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विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 10. पंजी प्रबंध

In पञ्जी, मैथिल, मैथिली, maithil, maithili, maithils on जुलाई 23, 2008 at 8:12 अपराह्न

10. पंजी प्रबंध
श्री विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया

पुनश्च सप्तसिन्धु सँ प्राच्याभिमुखी यायावर ऋषि लोकनि गंगा ओ’ हिमालयक मध्यक सुभूमि मिथिलामे जाहि आर्यसंस्कृतिक बीज-वपन कएल, तकर मूल छल धर्म, धर्मक मूल थिक जाति, ई जाति होयत एहि जन्मक विशुद्धिसँ, जन्मसँ विशुद्ध संतान होइत अछि तखन जखन विवाहक अधिकार जाहि कन्यासँ हो तकरहिसँ विवाह कएला उत्तर प्राप्त संतान आर्य जातिक विवाहक नियम सभ सर्वप्रथम निबंधित भेल विभिन्न स्मृति सभमे। महान स्मृतिकार मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक अनुसार ओहि कन्यासँ विवाहक अधिकार हो जे- 1. समान गोत्रक नहि होथि, 2. समान प्रवरक नहि होथि, 3. माइक सपिण्ड नहि होथि,
4. पिताक सपिण्ड नहि होथि,
5. पिताम अथवा मातामहक संतान नहि होथि, 6. कठमामक संतान नहि होथि।
एहि वैवाहिक अधिकारक निष्पादनार्थ कमसँ कम मनु ओ’ याज्ञवल्क्यक समयसँ त निश्चये लोक अपन ‘ यावतो परिचय’ स्वयं अपनहि रखैत आबि रहल छल, मुदा पश्चातक युगमे ई प्रवृत्ति समाप्तप्राय भ’ गेल। विवाहक हेतु वर ओ’ कन्याक सम्पूर्ण परिचय तँ आवश्यके छल, जे आनहु धार्मिक संस्कारक हेतु सपिण्डत्त्वक विचार विवाहक अतिरिक्त श्राद्ध ओ’ अशौच प्रभृतिअहुमे आवश्यक होइत छल, एहि कारणेँ प्रागैतिहासिक कालहिसँ लोक अपन सांगोपांग परिचय रखैत छल। ओ’ ओकरहि अनुसार अपन धार्मिक क्रियाक निष्पादन करैत रहए। ई नियम सभ हमरा लोकनिक प्राचीनतम धर्मग्रंथ सभमे उपलब्ध अछि। स्मृति सभमे कहल गेल अछि, जे जनिकासँ विवाहक अधिकार नहि हो से स्वजना भेलीह। स्वजनासँ विवाहोपरांत प्राप्त संतान चाण्डाल बूझल जाइत छल। ओ’ आर्यत्वक मर्यादासँ बहिष्कृत मानल जाइत छल।
(अनुवर्तते)

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