VIDEHA

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 3. महाकाव्यमहाभारत (आँगा)

In कथा, कविता, पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, व्यंग्य, संस्कृत, maithili, music, samskrit, videha on जुलाई 23, 2008 at 4:15 पूर्वाह्न

3. महाकाव्य
महाभारत (आँगा) ——
यश छल सुशासनसँ आ’ छल
जन-जीवन अति संपन्न।
छल अहिना दिन बीति रहल
अयलाह नारद एकदिन जखन,
स्वागत भेलन्हि खूब हुनकर
ओहो रहथि आनंदित तखन।
देखल शील-गुण पांडवक
मुदा कहल द्रौपदीसँ सुनू बात ई,
छी पत्नी पांडवक मुदा निवासक
नियम किए नहि बनेने छी,
नारदक बात समीचीन छल
से नियम बनेलथि पाँचो गोटे,
एक-एक मास रहथु सभ लग
द्रौपदी नियम नहि भंग हो।
बारह वर्ष पर्यंत छोड़य पड़त
गृह त्रिटि भेल जौँ,
पालन नियमक होमय लागल
किछु काल धरि ई,
कनैत अएलाह विप्र
एक अर्जुन पुछलन्हि बात की।
चोर छल चोरेने गौकेँ हाक्रोस
विप्र छल करि रहल,
शस्त्र छल गृहमे द्रौपदी संग
युधिष्ठिर जे रहि रहल।
विप्रक शापसँ नीक सोचि
मूरी झुकेने गेल अर्जुन,
शस्त्र आनि छोड़ायल गौकेँ
घुरि आयल गृह तखन।
माँगल आज्ञा युधिष्ठिरसँ दिय’
गृहत्यागक आज्ञा,
नियम भंगक कएल हम अपराध,
की बाजल अहाँ।
अर्जुन ई अपराध लागत
जखन पैघक द्वारा होयत,
छोट भाय कखनो अछि
आबि सकैत बड़ भाय घर।

मुदा निकलि गेलाह अर्जुन
आज्ञा लय माता भायसँ,
भ्रमण देश-कोसक करैत
पहुँचल हरिद्वार गंग तट,
स्नान करैत कल नजरि
छल नागरा कान्याक जौँ,
कोना बचि सकैत पहुँचि
गेलाह पातालक निकट।
विवाह प्रार्थना स्वीकारल
अर्जुन ई छल वरदान भेटल,
जलमे रस्ता बनत चलि
सकब अहाँ व्यवधान बिन।

मणिपुर पहुँचि जतय चित्रांगदा
राजकन्या छलि रूपवती,
विवाहक प्रस्ताव अर्जुनक
स्वीकारल मानल राजा सशर्त,
दौहित्र होयत हमर वंशज
भेल ई विवाह तखन जा कय।

चित्रांगदाक पुत्र भेल बभ्रुवाहन
नाम राखल गेल जकर ई,
परम प्रतापी पराक्रमी योद्धा
बनल बालक पाछू सुनय छी।
फेर ओतयसँ निकलि अर्जुन
पहुँचल प्रभास तीर्थ द्वारका निकट,
शस्त्र-प्रदर्शनक आयोजन केलन्हि
कृष्ण निकट परवत रैवतक।
प्रेम देखि सुभद्रासँ कृष्ण छलाह
सुझओने नव उपाय ई,
अपहरण करब जीतब युद्ध
यादवसँ बनत तखने बात ई।

बनलि सारथी वीर सुभद्रा
संग्राम छल बजरल जखन,
बुझा-सुझा मेल छल करओने
कृष्ण जा कय तखन।
विवाह भेल तदंतर अर्जुन
संग सुभद्रा गएलाह पुष्कर,
पुरल जखन ई वनवास कृष्णक संग पहुँचल इंद्रप्रस्थ।
देखि नववधू प्रसन्न कुंती
आनंद नहि समटा रहल,
द्रौपदीसँ पाँच पुत्र, आ’
अभिमन्यु सुभद्रासँ भेल छल।
बीति छल रहल दिन जखन
अएलाह जीर्ण शरीर अग्नि,
रोगक निदान छल खांडव
वन रहय छल ओ’सर्प तक्षक।

इंद्रक अछि मित्र ओ’ जखन
करैत छी जरेबाक हम सूरसार,
नहि जरबय दैत छथि इंद्र,
करू कृपा अहाँ हे इंद्र अवतार ।
छी प्रस्तुत मुदा अस्त्र अछि
नहि हमरा लग ओतेक,
इंद्र युद्धक हेतु चाही योग्य
शस्त्रक मात्रा जरूरी जतेक।
देल गांडीव धनुष तूणीर
अक्षय वरुणक रथ नंदिघोष,
चलल डाहबाक हेतु अग्नि
पेलाक बाद अर्जुनक तोष।

इंद्र मेघकेँ पठओलन्हि कृष्ण
कएल सचेत जे, वायव्यक
प्रयोग कएल अर्जुन मेघ बिलायल से।

तक्षकक मृत्योपरान्त इज़ंद्र भेलाह
प्रकट ओतय,
माँगल अर्जुन दिव्यास्त्र हु
नकासँ मौका देखि कय।

जाऊ शिवक उपासना करू
दय सकैत छथि वरदान ओ’,
छल मय आयल अग्निक
कोपसँ बचि लग अर्जुनक ओ’।
सेवा करबाक बात छल मोनमे
लेने कृतज्ञ छल ओ’, बनाऊ
सभा भवन अनुपम नहि
बनल जे कतहु हो’।

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