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‘विदेह’ १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ )३.उपन्यास/ सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

In उपन्यास, गद्य, सहस्रबाढ़नि, Maithili Novel on जुलाई 28, 2008 at 5:18 अपराह्न

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

नन्दक दुनू बेटा वर्गमे प्रथम अबैत छलन्हि। किछु दिन धरि सभटा ठीक-ठाक चलैत रहल। पुरनका सभटा चिन्ता-फिकिर लगैत छल जेना खतम भए गेल होए। गामक एक दू गोटे सेहो पटनामे रहैत छलाह। महिनामे एकटा रवि निश्चित छल, जाहि दिन सभ गोटे कतहु घुमए लेल जाइत छलाह। एक रवि कोनो गौँआक अहिठाम तँ कोनो आन बेर चिड़ियाखानाक यात्रा। एक बेर चिड़ियाखाना गेल रहथि सभ गोटे तँ आरुणि नन्दकेँ पुछलखिन्ह- “हमरा सभ आयल छी चिड़ियाखाना, बाहरमे बोर्ड लागल अछि बोटेनिकल गार्डेनक आऽ गेटक ऊपरमे लिखल अछि बायोलोजिकल गार्डेन”।
“पहिने सोनपुरमेला सभमे अस्थायी चिड़ै सभक प्रदर्शन होइत छल आऽ लोकक जीह पर ओकरा लेल चिड़ियाखाना शब्द आबि गेल। मुदा एतए तँ कताक बीघामे वृक्ष सभ लागल अछि, प्रत्येक वृक्ष पर ओकर नाम आऽ वनस्पतिशास्त्रीय विवरण सेहो लिखल अछि, आऽ ताहि द्वारे एकर नाम अंग्रेजीमे वनस्पति उद्यानक लेल बोटेनिकल गार्डन पड़ि गेल। मुदा बादमे अनुभव कएल गेल जे जन्तु आऽ वनस्पतिक रूपमे दू तरहक जीवविज्ञान अछि। एहि उद्यानमे वनस्पति, चिड़ै आऽ बाघ-सिंह इत्यादि सेहो प्रदर्शित अछि। ताहि द्वारे एकर नाम बायोलोजिकल गार्डन वा जैविक उद्यान दए देल गेल। पुरनका बोर्ड जतए-ततए रहिये गेल”।
एक बेर सभ गोटे गेल रहथि एकटा गौँआक अहिठाम। ओतए चर्चा चलए लागल जे गंगा पुल केर उद्घाटन दू तीन सालसँ एहि साल होयत, अगिला साल होयत एहि तरहक चरचा अछि।
नन्दसँ ओऽ लोकनि पुछलखिन्ह, “अहाँक बुझने कहिया धरि एहि पुलक उद्घाटन भए जएतैक। मुख्यमन्त्री तँ कहने छथि जे एहि साल एकर उद्घाटन भए जएतैक”।
“कहियो नहि होएतैक। दू-तीन सालसँ तँ सुनि रहल छियैक। यावत एकटा पाया बनैत छैक, तँ ओहिमे ततेक न बालु देने रहैत छैक जे किछु दिनमे दरारि पड़ि जाइत छैक। फेर राता-राती ओकरा तोड़ि कए फेरसँ नव पाया बनेनाइ शुरू करैत जाइत अछि”।
गंगा पुलक चरचा सुनि नन्दक सोझाँ पाया परसँ गंगाजीमे खसैत जोन-मजदूर सभक चित्र नाचि जाइत छलन्हि। नन्दक विवाद ओहि समय ठिकेदार आऽ संगी अभियन्ता सभसँ काजक संबंधमे होइत रहैत छलन्हि। एकटा पायाक कार्यक संबंधमे नन्द अपन विरोध प्रकट कएने छलाह, किछु दिनुका बाद ओऽ पाया फाटि गेल, एकटा पैघ दरारि पड़ि गेल छल बीचो-बीच। राता-राती ठिकेदार-अभियन्ता लोकनि ओकरा तोड़बेलन्हि। रातिमे कतहुसँ ओतेक विशाल पाया टूटि सकैत छल? से अगिला दिन दरारिक स्थान पर तिरपाल बिछाओल गेल, जे ककरो नजरि नहि पड़ि जाइ।
(अनुवर्तते)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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