VIDEHA

‘विदेह’ १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ )३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

In उपन्यास, सहस्रबाढ़नि, Maithili Novel on अगस्त 1, 2008 at 11:39 पूर्वाह्न

३.उपन्यास
सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर

एहि तरहेँ समय बितैत गेल। बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल। तकर बाद दूटा घटना भेल। एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन। आऽ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह। एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह। ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि। आब ओऽ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आऽ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाईमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आशक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि। सभ परिणामक कारण होइत छैक आऽ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत छन्हि। आऽ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह।
“नन्द छथि”?
एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि।

“नहि। ऑफिससँ नहि आयल छथि, मुदा आबैये बला छथि। भीतर आउ, बैसू”। नन्दक बालक कहलखिन्ह।
“हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”।
किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओऽ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह। पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह-
“शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”।
“चिन्हि गेलहुँ”। शोभा बाबू बजलाह।
आऽ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आऽ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लगलन्हि।
“एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल।
शोभाबाबू छलाह कछबी गामक। नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर। बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी नन्दक गाम मेहथक मामागाममे पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह। नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह। मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि। कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि। आऽ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि।

“ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”।
“आब ओऽ पुरान चास-बास खतम भए गेल। जमीन्दारी खतम आऽ चास-बास सेहो। मुदा खरचा वैह पुरनके। से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल। मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”।
शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आऽ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह-
“से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ। रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आऽ सोहमे पटना पहुँचि गेलहु। पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ। ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि।अवस्थो कम छल। फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल। जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा। फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जाऽ कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक। आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी। ओतहि पानक सेहो स्टॉल लगा देने छियैक”।
“सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”।
“चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल। मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल। मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आऽ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”।
एहि गपपर नन्द आऽ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह।
फेर गप-शप चलए लागल। शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा जौँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा जे विपत्ति आएल तँ सभटा एके बेर। नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी केलाइत छलीह पड़ोसमे आऽ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि जे फलना-अँगनाक फलना पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आऽ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आऽ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमयी मृत्यु भए गेलैक।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: