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विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 3.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

In उपन्यास, सहस्रबाढ़नि, First Maithili Language Blog, Ist Maithili Blog, Maithili Novel on जुलाई 27, 2008 at 5:01 अपराह्न

3.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

“काका यौ, हम नहि लगेलिअन्हि कबकबाउछ”। ई गप कहैत हमर आँखिमे नोर आबि गेल छल। बनाइकेँ किछु गोटे छौड़ा सभ दलान पर सुतलमे कबकबाउछ लगा’ देने छलन्हि। कलम दिशिसँ खेला-कुदा कए सभ आबि रहल छल। महारक कातमे कबकबाउछक पात तोड़लक, आ’ एकर पातकेँ चमड़ा पर रगड़लासँ होयबला पऋणाम पर चर्चा होमय लागल। क्यो अपन चमड़ा पर लगेबाक हेतु तैयार नहि छल से दलान पर बनाइकेँ सुतल देखि हुनके देह पर पात रगड़ि देलकन्हि। पाछाँसँ हम अबैत छलहुँ आ’ सभ छौड़ातँ निपत्ता भए गेल, बनाइक नजरि हमरा पर पड़लन्हि। से ओ’ काकाकेँ कहि देलखिन्ह। काका हमर कोनो गप नहि सुनलन्हि आ’ दस बेर कान पकड़ि कए उट्ठा-बैसी करबाक सजा भेटल। संगहि साँझमे संगी सभक संग खेलेबाक बदला काका आ’ हुनक भजार सभक संग खेत पथारक दिशि घूमबाक निर्णय भेल जाहिसँ हमर बदमस्ती कम होय।

बाढ़िक समय छल।नाओ पर बाढिक दृश्य आ’ सिल्लीक शिकार। बादमे तँ एकर शिकार पर सरकार प्रतिबंध लगा’ देलक। मुदा मोन हमर टाँगल रहल गाम परक कल्पित खेल सभक दिशि, जे हमर सभक संगी सभ खेलाइत होयताह। ई छल पहिल दिन।
दोसर दिन बेरू पहर धरि हम एहि प्रत्याशामे छलहुँ, जे आइ फेरसँ काकाक संग जाए पड़त। ओना संगी सभकेँ हम ई भास नहि होमय देलियैक जे हम एको रत्ती चिन्तित छी, आ’ नाओ आ’ सिल्लीक खिस्सा सभ तन्मयतासँ सुनैत रहलाह। मुदा हमर मुखाकृति देखि कए काका पुछलन्हि, जे आइ हमरा सभक संग जएबाक मोन नहि अछि? तँ हम नञि नहि कहि सकलियन्हि। मुदा फेर अपनाकेँ सम्हारैत कहलियन्हि, जे मोन तँ गामे पर लगैत अछि। तखन काकाकेँ व्दया लागि गेलन्हि, आ’ एहि प्रतिबन्धक संग की हम बदमस्ती नहि करब हमरा गाम पर रहबाक छूटि भेटि गेल।

गाममे डेढ़ साल धरि रहलहुँ, आ’ जखन बाबूजीक ट्रांसफर पटना भ’ गेलन्हि, तखन बड़का भैयाक संगे पहलेजाघाट आ’ महेन्द्रूघाट द’ कए पटना आबि गेलहुँ। ओतय स्कूल सभमे प्रवेश परीक्षा होइत छल आ’ बाबूजी भायकेँ छठासँ सतमाक हेतु आ’ हमरा पँचमासँ छठा आ’ सतमा दुनू वर्गक हेतु प्रवेश परीक्षामे बैसओलन्हि। आ’ तकरा बाद हमरा बुझायल जे किएक हमरा बाबूजी पचमेमे छठाक विज्ञान आ’ गणित पढ़ि लेबाक हेतु कहने छलाह। प्रवेश परीक्षामेमे ईएह दुनू विषय पूछल जाइत छल।
अस्तु हमरा छठा आ’ सतमा दुनू वर्गक हेतु आ’ भाएकेँ सतमाक हेतु चयन जिला स्कूलमे भए गेल। फेर शहरक सरकारीयो स्कूलमे ड्रेस छलैक। से दुनू गोटे बाबूजीक संग दोकान गेलहुँ आ’ ड्रेस सियाओल गेल, दू-दू टा हाफ पैंट आ’ एक-एकटा अंगा। स्कूलक पहिलुके दिन मारि होइत-होइत बचल। एकटा चौड़ा हमरा देहाती कहल तँ से तँ हमरा कोनो खराप नहि लागल। ओहि उम्रमे देहाती शब्द हमरा नीके लगैत छल, मुदा आइ सोचैत छी तँ ओ’ ई शब्द व्यंग्यात्मक रूपेँ कहने छल। फेर जखन ओ’ देखलक जे ई तँ नहि खौँझायल तखन बंगाली-बंगाली कहनाइ शुरू कएलक। हम दुनू भाइ पातर दुबर आ’ शुभ्र-शाभ्र चिक्कन-चुनमुन लगैत छलहुँ, ताहिओ द्वारे ओ’ हमरा सभकेँ बंगाली बुझि रहल छल। हम ई व्यंग्य नहि सुनि सकलहुँ, आ’ ओकरा दिशि मार-मार कए छुटलहुँ। भाइ बीच-बचाओ कएलक।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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