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‘विदेह’ ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ )- part-I

In 'विदेह' ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ )- part-I on अक्टूबर 26, 2008 at 9:34 पूर्वाह्न

‘विदेह’ ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ ) एहि अंकमे अछि:-

श्री रामाश्रय झा ‘रामरंग’ (१९२८- ) प्रसिद्ध ‘ अभिनव भातखण्डे’ जीक मैथिली रचना “विदेह”क लेल।
१.संपादकीय २.संदेश
३.मैथिली रिपोर्ताज-
जितेन्द्र झा रिपोर्टिंग-(बाढ़िपर विशेष)- मैथिली रिपोर्ताज- नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक- आर्थिक- राजनीतिक- सांस्कृतिक समाचार। लन्दनसँ ज्योतिक रिपोर्ट
४. गद्य –
कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत
लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर “शशि” २. श्री कुमार मनोज कश्यप
श्री प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्य
यायावरी- कैलास कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी
शोध लेख:हरिमोहन झा समग्र जितमोहन झा-महिला-स्तंभ
कोसी गद्य (बाढ़िपर विशेष)1.डॉ गंगेश गुञ्जन 2. सुशांत झा 3. बी.के.कर्ण. 4. शक्ति शेखर 5. ओमप्रकाश झा
५.पद्य
१.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)
१. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा ३. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
पंकज पराशर शैलेन्द्र मोहन झा
महाकाव्य महाभारत (आगाँ) प्रकाश झा
कोसी पद्य (बाढिपर विशेष)-स्व.रामकृष्ण झा “किसुन”, विनीत उत्पल, कोसी लोकगीत.
६. मिथिला कला-संगीत(आगाँ)
७.पाबनि-संस्कार-तीर्थ -श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” आऽ नूतन झा
८. महिला-स्तंभ- कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृतिक संग खिलवार- जितमोहन झा
९. बालानां कृते-
१०. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी )
११. संस्कृत मिथिला
१२. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ)
13. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
Videha Mithila Tirbhukti Tirhut…
The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani and poem by Jyoti
14. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)

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American Chronicle – Lalu Prashad Yadav now in Land scam !
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http://www.videha.co.in ‘রিদেহ’ পাক্ষিক পত্রিকা विदेह मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Maithili Fortnightly e Magazine

विदेहक नव-पुरान अंकमे ताकू (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा रोमनमे टाइप करू)।

एहि पृष्ठ पर देल गेल मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित साइट सभमे ताकू (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा रोमनमे टाइप करू)।
मिथिला रत्न मिथिलाक खोज विदेह पुरान अंकक आर्काइव
रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एतय प्रकाशित रचना/संग्रह सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ संस्कृत-अंग्रेजी अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार विदेह ई पत्रिकाकेँ छैक।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (४):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक “नो एंट्री: मा प्रविश” केर ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल ‘विदेह’ केर समक्ष “श्रुति प्रकाशन” केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना ‘विदेह’ द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (५): “विदेह” केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्वपूर्ण सूचना (६): ७ सितम्बर २००८ केँ मिथिलांगन संस्था द्वारा श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ पाँच बजेसँ मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोजन होएत।
१५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि।
मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। १२ सितम्बर २००८ केँ कोशी, बाढ़ि आऽ दिल्ली एहि विषयपर संस्था राजेन्द्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्लीमे एकटा सेमिनारक आयोजन कए रहल अछि।

विदेह (दिनांक १ सितम्बर सन् २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:९ अंक:१७)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक १७, दिनांक १ सितम्बर सन् २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ आइ काल्हि जूझि रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओऽ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। ओतुक्का लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओऽ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता, चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आऽ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक एहि बेरक प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि!
पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आऽ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आऽ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन आएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक?
सामयिक घटनाक्रम- कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्धक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त। एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्धमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ध लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आऽ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल अछि। आऽ ई करण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आऽ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आऽ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आऽ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल अछि। भीमनगर बैरेज आब एकटा कोशीक सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल।

राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौरा करैत अछि आऽ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आऽ ओऽ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौरा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आऽ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे, नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आऽ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ, एहिसँ पार पाएब संभव अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जाऽ रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि।

उपाय की हो? कुशेश्व्रर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की हो? दामोदर घाटीक आऽ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आऽ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि। नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब। एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ध बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आऽ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आऽ त्वरित समाधन। आऽ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब। आऽ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आऽ ओऽ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत।
कमला धार
नहरिसँ लाभ हनि- एक तँ कच्ची नहरि आऽ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आऽ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि!

कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आऽ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाटमे १९५४ मे मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी तक बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आऽ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए!
स्कूल कॊलेजमे छुट्टी गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि?
एहि अंकमे:
बाढ़िपर विनीत उत्पलक पद्यक संग कोसी लोकगीत आऽ स्व.श्री रामकृष्ण झा “किसुन” केर पद्य सेहो देल गेल अछि। बाढिपर सुशान्त झाक आऽ शक्ति शेखर जीक निबन्ध सेहो देल गेल अछि।
श्री गगे श गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित “राधा” जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। वरिष्ठ साहित्यकार वैकुण्ठ झाजीक पद्य सेहो अछि। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक “यायावरी”, मित्रनाथ झा जीक पद्य, नूतन जीक चौठचन्द्र पूजापर लेख, श्याम सुन्दर शशि आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक आऽ अनलकान्त जीक कथा सेहो अछि। श्री शम्भू कुमार सि‍ह जीक पद्य सेहो ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री ओमप्रकाश जीक लेख., श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि।
मैथिली रिपोर्ताज लिखने छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा संगमे ज्योतिजी सेहो लंदनसँ रिपोर्ताज पठेने छथि।
श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो आगाँ बढ़ल अछि।
ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि।
शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि।
पोथी समीक्षा:
बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि सालक दोसर पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद।
“भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- “विदेह” ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, “विदेह” केर सेहो दायित्व।
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- “विदेह”क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
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१.मैथिली रिपोर्ताज-जितेन्द्र आऽ २.मैथिली रिपोर्ताज-ज्योति
१.मैथिली रिपोर्ताज-जितेन्द्र झा
नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार
“रे नोर एना तोँ नञि टपक”

कोशी नेपाल आऽ भारतक जनता लेल एकटा अभिशापसँ कम नञि । १८ अगस्तक कोशी नदी पुर्वी तटबन्धकेँ पश्चिम कुशहा लग तीन सय मीटर भत्थन करैत बाट बदलने छल । तञि के बाद नेपालक लगभग १ लाख जनता विस्थापित भेल। वएह पानि जहन बिहारमे आएल तँ आओर विकराल रुप ल लेलक । बिहारमे पानिसं ३० लाखसं बेशी जनता प्रभावित अछि, जाहिमे २० लाख कोशी इलाकाके अछि । मृतकक संख्या हजारोमे हेबाक आशंका कएल जाऽ रहल अछि। बिहार सरकारक तथ्यक अनुसार कोशी बाढिसँ ७ सय ७५ गामक २२ लाख ७५ हजार जनता प्रभावित अछि ।
कोशीक कोप

चीनक तिब्बत उदगमस्थल रहल कोशी नेपाल होइत बिहार कुर्सेला धरि सात सय २० किलमीटर दुरी पार करैत गंगानदीमे मिलैत अछि। कोशी नदी वार्षिक ५० अरब घन लिटर पानि गंगानदीमे पंहुचाबै-ए। कोशी नदीक वर्तमान जलाधर क्षेत्र ९२ हजार ५ सय ३८ वर्ग फ़िट मिटर अछि, जाहिमेसँ ४१ हजार ३ सय ३३ वर्ग किलोमीटर नेपालक भीतर पड़ैत अछि। कोशी योजना संचालनक ४५ वर्ष होइतो कोशी पीडितक समस्या जहिनाक तहिना अछि ।
नेपाल आऽ भारत दुनु देशकेँ एहि प्रश्नक उत्तर देव आवश्यक अछि- किए टुटल बान्ह ? बाढिसँ गरीब किसान भूमिहीन भऽ गेल अछि, ने लत्ता कपडा ने पेटमे अन्न आऽ ने पीबालेल पानि । किसान टकटक्की लगौने अछि कोशीक पानि पर, जे कखन घटत? जमिनदार पानिदार भऽ गेल, गाय महिष सबटा दहाऽ गेल छैक, आव बाँकी छञि मात्र जीवाक आश,,,,,।
दोष ककर
नेपाल आऽ भारत दुनु पक्ष एक दोसराके दोषारोपण कऽ रहल अछि । ‘भारतीय प्राविधिक तटबन्ध मरम्मतिक लेल गेल छल मुदा, ओत्त काज करबाक वातावरण नञि बनलाक बाद तटबन्ध निर्माण नञि भऽ सकल, भारतीय पक्ष कहैत अछि। कोशी नदीक समझौता अनुसार नेपाल किछु नञि कऽ सकैत अछि, तेँ हमसभ मुक दर्शक छी, दोष भारतक अछि नेपाली पक्षके दाबी। भारतीय प्रधानमन्त्री डा मनमोहन सिंह बाढ़िक बिभीषिका देखिते राष्ट्रीय विपत्तिक घोषणा कऽ देलनि। बहुत रास पाई आऽ खाद्यान्न सहयोग करबाक आश्र्वासन सेहो। मुदा कोशी तटबन्ध टुटल किए, एकर सरकारी स्तरपर कोनो तरहक जाँच-बुझक आदेश नञि देल गेल अछि। हँ नेपालसँ एहि बिषयमे बातचीत करबालेल एकटा उच्चस्तरीय कमिटीक गठन कएल गेल अछि। ओऽ समिति की बातचीत करत आऽ की निष्कर्ष निकालत भविष्यक गर्भमे अछि।
क्षतिपुर्ति
कोशी समझौताक अनुसार कोशी तटबन्धक सभ तरहक काज भारतक जिम्मामे अछि । तटबन्धक मरम्मति मात्रे नञि तटबन्ध टूटलासँ होबऽ बला क्षतिपुर्ति सेहो भारते देत, से सन्धिमे उल्लेख अछि । नेपालक परराष्ट्रमन्त्री उपेन्द्र यादव कोशी समझौता अनुसार भारत सरकारकेँ सभ तरहक क्षतिपुर्ति देबऽ पडतै, से कहैत छथि। सन्धिक अनुसार इलाज, पुनर्वास आऽ खाद्यान्न जेहन सहयोग भारत सरकारकेँ करक चाही। भारतीय प्रधानमन्त्री आऽ विदेशमन्त्रीसँ सहयोगक आग्रह कएल गेल आऽ ओऽ सभ एहि प्रति सकारात्मक रहल, मन्त्री यादव कहलनि। आब देखऽ के बाँकी अछि, कोशी पीडित धरि कहिआ पडोसी देशसँ सहयोग पंहुचैत छञि।
नञि रुकल कटान
कोशी कटान नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल गेल सभ प्रयास असफ़ल भेल अछि। कोशीक सभसँ महत्वपुर्ण मानल जाएबला स्पर बहऽ लागल अछि। नेपाल आऽ भारतीय प्राविधिक टोलीद्वारा कटान नियन्त्रणलेल कएल गेल प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। संयुक्त प्राविधिक टोलीक निगरानीमे बीस हजार बोरा बालु, गिटी राखि कऽ नदिकेँ पश्चिम दिश घुमएबाक प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। बर्षाक कारण सेहो बाढि नियन्त्रण दुरुह बनल अछि। नेपाल सरकार कोशी कटानसँ बिस्थापित भेनिहारक प्रति परिवार १५ हजार टका सहयोग देत। ई १५ हजार ब्यथित कोशीपीडितके कत्तेक सहयोग भऽ सकत ओऽ सहजहि अनुमान लगाओल जा सकै-ए।
किछु मरल बहुतो निपत्ता
सप्तकोशी नदी गामेक बाटसँ बह लगलाक बाद विस्थापित भेनिहारसभ एखनो अपन परिजनक खोजिमे अछि । हरिपुर, श्रीपुर आऽ पश्चिम कुशाहासँ विस्थापित सभ अपन घर परिवारक सदस्यके ढुंढि रहल अछि। सुनसरी प्रशासन एखनधरि ५ गोटेक मृत्युक पुष्टि कएलक अछि। मुदा एखनो चारि सय गोट सम्पर्कविहीन अछि।
दोसर दिश कोशी बाढ़िसँ विस्थापित आब पेटझरीक चपेटमे आबि गेल अछि। पानि गन्दा भऽ गेलाक बाद विस्थापित शिविरमे पेटझरी आऽ मुँहपेट जाएव विकराल रुप लऽ लेने अछि। विस्थापित एक बालक सहित दु गोटक पेटझरीसँ मृत्यु भेल अछि। मृत्यु भेनिहारमे श्रीपुर-३ के ५६ वर्षीयय तेजन सदा आऽ ६ वर्षिय रम्बा सदा अछि। सुनसरीक विभिन्न २९ शिविरमे एक हजार ५ सय गोट एखन बिमार अछि। अधिकांशमे पेटझरी, निमोनिया, बोखार आऽ छातीमे इन्फ़ेक्सन देखल गेल अछि। रोगीमेसँ १२ गोटक अवस्था चिन्ताजनक रहल, उपचारमे संलग्न चिकित्सक जनौलक अछि ।
कत्तेक बिपत्ति !
बाढ़िसंगहि सप्तरी जिलामे सर्पदंश बढि गेल अछि। सर्पदंशसँ शुक्रक राति आओर एक गोटेक मृत्यु भेल अछि। भादव महिनामे सांप कटलासँ मरनिहारक संख्या ६ भऽ गेल स्थानीय जनस्वास्थ्य कार्यालय जनौलक। खेतमे काज कऽ रहल स्थानीय रामकृष्ण यादवकेँ सांप कटने रहन्हि। इलाजक लेल सगरमाथा अंचल अस्पताल लऽ जाइत काल हुनक मृत्यु भेल। एहिसँ पहिने फ़किरा ३ क ४५ बर्षीय रामअशिष यादव, पत्थरगाडा ७ क १४ बर्षिय बमभोला यादव आऽ महादेव ८क १२ बर्षीय घनश्याम इसरक मृत्यु भऽ चुकल अछि ।
बिहारक बाध्यता
कोशीक जलस्तर बढ़लाक बाद बिहारक स्थिति आओर असहज भऽ गेल अछि। बिहार सरकार वायु सेनाक ४ हेलिकप्टर, ८ सय ४० नाव आऽ सेनाक मदतिसँ युद्ध स्तरमे राहत कार्य भऽ रहल बतौलक अछि। मुदा बाढिपीडित लाखो जनता एखनो बाढिमे फ़ंसल अछि। सरकारी सहयोग समेत अपर्याप्त रहल, बाढिपीडितक कहब छञि। बिहार सरकार एखन धरि कोशी क्षेत्रमे २८ आऽ समुचा राज्यमे ७६ गोटेक मृत्यु भेल जनौलक अछि। मुदा प्रभावित इलाकामे स्थानीयवासी बहुतो शव दहाइत देखल गेल कहैत अछि। बिहार सरकारक तथ्यांकमे कोशी बाढ़िसँ ७ सय ७५ गामक २३ लाख जनता प्रभावित भेल कहल गेल अछि।
मातृभाषाक मोह
२३ अगस्त । नेपालमे मैथिली भाषा साहित्य पाछु हेवाक कारण शाहवंशीय राजाक गलत प्रवृति रहल बताओल गेल अछि। नेपालमे शाह वंशीय राजाक शासन शुरु होइते मैथिली भाषा साहित्य आऽ संस्कृतिसँ भेदभाव शुरु कएल गेल कहल गेल अछि। मैथिली साहित्य परिषद सप्तरीक अध्यक्ष हरिकान्त लाल दास शाह वंशक शुरुवातेसँ मैथिली भाषा साहित्यक विकासमे अवरोध सॄजना भेल बतौलनि। गणतन्त्र नेपालमे जँ सभ भाषा साहित्यक उत्थान हएत तहने नव नेपालक सार्थकता हएत हुनक कहब छन्हि। मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार दिवसमे आयोजित कार्यक्रममे प्रमुख अतिथि दास शाहवंशपर मैथिलीसँ भेदभाव करबाक आरोप लगौलनि। तहिना मैथिली साहित्य परिषद्क उपाध्यक्ष देवेन्द्र मिश्र मातृभाषा मैथिली होइतो अंग्रेजी, नेपाली, हिन्दी सहितके अन्य भाषा दिश आकर्षित हएव मैथिलीक लेल हितकर नई अछि कहलनि। “आब त गामक अशिक्षित, दलित आऽ गरिव वर्ग मैथिलीके जीवन्तता द रहल अछि” मिश्र आगु कहलनि। मधेशी कानुन व्यवसायी समाजक केन्द्रिय अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी भाषिक क्रियाकलापमे दलित वर्गकेँ सेहो समेटल जाए से सुझाव देलनि। कार्यक्रममे मैथिली पत्रकार परिषदक अध्यक्ष श्यामसुन्दर यादव, उद्योग वाणिज्य संघ सप्तरीक महासचिव सुरेश कुमार सिंह, पत्रकार हेमशंकर सिंह मन्तव्य ब्यक्त कएने रहथि। मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार दिवसक अवसरमे शनिदिन राजविराजमे सात गोट मैथिली बालकविकेँ पुरस्कृत कएल गेल अछि। मैथिली कवि परिषदक अध्यक्ष महेन्द्र मण्डल “बनवारी” कृष्णजन्माष्टमी तथा अपन जन्मदिवसक अवसरमे बालप्रतिभा पुरस्कार स्थापना कएने छथि। एहि बेरक बाळ प्रतिभा पुरस्कार श्यामसुन्दर साह, विकास कुमार मण्डल, राघवेश देव, आकाश कुमार मण्डल, अन्जु यादव, सोनु दास आऽ विवेक कुमार मण्डलके देल गेल ।
२.मैथिली रिपोर्ताज-लन्दनसँ ज्योतिक रिपोर्ट
ब्रिटिश लाइब्रेरी मे रामायणक परचम

इंगलैण्डके राजधानी लन्दनके ब्रिटिश लाइब्रेरीमे आइ काल्हि रामायणके परचम फहरायल अछि।१६ मई सॅं १४ सितम्बर २००८ तक चलऽ बला अहि प््रादर्शनीक विज्ञापन लाइब्रेरीक बाहरी देवारक उपरि बीच लन्दनके मुख्य सड़क पर लागल पैघ बैनर के रूपमे विश्वके सबसऽ पैघ महाकाव्य रामायणक महत्त्व उद्घोषित कऽ रहल अछि।
रामायणक समीक्षा तथा इतिहासक संसोधन पर विभिन्न विद्वानक लिखल अनेको पुस्तक सेहो प्रदर्शित अछि। पुस्तक सहित भारतीय चित्रकला सऽ शोभित विभिन्न वस्तु जेनाकि कप, छत्ता, कुशन, ग्रीटिंग कार्ड, बैच सब राखल अछि।अन्दर के गैलेरी मे प््रावेशे मे एक पैघ स्क्रीनपर सम्पूर्ण रामायण कहल गेल अछि तथा प्रसंगक अनुसारे मेवारक चित्रशैलीमे चित्रक स्लाइड देखायल गेल अछि। ई मेवाड़के राणा जगत सिंह (१६२८-१६५२) रामायणक मेनुस्कृप्ट पर आधारित अछि।मेवाड़क राजघराना सऽ ताल्लुक राखऽ वला ससोदिया राजपूत सबहक कहब छै जे ओ सब रामक वंशज छैथ।ताहि हिसाबे ई रामायण हुनकर सबहक पारिवारिक कथा छैन।
अहि स्क्रीनक बगलमे रामायणक महत्व एवम्‌ ओकर कथाके छोट रूपमे बताबऽके सराहनीय प्रयास सेहो कैल गेल अछि।करीब बारह प्रसंग उल्लेखित अछि-रामक बाल्यकाल, रामक वनवास, वनमे जीवन, भरत मिलाप, सीताहरण, सुग्रीव मिलन, सीताक ताक, हनुमान द्वारा सीताक भेटनाइ, लंकामे प्रथम आक्रमण, राक्षस एवम्‌ मायावी सबसऽ युद्ध, अंतिम युद्ध, एवम्‌ सीताक वापसी।

अन्दरके माहौल त मानू पूर्णत: सतयुग पहुँचा देत। लाल़ संतरा पीयर रंग सॅ भरल स्थान ताहिपर सऽ मध्यम रौशनी तकर बीच दशमुख रावणक पुतला आ सबतरि सौ स बेसी कागज पर कैल चित्रकारी पत्थड़क नक्‌काशीक फोटो किछु कपड़ा पर कैल १९सम शताब्दीक चित्रकारी सेहो।
चाऊ नाचमे उपयोग हुअ बला कागज के लुगदी सऽ बनल मुखौटा छलजे काफी चकमक रंग सऽ रांगल छल। चाउ नाचक विडियो सेहो छल।चाउ नाच झारखण्ड उड़िसा आ पश्चिम बंगालक मिलक स्थान पर के जनजाति सबहक संस्कृति छै।तकर बाद कत्थकलीक मुद्रामे पुतला राखल छै।केरलमे प््रासिद्ध शैडो प्ले के विडियो चलैत रहै छै। अनेको शैडो पप्पेट राखल अछि।शांगरी रामायण के दसटा प््रासंगक चित्र अछि जे हिमाचल प्रदेशक कुलु प्रदेश सऽ आयल छल। अहिमे अंगद द्वारा श्रीरामके लंकाक विवरणक प्रसंग दुहरायल छल। तकर बाद अनेको मैनुस्कृपटमे वाल्मिकी रामायणक कश्मीरी मैनुस्कृप्ट तथा पटना के वैष्मन दास द्वारा १७८५ ईसवीमे बनायल चित्र शामिल अछि।
सबसऽ पैघ आकर्षण छल उन्नीसम शताब्दीक बनल कपड़ाक पेटिंग।करीब ७’ लम्बा आ ७’ चौड़ा सूती कपड़ामे आन्ध्रा शैलीमे पेटिंग कैल अछि जाहिमे बामा कात नीचासॅ रामक जन्मसॅ रामायणक क्रमिक प््रासंगके वृताकार रूपस देखायल गेल अछि।बीचमे पैघ चित्र अछि राम सीता सहित रामक राजदरबारके।तहिना ७’ बाइ ५’ आर ७’ बाइ १०’ लम्बा कपड़ापर सेहो पेटिंग कैल गेल अछि।अहिसब मे रामायण तेलुगु मे लिखल अछि।श्रीलंकासऽ प््रााप्त कपड़ाक पेण्टिग सेहो अछि।परन्तु सब पेटिंगमे रामायणक उत्तरकाण्ड नहिं देखायल गेल अछि। लव-कुशक मूर्तीक फोटो जरूर अछि। मूर्तीक फोटोमे आठम शताब्दीक एलोराके गुफाक फोटो सेहो अछि।रामायणक थाई रूपान्तरण रामाकिन देखल जा सकैत अछि।कम्बोडिया एवम्‌ थाइलैण्डके हनुमानक फोटो एवम्‌ मुखौटा देखल जा सकैत अछि। भारतसँ लऽ कऽ विश्वक सभ शैलीक चित्रकलासँ सज्जित एतए सीतादेवीक एकटा मिथिला चित्रकला सेहो विराजमान छल। ई छल नुका कए राम द्वारा सीताक लंकाप्रवासक दौरान पतिव्रता रहबापर अयोध्यावासीक संदेह सुनबाक प्रसंग।लव-कुशक मूर्तीक फोटो जरूर अछि। मूर्तीक फोटोमे आठम शताब्दीक एलोराके गुफाक फोटो सेहो अछि।रामायणक थाई रूपान्तरण रामाकिन देखल जा सकैत अछि।कम्बोडिया एवम्‌ थाइलैण्डके हनुमानक फोटो एवम्‌ मुखौटा देखल जा सकैत अछि। भारतसँ लऽ कऽ विश्वक सभ शैलीक चित्रकलासँ सज्जित एतए सीतादेवीक मिथिला चित्रकला सेहो विराजमान छल।
लाइब्रेरी यूस्टन ट्यूब स्टेशन सऽ २ मिनट आर किंग्स क्रॉससऽ ५ मिनट आरामसऽ पैरे चलिकऽ पहुॅंचल जा सकैत अछि।झटकि क चली त दुओ मिनट नहि।कैम्पसके अन्दर सेहो रामायणक बैनर लागल भेटत।हॉलमे जायकाल बैगके चेकिंग होइत छै।अन्दर फोटोग्राफी के अनुमति नहिं अछि।

(आभार: श्री अजित कुमार झा, लन्दन)
गद्य –
कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत
लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर “शशि” २. श्री कुमार मनोज कश्यप
श्री प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्य
यायावरी- कैलास कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी
शोध लेख:हरिमोहन झा समग्र बूढ़-बुजुर्ग समस्यापर लेख
कोसी गद्य 1.डॉ गंगेश गुञ्जन 2. सुशांत झा 3. बी.के.कर्ण. 4. शक्ति शेखर 5. ओमप्रकाश झा
कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत

शंभु कुमार सिंह, जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, मैट्रिक धरि गामहि सँ, आइ.ए., बी.ए.मैथिली सम्मान, एम.ए.मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु] उत्तीर्ण 1995, “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर वर्ष 2008, ति.माँ.भा.वि.वि.भा.बिहार में शोध-प्रबंध जमा (परीक्षाफल प्रतीक्षारत)। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता आ निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे, शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे कार्यरत।
दूभि
09 मई 2008 क बात थिक। गाम गेल रही। साँझ चारि बजे तरकारी किनबा आ घुमबाक लाथे तिरंगा चौक दिस चलि गेलहुँ, घुरैत काल स्कूल लग अबैत-अबैत दीया-बातीक बेर भ’ गेलैक। गरमीक दिन छलैक मोन भेल कनी काल स्कूलक ओहि प्रांगणमे सुस्ता ली जतय कहियो बैसि हम अपन पाठ याद करैत रही। जहिना बैसबाक उपक्रम कयलहुँ कि एकटा अप्रत्याशित स्वर सुनबामे आयल… हे बाउ! ओतय नहि एमहर आउ। हम चौंकि गेलहुँ, देखैत छी तँ सरिपहुँ एकटा स्त्री हमरा सोझामे ठाढ़ छलीह आ बैसबाक आग्रह क’ रहल छलीह। हम बैसि गेलहुँ, हमरा सम्मुख ओ स्त्री सेहो बैसि गेलीह। हम साश्चर्य ओहि स्त्रीकेँ देखय लागलहुँ जिनक रूप-रंग किछु एना रहनि—हरितवर्णक शरीर ताहिपर हरियर रंगक मैल,पुरान-सन साड़ी जे कहुना हुनकर स्त्रीयांगकेँ झाँपने रहनि, ताहूमे कतोक ठाम पियन लागल, शेष शरीर उघारे बुझू। सम्पूर्ण शरीरमे छोट-पैघ घाव जाहिसँ पीज बहैत रहनि। एक-दू ठाम मैला सेहो लागल, जे दुर्गन्ध करैत छल। बामा जाँघ पर ढ़ल-ढ़ल करैत फोका, दहिना जाँघ पर गोदना जकाँ कोनो विशिष्ट आकृति, दुनू हाथ नोछड़ल जकाँ, माथक केश गोबरछत्ता जकाँ जाहिमे शिखर, पान-पराग, तुलसी, रजनीगंधा, माणिकचंद गुटखा, आदिक फाटल-चिटल पुड़िया, अखबार, कागदक टुकड़ी, जड़लका सिगरेटक पुत्ती आ टुकड़ी, सुखल गोबर, सूगरक मैला आदि-आदि सभ ओझरायल। एहि नारीक विचित्र ओ दयनीय दशा देखि हमर उत्कंठा बढ़ि गेल।
हम पुछलियनि– अहाँ के छी?
ओ कहलनि– हम दूभि थिकहुँ। वैह दूभि जाहि पर अहाँ एखन बैसल छी। वैह दूभि जतय बैसि अहाँ नेनपनमे नीरजक कविता पढ़ैत छलहुँ “यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनो तीरों से चल रहा राह मनमानी है…।”
हम फेर पुछलियनि –अहाँक एहन दुर्दशा किएक ?
ओ बजलीह— बाउ, हम देखि रहल छी जे अहाँ तखनसँ हमर अंग-प्रत्यंगकेँ खूब नीक जकाँ निहारि नेने छी। पहिने अहाँ बताउ, हमरा सुनबामे आयल अछि जे अहाँ साहित्यमे उच्च शिक्षा प्राप्त केने छी, ओहुमे मैथिली सन सरस साहित्यमे।
हम कहलियनि—सत्ते कहलहुँ।
तखन संभव भ’ सकय त’ हमर एहि दयनीय दशाकेँ अहाँ कोनो पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित करबा दिऔक। आ ओ आश्वस्त हैत बाजय लगलीह—बाउ, हमर शरीर स्कूलक एहि हातामे पसरल दूभिक प्रतीक थिक तैँ हरियर। हमरा माथ पर जे अहाँ गुटखा, सिगरेटक टुकड़ी, अखबार आ कागदक टुकड़ी देखैत छी से एहि स्कूलक छौंड़ा-छौंड़ी सभक किरदानी थिक, हम अहाँकेँ कहैत जाइत छी आ अहाँ एमहर-ओमहर नजरि दौड़ा-दौड़ा क’ देखने जाउ….। हमर देह जे घावसँ दागल अछि से सिगरेटक जड़लका पुत्तीसँ, हाथ जे नोछड़ल देखैत छी से थिक मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकरक किरदानी, ओ सभ दिन एतय आबि छिल्ला छिलैत अछि, दिनमे कैक बेर सूगर, महिस, गाय, बकरी आदि हमरा दूषित करैत रहैत यै, बाम जाँघ पर ई ढ़ल-ढ़ल फोका थिक वैह मंगरूआक लोकक किरदानी, ओ काल्हि राति चूल्हिक अँगोरा हमरा देह पर फेंकि देलक, आ हमरा दहिना जाँघ परक ई चेन्ह जकरा अहाँ गोदना बुझि रहल छी से वस्तुतः कोन चीजक आकृति थिक से हमरा कहितहुँ लाज लागि रहल ऐ, साँझहिकेँ, माने एखनसँ कनी कालक पश्चाते देखबैक जे एहि गामक गँजेरी छौंड़ा सभ हेज बनाकेँ आओत, सिगरेटमे भरि कए गाँजा पीयत आ हमरा झरका-झरका कए एहन अश्लील आकृति बनबैत अछि, हे! ओहिठाम देखियौक…, ई जे मैला देखि रहल छी, से थिक एहि आस-पड़ोसक स्त्रीगणक काज, कने रतिगर भेलाक बादे एक दिस सँ पथार जकाँ बैसि जाइत छथि। हे! ओमहर देखियौक हत्ताक कछेड़मे… की कहू बाउ, जीयब दूभर भ’ गेल अछि।
(एकटा दीर्घस्वास लैत) ओ फेर बाजय लगलीह–बाउ, अहाँकेँ अपन नेनपनक बात स्मरण अछि ने ? ताहि दिन प्रातः 10 बजे (प्रायः) स्कूल पहुँचलाक पश्चाते सभसँ पहिने सरस्वती वन्दना होइत छलैक जाहिमे शिक्षक-छात्र सभ क्यो भाग लैत छलाह। तकरा बाद श्रीवास्तव मास्टर साहेब सभ नेनाकेँ एक पतियानीसँ बैसा दैत छलाह, आ ओसब नेना एकहक टा कागद आ आन-आन सभ प्रकारक गंदगी सभ चुनि-बीछि लैत छल। हमर काया एकदम साफ भ’ जाइत छल। कक्षा सभमे जखन हाजरी होइत छलैक तँ नाम पुकारल जाइत छलैक, हरेराम, युगलकिशोर, शंभु, कुमारसंभव, चन्द्रकला, रहीम, कौशल्या, कतेक मधुर आ सार्थक नाम! सुनि कए मोन तृप्त भ’ जाइत छल। साँझ के नेना सब कबड्डी आ खो-खो खेलाइत जखन गिर जाइत छल तँ हम ओकरा बेसी चोट नहि लागय दियैक, वात्सल्यक अनुभव करैत छलहुँ तहिया। शनि केँ विशेष आयोजन होइत छलैक। शनिचराक गुर-चाउर बाकुटक-बाकुट नेना सभ खाइत छल, की कहू बाऊ, अहाँ सभक हाथ सँ गिरलाहा गुर-चाउर खयबा लेल हमहुँ शनि दिनक प्रतीक्षा करैत छलहुँ। दोसर पहरमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक। “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस ककर…। कखन हरब दुःख मोर हे भोला बाबा… । दुनियाँ मे तेरा है बड़ा नाम, आज मुझे भी तुमसे पर गया काम….।” अहाँकेँ तेँ स्मरण हेबे करत बाउ रमाकान्त एकबेर गयने छलाह “चल चमेली बाग मे मेवा खिलाऊँगा…..” ताहिपर मोलवी मास्टर साहेब हुनका चुत्तर पर ततेक ने छौंकी मारने रहनि जे बेचारेक सभटा मेवा घोसड़ि गेल रहनि। आ अहाँकेँ ओ अन्त्याक्षरी वला बात याद अछि की नहि? तहिया अन्त्याक्षरी मे कविताक पद्य सभ पढ़ल जाइत छलैक, अहाँ एकबेर ‘य’ पर अटकि गेल रही, गाब’ लगलहुँ—“ये मेरा दीवानापन था….”अहाँकेँ मोलवी साहब बजा कए पुछने छलाह “यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ……अहाँ काल्हिये ने याद केने छलहुँ, तँ बिसरि कोना गेलहुँ ? ” आ तकरा बाद हुनक छड़ी आ अहाँक दुनू हाथ। एकदिन रविशंकरक चुगली एकटा नेना क’ देने रहैक जे “मास्टर साहेब ई अपन ककाक जड़लका बीड़ी पीबैत रहय” एहि लेल श्रीवास्तव मास्टर साहेब रविशंकरकेँ रौद मे एक घंटा धरि अहीठाम मुरगा बना देने रहथि। ताहिदिन ककर मजाल रहैक जे एहि स्कूलक हाता मे क्यो गाय, महीस, आ बकड़ी-छकड़ी ल’ कए घुसि जायत। यैह मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकर एतय एकबेर छिल्ला छिलय बैसल रहय, मुखियाजी हुनका ततेक ने गारि-बात दलकैक, तकर ठेकान ने।
ओ बजने जाइत छलीह आ हम अपन अतीतलोकमे विचरण क’ रहल छलहुँ। अचानक हम हुनका टोकि देलियनि– अच्छा एकटा बात कहू, आइ काल्हि की एहन व्यवस्था नहि छैक एतय ? आब तँ देखै छियै जे ताहि दिन सँ बेसी सरकारक ध्यान शिक्षा पर छैक। लोक सेहो जागरूक भेल अछि शिक्षाक प्रति। हम त’ देखि रहल छी जे नीक भवन अछि, पानि पीबा लेल कल अछि, मूत्रालय अछि, शौचालय अछि, उचित संख्यामे शिक्षकगण छथि, आब की चाही ?
ओ बजलीह– औ बाउ! अहाँ जे किछु बजलहुँ सेहो साँचे थिक मुदा अहाँ आइ एलहुँ काल्हि चलि जायब। हम तँ कतोक बरखसँ एतहि छी आ प्रत्यक्षदर्शी छी, तैँ हमहुँ जे कहल आ जे कहब से फूसि नहि। एतय दूई भवन मे चारि टा कक्ष छैक आ विद्यार्थी 400 सयक करीब, एक तिहाई बच्चा कक्षमे बैसैत छैक आ शेष एहि हातामे आ ओहि बड़क गाछतर घुड़दौड़ करैत रहैत छैक, क्यो गुटखा, क्यो….., क्यो चरैत महिसक सींग पर दय ओकरापर चढ़बाक अभ्यास करैत अछि तँ क्यो……..। शौचालय, मूत्रालयकेँ अहाँ एकबेर देखि अबियौक एकोटामे पल्ला नहि लागल छैक, उपरसँ ततेक दुर्गन्ध जे राम कहू ! कल अहाँ काल्हि आबि कए देखि लेब। ई तँ परसू जलघर बाबूक बेटीक बियाह छलनि ताहिलेल ओ अप्पन कल एतए लगौने छलाह, आ शौचालयमे बोराक चट्टी। काल्हिए कलो खुलि जेतैक ? एतय गड़लाहा पाइपे टा स्कूलक छैक। की कहू, कल जहिना लागै छैक पाँचे-दस दिनमे क्यो चोरा लैत छैक। हे लियह! कुकुरक झौहड़ि सुनि रहल छी ने अहाँ ? बराती सभ जे काल्हि भोरमे चूड़ा-दही खा-खा क’ पात सभ स्कूलक पछुआड़ि मे फेकने छल ततहि कुकुर सभ लड़ि रहल अछि।
खैर! छोडू ई सब बात। आब पढ़ाईक व्यवस्था सुनू— अहाँ केँ तँ बुझले हैत जे हमरा सभक दयानिधान मुखमंत्रीजी कॉन्ट्रेक्ट पर कैक लाख लोककेँ बिना कोनो परीक्षे-तरीक्षे नेने मास्टर बना देलथिन, सेहो की जे गामक लोक गामहिमे शिक्षक हेताह। तैँ ढ़ोरहाय-मंगड़ू सब शिक्षक बनि-बनि एतय आबि गेल छथि, जिनकामे सँ कतोक केँ तेँ अपन नामो…..। प्रार्थना आब नहि होइत छैक। जँ कहियो काल होइतो छैक तँ चारि सय मे सँ चारिये टा नेनाक मुँहसँ स्पष्ट शब्द बहराइत छैक बाँकी सब आऊँ-आऊँ, ऊँ-ऊँ करैत रहैत छैक। हाजरी मे नाम पुकारल जाइत छैक-–डबलू, बबलू, डेजी, रोजी, स्वीटी…..। शनिचराक प्रथा उठि गेल छैक। सांस्कृतिक कार्यक्रम एखन धरि होइत छैक, एखनो गीत गाओल जाइत छैक—“एक आँख मारूँ तो पर्दा हट जाये, दूजा आँख मारूँ कलेजा फट जाये………। तनी सा जींस ढीला कर…. आदि।” एक दिनक बात कहैत छी, एकटा विद्यार्थी गाना शुरू कएलक—“चोली के पीछे क्या है……” आकि सबटा मास्टर ठेठिया-ठेठिया क’ हँस’ लागलाह। मंजय मास्टर साहेब केँ नहि रहल गेलनि ओ नेनाकेँ डाँटि कय बैसा देलथिन। ताहिपर, मंतोष मास्टर साहेब आ मंजय मास्टर साहेबमे नीक जकाँ बाझि गेलनि।
मंजय मास्टर साहेब कहलैथ—मेरा मानना है कि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है, अगर यही गाना गाना उस बच्चे की मजबूरी है, तो हम एक शिक्षक होने के नाते इसी गाने के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल सकते हैं, बस एक वाक्य में समझाकर की, “चोली के पीछे, ‘माँ’ होती है, जिसका अमृतपान करके हम, आप, सबके शरीर को जीवन मिला है।”
एहि घटनाक बाद सभ शिक्षक मिलि कए मंजय बाबूक नव नामकरण कय देलकनि ‘मायराम’। तहिया सँ ओहि कागमंडली मे हंस सदृश्य मंजय बाबूक बुधिये हेरा गेलनि। एकटा आर गप्प सुनू, यैह पिछले शनि दिनक बात छैक, अन्त्याक्षरी चलैत रहैक, एक सँ बढ़िकए एक कटगर फिल्मी गाना सब नेना लोकानि गबैत छल, अचानक ‘य’ पर एकटा दल अटकि गेलैक….. एकटा बच्चा उठल आ कहलक, “यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल…….।”
एकटा मास्टर साहेब ओहि बच्चकेँ लगमे बजौलकनि आ कहलथि– “अहाँ काल्हिये ने अपन मम्मी-पप्पाक संग सिनेमा देख’ सहर्षा गेल रही, ओहि सिनेमाक गाना, ये गोरी गोरी बाँहे, ये तिरछी तिरछी…….,बिसरि गेलहुँ ? बड़ भोदू छी अहाँ।”
दुभि रानीक कथा चलितहि रहनि की एहि बीचमे हमरा एकटा आर नारीक कर्कश स्वर सुनाए पड़ल… “गै माय के छियै ई मुनसा! ऐतेक कालसँ एतय की क’ रहल छैक? बुझैत नहि छैक जे ई लोक-बेदक, बाहर-भीतर करबाक बेर छैक?”
हमर ध्यान ओमहर गेल, अन्हारमे बुझा पड़ल जे तीन-चारिटा स्त्रीगण एम्हरे बढ़लि चलि आबि रहल छलीह। हम जा एमहर ताकी ताधरि दूभिरानी निपत्ता ! हमहुँ उठि कए घर दिस चलि देलहुँ।
ओहि भरि राति हमरा निन्न नहि भेल। कारण छल जे हम ई निर्णय नहि क’ सकलहुँ जे ओ सरिपहुँ दुभिए छलीह आ कि हमरा मोनक भ्रम ? जतेक सोचैत गेलहुँ ओतेक ओझराइते गेलहुँ, मुदा एकटा बात हमरा मोनमे घर क’ लेलक जे ई घटना एकटा कथाक रूप अवश्य ल’ सकैत अछि। काल्हिए हमरा मैसूर जेबाक रहय। सोचलहुँ एकर पांडुलिपि बना कए कोनो पत्रिकाक संपादक लग प्रेषित क’ देबैक, जँ ई कथा छपि गेल तँ हमहुँ अपन सीना तानि कए कहब जे “हम मैथिलीक कथाकार छी” सोझे-सोझ मैथिलीक एम.ए., पी-एच.डी. कहयलासँ कोनो प्रतिष्ठा नहि। मैथिली पढ़ि जँ मैथिलीक कथाकार, साहित्यकार नहि कहयलहुँ, तँ मैथिली पढ़बे किएक कएलहुँ ? हँ एकटा समस्या तँ रहिये गेल, एहि कथाक शीर्षक की दिऐक ? चलू जेहने कथा तेहने शीर्षक, ‘दूभि’।

अनलकांत- मैथिली त्रैमासिक पत्रिका अंतिकाक सम्पादक। हिन्दीमे गौरीनाथ नामसँ लेखन।
तर्पण
गामक छिच्छा आब एकोराी नीक नइँ लागि रहल छै डॉタटर कामना यादव केञ्ँ।
लोकेञ् अधタकी होइ छै, वंशउजाड़ौन होइ छै! अपने हाथ-पयर भकोसि कृञ्तमुख बनि जाइ छै!…मुदा एना तँ नइँ जे गामक कोनो चीन्हे-पहिचान नइँ रहय? कत’ गेल ओ गाम जे उजडि़-उपटि गेल अपन भूतपूर्व गौआँ लोकनिक स्वप्ने टा मे अबै अछि?…
तखन ओ अपना आँगनक क’ल लग बाथकीट आ कपड़ा राखि पछुआडि़ धरि आयल छलि। ई पछुआडि़ ओकरा पोखरिक पूबारि महार पर छलै। जत’ एक टा कागजी नेबोक गाछ छलै आ ओहि मे मारतेरास नेबो लुधकल छलै। किछु पीयर-पीयर नेबो खसि क’ सडि़ गेल छलै। कने हटि पतियानी सँ पाँच टा अड़रनेबा गाछ रहै। ओहू मे कैञ्क टा अड़रनेबा तेहन पीयर सँ ललौन जकाँ भ’ रहल छलै जे खसेला पर भタका-भタका भ’ जयतै। किछु मे तँ चिड़ै-चुनमुनी भूर सेहो तेना पैघ-पैघ क’ देने छलै जे भितरका लाली लखा दै छलै। ओ भूर सब केञ्ँ ध्यान सँ देखि रहलि छलि। कि एक टा अड़रनेबाक भूर देखि ओ चिड़ैक कलाकारी पर मुग्ध भ’ गेलि। ओहि अड़रनेबा मे ऊपर-नीचाँ पातर आ बीच मे कने चाकर भूर तेहन ढंग सँ बनायल छलै जेना अंग्रेजीक एक टा ‘वी’ अक्षर पर दोसर ‘वी’ उनटि क’ राखल हो!…ओहि पर एक गो बगिया राखि देने पूरा भूर मुना जयतै!
ओहि भूर देखि बगिया मोन पड़ला सँ ओकर अरुआयल-अरुआयल सन मोन ओस नहायलि दूबि जकाँ लहलहा गेलै। एहि बेर गाम अयलाक बाद पछिला तीन दिन मे ई एहन पहिल क्षण छलै जखन ओकर ठोर पर मुस्कीक पातर-सन रेह
जगजियार भ’ अयलै।
पछिला तीन दिन सँ ओ एक टा ढंगक रखबार आकि चौकीदार लेल परेशान छलि। कैञ्क टा एजेंसीक दलाल सँ गप्प क’ चुकलि छलि। सब कैञ्क टा ने रखबार ल’ क’ आयलो छलै, मुदा कामना यादव केञ्ँ जेहन ग्रामीण टाइपक काजुल आ अनुभवी रखबार चाही छल, से नइँ भेटि पाबि रहल छलै।
ओकर दादा कारी यादवक अमल सँ रहि रहल बुढ़बा रामजी मंडल आब अपन बेटा-पोता लग रहय चाहै छल। ओकर पैरुख सेहो थाकि गेल छलै। जेना-तेना कारी यादव सँ मंगनी यादव धरिक जीवन तँ पार लगा देलकैञ्, मुदा तकरा बाद कामना लग हाथ जोडि़ देलकैञ्, ”नइँ बुच्स्न्ची, आब पैरुख नइँ छौ। किछु दिन हमरो बेटा-पोता संग रहैक सख पुरब’ दे। ”
एहि पर की कहैत कामना?…ते ँ ओ ससミमान बुढ़वाक विदाइ कर’ चाहै छलि, मुदा कोनो दोसर रखबार भेटतै तखने ने?…
पछिला दू मास मे ई ओकर तेसर यात्रा छलै। लगले लागल ई यात्रा ओकरा परेशान कयने छलै, मुदा ओकर समस्याक निदान नइँ भ’ रहल छलै। ओミहर पूना मे ओकर タलीनिक एक-एक दिन बन्न भेला सँ जे परेशानी आबि रहल छलै, से अलगे।
बापक जीबैत कामना गामक बाट बिसरिए जकाँ गेलि छलि। कैञ्क बेर तीन वा चारि साल सँ बेसी पर आयलि छलि। तहिना दू मास पहिने मंगनीलाल यादवक मुइलाक बाद जे ओ गाम आयलि छलि सेहो प्रायः दू साल सँ बेसीए पर। ई रच्छ रहलै जे ओकर बाप ओकरा タलीनिक मे मुइलै आ तत्काल गाम अयबाक झंझटि सँ बचि गेलि। नइँ तँ एसगरि जान की-की करितय? एहने ठाम भाय-भातीज, कタका-पीसा, बहिन-गोतनी आकि जाउत-जयधी बला पुरना परिवार मोन पडि़ जाइ छै लोक केञ्ँ। जे-से, ओ एसगरुआ छलि ते ँ कहियो ओकरा पर कोनो दबावो नइँ देलकैञ् ओकर बाप। तीन सँ चारि मास नइँ बीतै कि बुढ़वा अपने पहुँचि जाइ पूना। फोन पर तँ गप्प होइते रहै छलै।…
बापक मादे सोचैत-सोचैत कामनाक ठोर परक मुस्की कखन ने बिला गेल छलै। ओकर नजरि चारूञ्भर सँ भटकि क’ पोखरिक अँगनी दिस झुकल लताम गाछ पर चलि गेल छलै। एहि गाछक रतबा लताम तेहन ने लाली लेने रहैत रहै जेना सुग्गाक लोल कि ओकर अपने तहियाक ठोर बुझाइत रहै।
लताम गाछक पात कोकडि़या गेल छलै। ड्डूञ्ल-फर एखन नइँ छलै। मुदा किछुए मास मे, कने गरमी धबिते, एकर पात ड्डेञ्र नव तरहे ँ लहलहा जयतै आ ड्डूञ्ल-फर सँ लदि जयतै एकर डारि। ड्डेञ्र-ड्डेञ्र एहि पर लुधकि जयतै डミहा आ
पाकल लताम। तखन ड्डेञ्र बहरेतै एहि रतबा लतामक भीतर सँ वैह लाली। मुदा ओकर ठोर? नइँ, आब तँ बाजारक महँग-सँ-महँग लिपिस्टिको नइँ सोहाइ छै ओकरा। गाछक आत्मा डिホबा मे केञ् भरि सकैञ्ए?
पछुआडि़क मारतेरास अड़हर-बड़हर, अाा-शरीफा, अनार-बेल, केञ्रा-मुनिगा सन गाछ पर सँ नजरि हटा कामना यादव पोखरिक पानि मे खेलाइत माछ दिस ताक’ लागलि। चारि-पाँच टा रोहुक एक टा झुंड पैघ-पैघ सुंग डोलबैत झिहरि खेला रहल छलै। पानिक सतह पर दूर धरि खूब-खूब हलचल पसरि रहल छलै। एहि हलचल मे हेरायलि कामना दू डेग आगू बढि़ दूबिक निर्मल ओछाओन पर टाँग पसारि बैसि गेलि। ओहि दूबि पर कचनारक किछु ड्डूञ्ल खसल छलै। एक ड्डूञ्ल उठा हाथ मे तँ ल’ लेलक, मुदा ओकर नजरि पानिक हलचले पर रहलै। ई हलचल ओकरा भीतर एक टा नव हलचल अनलकैञ्। ओहि हलचल संग बहैत-भसिआइत कामनाक भीतर कतेक ने अतीतक पन्ना फडफ़ड़ाब’ लगलै।…

…ई पोखरि ओकर दादाक खुनायल छलै। अपन पूरा जीवन गाय-महीसक बीच गुजार’ बला ओकर दादा एहि परोपट्टस्नक अंतिम अँगुठाछाप छलै। ओना रोज-रोज गाय-महीस दूहैत ओकर अँगुठाक निशान मेटा जकाँ गेल छलै। ताहि पर, गोबर-गोंत गिजलाक बाद, सदिखन ओ तीन किलोक हरौती आकि गेन्हवाँ लाठी जे पकड़ने रहैत छल, से ओकर हाथक रेखा खाय गेलै। मुदा ओकर कपारक रेखा जगजियारे होइत गेलै। खदबद करैत पंडित-पजियार आकि बाबू-बबुआन सभ सँ भरल गामक एक मात्र ‘अहूठ गुआर’ कहाब’बला कारी यादव ओहिना ‘मड़र’ नइँ कहाब’ लागल छल! दूध-घीक पैसा आकि गाछ-बाँस आ उपजा-बारी सँ कैञ् गोटे सुマयस्त भेल अछि? ओहि सँ पैत-पानह बचि जाय, तँ बड़का बात!…से जेना-तेना पैत-पानह बचबैत कारी यादव स्वयं अँगुठाछाप होइतो अपन एकमात्र मँगनिया बेटा मंगनी यादव केञ्ँ शहर-नगरक कॉलेज-यूनिवर्सिटी धरि पढै़ मे कोनो कमी नइँ होअय देलक।
कारी यादव सुधंग लोक छल। ओकरा नजरि मे दरोगा आ बीडीओ सँ बढि़ दुनिया मेे कोनो हाकीम नइँ छलै आ सैह ओ अपन बेटो केञ्ँ बनब’ चाहै छल। मुदा मंगनी यादव से नइँ बनि सकल। ओ काशीक नामी विश्वविद्यालय मे प्रोड्डेञ्सर बनल तँ की? बापक लेल मास्टरे छल!…ओ रंगमंचक मशहूर कलाकार भेल तँ की? बापक लेल नचनिञे छल!…बियाहो ओミहरे कयलक। मुदा कारी यादव लेल धनसन।

मायक चेहरा मोन नइँ छलै मंगनी केञ्ँ। बापेक रान्हल खाइत अपना हाथें बनायब सीखलक। ते ँ बापक दुःख ओकरा बेसी छटपटाबै, मुदा बाप लेल ओ किछु क’ नइँ पाबय। ई फराक जे हरसाइत मंगनी बाप केञ्ँ खुश करैक खूब प्रयास क’ रहल छल। ओ जखन-जखन गाम आबय, बाप लेल मारतेरास कपड़ा-लाा आ अनेक सामान आनय। मुदा ओकर बाप केञ्ँ तकर दरकारे ने रहै छलै! खरपा पहिरय बला कारी यादव केञ्ँ चप्पल-जूता सँ गोड़ मे गुदगुदी लागै। गोलगला छोडि़ कुर्ञ्ता पहिरब ओकरा कोनादन ने बुझाइ। मंगनीक आग्रह पर बाबा विश्वनाथक दर्शन करबाक लोभ ओकरा बनारस जयबा लेल उसकाबै तँ जरूञ्र, मुदा माल-जाल आ गाछ-बिरिछक चिन्ता पयर रोकैञ्। ते ँ ओ बेटा लग बनारस कहियो ने जा सकल।
गाछ-बिरिछ सँ बुढ़वाक बेसी लगावक एक टा खास कारण ईहो छलै जे बेसी गाछ बुढि़याक लगायल छलै। ड्डेञ्र बुढि़याक सारा सेहो सरौली आम आ बुढ़वा धात्री गाछक बीच मे छलै जे गोहाल सँ ओकरा सुत’ बला मचानक ठीक सोझाँ पड़ैत छलै तहिया। ओइ सारा पर एक टा ने एक टा तुलसी गाछ सब दिन रहै छलै। गाय-महीस दुहलाक बाद बुढवा ओही तुलसी गाछ दिस घुरिक’ धार दैत छल। ड्डेञ्र नहेलाक बाद ओहि तुलसी आ धात्रीक जडि़ मे पानि ढारब सेहो नइँ बिसरै छल।
मंगनी जहिया ठेकनगर भेल छल तहिया सँ बाप केञ्ँ अपने हाथे ँ भानस करैत देखने छल। ओकर कनियाँक गौनाक बाद ई सब किछु दिन लेल छुटबो कयलै, मुदा कामनाक जन्मक किछुए मास बाद ओ अपन परिवार बनारस आनि लेलक। ड्डेञ्र बुढ़वाक वैह हाल भ’ गेल रहै। मंगनी एक टा चाकर रखबाब’ चाहलक, तँ बुढ़वा डाँटि-धोपि थथमारि देलकैञ्, ”धुर बुडि़! हमरा देह मे कोन घुन लागल जे हम दोसरा सँ चाकरी खटायब?… एहने ठाम कहै छै, माय करय कुञ्टौन-पिसौन बेटाक नाम दुर्गादा!…”
किछु दिनुका बाद मंगनी तातिल मे गाम आयल तँ बुढ़वा केञ्ँ कने बीमार देखलक। बुढ़वा डाँड़ कने टेढ़ क’क’ चलै छल आ सूतल मे कुञ्हरैत रहै छल। दिन मे कैञ्क ने बेर लोटा ल’ बहराइत छल आ ढंग सँ किछु खाइतो ने छल। मंगनी कतबो पूछै, ”हौ, की होइ छअ?”, मुदा बुढ़वा सही-सही किछु बतबैते ने छलै। बुढ़वा केञ्ँ शहरक डॉタटर लग चलै लेल मंगनी कतबो जिद्द करै, बुढ़वा तैयारे ने होइ। अंत मे मंगनी खायब-पीबि छोडि़ रुसि रहल।
तखन बुढ़वा मंगनी केञ्ँ मनबैत कहलकैञ्, ”रौ मंगनी, चल खाय ले। तों किऐ जान दै छही! हम मरिये जेबै तँ की बिगड़तै? आब जीविक’ कोनो बान्ह-पोखरि देबाक छै हमरा?”
”किऐ हौ बाबू, मरिक’ तों हमरा कपूत कहबेबहक? कह’ तँ जीविक’ बान्ह-पोखरि किऐ ने दए सकैञ् छहक तों?” मंगनीक स्वर भखरि गेलै।
”रौ मंगनी, ओइ लेल एक बोरा टाका चाही। से ने हमरा दूध-घी सँ हैत, आ ने गाछ-बाँस आकि उपजा-बारी सँ। तोहर मास्टरियो सँ नहिऐं हेतौ। कोनो दरोगा-बीडीओ भेल रहितय तखन ने!…” कारी यादव गंभीर स्वर मे बाजल।
”हौ बाबू, तों नइँ बुझै छहक! हम दरोगा-बीडीओ सँ पैघे छिऐ हौ। तों बाज’ ने जे कोन बान्ह देबहक आकि पोखरि खुनेबहक!…”
”ठीकेञ् कहै छही रे?”
”हँ हौ!…हम तोरा ड्डूञ्सि कहबह?”
”बान्हक तँ एहि जमाना मे कोनो खगते नइँ छै। एक टा पोखरिए खुना तँ बड़की टा, अपना घरक पश्चिम दू बिगहा मे। मरियो जायब तँ, जुग-जुग धरि नाम तँ रहतै जे कारी जादब पोखरि खुनेलक।…” बुढ़वा भावना मे बह’ लागल छल।
”चलह, पहिने तोहर दवाइ करा दै छियह। ठीक होइते तों मटिकट्टस्न मजूर सब सँ बात करह। जहियाक दिन तों ठीकबहक तहिए सँ काज शुरूञ् भ’ जेतै।”
आ से ठीकेञ् भ’ गेलै। आ ओही संग एक टा चौकीदार, टेहलुक, भनसिया आकि मैनेजर जे बूझी, ताहि रूञ्प मे रामजी मंडल केञ्ँ ओ रखबौने छल। ई फराक जे तकरा बादो बूढ़वा जावत जीयलै माल-जाल रोमब, दुहब-गारब आकि गोबर-करसी; किछु ने छोड़लक। रामजी मंडल ओकरा घर-परिवारक अपन समाँग जकाँ भ’ गेल छलै।…आ कारी यादवक मान-मर्यादा ततेक बढि़ गेलै जे ओ पूरा परोपट्टस्न मे ‘मड़र’ कहाबय लागल छल।
कामना केञ्ँ ई सब बेसी सुनले छै। ओहि पोखरिक जाग जे भेल छलै तकर भोज कने-मने मोन छै ओकरा। मुदा दादाक हाथक तीन किलोक लाठीक ओ लाली एखनो खूब मोन छै ओकरा। ओहि लाठी मे चुरु भरि तेल पचाबैत कालक दादाक मालिश सेहो ओकरा मोन छै। ओ लाठी एखनो ओकरा घरक कोनो कोन मे राखल छै ठीक सँ, जुगताक’।
ओकर दादा कारी यादवक मुइलाक बादे एत’ ड्डुञ्सिघरक जगह पタका मकान बनल छलै। मुदा ओहि मे रह’बला रामजी मंडल टा छलै। ओकरा सँ मारते बबुआनक बीच एक गुआरक घरक ठीक सँ देखभाल नइँ भ’ पबै। ताहि पर किछु मालोजाल छलै। सभ छुट्टस्न्ी मे मंगनी अबै तँ किछु ने किछु नव बिदैत भ’ गेल रहै। हारिक’ ओ आँगन-दलान संगे पोखरि-गाछ-माने पूरा सात बिगहाक रकबाक चारूञ् कात खूब न्नँञ्च देबाल द’क’ तकरा ऊपर खूब न्नँञ्च धरि काँटबला तारक बेढ़ सँ बेढ़बा देलक। एक जोड़ा करिया गाय छोडि़ बाकी मालजाल हटा देलक। तकरा संग

रामजी मंडल केञ्ँ सチत आदेश भेटलै जे गाछक कोनो फल आकि तीमन तरकारी ओ जते चाहय खाय सकैञ्त अछि, मुदा एタको पाइक किछु बेचि नइँ सकैञ् अछि। तकर पालन करैत रामजी मंडल ओकर बाग-बगीचा, बाड़ी-झाड़ी सँ पोखरि धरि केञ्ँ सब दिन खिलखिल हँसैत जेना बनौने रहल। अपने मंगनी दू-तीन मास पर आबि तकतान क’ जाय। ओना ओकरा सभक सब छुट्टस्न्ी गामे मे बीतै छलै आ ओहि छुट्टस्न्ी मे माय-बापक संग कामना सेहो अबै छलि।
जे-से, समय-साल बीतैत गेलै। आ एक दिन मंगनी यादव विश्वविद्यालय सँ सेवामुタत भ’ सपत्नीक गाम आबि गेल। तखन कामना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली मे एमबीबीएस फाइनल क’ रहलि छलि आ दुनियाँ साधारण सँ साधारण आदमीक मुट्ठस्न्ी मे अँट’ लागल छलै।
ओहि समय धरि दुनियाँक सब शहर मे एक तरहक बसात बह’ लागल छलै आ अपना ठाँक गाम-घर खाली भ’ रहल छलै। ककरो बेटा शहर बसलै, तँ बापक मरिते डीह पर नढि़या भुक’ लगलै। किओ चारो दिसक कर्ज आ उकबा मे घेराय आकि दबंगक प्रताड़ना सँ डराय राता-राती गाम छोडि़ देलक, तँ किओ भूखक आवेग मे जत’-तत’ पड़ा गेल। बाबू-भैया लोकनि कोनो ने कोनो कंञ्पनीक स्थानीय मैनेजर भ’ अपना केञ्ँ शहरी बनाब’ लगलाह, तँ किछु गोटे वातानुकूञ्लित लाक्षागृह मे सेन्ह लगेबाक प्रयास मे धोती-कुर्ञ्ता उज्स्न्जर कर’ लगलाह। गाम-गामक खेत-पथार बड़का-बडक़ा कंञ्पनीक फॉर्म हाउस मे बदल’ लागल छल। सस्ता कार सनक कारखाना आ केञ्मिकल्स हौज लेल पैघ-पैघ रकबा हथियाओल जा लागल छल। किसान नामक प्राणी मे सँ किछु अपने अपन लीला खत्म क’ लेलक, किछु शहर-नगरक मशीन चलब’ चलि गेल आ जे बचल छल तकरा मे सँ किछु मारल गेल, किछु केञ्र जीन बदलि एहन मजूर बना देल गेल जे ने शहरी रहल आ ने देहाती आ जकर ने कोनो भाषा रहल आ ने कोनो आने चीन्ह-पहिचान। सगरे नव-नव कन्वेंट, नव-नव ढाबा, नव-नव चकलाघर मिल्क-बुथ आ टेलीफोन-बुथ जकाँ खुज’ लागल छलै। आ साधारण लोक ‘मैन-पावर’ कहाब’ लागल छलै। एहने सन आफत-बसात मंगनी यादवक गाम मे सेहो आयल छलै। एही आफत मे रामजी मंडलक बेटा-पोता ओकर काजुल घरवाली धरि केञ्ँ ल’क’ दिल्लीक झुग्गीवास कर’ चलि गेल।
मंगनी यादव जहिया सेवामुタत भ’ बनारस सँ गाम घूरल छल, ओकरा अपन स्टेशन कातक दोकान मे बेसी अपरिचिते लोक भेटल छलै। साँझक झलअन्हारी मे घर पहुँच’ धरि कतौ किओ एहन नइँ भेटलै जकरा सँ दूटप्पियो कुञ्शल-क्षेम भ’ सकैञ्त। रामजी मंडल केञ्ँ छोडि़ ओकर आगमन ककरो लेल कोनो खबरि नइँ छलै।
अगिला भोर गामक सड़क धयने टोलक एहि कात सँ ओहि कात गुजरि गेल मंगनी, केञ्ओ हाल-चाल नइँ पुछलकैञ्। ओत’ कतहु ओकरा अपन ओ गाम नइँ भेटलै जकरा ओ चिन्है छल। जत’ पहिने पंडित दीनबंधु झाक घर छलै, ओहि ठाम शून्य-सपाट एक टा मैदान बनि गेल छलै आ तकरा चारूञ्कात खूब न्नँञ्च देबाल रहै जकरा गेट पर एक टा पैघ सन बोर्ड टाँगल छलै, ‘भटिंडा फार्म हाउस’। पंडितजीक बेटा आब जामनगर मे बैसि गेल छनि। बेटी अमेरिकी नागरिकता ल’ लेने छनि।
मंगनी कने आरो आगू बढ़ल, तँ देखलक जेミहर पहिने धनुकटोली छलै, ओत’ पैघ सन कोनो ड्डैञ्タट्री खुजि गेल छलै जकरा छतक ऊपर तीन टा मोट-मोट चीमनीनुमा पाइप मारतेरास धुआँ छोड़ैत आसमान कारी करबाक अभियान मे लागल छलै। आ टोलाक कात सँ कलकल हँसैत बह’बला स्वच्छ-निर्मल जलधारा बला मिरचैया मे जमुना सन गन्हाइत कारी पानि तेना जमकल छलै जेना कोनो नाला।
मंगनी केञ्ँ थकान भेलै आ घर घुरय लागल। घर घुरैत ओ जगह ध्यान मे अयलै जत’ पहिने विशाल-विशाल बर आ पाकडि़क गाछ छलै। ओहि ठाँ लगे-लग कोनो दू गोट मोबाइल कंञ्पनीक विशाल-विशाल टावर ठाढ़ छलै। ओ रुकिक’ चारूञ्भर ताक’ लागल। दूर-दूर धरि देखलाक बादो ओकरा नजरि पर अपना घर लगक गाछ छोडि़ कतहु एタको टा तेहेन पैघ गाछ नइँ अयलै। जेミहरे देखलक सब किछु एकदम उजड़ल-उजड़ल सन बुझेलै। बीच टोल मे आबि एक ठाम ठमकल। बगलक दासजीक डीह पर कोनो टैंट हाउसक बोर्ड लागल छलै। कने हटि एक टा ट्रैवेल एजेंटक साइन बोर्ड टँगल छलै जकरा नीचाँ शीशाक गेटक भीतर एक टा पगड़ीवला सरदार जी कुर्ञ्सी पर बैसल छलै। तकरा दस डेग आगुक ग्राम देवता स्थान पर बजरंगबलीक एक टा पैघ सन मंदिर ठाढ़ छलै जकर दछिनबरिया देबाल पर कामोोजना जगब’बला कोनो टिकियाक विज्ञापन छलै। तकरा बाद मंगनी किछु ने देखलक आ सोझे अपना घर आबि गेल। घर मे ओकर पत्नी मुनिगाक तरकारी रान्हि रहल छलि। ओ ओकरा लग जाय अकबका गेल।
रसे-रस मंगनी अपन घर आ सात बिगहाक रकबा मे घेरायल पोखरि-गाछ, पछुआडि़-महार धरि अपना केञ्ँ समेटि लेलक। बेटी कामना आ बाकी हित-मित सँ संपर्कञ् लेल ओकरा घर मे फोन आ मोबाइल छलै, रंगीन स्क्रञ्ीनबला कंञ्प्यूटर छलै जकर तार सミपूर्ण दुनियाँ सँ जुड़ल छलै। घरक पाछाँ पैघ सन आयताकार आँगन छलै। आँगनक पश्चिम-उार कोन मे चापाकल छलै। तकर पछुआडि़ मे पोखरिक महार पर मारते गाछ-बिरिछ छलै। ओहि पर सँ कखनो कोयली, तँ कखनो पड़ौकी केञ्र सुपरिचित स्वर आबै।…माने ओकर गाम ओकरा सात बिगहाक रकबा मे बन्हायल छलै।
जेना-तेना समय कटि रहल छलै। कामना दिल्ली छोडि़ पूना मे प्रैタटिस शुरूञ् क’ देने छलि। मुदा मंगनीक घर पर एक टा एहन कार कौआ बैसि गेल छलै जे जखने ओ दुनू प्राणी शांति सँ आराम कर’ चाहय कि ओ जोर-जोर सँ टाँहि मार’ लागै। भोर होइ कि साँझ, दिन होइ कि राति-कार कौआक टाँहि मारब बन्न नइँ भेलै। आ एक राति कामनाक मायक छाती मे तेहेन ने दर्द उठलै जे डॉタटरकञ् अबैत-अबैत बेचारी चलि गेलि। आ तकरा बाद एसगर मंगनी कारी यादव जकाँ बाड़ी-झाड़ी मे लागल रहय आ बीच-बीच मे कामना लग पूना चलि जाय।…मुदा रामजी मंडल तँ एहन शापित यक्ष छल जकरा लग ने किओ अबै छलै आ ने ओ कतौ जाय छल।…

अनचोकेञ् कामनाक भक टूटलै । पोखरिक उतरबरिया महार परक कोनो गाछ पर नुकायल कोयली बाजि रहल छलै। कामनाक भीतर किछु उमडि़ अयलै। मुदा ओ तत्काल उठि गेलि। स्नान केञ्ँ अबेर भ’ रहल छलै।
भोजनक बाद ओ आराम क’ रहलि छलि कि ओकर मोबाइल बजलै। एक टा नव एजेंटक कॉल छलै, ”मैडम, ऐसा कीजिए कि चौकीदार और माली केञ् रूञ्प में दो अलग-अलग आदमी को रख लीजिए। यहाँ ऐसा कोई चौकीदार नहीं मिल रहा जो आपकी प्रॉपर्टी केञ् साथ पेड़-पौधों की भी देखरेख कर सकेञ्। यूँ पोखर की मछली की देखरेख केञ् लिए मछुआरे की जरूञ्रत फिर भी रह जाएगी।”
”नहीं, तीन-तीन आदमी रखना मुश्किल है हमारे लिए।”, कामना बाजलि।
”चौकीदार तो नेपाली ही है मगर माली जो मिल रहा है, वह एक उडि़या भाई है। ये दोनों हमारे पटना सेंटर केञ् मार्ड्डञ्त आ रहे हैं और उनकी शर्त है कि वेतन केञ् अलावा हाउसिंग ड्डैञ्सिलिटी भी चाहिए।”
बिना कोनो जवाब देने कामना कॉल डिस्कनेタट क’ देलक। मुदा भीतर सँ ओकर परेशानी आरो बढि़ गेल छलै। आब एहि गाम मे गाम भने नहि रहि गेल हो मुदा ओकर बाप-दादा, माय-दादी सभक स्मृतिक गाम सात बिगहाक एहि रकबा मे बेड़हल घर-आँगन, गाछ-बिरिछ, पोखरि-कल सभक बीच छै। कारी यादव सँ मंगनी यादव धरिक नाल एतहि गड़ल छै। कारी यादवक माल-जालक गोबर-गोंत एत’क माटिक कोनो ने कोनो कण मे एखनो खादक रूञ्प मे बचल हेतै। प्रोड्डेञ्सर मंगनी यादवक कलाकार मोन एहि रकबा मे जाहि गामक लघु संस्करण केञ्ँ समेटने छल, से जरूञ्र एही ठाम कतहु ने कतहु नुकायल हेतै।… की एकरा सब केञ्ँ ओ लुटा देत?…की ओ अपन जिनगी भरिक कमाइ सँ एकर रक्षा नइँ क’ पाओत?
कामना केञ्ँ मोन पडै़ छै जे एक बेर ओकर पिता मंगनी यादव बड़ व्यथित मोन सँ कहने छलै, ”गाम मे जेहो गाम देखाइ छलै, से तोरा मायक मुइलाक बाद नइँ बुझाइ छै। कखनो-कखनो तँ मोन करैए जे हमहूँ सब किछु बेचि-बिकीनि ली। मात्र घर-आँगन आ गाछ-पोखरि सँ गाम नइँ होइ छै, बौआ। जखन पहिने जकाँ केञ्ओ गौएँ नइँ रहल तँ कोन गाम आ की गाम?…”
कामना किछु जवाब नइँ द’ सकलि छलि तखन। मुदा एखनो मोन छै ओकरा जे ओ अपन बापक ओहि हेरायल-बेचैन आकृञ्ति केञ्ँ बड़ी काल धरि देखैत परेशान भ’ रहलि छलि। एタको शホद एहन नइँ भेटल छलै तखन ओकरा जाहि सँ अपन कलाकारमना बापक मोन केञ्ँ राहत द’ सकैञ्त छलि। तखन ओकरा अपन डॉタटरीक ज्ञान अकाजक बुझायल छलै।
सहसा एक कोन मे राखल अपन दादा कारी यादवक कारी खटखट लाठी देखा पड़लै ओकरा। ओ उठलि ओहि लाठी केञ्ँ छुबिक’ देखबाक लेल, मुदा तखने कॉलबेल जोर सँ बजलै। ओ गेट दिस पलटलि। गेट पर सी सी मिश्रा नामक एक टा मैथिली भाषी सेタयुरिटी एजेंटक दलाल छलै जे पछिला दू दिन सँ नव-नव रखबार ओकरा लेल ताकि रहल छलै।
ओहि दलाल केञ्ँ ड्राइंग रूञ्म मे बैसा ओ दू मिनट बाद दू गिलास पानि ल’ घुरलि। कि विनम्र सन बनैत ओ दलाल बाजल, ”डॉタटर यादव, सुनियौ! अहाँ बड़ सौभाग्यशालिनी छी जे एखनो अपन बाप-दादाक डीह पर अबै छी। हम तँ नोकरीयेक क्रञ्म मे एミहर आबि गेलहुँ। कोशीक पूबे सही, मुदा ईहो कहाइ तँ छै आइयो मिथिले ने। हम डीही छी कमला कातक। हमर जनम भेल हिमाचल मे व्यास नदी कातक एक टा अस्पताल मे। बचपन बीतल दिल्लीक यमुनापार मे आ नोकरी भेल कोलकाता मे। मैथिली तँ हम कोलकाता आबि सिखलहुँ सेहो एहि लेल जे हमर दादा मैथिलीक प्रसिद्घ लेखक छलाह आ हुनकर किताब सभक अंग्रेजी अनुवाद एखनो खूब लाभ दै अछि।…एखन कोलकतेक एजेंसीक काजें तीन मास लेल एहि क्षेत्र मे अयबाक अवसर भेटल। एहि क्षेत्र मे कैञ्क टा कंञ्पनी अपन कल-कारखाना शुरूञ् क’ रहल छै, से बहुत जल्दी एत’क प्रॉपर्टीक कीमत उछल’बला छै।…”
कामनाक धैर्य चुकि रहल छलै। ओ बाजलि, ”अहाँ कह’ की चाहै छी?… साफ-साफ बाजू!”
”अहाँ अन्यथा तँ नइँ लेबै?”
”बाजू ने!…”
”अहाँ यैह ने चाहै छी जे अहाँक ई गाछ-पोखरि बचल रहय, सुरक्षित रहय

आ अहाँक बाप-दादाक नाम…”
”तँ?…”, कामनाक माथ पर बल पड़लै।
”देखू, ओहेन रखबार बड़ महँग पड़त जे अहाँक इच्छा अनुकूञ्ल हो। एहि लेल रखबार, माली, मल्लाह आ मारतेरास मजदूर पर खर्च कयलाक बादो भेटत तँ किछु ने, उनटे चिन्ता आ परेशानी बेचैन कयने रहत।”
”तँ की करी?… हम बड़ परेशान छी। ओझराउ जुनि।”
”सैह ने कहै छी!…आ लाभक बात कहै छी।…” क्षण भरि बिलमि ओ बाजल, ”एहि ठाम एक टा भव्य रिजार्ट खोलै केञ्र अनुमति जँ दी तँ अहाँ केञ्ँ एक खोखा पूरा भेटि जायत। संगे पोखरि-गाछक सुरक्षाक गारंटी सेहो। मात्र एहि घर-आँगन केञ्ँ तोडि़ नव बहुमंजिला बनब’क अनुमति देब’ पड़त। गाछ सब लग मुタताकाश मे टेबुल-कुर्ञ्सी लगा देल जयतै आ डारि सब पर जगमग लाइट टँगा जयतै। पोखरि मे दू-चारि टा छोटका नाह खसा देल जयतै जाहि पर लोक सब अन्हरियो मे इजोरिया रातिक मजा लैत नौका-विहार करत। पोखरिक बीच मे जाठिक जगह एक टा छोट सनक सुइट बनि जायत, जकर डिमांड पर्यटन स्थल सभ पर सब सँ बेसी होइत छै। से एतहु हेबे टा करतै। किएक तँ एतहु रसे-रस बड़का-बड़का कंञ्पनीक डायरेタटर, सीईओ, एनआरआई आ विदेशी मेहमानक आगमन शुरूञ् होबए बला छै।…”
”हम अहाँक गप्प खूब नीक जकाँ बुझि गेलहुँ।… अहाँ तँ बड़ बुधियार लोक छी यौ!…तत्काल अहाँ जा सकैञ् छी, दान-पत्र हम शीघ्रे पठा देब!…” कामना अपन आवाज सप्रयास संयत रखलक।
कनेक सकपका जकाँ गेल मृदुभाषी मैथिल दलाल सी सी मिश्रा चालीस सँ बेसीक नइँ छल। गेट पार क’ ओ एकबेर ठमकल, ”कने इत्मीनान सँ विचार करबै मैडम। डॉタटर छी अहाँ, ओल्ड थिंक आ भावुकता सँ किछुओ फायदा नइँ हैत। हानिए-हानि!…”आ हीं-हीं क’ ठिठिआब’ लागल।
चालीस पार क’ चुकलि डॉタटर कामना यादव मे प्रौढ़ता आ धैर्य आबि गेल छलै, मुदा तैयो ओ अपना जगह पर बैसलि नइँ रहि सकलि। ओ उठिक’ दुआरि दिस आयलि। तेज-तर्रार दलाल सी सी मिश्रा लपकिक’ अपन विदेशी मॉडलक गाड़ी मे बैसि गेल छल। कदमक गाछ तर थोड़ेक गरदा उडि़याबैत ओकर गाड़ी तुरंते ड्डुर्ञ्र भ’ गेलै।
कामना बाहरक ओसारा पर नहुँ-नहुँ बुल’ लागलि छलि। कदम गाछक बाद देबालक काते-कात लागल जिミहड़, अमड़ा आ अशोक पर बेरियाक रौद खसि रहल छलै। ओहि रौद मे गाछ सभक पात-पात पर जमल गरदाक मोटका परत

नीक आर की हेतह?”
रामजी मंडलक बूढ़ चेहरा पर लाजक संग हँसीक फाहा छिडि़या गेलै। ओ खिलखिलाइत उठिक’ आँगन चलि गेल।
तखने घर मे राखल कामनाक मोबाइल बजलै। पूना सँ ओकर タलीनिकक फोन छलै। ओ उठबैते बाजलि, ”डोंट वर्री! सुबह की ヘलाइट से आ रही हूँ। एक-डेढ़ बजे तक タलीनिक में रहूँगी।” आ एतबा कहैत ओकर नजरि एकबेर ड्डेञ्र अपन दादा कारी यादवक तीन किलोक हरौती लाठी पर चलि गेलै। ओ लपकिक’ लाठी उठौलक।
लाठी मे पहिनेक लाली आ चमकि नइँ छलै। कारी खटखट ओहि लाठी पर झोल-गरदा जमि गेल छलै। भावावेश मे कामना ओहि लाठी केञ्ँ चूम’ चाहलक। मुदा रुकि गेलि।…
कामनाक हाथ चीन्ह’ जोग नइँ छलै। पूरा हाथ कारी भ’ गेल छलै। तखने ध्यान अयलै जे ओकर ओजनो आब तीन किलो तँ नहिये टा हेतै। कि एक ठाम लाठी पर कनेक दबाव पडि़ते ओकर आँगूर धँसि जेना गेलै! कि ओकरा बुझेलै जे ई लाठी कोकनि क’ फोंक भ’ गेल छलै आ जोर सँ पटकि देने टुकड़ी-टुकड़ी भ’ जयतै!… अचांचकेञ् डरा गेलि ओ। डराइते-डराइत ओ ओहि लाठी केञ्ँ पूर्ववत घरक कोन मे राखि हाथ धोअ’ कल पर चलि गेलि।
बड़ी काल धरि बेर-बेर हाथ धोयलाक बादो ठीक सँ हाथ साफ नइँ भेलै। साबिकक तेल पीयल लाठी सँ आओल एक टा अजीब तरहक गंध हाथ मे समा गेल छलै। हारिक’ तोलिया सँ हाथ पोछैत क्षण भरिक लेल पछुआडि़ दिस गेलि कामना। ओत’ ओकरा लगलै, सब गाछ पर जोर-जोर सँ केञ्ओ कुञ्ड़हरि चला रहल छलै। पोखरि दिस तकबाक साहस नइँ भेलै ओकरा। ओ सोझे पड़ायलि घर आ जल्दी-जल्दी अपन ब्रीफकेञ्स सैंत’ लागलि।
लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर “शशि” २. श्री कुमार मनोज कश्यप

श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत।

मरदे कि बरदे

भगवान भाष्करक प्रचण्ड प्रतापकेँ सम्हारि सकब धरती मैआक वास्ते कठिन भऽ रहल छलनि। मैञा अपरतीव छलीह। चण्डलवाक प्रलयंकारी रौद्र अवतारसँ अपने बाचथु कि अपन सखा सन्तानकेँ बचाबथु? “अपन मथा साहुर, साहुर” करबाक अवस्था सेहो नहि छल। मिथिलाक धरती थोरै छैक जे यत्र तत्र सर्वत्र हरियरी रहतै। लोक अपनो जुराएत आऽ लोकोकेँ जुरौतैक? ई कतार छै भाई। कतार। एत्त गाछ वृक्ष कत पावि? धनीमानीलोक ऐजुवा (वगैचा) लगबैत छथि। जेना लोक धीया पूताकेँ दूध पियाकऽ पोसैत अछि। तहिना पोसैत अछि एतुका सेखसभ गाछ-वृक्ष। ककरो मजाल छै जे ओहि गाछक नीचाँ सुस्ता लेत..। तुरन्त वन-विनाश कानूनक अन्तर्गत शख्त कार्यवाही भऽ जएतैक। आऽ ओऽ गाछ वृक्ष होईतो नहि अछि सुस्तैवा योग्य। एक कविक कवित जकाँ “वड़ा हुआ तो क्या हुआ लम्बे पेड़ खजुर। पंछीको छाया नही फल लागे अति दूर..” डार मोरवाक योग्य छाहरि नहि। बूझि परैत छल, दोहाक समुद्र वाफ भऽ कऽ उड़ि जाएत। सड़क उपरके अलकत्रा पघलि रहल छल। सरकार एहि गरमीक महिनामे दुपहरमे काज करबापर पाबन्दी लगौने छैक। तथापि देश विदेशक मजुरसभ अपन-अपन ओभर टाईम पका रहल छल। भगवान भाष्करसंगक महासमरमे लागल छल। धरती पुत्रलोकनि। धरती तँ आखिर धरती छैक ने। अपन जनम धरती हो कि करम धरती…।

एहि रौदसँ बेपरवाह लक्ष्मण पैघ-पैघ डेग मारैत आगाँ बढ़ि रहल छल। कोनो अभेद्य लक्ष्यकेँ भेदन करबाक योजनामे आगू बढ़ि रहल चोटाएल, हारल योद्धा जेकाँ। एहि बेरक समरमे विजयश्री प्राप्त करबाक दृढ़ सन्कल्पित छल ओऽ। ओकरा ठेकान नहि छलै जे ओकर समग्र देह घामे पसिने भिजी गेल छैक। ओऽ कारी झामर भऽ गेल अछि। ओऽ बस आगू बढ़ि रहल छल, अपन गंतव्य दिस। ओकर गन्तव्य छलै, दोहाक अतिव्यस्त इलाकामे अवस्थित नेपाली दूतावास। जतए ओकर प्रेयसी गत एक सप्ताहसँ शरणागत छैक। मुदा किछुए किलोमीटरक दूरीपर अवस्थित रहलाक बावजूदो ओऽ हुनकासँ भेटि नहि सकल अछि। ओऽ सीधा दूतावासमे प्रवेश कएकऽ मुदा तुरन्ते पाछाँ घुमि गेल। चार दिवालीक ओटमे ठाढ़ भऽ जिन्सपेन्टक पछिला जेबीसँ कंघी निकाललक। केस सीटलक। कपड़ा मिलौलक। आऽ कनेक सतर्क कदमसँ दूतावासक मेन गेटकेँ पार कएलक। दूतावास परिसरमे रहल नेबोक गाछक ओटमे बैसि ओकर प्रेयसी केस झारि रहल छलै। ओएह घुरमल-घुरमल केस। सुराही सन कमर आऽ सुडौल शरीर। पीठपर करिकवा तिलसँ ओऽ आओर निधोख भऽ गेल। ओऽ ओकरे रेशमा छैक। आगूसँ देखू कि पाछोसँ। ईस्स…। ओकरा मोनमे टिस जेकाँ उठलै। मोन भेलै जे पाछेसँ जाऽ भरि पाजकँ पकड़ि ली आऽ गत ९ महिनाक हिसाब-किताब माँगी। ओऽ आगू सेहो बढ़ल मुदा रेश्माक केश जखनसँ खुजल रहैक तखनेसँ दूतावासक चौकीदार सेहो ओकरे दिस ताकि रहल छलै। लक्ष्मणकेँ हिम्मति नहि भेलै अपने प्रेयसीक हाथ धरि पकड़बाक। जहन दुनूक आँखि मिललैक तँ दुनूक नयनसँ अनन्त अश्रुधारा बहि गेलै। एक दिस लक्ष्मण छल, दोसर दिस रेशमा आऽ बीचमे रहैक गाछ। जकरा साक्षी राखि दुनू ९ महिनाक हिसाब किताब फरियौलक। लक्ष्मण एतबे बाजल “हम तँ बरद जेकाँ बहिए रहल छी, एहि मरुभूमिमे, अहाँ दुधपिया बौवाकेँ छोड़िकऽ किया आबि गेलौ?”

कुमार मनोज कश्यप
जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

थाकल बाट

”सर, हमर मीटरक फाईल कहा तक पहुचलई?”
”उपर सँ नहि लौटलै” – बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेᆬकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आऽ यैह उत्तर सुनैत ।

”अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना ‘सेवा’ के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ” – अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब – अनायास,अनर्थक,आनश्रचत़।

बिजली विभागक कर्मचारी ‘सेवा’ पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम ‘सेवा’ महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र कें देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -”रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।” भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो।
बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग
-प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
बीसम शताब्दी: मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग (आगाँ)
कथा
साहित्यिक विधानमे कथा नवीनतम अछि। मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास पूर्णरूपेण बीसम शताब्दीक देन थिक, जकर विकास तीतीय दशकक पूर्व नहि भऽ सकल छल। प्रारम्भमे संस्कृत कथाक रूपान्तरण प्रकाशित भेल। मैथिली कथा-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय अछि मैथिलीक पत्रिकादिकेँ। मैथिली कथामे परिवर्तनक सूत्रपात होइत अछि विगत शताब्दीक द्वितीय दशकक पश्चात् जाऽ कऽ। मैथिली कथा साहित्यपर विचार करैत एकरा निम्नस्थ कालखण्डमे विभाजित कयल जाऽ सकैछ।
१. प्रारम्भ युग- १९२० ई.सँ १९३५ ई.
२. प्रगति युग १९३६ ई. सँ १९४६ ई.
३. प्रयोग युग १९४७ ई.क पश्चात्
स्वाधीनता पूर्वमे कतिपय कथाकार साहित्यमे प्रवेश कयलनि, किन्तु हुनक परिपक्व कथा स्वाधीनताक पश्चात् प्रकशमे आयल। देशक स्वाधीन भेलाक पश्चात् मैथिली कथामे तीव्र विकास भेल। मैथिली गल्प-साहित्यक विकासमे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्येक पत्रिकक रुझान साधारणतः कथा दिस रहल अछि। अतः नव-नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक आविर्भाव अत्यन्त द्रुत गतिएँ भेल। अति आधुनिक कथा-साहित्यमे जाहि नवयुवक कथाकारक अवदान अछि ओऽ गल्प वाङमयक जे मानदण्ड अछि ओकर सम्यक् परिचय रखैत गल्प रचनामे संलग्न भेलाह।
शनैः-शनैः सामाजिक जीवनमे घटित भेनिहार साधारण घटनाकेँ आधार बना कऽ कथाक रचना भेल तथा यथार्थवादी आऽ कल्पना प्रसूत कथाक दुइ धारा जकर प्रवर्तक हरिमोहन झा एवं व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” कयलनि जाहिमे राजकमल (१९२९-१९६७), ललित (१९३२-१९८३), मायानन्द (१९३४), प्रभास कुमार चौधरी (१९४१-१९९८) आदि कतिपय कथाकार योगदान छलनि। उपर्युक्त कथाकार लोकनिमे सामाजिक चेतना छलनि आऽ हुनका सभक कथा-आदर्श पूर्ण संवेदनशीलताक विशेष गुण आऽ मनोविज्ञानक हल्लुक पुट अछि। परवर्ती कथाकार लोकनि रोमांसपूर्ण कथाक सर्जन कयलनि। युग-संधिक उत्कर्ष बेलाक कथाकार जीवनक कथानक चुनलनि, मध्यवर्गक जीर्ण-जीवनक वर्णन कयलनि, व्यक्तिक मनक विश्लेषण कयलनि, स्त्री-पुरुषक प्रेमक चित्रण कयलनि आऽ आधुनिक जीवनक मानसिक आऽ भौतिक विषमताक पार्श्वभूमिपर अपन कथाकेँ आधारित कयलनि।
मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्र व्यापक भेल त्तथा मूल्य एवं दृष्टिकोणमे परिवर्तनक संग विषय-वस्तुमे अधिक वैविध्य आयल अछि। सत्तरिक दशकमे कथा सभमे यथार्थवादी एवं व्यक्तिवादी स्वर तीख आऽ सुस्पष्ट भेल। मैथिली कथाक प्रमुख भाग सामाजिक कथा थिक। सामाजिक जीवन एवं विचारधारामे परिवर्तनकेँ चित्रित कयनिहार कथाक रचना भेल। सामाजिक संरचना, परिवार एवं व्यक्तिगत जीवनक विभिन्न पक्षमे भऽ रहल परिवर्तनक यथार्थ निष्ठ चित्रण कथाकार लोकनि कयलनि अछि। मैथिलीमे लघु कथा, व्यंग्य कथा, लोक कथा इत्यादि विविध रोपक रचना सेहो भेल अछि। सर्वविध मैथिली कथा साहित्यक सम्वर्द्धक कथाकार लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप ई एक सुविकसित विधाक रूपमे अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेलक अछि।
नाटक-एकांकी
विगत शताब्दी मैथिली नाटक-एकांकीक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। आधुनिक मैथिली नाट्य जगत जखन अन्धकारमे टापर-टोइया दऽ रहल छल तखन युग-पुरुष जीवन झा गद्यक नव-ज्योतिसँ सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ आलोकित कयलनि। आधुनिक मैथिली नाटकक जन्म एही शताब्दीमे भेल जकरा प्रवर्तन कयलनि कीर्ति-पुरुष जीवन झा। ई मैथिली गद्यक महान उन्नायक रहथि। ओऽ गद्यकेँ नवीन स्वरूप प्रदान कयलनि। अपन नाट्यादिक माध्यमे मैथिली गद्यक मंगल द्वारकेँ खोललनि तथा भविष्यक नाटककारकेँ एक नव प्रेरणा देलनि। मैथिलीमे उच्च कोटिक नाट्य-साहित्यक निर्माण कार्य विगत शताब्दीक अनुपम उपहार एहि साहित्यकेँ भेटलैक। विगत शताब्दीक नाटककार जीवनक विभिन्न क्षेत्रसँ सामग्री ग्रहण कऽ कए सामाजिक, धार्मिक, विशुद्ध साहित्यिक, पौराणिक आऽ राष्ट्रीय एवं राजनीतिक नाटकक परम्पराकेँ जन्म देलनि आऽ भारतीय नवोत्थानकालीन भावनाक प्रचार कयलनि। जीवन झाक पश्चात् मैथिलीक दोसर नाटककार साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास आऽ पण्डित लालदास आऽ हुनका सभक पश्चातो नाटकक क्षेत्रमे एहि परम्पराक निर्वाह होइत रहल। देशक आवश्यकतानुसार विगत शताब्दीमे ऐतिहासिक नाटकक रचना भेल। पौराणिक कथाकेँ नव-ढ़ंगे प्रतिपादित कयल जाय लागल। मैथिलीक किछु नाटककार प्रतीकात्मक नाटकक रचना कयलनि, किन्तु ई परम्परा अधिक पुष्ट नहि भऽ सकल। यद्यपि गीति नाट्यक रचना सेहो विगत शताब्दीमे भेल तथापि मैथिलीमे सुन्दर गीति-नाट्यक रूपमे सोमदेव (१९३४-) क “चरैवेति” (१९८२) एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। विवेच्य कालावधिमे समस्या नाटकक रचना भेल अछि। यूरोपीय प्रभावक अन्तर्गत समस्या नाटकमे बुद्धिवादक आधारपर सामाजिक, व्यक्तिगत तथा जीवनक अन्य क्षेत्रमे व्यर्थक आडम्बर आऽ वाह्याचार तथा परम्परा पालनक विरोध कयल गेल अछि। किन्तु मैथिलीक समस्या नाटकक बुद्धिवाद कूंडित आऽ ओकर क्षेत्र सीमित अछि, जाहिमे जार्ज बर्नाड शॉ आऽ हेनरिक इब्सनक तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव अछि। ओहुना ई परम्परा मैथिलीमे विकसित नहि भेल अछि।
आलोच्यकालमे रंगमंचक अभावक कारणेँ एकर प्रगतिमे बाधक सिद्ध भेल अछि। मैथिलीमे एक साधु अभिनयशाला नहि भेलासँ पाठ्य साहित्यक विकासक गति एक विशेष दिशामे झुकि गेल अर्थात् एहन नाटकक निर्माण होइत रहल जे साहित्यिक आनन्दक दृष्टिएँ सुन्दर रचना थिक, किन्तु रंगमंचीय विधानक दृष्टिएँ दोषपूर्ण अछि। विगत शताब्दीक नाट्य-साहित्यपर विवेचन करबाकाल मात्र रंगमंचपर ध्यान नहि देबाक चाही। जँ रंगमंचकेँ नाटकक कसौटी मानि लेल जाए तँ विश्वक अनेक प्रसिद्ध नाटकादिकेँ नाटकक श्रेणीसँ निष्कासित करए पड़त। शैलीक दृष्टिसँ मैथिली नाट्य साहित्य पूर्व आऽ पश्चिमकेँ लऽ कए चलल छल, किन्तु शनैः-शनैः ओऽ पश्चिमाभिमुख अधिक भऽ गेल अछि आऽ भारतीय तत्त्व नगण्य भेल जाऽ रहल अछि।
विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दासकेँ श्रेय आऽ प्रेय दुनू छनि जे मैथिलीमे एकांकी रचनाक शुभारम्भ कयलनि जे पश्चात् जाऽ कऽ एक सबल प्राणवन्त विधाक रूपमे पल्लवित भेल। वर्तमान समयमे एकांकी लिखल जाऽ रहल अछि अवश्य, किन्तु किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ एकांकीक वास्तविक कलाक कसौटीपर खरारहनिहार एकांकीक अनुसंधान करबा-काल निराश होमए पड़ैछ। पृष्ठभूमि, वातावरण आऽ कार्य व्यापारक अभाव प्रायः सभ एकांकीमे भेटैछ। एकर उद्देश्यक परिधि विस्तृत अछि। ओऽ सामाजिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, मनोवैज्ञानिक, हास्य-व्यंग्यपूर्ण आदि अनेक उद्देश्यकेँ लऽ कए लिखल गेल अछि। वैश्वीकरणक फलस्वरूप आधुनिक जीवनक विडम्बनापर गम्भीर प्रहार करब एकांकीकारक कर्तव्य भऽ गेलनि अछि। रेडियो आऽ टेलीभीजनक कारणेँ नाटकक नवीनतम रूप ध्वनि रूपकमे भेटैछ, जकर टेकनिक एकांकीक टेकनिकसँ भिन्न होइछ। रंगमंचीय कलाक दृष्टिसँ एकांकीक ध्वनि रूपककेँ आघात पहुँचबाक पूर्ण सम्भावना अछि, ओहिना जेना फिल्मक प्रचारसँ नाट्यकलाकेँ क्षति पहुँचल अछि।
निबन्ध
भारतीय समाजमे एक नव सांस्कृतिक आऽ राजनैतिक चेतनाक उदय, पत्रिकाक प्रकाशन, साधारण विषय, सामाजिक आन्दोलनक फलस्वरूप पत्रिकाक संग जाहि साहित्यरूपक जन्मक संगहि ओकर स्वाभाव पत्रकारिताक विशेषताक झलक भेटैछ। विषय वैविध्य, सामाजिक आऽ राजनैतिक, शैलीक रोचकता आऽ गांभीर्य, गौरवक अभाव आदि आरम्भिक निबन्धक एहन गुण अछि जे पत्रकारितासँ सम्बद्ध अछि। निबन्ध तँ ज्ञान राशिक संचित कोश थिक।
निबन्धकार समाजक भाष्यकार आऽ आलोचक सेहो होइत छथि। अतएव सामाजिक परिस्थितिक जेहन प्रभाव निबन्धमे देखबामे अबैछ ओऽ साहित्यक अन्य रूपमे नहि। विवेच्य कालावधिमे निबन्धक विषय जीवनक अनेक क्षेत्रसँ लेल गेल तुच्छसँ तुच्छ तथा गम्भीरसँ गम्भीर विषयपर निबन्ध उपलब्ध होइछ। यद्यपि ओहिमे चिन्तन-मननक गम्भीरताक अभाव अछि तथापि ओकर सामाजिक चेतना व्यापक छल। समयानुकूल विविध विषयपर बिनु कोनो पूर्वाग्रहक स्वच्छन्द भऽ कए निबन्धकार आत्मीयताक संग अपन हृदय पाठकक समक्ष रखलनि। बिनु कोनो संकोचक विदेशी शासक वा शोषककेँ डाँटि-फटकारि सकैत रहथि तँ अपना ओतयक पण्डित मुल्ला आऽ पुरान शास्त्रकार धरि हुनक कठहुज्जतिपर नीक अधलाह कहलनि। निबन्धकार एक भाग आतुर वा प्रवाह पतित परिवर्त्तनवादी अंग्रेजी सभ्यताक गुलामक खबरि लेलनि तँ दोसर भाग नूतनता भीरू रुढ़िवादीक भर्त्सना कयलनि।
विगत शताब्दीमे गद्य शैलीक निर्माण निबन्धकारक वैयक्तिक प्रयासक प्रतिफल थिक। भाषाक दृष्टिएँ तत्कालीन निबन्धकार लोकनिमे सामूहिक भाव –कॉरपोरेट सेन्स- क अभाव छल। गद्यक कोनो स्वीकृत रूप नहि भेलाक कारणेँ ओकर भाषा सार्वजनिक रूप नहि प्राप्त कऽ सकल। आलोच्य्कालक आरम्भिक निबन्धमे विषय आऽ शैलीक दृष्टिएँ वैविध्य भेटैछ।
शनैः-शनैः निबन्धमे पत्रकारिताक स्वच्छन्दता क्षीण होमय लागल। पत्रिकाक संख्या बढ़लाक कारणेँ साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्रक दूरी बढ़ैत गेल आऽ निबन्धकार शनैः-शनैः शिक्षित आऽ शिष्ट समाजक समीप अबैत गेलाह। पश्चात् जाऽ कऽ गम्भीर विषयपर निबन्ध लिखल जाय लागल जाहिसँ ओकर रूप-रंग गम्भीर भऽ गेलैक। साहित्यिक समालोचनात्मक निबन्धक धारा जतेक पुष्ट भेल ओतेक रचना विषयक नियमानुवर्तिता छोड़ि कऽ नव ढ़ंगसँ कम अधिक स्वच्छन्दतापूर्वक शैलीमे निबन्ध नहि लिखल गेल।
हरिमोहन झा प्रचुर परिमाणमे व्यंग्य प्रधान निबन्धक रचना कयलनि जकर विकास युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे भऽ रहल अछि। व्यंग्यक मूल वृत्ति सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे आलोचना भऽ रहल अछि। एकरा मूलमे नव सामाजिक चेतना आऽ ओहिसँ उत्पन्न आलोचना वृत्ति प्रखर व्यंग्यक रूप धारण कऽ कए एहन निबन्धमे अबैत अछि। एहन निबन्धकार लैंब आऽ लूकसक अपेक्षा, प्रवृत्तिक विचारसँ चेस्टरटन, प्रत्युत स्विफटक अधिक समीप छथि। मैथिली निबन्ध अपन अत्यल्प जीवनकालमे कोन प्रकारेँ विविध रूप-रंगमे विगत शताब्दीसँ विकसित होइत आयल जे आगाँ साहित्यमे विषय-नैविध्य जहिना-जहिना विकसित होइत जायत तहिना-तहिना भावी पीढ़ीक निबन्धकार बढ़ैत जयतह।
पठन-पाठनमे स्वीकृति
एकर प्राचीन साहित्यक गौरव-गरिमासँ अवगत भऽ कए विगत शताब्दीक द्वितीय दशकमे आधुनिक भारतक प्राचीनतम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे प्रथमे-प्रथम मैथिली भाषा आऽ साहित्यक एम.ए. स्तर धरि पठन-पाठनक शुभारम्भ कएलनि सर आशुतोष मुखर्जी (१८६४-१९२४) आधुनिक भारतीय भाषा विभागक अन्तर्गत। तत्पश्चात् आलोच्य शताब्दीक शष्ठ दशकक पूर्वार्द्धमे पटना विश्वविद्यालयक संगहि संग बिहारक अन्यान्य विश्वविद्यालयमे सेहो एकर पठन-पाठनक व्यवस्था भेलैक। शिक्षण संस्थानमे मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् साहित्यकार लोकनिक दायित्व बढ़लनि जे एहि निमित्त तदनुरूप पाठ्य-ग्रन्थक निर्माणार्थ ओऽ सभ सक्रिय भेलाह आऽ सहित्यान्तर्गत नव स्पन्दनक प्रादुर्भाव भेल।
पत्रिका
पुनर्जागरणक एहि प्रवृत्तिक मैथिलीक सचेष्ट मनीषी तपः सपूत संघर्षरत भऽ साहित्यक नव निर्माणक दिशामे उन्मुख भेलाह। एहिमे सन्देह नहि जे प्रगतिशील आऽ सामान्य पूर्वाग्रह मुक्त शिक्षित समाजकेँ वाणी देबाक निमित्त प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयाससँ जयपुरसँ “मैथिल हितसाधन” (१९०५) तथा काशीसँ “मिथिला मोद” (१९०६) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक, जकरा एक क्रान्तिकारी डेग कहल जाऽ सकैछ, जे गद्य साहित्यक गतिविधिसँ पाठककेँ परिचय करौलनि। एकरा माध्यमे सामयिक साहित्यिक परम्पराक अध्ययन, चिन्तन आऽ मननक क्रम स्वाभाविक आऽ वांछनीय नहि, प्रत्युत भविष्यक हेतु मार्ग निर्देश करबाक, रुढ़ि आऽ विश्वास, शास्त्रीय मान्यतादिक मूल्यांकन करबाक, युगक नवीन आवश्यकता आऽ परखबाक दृष्टिएँ अत्यावश्यक छ्ल। एहि दृष्टिएँ साहित्य निर्माता आऽ अध्येता एक दोसराक समीप आबि गेलाह आऽ कोनो ठोस वस्तु प्राप्ति करबाक प्रशस्त मार्गक निर्माण कयलनि। एक नव शक्ति उद्भाषित भेल, पर्युषितक स्थान अपर्युषितक जन्म भेल। एकर जोरदार प्रभाव पड़लैक मिथिलांचलक मैथिल समुदायपर जे ओऽ सभ एहिसँ अनुप्राणित भऽ दरभंगासँ “मिथिला मिहिर” (१९०९-) क प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि जे विगत शताब्दीक नवम दशक धरि अनवरत चलैत रहल जे पाठकक संगहि लेखक वर्गक सबल दल तैयार कयलक आऽ ओकर नवीनतम अंक देखबाक निमित्त जहिना पाठकमे उत्सुकता रहैत छलनि तहिना लेखक लोकनि में सेहो औत्सुक्य रहैत छलनि जे हुनक कोन रचना प्रकाशित भेल अछि।
मैथिली पत्रकारिताक दोसर चरणक प्रारम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) क पश्चात् प्रारम्भ भेल। एहि समयमे सामाजिक, बौद्धिक आऽ औद्योगिक विकासक रचनात्मक कार्यक्रम हेतु मेधावी जनशक्तिक लोप भऽ गेलैक। विश्व-युद्धक समाप्तिक पश्चात् लोकक मोह भंग भऽ गेलैक जे विदेशी आधिपत्यक चापसँ किछु आशा कऽ रहल रहथि। एहि निराशासँ १९२० ई. मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा समाज सुधार आऽ असहयोग आन्दोलनक शुभारम्भ मिथिलांचलक चम्पार्णसँ भेल। एहि आन्दोलनक हेतु परिस्थिति अनुकूल भेल अपन किछु गम्भीर मन, देशी लोकक विपरीत एहि आन्दोलनक स्वागत सोत्साह कयलनि आऽ मैथिली पत्रिका आलोच्य कालक तृतेय दशाब्दमे प्रकाशनक पथपर अग्रसर भेल।
मैथिली पत्रिकाक तेसर चरणक शुभारम्भ आलोच्य शताब्दीक चतुर्थ दशकमे गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट (१९३५) द्वारा देशमे संवैधानिक परिवर्तनसँ भेल। एहि समयक अवसान बेलामे द्वितीय विश्व-युद्ध (१९३९-१९४५) प्रारम्भ भेलैक तथा कतिपय नव-नव पत्रिका साहित्य जगतमे प्रवेश कयलक। विगत शताब्दीक षष्ठ दशकमे अनेक पत्रिका प्रकाशित भेल जाहिमे वैदेही (१९५०) एवं मिथिला दर्शन (१९५३) मैथिली साहित्यक नव-निर्माण अहम् भूमिकाक निर्माणे नहि कएलक प्रत्युत रचनाकारक संगहि पाठक वर्गक निर्माण कयलक। युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे गोट बीसेक पत्रिका चलि रहल अछि जाहिमे कोलकातासँ प्रकाशित कर्णामृत विगत २६ वर्षसँ अनवरत चलि रहल अछि, किन्तु शेष पत्रिकादि कखन काल कवलित भऽ जायत ओऽ तँ भविष्यपर निर्भर करैछ।
प्रकाशन
विगत एवं वर्तमान सहस्राब्दी मैथिलीक जे उत्कर्ष जनमानसक समक्ष प्रस्तुत अछि तकर ज्वलन्त साक्षी थिक जे साहित्य निर्माताक संगहि संग प्रकाशनक सौविध्यक फलस्वरूप मैथिली साहित्यमे विपुल परिमाणमे गद्य-पद्य साहित्यक प्रकाशन भेल अछि, तकर श्रेय आऽ प्रेय मैथिली अकादमी आऽ साहित्य अकादमीकेँ छैक। मैथिली अकादमी द्वारा विविध विधादिक स्तरीय ग्रंथ अद्यापि लगभग अढ़ाय सय तथा साहित्य अकादेमी द्वारा डेढ़ सय ग्रन्थक प्रकाशन भऽ सकल अछि। एहि दृष्टिसँ कोलकाताक प्रवासी संस्थादिकेँ छैक जे ओतएसँ विविध-विधादिक सहस्राधिक मौलिक अनूदित पुस्तकक प्रकाशन संभव भऽ सकल अछि जे एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। एहि दिशामे चेतना समिति अर्द्ध शतकसँ बेशी पुस्तकक प्रकाशन कयलक अछि जे उल्लेख्य योग्य अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे अन्यान्य संस्थादि जे पुस्तक प्रकाशनमे सक्रिय अछि तकर सिलसिलेवार ढ़ंगसँ पुस्तक-प्रकाशनमे सहयोग देथि। एहिसँ अतिरिक्त कतिपय साहित्यिक संस्था तथा लेखक लोकनि अपन रुचिक अनुकूल साहित्यिक प्रकाशन कऽ कए एकरा सम्वर्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि जे एहि साहित्यक रीढ़केँ सुदृढ़ कयलक अछि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे जेना पुस्तक प्रकाशनक बाढ़ि आबि गेल अछि।
महिला साहित्यकारक प्रादुर्भाव
स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यान्तर्गत जनजागरणक जे मन्त्र फूकल गेल तकर महिला साहित्यकारपर अत्यन्त तीव्र प्रभाव पड़ल। विगत शताब्दीमे पुरुष लेखकक समानहि महिला लेखक प्रचुर परिमाणमे साहित्यक प्रत्येक विधामे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जकरा नहि अस्वीकारल जाऽ सकैछ। शताब्दीक सन्धि बेलामे महिला साहित्यकारक कृतित्वक अवगाहनोपरान्त स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि, जे हुनकामे साहित्य साधनाक अपरिमित सम्भावना छनि। हुनका सभक रचनाक क्षमता एवं गुणवत्ता दुनू दृष्टिएँ उल्लेखनीय अछि। साहित्यक क्षेत्रमे मिथिलांचलक नारी समाजक जागरण विगत शताब्दीक अर्द्धशतकक पश्चात् भेल जे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। महिलामे साहित्यिक अभिरुचि जगयबाक श्रेय छैक मैथिली पत्रिकादिकेँ जकर कतिपय उदाहरण अछि। साहित्यक कोनो एहन विधा बाकी नहि अछि जाहिमे ई लोकनि अपन हस्ताक्षर नहि कयलनि। हमरा दृष्टिएँ हुनका सभमे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना युग सन्धिक उत्कर्षमे स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल अछि।
विविध गद्य
युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे मैथिलीमे आत्मकथा, जीवनी, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आऽ परिचर्चा विषयपर साहित्य पाठकक समक्ष आयल अछि। विभिन्न पत्रिकादिमे समय-समयपर एहन रचनादि अवश्य प्रकाशित भेल अछि, किन्तु ओऽ सभ प्रकाशनाभावक कारणेँ धूल-धूसरित भऽ रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशाब्दमे ब्रजलिशोर वर्मा “मणिपद्म”क एक अनमोल संस्मरण प्रकाशमे आयल अछि, “हुनकासँ भेट भेल छल”(२००४) जकर सम्पादन कयलनि प्रेमशंकर सिंह एवं इन्द्रमोहन लाल दास, जे अत्यधिक चर्चित-अर्चित भेल अछि। एकरा माध्यमे मिथिलाक अनेक कीर्तिपुरुषक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संगहि मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना तथा गौरवमय परम्पराक चित्रण कऽ मैथिली पाठककेँ अनुप्राणित कयलनि अछि।
संस्थादिक सक्रिय सहभागिता
मैथिली साहित्यक उत्कर्ष बेलामे विगत शताब्दीमे मातृभाषानुरागी लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप मैथिली भाषा आऽ साहित्यक उन्नयनार्थ भारतक विभिन्न क्षेत्रमे यथा- मैथिल महासभा (१९१०), मैथिल छात्र सम्मेलन (१९१०), मैथिली क्ल्ब (१९१८), मैथिल शिक्षित समाज (१९१९), मैथिल सम्मेलन (१९२३), मैथिल युवक संघ (१९३०), मैथिली साहित्य परिषद (१९३०), मिथिला लोक संघ (१९४७), अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति (१९५०), चेतना समिति (१९५४), कर्णगोष्ठी (१९७४) आदि-आदि साहित्यिक संस्थादिक प्रादुर्भूत भेल जे योजना वद्ध रूपेँ मनसा वाचा कर्मणा दत्तचित्त भऽ कार्यरत भेल, जकर फलस्वरूप एकर विकासक अवरुद्ध मार्ग शनैः-शनैः प्रशस्त होइत गेल। सन् १९४७ ई.मे विश्व लेखक सम्मेलन पी.ई.एन.मे, १९६० ई. मे इलाहाबादमे एवं १९६३ ई. मे दिल्लीमे पुस्तक प्रदर्शनीक फलस्वरूप १९६५ ई. मे साहित्य अकादेमीमे आऽ वर्तमान शताब्दीमे भारतीय संविधानमे एहि भाषा आऽ साहित्यकेँ अष्टम अनुसूचीमे एक प्राचीन भाषाक रूपमे मान्यता भेटलाक तत्पश्चात् एकर विकासक गति तीव्रतर होइत गेल।
वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे समग्र संस्थादिक सिलसिलेवार ढ़्गसँ अनुसंधान कऽ कए तथ्योपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयल जाय जे भावी पीढ़ीकेँ ई दिशा निर्देश करत। एहि प्रकारक संस्थादिक संख्या बड़ विशाल अछि तेँ ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा करब आवश्यक अछि।
निःसारण
युग-सन्धिक उत्कर्षबेलामे बीसम शताब्दीकेँ स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक पाछाँ कतिपय आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक तत्त्वक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली साहित्यक उन्नयनार्थ जे क्रिया-कलाप भेल तकर वास्तविक रूपेँ विवरण प्रस्तुत करब एक दुर्वह कार्य थिक तथापि साहित्यिक गवाक्षसँ उल्लेख योग्य परिस्थिति एवं परिवेशमे एकरा स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। विगत शताब्दीक मैथिली साहित्य जाहि सजीवता, प्रतिभा आऽ विभिन्न विचारादर्श आऽ गतिविधिक परिचय दैत अछि ओकर जड़िमे जाहि प्रकारेँ उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्धमे जमल ओहिना बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक बौद्धिक क्रियाशीलताक पूर्वाभास हमरा भेटैछ।
वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ई श्रेय आऽ प्रेय बीसम शताब्दीकेँ छैक जे आलोच्य कालक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक गद्य-साहित्य। जतय एक भाग परम्परागत मैथिली साहित्य अपन बन्धनमे बरोबरि बन्हने रहल आऽ अपनाकेँ मेटबैत रहल ओतय निश्चये अभूतपूर्व आऽ निस्सन्देह गद्यक रूपमे प्रतिष्ठित भेल। आलोच्य कालीन गद्य मैथिली साहित्यमे एक नव युगक अवतरण कयलक। साहित्येतिहासमे क्रमबद्ध परम्परा एहि शताब्दीक महत्वपूर्ण अवदान थिक जे अपन भविष्यक प्रति आशाक सम्बल लेने साहित्यमे प्रवेश कयलक आऽ ओकर शब्दकोशमे आश्चर्यजनक वृद्धि भेलैक। वस्तुतः आलोच्य शताब्दी गद्य-युग थिक जे अवतारणा आलोच्यकालीन गद्य थिक।
युगसन्धिक उन्मेषबेलामे गद्य जगतक संगहि संग काव्य जगतक अभूतपूर्व समागम एहि कालावधिमे भेल जे मैथिली साहित्यान्तर्गत कतिपय नव-नव विधादिक जन्म भेलैक, ओकर संस्कार भेलैक आऽ ओकर प्रचार-प्रसार द्रुतगतिएँ भेलैक आऽ भऽ रहल अछि जे वर्तमान सन्दर्भमे ओऽ साहित्यक सर्वाधिक प्रमुख अंग बनि कऽ अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित कयलक आऽ लोकप्रिय भऽ गेल अछि। वर्तमानमे साहित्यक कोनो एहन विधा नहि अछि जाहिमे तिल-तिल नूतनताक संचार नहि भऽ रहल हो आऽ साहित्य नव स्पंदनसँ भरि गेल अछि। वर्तमान समयमे हमरा लोकनि अपन मातृभाषाक अत्यन्त समीपमे छी आऽ एहिमे कतिपय उलझन आऽ सन्देहपूर्ण स्थल अछि। तथापि निस्सन्देह कहल जा सकैछ जे मैथिली जीवनक सहस्राब्दीक कालावधि मानसिक उथल-पुथल आऽ बौद्धिक क्रान्तिक संधि-स्थल थिक। विविध-धारा अन्तर्धाराक बीच वर्तमानमे हम मैतिली साहित्यक संधि स्थलपर स्थिर भऽ नवयुगक आशा भरल प्रतीक्षा कऽ रहल छी। गेटेक कथन छनि “वी बिड यू होप”- इतिहास हमरा एहिसँ नीक संदेश नहि दऽ सकैछ।
(अगिला अंकमे स्व जीवन झाक कृतिक विवेचन, श्री प्रेमशंकर सिंह द्वारा।)

डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।
“रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलास जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप।

यायावरी

नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र

-हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आऽ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आऽ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आऽ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि।
एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आऽ वर्णनकेँ पढ़थि आऽ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि।

यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आऽ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी।
अपन संस्था – इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आऽ विरासत केर रक्षा कएल जाऽ सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल।

लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आऽ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आऽ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक।

असम केर अधिकांश ऑफिस आऽ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी।
स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक।
शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आऽ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जाऽ सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब।

श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आऽ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आऽ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। हमेशा ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि।
गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आऽ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आऽ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जाऽ सकैत अछि:
१.अपर असम
२.लोअर असम
३.बराक घाटी
४.नॉर्थ कछार घाटी

शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आऽ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी।

शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब।
गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आऽ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह।

गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आऽ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह।

समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आऽ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक।

खैर! शर्माजीक प्रयास आऽ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जाऽ सकैत अछि।

हमर कमरा काफी पैघ आऽ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आऽ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आऽ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आऽ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”।

हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”।
हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”।

एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ।
अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल।

किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आऽ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आऽ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ।

स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आऽ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आऽ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक।

अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आऽ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक।
नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक
लोक रहैत छथि:

१.दीमासा (Dimasa or Cachari)
२.ह्मार (Hmar)
३.जेमि नागा (Zeme Naga)
४.कुकी (Kuki)
५.बंइते (Baite)
६.कार्बी (Karbi)
७.खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar)
८.ह्रांगखल (Hrangkhals)
९.वइफी (Vaiphies)
१०.खेलमा (Khelma)
११.रोंगमई (Rongmei)

एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल।
स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आऽ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आऽ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि।
अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक।
रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आऽ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आऽ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए।
उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक।
१८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक।
नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आऽ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक।
नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आऽ मइबांग)मे विभक्त अछि।
अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आऽ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आऽ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः
(क) लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.)
(ख) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर)
(ग) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर)
ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आऽ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आऽ गाम सेहो चलब”।
गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छञि? आऽ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ।
जटींगा पहाड़ी आऽ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आऽ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक।
अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आऽ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक।
अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आऽ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक।
आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आऽ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक।
जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कहिं कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए।
१९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आऽ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक।
स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:.
घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह।
सभ कियो हमरा माध्यमसँ आऽ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आऽ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आऽ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आऽ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”।
लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक।
जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी:
A harmonious game of hide and seek
Behind the bushes, marshy meadow
Under shadow with clouds view,
Ever ready for worthwhile, cherish at dawn,
The blues make enchanting heart of lovers
Midst of covers white
Changing scene that lively for romance
Beauty and bounty of brooks that flow.
Moments of joy, love to cherish
Insight the harmony game of hide and seek
Behind thick trespasses of white and blue
With narrow path of zig-zag.
The beauty of hills under cover
Orchids, white fall, violet at hills
Every moment thrilled with behalf
Nature disposal at North Cachar Hills.

(अनुवर्तते)
सहस्रबाढ़नि-गजेन्द्र ठाकुर

भ्रष्टाचारीकेँ दण्ड दिआ सकबाक, बच्चा सभक रिजल्ट नीक करेबाक, सभकेँ स्वस्थ रखबाक आऽ आर आर तरहक समस्या सभक। ई सभटा समस्याक समाधानक आधार छल तंत्र विज्ञान, जकर विश्वसनीयतापर कोनो प्रकारक अविश्वास नन्दकेँ कहियो नहि छलन्हि।

ओऽ तान्त्रिक नन्दसँ गुप्त पूजा-पाठ लेल पाइ-कौड़ीक माँग करए लागल। ओऽ तान्त्रिक कहियो कहन्हि जे माता सपना देलन्हि अछि, जे आब दुष्टक नाश होएत। आबए दिऔक आसिन, शारदीय नवरात्रमे सम्पूर्ण सिद्धि भए जायत। फेर मारि रास पूजा पाठक विधि, शवासन-योग आदि बता देलकन्हि नन्दकेँ आऽ नन्द ओहि सभ विधिक अनुसरण ओहिना करए लगलाह जेना एकटा विद्यार्थी अपन गुरुक पाठक अभ्यास निअमक अनुसार करैत अछि। आसिन भरि सभ काज छोड़ि नन्द एहि सभमे लागल रहलाह मुदा आसिन आएल आऽ चलिओ गेल, मुदा नञि किछु हेबाक छल आऽ ने किछु भेल। आसिनमे कहल गेल जे आब भ्रष्ट अभियन्ता सभकेँ सजा भेटबे करतैक, आबए दिऔक बरखा। एहिना साल बीति गेल मुदा सजा दिएबाक जे समय सीमा छल से आगाँ बढ़ैत रहल। पंडितजीकेँ किछु आर्थिक समस्या सेहो अएलन्हि आऽ नन्दकेँ तकर भार वहन करए पड़लन्हि। घर-द्वारपर पंडितजीक बच्चा सभ सेहो तांत्रिक विद्या शुरू कए देलक। पलंगक नीचाँ भगवती- ई शब्द पंडितजी वा तांत्रिकजीक बच्चा बाजल आऽ नन्द पलंगक नीचाँ भगवतीकेँ ताकए लागथि। फेर पंडितजी विवाह-दानक प्रस्ताव अपन पुत्र-पुत्रीक राखए लगलन्हि, नन्दक इंजीनियर भातिजसँ अपन पुत्रीक आऽ अपन पुत्रसँ नन्दक पुत्रीक। आब नन्दक मोन उचटि गेलन्हि, यावत अपना धरि गप सीमित छलन्हि तावत धरि स्वीकार छलन्हि, मुदा बाल-बच्चाक अहित हुनका कहियो स्वीकार नहि भेलन्हि। एम्हर गामक एक-दू गोट नन्दक भातिज आऽ नन्दक भैया सेहो तांत्रिककेँ घरपर जाए रबाड़ि देलखिन्ह, से ओहो अन्तमे स्वीकार कए लेलक जे ओकरा कोनो तंत्र-मंत्र नहि अबैत छैक आऽ नहिये ओऽ एहि विधिसँ ककरो सजा दिआ सकैत अछि। नन्दसँ लेल पाइ ओऽ घुराऽ देत, ओऽ ई गप सेहो कहलक, मुदा कहियो पाइ घुरा नहि सकल।
नन्दक लेल ई एकटा पैघ आघात छलन्हि। तांत्रिकक घरक बगलसँ जाथि मुदा नहि तँ वैह टोकैत छलन्हि आऽ नहिये नन्द ओकरा टोकैत छलखिन्ह। एम्हर नन्दक पुत्रीक विवाह भए गेलन्हि आऽ नन्द जेना सभ दिससँ आसरा छोड़ि बिना लक्ष्यक जिनगीक पथपर आगाँ बढ़य लगलाह।

(अनुवर्तते)

२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति

चारिम दिन :
२८ दिसम्बर १९९०, शुक्रवार :
हमसब यथावत साढ़े पॉंच बजे भोरे उठिकऽ अपन पूर्वसूचित कार्यक्रमक अनुसारे तैयार भऽ गेलहुं।पहिने बेलुर मठ गेलहुं।
बेलुर मठ :
ओतऽप्रवेश करैत देरी मोन निर्मल भऽ जाइत छै। ओतके स्वच्छ वातावरण आ शान्ति अलौकिक शक्ति के प््राति श्रद्धा आर बढ़ा दैत छै।धर्मगुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी सब हुन्कर मरणोपरान्त अहि संस्थाक निर्माण केने छथि।भागमभाग सॅ भरल शहर के एक कोन में स्थित ई स्थान महावतार रामकृष्ण परमहंस, हुनकर पत्नी शारदा देवी आ हुनकर शिष्य विवेकानन्द के मन्दिर आ प्रतिमा सऽ भरल अछि।अत विराजित प्रतिमा के मुख पर जे भक्तिभाव आ आत्मसंतोष परिलक्षित होइत छै तकर दर्शनमात्रके लेल दुनियाभरि सऽ लोकसब आबैत अछि।आस्तिकताक प्रति आस्था बढ़ाबऽमे पूर्णत: सक्षम अछि।अतऽ सऽ हम सब दक्षिणेश्वर मन्दिर गेलहुं।
दक्षिणेश्वर मन्दिर :
गंगाक कछार पर स्थित ई मन्दिर एक अछूत स्त्री रासरानी उारा निर्मित अछि। कथानुसार रासरानी के सपना में स्वयम्‌ देवी कालीजी आदेश देलखिन मन्दिर निर्माण लेल।अहि ठाम बारहटा शिवके मंदिर चारू दिस छल आ इकटा कालीजीक मंदिर बीचमे। धार्मिक स्थानक दर्शन होइ आ शैक्षणिक यात्रा पर निकलल टोली में विज्ञान आ ईश्वरक अस्तित्वके चर्चा नहिं होई से कोना भऽ सकैत छल। बहुत सामान्य विषय परन्तु हमसब काफी देर तक अहि पर बाजैत रहलहुं।आश्चर्य ई छल जे केकरो सौ प्रतिशत हिम्मत नहिं छल जे ईश्वर के अस्तित्वके पूर्णतथ झूठ मानय। हॉं सब अहि पर सहमति छलैथ जे ईश्वर ओकरे सहायक छथिन जे अपन सत्कर्म पर अडिग रहैया।
“God helps him who helps himself” (गॉड हेल्प्‌स हिम हू हेल्प्‌स हिमसेल्फ) अर्थात्‌ ईश्वरो ओकरे सहायक होइत छथिन जे अपन सहायता स्वयम्‌ करैत अछि। आब अगिला लक्ष्य छल नैशनल बॉटेनिकल गार्डेन।
इंडियन बॉटेनिकल गार्डेन :
अकरा कलकत्ता बॉटेनिकल गार्डेन आर रॉयल बॉटेनिकल गार्डेन के नाम सॅ सेहो चिन्हल जाइत अछि।अपन नामक अनुरूपे इ बगान अनेको तरहक गाछ पात स भरल छल।कलकत्तासऽ लगले शिवपुर, हावड़ा में स्थित १०९ हेक्टेयर में पसरल ई स्थान करीब १२००० प्रजातिक वनस्पति के संरक्षित केने अछि। बबूल, रोइन, बॉंस, अशोक, पाम के अनेक प्रजाति, महुआ, जंगली बादाम, सुप्ति आदि।अकर स्थापना १७८७ ईसवीमे ईस्ट इंडिया कम्पनीके एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर द्यरॉबर्ट किड’ उारा वनस्पतिके नव प््राजाति के चिन्हैलेल कैल गेल छल। उद्देश्य व्यापार छल। अतऽके मुख्य आकर्षण छल विश्वके सबसऽ पैघ बड़क गाछ द्यफाइकस बेंघालेसिंस'(Ficus Bengalhensis) ।ई गाछ २२५ वर्ष पुरान अछि। १८६४ आऽ १८६७ के भयंकर बवंडर सेहो अकरा नहिं नष्ट कऽ सकल।१९२५ में फफूंदी उारा रोगग्रस्त भेलाक बाद अकर मुख्य जड़ि काटि देल गेल। किन्तु वर्तमान में स्थित १८२५ जड़ि में सऽ कोन सबसऽ बलगर अछि से कहनाई मुश्किल।अकर उच्चतम्‌ शाखाक ऊॅंचाई २४.५ मीटर छै।ई अपनेमे एकटा जंगल जकॉं छै।अकर परिधि लगभग ४२० मीटर छै ।अतऽ सऽ बहरा भोजन कैल।तदोपरान्त कलकत्ताक दोसर (मेट्रो रेलक बाद) सबसऽ रोमांचक यात्रा हमरा सबलेल हुगली नदीके स्टीमर सऽ पार केनाई छल।हमरा सबलेल पर्याप्त सीट रिजर्व छल लेकिन हमसब ठाढ़े भऽ कऽ नदीक धारक वेग अवलोकित केलहुं। हरिउारक गंगामे स्नान केने रही आ अतऽ सागर में विलीन होइकाल सेहो देख लेलहुं।घुरैकाल हावड़ा ब्रिजके पैरे पार केलहुं। ओहिमें वॉकवे बनल छल।ओहि सेतुके नजदीकसॅ देखके एहिसऽ नीक अवसर नहिं भेट सकैत अछि।अतऽ सऽ निकलि हमरा सबके एकटा मैदानमे करीब एक घंटा लेल छोड़ि देल गेल छल। ओतऽ सऽ अपन लॉज लौट गेलहुं। काल्हि हमरा सबके कलकत्तासऽ विदा भऽ जायके अछि। ओहि हिसाबसऽ अपन समान पाती सैंत लेलहुं। फेर भोजनोपरान्त किछु मनोरंजन कैल गेल। किछुगोटए गीत सुनेलक, किछु चुटकुला, तऽ किछुगोटय शायरी सुनेलक। हम एकटा स्वरचित हास्य कविता सुनेलहुं जाहिमें सब विषय आऽ ओहि विषयक शिक्षक-शिक्षिका सबसऽ बचके ईच्छा व्यक्त केने छलहुं।ई हम अपन विद्यालयमे शिक्षक दिवस पर सुनेने छलहुं। अतौ सबके हॅंसाबऽ में सक्षम भेलहुं। अहिप्रकारे आहिके दिनचर्या समाप्त भेल।

१. हरिमोहन झा समग्र २.महिला-स्तंभ -जितमोहन झा
. हरिमोहन झा
स्व. श्री हरिमोहन झा (१९०८-१९८४)
जन्म १८ सितम्बर १९०८ ई. ग्राम+पो.- कुमर बाजितपुर , जिला- वैशाली, बिहार, भारत। पिता- स्वर्गीय पं. जनार्दन झा “जनसीदन” मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दीक लब्धप्रतिष्ठ द्विवेदीयुगीन कवि-साहित्यकार। शिक्षा- दर्शनशास्त्रमे एम.ए.- १९३२, बिहार-उड़ीसामे सर्वोच्च स्थान लेल स्वर्णपदक प्राप्त। सन् १९३३ सँ बी.एन.कॉलेज पटनामे व्याख्याता, पटना कॉलेजमे १९४८ ई.सँ प्राध्यापक, सन् १९५३ सँ पटना विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष आऽ सन् १९७० सँ १९७५ धरि यू.जी.सी. रिसर्च प्रोफेसर रहलाह। हिनकर मैथिली कृति १९३३ मे “कन्यादान” (उपन्यास), १९४३ मे “द्विरागमन”(उपन्यास), १९४५ मे “प्रणम्य देवता” (कथा-संग्रह), १९४९ मे “रंगशाला”(कथा-संग्रह), १९६० मे “चर्चरी”(कथा-संग्रह) आऽ १९४८ ई. मे “खट्टर ककाक तरंग” (व्यंग्य) अछि। “एकादशी” (कथा-संग्रह)क दोसर संस्करण १९८७ ए. मे आयल जाहिमे ग्रेजुअट पुतोहुक बदलाने “द्वादश निदान” सम्मिलित कएल गेल जे पहिने “मिथिला मिहिर”मे छपल छल मुदा पहिलुका कोनो संग्रहमे नहि आएल छल।श्री रमानथ झाक अनुरोधपर लिखल गेल “बाबाक संस्कार” सेहो एहि संग्रहमे अछि। आऽ हुनकर “खट्टर काका” हिन्दीमे सेहो १९७१ ई. मे पुस्तकाकार आएल। एकर अतिरिक्त हिनकक स्फुट प्रकाशित-लिखित पद्यक संग्रक “हरिमोहन झा रचनावली खण्ड ४ (कविता)” एहि नामसँ १९९९ ई.मे छपल आऽ हिनकर आत्मचरित “जीवन-यात्रा” १९८४ ई.मे छपल। हरिमोहन बाबूक “जीवन यात्रा” एकमात्र पोथी छल जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल छल आऽ एहि ग्रंथपर हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार १९८५ ई. मे मृत्योपरान्त देल गेलन्हि। साहित्य अकादमीसँ १९९९ ई. मे “बीछल कथा” नामसँ श्री राजमोहन झा आऽ श्री सुभाष चन्द्र यादव द्वारा चयनित हिनकर कथा सभक संग्रह प्रकाशित कएल गेल, एहि संग्रहमे किछु कथा एहनो अछि जे हिनकर एखन धरिक कोनो पुरान संग्रहमे सम्मिलित नहि छल। हिनकर अनेक रचना हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषामे अनुवादित भेल। हिन्दीमे “न्याय दर्षन”, “वैशेषिक दर्शन”, “तर्कशास्त्र”(निगमन), दत्त-चटर्जीक “भारतीय दर्शनक” अंग्रेजीसँ हिन्दी अनुवादक संग हिनकर सम्पादित “दार्शनिक विवेचनाएँ” आदि ग्रन्थ प्रकाशित अछि। अंग्रेजीमे हिनकर शोध ग्रंथ अछि- “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी”।
प्राचीन युगमे विद्यापति मैथिली काव्यकेँ उत्कर्षक जाहि उच्च शिखरपर आसीन कएलनि, हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली गद्यकेँ ताहि स्थानपर पहुँचा देलनि। हास्य व्यंग्यपूर्णशैलीमे सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आऽ पाखण्डपर चोट हिनकर लेखनक अन्यतम वैशिष्ट्य रहलनि। मैथिलीमे आइयो सर्वाधिक कीनल आऽ पढ़ल जायबला पीसभ हिनकहि छनि।
हरिमोहन झा समग्र
कन्यादानक समर्पण- जे समाज कन्या कैं जड़ पदार्थवत् दान कय देबा मे कुंठित नहि होइत छथि, जाहि समाजक सूत्रधार लोकनि बालक कैं पढ़ैबाक पाछाँ हजारक हजार पानि मे बहबैत छथि और कन्याक हेतु चारि कैञ्चाक सिलेटो कीनब आवश्यक नहि बुझैत छथि, जाहि समाजमे बी.ए. पास पतिक जीवन-संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन्ह, जाहि समाज कैं दाम्पत्य-जीवनक गाड़ी मे सरकसिया घोड़ाक संग निरीह बाछी कैं जोतैत कनेको ममता नहि लगैत छन्हि, ताही समाजक महारथी लोकनिक कर-कुलिश मे ई पुस्तक सविनय, सानुरोध ओ सभय समर्पित।
प्रणम्य देवताक समर्पण- आइ सँ सात वर्ष पूर्व जे कार्तिकी पूर्णिमाक करार पर हमरा सँ पैंच लऽ गेलाह और तहियासँ पुनः कहियो दर्शन देबाक कृपा नहि कैलन्हि, जनिक चिर-स्मरणीय कीर्ति-कलाप प्रथमे कथा मे विशद रूप सँ वर्णित छैन्ह, जे “प्रणम्य देवता” क मध्य सर्वश्रेष्ठ आसन पर अधिकार जमा सकैत छथि, जनिक वन्दनीय बन्धुवर्ग ई पुस्तक देखि विनु मङनहि अपन स्वत्व स्थापित कय लऽ सकैत छथि, तेहन प्रमुख चरित-नायक, विकट पाहुन भीमेन्द्रनाथ क सुदृढ़ विशाल मुष्टिमे ई विचित्र-चरित्र-पूर्ण पोथी विवशतापूर्वक अर्पित छैन्ह!
खट्टर ककाक तरंगक समर्पण- जे भंगक तरंगमे काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा बहा दैत छथि; जनिक प्रवाहमे थोड़ेक कालक हेतु वेद-पुराण, धर्मशास्त्र, सभटा भसिया जाइत अछि; जे बात-बातमे अद्भुत रस ओ चमत्कारक चाशनी घोरि दैत छथि; जे मर्मस्पर्षी व्यंग्य द्वारा लोकक अन्तस्तल मे पहुँचि गुदगुदी लगा दैत छथि; तेहन चिर आनन्दमूर्ति, परिहास-प्रिय खट्टर कका कैं- त्व्दीयं वस्तु पितृव्य! तुभ्यमेव समर्पितम्।
रंगशालाक समर्पण- जे अक्षययौवना नटी एहि अनादि अनन्त रंगशालाक प्रवर्तिका थिकीह, जे मनोहर वीणा-वादिनी सम्पूर्ण चराचर विश्वकैं अपना आंगुरक अग्रभाग पर नचा रहल छथि, जे रहस्यमयी अपन मोहिनी लीलाक झलक देखाय ककरो स्पर्श नहि करय दैत छथिन्ह, जे कल्पनाक रंगीन पाँखि पर आबि कलाकारक कलामे रसक संचार करैत छथिन्ह, तेहन आश्चर्यकारिणी चिरसुन्दरी त्रैलोक्य-विजयिनी माया देवी कैं।

जितमोहन झा घरक नाम “जितू” जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि।

कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार

पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ। जहिया गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बचपनक दोस्तक बहुत जोर मोन ख़राब छनि ! आर ओ अस्पतालमे भरती छथि ! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि ! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्तकेँ) छुट्टी मिल जेतनि, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनी चारू दिस घुमि – फिरि ली। मनमे अस्पतालक लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्तक वार्डसँ बाहर निकललहुँ, हमर नज़रि अपन चचेरा भैया – भाभी पर पड़ल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़र एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल …..पुछलियनि की बात … मुदा ओ किछु जबाब नञि देलीह। हमर पत्नी कातमे बजा कए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलकि उठलनि, पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्याकेँ नञि बर्दाश्त करैक चेतावनी भैया हुनका पहिने द् चुकलकिन-ए ….पता चलल गर्भ परिक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पोसा रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासँ उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ – साफ देख्अलहुँ ! बादमे हमरा आर हमर पत्नी केँ कतेक बुझेलापर भैया भाभीकेँ वापस घर लए गेलखिन ! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि ….

ओना भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनो बनेने छथि ! मुदा ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नञि छोड़ने अछि, तखने तँ भैया बहुत आसानीसँ भाभीकेँ गर्भ परीक्षण करबाबए लेल चलि देने छलथि। हम तँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जा तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि हएबक समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल ? नञि ! आर यदि अपने ई नञि हेबाक कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतहु ने कतहु कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक संग कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फेरमे नए रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ के कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबए परए …. हम सब चुकय नञि छी ! हम तँ पूछे छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मूह सिकोरल जाइत अछि ? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार कएल जाइत अछि ! मुदा कि लड़काक जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि ? लड़कोकेँ तँ परवरिश करए परए-ए ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए पड़ैत अछि ! आर विवाह ……..!

यदि एहि गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़काकेँ कुंआरे रहए पड़त ! उदाहरण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज कएल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटए छनि। ओहि ठामक लोकनीकेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि …..

कनी सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जाएत तँ की होएत ?

हम नीक जेकाँ जनैत छी जे अपने एहि बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण देबाक लेल ! लेकिन कि अपने स्वयं कन्या भ्रूण हत्या रोकएमे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल एहि गाड़ीक दुनु पहियाक समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! एहि खिलवाड़केँ रोकए लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए पड़त कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही रूपामे आधुनिक कहाएब ….

1.श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )।विचार टिप्पणी- गंगेश गुंजन
भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ

“भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी।
हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आऽ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से।
पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आऽ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि।
अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह!
2.सुशांत झा,ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मधुबनी(बिहार),हिनकर पिता श्री पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ ताहि समयक मिथिला मिहिर आऽ आर्यावर्तक प्रसिद्ध स्थाई स्तंभकार। पठन-लेखन विरासतमे भेटल छन्हि सुशान्तजीकेँ।
सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि,-मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक(इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी(भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा(2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आऽ न्यूज वेबसाईटमे काज,दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल|
बिहार में प्रलय, लेकिन की छैक निदान ?

बिहार में एहिबेर बाढ़ि प्रलय बनि कऽ आयल अछि। ई ओऽ बाढ़ि नहि छी जे पहिनउ अबैत छल आऽ दस-पांच दिन रहि कऽ चलि जाइत छल। अहि विभिषिका के तँ ककरो उम्मीदो नहि छलैक। ऐहेन आपदा तँ हजार दू हजार सालमे एक बेर अबैत छैक। लेकिन पैघ सवाल ई जे कि एकर कोनो निदान छैक या बिहार के एकटा हिस्सा एहिना बीरान भय जेतै? इतिहासकार सभक मत छन्हि जे दुनिया के कय टा सभ्यता एहिना बाढ़ि वा भुकंप के कारणे खत्म भऽ गेलैक। किछु लोक केँ इहो कहब छन्हि जे सिंधु घाटी सभ्यता सेहो एहने कोनो बाढ़िक कारणेँ खत्म भऽ गेलैक। बहुत दिन पहिने प्रख्यात नदी विशेषज्ञ अनुपम मिश्रक लेख पढ़ने रही जाहिमे ओऽ कहने रहथि जे विशाल बांध बनाकऽ बाढिक जबर्दस्ती निदान नहि कयल जा सकैत अछि। हमरा लोकनि केँ नदीक संग जिनाई सीखय पड़त।ओकर पानि केँ बिना कोनो छेड़छाड़ के समुद्र तक जाई के रास्ता देबय पड़त।अगर एहिमे कोनो रुकाबट हेतई तँ प्रकृतिक कोप हमरा सबके झेलय-ए पड़त। आऽ अगर ध्यान सँ देखल जाय तँ पिछला सय सालमे यैह भेलैक अछि।

बाढ़िक सबसँ पैघ कारण छैक नदीक सिल्टींग। जाबेकाल तक एहि सिल्टींग के दूर नहि कयल जायत ताबेकाल तक बाढ़ि पर प्रभावी ढ़ंग सँ रोक नहि लगायल जाऽ सकैत अछि। पानि केँ जखन-जखन समुद्रमे जाईमे अवरोध हेतई- ओकर पानि किनारमे पसरि जायत। गौरसँ देखल जाए तँ सिल्टिंग हटेनाई कोनो बड्ड मुश्किल नहि। खास कऽ बिहार एहेन प्रान्तमे तँ एहिसँ कतेक रास रोजगार सेहो सृजन कयल जा सकैत अछि। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना केँ पाई सेहो अहि मे लगायल जाऽ सकैत अछि। दोसर बात ई जे नदीक कछेरमे सिल्ट सँ ऊंच तटबंध आऽ सड़क बनायल जाऽ सकैत अछि, पर्यटन आऽ दोसर कतेको काज कायल जाऽ सकैत अछि।

बिहारमे बहय बला नदीक स्रोत नेपालमे छैक। ओहि पानिपर हमरा लोकनिक कोनो बस नहि आऽ ने ओहि पानिकेँ नेपालमे रोकल जाऽ सकैत छैक। पुरना जमानामे नेपालक तराईमे आऽ पहाड़क ढ़लानपर खूब बोन छलै- जे पिछला सय-दू सय सालमे खत्म भय गेलै। आब पहाड़मे कनियो पानि होई छै कि मैदानमे पसरि जाई छैक। पहिने ओऽ जंगलक कारणे आस्ते-आस्ते मैदानमे अबैत छलै। बिहार सरकार अहि मामलामे किछु नहि कऽ सकैत अछि, सिवाय केंद्र पर दबाव दै के। हँ, भारत सरकार चाहे तँ नेपालक संग मिल कय बाढिकेँ रोकय के लेल छोट-छोट बांध आऽ वनीकरणक एकटा दीर्घकालीन नीति बना सकैत अछि । एहि के लेल हजारो करोड़ रुपैया के निवेश के जरुरत छैक आऽ ई काज दूनू देशक आपसी सहयोगसँ कयल जाऽ सकैत अछि।

दोसर बात ई जे हमरा सबके अपन गलती के सेहो ध्यान में राखय चाही। छोट-2 धार जे कमला-बलान में मिल जाईत छलैक ओकरा पिछला शताब्दी में भरि कय़ खेत आ घराड़ी बना लेल गेलै।जे जमीन, सरकारी मानल जाईत छलैक ओकर बड़ पैघ पैमाना पर लूट भेलैक।एकरा कड़ा कानून बना कय रोक पड़त। पानि के संग छेड़छाड़ के जघन्य अपराध घोषित कर पड़त।इम्हर जे विकास के योजना बनलैक ओहो बाढ़ के बढ़ावा दै में कोनो कसर नहि छोड़लकै।उदाहरणार्थ, उत्तर बिहार में जमीन के ढ़लान उत्तर सं दक्षिण दीस आ दक्षिण बिहार में दक्षिण सं उत्तर दीस छैक। लेकिन के टा एहन हाईवे आ रेलवे बनलैक जे पानि के प्राकृतिक बहाव में अवरोध भय गेलैक। जेना, दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाईवे आ दरभंगा-निर्मली रेलवे लाईन।एतय कहैक ई मतलब नहि जे विकास नहि हुअक चाही-लेकिन विकास आ प्रकृति के बीच में पूरा सामंजस्य हुआ के चाही।

दोसर बात ई जे बिहार में जे नदी परियोजना सब में पिछला पचास साल सं लूट भेलैक ओहिलेल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के अध्यक्षता में एकटा आयोग बनय के चाही।पूरा देश में हमरा हिसाब सं बिहार में जतेक लूट भेलैक ओते कतौ नहि। कोसिये के बात कयल जाय त -पश्चिम कोसी नहरि जे हमरा गांव के बीच सं निकलैत अछि ओकरा सरकारी घोषणा के हिसाब सं 1983 में बनि जाय के चाही छलैक।लेकिन एखन पचीस साल बीतला के बादों कोनो उम्मीद नहि। हमरा जनैत जे यदि नदी परियोजने सब के ढ़ंग सं लागू कयल जैयतैक त बाढ़ि के पूरा नहि त आधा समाधान त जरुर निकलि जयतैक। शायदि एखनो पूरा तबाही नहि भेल अछि,एहि बेरक जलप्रलय़ हमरा सबके सूतल सं जगेलक अछि। कुल मिलाकय जाबेतक बाढ़ि जनता आ राजनेता सबके एजेंडा में शामिल नहि होयत ताबेत तक एकर समाधान संभव नहि अछि।

3.बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)।
संदकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आऽ मैथिल
मिथिलाक विकास क़ेना आऽ कखन
विकासक बिना जिनगी बड कठिन। विकासक रस्ता बड उबड ख़ाबड ।
संघर्ष सदिखन। डेग डेगपर। बिना संघर्षक विकासो संभव नहि।
सर्वांगीन विकासक हेतु़ व्यक्तिगत विकासे आधार होइछ ।
बहुत किछु गमेलहुँ मुदा आब नहि।
मैथिल युवा मोर्चा तैयार भए रहल अछि। विकसित वा अविकसितक बिच-बिचवामे छी।एतवा तॅ तए अछि जे आर्थिक विकासक लेल सुर सार भए रहल अछि। आर्थिक विकास एकटा गति होइछ जे कखनो कम वा बेशी।
आर्थिक उपार्जनक लेल़ हम सब सकारात्मक प्रयासमे सुतल छी। जहिया उठब़ तहिया सिंह जकां दहारब वा सांप जकां फूफकारब।
जय श्री हनुमानजी एक समयमे अपन शक्ति बिसरि गेल छलाह, तहिना हम सब मैथिल अपन शक्ति बिसरौने छी।
बहुतो मैथिल प्रवाशी जीवनमे़ अपन आर्थिक सक्षमता मे वृद्धि केलाह, परञ्च हुनक धिया पूता मिथिला मैथिल सॅं कोसो दुर !!! पैघ संकट। ग्रेट रिस्क!!!
मैथिलक सम्मान मैथिली थीक आओर एकर अपमान मैथिले कऽ रहल छथि। अपने परिवारमे मैथिलीपर मतांतर। मैथिली घरेमे टूअर।
मैथिल पलायनसॅं मैथिलीक आकस्मिक अन्त। केऽ विलाप कडत।
पलायन दुइ स्थितिमे-
१. जीवन भरण पोषणक लेल
२. व्यक्तिगत उद्देश्यक पूर्तिक लेल
मिथिलामे की कमी
डेग डेग पर पोखरि
घर घरमे पतरा-पोथी।
गाम गाममे जाति पॉति
छोटका पॉति लैऽ कऽ एके परिवारमे शानक घमासान।
मैथिली संकटमे, आवश्यकत अछि कोमल स्पर्शक।
कतेको बेर बिहार सरकार द्वारा मैथिली भाषापर सीधा प्रहार भेल। परम दुखक बात ई अछि जे किछु मैथिल मैथिलीकेँ तोड़यमे लागल रहल छथि। परञ्च चिंताक कोनो बात नहि़। मैथिली अछि अटल़-अविचल। मैथिलीक जड़ बड़ मजगूत।
हम मैथिलसब अपन मौलिक कर्तव्य बूझि आऽ अपन भाषा सॅं अथाह लगन लगावी।
बंगाली-पंजाबी-मराठी केँ देखु जे अपन मातृभाषाक प्राणोंसॅं ऊपर स्थान देने छथि। एतबाऽ नहि हर मंचपर अपन भाषाक प्रति स्नेह तथा सम्मान कन्निको कट्टौती नहि करैत छथि। परञ्च़ हम मैथिल कतेक निष्ठा रखैत छी। एहन किछुए मैथिलके देखल जा सकैछ।
बंगालमे बंगाली, पंजाबमे पंजाबी। एहिना बहुतो प्रादेशिक राज्यमे़ अपन-अपन भाषाकेँ अपन जीऽ जान सॅं पैध लगाव रखने छथि।
बंगालीक भाषा बंगाली
पंजाबीक भाषा पंजाबी
मराठीक भाषा मराठी
बिहारीक भाषा की?
हिन्दी़-भोजपुरी आऽ मैथिली
हिन्दी़ तॅं राष्ट्रभाषाक अस्तित्वमे अछि। भोजपुरी काफी लोकप्रियता हासिल कय रहल अछि। भोजपुरी सिनेमा उद्योगकेँ काफी सफलता भेटल। मुदा मैथिलीक स्थिति बिहारमे केहन अछि से की कहल जा्‌इछ। मैथिलीक स्थिति मिथिलामे बड़ कमजोर।
गैरमैथिल बिहारी कतेक प्रतिशत मैथिलीक इज्जत करैत छी।अनुमानित प्रतिशत बड़ कम होयत।
मैथिल अपनाकेँ गोद लेल मैथिल जेकाँ आचरित कहिआ धरि करताह?
मैथिली सशक्त भाषा अछि। एकर अपन इतिहास अछि। परञ्च हम सब मैथिली बाजय वालाकेँ आऽ लिखय वालाकेँ पिछड़ल बुझैत छी।अनेक भाषा सीखू़ बाजू़ मुदा मैथिलीकेँ छोड़ि कऽ नहि। मैथिलीकेँ बोझ नहि बुझियौक।
अगिला अंकमे
4.शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी।
कखन बदलब हम-शक्ति शेखर
बहुत तामस होइए भगवानक एहि कृत्यसँ जे ओऽ अपन उपस्थिति मिथिलांचलमे दर्ज केनाय शायदे कोनो साल बिसरै छथि। मुदा हमरा सबकेँ एहि भयावह स्थितिसँ लड़बाक अलावा आओर कोनो रस्तो तँ नहि अछि। जी, हम बात कऽ रहल छी, एखन बिहारमे आयल बाढिक संदर्भमे। अनुमान लगायल जाऽ रहल अछि, जे अहि बाढिक चपेटमे करीब 50 लाख लोक आयल छथि। सभ साल जुलाई-अगस्तक मास अबिते बिहारक लोक आतंकित भऽ जाइत छथि।सबहक मोनमे ई डर रहै छनि, जे एहि बेर केकर घर उजरतौ। लोकसब भरि साल दिन राति मेहनत कऽ एकटा घर बनाबैत छथि, किछु पूंजी जमा करैत छथि,मुदा की होइए एहि सभसँ? ई बाढि तँ कोनो आतंकवादीसँ बेसी भयावह होइत अछि जे हर बेर कतेको गामकेँ, कतेको बिगहा जमीनकेँ अपन अंदर समेट लैत अछि। संबधित विभाग बाढिकेँ लऽ कऽ सब जानकारी राखितो कोनो तरहक कदम नहि उठाबैत अछि। शायद ई बाढि हुनका सभक लेल आमदनीक एकटा श्रोत जे होइ-ए। पछुलका बाढि सभक राहत-अनुदानपर नजर दौड़ाबी तँ निधोक एक बात कहनाइ अनुचित नहि होयत, जे बाढिसँ कतेको लोक करोड़पति सेहो भऽ गेलाह। ईश्र्वरक लीला देखियौक, जे एक दिस एहि बाढिसँ सभ बेर कतेको लोक (शायद अनुमान लगेनाय असंभव अछि) केर सब चीज लुइटे जाय छनि, तँ दोसर दिस बाढि घोटालाक अभियुक्त आओर कतेको लोक करोड़पतिक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि दृश्यक बारेमे सोचल जाय, जे पूर्णियामे बाढिक डरे अपन छत पर बैसल चारि सालक बच्चा भूखसँ अपन दम तोड़ि देलक, ओहि लोकक बारेमे सोचि, जिनका खेनाय तँ दूर पिबऽ के लेल पानि तक नहि भेटि रहल छनि। लोकक चापाकल बाढिक पानिमे डुबि गेल छनि। हिनका सभ लग किएक नहि पहुंचि पाबि रहल छनि राहत सामाग्री। कहिं एहन तँ नहि जे फ़ेर सँ कतेको लोक एहि बाढिमे करोड़पति बनए वला छथि। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बिहारक बाढिकेँ राष्ट्रीय आपदा घोषित तँ कऽ देलन्हि मुदा पीड़ितक लेल ई सांत्वना मात्र अछि। केन्द्र सरकार दिससँ बिहारक बाढि पीड़ितक लेल 1000 करोड़ रुपया अनुदानक राशि देल गेल अछि। मुदा एहि अनुदानक राशिक विषयमे अखनो कतेको बाढि पीड़ित केँ मालूम नहि चलि सकल अछि। जिनका अहि बारेमे जानकारी भेटबो कैल तँ निश्चित ओऽ सोचने हेताह कि शायदे एहि राशिमे सँ हुनका सभकेँ किछु भेटत। केन्द्र सरकार ई राशि तँ दऽ कऽ अपन बाढि पीड़ितसँ तँ अपन पल्ला झाड़ि लेलाह, मुदा बाढि पीड़ित तक ई राशि कोना पहुंचि सकत, एहि बारेमे हुनकर ध्यान नहि गेल अछि। एक बेर फ़ेरसँ कहब जे ई अनुदानक राशि सब विभाग तक बटैत बटैत दस प्रतिशतो बाढि पीड़ित तक नहि पहुंचि सकत। आओर हँ, बाढिक दोगमे जे सभसँ पैघ चीज होइत अछि ओऽ अछि राजनीति। कतेको नेता सभ एहि बाढि पीड़ितक लेल आगिमे घी देनाय जेहेन काज करैत छथि। राज्य सरकार केँ दोषी ठहराबैत नेता सब ओहि जगह अपन सीट सुनिश्चित करबाक फ़िराकमे रहैत छथि। हेलीकाप्टरसँ बाढि क्षेत्रक सर्वेक्षण करैत बहुतो नेतासभकेँ अतबो जानकारी नहि रहैत छनि जे ओऽ कोन क्षेत्रक दौड़ा कऽ रहल छथि। पता एहि बातसँ लगायल जाऽ सकैत अछि जे नेतासभ ओहि क्षेत्रक कतेक ज्ञान रखने छथि। इमहर राज्य सरकार सेहो कहां चुप रहए वला। ओऽ केन्द्रपर निशाना साधैत छथि तँ केन्द्र राज्य सरकार पर। एहि राजनीतिमे पिसाइत तँ बाढि पीड़ित छथि। कोनो बात नहि, समय आबि गेल अछि एकजुटता देखाबएबाक आऽ मदति करबाक….बाढि पीड़ितक संग, बाढि पीड़ितक लेल। तखने हम स्वतंत्र भारतक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भऽ सकए छी।

5.ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी।
मिथिले तक नहि छथि मैथिल-ओमप्रकाश झा
गप्प अछि नवंबर 2007 केर, एहि समयमे हम गोवा न्यूज (जे कि गोवा अवस्थित अंग्रेजी क्षेत्रीय न्यूज चैनल छ्ल) मे काज करैत रही। गोवामे सोलहम अंतराष्ट्रीय मैथिली परिषदक सम्मेलन भेल छ्ल, जकर अध्यक्षता श्री विनय कुमार झा ,चीफ़ विजिलेंस,गोवा स्टेट केलथि। एहि कांफ़रेंसक एकटा छोट सनक अंश यू-टयूब साइट पर सेहो उपलब्ध अछि। एहि कार्यक्रमकेँ कवर करबाक भार अपन संस्थासँ हमरे भेटल छ्ल। एहि कार्यक्रमक दौरान बहुत रास चित्र जे स्पष्ट भऽ कऽ सोझाँ आयल ओऽ ई सभ छल…….
1.बहुत रास मैथिल छतीसगढ आऽ मध्य प्रदेशमे बसल छथि। हालांकि आब हुनका सबहक मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल अछि। यदि आओर तहमे जाई तँ ओऽ लोकनि मैथिली भाषा बिसरि चुकल छथि, तथापि मिथिलासँ ओतबेक स्नेह आऽ लगाव छन्हि, जतबाक हमरा सबकेँ अछि। हुनकर सबहक पुस्त बहुत पहिने ओतए चलि गेल रहथिन्ह। गप्प करीब 4-5 पुस्त पहिनेक अछि।
2. दिल्लीक नांगलोई इलाकामे सेहो किछु रास मैथिल छथि, जे कि अपन जीवन-यापनक क्रममे कतेक रास आन आन व्यवसाय सब अपना लेने छथि। संगहि देशक भिन्न- भिन्न भागमे कतेको ठाम मैथिल लोकनि वृहद समुदायक संग रहि रहल छथि। ओना भाषा एहिमे सँ बहुतो गोटेक हरा गेल अछि।
3. एकटा आरो गप्प जे कि सामने आयल ओऽ छल, जे कि गोवाकेँ मैथिले ब्राहम्ण सब बसेने छथि आऽ एकर प्रमाण स्कन्द पुराणमे भेटैत अछि। हम अहाँ केँ ई बात कहि दी, जे कि गोवन (गोवाक वासी) सबहक मातृभाषा कोंकणी अछि मुदा एहि भाषाक बहुतो रास शब्द मैथिली भाषाक अछि। किछु शब्दक बारेमे हम अहाँ सबकेँ कहि रहल छी, जेना कि अदहन (भातक लेल गरम कएल गेल पानि), पाहुन (गेस्ट), मधुर आदि। ओहो सब कोजगरा दिन लक्ष्मी पूजा करैत छथि। रहन-सहनक स्तर अपना सबसँ बहुत हद तक मिलैत अछि। आओर तहमे गेनाय अखन उचित नहि अछि।
कार्यक्रममे कतेको मिथिला-विभूति सब उपस्थित छलाह। वर्तमानमे दिल्ली पुलिसमे वरिष्ठ अधिकारी श्री उज्जवल मिश्र ओहि ठाम तत्कालीन डी.आइ.जी. छलाह। भारतक विभिन्न भागक संगे नेपालक किछु रास प्रतिनिधि सब सेहो पहुंचल छलाह। एहि कार्यक्रमक कवर करबाक लेल गोवा न्यूज आऽ नेपाल टीवी (नेपालक) चैनल पहुंचल छल, जखन कि बड़का-बड़का मैथिल पुरोधा सब गोवामे विभिन्न मीडिया लेल काज करैत छथि। बादमे जहन हुनका सबसँ जिज्ञासा बस पुछलियन्हि तँ कुनू ने कुनू ओहने बहाना बना लेलाह, जेना कि जखन प्रधानमंत्री स्व० राजीव गांधीक समयमे मधुबनी के एम०पी० हनान अंसारी लोक सभामे मैथिली केँ अष्टम सूचीमे जोरबाक लेल आवाज बुलंद केलथि तँ श्री भोगेन्द्र झा जी जे कुनू बहान्ना बनेने रहथि। हम एकर तहमे नहि जाय चाहब, सब गोटे बुझि रहल छी। अल्पज्ञ कहु वा किशोर हमरा मोनमे कतेको प्रश्न उठए लागल जे एनामे मैथिली कोना बचल रहत।
हयऔ, हमर भाषा कुनू अन्य भाषा सँ कनिको कमजोर नहि अछि। हमरा लोकनि अंग्रेजी बाजैत छी, आधुनिक परिधान पहिरैत छी, सबटा बड्ड नीक बात अछि। मुदा एहि तमाम चीजक मूल्यक रुपमे अपन भाषा आऽ संस्कृति केँ उत्सर्ग केनाय हमरा नहि पचि रहल अछि। ई तँ ओहने गप्प भेल जेना किछु रास लोककेँ आर्थिक तंगी नहि रहलाक बादो दोसरसँ कर्ज लेबाक प्रवृति होय छन्हि।
परिवर्तनक फ़ेज सँ गुजरि रहल अपन समाज कहीं त्रिशंकु तँ नहि बनि रहल अछि।एखन बस एतबे।

(c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
‘विदेह’ (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx .txt वा .rtf फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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