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विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 10. पंजी प्रबंध श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार

In पञ्जी, First Maithili Language Blog, Ist Maithili Blog, maithil, maithili, maithils on जुलाई 25, 2008 at 8:14 पूर्वाह्न

10. पंजी प्रबंध श्री विद्यानन्द झा”मोहनजी” पंज्जीकार

अतः विवाहक पहिल चरण अधिकारक निर्णय रहल होयत। वर पक्ष ओ’ कन्या पक्षक लोक परस्पर बैसि अपन-अपन परिचयक आधार पर निर्णय करैत छल होएताह, जे ‘अमुक’ कन्यासँ ‘अमुक’ वरक विवाह हो वा नहि। मुदा परिचय रखबाक प्रवृत्तिक ह्रासक कारणेँ अधिकार-निर्णयक हेतु प्रत्येक परिवारक सुयोग्य ओ’ आस्थावान व्यक्ति अपन यावतो परिचय(32 मूलक उल्लेख) लिखि कए राखय लगलाह। सातम शाब्दीसँ पूर्वहि ए लिखित कौलिक परिचय ‘समूह लेख्य’ क उल्लेख सर्वप्रथम विद्वद्वैरैण्य कुमारिल भट्ट रचित ‘तंत्र वार्त्तिक’मे भेल अछि, जे मीमांसा दर्शनक जैमिनी सूत्रक शबर द्वारा कएल भाष्यक ग्द्यात्मक ‘वार्त्तिक’ थीक। तंत्रवार्त्तिक दर्शनक ग्रंथ थीक जाहिमे यथार्थ वस्तुस्थितिक वर्णनसँ जातिक विशुद्धि सिद्ध कएल गेल अछि। जाहि आधार पर धर्मक निरूपण भए सकैत। कुमारिल भट्टक कहब छलन्हि जे “ बड़का कुलीन लोक बड़ विशेष प्रयत्नसँ अपन जातिक रक्षा करैत छथि। तैहि त’ क्षत्रिय ओ’ ब्राह्मण अपन पिता-पितामहादिक परम्परा बिसरि नहि जाए तेँ समूह-लेख्य चलौलन्हि। ओ’ प्रत्येक कुलमे गुण आ’ दोष देखि ओहि अनुरूप सम्बंध करबामे प्रवृत्त होइत छथि।
“विशिष्टेनैव हि प्रयत्नेन महाकुलीनाः परिक्षन्ति आत्मानम् अनेनैव हि हेतुना राजाभिब्रह्मिणैश्च स्व पितृ-पितामहादि पारम्पर्यो विस्मणार्थं समूहलेख्यानिप्रवर्तितानि तथा च प्रतिकुलं गुण-दोष स्मर्णांतदनुरूपाः प्रभृति-निवृतयो दृश्यंते”।
(तंत्रवार्त्तिक, अध्याय 1, पाद-2, सूत्र-2क वार्त्तिक)
मुदा तेरहम शताब्दीक उत्तरार्ध होइत-होइत साधारण लोकक कोन कथा पण्डित लोकनि समेत समूह लेख्य राखब छोड़ि देलन्हि। एकर परिणाम ई भेल जे पं हरिनाथ उपाध्याय(धर्म-शास्त्रक महान ज्ञाता) “स्मृतिसार” सन धर्मशास्त्रक विषयक ग्रंथकर्त्ता ओ’ महापंडित परिचयक अभावमे विवाह कए लेल, स्वजनमे अनधिकारमे अपन साक्षात पितयौत भाइक दौहित्रीमे। फलतः चौदहम शताब्दीक तृतीय दशक होइत-होइत एहि कौलिक परिचयकेँ विशिष्ट पण्डितक अधीन कए देबाक आवश्यकताक अनुभव कएल जे विवाहक समय अधिकारक निर्णय कए सकथि। मिथिलाक तत्कालीन शासक राजा हरिसिंहदेवक प्रेरणासँ मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके 1248 तदनुसार 1326 ई. मे निर्णय कएलन्हि, जे “ परिचय राखब लोककेँ अपना पर नहि छोड़ल जाय, प्रत्युत ओकरा संगृहित कए विशिष्ट पण्डितजनक जिम्मा कए देल जाए, ओ’ ई राजकीय एक गोट विभाग बना देल जाए जाहिसँ पण्डित राजाज्ञासँ नियुक्त होथि सैह संगृहित परिचय राखथि। प्रत्येक विवाह तखनहि स्थिर हो जखन नियुक्त पंडित(पञ्जीकार) अधिकार जाँचि कए लिखिके देथि, जे अमुक कन्या ओ’ अमुक वर ‘स्वजना’ नहि छथि। अर्थात् शास्त्रीयनियमानुसार कन्याक संग वरकेँ वैवाहिक अधिकार छन्हि। इयैह पत्र ‘अस्वजन पत्र’ वा ‘सिद्धांत पत्र’ कहौलक। आइयो कन्या वरक विवाह पूर्व अधिकार जँचाए सिद्धांत पत्र लेल आवश्यक बूझल जाइत अछि। पञ्जी-प्रबंधमे इएह सभसँ प्रधान नियम भेल जे बिनु सिद्धांत भेने विवाह अशास्त्रीय मानल जायत। ‘अस्वजन पत्र’ देनिहार राजाज्ञासँ नियुक्त इएह पण्डित पञ्जीकार कहओलाह। संगृहित परिचय जाहिमे प्रत्येक नव जन्म ओ विवाह जोड़ल जाय लागल से भेल पञ्जी। जिनकर पञ्जीमे आएल से भेलाह पञ्जीबद्ध।
महाराज हरिसिंहदेव ओ’ तत्कालीन पण्डितक संयुक्त निर्णय अनुसार परिचेता लोकनिक नियुक्त्ति कए समस्त मैथिल ब्राह्मणक सम्पूर्ण परिचय संगृहित कएल गेल। परिचेता लोकनि घुमि-घुमि प्रत्येक परिवारक मुख्य व्यक्तिसँ हुनक परिचय पुछि लिखि लेल करथि। सामान्य रूँपे छओ पुरुषक परिचय सभ जनैत रहथि। किछु गोटा एहिसँ बहुतो अधिक परिचय जनैत रहथि। एहिना किछु गोटए मात्र दू वा तीन पुरुषाक ज्ञान रखैत छलाह। जे जतबा जनैत रहथि हुनकासँ ओतबहि संग्रह कए हुनकर पूरवजक वास-स्थान, गोत्र, प्रवर तथा हुनक वेद ओ’ शाखाक सूचना लिखि लेल जाइत रहैए। एहि संग्रहसँ एकहि कुलक अनेक शाखा जे विभिन्ना ग्राममे बसैत छलाह, तकर परिचय एकत्र भए गेल। एहि रूपे गोत्रक अनुसार भिन्न-भिन्न कुलक सम्पूर्ण परिचय प्राप्त भए गेल। एहि परिचय संकलनक समय सभसँ प्रमुख मानल गेल बीजी पुरुष ओ मूल ग्रामकेँ। कारण कौलिक परिचयक हेतु सर्वाधिक उपयोगी इयैह सूत्र भेल। विभिन्न गाममे बसैत एकहि कुलक विभिन्न व्यक्तिक कौलिक परिचय एहि मूल ग्रामक आधार पर संगृहित कएल गेल रहए। एहि कारणे पञ्जीमे अनिवार्य रूपसँ मूल ग्रामक उल्लेख भेल अछि। पञ्जी-प्रबंधक समय जे व्यक्ति जतए बसैत रहथि से हुनक भावी संतानक ग्राम कहओलक ओ परिचय लिखौनिहार अपन पूर्वजक प्राचीनतम वास स्थानक जे नाम कहल से ओहि व्यक्तिक मूल भेल। एहिना प्रत्येक कुलक प्राचीनतम ज्ञात पूर्वज ओहि कुलक बीजी पुरुष कहाओल। एकर प्रमाणमे एक गोट उदाहरण देखल जाए सकैत अछि। काश्यप गोत्रीय एक महाकुल जकर शतावधि शाखा मिथिलामे अनुवर्त्तमान रहए, संगृहित परिचयक आधार पर मूलतः माण्डर ग्रामक वासी सिद्ध भेलाह। मुदा पञ्जी-प्रबंधसँ बहुत पहिनहि, एकर दू गोट शाखा स्पष्टतः प्रमाणित भए गेल। एक मँगरौनी गामक आ’ दोसर गढ़-गामक। अतः पञ्जीमे आदिअहिसँ मण्डरक संग-संग गढ़ ओ मँगरौनी विशेषण जोड़ल जाए लागल। मुदा उपलब्ध परिचयक आधार पर दुनू एकहि कुलक दू शाखा सिद्ध भेल। तैय दुनू कुलक मूल एकहि भेल ओ बीजी पुरुष सेहो एकहि भेलाह।

गोत्र- कहल जाइत अछि जे सकल गोत्रक समस्त जन समुदाय एकहि प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक वंशज थिकाह। ईएह प्राचीनतम ज्ञात महापुरुष गोत्र कहाए सुविख्यात छथि। श्री एम.पी. चिंतालाल राव महोदय चारि हजार गोत्रक सूची तैयार कएने छथि। “ अमरकोष”मे गोत्रक हेतु तीन अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, वंश आ’ नाम। “वाचस्पत्य” कोषमे गोत्रक एगारह अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, नाम ,ज्ञान, जंगल,खेत,क्षत्र,संघ,धन, मार्ग, वृद्धि आ’ मुनि लोकनिक वंश। प्राचीन संस्कृत साहित्यमे गोत्र शब्दक प्रयोग प्रायः वंश वा पिताक नामक लेल भेल अछि। छान्दोग्य उपनिषद (4/4) मे जीवन गुरु सत्यकामसँ गोत्र पुछैत छथिन्ह तँ हुनक अभिप्राय सत्यकामक कुल अथ्वा पिताक नामसँ छन्हि, मुदा ऋगवेदमे गोत्रक उल्लेख चारि ठाम मेघ अथवा पहाड़क लेल आ’ दू ठाम पशु समूह अथवा जनसमुदाय अथवा पशु रक्षक रूपमे भेल अछि। अंततः वंश अथवा परिवरक अर्थमे गोत्र शब्दक प्रयोग पश्चातक प्रयोग थिक। वंश अथवा परिवारक अर्थमे गोत्रक प्रयोग सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे भेल अछि।
मैथिल ब्राह्मण समाजमे गोत्र वंशा-बोधक थीक। मैथिल ब्राह्मणक समस्त गोत्र पितृ प्रधान थीक- अर्थात् प्रत्येक गोत्र अपन-अपन वंशक प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक नाम थीक। मैथिल ब्राह्मणमे सभ मिलाए 20 गोट गोत्र अछि। मैथिल ब्राह्मणमे सात गोट गोत्रक कुल व्यवस्थित, सुपरिचित ओ बहुसंख्यक अछि। ई सात गोट गोत्र थीक- 1.शाण्डिल्य 2.वत्स 3.काश्यप 4.सावर्ण 5.पराशर 6.भारद्वाज 7.कात्यायन। शेष 13 गोट गोत्र थीक- 1.गर्ग 2.कौशिक 3.अलाम्बुकाक्ष
4.कृष्णात्रेय 5.गौतम 6.मौद्गल्य 7.वशिष्ठ 8.कौण्डिन्य 9.उपमन्यु 10.कपिल 11.विष्णुवृद्धि 12.तण्डि 13.जातिकर्ण।
प्रत्येक गोत्रमे कतौक मूल्य अछि। मिथिलामे 153 मूलक ब्राह्मणक परिच्अय प्राप्त होइत अछि। कतैक मूल एहन अछि, जे एकसँ अधिक गोत्रमे पाओल जाइत अछि।‘ब्रह्मपुरा’ एकटा एहने मूल थिक। एहि मूलक ब्राह्मण- शाण्डिल्य,वत्स,काश्यप,अलाम्बुकाक्ष,गौतम ओ गर्ग गोत्रमे पाओल जाइत छथि। प्रवर- प्रवरक उल्लेख वैदिक युगमे दर्श ओ पौर्णमास नामक इष्टिमे भेटैत अछि। इ इष्टि सभ आन सभ प्रकारक यज्ञक आधार थीक। अतः एहिमे प्रवरक पाठ होइत अछि। एहि पाठक प्रयोजन तखनहि होइत अछि जाहि क्षण यज्ञाग्नि उद्दिप्त करएबाली(सामधेनी) ऋचाक पाठक अनंतर अध्वर्यु ओहि अग्नि पर आज्य(घृत) दैत छथिन्ह। एकर निहितार्थ अछि जे प्रवर, यज्ञमे अग्निकेँ बजएबाक प्रार्थना थीक। प्रवरकेँ बादमे ‘आर्षेय’ सेहो कहल गेल अछि- जकर अर्थ थिक ऋषिसँ संबंधराखए बला(ऋग्वेद-09/97/51)। शोनक ऋषिक सुविख्यात पूर्वज लोकनि मैथिल ब्राह्मण मध्य प्रवर कहबैत छथि अर्थात् ऋगवेदक ऋचाक प्रणेता लोकनि प्रवर थिकाह।
मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि।
1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स—] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
3. सावर्ण–] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन।
4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस.
गोत्र आ’ मूल
शाण्डिल्य- दिर्धोष(दिघवे), सरिसब, महुआ, पर्वपल्ली(पवौली),खण्डबला, गंगोली, यमुशाम, करिअन, मोहरी, सझुआल, मड़ार, पण्डोली, जजिवाल, दहिसत, तिलय, माहब, सिम्मुआल, सिंहाश्रम, सोदरपुर, कड़रिया, अल्लारि, होइयार,तल्हनपुर,परिसरा,परसड़ा,वीरनाम, उत्तमपुर, कोदरिया, छतिमन, वरेवा, मधुआल, गंगौर, भटोर, बुधौरा, ब्रह्मपुरा, कोइआर, केटहिवार, गंगुआल, घोषियाम, छतौनी, भिगुआल, ननौती, तपनपुर।
वत्स- पल्ली(पाली), हरिअम्ब, तिसुरी, राउढ़, टकवाल, घुसौत, जजिवाल, पहद्दी, जल्लकी(जालय), भन्दवाल, कोइयार, केरहिवार, ननौर, डढ़ार, करमहा, बुधवाल, मड़ार, लाही, सौनी, सकौना, फनन्दह, मोहरी, वंठवाल, तिसउँत, बरुआली, पण्डौली, बहेटाढ़ी, बरैवा, अलय, भाप्रारिसमथ, बभनियाम, उचति, तपनपुर, विठुआल, नरवाल, चित्रपल्ली, जरहटिया, ब्रह्मपुरा,सरौनी।
काश्यप- ओइनि, खौआल, संकराढ़ी, जगति, दरिहरा, माण्डर, वलियास, पचाउर, कटाइ, सतलखा, पण्डुआ, मालिछ, मेरन्दी, नदुआल, पकलिया, बुधवाल, दिभू, मौरी, भूतहरी, छादन, विस्फी, थरिया, दोस्ती, भरेहा, कुसुम्बाल, नरवाल, लगुरदह।
सावर्ण- सोन्दपुर, पनिचोभ, बरेबा, नन्दोर, मेरन्दी। पराशर- नरौन, सुरगन, सकुरी, सुइरी, सम्मूआल, दिहवाल, नदाम, महेशारि, सकरहोन, सोइनि, तिलय, बरेबा। भारद्वाज- एकहरा, विल्वपञ्चक(बेलौँच), देयाम, कलिगाम, भूतहरी, गोढ़ार, गोधूलि। कात्यायन- कुजौली, ननौती, जल्लकी, वतिगाम। अलाम्बुकाक्ष- बसाम,कटाइ, ब्रह्मपुरा।
गार्ग्य – बसहा, बसाम, ब्रह्मपुरा, सुरौर, विधौर, उरौर। कौशिक- निटेरति कृष्नात्रेय- लोहना, बुसवन, पोदौनी। मौद्गल्य- रतवाल, मालिछ, दिघौष, कपिञ्जल, जल्लकी। गौतम- ब्रह्मपुरा, उंतिमपुर, कोइयार। वशिष्ठ- कोथुआ। कौंडिल्य- एकहरा, परौन। जातुकर्ण- देवहार। तण्डि- कटाई।

मिथिलाधीश कार्णाट वंशीय क्षत्रिय महाराज हरिसिंहदेव जीक सभामे उपस्थित सभ्य लोकनि महिन्द्रपुर पण्डुआ मूलक सदुपाध्याय गुणाकर झाकेँ मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्धक भार देलन्हि

नन्देहु शुन्यं शशि शाक वर्षे (1099 शाके) तच्छ्रावणस्य धवले मुनितिथ्यधस्तात। स्वाती शनैश्चर दिने सुपूजित लग्ने श्री नान्यदेव नृपतिढ़र्यधीत वास्तं॥1॥ शास्तानान्द पतिर्व्वभूव नृपतिः श्री गंगदेवो नृपस्तत् सूनू(पुत्र) नरसिंहदेव विजयी श्री शक्ति सिंह सुतः तत् सूनू खलू राम सिंह विजयी भूपालवंत सुतो जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः कार्णाट चूड़ामणि ॥2॥ श्रीमंतं गुणवन्त मुत्तम कुलस्नाया विशुद्धाशयँ सञ्जातानु गवेषणोत्सुक यातः सर्वानुव्यक्तिक्षमां चातुर्यश्चतुराननः प्रतिनिधिंकृत्वा च्च्तुर्द्धाकिमां पंचादित्यकुलांविता विवजया दित्यै ददौ पञ्जिकाम्॥3॥
भूपालवनि मौलि रत्न मुकुटोलंकार हिरांकुर ज्योत्सोज्वाल यटाल माल शशिनिः लीलञ्च चञ्चलम्तावः शोभा भाजि गुणाकरे गुणवतां मानन्द कन्दोदरे दृष्ट्वात्मा हरिसिंह देव नृपतिः पाणौ ददौ पञ्जिकाम॥4॥ दृष्ट्वा सभां श्री हरिसिंहदेव विचार्य चिंते गुणिणी सहिष्णौ॥ गुणाकरे मैथिल वंश जाते पञ्जी ददौ धर्म विवेचणार्थम॥

(अनुवर्तते)

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