VIDEHA

विदेह दिनांक 15 फरबरी, 2008 (वर्ष: 1 मास: 2 अंक: 4 ) 4.कथा इमानदारीक ग्लैमर

In कथा, कविता, कोष, पञ्जी, पद्य, मैथिली, रचना, विदेह, संस्कृत, maithili, music, samskrit, videha on जुलाई 23, 2008 at 4:19 पूर्वाह्न

4.कथा इमानदारीक ग्लैमर
घर अबैत काल मोन कोना दनि क’ रहल छल। सभ क्यो एक दोसरा सँ किछु असंभव घटित होयबाक गप क’ रहल छलाह। हम दुनू भाय सातम कक्षामे पढ़ैत छी, संगहि-संग। मुदा आइ पैघ भायक पेटमे दर्द छल से ओ’ टिफीनक बाद छुट्टी ल’ घर चलि गेल छलाह। स्कूलमे सभकेँ हँसैत देखैत छी, तँ अपन घरक स्थिति यादि पड़ि जाइत अछि।ईर्ष्य़ा सेहो होइत अछि आन बच्चाक भग्य पर। फेर मोनमे ईहो होइत अछि, जे हमरे सभ जेकाँ परिस्थिति होयत एकरो सभक। मुदा झुट्ठे प्रसन्नताक नाटक करैत जाइत अछि।घरमे माय बापक कलहक बीच डरायल सन रहैत छी। लगैत रहैत अछि जे ई सभ परिस्थिति कहियो खत्म नहि होयत। नहितँ दोसरसँ गप्प कय सकैत छी, नहिये ककरो अपन मोनक गप्पे कहि सकैत छी। बेर-बखत कहियो अपन सहायताक हेतु सेहो सोर नहि क’ सकैत छी। माय ठीके घरघुसका, मुँहदुब्बर आदि विशेषणसँ विभूषित करैत छलीह। साँझमे घुमनाइ आकि दुर्गापूजाक मेला गेनाइ, ई सभ बात हमरा सभक जीवनसँ दूर छल। एक बेर भूकम्प जेकाँ आयल छल, सभ क्यो ग्रील तोड़ि कय बहरायल, मुदा हम खाट पर पड़ले रहि गेलहुँ। किछुतँ अकर्मण्यतावश आ’ किछु ई सोचि कय , जे की होयत घर टूटि देह पर खसत तँ समस्यासँ मुक्तियोतँ भेटत। एक बेर बाबूजीकेँ कटहरक कोआ खेलाक बाद पेट फूलि गेलन्हि, दू बजे रातिमे। ईहो नहि फुराइत छल, जे बगलमे श्रवनजीक बाबूकेँ बजा लियन्हि, जे कोनो डॉक्टरकेँ बजा देताह। फुरायलतँ छल, मुदा कहियो ग्प नहि छल, तँ आइ काज पड़ला पर कहियन्हि, से हियाऊ नहि भेल। माय केबाड़ पीटि कय पड़ोसीकेँ उठेलन्हि, कनैत खिजैत रहलीह। पड़ोसी डॉक्टरकेँ बजओलक, तखन जा’ कय बाबूजीक जान बाँचल। माय श्राप सेहो दैत रहल आ’ ईहो कहैत रहल जे पाँच वर्षक बेटा रहैत छैक तँ सभ भरोस दैत छैक, जे कनैत किएक छी, अहाँकेँ तँ पाँच वर्षक बेटा अछि। आ’ ई सभ …..जाह, अपने भोगबह हमतँ दुनियासँ चलि जायब। बहिन कॉलेजमे पढ़ैत छलीह। कॉलेजक रस्ता पैरे जाय पड़ैत छल। आ’ कॉलेजसँ आँगा स्कूल छल। बहिन कहलन्हि, जे अहूँ सभ संगे हमरा सभक संगे चलू। एक दिन हमरा सभ गेलो रही। मुदा गप बिनु केने हम दुनू भाँय आगू-आगू झटकैत चल गेलहुँ। मोनमे ईहो भव छल, जे छौड़ा सभ चीन्हि नहि जाय जे हमरा सभक ई बहिन छथि। आब ई सोचैत छी जे चिन्हिये जाइत तँ की होइत। अपन व्यक्तित्त्वक विकासक कमी छल ई? बादमे पैघ भेल छी तँ माँ-बापकेँ उकटैत छियन्हि, जे घरघुस्सू आ’ मुँहचुरूक संज्ञा जे देलहुँ अहाँ सभ, कहियो ई सोचलहुँ, जे कोनो पड़ोसीसँ गप्प नहि करबाक, संगी-साथी नहि बनयबाक, घूमब-फिरब नहि करबाक उपदेशक पाछू, जे अहाँ सभ उपदेश देलहुँ, ओकर पाँछा इच्छा समाजक बुराइसँ दूर करबाक उद्द्य्श्य छल, परंतु यैह तँ बनेलक मुँहचुरू आ’ घरघुस्सू हमरा सभकेँ। रातिमे माय बापक झगड़ाक सीन सपनामे देखैत छलहुँ आ’ डरा कय उठि जाइत छलहुँ। पैघ भाय बहिनसँ हमरा खूब झगड़ा होइत छल, मुदा एक बेर माय-बापक झगड़ाक पछति, खूब कानल छलहुँ, खूब बाजल छलहुँ। किछु दिनसँ भाय-बहिनसँ झगड़ाक बाद टोका-टोकी बन्द छल। सभ बेर वैह लोकनि आगाँ भ’ टोकैत छलाह। मुदा एहि बेर हम कानैत-कानैत बहिनकेँ टोकलियैक आ’ फेर कहियो बहिनसँ झगड़ा नहि भेल। भाय पिठिया छल, संगे पढ़ैत छल ताहि हेतु ओकरासँ तँ झगड़ा होइते रहल, मुदा कम-सम। एहि सभ गपक हेतु माँ पिताजीकेँ जिम्मेदार ठहराबथि, जे सभसँ पड़ोसी-संबंधी, जान-पहचानसँ गप करबासँ ओ’ कहियो नहि रोकलन्हि आ’ सभटा दोष पिताक छलन्हि। एक बेर ग्लोब किनबाक जिद्दक बाद कएक बेर समय देल गेल, जे आइ आयत काल्हि आयत। हम पढ़ब छोड़ि देलहुँ। आ’ तखन जा’ कय ग्लोब आयल। बहिन अखनो कहैत छथि, जे ग्लोब अनबाक जिद्दक पूरा भेलाक बाद हमर पढ़ाइक लय टूटि गेल। वर्गमे स्थान प्रथमसँ नीचाँ आबि गेल आ’ पिताजी एकर कारण तंत्र-मंत्रमे ताकय लगलाह। एकटा तांत्रिकसँ भेँट भ’ गेलन्हि। कतेक दिन हमरा सभ गाममे रहैत जाइत गेलहुँ। कॉलोनीमे एकटा एकाउन्टेंट बाबू छलाह। ओ’ बाबूजीकेँ कहलखिन्ह, जे अहाँ तँ घूस नहि लैत छी, मुदा अहाँक पत्नी अहाँक नाम पर घूस लैत छथि। सभ ट्रांसफरक बाद बिहार सरकारक नौकरीमे दरमाहा बंद भ’ जाइत छैक।आ’ ताहि द्वारे सभ ट्रांसफरक बाद बाबूजी हमरा सभकेँ गाम पठा दैत छलाह। एहि क्रममे हमरा सभ गाममे छलहुँ। पिताजीक चिट्ठी माँक नामसँ गाम आयल छल। हमही पढ़ने रही। बाबूजी मायकेँ लिखने छलाह, जे जौँ अहाँ पाइ लेने छी तँ लौटा दियौक। हम विजीलेंसकेँ लिखने छी, छापा पड़त तखन पाइ निकलत तँ बड्ड बदनामी होयत। एहि सभ परिस्थितिमे स्कूलमे हम घरक परिस्थितिकेँ बिसरि जयबाक प्रयास करय लगलहुँ। झुट्ठेकँ हँसय लगलहुँ। ई आदति पकड़ने छी। घरक बड़ाई करय लगलहुँ। लोक सभ बाबूजीक ईमानदारीक तँ चर्चा करिते रहय। हम सभ घरक कलहक विषय घरक बाहर अनबासँ परहेज करय लगलहुँ, लोक बुझत तँ हँसत। आ’ बुझू जे ईमानदारीक ग्लैमरकेँ जिबैत जाइत गेलहुँ। सोचबाक आ’ गुनधुनीक आदति एहन पड़ल, जे सुतैत सपनामे आ’ जगैत लिखबा-पढ़बा काल धरि ई पाँचाँ नहि छोड़लक। दसमामे छमाही परीक्षा किछु दिन पहिने देने छी। कॉमर्सक परीक्षामे एकटा प्रश्न बनेलहुँ। मुदा ओ’ गलत बनि गेल, फेर दोसर अ’ तेसर बेर प्रयास केलहुँ। सभटा प्रश्नक उत्तर अबैत छल मुदा पहिलो प्रश्नक उत्तर पूरा नहि भ’ रहल छल।कॉपीकेँ अंगाक नीचाँमे नुका लेलहुँ। आ’ पानि पीबाक बहन्ने जे बहरेलहुँ, तँ घर पहुँचि गेलहुँ। पढ़ैत-पढ़ैत सोचय लगैत छी। एक्के पन्ना उनटेने घंटा बीति जाइत छल। चिड़ियाखाना गेल रही एक बेर। किछु गोटे,हमर सभक संबंधी लोकनि, ओतय हमरा सभकेँ भेटि गेलाह। बड्ड हाइ-फाइ सभ। ओनतँ कहलन्हि किछु नहि मुदा हुनकर सभक बगेबानी देखि कय, हमरामे हीन भावना आयल।चुप्पे भीड़मे निकलि घरक लेल निकलि गेलहुँ। जेबीमे पाइ नहि रहय से पैरे निकलि गेलहुँ। ओतय चिड़ियाखानामे सभ डराइत रहल जे कतय हरा गेल। सभकेँ कहलहुँ जे सत्ते भोथला गेल रही। सत्त बात ककरो नहि बतेलहुँ। सभ लोक जे भेटय यैह कहय जे अहा, फलनाक बेटा छथि। बेचारे भगवाने छथि। हिनकर पिताक पे-स्लिप बिना पाइयेक बना दियन्हु। पिताजीसँ नहितँ सहकर्मी खुश छलन्हि नहिये ठीकेदार सभ। सहकर्मी एहि ल’ कय जे नहि स्वयं कमाइत अछि, नहिये दोसराकेँ कमाय दैत अछि। पैघभायक गिनती बच्चामे बदमाशमे होइत छल। एक बेर ट्रांसफरक बाद जखन हमरा सभ गाम गेलहुँ, तँ पैघ भाय जे सभक फुलवाड़ीसँ नीक-नीक गाछ उखाड़ि कय अपना घरक आगाँ लगा’ लैत छल, से आब एकहि सालमे दब्बू,सभसँ पाचू बैसनिहार विद्यार्थीक रूपमे गिनतीमे आबि गेल।एहि बेर ट्रांसफरक बादक गाममे गामक निवास किछु बेशी नमगर भ’ गेल छल। फेर मुख्यमंत्री पदक दावेदार एकटा नेताजी जखन गाममे वोट मँगबाक लेल अयलाह, तखन काका हुनकासँ भेँट कएलन्हि, आ’ कहलखिन्ह जे हमर भायकेँ वर्क्ससँ नन-वर्क्स मे ट्रांसफर कए दियौक, बच्चा सभ पोसा जयतैक। नेताजी कहलन्हि जे जौँ हम जीति गेलहुँ तँ ई काज तँ हम जरूर करब। वर्क्समे जयबाक पैरवी तँ बहुत आयल मुदा नन-वर्क्समे जयबाक हेतु ई पहिले पैरवी छी। संयोग एहन भेल जे ओ’ नेताजी जीति गेलाह आ’ मुख्यमंत्री सेहो बनि गेलाह। ओ’ शपथ ग्रहण केलाक बाद ई काज धरि केलन्हि, जे पिताजीक ट्रांसफर कय देलखिन्ह। आ’ हमरा सभ पुनः शहर आबि गेल रही। गाममे रहीतँ एक गोटे जे हमर भायक संगी छलाह, केर गप यादि पड़ि जाइत अछि जे ओ’ ककरो अनका प्रसंगमे कहने छलाह। हुनकर अनुसार हुनकर मायक स्वभाव तीव्र छलन्हि, आ’ ओ’ खेनाइ खाइते काल झगड़ा करय लगैत छलीह। मुदा ओहि दिन ककरो अनका ओ’ आर तीव्र स्वभावक देखने छलाह। खराब आर्थिक स्थितिक उपरांत होयबला कलहक परिणाम हमरो सभ देखि रहल छलहुँ। दू टा घटना आइयो हमरा विचलित कए दैत अछि। एकटातँ इनकम टैक्स कटौतीक मास- मार्च मास। ई घटना तँ सभ साले होइत छल, मुदा कटौती बढ़ैत-बढ़ैत एहि साल धरि आबि कय पूरा मार्च मासक दरमाहा काटि लेलक। माँ कहैत छलीह जे आब भोजन कोना चलय जयतौह। आब भीख माँगय जइहँ ग’ सभ। मुदा बाबूजी एकटा गामक भातिजकेँ पोस्टकार्ड पठेलन्हि आ’ ओ’ आठ सय टाका आनि कय दय गेलखिन्ह, तखन जा’ कय असुरक्षाक भावना खत्म भेल छल। भीख मँगैत अखनो जौँ ककरो देखैत छी तँ मोन कलपय लगैत अछि। दोसर घटना अछि जखन हमरा घरक आँगा एकटा एक्सीडेंट भेल छल आ’ ओकरा बाद हमर भाइ खेनाइ छोड़ि देने छलाह आ’ कानि-कानि कय आँखि लाल कए लेने छलाह। पिताजी जखन बुझबय लगलाह तँ ओ’ जवाब देलन्हि, अहाँकेँ जौँ किछु भय जायत, तखन हमरा सभक की होयत। पिताजी इंश्योरेंस बेनीफिट, जी.पी.एफ., ग्रेच्युटी आदिक हिसाब लगाय भायकेँ बुझेलन्हि जे 99000 रुपय्यातँ तुरत भेटत आ’ फेर महिने-महिने पेंशनो भेटत। लगभग एक घंटा तक बाबूजी भायकेँ बुझबैत रहलाह।
हमरा सभक ओहिठाम एक गोट पीसा आयल छलाह। आइयो घर्मे क्यो अबैत छथि, तँ हम सुरक्षित अनुभव करैत छी। बाबूजीक हुनकर सार भेलखिन्ह से एहि ओहदासँ हँसी सेहो चलि रहल छल। ओ’ कहलन्हि जे हमरे पिताजी जेकाँ ईमानदार एकटा बी.डी.ओ. साहेब झंझारपुरमे छलाह। पिताजी हुनकर मलाह छलखिन्ह, कष्ट काटि अफसर भेलाह। मुदा हमरे सभक घर जेँका हुनको घरमे खाटे टा छलन्हि। पीसा कहलखिन्ह जे कथी ले अफसर भेलहुँ, गाममे रहितहुँ आ’ मचान पर बैसि माछ भात खएतहुँ। माछक कारबारमे फायदा होइत।
बहिनक विवाह बाद घरमे कखनो काल बहनोइ अबैत छलाह। जमायक अबिते देरी माँक झगड़ा पिताजी सँ शुरू भय जाइत छल, किएकतँ घर इंतजाम तँ किछुओ रहिते नहि छल।
ट्रांसफरक बाद पिताजीक अभियान घूसखोरकेँ सजा देबय पर चलल। आ’ जखन सरकारी तंत्र परसँ विश्वास खतम भए गेलन्हि, तखन एकटा तांत्रिकक फेरमे पड़ि गेलाह। घरमे माता-पिताक बीच कलह बढ़ि गेल। एक दिन पिताजीसँ हमरो बहसा-बहसी भए गेल आ’ तीनू भाय बहिन गरा लागि कय कानय लगलहुँ। तकरा बादसँ भाय-बहिन सभसँ झगड़ा होयब समाप्त भय गेल।
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अनेर गुनधुन करैत रही, घरक लगमे पहुँचलहुँ तँ भीड़ देखि मोन हदसि गेल, जे बाबूजीकेँ तँ किछु नहि भ’ गेलन्हि। घरमे पहुँचलहुँ तँ माँ-बहिन सँ पूछय लगलहुँ, जे की भेल? सभ बोल भरोस देबय लगलथि तँ आरो तामस उठय लागल। जोरसँ कानि कय बाजय लगलहुँ जे बाबूजी मरि गेलाह की? कतय छन्हि हुनकर मृत शरीर। ताहि पर बहिन कहलन्हि जे नहि, हुनका किछु नहि भेलन्हि। अहाँक संगी जे मकान मालिकक बेटा अछि, से ओ’ ओकर चोट भाय , ओकर पिता आ’ रिक्शाबला, चारू रिक्शा पर जाइत छल। बेचारा रिक्शा बला विवाह क’ कय कनियाँकेँ अननहिये छल। एकटा विशाल ट्रक रिक्शाकेँ धक्का मारि देलकैक। ठामहि मरि जाय गेलाह। हमर कानब खतम भय गेल। ई जे आफत आयल छैक से आइ ककरो अनका घर, ओना ओ’ जे मृत भेल छल हमर संग डेढ़ सालसँ स्कूल जा रहल छल प्रतिदिन प्रातः। सभ दिन प्रातः सीढ़ी पर कॉलबेल बजबैत छलहुँ आ’ ओ’ सीढ़ीसँ उतरैत छल, आ’ संगे हम सभ स्कूल जाइत छलहुँ। मोन पड़ल जे काल्हि सेहो सभ दिन जेकाँ हम कॉलबेल बजेने छलहुँ,तँ ओकर बहिन जे चश्मा लगबैत छलि, आ’ झनकाहि छलीह, से ऊपरसँ तमसाकेँ कहलक जे कतेक जोरसँ आ’ देरी तक कॉलबेल बजबैत छी, आ’ सेहो जे बेर-बेर किएक बजबैत छी, आबि रहल अछि। काल्हितँ ओ’ आयल मुदा हम तखनहि कहि देलियैक जे काल्हिसँ हम कॉलबेल नहि बजायब, अहाँकेँ हमरा संगे जयबाक होय तँ नीच उतरि कय आयब आ’ संग चलब। ओ’ नहि आयल तँ हम किएक कॉलबेल बजबितहुँ। डेढ़ सालमे पहिल बेर भेल छल जे हम कॉलबेल नहि बजेने छलहुँ आ’ ओ’ डेढ़ सालमे पहिल बेर स्कूल नागा कएने छल। आब हमरा मोनमे हेबय लागल जे कतहु ओ’ बाजि तँ नहि देने होयत जे हम काल्हिसँ कॉलबेल नहि बजायब। मुदा किंसाइत ओकर कोनो आनो कार्यक्रम होयतैक। किएकतँ चोट भाय आ’ पिताक संग रिक्शासँ कतहु जा’ रहल छल। अस्तु हम चिंतित छलहुँ मुदा दुःखी नहि, मुदा मोनक गप कियो बुझय नहि तेँ मुँह लटकेने ठाढ़ रही।हमतँ मात्र सोचने रही जे काल्हिसँ एकरा संगे स्कूल नहि जायब, जायत ई असगरे। मुदा ओ’ तँ असगरे नहि जायत से सत्य कय देखा देलक। हमर मायक आँखिमे नोर छलन्हि, मुदा हमर भीतर प्रसन्नता,किएकतँ हमर पिताजीक मृत्यु जे रुकि गेल छल।

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