VIDEHA

‘विदेह’ १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )/ ५कथा/1. गंगेश गुंजन -गोबरक मूल्य/2. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति

In कथा, खिस्सा, खिस्सा-पिहानी, गद्य, Maithili Story on जुलाई 28, 2008 at 5:15 अपराह्न

५कथा
1. गंगेश गुंजन -गोबरक मूल्य

2. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति
1. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ’ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
गोबरक मूल्य
भागलपुर मे एकटा उनटा पुल कहबैत छैक। उनटा पुलसँ दक्षिण मुँह जे सड़क जाइत छैक, तकरा बौंसीे रोड कहल जाइत छैक। बौंसी रोड पर कएक टा बस्ती-मोहल्ला लगे-लग पड़ैत छैक। बहुत रास दोकान आ लोकक, ट्रक-बस, टमटम, रिक्शा सभक खूब घन आवाजाही। सुखायल मौसम मे भरि ठेहुन ध्ूरा आ भदवारि मे भरि ठेहुन पानि-कादो। शहरी नाला सभक कारी गंदगीसँ सड़क भरल-पूरल। कैक समय तं पयरे आयब-जायब कठिन ।
मुदा सड़क छैक पीच। मोजाहिदपुर मिरजान हाट चौक, हबीबपुर आ हुसैनाबाद तथा अलीगंज। कैक जाति आ पेशाक लोक । काठ गोदामसँ ल क तसरक उद्योगी ध्रि आ जानवरक गंध् तोड़ैत हड्डीक टालसँ ल क हरियर टटका तरकारी सभक हाट ध्रि । तहिना टिक टिक घोड़ासँ ल क बड़दोसँ बत्तर ठेलासँ छातीतोड़ श्रम करैत घामे-पसेने तर माल उघैत मजूर सेहो। बच्चा, सियान सभक भीड़ भेटत । कतहु दोकानमे लागल पफलकल कोबीक छत्ता जकाँ कतहु अलकतराक उनटल पीपा जकां। ई दृश्य थिक सड़कक दुनू कातक उनटा पुलसँ ता अलीगंज।
अलीगंजसँ किछुए आगाँसँ सड़क खूब पकठोस छैक। चिक्कन कारी। तेहन जे कैक टा परिवार ओहिपर मकै-गहूम पर्यन्त पथार द क सुखबैत भेटत।
ओही इलाकाक एकटा घटना थिक। आने बीच सड़क परक अलीगंज बस्ती जत खतम होइत छैक ताही ठाम सड़कक कातमे एकटा आर कल छैक जे हरदम अबन्ड छौँड़ा जकाँ छुरछुरबैत रहैत छैक। यद्यपि भागलपुर मे पीबाक पानिक कष्ट बड़ सामान्य बात अछि, मुदा एत पानिक उदारता देखिक से समस्या अखबारी पफूसि बनि जाइत छैक। खैर, ताहू दिन खूब तेजीसँ पानि छुरछुरा रहल छलैक। क्यो भरनिहार नहि रहैक। खूब रौद रहैक। चानि खापड़ि जकाँ तबैत। तेहन सन जे चानि पर यदि बेलिक रोटी ध् देल जाइक तँ पाकि जयतैक।
एहना मौसम मे कलसँ सटले दस गोटे बीस गोटे अपन चानि तबबैत यदि घोलिमालि करैत ठाढ़ हो तँ ध्यान जायब स्वाभाविके। हमहूँ अपनाके ँ रौद, लू आ उमसमे उलबैत पकबैत ओहि द क ल जाइत रही। एकटा उपयुक्त कारण बुझायल सुस्तयबाक। भने किछु लोक
घोँघाउज क रहल छलैक। लगमे कलसँ ओतेक प्रवाह सँ जल झहरि रहल छलैक से एकटा मनोवैज्ञानिक शीतलता पसारि रहल छलैक मने।
जखन ओहि गोल लग पहुँचलहुँ तँ ईहो देखबा योग्य भेल जे ओहि घोँघाउजि मण्डलीसँ आगाँ एक टा मिनी बस ठाढ़ छैक। सन्देह नहि रहल जे कोनो दुर्घटना सँ पफराक किछु बात नहि छैक। एहन दुर्घटना मे सड़कपर ककरो मृत्यु सामान्य बात थिक। डेग अनेरे किछु झटकि गेल। लग पहुँचलहुँ आ ओहि घरेलू घोंघाउजिक कन्हापरसँ हुलकि क देखलहुँ तँ बीचमे दू पथिया गोबर हेरायल बीच सड़कपर। एक टा छौंँड़ा हुकुर-हुकुर करैत…। घोंघाउजि खूब जोरसँ चलि रहल छल। ओही लोकक गोलमे एक कात करीब १०-१२ बर्षक दूठा छौंड़ी आदंकेँ चुप्प ठाढ़ि आ कनैत… खरफकी पहिरने खूजल देह, छिट्टा सन केश…। ओहिमे सँ एक टा छौंड़ीक जमड़ी लागल अगंिह मे पफाटल पैंट, ताहिपर टटका गोबर लेभरल। दुनू छौँड़ीक गालपर हाथमे, सौँसे देहपर गोबर लागल आ दुर्घटनाग्रस्त छौँड़ाक छातीपर गोबर लागल । दू टा नान्हि टा हाथक छाप यद्यपि ओहि कड़ा रौदमे सुखा गेल रहैक, मुदा स्पष्ट रहैक।
आदंकमे पड़लि दुनू छौँड़ी, अंदाज करैत छी, गोबरबिछनी छैक। बाट-घाट जाइत अबैत गाय-महींसक गोबर जमा अछि, भरि दिन तकर गोइठा थोपैत अछि, माय वा परिवारक क्यो लोक तकरा सुखबैत अछि आ बड़का पथियामे सजाक शहर जाक बेचैत अछि । जीविकाक एक साध्न यैह गोइठाक आमदनी। गोइठा जाहिसँ बनय से गोबर आबय कतसँ एहिना अनिश्चित। कहियो एको पथिया कहियो किछु नें। तेेँ एहि सड़कपर गोइठा बिछनी छौँड़ी सभक आपस मे होइत झोंटा-झोंटीक दृश्य बड़ आम घटना रहैत छैक। आ ओकरा माय-बाप केँ गारि-सराप देलक, ओ ओकरा माय बहिनके ँ घोड़ासँ वियाह करौलक… एकहि दिन पहिने दूटा छौँड़ी बीच सड़कपर तेना पटकम-पटकी करैत रहय आ एक दोसराक झोंटाके ँ तेना नोचि रहल छल जे दया आ क्रोध् दुनू आबय मनमे, मुदा समाधन की। गोबर जकर जीविका छैक ताहि परक आपफत तँ ठीके नै सहल हेतैक ओकरा ताहूमे एक दिन हम एकटा छौँड़ी के ँ पुछने रहिऐक-÷तोरा सिनी केहने एना झगड़ा करै छे ँ, जरी टा गोबर के वास्ते?’
– ÷जरी टा छलै? एतना छलै, हम्मे जमा करी क रखलिऐ आरू ई रध्यिा मोटकी-ध्ुम्मी ने अपने छिट्टामे ध्री लेलक। आय हमरा केतना मारतै माय ? माय तँ इहे ने कहतै जे हम्मे गोबर नहि बीछय छलियै, कहीं दिन भर खेली रहल छलियै? की खयतै लोगें?’
हमर प्रश्न हमरे खूब भारी चमेटा जकाँ बुझायल, हम चोट्टहि ससरि गेल रही।
मुदा ओहि दिनुका दृश्य बड़ भार्मिक छलैक। आदंके ँ चुपचाप दहो-बहो कनैत दुनू छौँड़ी एक बेर चारू कातक लोकके ँ एक बेर शोणित बहैत बच्चाके ँ देखैत ठाढ़ि रहैक।
– ÷की होलै भाइ जी?’ हम एकटा सज्जनसँ पुछलियनि।
– ÷अरे कलियुग छौं भाई जी। बताब जरी टा गोबर के वास्ते एकरा सिनी मे आपसे मे झगड़ा होलै आरू हौ छौ ँड़ी एकर छोट भाइके ँ ध्केली देलकै मिनी बसके आगूमे। देखै नै छहौ जे घड़ी मे दम टुटल छै छौँड़ाके आहा…
– ÷जरी टा गोबर छलै उफ? माय किरिया खा के कही तँ लछमिनियाके ँ जे हमर एक चोत गोबड़ छलय कि नै ?’ अचानक जेना खूब साहस करैत आदंकित एक टा छौंड़ी कनिते बाजलि-
हमरा अकस्मात लोकसभपर खासक ओही भाइ साहेबपर क्रोध् उठल।
– ÷विचित्रा बात तोरा की नहि देखाइ रहल छ जे ई बुतरू मरि रहल दै आ अस्पताल पहुँचाबै के पिफकिर नै करीक दबकि बनल खाड़ छ ध्क्किार।’
सभ जेना हमरेपर गुम्हर लागल।
– ÷आब की ई बच पाड़तै? की पफयदा लय गेलासँ।’
– ÷तैयो लै जायमे की हर्जा? भाइ-साहेब ठीके तँ कही रहल छै हौ।’ एक गोटे अपन विचार देलकैक।
मुदा तकर कोनो प्रयोजन नहि भेलैक। घोल-पफचक्का मचिते रहलैक, ओ दुनू गोबरबिछनी छौंड़ी आदंके ठाढ़िए रहलि लोकसँ घेरायलि। बीच बाटपर ओहि घायल नेनाक प्राण छुटि गेलैक। एक चुरफक पानियो ने देलकै क्यो।
एहि संदर्भमे एकटा लेखकक टिप्पणी प्रस्ताव करैत छी जे ई दृश्य छल एकटा नहि, कैकटा गोबर पर जिनहार परिवारक बच्चाक संघर्षक। एक बहिन ककरो एक चोत गोबर चोरा लेलकै तँ तामसमे ओ चौरौनिहारक छोट भाइके ँ सड़कपर ध्क्का द देलकै आ मिनीबस ओकरा पीचि देलकै। पीचपर शोणित आ गोबर बराबरि दामक भेल जे रौदमे सुखाइत रहलैक।
बौंसी रोडक ई दृश्य जे देखने होयता सैह बुझने होयता – एतबे कहब।
हमरा तँ ईहो नहि बुझल अछि जे मुइल छौंड़ाक मायो-बाप छलैक कि नहि? छलैको तँ ओकरा कखन खबरि भेल होयतैक जे ओकर बेटा मिनीबसमे पिचा क मरि गेलैक। वा मिनीबसक ड्राइवर कोन थानामे जाक कहने होयतैक जे हम एकटा निरीह छौंड़ाके ँ खून क क आबि रहल छी?
हमरा तँ नहि बूझल अछि ओहि दुनू छौंड़ियो क, मुदा ओहि घटनाक बादसँ मनमे एहि बातक अंदेशा अवश्य होइत रहैत अछि जे कतहु दुनू छौंड़ी पफेर ने एहि बौंसी रोडपर गोबर बीछैत भेटि जाय… कतहु पफेर ने भेटि जाय।…..
आ, सत्य पूछी तँ आब हमरा सभटा गोबर बिछनी एक्के रंग लगैत अछि।
2.. गजेन्द्र ठाकुर-
पहरराति

“सुनू। प्रयोगशालाक स्विच ऑफ कए दियौक”। चारि डाइमेन्शनक वातावरणमे अपन सभटा द्वि आऽ त्रि डाइमेन्शनक वस्तुक प्रयोग करबाक लेल धौम्य प्रयोगशालामे प्रयोग शुरू करए बला छथि। हुनकर संगी-साथी सभ उत्सुकतासँ सभटा देखि रहल छथि।
“दू डाइमेन्शनमे जीबए बला जीव तीन डाइमेन्शनमे जीबए बला मनुक्खक सभ कार्यकेँ देखि तऽ नहि सकैत छथि, मुदा ओकर सभटा परिणामक अनुभव करैत छथि। अपन एकटा जीवन-शैलीक ओऽ निर्माण कएने छथि। ओहि परिणामसँ लड़बाक व्यवस्था कएने छथि। तहिना हमरा लोकनि सेहो चारि डाइमेन्शनमे रहए बला कोनो सम्भावित जीवक, वा ई कहू जे तीनसँ बेशी डाइमेन्शनमे जिनहार जीवक हस्तक्षेपकेँ चिन्हबाक प्रयास करब”। धौम्य कहैत रहलाह।
एक आऽ दू डाइमेन्शनमे रहनहारक दू गोट प्रयोगशालाक सफलताक बाद धौम्यक ई तेसर प्रयोग छल।
“एक विमीय जीव जेना एकटा बिन्दु। बच्चामे ओऽ पढ़ैत छलाह जे रेखा दू टा बिन्दुकेँ जोड़ैत छैक। नञि तऽ बिन्दुमे कोनो चौड़ाइ देखना जाइत अछि आऽ नहिये रेखामे। रेखा नमगर रहैत अछि, मुदा बिन्दुमे तँ चौड़ाइक संग लम्बाइ सेहो नहि रहैत छैक। एक विमीय विश्वमे मात्र अगाँ आऽ पाछाँ रहैत अछि। नञि अछि वान दहिनक बोध नहिये ऊपर नीचाँक। मात्र सरल रेखा, वक्रता कनियो नहि। आब ई नहि बुझि लिअ जे अहाँ जतय बैसल छी, ओतए एकटा रेखा विचरण करए लागत। वरण ई बुझू जे ओऽ रेखा मात्र अछि, नहि कोनो आन बहिः।
“द्वि बीमीय ब्रह्माण्ड भेल जतए आगू पाछूक विहाय वाम दहिन सेहो अछि, मुदा ऊपर आऽ नीछाँ एतए नहि अछि। ई बुझू जे अहाँक सोझाँ राखल सितलपाटीक सदृश ई होयत, जाहिमे चौड़ाइ विद्यमान नहि अछि।“
“ मुदा श्रीमान् ई चलैत अछि कोना। गप कोना करत एक दोसरकेँ संदेश कोना देत”।
“आऊ। पहिने एक विमीय ब्रह्माण्डक अवलोकन करैत छी”।
धौम्य एक विमीय प्रयोगशालाक लग जाइत छथि। ओतए बिन्दु आऽ बिन्दुक सम्मिलन स्वरूप बनल रेखा सभ देखबामे अबैत अछि। ई जीब्व सभ अछि। एक विमीय ब्रह्माण्डक जीव, जे एहि तथ्यसँ अनिभिज्ञ अछि जे तीन विमीय कोनो जीव ओकरा सभकेँ देखि रहल छैक।
“देखू। ई सभ जीव एक दोसराकेँ पार नहि कए सकैत अछि। आगू बढ़त तँ तवत धरि जाऽ धरि कोनो बिन्दु वा रेखासँ टक्कर नहि भए जएतैक। आऽ पाछाँ हटत तावत धरि यावत फेर कोनो जीवसँ भेँट नहि होयतैक। एक दोसराकेँ संदेश सेहो मात्र एकहि पँक्त्तिमे दए सकत, कारण पंक्त्तिक बाहर किछु नहि छैक। ओकर ब्रह्माण्ड एकहि पंक्त्तिमे समाप्त भए जाइत अछि।
“आब चलू द्वि बीमीय प्रयोगशालामे”।
सभ क्यो पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि।
“एतय किछु रमण चमन अछि। पहिल प्रयोगशाला तँ दू तहसँ जाँतल छल, दुनू दिशिसँ आऽ ऊपरसँ सेहो। मात्र लम्बाइ अनन्त धरि जाइत छल। मुदा एतय ऊपर आऽ नीचाँक सतह जाँतल अछि। ई आगाँ पाछाँ आऽ वाम दहिन दुनू दिशि अनन्त ढरि जा रहल अछि। ताहि हेतु हम दुनू प्रयोशालाकेँ पृथ्वीक ऊपर स्वतंत्र नभमे बनओने छी। एतुक्का जीवकेँ देखू। सीतलपाटी पर किछुओ बना दियौक। जेना छोट बच्चा वा आधुनिक चित्रकार बनबैत छथि। एतय ओऽ सभ प्रकार भेटि जायत। मुदा ऊँचाइक ज्ञान एतए नहि अछि। एक दोसरकेँ एक बेरमे मात्र रेखाक रूपमे देखैत अछि ई सभ। दोसर कोणसँ दोसर रेखा आऽ तखन स्वरूपक ज्ञान करैत जाइत अछि। लम्बाइ आऽ चौड़ाइ सभ कोणसँ बदलत। मुदा वृत्ताकार जीव सेहो होइत अछि। जेना देखू ओऽ जीव वाम कातमे। एक दोसराकेँ संदेश ओकरा लग जाऽ कए देल जाइत अछि। पैघ समूहमे संदेश प्रसारित होयबामे ढ़ेर समय लागि जाइत अछि”।
“श्रीमान, की ई संभव अछि, जेना हमरा सभक सोझाँ रहलो उत्तर ओऽ सभ हमरा लोकनिक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ अछि तहिना हमरा सभ सेहो कोनो चारि आऽ बेशी विमीय जीवक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ होञि”।
“हँ तकरे चर्चा आऽ प्रयोग करबाक हेतु हमरा सभ एतए एकत्र भेल छी। अहाँने सँ चारि गोटे हमरा संग एहि नव कार्यक हेतु आबि सकैत छी। ई योजना कनेक कठिनाह छैक। कतेक साल धरि ई योजना चलत आऽ परिणाम कहिया जाऽ कए भेटत, तकर कोनो सीमा निर्धारण नहि अछि”।
पाँच टा विद्यार्थी श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा एहि कार्यक हेतु सहर्ष तैयार भेलाह। धौम्य पाँचू गोटेकेँ अपन योजनामे सम्मिलित कए लेलन्हि।
“चारि बीमीय विश्वमे तीन बीमीय विश्वसँ किछु अन्तर अछि। तीन बीमीय विश्व भेल तीन टा लम्बाइ, चौड़ाइ आऽ गहराइ मुदा एहिमे समयक एकटा बीम सेहो सम्मिलित अछि। तँ चारि बीमीय विश्वमे आकि पाँच बीमीय विश्वमे समयक एकसँ बेशी बीमक सम्भावना पर सेहो विचार कएल जायत। मुदा पहिने चारि बीमीय विश्व पर हमरा सभ शोध आगाँ बढ़ायब एहिमे मूलतः समयक एकटा बीम सेहो रहत आऽ ताहिसँ बीमक संख्या पाँच भए जायत। समयकेँ मिलाकए चारि बीमक विश्वमे हमरा सभ जीबि रहल छी। जेना वर्ण अन्धतासँ ग्रसित लोककेँ लाल आऽ हरियरक अन्तर नहि बुझि पड़ैत छैक, ओहिना हमरा सभ एकटा बेशी बीमक विश्वक कल्पना कए सकैत छी, अप्रत्यक्ष अनुभव सेहो कए सकैत छी”। धौम्य बजलाह।
सभा समाप्त भेल आऽ सभ क्यो अपन-अपन प्रकोष्ठमे चलि गेलाह। सैद्धांतिक शोध आऽ तकर बाद ओकर प्रायोगिक प्रयोगमे सभ गोटे लागि गेलाह। त्रिभुज धरातल पर खेंचि कए एक सय अस्सी अंशक कोण जोड़ि कए बनएबाक अतिरिक्त्त पृथ्वीकार आकृतिमे खेंचल गेल त्रिभुज जाहि मे प्रत्येक रेखा एक दोसरासँ नब्बे अंशक कोण पर रहैत अछि, मुदा रेखा सोझ नहि टेढ़ रहैत अछि। ओहिना समय आऽ स्थानकेँ तेढ भेला पर एहन संभव भए सकैत अछि जे हमरा सभ प्रकाशक गतिसँ ओहि मार्गे जाइ आऽ पुनः घुरि आबी। प्रकाश सूर्यक लगसँ जाइत अछि तँ ओकर रस्ता कनेक बदलि जाइत छैक।
श्वेतकेतु आऽ रैक्व एकटा सिद्धान्त देलन्हि- जेना कठफोरबा काठमे वृक्षमे खोह बनबैत अछि, तहिना एकटा समय आऽ स्थानकेँ जोड़एबला खोहक निर्माण शुरू भए गेल। अपाला एकटा ब्रह्माण्डक डोरीक निर्माण कएलन्हि, जकरा बान्हि कए प्रकाश वा ओहूसँ बेशी गतिसँ उड़बाक सम्भावना छल। सत्यकाम एकटा एहन सिद्धान्तक सम्भावना पर कार्य शुरू कएने छलाह, जकर माध्यमसँ तीन टा स्थानिक आऽ एकटा समयक बीमक अतिरिक्त्त कताक आर बीम छल जे बड़ लघु छल, टेढ छल आऽ एहि तरहेँ वर्त्तमान विश्व लगभग दस बीमीय छल। घोषा स्थान समयक माध्यमसँ भूतकालमे पहुँचबासँ पूर्व देशक विधिमे ई परिवर्त्तन करबाक हेतु कहलन्हि जाहिसँ कोनो वैज्ञानिक भूतकालमे पहुँचि कए अपन वा अपन शत्रुकेँ जन्मसँ पूर्व नहि मारि दए। घोषा विश्वक निर्माणमे भगवानक योगदानक चरचा करैत रहैत छलीह। जौँ विश्वक निर्माण भगवान कएलन्हि, एकटा विस्फोट द्वारा, आऽ एकरा सापेक्षता आऽ अनिश्चितताक सिद्धांतक अन्तर्गत छोड़ि देलन्हि बढ़बाक लेल, तँ फेर समयक चाभी तँ हुनके हाथमे छन्हि। जखन ओऽ चाहताह फेरसँ सभटा शुरू भए जायत। जौँ से नहि अछि, तखन समय स्थानक कोनो सीमा, कोनो तट नहि अछि, तखन तँ ई ब्रह्माण्ड अपने सभ किछु अछि, विश्वदेव, तखन भगवानक कोन स्थान? घोषा सोचैत रहलीह।
आब धौम्यक लेल समय आबि गेल छल। अपन पाँचू विद्यार्थीक सभ सिद्धांतकेँ ओऽ प्रयोगमे बदलि देलन्हि। आऽ आब समय आबि गेल। पहरराति।
पुष्पक विमान तैयार भेल स्थान-समयक खोहसँ चलबाक लेल। ब्रह्माण्डीय डोरी बान्हि देल गेल पुष्पक पर। धौम्य सभसँ विदा लेलन्हि। प्रकाशक गतिसँ चलल विमान आऽ खोहमे स्थान आऽ समयकेँ टेढ़ करैत आगाँ बढ़ि गेल। ब्रह्माण्दक केन्द्रमे पहुँचि गेलाह धौम्य। पहरराति बीतल छल। आगाँ कारी गह्वर सभ एहि समय आऽ स्थानकेँ टेढ़ कएल खोहमे चलए बला पुष्पकक सोझाँ अपन सभटा भेद राखि देलक। भोरुका पहरक पहिने धौम्यक विमान पुनः पृथ्वी पर आबि गेल। मुदा एतए आबि हुनका विश्व किछु बदलल सन लगलन्हि। श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा क्यो नहि छलाह ओतए। विमानपट्टी सेहो बदलल सन। विश्वमे समय-स्थानक पट्टी सभ भरल पड़ल छल।
“यौ। समय बताऊ कतेक भेल अछि”।
“कोन समय। सोझ बला वा स्थान-समय विस्थापन बला। सोझ बला समय अछि, सन् ३१०० मास…”।
ओऽ बजिते रहि गेल छल मुदा धौम्य सोचि रहल छलाह जे स्थान-समय विस्थापनक पहररातिमे हजार साल व्यतीत भए गेल। ककरा बतओताह ओऽ अपन ताकल रहस्य। आकि एतुक्का लोक ओऽ रहस्य ताकि कए निश्चिन्त तँ नहि भए गेल अछि?
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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