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‘विदेह’ ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ ) – part-II

In 'विदेह' ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ )- part-I on अक्टूबर 26, 2008 at 9:36 पूर्वाह्न

‘विदेह’ ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ ) – part-II

पद्य
१.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)
१. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
पंकज पराशर शैलेन्द्र मोहन झा
महाकाव्य महाभारत (आगाँ) प्रकाश झा
कोसी पद्य -स्व.रामकृष्ण झा “किसुन”, विनीत उत्पल, कोसी लोकगीत.
१.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)
डॉ मित्रनाथ झा, १९५६- , पिता स्वनामधन्य मिथिला चित्रकार स्व. लक्ष्मीनाथ झा प्रसिद्ध खोखा बाबू, ग्राम-सरिसब, पोस्ट सरिसब-पाही, भाया- मनीगाछी, जिला-मधुबनी (भारत), सम्प्रति मिथिला शोध संस्थान, दरिभङ्गामे पाण्डुलिपि विभागाध्यक्ष ओ एम.ए. (संस्कृत) कक्षाक शिक्षार्थीकेँ एम.ए. पाठ्यक्रमक सभ पत्रक अध्यापन। लेखन, उच्चस्तरीय शोध ओ समाज-सेवामे रुचि। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी ओ उर्दू भाषामे गद्य-पद्य लेखन। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर सुप्रतिष्ठित अनेकानेक पत्र-पत्रिका, अभिनन्दन-ग्रन्थ ओ स्मृति-ग्रन्थादिमे अनेको रचना प्रकाशित। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर आयोजित अनेको सेमिनार, कॉनफेरेन्स, वर्कशॉप आदिमे सक्रिय सहभागिता।

विदेह-वैभव
विद्या-वैभव केर गरिमासँ सर्वथा पुक्त जे सिद्ध भूमि।
अन्तर कदापि नहि जे कएलक अप्पन वा आनक थातीमे॥
देलक सदिखन जे पूर्ण ज्ञान निश्छलता ओ कर्मठतासँ।
मद्धिम कखनहुँ नहि पड़य देल, दय तेल ज्ञान केर बातीमे॥
हवि ज्ञानक अप्पन सतत बाँटि, हो बुद्धिक कोनो अनुष्ठान।
शिक्षाक भनहि हो कोनो विधा, वर्जित नहि हिनकर पातीमे।
अक्षुण्ण राखि निज-मर्यादा, अन्यहु क्षेत्रक कएलक विकास।
मिथिला केर तापस ज्ञान-भानुसँ, के-के नहि लेलक प्रकाश॥
मतवैभिन्यक अप्पन महिमा, के नहि जनैछ ई दिव्यभूमि।
तमसँ आच्छादित मार्ग कोनो, त्वरिते पाओल ज्ञानक प्रकाश॥
रहि मध्य मार्ग केर अनुगामी, कामी नहि कोनहु तुच्छ फलक।
कएलक प्रयास विध्वंसक बड़, पर कए न सकल किञ्चित् विनाश॥
होता कोनहु हो, यजमानक ज्ञानक मानक हो ध्यान सदा।
मिथिला केर पावन धरतीपर, गुञ्जित हो ज्ञानक गान सदा॥

भग्न चिन्तन
चिन्ताक तप्त दावानलमे हम की रचनात्मक कार्य करू।
हियमे तँ अबैछ लहरि भावक, पर धार कोना ई पार करू॥
त्रिभुवन केर प्रायः कोनो वस्तु, मानव-चिन्तनसँ दूर नञि।
की भावनाक ई दिव्य महल, होएत हमरासँ पूर नञि॥
लेखनी हमर ई बाजि रहल, की हमरा अपनहि भरि रखबेँ।
मानस पट से धिक्कारि रहल, की समय एतबहि भरि रखबेँ॥
खाली हाथेँ जाएत सभ क्यो, ई नीक जेकाँ हम जनैत छी।
लेखनीक आइ दुर्दशा देखि, एकान्त मौन भए कनैत छी॥
कारण जनैत छी नहि जाएत भूतलसँ संग एक्कोटा कण।
पर मित्र भाग्यसारणी हमर नहि देलक एहन कोनो यक्षण॥
जेहि अनुपमेय क्षणमे अप्पन भावना अतीतकेँ दोहराबी।
भग्ना वीणा केर रुग्ण तारपर दू आखर हमहूँ गाबी।

२.शंभु कुमार सिंह, जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, मैट्रिक धरि गामहि सँ, आइ.ए., बी.ए.मैथिली सम्मान, एम.ए.मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु] उत्तीर्ण 1995, “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर वर्ष 2008, ति.माँ.भा.वि.वि.भा.बिहार में शोध-प्रबंध जमा (परीक्षाफल प्रतीक्षारत)। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता आ निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे, शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे कार्यरत।
आह्वान

भारत भूमिक नवतुरिया
हमर कविताक आह्वान सनू
भ’ तन्मय अपन कान खोलि
छथि बाजि रहल भारती से सुनू
हे भारत ! ई भारती थिक
अति विवश भाव भंगिमा नेने
हिल रहल ठोर किछु कहबा लेल
प्रेरित क’ रहल किछु करबा लेल
कखनहुँ अहाँक कखनहुँ हमर
एहि लेल बाट निहारैत छथि
बस त्राहि-माम पुकारैत छथि
छथि कहथि देखू हमर ई दशा
शोणित सँ रंजित श्वेत वसन
नखसँ शिख धरि अछि जख्म भरल
लूटि रहल हमर अछि अमन-चैन
पंजाब,असम,गुजरात,आँध्र
कश्मीर सहित अन्यान्य प्रान्त
अछि सिसकि रहल भ’ भयाक्रान्त
छल कहियो
उत्तुंग गर्वसँ हम्मर सिर
प्रकृति प्रदत्त पावन कश्मीर
केसरिया सेब क’ रहल श्रृंगार
लहलह-हरियर बाग निशात
उज्जर बर्फशिला बाँटि रहल छल
शांतिकेर संदेश उधार
छल बहैत जतय शीतल समीर
चहुँदिस आब बरसैत अछि गोली
नहि खेलू, नहि खेलू रोकू ई खूनक होली
जाति-धर्मक उन्माद भड़का
जे उन्मादी अहाँकेँ लड़ाबैत छथि
हुनकर तँ कुरसीक प्रश्न छैक
मुदा की यैह अहाँक मानवता थिक ?
(18-08-2008,मैसूर)

३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .।
अंगप्रदेश
बिसरि जाउ
ओ कर्णक नगरी अंगप्रदेश
जतय
, जाहि सं जे मंगतहुं
स भेटतहि

कहियो विक्रमशिलाक
सन रहै
अहि ठाम विश्वविद्यालय
चारों दिशक लोक आबथि
शिक्षा लेबा लेल

एहि ठाम छैथ
मंदार पर्वत
जे अछि
समुद्र्मंथनक निशानी

अहि ठाम आयल रहथि
कवि रविन्द्रनाथ
ओ शरतचंद्रक नेनपन
एहि ठाम बीतल

मुदा
अंगप्रदेश क
s
ककर नजरि लागल
जे नहि ओ शान नहि ओ शौकत

दलमलित होइत छथि
अंगप्रदेशक आत्मा
आ बजबैत छथि
तारणहार उधारकर्ताक क
s.

परीक्षा
कहू वा नहि कहू
अलबल रीति
-रिवाज
युग
-युग सs
अपन समाजक कोइढ़ छथि

एक पावनि अछि
मधुश्रावणी
पत्नीक पतिव्रताक
सर्टिफ़िकेट लेल
होइत अइमे टेमी

जकरा कहैत छी
हम अर्धांगिनी
बारंबार दैत छथि परीक्षा
त्रेता मे सीता ओ अहिल्या
कलयुग मे होइत नित अग्निपरीक्षा

छी हम पुरुष
मुदा छी बड़ डरपोक
तहि स परीक्षा नहि दैत छी
नहि फ़ेलक चिंता नहि पासक

४ विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य ।
जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि:
1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि।
मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि।
प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:-
विविध भजनावली

६.

भजन भैरवी

आब मन हरि चरनन अनुराग।
त्यागि हृदयके विविध वासना दम्भ कपट सब त्याग॥
सुत बनिता परिजन पुरवासी अन्त न आबे काज।
जे पद ध्यान करत सुर नर मुनि तुहुं निशा आब जाग॥
भज रघुपति कृपाल पति तारों पतित हजार
बिनु हरि भजन बृथा जातदिन सपना सम संसार
रामजी सन्त भरोस छारि अब सीता पति लौ लाग॥

७.

॥ राग विहाग ॥

को होत दोसर आन रम बिनु॥ जे प्रभु जाय तारि अहिल्या जे बनि रहत परवान॥ जल बिच जाइ गजेन्द्र उबारो सुनत बात एक कान॥ दौपति चीर बढ़ाई सभा बिच जानत सकल जहान॥ रामजी सीता-पति भज निशदिन जौ सुख चाहत नादान॥

८.

चैत के ठुमरी

चैत पिया नहि आयेल हो रामा चित घबरायेल।।
भवनो न भावे मदन सताबे नैन नीन्द नहि लागल॥
निसिवासर कोइल कित कुहुकत बाग बाग फूल फूलल॥
रामजी वृथा जात ऋतुराजहि जौंन कन्त भरि मिललरामा॥
चित घबरायेल चैत पिया नहि आयल॥

९.

चैतके ठुमरी

आबि गेल चैत बैरनमा हो रामा विधि भेल वामा॥
लाले-लाले चून्दरी लगाय पलंगपर पियवा न अयल सपनमा॥
जौवन जोर आर भैल दिन दिन विष सन लागत भवनमा॥
रामजी जीवन वृथा एहि तनमे प्रभु कोन देखलो नयनमा॥

१०.

चैतके ठुमरी

आबि गेल सियाक खोजनमा हो रामा पवन सुअनमा॥
वरजि वरजि हारे सब निसिचर लड़त कौ न सयनमा॥
उपवन नास रिसाय लंकपति मेघवासे कहत बयेनमा॥
मारसि जनि सुत बान्हिके लाऊ रामजी बुझत कारनमा हो रामा॥

११.

महेशवाणी

सुनु सुनु चण्डेश्वर नाथ कृपा दृष्ट से एक वेर ताकहु हम छी परम अनाथ॥
देव दनुज भूपति कत सेबल कियो न दुखके साथ,
बड़े निरास आश धय रोपल अहाँक चरणमे माथ॥
भटकि-भटकि सबके रुचि बूझल सब स्वारथके साथ जे छथि
मित्र अपेक्षित परिजन सभै रखै छथि क्वाथ॥
नहि किछ वेदपुराण जनए छी नहि पूजाके भाव
निसि दिन चिन्ता उदरके फूसिफटकके बात।।
अहाँ दयालु दीनेपर सब दिन जनैत अछि संसार
रामजीके सकल मनोरथ पूर वहु भोला नाथ॥
(अनुवर्तते)
१. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
१. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस “राधा” जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर “विदेह”मे गुञ्जनजीक “राधा”क पहिल खेप।-सम्पादक। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक पढबाक लेल क्लिक करू बुधिबधिया। गुंजनजीक नाटक आइ भोर पढ़बाक लेल क्लिक करू “आइ भोर”।
गुंजनजीक राधा
विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल।
अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक ।
आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल-
जगमगाएल अछि। सुस्वागतम!
लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी।

राधा (दोसर खेप)
देह भेल पिजड़ा केहन निर्मम कतेक लाचार
ई मन सोन चिड़ै उड़वा लेल व्याकुल व्यग्र,
प्रतिपल झांटि-झांटि क’ पांखि
करइत शोनिते-शोनिताम
कोमल माधुरी फूल सदृश अपन देह।
चांगुर सुकोमल,
तुरंत जनमल नेना सन सुन्नर
आ जीवन-सृष्टि केर सद्यःसृजित आशा मनोरथक
नवीन मृदु माटि, पानि ,प्रकाश, पवन आ आगि
धधकि रहले देह पहरक पहर एक-एक श्वांस
केहन वज्रक देह केर पिजड़ा तथापि
जरि छुटितय
क’ दिअय फेर सं मुक्त
ओएह आकाश, मेघक श्याम स्निग्ध सतरंग
मास धोअल फहराइत सघन कारी केशराशि
झूमैत डारि-पातक हिड़ला-स्पन्दन !
स्वाधीन संगीतक मुक्ताकाश स्वच्छ
धोअल वस्त्रसन ई तन
जेना उधिया रहल वेग मे बहि रहल
दिव्य बसात पर निर्बंध निर्भय मुक्त आत्मालीन
किन्तु असह जे ई सब,
स्वप्नवत भ’ जाइत अछि सब बेर
खुजय नहि पिजड़ाक ई फाटक से पर्यंत
आ हमर ई मन ,कोमल पांखिक सामर्थ्य पर
सहैत सबटा लोक-समाज-सम्बन्ध केर
बोराक बोरा
ऊघि रहल छी अनेरे जे अनन्त
तेकर करय के हिसाब,
इस्स कियेक नहि टुटैये पिजड़ा
ने जरिये जाइत अछि
एहि देहक मुक्ति केर अकांक्षा आ उताप!
एकरा मे सं अनुपस्थित भ’ गेलय की
सबटा ज्वाला सबटा आगि ?
एहि दुर्बल देह व्याकुल मनक
ल’ लेलक की आश्रय ?
भ’ गेलय निश्चिन्त
चलि गेलय कुटमैती मे कोनो गाम
तेहन भेल आब समय जे प्रकृति सेहो
छोड़ि रहले धर्म
जल करय नहि तृप्त प्यासल कंठ,
करय ने शीतल बसातो तन
अग्नि छोड़ल धर्म नहि तं जरा ने दितय
हमर पिजड़ाकें, ई जीवन
धन्य धरि आकाश
अछि टीकल अनोन-बिसनोन, धनिसन
महाश्वेती आक्षितिज नीलाभ छाता
तनल अछि आद्यन्त,
ककरा लेल कहि नहि
ल’ लेने अछि गंहीर दीर्घ शवासन
ओहो नहि रहि गेल कोनो कार्यक
एहि लाचार लेल
बनि गेलए जेना कोनो अथबल माय,
करैत विलाप मनेमन अपन असक्त ममता
निष्प्रयोजन निरुपाय होयवाक नियति पर …
(८/४/०५)

२.श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ – ०७ – १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ”हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन।

दुनियॉं
दुनियॉं कृतघ्नक डेरा छै,
पापी – अधमक इ बसेरा छै।
उपकार करु अपकार करत,
खायत मधुर कुप्रचार करत।
बाजय जे झूठ सगरो – सदिखन,
स्वयं सत्यक ओ अवतार कहत॥
देखू जे सत्य अछि बाजि रहल,
ओकरे खातिर ई घेरा छै।
दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै,
पापी – अधमक ई बसेरा छै।
पापी – कृतघ्न के देखि देखि,
दुनियॉं नहि एखनो चेत सकल।
सत्‌युग, त्रेता, द्वापर, कलियुग मे,
देखि रहल छी वैह विकल।
धन शांति क्‌ऽ माध्यम होयत कोना,
त्रेता मे देखलहुं सोन जरल।
विद्या – बल सत्य सं दूर रहल,
रावण – कौरव बेमौत मरल।
जे दूर सत्य सं भागि रहल,
दुनियॉं इ कांट क घेरा छै।
दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै,
पापी – अधमक ई बसेरा छै।

३. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
कल्पनालोक
कल्पनालोकमें विचरण करै छलहुँ उन्मुक्त
सबतरहक विषाद जतऽ भऽ गेल छल लुप्त
आह्लादित हृदय सेहो रहय विस्मयसॅं युक्त
प््राशंसामें स्वर्ग शब्द लागल सबसऽ उपर्युक्त

कोनो भूमि नहि भेटल जे छल कलह सॅ लिप्त
थम्हलहुँ जत कतौ छल स्नेहक जलसॅंऽ सिक्त
आरोग्यक कचोर रंग सर्वत्र छल पल्लवित
ताहि पर खुशी कोमलतापूर्वक रहय पुष्पित

शान्ति तेहेन जे देलक अपूर्व आत्मसंतोष
दूर-दूर तक नहिं कतौ देखायल आक्रोश
एहनो दुनिया हैत कतौ से नहिं छल भरोस
जाहि सॅं दुखी छलहुँ से मेटायल सब रोष

वास्तविकता अछि अलग से तऽ स्वयंसिद्ध
समस्या सॅं जूझैत सब, की बच्चा की वृद्ध
कल्पनाक साकार भेनाई अछि अहिमें निमित्त
घर-घर जहन लोक हैत शिक्षित आ समृद्ध।
1.भक्तिगीत 2. महाभारत
प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत)
हाल बचपनसँ पचपन तक


छोट-छोट धीया पुताक चंचलता,
पूरा परिवारक प्रसन्नता,
देख-देख खुशीक नयनसँ खसए अछि नोर
बुझबामे नञि आबए अछि
कखन भेल साँझ कखन भेल भोर,

• * *
नाना-नानी, मामा-मामी, बाबा-मैञा, कक्का-काकी, हिनकर लोकनिक एकटा प्यार
मा-पिता, संग पूरा समाज मिल रखने छथि हजारो नाम
कियो कहए नवनीत-निराला, कियो कहे मिकुन्द कुमार,

हिनकर छोट भऽ कनिओ कम नञि
हिनकर नाम छन्हि दर्शन
पढ़ाईमे छथि एकदम जीरो
पैघ भऽ बनता डॉक्टर एन्डरसन।

बचपनमे तोतराइत बोली सुनबालेल लगेने रहए छथि सभ आस
मुदा एहि युगक नेना जनमैते
पहिलेसँ रहए यऽ बी.ए. पास।

हाट-बजार लगेने बौआक फरमाइस रहए छनि सभसँ भिन्न
भात-दालि सभसँ पैघ दुश्मन
सदिखन खएता मैगी-चौमीन

जिन्स पैन्ट कारी चस्मा पहिरि
अपनाकेँ बुझए पैघ हीरो
अपन आगूमे दोसर बच्चाकेँ
बुझता एकदम जीरो

स्कूलक चरचा ज्यौँ करियौ तँ
हिन्दी मीडिअमसँ नञि पढ़ताह
अंग्रेजी स्कूलमे पढ़ि ओऽ
इन्जीनिअर-डॉक्टरक सपना देखताह

आइ काल्हिक बच्चाकेँ छञि
स्कूल जाइ लेल एसिसटेन्स आऽ कार
पापा कपड़ा, जूता पहिराबथि
माँ केक टॉफी भरि
कऽ रहल छथि टिफिन तैयार

बौआ स्कूलमे पढ़ए छथि
बुझिऔ सभटा भगवान भरोसे
परीक्षामे फेल भेलाऽ पार
पेरा-लड्डू भेटए छनि सौँसे

बच्चाक असफलता देखि
माँ-बाप पित्ते कपार
एखन तँ शुरुआते भेल अछि
पैघ भऽ पिअत शराब

बेटा कहिआ रुपैआ कमाएत
तकर रहए छनि , सभ गोटेकेँ इन्तजार
नीक पुतोहु, नीक परिवार आर पाँच लाख दहेज लेबा लेल
बरका रहए छनि बोगली तैयार

जखन आबए छनि, पुतोहु हेमामालिनी सन
देखबनि हुनकर साज-शृंगार
थोर लिपिस्टिक, आँखिमे काजर
बिच अँगनामे माथ-उघार

एखन आबि गेल मोबाइलक जमाना
मिनटे-मिनटे घण्टी बाजए
अपने-कमाइत छथि दिल्ली-मुम्बई
बिन बात केने किए छनि भेटे

बुरहारीमे माँ-बाप के कहए
अहाँ सभ बनल छी कण्ठक घेघ
अर्द्धांगिनीकेँ प्रसन्न रखबाऽ लेल पकड़ाबथि
हस्ताक्षर कएल ब्लैंक चेक

आब कतेक वर्णन करी जमानाक
सभ मिलि दुयओ बातपर ध्यान
माँ-बाप भगवानोसँ पैघ
हुनका लोकनिक करियन्हु सम्मान

सभक एक दिन आएत बुरहारी
जेहने करबए तेहने फल पाएब
स्वर्ग नरक एतए भेटत
कतबू करब तीर्थ वा गंगा नहाएब

लिखते-लिखिते कलम रुकए कऽ
नञि लए कखनो नाम
प्रकाशक बातपर ध्यान देलापर
अहाँ कहब मिथिला महान

2. महाभारत
महाभारत (आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
७. द्रोण-पर्व

रात्रिमे दुर्योधन कएलक प्रण
अर्जुनक मृत्युक भेल आवाहन,
कर्णकेँ सेनापति बनाए कएलन्हि
कौरवक गण सोलहम दिनक युद्धक प्राअरम्भ।

कर्णक शंखध्वनिसँ भेल युद्ध शुरू,
कर्णक तापसँ युद्धभूमि स्तब्ध,
नकुल सोझाँ पाबि अपघात छोड़ल प्राण
कुन्तीक देल कर्णक वर प्राणदान।

कृष्णक आवाहन अर्जुन अहाँकेँ छोड़ि,
क्यो नञि कए सकत विजय कर्णक ऊपरि,
वीगसँ जे बढ़ल अर्जुन आगाँ भेल शुरु बरखा,
बरखा वाणक कौरवगणक अर्जुनक समक्ष,
मुदा अर्जुनक सोझाँ सभ भेलाह पस्त,
मुदा तखने भेल सोलहम दिनक सूर्यास्त।

रात्रिमे कर्ण कहलन्हि हे मित्र दुर्योधन,
अर्जुनक रथमे होइछ ढेर-रास शस्त्रक अटावेश,
गाण्डीव आऽ अक्षय तूणीरक नहि कोन्पो जोड़,
हुनकर अश्वक गति नहि कोनो थोड़ कृष्ण सन सारथी।
शल्य बनथि हमर सारथी यदि होएताह ओऽ कृष्णक तोड़,
मुदा शल्य कहलन्हि अछि हमर मुँहपर नहि जोड़,
कर्णकेँ से होए स्वीकार तँ हमरा कोनो हर्ज नहि।

सत्रहम दिनुका युद्ध भेल शुरू कर्णक आक्रमण शुरू,
अर्जुन बढ़ल आगू शल्य कहल भिरू महाप्राक्रमीक अर्जुनसँ,
कर्ण देखलन्हि भीमकेँ करैत संहार चलू शल्य ओहि पार,
भीमक रूप आइ प्रचण्ड छोड़ल वाण चीड़ि कवच कर्णक गाँथल देह,
अचेत कर्णकेँ लए भगलाह शल्य रणभूमिक कात-करोट।
देखि ई दृश्य भीम भेलाह आर तीव्र,
दुर्योधन हुनकर सोझाँ पठाओल दुःशासन वीर।
गदा युद्ध दुहुक मध्य छल भेल भयङ्कर,
भीमक मस्तक प्रहार खसल मूर्छित दुःशासन।
भीम हाथ उखाड़ि पीबय लागल छातीक रक्त,
भागल कौरवसेना देखि दृश्य एहि तरहक।
आब सोझाँ-सोझी अर्जुन कर्णक युद्ध आइ शुरू,
कर्ण काटल गांडीवक प्रत्यंचा यावत दोसर चढ़ाबथि,
कएल वाणसँ आक्रमण अर्जुन कोहुना कए प्रत्यंचा चढ़ाओल,
वाण-वर्षा अर्जुनका जखन भेल शुरू, कर्ण शल्य भेलाह चोटिल,
कर्णक सहायक सेना भेल नष्ट कर्ण अति व्याकुल।
छोड़ल कर्ण वाण दिव्य अर्जुनपर कृष्ण कएलन्हि अश्वकेँ ठेहुनपर ठाढ़,
अर्जुनक मुकुटकेँ छुबैत ओऽ अर्जुनक प्राणक संकट भेल पार।
तखनहि कर्णक रथक पहिया धँसल युद्ध मध्य,
कर्णक पुकार कनेक काल वाण नहि चलएबाक धर्मक ई युद्ध,
विराटक गौक चोरि अर्जुन कहलन्हि आऽ अभिमन्युकेँ मारैत काल,
धर्म आऽ धर्मयुद्धक बिसरल छलहुँ अहाँ पाठ,
प्राणक भिक्षा मँगैत लगितहु अछि नहि लाज।
कर्ण उतरि लगलाह रथक पहिया निकालए,
अर्जुनक वाण काटल मस्तक कौरवमे हाहाकार भारी।
दुर्योधनक सभ भाँयकेँ मारने छालाह भीम तावत,
एगारह अक्षौहिणीमे सँ बड़ थोड़ कौरव छल बाँचल,
कृपाचार्य बुझओलन्हि दुर्योधन आबो करू सन्धि,
मुदा ओऽ कहल हम अहाँ कृतवर्मा अश्वत्थाम आऽशल्य अछैत,
सन्धिक गप छी अहाँ करैत।
शल्य बनथि सेनापति युद्ध अठारहम दिन रहत जारी।

९.शल्य-पर्व

शल्यक भेल उद्घोष ओकर बढ़ल पग युधिष्ठिर छल रोकल।
शल्य जखनहि काटल हुनकर एक धनुष,
युधिष्ठिर उठाए दोसर धनुष मारल शल्यक अश्व आऽ सारथीकेँ,
भेल तखन घमासान युधिष्ठिर लेलन्हि शल्य प्राण,
सहदेव छुटलाह शकुनि आऽ ओकर पुत्र उलूकपर,
लेलन्हि बाप-बेटाक प्राण जुआरीक प्राणान्त।
गदा लए दुर्योधन निकलि गेलाह छोड़ि रण,
एकटा सरोवर मध्य छल स्तंभ नुकाएल ओतए दुर्योधन,
देखलन्हि जाइत हुनका किछु ग्रामीण।
पाण्डवक संग कृष्ण पहुँचलाह ओतए,
किछु ग्रामीण जे देलन्हि पता ओतएक,
भीम देलक ललकारा दुर्योधन निकलि आएल,
तीर्थसँ घुरैत बलराम सेहो पहुँचलाह ओतए आइ।
शिष्य दुर्योधनकेँ दए आशीर्वाद कएल गदा युद्धक शुरुआत,
भीम दुर्योधनक बीच बाझल युद्ध घनघोर,
कृष्ण देल जाँघपर थपकी मोन पाड़ल भीमकेँ ओकर प्रतिज्ञाक,
तोडि जाँघक हड्डी कए मस्तकपर दुर्योधनक गदा-पएरसँ प्रहार,
भीमक ई कृत्य छुटलाह बलराम ओकरा पर मार-मार,
कृष्ण रोकि दाऊकेँ मोन पाड़ल द्रौपदीक अपमान,
भीमक प्रण।
छोड़ि दुर्योधनकेँ असहाय,
गेलाह सभ पाण्डव भाय।
संध्या समय कृतवर्मा कृपाचार्य आऽ अश्वत्थामा
पहुँचि देखल दुर्योधनक दुर्दशा आऽ प्रलाप,
भीमक पादसँ दुर्योधनक मस्तकपर प्रहार,
सुनि ई कथ्य अश्वत्थामा लेल पाण्डवक वधक व्रत,
दुर्योधन कएल अश्वत्थामाक सेनापति रूपमे अभिषेक,
कृतवर्मा कृपाचार्य आऽ अश्वत्थामा बढ़लाह पाण्डव-शिविर समक्ष।

१०.सौप्तिक पर्व
कृष्न लए पांचो पांडवकेँ गेलाह कतहु अन्यत्र।
पाण्डव-शिविरक समक्ष एकटा वृक्ष,नीचाँ सुतलाह कृपा आऽ कृत,
अश्वत्थामाक आँखिमे निन्नक नञि लेष, देखल एकटा पक्षी अबैत,
ओहि वृक्षपर कौआसभ सुतल मारि रास, केलक ओऽ पक्षी सभक ग्रास।
देखि ई दृश्य अश्वत्थामा उठाओल कृपाचार्य ओऽ कृत,
भोरक बाट ताकब नहि सुबुद्धि, ई अधर्म कहल कृप,
मुदा अश्वत्थाम चलि पड़ल शिविर दिश,
हारि पहुंचल पाछाँ-पाछाँ कृत-कृप,
हम पैसैत छी भीतर शिविर,
बाहर होइत सभकेँ प्राण लिअ अहाँ दुनू गोटे,
एतए ठाढ़ लग द्वार।
सभ पांचाल धृष्टद्युम्न शिखण्डी समेत,
द्रौपदीक पाँचू पुत्रकेँ बुझि पाण्डव देल मारि,
अश्वत्थामा देल शिविरकेँ आगिसँ जराए।
फेर पहुँचि लए द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
दुर्योधन देखि माँगल भीम माथ,
ओकर मुष्टिकाक प्रहारसँ मस्तक भेल फाँक,
नहि ई नहि भीमक माथ,
भोरमे देखल द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
कानैत हाक्रोश करैत भेल दुर्योधनक प्राणान्त।
भोरमे कॄष्ण पहुँचलाह पाण्डव-द्रौपदीक संग,
देखि विनाश भीम चलल अश्वत्थामाक ताकिमे,
छल ओऽ गंग तटपर ब्यासक समक्ष,
युधिष्ठिर-अर्जुन संग कृष्ण पहुँचल जाए,
पाण्डवक नाशक संकल्प संग अश्वत्थामा छोड़ल ब्रह्मशिरा अस्त्र,
अर्जुनक छोड़ल पाशुपत महास्त्र अग्नि वृष्टि सँ सृष्टिक विनाश,
बीचमे अस्त्रक अएलाह नारद आऽ ब्यास,
आग्रह करैत जे दुनू गोटे लिअ अपन-अपन अस्त्र सम्हारि,
अर्जुन लेलन्हि अपन अस्त्र सम्हारि मुदा,
अश्वत्थामा कहल नहि घुरि सकत हमर अस्त्र आइ,
ऋषिक प्रतिकार ब्रह्मशिरासँ होएत उत्तराक गर्भक नाश,
मुदा अश्वत्थामकेँ देमए पड़त मस्तकक मणि,
भेल ओऽ निर्बल तपस्वी ब्यासक आश्रममे जीवन सकल।

११.स्त्री पर्व

दुर्योधनक पत्नी भानुमति छलि अचेत, गांधारी करथि विलाप,
धृतराष्ट्र मूच्छित विदुरक हाक्रोश, पाण्डव घुरल अश्वत्थामाक मणि संग,
कृष्ण लेलन्हि लौहक भीमक स्वांग धृतराष्ट्र पहुँचल कुरुक्षेत्र वधू सभक संग।
भीमकेँ गर लगाए कएल ओकरा चूर्ण भेल भीम-भीम कहैत प्रलाप,
कृष्ण कहल नहि कानू हे धृतराष्ट्र, छल ई लौहक भीम मात्र,
गांधारी देल कॄष्णकेँ शाप,
जेना कएल अहाँ हमर वंशक नाश,
होएत अहूँक कुल नष्ट।
मृतकक दाह संस्कारक संग एक पक्ष समाप्त।

१२. शान्ति पर्व

युधिष्ठिरक मोन विखिन्न, छोड़ल राज-पाटक विचार,
ब्यास आबि देलन्हि उपदेश, पलयन नहि अहाँक मार्ग।
धौम्य कए वेद मंत्रक गाण राजतिलक युधिष्ठिरकेँ लगाएल।
फेर पहुँचि भीष्मक समक्ष लेल अनुशासनक शिक्षा,
राजधर्म,लोकधर्म मोक्षधर्मक ज्ञान, प्रजापालन,
उठि प्रदेश जातिक विचारसँ ऊपर, राजाक व्रतक करू परिपालन।

१३.अनुशासन पर्व

आएल ओऽ काल जखन सूर्य भेलाह उत्तरायण,
पहुँचलाह युधिष्ठिर संग माता-गांधारी-कुन्ती, धृतराष्ट्र भ्राता संग,
अट्ठावन दिनक शर-शय्याक अन्तिम उपदेश आऽ महाप्रयाण,
चाननक चितापर भीष्मकेँ युधिष्ठिर देल आगि सभ आक्रान्त।

१४.आश्वमेधिक पर्व

हस्तिनापुरक राज्यमे आएल सुख समृद्धि,
युधिष्ठिरक कौशल कएल आशाक वृद्धि,
उत्तराकेँ तखने भेल मृत-पुत्रक प्राप्ति,
सुभद्रा खसलि कृष्ण लग जाए।
कृष्ण उठाए बालकेँ कहल हम नहि कएल पलायन,
सत्यसँ सम्बन्ध रहल बनल, पराजित शत्रु कए नहि भेलहुँ हिंसक,
यदि ई सत्य तँ बालक जीबि उठथि।
ई सुनितहि शिशु भेल जीवित नाम पड़ल परीक्षित।

फेर कएल युधिष्ठिर यज्ञ अश्वमेध,
सिलेबी अश्वक गरमे स्वर्णपत्र,
जिनका युधिष्ठिरक राज्यसँ परहेज,
से पकड़ि घोटक करथि एकर विरोध।
मुदा घुरि आएल अश्व निष्कंटक,
यज्ञ भेल समाप्त निर्विघ्न।

१५.आश्रमवासिक पर्व

बरख पन्द्रह बीतल तखन अएलाह ब्यास,
देल उपदेश धॄतराष्ट्र लेल वानप्रस्थ धर्मक ज्ञान,
गांधारी, कुन्ती विदुर संजयक संग हिमालय प्रयाण,
विदुर लेलनि वनहिमे समाधि,
दावाग्नि लेलक शेष सभक प्राण।

१६.मौसल पर्व

कृष्ण युद्धक बाद गेलाह द्वारका,
छलथि प्रप्त कएने सम्मान,
मुदा यादव राजकुमार,
करथि अपमान विद्वानक,
मारि-काटि करथि आपसमे खत्म,
देखि दुखित बलराम प्रभासतीर्थ जाए,
ओतहि लेल दाऊ समाधि,
कृष्ण पहुँचि देखि हुनकर प्राणान्त,
गाछ पकड़ि रहथि ठेहिआए,
ब्याध जकर छल जरा नाम,
हरिण बुझि पैरक तलवामे मारल वाण,
भेल कृष्णक प्राणान्त,
सुनि ई समाचार मृत्युक वसुदेवक,
पिता वासुदेव सेहो कएल जीवनक अन्त।

१७.महाप्रास्थानिक पर्व

कृष्णक मृत्युक समाचार,
पाण्डवराज युधिष्ठिर देल परीक्षितकेँ राज,
सुभद्रा केँ दए उपदेश,
संग द्रौपदी पहुँचल द्वारका पाँचू भाए।
ओतए डूबल समुद्रमे छल ओऽ नगरी,
घुमैत फिरैत चललाह हिमालय सभ गोटे।
एक कुकुड़ छल संग चलैत ओतए,
हिमालय वृहदाकार हिमपातक मारि,
द्रौपदी खसलि मरलि , फेर सहदेव,
नकुल अर्जुन भीम खसि मरल फेर-फेर।
आगाँ देवलोकक रथ छल ठाढ़,
इन्द्र कहल चलू असगर सशरीर युधिष्ठिर,
ई कुकुड़ नहि रहए साथ।
युधिष्ठिर नहि मानल घुरि जाऊ इन्द्र,
बिन एकर नहि जाएब ओतए होए स्वर्ग अहि।
छल ओऽ कुकुड़ यमराज स्वयं,
प्रकट भए देल ओऽ आशीर्वाद ओतए।

१८. स्वर्गारोहण पर्व

पहुँचि स्वर्ग देखल कौरव गण सभ ओतए,
इन्द्र हमर भ्राता छथि कतए।
तखन एकटा दूत लए गेल हुनका नर्कक द्वारपर,
द्रौपदी संग पाँचू भाए छलाह ओतए।
कहल युधिष्ठिर हम रहब एतहि हे दूत,
छोड़ि हिनका जाएब नहि कतहु।
इन्द्र यम पहुँचि गेलाह ओतए।
यम कहल यक्ष कुकुड़ बनि हम अहाँ परीक्षा लेल,
आइ एहि तेसर परीक्षामे सेहो अहाँकेँ उत्तीर्ण कएल।
ई अछि देवलोक मुदा सदेह राजाकेँ,
एतुक्का कष्ट देखक लेबाक चाही शिक्षा तेँ,
किछु कालक कष्ट हम अहाँक देल।
छोड़ू ई शरीर लिअ दैवी रूप आब,
कहैत यमक भेल ई परिवर्तन,
कर्ण सेहो ओतए बारह आदित्यक संग,
रत्नजटित सिंहासनपर छल विराजमान
भारतक युद्धक काव्यक समापन।
(समाप्त)
बुद्ध चरित

ई पुरातन देश नाम भरत,
राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज।
एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन,
पत्नी माया छलि,
कपिलवस्तुमे राज करथि तखन।

(अनुवर्तते)
1.श्री डॉ. पंकज पराशर 2. शैलेन्द्र मोहन झा
श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
न्याय जारी अछि
(सद्दाम हुसैनकेँ देल गेल मृत्युदण्डपर)

सुभाषितानि आ नीतिश्लोकाः मे आब नहि बाँचल
एक्को टा न्यायाधीश वानर
अपन इनसाफी बटखराक संग
आब ओ सब देखल जा रहल-ए आख्यानसँ बहरा कऽ
सुच्चा वर्तमानमे

वर्तमानक अर्थ जँ सुपरसोनिक विमानसँ
गणेशजीक दुग्धतृषा धरि जोड़ि सकी
आ अर्थ लगा सकी कोनहुना उच्च तकनीकसँ संपन्न
सुपर कंप्युटरपर लागल सेनुरक ड़ाँड़ि के बीच
तँ शायद वर्तमान शब्दक किछु अर्थ ताकल जा सकैत अछि

कलस्टर बमक प्रहारसँ दुनिया भरिमे
लोकतंत्र स्थापित करबाक प्रयासमे अपस्याँत महाशक्ति
क्षणे-क्षण अपन बयान बदलैत एकर कारण
कहुखन ईश्वरीय आदेशक पालन कहैत अछि
तँ कहुखन व्यापक विनाशक हथियारक उत्पादन

जानि नहि कोन-कोन न्यायाधीशक निर्णय आयब
एखन बाँचल अछि

जानि नहि हमरा सबहक छाती
ककरा-ककरा बंदूकक लेल आरक्षित अछि
आ घर पेट्रोल बमक घेरामे आबि चुकल अछि

लोकतंत्र स्थापनाक प्रयासपर कोनो तरहक टिप्पणी
न्यायालयक गंभीर अवमानना मानल जायत
आ न्यायाधीश केर नियोक्ताक संग नहि देब-शत्रुता

सावधान! दुनियाक खास-ओ-आम
न्यायाधीशक न्याय जारी अछि।

बोनिहारि मोनक आर्तनाद
डिल्ली-पैंजाबक लेल जहिया-जहिया निकलैत अछि
झुंडक-झुंड युवक सब बटखर्चाक लेल बान्हल
दालिपुड़ी आ ठकुआ-पकमानक संग
तँ नोसि जकाँ भरि लैत छी नाकक पूरामे सबटा गंध

लाहक लहठीसँ भरल हाथसँ बान्हल मोटरीपर हड़बड़ीमे
अभरल हरदियाएल हाथक आँगुरक छाप
भरिसक सओन-भादवक रातिमे हेतैक कनेँ-कनेँ मलिन
वा सेहो नहि कोना कहि सकब

बाटक बाँचल दुटप्पी
जे टमटमपर टीसन धरि चलैत अछि अनवरत
ताहिमे बेर-बेर हुलकी मारैत अछि पैंजाबक चर्च के बीच
मासूलवला टाकाक कर्जा आ पछिले वर्षसँ सूदभरना लागल
अगदुआरिवला खेतक हियास

मोन कइक युगसँ कऽ रहल अछि आर्तनाद
बाटसँ बेशी मोनमे चलैत अछि अगदुआरिवला खेतक चर्च
जहिया-जहिया हफीमक निसांमे
बड़द जकाँ खटैत अछि तीन बहीन परक दुलरुआ हमर दोस
जिला संगरूरक साकिन जस्सियामे
• * * *
शौचालयक कातमे कोनहुना ठाढ़ हेबाक ठाम तकैत
ओ जखन नाकक क्रियाशीलताक सँ होइत अछि पीड़ित
तँ तकैत अछि गामसँ लऽ कए ट्रेन धरि कनेकोँ टा स्थान
मुदा स्थानासीन लोकक शंकित दृष्टिसँ विद्ध
ओ बिलमैत अछि गामहि जकाँ एतहु कोनो करौटमे भरि राति

मोनमे कइक युगसँ दमित अछि स्थानक आस

पिंडदानक संदर्भमे सुनल पिंडक अर्थ जखन ओ सुनैत अछि-गाम
तँ गामक बाहर बसनिहार ओकरा एतहु जगह भेटैत छैक
पिंडसँ बाहर खेतक बीचमे बनाओल “कोठा”मे
पुरना ट्रैक्टरक टायर आ खाद-बियाक बोरा सबहक बीच

दुनिया मायक कोर नहि होइत अछि आ नहि घरक बिछाओन
जतय कोनो तरहक चिन्ताक स्थान नहि छल
ओ सोचैत अछि अपन राज्यक संज्ञाकेँ एकटा गारि जकाँ सुनैत

कोनो अताहि हरवाह जकाँ ओकरा बड़द बुझि
जखन मारैत अछि पैंजाबक किसान
जल्दी करो, जल्दी करो- केर पेना
तँ अदार बाछा सन मोनपर अभरि अबैत अछि- दाग

ओ सोचैत अछि करनिनिया रातिमे
सब लोक सबहक लेल लोके नहि होइत छैक

घरमुहाँ मोन बेर-बेर ढरैत अछि
बितलाहा समय केर बाट

जाहि गाममे ओ जनमल-बाढ़ल
जाहि माटिमे लोटबैत भेल जुआन
ताहि ठाम ककर-ककर नहि कयलक बेगारी आ हरवाही
मुदा तइयो नहि भेटलैक कोनो स्थान, कोनो मान
आ गाममे भरि पेट भोजन दुनू साँझ

मासूलवला टाका अगदुआरिवला खेतमे मिज्झर होइत
ट्रेनक यात्रा संग हरदियाएल हाथक कँपकँपी
घिंघोरल रंग जकाँ ओकरा आँखिमे नचैत रहैत छैक
आ निन्नकेँ फुसलयबाक ओकर सबटा प्रयास
व्यर्थ भऽ जाइत अछि अक्सरहां

तेरह मासक ओकर कन्हकिरबा आब कतेक टा भेल हेतैक
कतेक बदलल हेतैक ओकरा परोक्षमे गामक मोनक भूगोल
चिन्हार चीज सब कतेक भऽ गेल हेतैक अन्चिन्हार
आ आस्ते-आस्ते कतेक भेल हेतैक टोलक पसार

कतेक रास स्वप्न आ कतेक रास प्रश्नक संग
ओ घुरैत अछि मोनमे बसल गाम
असंख्यक रातिक हियास लेने
माथपर भारी बक्शाकेँ फूल सन हल्लुक बुझैत

बुढ़ियाक खिस्सा सुनू… बुढ़ियाक खिस्सा…
ने ओ नगरी ने ओ ठाम… ने ओ नगरी ने ओ ठाम…

मोन अहर्निश करैत रहैत अछि आर्तनाद

बरगंडीसँ सोलगंडी सेरक यथार्थ धरि बढ़ल गाम
शनैः शनैः होइत गेल अनचिन्हार
आ बोनिहारी मोनक गाम घुरबाक आकुलतापर
होइत गेल वज्रपात।

2. शैलेन्द्र मोहन झा
रसमय कवि चतुर चतुरभुज- विद्यापति कालीन कवि। मात्र १७ टा पद्य उपलब्ध, मुदा ई १७ टा पद हिनकर कीर्तिकेँ अक्षय रखबाक लेल पर्याप्त अछि। उदाहरण देखू-दिन-दिन दुहु-तन छीन, माधव,एकओ ने अपन अधीन।
हे कृष्ण! दिनपर दिन दुनूक तन विरहसँ क्षीण भेल जाऽ रहल अछि, आऽ दुनूमे केओ अपन अधीन नहि छथि।
“विदेह” प्रस्तुत कए रहल अछि आधुनिक रसमय कवि शैलेन्द्र मोहन झाक रचना।

सौभाग्यसँ हम ओहि गोनू झाक गाम, भरवारासँ छी, जिनका सम्पूर्ण भारत, हास्यशिरोमणिक नामसँ जनैत अछि। वर्तमानमे हम टाटा मोटर्स फाइनेन्स लिमिटेड, सम्बलपुरमे प्रबन्धकक रूपमे कार्यरत छी।

हम तऽ छी परदेशमे
-किछु दिन पहिने हमर विवाह भेल छल आर ई गीत हम अपन कनियाँ लेल, जेना लिखल आर गायल बुझाइत छल, लिखि पठाओल। मुदा दुःखक गप ई जे प्रचंड बाढ़िक कारण हुनका प्राप्त नहि भेल।
हम तऽ छी परदेशमे,
गामपर निकलल होएत चाँद
अपन रातिके छतपर कत्तेक,
असगर होयत चाँद यौ
हम तऽ छी…
जाहि आँखिमे काजर बनि कयऽ
हेलै अन्हरिया राति
ओहि आँखिमे, नोरक एकटा
बूँदे होयत चाँद यौ
राति तऽ ऐहन पेंच लगौलक,
छूटल हाथसँ डोरि
अपन आँगनक नीममे जा कयऽ
अटकल होएत चाँद यौ
चाँद बिना दिन अहिना बीतै
जेना युग बितल
हमरा बिना कोन हालमे होएत
केहन होएत चाँद यौ
हम त छी परदेशमे,
गामपर निकलल होयत चाँद
गे

गे छौड़ी कनि तकिहैं गे,
एम्हर कनि तकिहैं गे….
तोरा लऽ हृदय बेकरार गे ऽऽऽऽ
केश छौ कारी-कारी
ई यौवन भारी-भारी
असगर सम्हरतौ कोनाऽऽऽऽ
आँखि मदिराक प्याला
ठोढ़ तोहर मधुशाला
पीबय दे हमरो कनिऽऽऽ
बातसँ मिसरी चूबै
मन तऽ आँखिमे डुबै
पार उतरबै कोनाऽऽऽऽ
चाल छौ हिरणी जेहन
जहर तोहर, बिढ़नी जेहन
जहर उतरतै कोनाऽऽऽ
गालमे सूरज उगै
केशमे सूरज डुबै
दिन राति बशमे तोराऽऽऽ
गें छौड़ी कनि तकिहैं गे
एम्हर कनि तकिहैं गें
एम्हर कनि तकिहें गें
तोरा लेल हृदय बेकरार गेऽऽऽ
१.(कोसी लोकगीत)(बिहार की नदियाँ, सहृदय, १९७७, पृ.३७२-७३)
मुठी एक डँड़वा गे कोसिका अलपा गे बयसवा
गे भुइयाँ लौटे नामी-नामी केश
कोसी मय लोटै छौ गे केश॥
केशवा सम्हारि कोसी जुड़वा गे बन्हाओल
कोसी गे खोपवा बन्हाओल
ओहि खोपवा कुहुकै मजूर।
उतरहि राज से एलेँ हे रैया रनपाल
से कोसी के देखि-देखि सूरति निहारै
सूरति देखि धीरज नै रहै धीर॥
किये तोरा कोसिका चेकापर गढ़लक
किये जे रूपा गढ़लक सोनार॥
नै हो रनपाल मोहि चेकापर गढ़लक
नै रूपा गढ़लक सोनार
अम्मा कोखिया हो रनपाल हमरो जनम भेल
सूरति देलक भगवान
गाओल सेवक जन दुहु कर जोरि
गरुआक बेरि होउ न सहाय, गे कोसी मैया
होउ न सहाय॥
२. (कोसी लोकगीत, मोरंग, नेपाल)(नदियाँ गाती हैं, ओमप्रकाश भारती, २००२, पृ.१०८)
सगर परबत से नाम्हल कोसिका माता,
भोटी मुख कयेले पयाम

आगू-आगू कोयला वीर धसना खभारल,
पाछू-पाछू कोसिका उमरल जाय
नाम्ही-नाम्ही आछर लिखले गंगा माता,

दिहलनि कोसी जी के हाथ
सात रात दिन झड़ी नमावल
चरहल चनन केर गाछे ये
चानन छेबि-छेबि बेड़ बनावल,
भोटी मुख देव चढ़ी आय ये
गहिरी से नदिया देखहुँ भेयाउन
तहाँ देल झौआ लगाय
रोहुआक मूरा चढ़ी हेरये कोसिका,
केती दूर आबैय छे बलान
मार-मार के धार बहिये गेल,
कामरू चलल घहराय
पोखरि गहीर भौरये माता कोसिका,
कमला के देल उपदेस
माछ-काछु सब उसरे लोटाबय,
पसर चरयै धेनु गाय
गाइब जगत के लोक कल जोरी,
आजु मइआ इबु न सहाय।
३.(कोसी लोकगीत)(कोसी लोकगीत- ब्रजेश्वर,१९५५)
रातिए जे एलै रानू गउना करैले,
कोहबर घरमे सुतल निचित!
जकरो दुअरिया हे रानो कोसी बहे धार
सेहो कैसे सूते हे निचित॥
सीरमा बैसल हे रानो कोसिका जगाबै
सूतल रानो उठल चेहाय॥
काँख लेल धोतिया हे रानो मुख दतमनि
माय तोरा हंटौ हे रानो बाप तोरा बरजौ
जनु जाहे कोसी असनान॥
हँटलौ ने मानै रानो दबलौ ने मानै
चली गेलै कोसी असनान॥
एक डूब हे कोसी दुइ डूब लेल
तीन डूब गेल भसियाय॥
जब तुहू आहे कोसिका हमरो डुबइबे
आनब हम अस्सी मन कोदारि॥
अस्सी मन कोदरिया हे रानो बेरासी मन बेंट
आगू आगू धसना धसाय॥
स्व.रामकृष्ण झा “किसुन” (१९२३-१९७०)
कोशीक बाढ़ि(किशुन रचनावली, तेसर खण्ड, मैथिली अकादमी)
आबि रहलै बाढ़ि
अछि उद्दाम कोशीक धार
आबि रहलै बाढ़ि ई
अति क्षुब्ध/ मर्यादा-रहित सागर सदृश
उछलैत/ लहरिक वेगमे
भसिया रहल छै काश वा कि पटेर, झौआ, झार
गाछ, बाँस कतहु
कतहु अछि खाम्ह, खोपड़ि
खढ़ कोरो सहित फूसिक चार
आबि रहलै बाढ़ि अछि उछाम कोशीक धार
बचि सकत नहि एहिसँ
डिहबार बाबा केर उँचका थान
वा कि गहबर सलहेसक
आ रामदासक अखराहा
वा डीह राजा साहेबक
ड्योढ़ी, हवेली, अस्तबल, हथिसार
बाभनक घर हो
कि डोम दुसाध गोंढ़िक तुच्छ खोपड़ि
पानि सबकेँ कऽ देतै एकटार
आबि रहलै बाढ़ि
अछि उद्दाम कोशीक धार।

ऊँच-ऊँच जतेक अछि
सब नीच बनि जयतैक
नीच अछि खत्ता कि डाबर
भरत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत
हैत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत
हैत सबटा एक रंग समभूमि
ऊँच नीचक भेद नहि किन्नहु रहत
जे ऊँच अछि
पहिने कटनियांमे कटत
आ नीच सभकेँ
ऊँच होमक
सुलभ भऽ जयतै सहज अधिकार
कोढ़मे छक दऽ लगय तँ की करब
आब ई सब तँ सहय पड़बे करत
बाप-बाप करू कि पीटू सब अपन कपार
आबि रहलै बाढ़ि
अछि उद्दाम कोशीक धार।
आरि धूर ने काज किछुओ दऽ सकत
सब बुद्धि
नियमक सुदृढ़ बान्ह ने किच्छु
टिकि सकत किछु काल
बस
सब पर पलाड़ी पानि
उमड़ि कऽ चढ़ि जैत
सबकेँ भरि बरोबरि कऽ देतै
आ पुरनकी पोखरि
कि नवकी अछि जतेक
खसि पड़त ई पानि बाढ़िक हहाकऽ
नहि रोकि सकबै
रोकि नहि सकतैक ऊँच महार
जे बनल अछि पोखरिक रक्षक
भखरिकऽ वा कि कटिकऽ निपत्ता भऽ जैत
आ पानि जे खसतै
तखन ई
बहुत दिनसँ बान्हि कऽ राखल
महारक शृंखलामे
अछि जते युग-युग प्रताड़ित
प्रपीड़ित फुसिऐल पोसल
नैनी, भुन्ना आ कि ललमुँहियाँ प्रभृति
ई माछ सब एहि पोखरिक नहि रहि सकत
सब बहार उजाहिमे जयबे करत
पाग आब रहय कि नहि
वा बचि सकय नहि टीक ककरो
की करब?
एहि बाढ़िमे अछि ककर वश?
ककरा कहू जे के नै हैत देखार
आबि रहलै बाढ़ि
अछि उद्दाम कोशीक धार।
आबि रहलै बाढ़ि जे कोशीक ई
बचि सकत नहि घर आ कि दुआर
सड़क-खत्ता/ ऊँच-नीच
पोखरि कि डाबड़/ गाम-गाछी
आ कि खेत-पथार
आबि रहलै बाढ़ि
अछि उद्दाम कोशीक धार।
विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .।
गाम
डूबि गेल

भोरम
-भोर
चन्दन भैयाक
फ़ोन आयल

कहलखिन हालचाल
समाद दलखिन
अपन गाम डूबि गेल

सुनक सन्न रहि गेलो
ओहि जन्मभूमि
ओहि मिथिलाक त्रासदी सुनि कs

सिलेमा जना
गामक सबटा दृश्य
आखिंक सामने घुरै लागल

अपन फ़ूसक घर
कक्काक पक्का मकान
द्वार ओ भंसाघर

याद आ
कुकुर ओ मालजाल
बाड़ी ओ कटहलक गाछ

भैया कहलखिन
चाइर सं पांच फ़ुट
पैन छै आंगन मे

अपन गाम रहैथ
सबसे ऊंच कहियो
नहि डूबैत छैक बाढ़ मे

देखू, चकाचक भs रहल
छैथ राजधानी

एतअ सं दूर गाम-घर मे भढ़ल छैक पानी.

1. कला 2. संगीत शिक्षा
मिथिला कला(आँगा)
चित्रकार- तूलिका, ग्राम-रुद्रपुर, भाया-आन्ध्रा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी।

अनुवर्तते)

2.संगीत शिक्षा
श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’(१९२८- )
राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित)

मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना।
स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान।
अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥

स्थायी
– – रेग॒म॑प ग॒रेसा
ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ

रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ – म॑
ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग

प प धनि॒ धप धनिसां – – रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा
ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ

अन्तरा

पप नि॒ध निसां सांरें
मिथि लाऽ ऽऽ कोकि

सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा
लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ

रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा
हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ

*गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध।

३.श्री गणेश जीक वन्दना
राग बिलावल त्रिताल (मध्य लय)
स्थाई: विघन हरन गज बदन दया करु, हरु हमर दुःख-ताप-संताप।
अन्तरा: कतेक कहब हम अपन अवगुन, अधम आयल “रामरंग” अहाँ शरण।
आशुतोष सुत गण नायक बरदायक, सब विधि टारु पाप।

स्थाई
नि
ग प ध नि सा नि ध प ध नि॒ ध प म ग म रे
वि ध न ह र न ग ज ब द न द या ऽ क रु

ग ग म नि॒ ध प म ग ग प म ग म रे स सा
ग रु ऽ ह म र दु ख ता ऽ प सं ता ऽ प ऽ

अन्तरा
नि रें
प प ध नि सां सां सां सां सां गं गं मं गं रें सां –
क ते क क ह ब ह म अ प न अ व गु न ऽ
रे
सां सां सां सां ध नि॒ ध प ध ग प म ग ग प प
अ ध म आ य ल रा म रे ऽ ग अ हां श र ण

ध प म ग म रे सा सा सा सा ध – ध नि॒ ध प
आ ऽ शु तो ऽ ष सु त ग ण ना ऽ य क व र
धनि संरें नि सां ध नि॒ ध प पध नि॒ ध प म ग म रे
दाऽ ऽऽ य क स ब बि ध टाऽ ऽ रु ऽ पा ऽ ऽ प

४.मिथिलाक वन्दना
राग तीरभुक्ति झपताल

स्थाई: गंग बागमती कोशी के जहँ धार, एहेन भूमि कय नमन करूँ बार-बार।
अन्तरा: जनक याग्यवल्क जहँ सन्त विद्वान, “रामरंग” जय मिथिला नमन तोहे बार-बार॥

स्थाई

रे – ग म प म ग रे – सा
गं ऽ ग ऽ बा ऽ ग म ऽ ती


सा नि ध़ – प़ नि नि सा रे सा
को ऽ शी ऽ के ज हं धा ऽ र

सा
म ग रेग रे प ध म पनि सां सां
ए हे नऽ ऽ भू ऽ मि कऽ ऽ य


सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा
न म न क रुँ बा ऽ र बा र

अन्तरा
प पध म – प नि नि सां – सां
ज नऽ क ऽ ऽ या ग्य व ऽ ल्क

रें रें गं – मं मं गं रें – सां
ज हं सं ऽ त वि ऽ द्वा ऽ न
ध प
सां नि प ध म प नि सां सां सां
रा म रं ऽ ग ज य मि थि ला

सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा
न म न तो हे बा ऽ र बा र
५.श्री शंकर जीक वन्दना
राग भूपाली त्रिताल (मध्य लय)

स्थाई: कतेक कहब दुःख अहाँ कय अपन शिव अहूँ रहब चुप साधि।
अन्तरा: चिंता विथा तरह तरह क अछि, तन लागल अछि व्याधि,
“रामरंग” कोन कोन गनब सब एक सय एक असाध्य॥

स्थाई
प ग ध प ग रे स रे स ध सा रे ग रे ग ग
क ते क क ह ब दुः ख अ हाँ कय अ प न शि व

ग ग – रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा –
अ हूँ ऽ र ह ब चु प साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ

अन्तरा

प ग प ध सां सां – सां सां ध सां सां सां रें सां सां
चिं ऽ ता ऽ वि था ऽ त र ह त र ह क अ छि

सां सां ध – सां सां रें रें सं रे गं रें सां – ध प
त न ला ऽ ग ल अ छि व्या ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ

सां – ध प ग रे स रे सा ध स रे ग रे ग ग
रा ऽ म रं ऽ ग को न को ऽ न ग न ब स ब

ग ग ग रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा –
ए क स य ए ऽ क अ साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ध्य ऽ
1.मौन-मिथिलाक शाक्त क्षेत्र 2.हरितालिका/ चौरचन्द्र/ अनंत चतुर्दशी 3. चौठचन्द्रपर नूतन झा
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८.
मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता।
मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)।
प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”।
भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)।
अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल।
सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)।
मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित।
अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)।
व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)।
चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)।
वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।
मिथिलांचलक शाक्त क्षेत्र- डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”

सृष्टि रहस्यावृत्त अछि आर ’धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां’ , मुदा सृष्टिक मूलमे पृथ्वी (क्षिति), जल, अग्नि (पावक), आकाश (अंतरिक्ष) एवं वायुक तात्विक अवस्थिति सर्वमान्य अछि। वैदिक साहित्यमे पृथ्वीकेँ माता ओऽ मनुष्यकेँ पृथ्वीपुत्र कहल गेल अछि। ऋगवेदक “पृथ्वी सूक्त” ओ “नदी सूक्त” मे हुनक देवीत्वक स्तुतिगान भेल अछि। पृथ्वी ओ जलक प्रजनन शक्ति अर्थात् ओहिसँ उद्भूत चेतनशील जीवन जगत मनुष्यक लेल कौतुहलक विषय छल, श्रद्धा ओ भक्तिक विषय छल। अहिठामसँ शक्तिक प्रति निरन्तर चिन्तनक परिणामस्वरूप हुनकासँ आरोग्य, संतति, सुख-समृद्धि एवं संरक्षणक कामना कयल जाइछ।

मातृदेवीक रूपमे पृथ्वी (भूदेवी)क परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। विश्वक प्रायः समस्त प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक उद्गम नदी-धारी मानल गेल अछि, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, काली-बंगा, मिश्र, मेसोपोटामिया आदिसँ प्राप्त मातृदेवीक प्राक् ऐतिहासिक मृणमूर्तिसभक पुरावशेष एकर ज्वलंत उदाहरण अछि। एवं प्रकारे पृथ्वी ओ जलमे देवत्वक अवधारणा पूर्व वैदिक युगक आर्येतर अवधारणा थिक। आर्य लोकनिकेँ अपन प्रभुत्व विस्तारक क्रमे अनेक युद्ध (देवासुर संग्राम अर्थात् इन्द्र-वृत्रासुर, महिषासुर वध, कालिय-दमन, राम-रावण युद्ध, गजासुर वध आदिक परम्परित श्रुति ओ साहित्यिक अंतः साक्ष्य उपलभ्य अछि। तदनुसार आर्यलोकनि आर्येतरक शाक्त अवधारणाकेँ समूल नष्ट नहि कऽ ओकरा परिष्कृत कऽ अंगीकार कयलनि। पृथ्वी ओ नदी (गंगा, यमुना, सरस्वतीक समानान्तर मिथिलांचलक कमला, कोशी, जीबछ) मे देवीत्व एवं अग्नि ओ वायुमे देवत्वक प्रतिष्ठापन कयल गेल। आकाश (अंतरिक्ष) तँ अहि देवी-देवताक विहार क्षेत्र अछि। आजुक वैज्ञानिक लोकनिक लेल अंतरिक्ष शोध-बोधक विहार क्षेत्र बनि गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक अंतः साक्ष्यक अनुसार वैदिक आर्यलोकनि अग्निपूजक छलाह।

आध्यात्मिक चेतनाक विकासक क्रममे शक्तिक विकास एवं विस्तार सप्तमातृका, दशमहाविद्या, चौसठ योगिनी आदिक रूपमे भेल देखना जाइछ। भारतीय मूर्तिकलाक इतिहासमे एक फलकपर सप्त मातृकाक शिल्पांकन कुषाणकालमे आरम्भ भऽ गेल छल- ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, वाराही, कौमारी, इन्द्राणी ओ चामुण्डा। एकर समानान्तर मिथिलांचलक जन-जीवनमे पूजित सप्तमातृकाक नामावली भिन्न छैक एवं हुनक लोकोपासना सातटा पिण्डक आदिम रूपमे प्रचलित अछि, जे सप्तपिण्डी अथवा सप्तवेदीक रूपमे अभिज्ञात अछि।

दोसर विकासक्रममे अबैत अछि दशमहाविद्या अर्थात् काली, तारा, षोड़सी (त्रिपुर सुन्दरी), छिन्नमस्ता, बगला, कमला (लक्ष्मी), मातंगी, भुवनेश्वरी, भैरवी ओ धूमावती-

काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगला रमा।
मातङ्गी भुवनेश्वरी सिद्धविद्या च भैरवी।
धूमावती च दशमी महाविद्या दशस्मृता॥–पुरश्चर्यार्णव शाक्त सम्प्रदायमे जाहि दस प्रधान रूपक ब्रह्मक उपासना होइछ, ओकरा महाविद्या कहल जाइछ। अहि विद्याक दू टा प्रधान मार्ग अछि, योग एवं तंत्र।

तेसर विकासक्रममे अबैत अछि चौसठ योगिनी। चौंसठ योगिनीक मध्यकालीन मन्दिर वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भेड़ाघाट (मध्य-प्रदेश), हीरापुर (उड़ीसा) आदि स्थानसभमे पाओल जाइछ। मिथिलांचलक सहरसाक (मत्स्यगंधा परिसर) पिरामिडनुमा स्थापत्य (मन्दिर)मे निम्नलिखित चौंसठ योगिनीक संग बटुक भैरवक मूर्तिसभ प्रतिष्ठापित अछि- माया, कुष्माण्डा, नर्मदा, यमुना, क्रान्ति, वृद्धि, गौरी, ऐन्द्री, वाराही, रणवीरा, मूरति, वैष्णवी, ज्वालामुखी, अजिता, चर्चिका, मार्जारी, डाकिनी, घण्टकर्णा, घटवरा, विकराली, जयन्ती, सरस्वती, कावेरी, मालुका, नारसिंही, श्री, विकटा, व्रजेश्वरी, कौमारी, महामाया, सुरपूजिता, ईश्वरी, सर्पस्या, यशा, वैवस्वती, रुद्रकाली, मातंगी, जयावती, अभया, माहेश्वरी, कामाक्षी, मयूरी, कपालिनी, तुष्टि, काली, उमा, रौद्री, अम्बिका, ब्रह्माणी, अश्वमुखी, आग्नेयी, अग्निहोत्री, अदिति, चन्द्रकान्ता, चामुण्डा, गंगा, मारुति, धूमावती, गान्धारी, अपराजिता, विमोहिनी, सूर्यपुत्री एवं वायुवेगा।

कालिकापुराणक अनुसार भगवती स्वेच्छया भिन्न-भिन्न उद्देश्यसँ विभिन्न अवसरपर चौंसठ रूपमे अवतरित भऽ योगिनीक रूपमे पूजित भेलीह। सृष्टिक सृजन, पालन एवं संहार हेतु त्रिधारूपमे अवधारित महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकालीसँ उद्भूत नाना शक्तिरूपा योगिनी सभ धन, यश, विद्या, बुद्धि, शौर्य-पराक्रम, आरोग्य ओ मोक्षदायिनी मानल जाइत छथि। उपरोक्त नामावलीमे ऐन्द्री, वाराही, वैष्णवी, माहेश्वरी, ब्रह्माणी ओ चामुण्डा, दशमहाविद्यामे एवं किछु सप्तमातृकामे सेहो परिगणित छथि। गंगा, यमुना, सरस्वती ओ कावेरी मूलतः नदी देवी छथि। कामाक्षीक स्वतंत्र तांत्रिक पूजोपासना कामरूप (असम)क कामाख्या एवं नेपाल उपत्यकाक गुह्येश्वरीमे परम्परित अछि। कुष्माण्डा, नवदुर्गाक एकटा रूप थिक मुदा योगिनीरूपेँ प्रतिष्ठित वराहविष्णुक शक्ति वाराहीक स्वतंत्र पालकालीन प्रस्तर मूर्ति पुनामा प्रतापनगर (नौगछिया, भागलपुर), ज्वालामुखी बनाम जालपाक मूर्ति लगुराँव (महुआ, वैशाली), डाकिनीक पूजन खुरहान (आलमनगर, मधेपुरा) आदि माता अम्बा बनाम अम्बिकाक पूजन आमी (दिघवारा, सारण), चामुण्डा पूजन कटरा (मुजफ्फरपुर), पचही, वरैपुरा, पचम्बा (बेगुसराय) आदिक प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभमे उपलभ्य अछि। जयावतीक पूजा नाग देवी जयाक रूपमे एवं नदी देवीक रूपमे गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र पूजन परम्परा, बरसाम (मधुबनी), नगरडीह (दरभंगा), मंझौल (बेगुसराय) आदिक अलावा अन्धराठाढ़ी (मधुबनी) ओ महिषी (सहरसा)क मन्दिर स्थापत्यक एवं अलंकरणक रूपमे प्राप्य अछि। स्थापत्य अलंकरणक रूपमे गंगा-यमुनाक प्राचीनतम मूर्ति अवशेष भरहुत ओ सांची (मध्य-प्रदेश)सँ प्राप्त अछि, जकर शिल्पांकन ई.पू. दोसर-तेसर शताब्दीमे भेल छल। कौमारी कुमार कार्तिकेय शक्ति छथि। सभटा शक्ति स्वरूपा देवी अपन-अपन देवताक वाहन ओ आयुध धारित कयने छथि।
ध्यातव्य अछि जे आलोच्य शक्ति स्वरूपाक उद्भावना उद्देश्य विशेषक कारणेँ भेल छल। असुर शक्तिक संहारक हेतु सप्तमातृकाक संयुक्त शक्ति प्रतिकार हेतु प्रत्यक्ष भेल छल। दशमहाविद्याक प्रत्येक देवी शक्ति-सम्पन्न, मोक्षदायिनी, कल्याणकारिणी एवं स्वयंमे नानारूपा छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव ओ शक्तियुक्त भेलासँ शिव छथि। दोसर शब्दावलीमे शक्तिहीन शिव शव समान छथि अर्थात् निष्क्रिय ब्रह्मक सक्रिय, चेतन ओ जाग्रत स्वरूप काली छथि- “महाकालक शक्ति महाकाली”- परमात्मा कालश्च परः संविदि वर्तते। काली नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते”।– तंत्रलोक (बम्बई, १९२० ई.)। मिथिलांचलमे दस महाविद्याक पूजोपासना गढ़-बरुआरी (सहरसा), भीठ भगवानपुर ओ राजनगर (मधुबनी)मे होइछ। कर्णाटकालीन मूर्तिकलामे ओ सभ विन्यस्त छथि।

पं राजेश्वर झ मिथिलांचलक शक्ति-साधनाक एकटा उपक्रम मालिन कल्टक उल्लेख कएने छथि, जे लौकिक धरातलपर परम्परित अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक तांत्रिक पूजा योगिनी ओ मालिनीक रूपमे होइछ। तांत्रिक साधनामे हिनक भूमिका महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। तांत्रिक प्रक्रियामे ओ मार्गदर्शनक काज करैत छथि। कालान्तरमे योगिन ओ मालिन एकार्थक भऽ गेलीह। चौसठ योगिनीमे “मालिन” सेहो प्रतिष्ठित छथि। कल्याण, गोरखपुर, शक्ति उपासना अंक, जनवरी १९८७ ई. पृ.२३६)। ओऽ सिद्धिदायिनी, मोक्षदा एवं वरदायिनी मानल जाइत छथि। लौकिक अवधारणाक अनुसार मालिन भगवतीक प्रिय सेविकाक संगे तंत्र-मंत्र, योग-टोम, चमत्कारादिक माध्यमे अभीष्ट साधनमे निपुण होइत छथि। डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ मिथिलाक लोकप्रसिद्ध मालिनसभमे कुसुमा मालिन, दौना मालिन, कोसा मालिन, रूपना मालिन, रमण अभिनन्दन ग्रन्थ, खुटौना, मधुबनी, २००४ ई. पृ.२२६-२३४)। मिथिलांचलक झिझिया नृत्य वस्तुतः तांत्रिक नृत्य थिक।

वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्यमे अन्तर्निहित आद्याशक्तिक आश्रय लऽ पुराणसभमे शक्ति (देवी)क स्वरूप, महिमा ओ पूजोपासना-प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि। शाक्त उपासनाक दृष्टिसँ पुराणकाल एवं शक्ति सभक भव्य शिल्पांकन दृष्टिसँ गुप्तकालकेँ स्वर्णयुग कहल जाइछ। पुराणसभक व्यापक प्रसारसँ शक्ति उपासनाकेँ एतेक बल भेटलैक जे जनजीवनमे ब्रह्मक पूजोपासना परब्रह्म एवं मातृब्रह्म दुनू रूपमे होमऽ लागल। देवी भागवत (३.६.२) क अनुसार मातृब्रह्म समस्त दैवीशक्तिक मूलमे छथि। मध्यकालमे आबि शक्तिक तंत्रोपासना बेस लोकप्रिय भऽ गेल। फलतः आभिजात्य स्तरपर कंकाली (भारदह, भीमनगर बराज, नेपाल, राजपरिसर, दरभंगा आदि) छिन्नमस्ता (सखरा, राजविराज, नेपाल; खुरहान, मधेपुरा; रजरप्पा, झारखंड आदि), तुलजा (नेपाल उपत्यका, राजा हरिसिंहदेव द्वारा स्थापित), हैहट्ट देवी (हावी डीह, कर्मादित्य द्वारा स्थापित), वाणेश्वरी (भंडाअरिसम, दरभंगा), त्रैलोक्य विजय (मंगरौनी, मधुबनी), उग्रतारा (महिषी, सहरसा) आदिक अतिरिक्त लोकस्तरपर बामती, गहिल, रक्तमाला, चम्पा डमौनी, नयना योगिन, गढ़ीमाइ, लुकेसरी (लोकेश्वरी) आदि देवी सभक प्रादुर्भाव भेल देखना जाइछ (हमारे लोक देवी-देवता, डॉ मौन, मुजफ्फरपुर, १९९९ ई.)। हिन्दू धर्मक अन्तर्गत तंत्रयानक विकास बज्रयानी परम्परासँ प्रभावित अछि। अधिकांश बौद्ध देवी हिन्दू देवीक प्रतिरूप अथवा समानान्तर विकसित छथि। बौद्ध देवी तारा दशमहाविद्याक द्वितीया तारा छथि। वनगाँव (सहरसाक) भगवती ओ महिषीक उग्रतारा, एवं वारी (सिंधिया, समस्तीपुर)क भगवती ओ तारा समानान्तर विकसित छथि। मंगरौनी (मधुबनी)क त्रैलोक्यविजय अष्टभुजी शक्तिरूपा छथि, मुदा शिव ओ पार्वती हुनक पैरक तर मर्दित छथि। आलोच्य मूर्तिमे बौद्धदेवीक श्रेष्ठता प्रदर्शित अछि। मुदा बौद्धदेवी प्रज्ञापारमिता हिन्दू देवी सरस्वतीक प्रतिरूप थिकीह।

मिथिला बंगाल ओ असम शक्ति साधनाक एकटा सशक्त त्रिकोण अछि। मिथिलाक धरतीपर एहि त्रिकोणकेँ महिषी (तारा), विराटपुर (चण्डी) ओ बदलाधमहारा (कात्यायनी)मे देखि सकैत छी। अधोमुखी त्रिकोण शाक्त ओ उर्ध्वमुखी त्रिकोण शैव लोकनिक साधना प्रतीक थिक। जखन विपरीत स्थितिमे आबि षटकोषक सृजन होइत अछि तखन ओ महाकाली ओ महाकालक संयुक्त भेने कामकलाक रूप होइत अछि। ब्रह्मक कामशक्ति द्वारा कलाक सृष्टिक नाम कामकला थिक। (प्रतीक विद्या, डॉ जनार्दन मिश्र, पटना, १९५९ ई., पृ.१९८) अर्थात् सदाशिवक ऊपर रहि (मर्दिनी काली) शक्ति ब्रह्माण्डक सृजन करैत अछि- “सदाशिवोपरि स्थिरवा ब्रह्माण्डं क्षोभमानयेत” कालीविलासतंत्र, लंडन, १९१७ ई. २४.२३)। त्रिकोण त्रिशक्तिक रूपमे चेतनाक आत्मप्रसार थिक। उर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव, अधोमुखी त्रिकोण शक्ति (शिवा) एवं षटकोणीय त्रिकोणकेँ शिव-शक्त्यात्मक त्रिकोण कहल जाइछ। त्रिकोणक केन्द्रमे विन्दु सृष्टिक मूल थिक। तंत्रमूलक यंत्रक संरचनाक क्रमे ई आधार मानल जाइछ। मिथिलांचलमे मंगरौनी (मधुबनी) एवं हरौली (वैशाली) आद्याशक्ति (मातृब्रह्म)क साधना पीठ थिक।

देवताक भेदें आगमक वर्गीकरण निम्नरूपेँ भेल अछि- शैवागम, शाक्तागम, वैष्णवागम एवं बौद्धागम। महाकालसंहिताक अनुसार शाक्तागमक चारिटा उपभेद अछि- कापालिक, मौलेय, दिगम्बर एवं भाण्डिकेर। कापालिक डामरतंत्रक, मौलेय यामल तंत्रक, दिगम्बर भैरव-भैरवी तंत्रक एवं भाण्डिकेर क्षावरतंत्रक अनुसरण करैत अछि। मिथिलामे वेदहि जकाँ तंत्रोकेँ अपौरुषेय कहल गेल अछि।(मिथिलामे तंत्र, डॉ त्रिलोकनाथ झा श्रीअमर अर्चना; दरभंगा,२००१ ई.पृ.२९५)। तांत्रिक पद्धतिसँ उपासना सरल होइछ। प्रागैतिहासिक कालसँ पूर्वी भारतक असम, बंगाल, मिथिला ओ नेपालमे शाक्ततंत्रक प्रचार-प्रसार रहल अछि। असमक कामाख्या, बंगालक दक्षिणकाली, नेपालक गुह्येश्वरी एवं मिथिलांचलक उग्रतारा (महिषी)सहरसा। बरांटपुरक चण्डी, कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल)क कंकाली, आमी (सारण)क अम्बिका स्थान, उच्चैठ (मधुबनी)क भगवतीथान, थावे (गोपालगंजक)क भगवती मन्दिर आदिक अतिरिक्त बेतियाराज, दरभंगाराज ओ राजनगरक भगवती मन्दिर आदि।
तंत्रोपासनाक उद्भव बंगालमे भेल छल मुदा ओ साधना बलेँ मिथिलामे प्रवलीकृत भेल- “गौड़े प्रकाशित विद्या मिथिले प्रवलीकृता”। कलियुगमे संसार सागरसँ पार उतारनिहार एवं जन्म-मरणक बंधनसँ मुक्ति दियौनिहार मात्र दू टा आराध्य छथि- शिव ओ शक्ति। मिथिलांचलमे शिवक अपेक्षा शक्तिक महत्व अधिक अछि। मैथिल लोकनिकेँ कहल गेल अछि- “अन्तः शक्ताः”। शक्ति उपासनाक दू टा मार्ग- वाम एवं दक्षिण- दुनू पक्ष सैद्धांतिक ओ प्रायोगिक अपन उत्कर्षकेँ प्राप्त कयलनि। दरभंगाक खण्डवलाकुलक राजालोकनि शाक्तधर्मी ओ तंत्रोपासक छलाह।
सामान्यतः वैदिक अवधारणाक अनुसार जतऽ भोग छैक ततऽ मोक्ष नहि आर जतऽ मोक्ष छैक ओतऽ भोग नहि। मुदा दश-महाविद्याक अन्तर्गत पूजिता त्रिपुरसुन्दरीक पूजनसँ भोग एवं मोक्ष दुनू प्राप्त भऽ जाइछ। एहि तरहेँ नानारूपधारिणी शक्तिक पूजोपासना शास्त्रीय एवं लौकिक दुनू रूपेँ सम्पूर्ण मिथिलांचलमे परिव्याप्त अछि। एहिठाम आध्यात्मिक ऊर्जासँ उर्जस्वित अनेक सिद्ध शक्तिपीठ ऐतिहासिक साक्ष्यसँ प्रमाणित, पौराणिक कथासँ समन्वित एवं लोक-आस्थासँ सूत्रबद्ध अछि। गोसाउन घरसँ लऽ कऽ शक्ति (भगवती) कतहु पिण्डरूपमे, कतहु पाथरक मूर्ति रूपमे तँ कतहु तांत्रिक चक्र रूपमे पुजाइत छथि। नवरात्रक अवसरपर सम्पूर्ण मिथिला शाक्तमय भऽ जाइछ। अतः मिथिलाक सुदूर ग्रामांचलमे विशृंखलित शक्ति साधनाक किछु प्रतिनिधि स्थलसभकेँ बानगीक रूपमे “हेरिटेज मिथिला”क अन्तर्गत प्रकाशमे आनब एकटा धार्मिक कृत्य थिक।

उच्चैठक भगवती: मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालयसँ प्रायः पाँच किलोमीटर दिशामे अवस्थित उच्चैठक (उच्चैःस्थ) भगवती स्थान सुप्रसिद्ध शक्ति साधना स्थल अछि। मिथिलामे प्रत्येक देवीकेँ भगवती कहल जाइछ। श्रुति-परम्पराक अनुसार उच्चैठक भगवतीक सम्बन्ध कालिदाससँ सूत्रबद्ध अछि। भगवती स्थानक लगपासमे कालिदासक डीह कहल जाइछ। मुदा उच्चैठक भगवती कालिदास कालीन (गुप्तकाल) नहि अछि। मंदिरमे स्थापित भगवतीक कारी पाथरक मूर्ति तैंतीस ईंच नमहर अछि।

भगवतीक चतुर्भुजी मूर्ति दोहरा कमलासनपर ललितासनमे निर्मित अछि। भगवतीक सिरोभाग ओ वाम भुजा खण्डित अछि। एकटा समकालीन भगवती मूर्तिक वाम हाथ (निम्न)मे कलश ओ ऊपरी हाथमे त्रिशूल एवं दहिन हाथ (निम्न)मे फल ओ ऊपरी हाथमे दर्पण उत्कीर्ण अछि। शिरोभूषण, कर्णफूल, गृमहार, यज्ञोपवीत, वाजुवन्द, कंगन, कटिबन्ध ओ पायल आदिक संग कंचुकी ओ अधोवस्त्रसँ सुसज्जित अछि। पादपीठमे वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। रूप विन्यासक दृष्टिसँ उच्चैठक भगवती सिद्धेश्वरी पार्वती छथि।

अहि तरहक भगवतीक दोसर प्रस्तर मूर्ति मधुबनी जिलान्तर्गत कपिलेश्वरस्थानसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम-दक्षिणमे अवस्थित भोजपरौलसँ (पैंतीस ईंच नमहर) प्राप्त अछि, जे पूर्णतः अक्षत अछि। रूप ओ भंगिमा सादृश्यक अलावा उच्चैठ भगवतीक मुखाकृति आर्यत अछि तँ भंडारिसमक भगवतीक मुखाकृति गोल अर्थात् मंगोलन अछि। मुदा अमृतकलश, त्रिशूल, फल ओ दर्पण समान अछि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) संकेतानुसार एहि वर्गक एकटा भगवती मूर्ति वनगाँव (सहरसा)मे सेहो पूजित अछि। भगवतीक तीनू मूर्ति पालकालीन कलाकृति मध्ययुगीन सांस्कृतिक दर्पण बनि गेल अछि। अमृतकलश हुनक मातृदेवीत्वक एवं दर्पण पार्वतीक प्रतीक थिक। आलोच्य भगवती-मन्दिर सभ प्राचीन भवनावशेष क्षेत्रमे बनल अछि। स्पूनर सूबेगढ़क (मुजफ्फरपुर) भगवती मंदिरकेँ तिरहुत शैलीमे बनल कहने छथि।एहि कड़ीक एकटा षटभुजी भगवती समस्तीपुर जिलान्तर्गत सिंघिया प्रखण्ड मुख्यालयसँ आठ किलोमीटर उत्तर वारीक भगवतीस्थानमे पूजित अछि। कारी पाथरक ई आलोच्य भगवती मूर्ति चौंतीस ईंच नमहर कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भगवतीक वाम हाथ सभमे क्रमशः नीचासँ ऊपर कलश, घण्टा, ढाल ओ दहिन हाथसभमे क्रमशः अभयमुद्रा, खड्ग ओ अक्षमाला सुशोभित अछि। भगवती कमलासनपर ललितासनमे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे सिंह वाहनक रूपमे उत्कीर्ण अछि। वारी ऋषि-मुनि एवं तपसी-साधक लोकनिक साधना-स्थल छल मध्यकालमे।
उच्चैठ, भोजपरौल, वनगाँव ऊ वारीक अतिरिक्त ओ भंडारि सभ (दरभंगा)मे सेहो परम्परासँ पूजित छथि। भोजपरौल एवं भंडारिसभक भगवती चतुर्भुजी छथि। भंडारिसभक भगवतीक वाम (निम्न) हाथमे त्रिशूल ओ पद्म पुष्प एवं दहिन हाथमे फल ओ खड्ग अछि। भगवती वाणेश्वरीक नामे विशेष प्रसिद्ध छथि। मूर्ति अड़तालीस ईंच नमहर अछि, नदी अवशेषक पश्चिमी तटपर अवस्थित एकटा मंदिरमे पूजित छथि। भंडारिसम दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखण्डसँ तीन कि.मी. दक्षिणमे अछि। देकुलीक अष्टभुजी भगवती कर्णाटकालीन छथि।

अध्यात्मिक चेतना ओ कलात्मक भव्यतासँ समन्वित ई मध्यकालीन भगवती मूर्तिसभ अपन युगक सांस्कृतिक दर्पणे नहि अपितु तत्युगीन जीवनक धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, कलात्मक सोच, सामाजिक ओ आर्थिक अवस्थितिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ। मूर्ति विज्ञानक अनुसार भगवतीक शास्त्रीय स्वरूप निर्धारित अछि, मुदा एकहि युगक बनल भगवतीक मूर्ति सभमे शैलीगत भिन्नता पाओल जाइछ। पाल साम्राज्यक पतनोन्मुख अवस्थामे राजकीय संरक्षण ओ निर्देशक अभावक कारणे शैलीगत शैथिल्य स्वाभाविक अछि। मूर्तिशिल्पक शास्त्रीयतासँ बन्हल रहितो मूर्तिकार स्वतंत्र चेता सेहो होइत छथि।

फुलहरक भगवती गिरिजा: मधुबनी जिलान्तर्गत हरलाखी प्रखण्ड मुख्यालयसँ पश्चिम-दक्षिण दिशामे अवस्थित फुलहर गाममे प्राचीन भग्नावशेषपर बनल नवनिर्मित मंदिरमे स्थापित एवं पूजित भगवती गिरिजाक भव्य प्राचीन प्रतिमा सैंतीस ईंच नमहर अछि। जनश्रुतिक अनुसार रामचरितमानसक गिरिजास्थान यैह थिक, जे जानकीक आराध्या छलीह आर आइयो कुमारि कन्या लोकनिक आराध्या बनल छथि।

गिरिजाक चतुर्भुजी प्रतिमा कमलासनपर स्थानक मुद्रामे बनल अछि। वाम हाथमे केराक हत्था ओ गदा एवं दहिन हाथमे दर्पण ओ सनाल कमलपुष्प सुशोभित छनि। माथपर मुकुट, कानमे कुण्डल, गरामे हार, कान्हसँ लटकैत यज्ञोपवीत, बाँहिमे बाजूवन्द, कलाइमे आभूषण, डाँरमे अधोवस्त्रकेँ कसैत कटिभूषण ओ पैरसभमे पादाभूषण। भगवतीक वाम पार्श्वमे कार्तिकेय एवं दहिनमे गणेश कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक प्रतिमा वात्सल्यक भावात्मक परिवेशमे निर्मित अछि। पार्वती जगन्माता छथि। गिरिजा वस्तुतः पर्वतकन्या पार्वती छथि। विवाह पंचमीक अवसरपर एहिठाम विशाल मेला लगैत अछि। नवरात्रमे तांत्रिक साधना सेहो प्रचलित अछि।

भगवती गिरिजा अर्थात् पार्वतीक दोसर भव्य कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) मूर्ति दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लाक देवी मन्दिरमे प्रतिष्ठापित अछि। दरभंगाक सांस्कृतिक क्षितिजपर उद्भासित भगवती पार्वतीक (बत्तेस इंच नमहर) कर्णाट (पालोत्तर) शैलीमे निर्मित छथि। मूर्तिक प्रभावली बेस अलंकृत अछि। भगवती कमलासनपर वस्त्राभूषणसँ विन्यस्त स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वाम पार्श्वमे कार्तिक ओ दहिनमे गणेश ठाढ़ छथि। दुनूकेँ भगवतीक अभय प्राप्त छनि। भगवतीक दहिन हाथ (उपरका) मे बाँसुरी उत्कीर्ण भेने सत्यार्थी एहि प्रतिमामे गिरिजा, राधा एवं लक्ष्मीक समाहार देखने छथि। मुदा बाँसुरी शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि, शिवक डमरू जकाँ। मिर्जापुरक भगवती म्लेच्छमर्दिनीक नामे लोकख्यात छथि। श्रुति साक्ष्यक अनुसारे भगवती जाहि पोखरिक जीर्णोद्धारक क्रमे उत्खनित भऽ प्रकट भेलीह, ओऽ कब्रगाह छल। मुजफ्फरपुर कोर्टक फैसलाक अनुसार ओहि भूभागक स्वामित्व हिन्दू लोकनिकेँ भेटलनि। ओहि स्थानपर आइ भगवतीक एकटा भव्य ओ दर्शनीय मंदिर शक्ति-साधना ओ लोक आस्थाक केन्द्र बनि गेल अछि।

सत्यार्थी (मिथिलाक पुरातात्विक संपदा, २००३ ई.) अपन सर्वेक्षणमे अन्धराठाढ़ी (मधुबनी), देकुली, कुर्सी नदियामी (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर) ओ फुलहर (दरभंगा)क भगवती पार्वतीक उल्लेख कएने छथि। भगवतीक रूप कमनीय, वस्त्राभूषण ललित एवं देहयष्ठि आनुपातिक बनल अछि। फलतः भगवती पार्वतीक प्रतिमा प्राणवंत भऽ गेल अछि।

नाहरक महिषासुर मर्दिनी: मधुबनी जिला मुख्यालयसँ बारह कि.मी. पूर्व दिशामे अवस्थित भगवतीपुरक मंदिरमे महिषासुर मर्दिनीक पाथरक मूर्ति (२५”*१२”आकार) स्थापित एवं पूजित अछि। दसभुजी भगवती त्रिभंगी एवं स्थानक मुद्रामे कमलफूलक दोहरा आसनपर महिषासुरकेँ शूल (बरछी)सँ बेधैत बनल अछि। वस्त्राभूषणसँ सुसज्जित भगवतीक हाथसभमे दश दिक् पालक अस्त्रसभ शोभित छनि। इन्द्रक बज्र, अग्निक शक्ति, यमक दण्ड, नैऋतक खड्ग, वरुणक पाश, ईशानक शूल, वायुक अंकुश, कुबेरक गदा, विष्णुक चक्र ओ ब्रह्माक पद्म। महिषासुर महामोह अथवा अविद्याक प्रतीक अछि, जकर बध लोककल्याणार्थ भगवतीक हाथेँ भेल छल। दश भुजा भगवतीक दिग-दिगंत परिव्याप्त शक्तिक प्रतीकाभिव्यक्ति थिक। भगवतीक मूर्ति कर्णाटकालीन कलाशैलीमे निर्मित अछि। मुखाकृति आर्यन, देहयष्ठि संतुलित ओ आनुपातिक बनल अछि।

नाहरक भगवतीक प्रसिद्धिक कारणेँ शक्ति-साधना स्थल नाहर भगवतीपुरक नामे लोक प्रसिद्ध अछि। एहि ठामक पार्श्ववर्ती मंदिरसभमे सूर्य ओ विष्णुक प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि मुदा नाहरक प्रसिद्धि महिषासुर मर्दिनीक कारणे अधिक अछि। मूर्तिक पादपीठमे भक्तगणक छोट-छोट मूर्तिसभ विनीत मुद्रामे उत्कीर्ण अछि।

हावीडीहक भगवती: दरभंगा जिलान्तर्गत बहेड़ा प्रखण्ड मुख्यालयसँ पाँच कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित हावीडीहक प्रसिद्धि यद्यपि महारानी सौभाग्यवतीदेवी (सुहब देवी)क आज्ञासँ प्रतापी मंत्री कर्मादित्य द्वारा स्थापित हैहट्ट देवी भगवती पार्वतीक कारणे अधिक अछि (१३म शती), मुदा देवी मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित महिषासुर मर्दिनीक महत्व कम नहि होइछ। श्रुति अछि जे भगवतीक मूर्तिक पादपीठ नवादा (दरभंगा) मे पूजित अछि, मुदा यत्र-तत्र उद्धृत अभिलेख कतहु नहि अछि। हाबीडीहक महिषासुर मर्दिनी अष्टभुजी छथि। हैहट्ट देवीक नामे पूजित पार्वती ललितासनमे एवं महिषासुरमर्दिनी स्थानुक मुद्रामे निर्मित अछि। कर्मादित्यक काल १२२५-७५ ई. मानल जाइछ। हावीडीह पंचदेवोपासक भूमि अछि मुदा प्रभुत्व भगवतीक छनि।

महिषासुरमर्दिनीक तेसर साधना केन्द्र दरभंगासँ नौ कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित अन्दामामे (२२”) प्राची नदी अवशेषक पश्चिमीतटपर बनल मन्दिरमे स्थापित भगवती ओ पूजित अछि। अष्टभुजी भगवतीक हाथसभमे नाग, धनुष, ढाल, शूल, चक्र ओ खड्ग धारित अछि। नाना वस्त्रालंकारसँ सुशोभित भगवती दोहरा कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक दहिन पार्श्वमे एकटा ढाल खड्ग धारिणी सहदेवीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। भगवतीक मूर्ति संरचना मैथिल अवधारणाक अनुसार भेल अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक महिषासुर मर्दिनी रूप समसामयिक परिवेशमे बेस लोकप्रिय छल। महिषासुर मर्दिनीक प्राचीन ऐतिहासिक मूर्तिसभ वैद्यनाथपुर (चतुर्भुजी), उजान (मधुबनी). डोकहर, जरैल-परसौन, देवपुरा (मधुबनी), कुर्सो-नदियामी, बरसाम, पोखराम (अष्टभुजी), नेहरा, बहेड़ी (अष्टभुजी), चौगामा (दरभंगा), मदरिया, बुढेव (७२*३०” अष्टभुजी), भवानीपुर, सहमौरा, नया नगर (कोशी प्रमण्डल), खोजपुर (दरभंगा) आदिक अतिरिक्त भजनाहा (मधुबनी) ओ गन्धवारि (दरभंगा)सँ प्राप्त सिंहवाहिनी अष्टभुजी दुर्गाक प्राचीन, पूजनीय एवं ऐतिहासिक मूर्तिसभ पहाड़ी शैलीमे निर्मित अछि।

मिथिलांचलमे अनेक नामधारिणी भगवतीक मूर्तिसभ राजेश्वरी, परमेश्वरी, सिद्धेश्वरी, भुवनेश्वरी वाणेश्वरी, गुह्येश्वरी जयमंगला आदिक नामे पूजित अछि। सिमरिया भिण्डी (समस्तीपुर)मे सेहो महिषासुरमर्दिनीक प्राचीन पाथरक मूर्ति प्राप्त भेल अछि। नदियामीक चतुर्भुजी मूर्ति पार्वती (गिरिजा)क थिक, जनिक पार्श्वमे कार्तिक ओ गणेश उत्कीर्ण छथि। पार्वतीक एकटा विलक्षण प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा (पाली) निसंदेह अद्वितीय अछि। पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक संगे बैसल छथि। गुप्तकालक ई मूर्ति भगवतीक वात्सल्य भावक अभिव्यंजक अछि। पार्वतीक एकटा चतुर्भुजीमूर्ति करियन (समस्तीपुर)सँ सेहो प्राप्त अछि। मिथिलाक इतिहास पुरातत्व ओ सांस्कृतिक क्षेत्रमे विजयकान्त मिश्र- मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर- एवं सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन (कर्णाटकालीन मूर्तिकला), सत्यनारायण झा सत्यार्थी (दर्शनीय मिथिला, १-१०), डॉ नरेन्द्र नारायण सिंह निराला- मधुबनी अंचलक मूर्ति-, डॉ हीरानन्द आचार्य (राजनगरक ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व) आदिक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन-अनुशीलन उल्लेखनीय अछि।

मिथिलांचलक नवरात्रमे महिषासुर मर्दिनीक लोकपूजन सर्वाधिक लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। आलोच्य प्रतिमा एकटा सामाजिक प्रतिक्रियाक धार्मिक अभिव्यंजना थिक। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहास आक्रमण-प्रत्याक्रमण एवं संघर्षपूर्ण स्थितिसँ भरल अछि। विशेष कऽ मुस्लिम आक्रमण ओ घात-प्रतिघातसँ मिथिला आक्रान्त छल। एहि स्थितिमे म्लेच्छमर्दिनी दुर्गाक रूपगत संरचनाक अर्थवत्ता बढ़ि जाइछ। म्लेच्छ असुरक पर्याय अछि। देव लोकनि असुरक वध कयलनि मुदा म्लेच्छ सभक वध भगवतीक हाथे भेल आर हुनक एहि रूपकेँ म्लेच्छमर्दिनी मानल गेल, जे शक्ति-साधनाक एकटा प्रतीक बनल अछि।

मिथिलाक मध्यकालीन इतिहासक पृष्ठभूमिमे हिन्दू धर्मक अन्तर्गत धार्मिक सद्भावक विकास भेल। पाल राजालोकनि यद्यपि बौद्धधर्मी छलाह, मुदा ओ हिन्दू धर्मक देवी-देवता सभक सेहो उदारतापूर्वक संरक्षण देलनि। एहि संक्रमणकालमे बौद्ध लोकनि हिन्दू देवी-देवता एवं हिन्दू लोकनि बौद्ध देवी-देवताकेँ अंगीकार कएलनि। तारा, छिन्नमस्ता, मनसा आदि हिन्दू जगतमे ओ तारा, चण्डी, कंकाली, डाकिनी, वज्र-वाराही, वज्रतारा आदि बौद्ध जगतमे प्रतिष्ठा पौलनि। भिन्न साधना प्रक्रिया एवं रूपविन्यासक अलावा बलि निषेध छल बौद्ध-साधक लोकनिमे। मुदा विक्रमशिलाक सिद्ध-साधनामे पंचमकारक समावेशसँ मिथिलांचलक शक्ति-साधना प्रभावित अवश्य भेल। एहि भूभागमे हिन्दू ओ बौद्ध धर्म संगे-संग विकसित भेल। उदाहरणार्थ वनगाँव महिषी (सहरसा) एवं वारीक (समस्तीपुर) हिन्दू ओ बौद्ध ताराक पूजोपासनाकेँ राखल जाऽ सकैछ।

कोर्थक काली: दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखण्डक अन्तर्गत सांस्कृतिक कोर्थ (पौराणिक कोर्थ, सत्यनारायण झा सत्यार्थी, लहेरियासराय, दरभंगा)क गोसाउनिक स्थानमे स्थापित एवं पूजित पाथरक काली मूर्ति (३ फीट ६ इंच) चतुर्भुजी अछि। आद्याशक्ति काली दशमहाविद्यामे प्रथमा एवं महाकाल (शिव)क शक्ति छथि। कला (साकार जगत)कें आत्मसात करऽबाली काली दिग्वस्त्र छथि। हुनक वाम हाथ (निम्न)मे छिन्नमस्तक ओ खड्ग एवं दहिन हाथमे पोथी (शास्त्र) ओ वरमुद्रा बनल अछि। मुण्डमालिनी काली शवरूप शिवक हृदय स्थलपर ठाढ़ छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव अछि आर शक्तियुक्त भऽ ओ शिव कहबैत अछि। कालीक माथपर मुकुट, डाँर ओ हाथ-पैर सभ आभूषण मंडित अछि, कालीक जिह्वा बाहर निकलल छनि। कोर्थक एहि कालीक पूजामंत्र अछि- “हंसौः सदाशिव महाप्रेतपद्मासनाय नमः”।– तारा रहस्य, १८९६ ई., पृ.४१.

“पुरश्चर्यार्णव” (बनारस, १९०१ ई.-पृ.१७)क अनुसार कालीक नौटा भेद अछि- दक्षिणकाली (कलकत्ता), भद्रकाली (कोइलख), श्मसानकाली (दरभंगा), कालकाली, गुह्यकाली (काठमाण्डू), कामकलाकाली (कामरूप), धनकाली, सिद्धिकाली ओऽ चण्डकाली (बिराटपुर)। लक्ष्मीतंत्रक अनुसार मित्र व शत्रुक सत-असत रूपक विभुकेँ मायागुणयुक्त भेलाक कारणे ओ भद्रकाली कहबैत छथि। ओ कल्याणरूपा छथि। मिथिलांचलमे भद्रकालीक पूजोपासना कोइलख (मधुबनी) मे होइछ। “मिथिला तत्व विमर्श” (परमेश्वर झा) मे कोइलखक भगवतीकेँ भद्रकाली ओऽ काकिलाक्षी कहल गेल अछि। भगवती मधुबनीसँ तेरह कि.मी. पूर्व दिशामे स्थित कोइलखक भव्य मन्दिरमे पूजित छथि।

एकर अतिरिक्त सहरसाक मत्स्यगंधा परिसरक पगोडा शैलीमे बनल मंदिरमे रक्तकालीक भव्य ओऽ आकर्षक मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। त्रिभंगी नृत्य मुद्रामे निर्मित द्विभुजी मुण्डमालिनी रक्तकालीक वाम हाथमे कपाल ओ दहिनमे खड्ग धारित छनि। रक्तकालीक एहि नृत्यमे असत तत्वादिक दमन ओ कपालमे सृष्टि बीजक संरक्षणक भाव अन्तर्निहित अछि। राजनगर (मधुबनी)क राजपरिसरक काली मन्दिरमे स्थापित कालीक सौम्य मूर्ति, मधुबनीक भओरागढ़मे महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित काली, राजदरभंगाक श्यामा, दरभंगाक बागमती तटक शसान काली, चैनपुर (कोशी अंचल)क महाकाली, धरान (नेपाल)क दंतकाली, बेतिया राजक काली आदि विभिन्न रूपेँ पूजित छथि। जनपदक ग्रामांचलमे वनकाली, रणकाली आदिक लोकपूजन सेहो परम्परित अछि। दशमहाविद्याक अन्तर्गत द्वितीया महाविद्याक रूपमे प्रतिपादित भगवती तारा ब्राह्मण धर्मक वैदिक परम्परा ओ बौद्धिक धर्मक तांत्रिक परम्परामे वनगाँव-महिषी ओ वारीमे स्थापित एवं पूजित छथि। डॉ जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई. पृ.२०७)क अनुसार सनातनी तारा एवं बौद्ध ओ जैन तारामे स्वरूपगत आर सिद्धान्ततः कोनो भेद नहि अछि। मुदा बौद्ध देवी ताराक रूपगत विस्तार देखना जाइछ- उग्रतारा, नीलतारा, पीततारा, हरिततारा, धनद तारा, महाचीन तारा, बज्रतारा, वरद तारा, श्वेत तारा आदि। वारी (सिंघिया समस्तीपुर) क रामजानकी मन्दिरमे रक्षित द्विभुजी बौद्धदेवी तारा (३१ इन्च)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्तिमे मुख्य तारक अतिरिक्त सम्पूर्ण प्रभावलीमे एगारह टा विभिन्न तारा सभक मूर्ति अभिशिल्पित अछि। भगवती तारा कमलासनपर ललितासनमे बैसल छथि। दहिन हाथ वाममुद्रामे बनल अछि। भगवतीक प्रतिमा वस्त्राभूषणसँ अलंकृत अछि। हम प्रायः तीन दशक पूर्व बहेड़ा (दरभंगा)क एकटा व्यक्तिगत पूजागृहमे नीलतारा (सरस्वतीक प्रतिरूप)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। सत्यार्थी वनगाँव महिषीक तारामूर्तिकेँ पूर्णतः (मुखाकृतिकेँ छोड़ि) वस्त्राच्छादित पोटरी कहने छथि। महिषीक वर्तमान तारामन्दिरक निर्माण नरेन्द्र ठाकुर (१७४३-६०)क रानी पद्मावती करौने छलीह। ओ महिषीक छलीह। प्रत्यक्षदर्शीक अनुसार उग्रताराक पार्श्वदेवक रूपमे नीलतारा ओ एक जटा मूर्तित अछि। महिषीक उग्रताराकेँ वशिष्टाराधितारा कहल जाइत छनि। एहि क्षेत्रक धर्ममूला (धेमुरा) नदीक तटवर्ती क्षेत्रसँ प्राप्त बौद्धदेवी ताराक एकटा प्रस्तर मूर्ति सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित अछि। वैशालीक नीरभुक्तौ ताराः चर्चित अछि।
जगतपुर बरारी क्षेत्रसँ प्राप्त ताराक द्विभुजी स्थानक मूर्ति दशम-एगारहम शताब्दीक थिक। ताराक पार्श्वमे दू टा देवी मूर्ति त्रिभंगी मुद्रामे अंकित अछि। एहिसँ ई ज्ञात होइछ जे मिथिला सतत ब्राह्मण धर्मक प्रवर्तक छल, सेहो बौद्ध धर्मक देवी-देवताक प्रभावसँ वंचित नहि रहि सकल। (मिथिला भारती, पटना, मार्च-जून १९६९ ई.)। मूर्ति २ फीट चारि इन्च गुणा १ फीट ३ इन्च आकारमे बनल अछि। मूर्ति अभिलिखित अछि- “यं धर्मा हेतु प्रभवा…”। महायानमे देवी तत्वक प्रधानता छल- तारा, चण्डी, हारीति आदि। भगवती ताराक एकटा प्राचीन मन्दिर तिलकेश्वर (दरभंगा)मे अछि। स्मरणीय अछि वनगाँव-महिषीक पहिचान बुद्धकालीन आपण निगमसँ भेल अछि।

कटराक चामुण्डा: गुप्तकालीन इतिहासमे कटरा तीरभुक्तिक चामुण्डा एकटा “विषय” छल आर कटरागढ़ (वर्तमान मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत)क चामुण्डा एहि तांत्रिक शक्तिपीठक अधिष्ठात्री देवीक रूपमे पूजित छथि-

विदेह नगरी स्थित्वा सर्वशक्ति समन्विता
चामुण्डेति ततो ख्याता लक्ष्मणातर वासिनी।

कटराक प्राचीन ऐतिहासिक गढ़क भग्नावशेषपर चामुण्डाक नवनिर्मित मन्दिर लखनदेड़ (लक्ष्मणा) तटपर अवस्थित अछि। चामुण्डा क्षेत्रक कटैयाक कटीश्वरी ओ चकौतीक चक्रेश्वरी उपशक्ति पीठ अछि।

चामुण्डा तांत्रिक पूजावशेष वीरपुर, पचम्बा(बेगुसराय), पचही (मधुबनी) आदि स्थान सभसँ प्राप्य अछि।

विराटपुरक चण्डी: सहरसा जिलाक सोनवर्षा प्रखण्डक अंतर्गत जिला मुख्यालयसँ पैंतीस कि.मी. पूर्वमे स्थित विराटपुर गामक शक्तिपीठ चण्डीस्थानक नामसँ लोकख्यात अछि। विराटपुरक चण्डी, धमहारा (धर्मधारा)क कत्यायिनी एवं महिषीक उग्रतारा स्थान एकटा तांत्रिक त्रिकोणपर अवस्थित अछि। चण्डी मन्दिर अष्टकोणीय आधारपर बनल मन्दिरक गर्भगृहमे भगवती चण्डीक मूर्ति, मन्दिरक प्रवेश द्वारपर बुद्धक मूर्ति (बुधाय स्वामी), शिल्पांकित तांत्रिक चक्र, प्रांगणमे तिरहुतामे अभिलेखादि शक्तिपीठक ऐतिहासिकताक प्रमाण अछि।

चण्डी दुर्गाक एकटा रूप थिक। हिन्दू प्रतिमा विज्ञानक अनुसार ओऽ दसभुजी एवं सिंह अथवा बाघपर आरुढ़ रहैत छथि। ओऽ महिषासुर मर्दिनी जकाँ उग्ररूपा छथि। चण्डीक एकटा गुप्तकालीन मन्दिर गाजीपैता (कोशी क्षेत्र) गाममे अवस्थित अछि। मन्दिरक पाथरक चौखटिमे एकटा अस्पष्ट अभिलेख उत्कीर्ण अछि (बिहार की नदियाँ, हवलदार प्रसाद त्रिपाठी, पटना, १९७७ ई., पृ.४१०)। बेहट ओ लक्ष्मीपुरमे सेहो चण्डीमन्दिर शक्ति-साधनाक केन्द्र बनल अछि। जयमंगलागढ़ (बेगुसराय)क भगवती मंगलाकेँ “मंगल चण्डी” (देवी भागवत) कहल गेल अछि। एवं प्रकारे चण्डीक पूजन परम्पराक अवशेष विराटपुर (वीरहट्ट), गाजीपैता, लक्ष्मीपुर (कोशी क्षेत्र), बेहट, जयमंगलागढ़ एवं अरेराज (प.चम्पारण) क्षेत्रक चण्डीस्थानमे उपलभ्य अछि।

सिमरौनगढ़क कंकाली: तिरहुतक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेवक राजधानीनगर सिमरौनगढ़ (सम्प्रति नेपाल तराइमे अवस्थित)क कुलदेवी कंकालीक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति (खण्डित) एकटा मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित ओ पूजित अछि। मन्दिरक प्रांगणमे विष्णु, उमामाहेश्वर सूर्य आदिक विशाल- पाथरक कलात्मक मूर्तिसभ कर्णाटशैलीमे निर्मित एवं लोकपूजित अछि। कर्णाट राजा लोकनि पंचदेवोपासक रहितो शक्तिक उपासक छलाह। कर्णाट राजा शक्र सिंह द्वारा स्थापित सखराक भगवतीक शक्रेश्वरी एवं राजा हरिसिंहदेवक कुलदेवी तुलजा भवानीक (नेपाल उपत्यकाक तीनू राजधानी नगरमे स्थापित एवं पूजित मूर्ति सभ शक्ति उपासनाक उदाहरण बनि गेल अछि। कंकालीक एकटा मन्दिर राजपरिसर, दरभंगामे अछि।

कंकालीक तेसर सांस्कृतिक मिथिलांचलक भारदह (भीमनगर बराजसँ पश्चिम, वर्तमान नेपाल तराइ)क मन्दिरमे एकटा तेजस्विनी पाथरक मूर्ति स्थापित अछि। कंकाली भगवती चतुर्भुजी छथि, जे निसंदेह कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) थिक। कंकालीक पार्श्वमे अष्टभुजी दक्षिणकाली, वाम दिस चतुर्भुजी विष्णु आदि प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभक ऐतिहासिक महत्व अछि। कंकालीक उदर भाग गहीर धरि तराशल अछि आर हाथसभमे दण्ड ओ पाश बाँचल अछि। शेष खण्डित अछि।

आमीक अम्बिका स्थान: हाजीपुर-सोनपुरसँ छपरा मार्गमे दिघवारा (सारण) लग गंगाक वाम तटपर आमीमे अम्बिका भगवतीक एकटा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। आमी मही ओ गंगाक संगम क्षेत्र अछि। एहि भूभागकेँ संगमतीर्थ सेहो कहल जाऽ सकैछ। श्रुति अछि एहिठाम दक्ष प्रजापतिक यज्ञमे शिवा अपन प्राणाहुति देने छलीह। राजा सुरथ एहिठाम भगवतीक उपासना कयने छलाह। दुर्गा-सप्तशतीक अंतः साक्ष्यक अनुसार ओ एहिठाम भगवतीक मंदिरक मूर्ति बनाकऽ पूजने छलाह। आमी जाग्रत शक्तिपीठ अछि।

अम्बिकाक रूप विन्यासमे कहल गेल अछि जे ओ कमलासनपर आसीन छथि। हुनक हाथमे पाश, अंकुश आदि छनि एवं वाहन सिंह छनि। अम्बिकाक पूजोपासना समान रूपसँ शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि लोकनि करैत छथि। जैन सन्दर्भमे ओ नेमिनाथक यक्षिणी ओ शासनदेवी सेहो छथि।

सखराक छिन्नमस्ता: कुनौलीसँ (निर्मली, सहरसा) मात्र दू मील पश्चिमोत्तर दिशामे अवस्थित सखरामे छिन्नमस्ताक प्रसिद्ध मन्दिर अछि। मन्दिरक गर्भगृहमे कर्णाट राजा शक्रसिंह (१२८५-९५) भगवतीक मूर्तिक स्थापना कयने छलाह। फलतः सखराक छिन्नमस्ताकेँ शक्रेश्वरी सेहो कहल जाइत अछि। ओऽ तांत्रिक पूज्या भगवती छथि, मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित पंचदेवीमे छिन्नमस्ता प्रमुख छथि। सखरा सांस्कृतिक मिथिलांचलक नेपाल तराइ राजबिराज, सप्तरीमे पड़ैत अछि।

भगवती छिन्नमस्ता द्विभुजी रूपमे रति-कामक युगनद्ध आसनपर ठाढ़ छथि। दहिन हाथमे काता एवं वाम हाथमे स्वहस्ते मुण्डित मस्तक छनि। ओ दिगवस्त्रा छथि, मुक्तकेशा छथि। हुनक दुनू पार्श्वमे योगिनी ओ भोगिनी (डाकिनी) योनिमुद्रामे ठाढ़ भगवतीक कण्ठसँ निःसृत रक्तक धारकेँ पीबैत छथि। रक्तक पहिल धार भगवतीक अपने मुँहमे जाइत छनि। यैह सृष्टिक जीवनचक्र थिक। योगिनी ओ डाकिनीक हाथ सभमे कपाल ओ काता छनि। रजरप्पा (झारखण्ड) मे भगवतीक भव्य मन्दिर दर्शनीय अछि।

भगवतीक शास्त्रविहित एवं लोकविहित रूपसाधनाक सन्दर्भमे निम्नलिखित स्वरूपक प्रसिद्धि उल्लेखनीय अछि- लक्ष्मी (अन्धराठाढ़ी, मधुबनी; परानपुर, कटिहार), गजलक्ष्मी (भीठ-भगवानपुर, मधुबनी; रोसड़ा, समस्तीपुर आदि), सहोदरा माई (नरकटियागंज, प.चम्पारण), गढ़ी माइ (नेपाल तराइ), बुढ़िया माइ ( मंगरौनी, मधुबनी;कन्हौली, वैशाली आदि) आदिक अतिरिक्त परमेश्वरी (अन्धराठाढ़ी), वाणेश्वरी (मकरन्दा), भुवनेश्वरी (भवानीपुर), राजेश्वरी (डोकहर), सिद्धेश्वरी (सरिसव), जटेश्वरी (लोहट), विषहरी (दियारीथान, सहरसा) आदि। मिथिलांचलक गाम-गाममे पसरल पिण्डस्वरूपा सप्तमातृका एवं घर-घरमे पिण्डित गोसाउनि भगवतीक रूप विस्तारक सांस्कृतिक सर्वेक्षण ओ अनुशीलन आवश्यक अछि। एकर अतिरिक्त जलशक्ति पूरित नदी देवी सभमे गंगा, यमुना, कोशी, कमला ओ जीवछक शक्ति स्वरूपक पूजोपासना सेहो विशिष्ट अछि।
2.हरितालिका/ चौरचन्द्र/ अनंत चतुर्दशी- गजेन्द्र ठाकुर

हरितालिका पूजा व्रत (तीज)
तिथि भादव शुक्ल तृतियाकेँ कुमारि कन्या सोहागक लेल व्रत करैत छथि। कथा एहि प्रकारेँ अछि। सूतजी- पार्वती शिवसँ शिवसन वरप्राप्तिक व्रतक विषयमे पुछैत छथि तँ ओऽ उत्तर दैत छथि जे हिमवान पहाड़पर अहाँ भादव शुक्ल तृतियाकेँ ई व्रत कएने रही बारह वर्ष उल्टा टांग मात्र धुँआ पीबि कए, मघमे जलमे बैसि, श्रावनमासमे वर्षामे आऽ बैसाख दुपहरियामे पंचाग्निमे। तखन अहाँ पिता नारदकेँ कहलन्हि जे ओऽ पार्वतीक विवाह विष्णुसँ करओताह। ई सुनि अहाँ सखीक घरपर कानए लगलहुँ जे हम तँ पात्र शिवकेँ अपन पति बनाएब आऽ अपन सखेक संग गंगाकात खोहमे चलि गेलहुँ आऽ भादव शुक्ल तृतियाकेँ हमर बालूक प्रतिमाक पूजा कएलहुँ तखन हम आबि अहाँकेँ पति होएबाक वर देलहुँ। तखन अहाँ हमर बालुक प्रतिमाक विसर्जन कए पारण केलहुँ, तखने अहाँक पिता सेहो पहुँचि गेलाह आऽ अहाँकेँ घर अनलन्हि आऽ हमरासँ अहाँक विवाह भेल। अहाँक सखी अहाँकेँ हरिकए लए गेल छलीह तैँ एहि व्रतक नाम हरितालिका पड़ल।

चौरचनक कथा

सनत्कुमारकेँ नन्दिकेश्वर योगीन्द्र कथा सुनबैत छथि- कृष्ण मिथ्या आरोपसँ दुखित भए गणेश आऽ चन्द्रमाक पूजा कएलन्हि। पृथ्वीक भार उतारए लेल बलराम, कृष्ण आऽ कमलनाभ उत्पन्न भेलाह। कंसक वध कृष्ण कएलन्हि। मुदा कंसक ससुर जरासन्धक आक्रमण संकट देखि छप्पन करोड़ यदुवंशीक आऽ सोलह हजार आठ स्त्रीवर्गक संग द्वारका अएलाह।
संत्राजित सूर्यक उपासना द्वारका तटपर कए स्यामन्तक मणि- जे सभ दिन आठ भार सोना उत्पन्न करैत छल- पओलन्हि। ओऽ एकरा अपन भाइ प्रसेनकेँ दए देलन्हि। राजा उग्रक दुनू सन्तान छलाह- संत्राजित आऽ प्रसेन। एक दिन कृष्ण आऽ प्रसेन शिकार खेलाए लेल बोन गेलाह तँ एकटा सिह प्रसेन कए मारि मणि लए विदा भेल तँ जाम्बवान भालु ओहि सिंहकेँ मारि मणि अपन पुत्रकेँ खेलाए लेल दए देलन्हि। कृष्ण जख्न असगरे आपिस भेलाह तखन सभ हुनकापर प्रसेनक हत्या मणिक लोभमे करबाक आरोप लगओलक। तखन कृष्ण सभकेँ लए बोन गेलाह तँ सिंह आऽ प्रसेनकेँ मुइल देखलन्हि आऽ जाम्बवानक पुत्र सुकुमारक झूलामे लटकल मणि देखलन्हि। जाम्बवानक पुत्री कृष्णकेँ मणि लए भागए कहलन्हि, मुदा कृष्ण शंख फुकि सात दिन खोहमे भेल युद्धक बाद द्वारकावासी द्वारका घुरि कृष्णक अन्तिम संस्कार मृत बुझि कएल, मुदा २१ म दिन जाम्बवान हारि मानि पुत्रीक विवाह हुनकासँ कराए मणि उपहारमे देलन्हि। कष्ण ओहि मणिकेँ संत्राजितकेँ दए देलन्हि। संत्राजित हुनकापर मिथ्या आरोपसँदुखी भए अपन पुत्रीक विवाह कृष्णसँ कराओल आऽ स्यामन्तक मणि कृष्णकेँ देल मुदा कृष्ण नहि लेलन्हि।
फेर कृष्ण-बलराम जखन बाहर छलाह तखन शतधन्वा सत्राजितकेँ मारि मणि लए लेलक आऽ अक्रूर यादवकेँ दए अपने भागि गेल। सत्यभामाक कहलापर कृष्ण-बलराम ओकरा खेहारलन्हि, कृष्ण ओकरा मारल मुदा मणि नहि भेटल, ई कथा सुनिते बलरामकेँ ई शंका भेल जे कृष्ण कपट करैत छथि, से ओऽ कृष्ण द्वारका अएलाह मुदा बलराम विदर्भ चल गेलाह, अक्रूर तीर्थयात्रापर निकलि गेलाह, मणि धारण कए काशीमे सूर्यक उपासना करए लागल।
तखन नारद कृष्णकेँ भाद्र शुक्ल चौठमे चन्द्रमाक दर्शन कएलाक कारण ई कलंक लागल, से कहलनि, कारण रूपक गर्वमे चन्द्रमाकेँ गणेशजी श्राप देलन्हि जे एहि दिन हुनकर दर्शन करएबलाकेँ कलंक लागत।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश निर्विघ्नदेवक अष्टसिद्धि पूजा कएल आऽ जखन ओऽ घुरि रहल छलाह तँ चन्द्रमा हुनकर हाथी बला मस्तक, पैघ पेट देखि कए हँसि देलन्हि आऽ ई श्राप पओलन्हि। तखन एहि चतुर्थी तिथिकेँ ब्रह्माक कहल अनुसार गणेशक पूजा भेल फेर चन्द्रमाक अनुनय-विनयपर ई वर देल जे जे क्यो भाद्र शुक्ल चौठमे हथमे फल-फूल लए मंत्रक संग अहाँ दर्शन करत ओकरा कलंक नहि लागत।
अनंत पूजा
अनन्त भादवमास शुक्ल पक्ष चतुर्दशीकेँ अनन्त पूजा होइत अछि। कथा- जुआमे हारल युधिष्ठिरकेँ बोनमे कृष्ण एहि व्रत करबाकलेल कहलन्हि आऽ कथा सुनओलन्हि। सत्ययुगमे सुमन्त नाम्ना ब्राह्मण भृगुक कन्या दीक्षासँ विवाह कएलन्हि। मुदाक शील जन्मक बाद दीक्षाक मृत्यु भए गेलन्हि। फेर सुमन्तक विवाह कर्कशासँ भेलन्हि ओऽ शीलाकेँ कष्ट देमए लागलि। फेर शीलाक विवाह कौण्डिन्यसँ भेलन्हि। दुनू गोटे अनन्त चतुर्दशीक दिन यमुना तटपर घुरैत कल जाइत छलाह तँ स्त्रीगण लोकनि हुनका बाँहिपर अनन्तक ताग बान्हि देलन्हि जाहिसँ हुनकर सभक घर गृहस्तीमे समृद्धि आयल। घरमे माणिक्य रहितहुँ ई ताग देखि एक दिन पति ओकरा तोड़ि आगिमे फेंकि देलन्हि। शील जरल डोरकेँ निकालि दूधमे राखि लेल। आब विपत्ति शुरू भए गेल आऽ घरमे आएल दरिद्रताकेँ देखि कौण्डिन्य बोन चलि गेलाह। ओतए अनन्त भगवान हुनका विष्णु लग लए गेलखिन्ह। ओऽ हुनका अनन्त व्रत १४ बरख धरि करबाक लेल कहलन्हि।

नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा – बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ’ मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ’ आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।”

चौठचन्द्र पूजा
भादवमासक शुक्लपक्षक चतुर्थी तिथिकऽ ई पूजा होइत अछि।मनोकामना पूर्ण भेलापर ई पाबनि कैल जाइत अछि। अहि दिन चन्द्रमाक पूजा भॉंति प््राकारक पकवानक नैवेद्यसॅ कैल जाइत अछि।मिंथिलानरेश हेमांगद ठाकुर जे कि ज्योतिषी सेहो छलाह अपन कोनो मनोकामना पूर्ण भेलापर अहि पूजाक आरम्भ केने छलाह।अहि पाबनिमे दिन भरि निराहार रहिकऽ सॉंझमे विभिन्न प््राकारक पूरी पकवान सहित दहीक मटकुरी के अड़िपन पर उचित स्थान पर राखि पूजा प््राारम्भ कैल जाइत अछि।गणपत्यादि पंच देवता सहित गौरीजीक पूजा पहिने होइत अछि। जे विधवा स्त्री होइत छथि से गौरीक स्थानपर विष्णुक पूजा करैत छैथ।तकर बाद चतुर्थीचन्द्रक पूजा चानन, रक्त चानन, सिन्दुर, यज्ञोपवीत, अक्षत, फूल, फूलमाला, दूबि, बेलपात, जल, अर्घ्य इत्यादि लऽ पूजा कैल जाइत अछि।तकर बाद डाली लऽ तथा दही मटकुरी लऽ कऽ चन्द्रमाक दर्शन कैल जाइत अछि।
डालीलऽ दर्शन करैके मन्त्र –
नमो सिंह: प््रासेनमवधीतसिंहो जाम्बवताहत: ।
सुकुमारक मारोदीपस्तेह्यषव स्यमन्तक:॥
दही मटकुरी लऽ दर्शन करक मन्त्र –
नमो दधि शंखातुषाराभम्‌ क्षीरोदार्णव सम्भवम्‌।
नमामिशशिनं भक्त्या शंभोर्मुकुट भूषणम्‌॥
अर्धपात्रमे सब वस्तु राखि अन्तमे ”ब्रह्मणे नम:”।
तकर बाद कथा सुनि विसर्जन कैल जाइत अछि।कथा सुनैत काल हाथमे जे फूल रहैत अछि तकरा निम्न मंत्र पढै़त विसर्जित कैल जाइत अछि।
”रूपं देहि जयं देहि भाग्यं भगवान देहिमे।
धर्मान देहि धनं देहि सर्वान्‌ कामान प््रादेहिमे॥ च्च्
तकर बाद दक्षिणा दऽ प््रासाद वितरण कैल जाइत अछि।

(c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
‘विदेह’ (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx .txt वा .rtf फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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