसुन की नहि रहय तात्पर्य,
आपद्काले रहि गेल अछि आइ काल्हि सदिखन।
सेल टैक्समे करैत छी भरि दिन काज,
तैँ प्रोननशियेशन भेल अछि मराठी,
एक्साइज तँ अछि केन्द्रीय सरकार,
संपर्क बाहरीसँ बेशी।
छत्तीसगढ़क छत्तीस घंटाक यात्रा,
उत्तर-मध्य क्षेत्रक स्तूपकेँ देखल,
बंगाल घूमल पंजाब घूमल,
बंगाली कहलन्हि सुनि जे जौँ,
बंगाली जायत संग करत कानूनी बात\
सरदारजी कहलन्हि रोड पर,
रेड लाइट रहलो क्रॉस करू,
सोझाँसँ अबैत छल एकटा सरदार,
कहल करत आब ई झगड़ा।
सक्सेना कहलक एक मैथिलकेँ,
मैथिल अछि मैथिलक परम शत्रु।
हम कहल सक्सेनाकेँ,हे
जुनि करू हुनका दूरि।
काज सभटा झट कराऊ जुनि भड़काऊ।
बुद्धक भूमिसँ घुरि आयल छथि,
दिल्लीक सड़क पर एहि बेर।
पाटलिपुत्र रहय राजधानी,
हम छलहुँ ततय पुन फेर,
दिल्ली बनल राजधानी भारतक,
कोन जुलुम हम कएल।
कणाद कपिल गौतम जेमिनी देतथि
जौँ नहि काज,
कहलन्हि ई ठीके हृदय लग,
जेबी देने अछि सीबि।
हृदय कोना प्रसन्न रहत जखन,
पेट रहत गय खाली।
जेबीमे पाइ नहि रहत,
उपासे करब हम भाइ।
बुद्ध सेहो कहि गेलाह ई।

92. रिक्त पाँचम वर्गसँ सातम वर्गमे,
तड़पि गेल छलहुँ हम।
छट्ठा वर्गक अनुभव अछि रिक्त।
बा’ आ’ बाबा जन्मक पहिनहि,
प्राप्त कएलन्हि मृत्यु,
वात्स्ल्यक अनुभव भेल रिक्त।
माँ एके बहिनि छलि तेँ,
मौसी-मौसाक अनुभवो नहि,
ईहो रहल रिक्त।
क्यो कहैत अछि जे छठामे पढ़ैत छी,
बा’ आ’ बाबाक संग घुमैत छी,
मौसी-मौसाक काज उद्यममे जाइत छी,
तँ हम कहैत छी, जे ई कोन संबंध
, कोन वर्ग अछि,
छोड़ि सकैत छी।
उत्तर भेटैछ,
अहाँ नहि बुझब।
मुदा नव संबंध,
नब नगर,
नव भाषा,
नवीन पीढ़ीकेँ, कोना बुझायब,
ओ’ कोना बुझत।
ओ’ तँ नहि बूझि सकत काका-काकी,
नहि बूझत दीया-बाती,
खटैत दौड़ैत आ’ नहि घुरि आओत,
ककरा बुझायब आ’ के बूझत।

93. चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आ’,
खसैत काल नरकक अनुभूति।

94.प्रवासी
संगहि काटल घास,
महीस संगे चड़ेलहुँ,
पुछैत छी गहूम ई,
पाकत कहिया?
दू दिन दिल्ली गेलहुँ,
सभटा बिसरेलहुँ,
ईहो बिसरि गेलहुँ,
जे धान कटाइछ कहिया।

95. वेदपाठी
वेद वाक्य परम सत्य,
संस्कृत साहित्य अति उत्तम।
करैत छी अहाँ वक्त्तव्य,
मुदा अहाँ की अहाँक पुरखा,
मरि गेलाह बिन सुनने,वेद वाक्य,
बिन पढ़ने संस्कृत।
यौ अहाँ नहि पढ़लहुँ अहाँ,
अनका अनधिकार बनेबाक चेष्टा,
कएलहुँ अहाँ।
छी वेदक अप्रेमी,
नहि अछि क्षमता,
वेदक पक्ष की विपक्षमे बजबाक ।
वेद वाक्य सत्य एकरा बनेने छी,
अहाँ फकड़ा।

96. बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत,
जे नहि बिसरब आइ,
मुदा गप्प पर गप्प चलल,
कृत्रिमता गेल ढ़हाइत।
फेर काजक बेर मोन,
नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन,
कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप,
आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।

97. तक्षशिला
तक्षशिला अछि पाकिस्तानमे,
इतिहासक उनटबैत पन्ना,
चक्र घूमल टूटल हमर देश,
अराड़ि ठाढ़ कएलक दियाद।
मुदा सोचैत छी।
जे भने दियाद अछि समीप,
आ’ कएने अछि अराड़ि,
ताहि बहन्ने छी हम सजग,
करैत रहैत छी तैयारी।
1962 धरि हिमालयकेँ बुझल बेढ़,
जेना 1498 धरि छल समुद्र,
द्वार खोलैत छल खैबर दर्रा।
प्ड़ोसीयो पर आक्रमण होइत छल,
दूर-दूरसँ अबैत छल अत्याचारी,
भने दियाद अछि कएने अराड़ि,
जे करैत रहैत छी तैयारी।

98. चोरि
गेलहुँ गाम आ’ एम्हर,
आयल फोन, समाचार चोरिक।
छुट्टी होयबला छल समाप्त,
मुदा चोरक गणना छल ठीक।
आबयसँ एक्के दिन पहिने,
लगेलन्हि घात।
तोड़ि कय केबाड़,
उधेसल घर-बार।
नहि पाबि कोनोटा चीज,
घुरल माथ पीटि।
भोरमे पड़ोसी कएलन्हि डायल सय,
पुलिस आयल हारि थाकि कय।
पड़ोसीसँ किनबाय दू टा अतिरिक्त ताल,
(पुलिस महराज अपन घरक हेतु),
चाभी लेलन्हि अपन काबिजमे।
चोर हड़बड़ीमे छल चलि गेल,
मुदा एहि महाशयक हाथ चाभी गेल,
आ’ शो-केशक चानीक नर्त्तकी गुम भेल।
चोरकेँ छल डर गेटक दरबानक,
से छलाह ओ’ गहनाक आ’ नकदीक ताकक।
मुदा पुलिस महाराज दय राब दौब दरबानहुँकेँ,
निकललाह चोरि कय बरजोड़ीसँ।

99. चोरकेँ सिखाबह
यौ काका छी अहाँ खाटकेँ,
धोकड़ी किएक बनओने,
खोलि नेवाड़ फेर घोरिकेँ,
बनाऊ खाट फेर नवीने।
कहलन्हि काका तखन जे हौ,
देखह आयत रातिमे जे चोर,
पटकत लाठी खाट पर आ’
चोट नहि लागत मोर।
परञ्च काका जौँ ओ’ चलबय,
लाठी नीचाँ बाटे,
वाह बेटा कहि दिहह चोरकेँ,
ई गप तोहीँ जा कय।

100. काल्हि
भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आ’ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकाइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी चुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।

101. मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल,
पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत,
फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग,
छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़,
अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी,
दिनमे बौआइत रही,
कलममे बाँझी तकैत,
दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल,
बुरबक होयबाक संज्ञा,
ईहो छी नहि बुझैत,
मोजर होइत तँ खैतहुँ आम,
अगिला साल।
बाँझीमे नहि कोनो आस,
घूरमे होइछ मात्र काज।
फेर छे पाड़ैत, अंडीक बीया बीछब,
पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल,
ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद,
राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद,
’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद।
महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च,
भ’ जायत एक किलो, पाइक माश्चर्ज।
कंजूसी नहि, जबरदस्ती ठूसी।
मोन पाड़ैत छी धानक खेत,
झिल्ली कचौड़ी, लोढ़ैत
काटल धानक झट्ठा,
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी।
‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी,
बंशीसँ मारैत माछ,
खुरचनसँ सोहैत आम काँच।
चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद,
बडका दलान, दाउन,
बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद,
बिदेसरक रवि दिनक बूझल,
फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल।
चूड़ा लय जाइत रही गामसँ,
दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद,
पुरनाहाक धातरीमक गाछ।
साहर दातमनिक सोझ नीक छड़,
जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल, गुल्ली डंटा,
गोलीक खेल, अखराहाक झमेल।
हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती,
फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय।
छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल,
जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष,
छोड़ल गाम यौ मित्र।
मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत,
बैसि बैसि बैसि।

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