VIDEHA

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 2.उपन्यास सहस्रबाढ़नि

In उपन्यास, गद्य, विदेह, सहस्रबाढ़नि, videha on जुलाई 23, 2008 at 8:35 अपराह्न

2.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि
दोसर साल फेर वैह मीटिंग, दुनू गामक स्कूलक मध्य, मुदा एहि बेर दोसर गाम बला टीम रस्ता बदलि लेलक। मारि बझब गाममे एकटा पर्वक जेकाँ छल। दुर्गास्थानमे चॉकलेटक बुइयाम फूटब, आ’ कोनो कटघरा किंवा टाटक खुट्टा उखाड़ि कय मारि-पीट शुरू भय जाइत छल। आ’ बादक जे गप्प होइत छल से मनोरंजक। एक बेर एकटा अधवयसू एक गोट नव-नौतारकेँ दू-चारि चमेटा मारि देलन्हि। बादक घटनाक हेतु हम कान पथने रही तँ हमर पितियौत ओहि गौआँकेँ पुछलखिन्ह जे वैह बात रहय ने। सभ क्यो एकमत रहथि जे वैह बात रहय। एहि बेर हम हारि कय पुछलियन्हि, जे वैह कोन बातअछि जे सभकेँ बूझल अछि, मुदा हमरा नहि बूझल अछि। ओ’ कहलन्हि जे एहि युवा पर बचियाक घटकैतीक हेतु ओ’ अधवयसू गेल रहथि, मुदा कथा नहि सुतरलन्हि। ओहि युवकक विवाह दोसर ठाम भय गेलन्हि, से तकरे कैन ल’ कय कोनो फुसियाहीक लाथ लय आइ ओकरा कुटलन्हि अछि। हम पुछलियन्हि जे जौँ विवाह भ’ जाइत तँ ससुर जमायक संबंध रहैत। तखन एहि फुसियाही गप प मारि बजरैत। सभ कहथि जे अहाँ तँ तेसरे गप पर चलि गेलहुँ। रातिमे नाटक देखैत अकाशमे डंडी-तराजू देखब, खाली डंडी छैक तँ तराजू कियैक कहैत छियैक? फेर ओहि नाटकोमे अनगौँआ सँ मारि बझेबाक हमर संगीक एकटा चालि। भेल ई जे नाटक केखय काल ओ’ एकटा अनगौँआकेँ खौँझा रहल छलाह। मारि अंट-शंट बकैत छलाह। आ’ ओ’ किछु बाजय तँ कहैत छलाह जे अखने नरेण भैयाकेँ बजायब। ताहि पर ओ’ कहलन्हि जे जाओ अहाँक नरेण भैयाक डर हमरा नहि अछि। आब आगू सुनू। हमर मित्र अनायासहि जोरसँ कानय लगलाह, दहो-बहो नोर निकलि गेलन्हि। भोकारि पाड़ैत नरेण लग पहुँचलाह जे एकटा अनगौँआ मारलक अछि, आ’ कहैत अछि जे के नरेण ओकर हमरा कोनो डर नहि अछि आरो अण्ट-शण्ट। आब नरेण भैया पहुँचलाह जे बता के छी। जखने टॉर्च ओहि व्यक्ति पर देलन्हि, बजलाह, भजार यौ। अहाँ छी। जरूर एही छौड़ाक गल्ती छी। अनका विष्यमे कहैत तँ पतिया जयतहुँ। मुदा अहाँक विषयमे। आ’ ईहो नहि जे तमसयलाह अछि, वरन् ई जे मारलन्हि अछि। आ’ नेप की चुआ रहल छल जेना कतेक मारि पड़ल होय। हमरा सँ पुछलन्हि जे भार किछु एकरा कहबो कएलन्हि, तँ हम कहलियन्हि जे नहि। एहि पर हमर मित्रक नोर जतयसँ आयल छलन्हि, ततहि चलि गेलन्हि। फज्झति मूरि झुका कय सुनलन्हि आ’ नरेण भाइक गेला पर सभकेँ कहलन्हि, जे ई नरेण काकाक संगी छथिन्ह, क्यो हिनका किछु कहथिन्ह तँ बेजाय भ’ जायत। आ अस्थिरसँ कहलथि जे बचि गेल आइ ई। (अनुवर्तते)

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