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‘विदेह’ १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ ) ११. बालानां कृते-१.नैका बनिजारा-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी: गरीबक सहायता- ज्योति झा चौधरी

In बालानां कृते on अगस्त 1, 2008 at 11:28 पूर्वाह्न

११. बालानां कृते-
बालानां कृते

१.नैका बनिजारा-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: गरीबक सहायता- ज्योति झा चौधरी
१.नैका बनिजारा

चित्र: ज्योति झा चौधरी
नैका बनिजारा

शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि, आऽ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओऽ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह, तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओऽ राति बड़ शुभ छल आऽ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक।
ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आऽ चलि गेलाह मरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि, आऽ तेरहम बर्ख बिदा भेला घरक लेल।
एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओऽ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओऽ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलकैक आऽ सभ हँसी खुशी रहए लागल।
तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना।
दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने
केलही रे ना।
कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना
दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना
रहबइ रे ना।
२. देवीजी: गरीबक सहायता

चित्र: ज्योति झा चौधरी

देवी जी : गरीबक सहायता
एक बेर देवीजी विद्यालय आबि रहल छलीह तऽ द्वार लग हुनका एकटा चिनिया बदाम बेचऽवला बड उदास देखेलनि। हुनका सऽ नहि रहल गेलनि। ओऽ ओकरा लग जा कऽ पुछलखिन ” एहि उदासीक की कारण? जवाबमे जे सुनऽ भेटलनि ताहि सऽ हुनकर मोन क्षोभसॅं भरि गेलनि।
हुनकर विद्यालयक किछु छात्र ओकरा सऽ चिनियाबदाम खरीदकऽ पाई नहि देलकै। अगिला दिन ओऽ खुमचावला ओहि बेईमान सभकेँ समान बेचऽ सॅं मना कऽ देलक। ताहिसॅं उकता कए बच्चा सभ आर उग्र भऽ गेल आर ओकरा सब समानकेँ लुटि पाटि कऽ छिड़िया देलक। ओऽ खुमचावला गरीब छल, ओकर बड नुक्सान भेलैक। ताहि लऽ कऽ ओऽ बड दुःखी छल।
देवीजी ओकरा प्रधानाध्यापक लग लऽ गेलखिन। प्रधानाध्यापककेँ सेहो अपन विद्यालयक बच्चा सबहक ई कुकर्म बड क्षोभित केलकनि। ओऽ देवीजी संगे मिलिकऽ उपद्रवी बच्चा सभकेँ अपन अभिभावक संगे बजेलखिन। सभ उपद्रवी बच्चा सभकेँ विद्यालयसँ निष्कासित करबाक बात भेल। तहन बच्चा सभ माफी मॅगलक। देवीजी ओकरा सभकेँ बुझेलखिन जे गरीबी द्वारे ओऽ खुमचावला विद्यालय लग खुमचा लगाकऽ दू पाई कमाइत अछि जाहि सॅं ओकर परिवार चलैत छञ। एहि घटनासॅ ओकर बड हानि भेलैक। ओकरा खेनाइ पिनाइ तकक कष्ट भऽ गेलैक।
तखन बच्चा सभ अपन एहि गलतीक पश्चाताप करबाक विचार केलक। देवीजीक आज्ञा लऽ ओऽ सभ टूटल खुमचाक मरम्मति केलक आऽ चंदा जमाकऽ जतेक समान लुटने रहए तकरा कीनि लौटेलक। सभ कियो ई शपथ लेलक जे कहियो फेर एहेन काज नहि करत आऽ गरीबक यथासम्भव सहायता करत ।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
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(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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