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विदेह १५ सितम्बर २००८ वर्ष १ मास ९ अंक १८- part-I

In विदेह १५ सितम्बर २००८ वर्ष १ मास ९ अंक १८- part-I on अक्टूबर 26, 2008 at 9:51 पूर्वाह्न

विदेह १५ सितम्बर २००८ वर्ष १ मास ९ अंक १८

‘विदेह’ १५ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १८ ) एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय (बाढ़िपर विशेष) २.संदेश
३.मैथिली रिपोर्ताज- १. कतारसँ श्याम सुन्दर शशि २. जितेन्द्र झा ३. पटनासँ नवेन्दु कुमार झा ४.गुंजनजीक विचार-टिप्पणी आऽ ५. बी.के. कर्णजीक मिथिला-मंोथन
४. गद्य –
१. शम्भू कुमार सिंह २. कुमार मनोज कश्यप
पोथी समीक्षा:- १.नो एण्ट्री: मा प्रविश २. उदाहरण
जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन-डॉ प्रेमशंकर सिंह
शोध लेख-१.स्व. राजकमल चौधरी(देवशंकर नवीन)
यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी
कोसी गद्य १. श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर २. स्व. श्री राजकमल चौधरी
५.पद्य
विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)2.गुंजनजीक गजल
१. श्री गंगेश गुंजन (राधा तेसर खेप) २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी
महाकाव्य- बुद्ध चरित
१. स्व. गोपेशजी २. डॉ पंकज पराशर
१. विनीत उत्पल २. अंकुर झा
६. मिथिला कला-संगीत(आगाँ)
७.पाबनि-संस्कार-तीर्थ –
८. महिला-स्तंभ- – जितमोहन झा
९. बालानां कृते-

१०. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ)
11.. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
Videha Mithila Tirbhukti Tirhut…
The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani
12. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)
विदेह (दिनांक १५ सितम्बर सन् २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:९ अंक:१८)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक १८, दिनांक १५ सितम्बर सन् २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
कोशी:
कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आऽ गौरी-शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशी, जाहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आऽ तामर कोसी सम्मिलित अछि।
एहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आऽ दूध कोसी मिलि कए सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आऽ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आऽ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि।
अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि।
तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आऽ अपन पानि कंचनजंघा पर्वतश्रृंखलासँ पबैत अछि।
आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आऽ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतएसँ १० किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैत अछि जतए महाकोसी, सप्तकोसी वा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः ५० किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर- भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आऽ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आऽ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आऽ भारतमे लगभग १३० किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइत छथि। कोसीमे बागमती आऽ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि।
कोसीपर पहिल बान्ह १२म शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे एखनो अछि।
भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आऽ पूर्वी कोसी नहरि सेहो।
कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ २३ किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आऽ राजनीतिमे ओझरा गेल। एहि बैराजसँ दू फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितए, दोसर एहिसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जाहिसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतए। मुदा एहि बैरेज निर्माण लेल पाइ आवंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नहि देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा एखनो धरि ओहिमे काज भइये रहल अछि।
मुदा कोसी लेल ई नहि भऽ सकल। विचार आएल तँ योजना अस्वीकृत भए गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे ताकि रहल अछि!
विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन :हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आऽ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आऽ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्हक हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेशरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आऽ मलेरियाग्रस्त आऽ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आऽ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् वालु, कैल्सियम पाथर आऽ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल।
दिल्ली अछि दूर एखनो! प्रधानमंत्री आपदा कोष आऽ मुख्यमंत्री आपदा कोषक अतिरिक्त स्वयंसेवी संगठन सभक कोषमे सेहो दिल्लीवासी अपन अनुदान दए सकैत छथि। मुदा दीर्घ सूत्री काज होएत निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब।
१.स्कूल कॊलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल। दिल्लीवासी सी.बी एस.ई आऽ आइ.सी.एस.ई.सँ एहि तरहक कार्यान्वयन कराबी तँ लाजे बिहार बोर्ड ओकरा लागू कए देत।
२.भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कएल जाए कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कए लेने अछि। एहिमे फन्ड रेलवे आऽ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाए कारण एहिपर रेल आऽ सड़क सेहो बनि सकैछ/ आऽ बनबाक चाही।
३.बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए।
४.कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आऽ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए।
५.बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होए जेना देखि परि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए युद्ध-स्तरपर काज एहि सभपर कार्य शुरू कएल जाए।
उपरोक्त बिन्दु सभपर दिल्लीमे लॉबी बना कए केन्द्र सरकारपर/ मंत्रालयपर दवाब बनाएब तखने बिहार अपन नव छवि बना सकत। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह तखने पूर्ण होएत आऽ धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत।

एहि अंकमे:
श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरजीक कोसी बाढ़िपर निबन्ध आऽ कोसीक बाढ़िपर स्व. राजकमल द्वारा लिखित कथा अपराजिता देल गेल अच्हि।
श्री गगेपश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित “राधा” जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक “यायावरी”, अंकुर झा जीक पद्य, श्याम सुन्दर शशिक रिपोर्ताज आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सि‍हक कथा-निबन्ध सेहो अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री पंकज पराशर, जितमोहन, विनीत उत्पल, नवेन्दु कुमार झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। गुँजन जीक गजल आ’ विचार टिप्पणी सेहो अछि।
श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। उदाहरण आऽ नो एण्ट्री: मा प्रविश पर समीक्षा देल गेल अछि।
ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि।
गोपेशजी स्वर्गीय भए गेलाह हुनकर संस्मरण हम लिखने छी पद्य स्तंभमे, संगमे देने छी हुनकर एकटा पद्य सेहो।
शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (४):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक “नो एंट्री: मा प्रविश” केर ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल ‘विदेह’ केर समक्ष “श्रुति प्रकाशन” केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना ‘विदेह’ द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (५): “विदेह” केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्वपूर्ण सूचना (६): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि।
मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि।

२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- “विदेह” ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, “विदेह” केर सेहो दायित्व।
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- “विदेह”क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

रिपोर्ताज- १. कतारसँ श्याम सुन्दर शशि २. जितेन्द्र झा ३. पटनासँ नवेन्दु कुमार झा ४.गुंजनजीक विचार-टिप्पणी आऽ ५. बी.के. कर्णजीक मिथिला-मंपथन

श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत।
कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह-
कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आऽ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आऽ ने गोपी। मुदा बकड़ी आऽ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हावा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयके पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आऽ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आऽ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा…??

मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आऽ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधिनक भेड़ा आऽ बकड़ीकेँ गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल।
एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आऽ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आऽ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आऽ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आऽ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक।

महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आऽ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आऽ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आऽ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल।
ओऽ भेड़ा आऽ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दुध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आऽ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आऽ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल।
जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बतैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आऽ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”।

गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आऽ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आऽ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आऽ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर।
दोहा,कतार, जमलिया।
२. जितेन्द्र झा
कोशी सन बेदर्दी कोइ ने
मिथिलाक लाखो जनताके विपत्तिक बाढि देब बला कोशी नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल प्रयास अपर्याप्त रहल बताओल गेल अछि । ५० बर्ष पहिनेसं कोशीक नामपर खर्च कएल करोडो रुपैयाक बास्तविकताक पोल खुलि गेल अछि । कोशी बाढिपर दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे वक्ता सभ कोशी बांन्ह टुटलाक बाद आब दोषारोपण क क बचबाक प्रयास कएल जा रहल कहलनि । मैथिली लोकरंग मन्च सेप्टेम्बर १२ तारिखक’ कोशी सन बेदर्दी कोइ नई नामक कार्यक्रम आयोजन कएलक अछि । कार्यक्रममे कोशीक बाढिपर बजनिहार वक्तासभ कोशी नदी नियन्त्रण लेल सरकारक प्रयासके आलोचना कएल गेल । नाटककार मदहेन्द्र मलंगिया कोशीक रस्तासं खेलबाड कएल गेलाक कारण एहन भयावह स्थिति उत्पन्न भेल कहलनि । ‘मात्र कोशीके बदनाम कएल जारहल अछि’ मलंगिया आगु कहलनि ‘कोशीके बुझब आबश्यक अछि । तहिना मैथिली इ पत्रिका विदेहके सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर कोशी बाढिके सरकारी लाचारीके संज्ञा देलन्हि ।कोशीक तटबन्ध टूटत से बुझितो सरकार मुकदर्शक बनल रहल हुनक आरोप रहनि ।मधेपुराक शान्ति यादव अपन आंखिक आगु कोशीक विकराल रुप देखने बतबैत पर्यावरण विद सेहो एकरा कत्तेक बुझि सकल अछि से प्रतिप्रश्न कएलनि ।
कोशीप्रति ओतुक्का जनताके सुसुचित करबाक आवश्यकता पर भारती जोड दैत कहलनि ‘बाढिप्रति संवेदनशील बनाएब आबश्यक अछि ।
बिछियाक आर्तनाद
पेटमे अन्न नईं, राहतलेल आकाशमे टकटकी लगौने आंखि, आङमे लत्ताकपडाक अभाव आ भोक्कासी …। सभ अपन अपन पीडा सुना रहल अछि । पेटके राक्षस शान्त नई भेलाक बाद ओ त सौंसे आदमीएके खा लेलक । नवजात शिशु कत्तेक काल भुक्खे रहैत, ओकरा कोशीक कोरमे छोडिदेल गेल ।
कोशी सन बेदर्दी जगमे कोइ नइ लघुनाटकमे किछु एहने देखल गेल । मैलोरंगक आयोजनमे दिल्लीमे सेप्टेम्बर १२ क’ मन्चित लघुनाटकमे कोशीक बिभीषिका देखएबाक प्रयास कएल गेल । नाटकमे राहतलेल मारामारी कएनिहार जनता भुखसं मृत्युवरण करबाक बाध्यताके जीवन्त रुपमे प्रस्तुत कएल गेल। पीडितके रोदनसं दर्शक भावविह्वल बनल छल । मैलोरंग सेप्टेम्बर १२ सं १४ तारिखधरि मैथिली लोकरंग महोत्सव स्थगित कएलक अछि । कोशी क्षेत्रमे घुरैत मुस्कानकसंग महोत्सव आयोजन हएत मैलोरंग जनौलक अछि ।
संघर्षक कठिन बाट
मैथिली साहित्यकार व्रजकिशोर बर्मा मणिपद्मक स्मृतिमे नयां दिल्लीमे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल । एहि कार्यक्रममे मैथिली नाटक मन्चन हएबाक संगहि मिथिलांगन संस्थाक स्मारिका सेहो विमोचन कएल गेल । मिथिलांगन साहित्यकार मणिपद्मक स्मृतिमे ‘उगना हल्ट’ नामक मैथिली नाट्क मन्चन कएने छल ।

ब्रज किशोर बर्मा मणिपद्म मैथिली साहित्यक चर्चित नाम अछि । लोक साहित्यक संरक्षणमे हुनक योगदान उल्लेखनीय मानल जाईत अछि । इएह योगदानक सम्मान करैत हुनका मैथिलीको वाल्टर स्काट सेहो कहल जाईत छन्हि । लोरिक, राजा सल्हेश, नैका बन्जारा जेहन लोकगाथाक संरक्षण करबामे हुनक योगदान सराहनीय रहल कार्यक्रममे कहल गेल । मिथिलांगन एहिसं पहिने सेहो मणिपद्मक स्मृतिमे विभिन्न कार्यक्रम आयोजन करैत आएल अछि । तहिना त्रैमासिक मिथिलांगन पत्रिका सेहो प्रकाशनके निरन्तरता देल गेल संस्था जनौलक अछि । उगना हल्टक लेखक कुमार शैलेन्द्र आ निर्देशक संजय चौधरी छैथ । नाटकमे दिल्लीमे संघर्षरत मैथिली रंगकर्मीक जीवनक कटु सत्य देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । उगना हल्ट बिहारक मधुवनी जिलाक एक रेल्वे स्टेशनको नाम अछि , यद्यपि नाटकके परिवेश नयां दिल्लीक रंगकर्मीक अडडा मण्डी हाउसपर केन्द्रित अछि । स्थानीय पण्डौल आ सकरी बीचक स्टशन अछि उगना हल्ट । नाटकमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणलेल अपस्यांत नवतुरियाक कथा ब्यथा समेटल गेल अछि । वएह युवाक संघर्षक इतिबृत मे नाटक घुमैया । कियो संगीतकार बन’ चाहैत अछि त कियो गीतकार, ककरो फ़िल्ममे हिरो बनबाक धुन सबार छइ त ककरो हिरोइन । अन्ततः कडा संघर्षक बाद सभ अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे सफ़ल होइत अछि । नाटकमे संगठने शक्ति अछि आ एहिसं सफ़लता पाबि सकैत छी से पाठ सिखएबाक प्रयास कएने छैथ नाटककार । छिरिआएल आ दिग्भ्रमित जंका बुझाईत पात्रक अभियान अन्तमे सफ़ल होइत अछि । अन्ततः नाटक सुखान्त अछि ।
साहित्य केन्द्रित पुस्तक मेला
नया दिल्ली । विद्यापतिक गीत, हरिमोहन झाक कथा, लोकोक्ति संग्रह, पत्रपत्रिकाक इतिहास, गोरा(अनुवाद), इत्यादि । ई कोनो मैथिली पुस्तकालयके सूची नईं, १४ म्‌ दिल्ली पुस्तक मेलामे लागल किताबक नाम अछि ।

महिला लेखनके केन्द्र बनाक’ मेला आयोजन कएल गेल छल । जाहिमे लगभग तीन सय प्रकाशक स्टल लगौने रहए । मुदा मेलामे मैथिली भाषामे मात्र दु तीनटा किताब मैथिली साहित्यमे महिला लेखनके सबुत बनल छल । मेलामा पाकिस्तान, अमेरिका, चिन, स्पेन , दुबई आ इरानक प्रकाशक सहभागी छल। मेलामे मैथिली भाषाक पुस्तक सेहो राखल रहए । साहित्य विद्यापति आ हरिमोहन झाक किताव बेश बिकाएल छल । ओना साहित्य एकेडमीक स्टलपर मैथिलीक दर्जनसं बेशी किताब नई छल । तें पाठकलग किताब चुनके अबस्था नई रहए । महिला लेखनके केन्द्र बनाओल गेल मेलामे साहित्य एकेडमीसं प्रकाशित महिला लेख संग्रहित एकटा किताब मेलाक उद्देश्य पुरा करैत छल । मेला मैथिलीक संकीर्ण प्रकाशन अबस्थाके प्रतिबिम्बित क रहल छल । प्रवासमे रहनिहार मैथिली भाषीके साहित्य एकेडमीक स्टल मैथिली किताबके दर्शन धरि करादेने रहए । मैथिली साहित्यिक खोराक चाहनिहारके पुस्तक मेला थोर बहुत सहायक छल । संख्यात्मक हिसाबसं मैथिली भाषाक पोथी थोरबे छ्ल । मेलामा साहित्यसंगहि कला-संस्कॄतिक अदभुत संगम सेहो प्रस्तुत कएल गेल छल । प्रख्यात महिला साहित्यकारक गैर साहित्यिक किताब सेहो राखल गेल छ्ल । महिला स्रष्टाक रचनासंगहि हुनकर सभहक आत्म बृतान्त सेहि उपलब्ध कराओल गेल छल । एहि मेलामे लगभग १५ करोड भारतीय रूपैयाको कारोबार हुएबाक अनुमान कएल गेल अछि । मेला सेप्टेम्बर 1 तारिखसं ७ तारिखधरि चलल छल।
३. पटनासँ नवेन्दु कुमार झा
बिहारक शोक देखौलक अपन रूप
बिहारक शोक कहल जाएबला कोसी नदी भारत-नेपाल मध्य विभाजन आऽ गंगाक मुख्य सहायक नदी अछि। अपन धारा परिवर्तनक लेल विख्यात एहि वर्ष जाहि तरहेँ अपन तांडव देखौलक अछि अवश्ये चिन्ताक विषय थिक। पछिला कतेको दिनमे बाढ़िक जे तबाही प्रदेशक सीमांचल विशेष रूपसँ सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया आऽ पूर्णिया जिलामे मचल अछि एकर डरसँ एहि जिलाक संगहि लग पासक गोटेक तीस लाखक आबादी अपन घर, द्वार आऽ सम्पत्तिक चिन्ता छोड़ि सुरक्षित ठेकानक तलाशमे भटकि रहल अछि। ८ अगस्तकेँ कोसी नदीक तटबंध कुशहा लग नेपालक वीरपुर बराजक उत्तर गोटेक १२.९० किलोमीटरक दूरीपर जखने टूटल कि भारत आऽ नेपालक पैघ आबादी बर्बाद भऽ गेल। कतेक लोक एहि मानव निर्मित अप्राकृतिक बाढ़िक कालमे घुसि गेलाह एक अनुमान लगबऽ मे कतेक मास बितत से कहब मुश्किल अछि।
हिमालय पर्वतमालासँ गोटेक ७००० मीटर ऊँचाईसँ निकलि कोसी नदी भारतमे उत्तर बिहारक ९२०० किलोमीटर रास्ता तय कऽ अंतमे गंगा नदीमे मिलि कऽ बंगालक खाड़ीमे खसि पड़ैत अछि। बिहारक सभसँ जीवन्त ई नदीकेँ सात नदी इन्द्रावती, तांवा कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी, लिछु कोसी, तामर कोसी आऽ सुन कोसी वा भोट कोसीक प्रवाहक मिलनक हेबाक कारण सप्त कोसी सेहो कहल जाइत अछि। नेपाल आऽ तिब्बतक जल ग्रहण क्षेत्र वाला एहि नदीक ७४०३० वर्ग किलोमीटर जल ग्रहण क्षेत्रमे सँ मात्र ११४१० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भारतमे आऽ शेष ६२६२० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नेपाल अथवा तिब्बतमे पड़ैत अछि। १५० वर्ष पूर्व पूर्णियाक पूरबसँ बहए वाला एहि नदीक निचला हिस्सा एखन दरभंगा जिला दऽ बहैत अछि। अपन धारा बदलबाक लेल बदनाम ई नदी जखन अपन रस्ता बदलैत अछि तँ नचैत अछि तबाही आऽ सभक सोझाँ होइत अछि बर्बादी आऽ एक शिकार निरीह जनता, भऽ जाइत अछि असहाय।
मैदानी क्षेत्रमे उतरलाक बाद कोसी नदीक पाट छओसँ दस किलोमीटर चौड़ा भऽ जाइत अछि आऽ प्रायः नेपालक सीमाक भीतर पचास किलोमीटर दूरी तय कए भीमनगर-चतरा लग भारतीय सीमामे प्रवेश करैत अछि आऽ मानसी-सहरसा रेल लाइनक कुर्सेला स्टेशन लग गंगा नदीमे मिलि जाइत अछि। उत्तर बिहार आऽ पूर्वी मिथिलामे ई विश्वक सभसँ उपजाऊ समतल त्रिकोणक निर्माण करैत अछि तेँ एकरा एहिठामक जीवन रेखा सेहो कहल जाइत अछि। एहि नदीसँ होमएवाला तबाही आऽ बर्बादी बचैबाक लेल प्रयास तँ भेल मुदा ओहि दिस कएल गेल प्रयास कतेक सफल भेल ई तँ कोसीक वर्तमान कहरसँ सहजे बुझल जाऽ सकैत अछि। आजादीक बाद १९५५मे कोसीक पूर्वी किनार वीरपुरसँ कोपड़िया धरि १२५ किलोमीटर लम्बा आऽ पश्चिम किनारपर नेपालमे भारदहसँ भारतमे सहरसासँ घोघेपुर धरि १२६ किलोमीटर लम्बा तटबन्ध बनेबाक जे काज शुरू भेल ओऽ १९६३-६४ मे पूरा भऽ गेल। १९६३ मे कोसीक धार बराजक निर्माण कऽ एहिपर नियन्त्रण स्थापित कऽ लेल गेल।
कुशहामे एहि वर्ष तटबंध टुटबाक घटना कोनो पहिल घटना नहि थिक। कोसी नदीपर बनल ई नहर एहिसँ पूर्व १९६३मे डलबा (नेपाल), १९६८ जमालपुर (दरभंगा), १९७१ भटनिया (सुपौल), १९८० बहुअरबा (सहरसा), १९८४ हेमपुर (सहरसा) आऽ १९९१ जोगिमियामे टुटल छल आऽ तखनो तबाहीक मंजर ओहिना छल जे एखन अछि। कुशहामे तटबंध टुटब एहि बातक संकेत अछि जे एखन धरि सभ सरकार उत्तर बिहार बाढ़ि प्रभावित क्षेत्र आऽ जनताक प्रति उदासीन अछि आऽ सभ दिन एकर अनदेखी कएल गेल अछि। आजादीक ६१ साल धरि मात्र राहत आऽ बचाव काज चला कऽ सभ सरकार अपन दायित्व समाप्त बुझैत अछि आऽ पीड़ित जनता एकरा अपन नियति मानि अपन जिन्दगीक डेग आगाँ बढ़बैत रहल अछि। सम्पूर्ण परिस्थिति सरकारक संव्र्दनहीनताक परिचायक अछि।
कोसी नदीक चलि रहल तांडव सँ एखन धरि १६ टा जिला एकर चपेटमे आबि गेल अछि। तटबंध बचेबाक आऽ नदीक धार मोरबाक कोनो प्रयास एखन धरि युद्ध स्तरपर शुरू नहि भऽ सकल अछि। दिन प्रति दिन नव-नव क्षेत्र कोसीक चपेटमे आबि रहल अछि। १९६३ सँ २००८ धरि कतेको बेर कोसीक तटबन्ध टूटल अछि मुदा एहि बेर पछिला सभ रेकॉर्ड टुटि गेल अछि। पछिला १५ दिनसँ कोसी जेना अपन रौद्र रूप धेने अछि आऽ कटाव कऽ रहल अछि ओहि सँ कोसी बराजपर सेहो खतरा बढ़ि गेल अछि। ज्यों ई हाल रहल तँ एखन २५ लाख लोक प्रभावित छथि आऽ अगिला दू चारि दिन ५० लाख आबादी कोसीमे समाधि लऽ लेत तेँ सरकारकेँ कोसीपर नियन्त्रणक प्रयासमे गति आनब आवश्यक अछि।
बाढ़ि आऽ सरकारी प्रयास
बिहारमे बाढ़ि आएब कोनो नव बात नहि अछि। सभ साल बाढ़ि अबैत अछि आऽ चलि जाइत अछि। वर्ष भरि चलएवाला पावनि-तिहार जकाँ ओकर बादक राहत बाटबाक पावनि चलैत अछि आऽ फेर जिनगी ओहिना पटरीपर चलए लगैत अछि। हवामे उड़ैत हेलिकाप्टर हाहाकारक संग सफेद पोश नेता सभ आकाशसँ पीड़ित मानवकेँ हाथ हिला-हिला कऽ फोटो छपा, मूह दुसि दैत छथि आऽ फेर डपोरशंखी घोषणा कऽ अपन कर्तव्य समाप्त बुझैत छथि। वास्तवमे सरकारी महकमाक लेल ई बाढ़ि एकटा वार्षिक पावनि अछि जकर इंतजार ओऽ करैत रहैत अछि। बाढ़िक टकटकी लगौने सरकारी अफसर आऽ कर्मचारीक लेल ई बाढ़ि सोनाक अंडा देबए वाला मुर्गी अछि। सरकार पहिने बाढ़िसँ बचाव लेल पूर्व तैयारीक नामपर टाका लुटबैत अछि तकर बाद बाढ़िक क्रममे बाढ़ि पीड़ितकेँ राहत आऽ बचाव काजक नामपर आऽ तत्पश्चात् बाढ़िक समाप्त भेलापर बाढ़ि पीड़ितक पुनर्वासक लेल टाका बाढ़िक पानि जकाँ बहैत अछि मुदा एहिमे केओ डुबैत नहि अछि, परञ्च सरकारी अफसर आऽ अभियन्ता सभक धोधि फुलैत अछि।
बाढ़िपर नियन्त्रणक प्रति सरकारक प्रयास तँ पैघ स्तरपर चलि रहल अछि। उत्तर बिहारक बाढिक नियन्त्रणक लेल केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा १९९२ मे एकटा समिति (एन.बी.एफ.पी.सी.)क गठन कएल गेल छल। मंत्रालयक सचिव एकर पदेन अध्यक्ष छलाह आऽ रेल मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय आऽ बिहार सरकारक अधिकारी केर एहिमे सम्मिलित कएल गेल। मुदा १६ वर्षमे समितिक गोटेक एगारह टा बैसक भेल आऽ छोट पैघ एक सय (१००) योजना बनाओल गेल, जाहिमे सँ मात्र अनठाबन टा योजनापर काज शुरू भऽ सकल। केन्द्र सरकार २००५ मे राज्य सरकार द्वारा लापरवाहीक आरोप लगबैत फंडिंग रोकि देलक आऽ पछिला तीन वर्षसँ ई योजना ठप्प अछि। वर्ष २००५ मे केन्द्र सरकार जल आऽ बिजली सलाहकार सेवा (वैपकास) लिमिटेडकेँ बाढ़िक मूल्यांकनक जिम्मेवारी देल गेल। पछिला तीन वर्षसँ सेहो परियोजनाक मूल्यांकन भऽ रहल अछि आऽ टाकाक अभावमे आगाँक काज रुकल अछि।
बिहार आऽ उत्तर प्रदेशक गंडक नदीपर बाढ़िक बचावक काज आऽ निर्माण काजक समीक्षाक लेल १९८१मे कोसीक तर्जपर गंडक उच्च स्तरीय समिति सेहो गठित कएल गेल। समय-समयपर एहि समितिक कार्यकाल बढ़ैत रहल आऽ आब एकर नाम गंडक उच्च स्तरीय स्थायी समिति कऽ देल गेल। जल संसाधन मंत्रालय लालबकिया, बागमती, कमला आऽ खाको नदीक तटबन्धकेँ मजगूत आऽ लम्बा करबाक वास्ते टाका उपलब्ध करौलक अछि। एकर बाद दसम पंचवर्षीय योजनामे साठि करोड़ टाका जल संसाधन मंत्रालय मंजूर कएने छल मुदा योजनाक सुस्त प्रगतिकेँ देखैत योजना आयोग एहि योजनाक टाका छियालिस करोड़ कऽ देलक। १९७८ मे जी एफ सी सीक अध्यक्षक अगुवाईमे कोसी उच्च स्तरीय समितिक गठन कएल गेल जे सभ साल बाढिसँ भेल नोकसानक आकलन करैत अछि आऽ बाढ़िसँ पूर्व होमए वाला उपायक सुझाव दैत अछि। मुदा ई बनैत समिति दर समितिक बाढ़ि असली बाढ़िक विभीषिकासँ लोक सभकेँ बचबऽ मे एखन धरि असफल रहल अछि। सभ साल बाढ़ि अपन भांज पुरैत अछि, समिति सेहो अपन बैसक कऽ सुझाव दैत अछि मुदा ओकर योजना आऽ सुझाव सँ नहि बाढ़ि रुकैत अछि आऽ नहि तबाहीक मंजर बदलि रहल अचि।
बाढिक वर्तमान स्थिति
जिला गाम प्रभावित लोक(लाखमे) मृतकक संख्या प्रभावित जानवर(लाखमे)
मधेपुरा ३७८ ११.५५ १५ ३.००
अररिया ९३ १.६० ०० ०.८०
सुपौल २४३ ८.९४ ०३ ४.५०
सहरसा १४५ ४.३१ ०९ १.५८
पूर्णिया ११८ ०.६५ ०० ०.३५
९७७ २७.०५ २७ १०.२३

बाँटल गेल सामग्री
मटिया तेल १२८६६ लिटर
नकद मदति ८५.०५ लाख
अन्न १४५३७ क्विंटल
नमक १८.२५ क्विंटल
सातु ४३५.५० क्विंटल
सलाई १४६१२५
मोमबत्ती २०९०१८

(स्रोत: आपदा प्रबंधन विभाग)
४. गुंजन जीक विचार टिप्पणी
प्रियवर,
मैथिल, मिथिला आऽ मैथिली मानसकेँ जतेक बूझि सकल छी, ६६ वर्षक सक्रिय, सचेष्ट आऽ सम्वेदनाशील मैथिल जीवनमे ताहिमे संसद आऽ विधानसभाक समक्ष निरन्तर धरना आऽ कोनो तरहक चुनाव प्रक्रियाक विरोधसँ हमर चेतना सहमति अनुभव करैत अछि। मुदा सर्वप्रथम “शुद्ध हृदयसँ संकल्प चाही”। राजनीतिबला संकल्प नहि। शुद्ध हृदयसँ संकल्प- समय सुतारू राजनीति आब मात्र राजनीतिज्ञे तकक अवसरवादी “विशेषता” नहि, सम्भ्रान्त अधिकांश मैथिल बुद्धिजीवियो लोकनिक भऽ गेल अछि! से पूरा सक्रिय छथि- सामाजिक, साहित्यिक आऽ सांस्कृतिक, सभ क्षेत्रमे। विपत्तियोकेँ हाट-बजार बना कऽ स्व-केन्द्रित उपयोगक वस्तु बना लैत छथि। तहिना मैथिलीसँ तँ उपलब्ध अवसरक अघोषित मालिक बनि जाइत छथि।
से अपन-अपन छातीपर हाथ राखि हमरा लोकनि अपनाकेँ ताकी आऽ पूछी। बेशी काल तँ एहि प्रकारक सबदिन सामूहिक विपत्तिक कारण मनुक्खक, ओहि समाजमे अपनेमे विद्यमान रहैत छैक बन्धु! तेँ आत्म-विश्लेषण सेहो। सभजन मंगलकारक अभियान लेल एक मात्र मैथिल मन अभियान!
५. बी.के. कर्णजीक मिथिला-मंशथन
मैथिल जे कहियो मैथिली छोड़ि लन्हि़ ओ मानसिक रूपसं गरीब भए गेलाह। आर्थिक विकास भेलाक तदुपरान्तों अपन मनसॅं बहुत गरीब। अमेरिकामे जे भारतीय मुलक स्थिति पर जे एकटा अमेरिकन पत्रकार अध्ययन केलाह जरूर देखल जाए।
Family Ties and the Entanglements of Caste http://www.nytimes.com/2004/10/24/nyregion/24caste.html
अमेरिकन क़ी मिथिलामे रहि सकैत अछि
नहि़ कथमपि नहि़।
की अमेरिकन आ कोनो विकसित देश व राज्य के एकोटा लोग अपन मैथिली भाषा अपनायत़
नहि़ कथमपि नहि़।
बेसी मैथिले भेटताह जे़ मिथिला आ मैथिली छोड़ि ताहिमे सबसॅं आगू ।
मैथिल मिथिलाक सीमाक बाहर बड मेहनती परञ्च मिथिलाक सीमाक अन्दर बड आलसी। मेहनती मैथिल कतौऽ रहथि धाक जमौने छथि परञ्च मैथिली पर जेना मतसुन। एको रति रू चि नहि रखैत छथि, हुनकर धिया पुताक बाते छोड़ु।

गिर्यसन जकॉं खोजी़ एहि पर अलग विचार रखैत छथि।
मैथिलीके बोझ बुझय वाला मैथिल सोचि विचारमे बड़ गरीब।
गरीबी झेलबाक मानसिकता मैथिल मे कियाक बेसी।
मिथिलामे मौलिक सुख सुविधाक कमी कोन कारणे। बहूतो कारण भए सकैछ। गरीबीमे ककरा नेऽ इ कष्ट झेल्‌ऽ पऽडै़त।
मैथिल मेहनती तॅं मिथिलामे गरीबी कियाक
गरीबी झेलबाक मानसिकता कियाक !!!ग्रेट रिस्क !!!
कतेक मैथिल कहताह जे भाग्यक लिखल कष्ट अछि। एहि प्रश्नक जबाब खोजि रहल छी जे पॉंच करोड़क मैथिलक एके रंग भाग्य कियाक। गरीबीक झेलबाक मानसिकता कतेक दिन तक।
हम मैथिल सब वाक विवादमे बड प्रखंड छी। हरएक बातपर अपनाक अनुभवी प्रमाण दैत छी।
मनसॅं वाक पटूतामे धनी। जीवनक मौलिक आवश्यकताक पूर्तिकक लेल हम सब मैथिल बड़ गरीब।
गरीब मानसिकता गरीबी झेलबाक लेल सदिखन तैयार।
स्वस्थ नेताविहीन मैथिल समाज अपन मौलिक हक सॅं दूर कोसो दूर अछि।
जड़ जड़ हालतमे मैथिल समाज अपन देशक आजादीक बाद मिथिलामे आधारभूत ढॉंचाक शूरूआतोऽ तॅं नहि भेल।
खकरा कहबैऽ केऽ सूनत के सुधि लेत।
अगला अंकमे
गद्य –
१. शम्भू कुमार सिंह २. कुमार मनोज कश्यप
पोथी समीक्षा:- १.नो एण्ट्री: मा प्रविश(प्रेमशंकर सिंह/ गजेन्द्र ठाकुर) २. उदाहरण(कमलानन्द झा, देवशंकर नवीन)
जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन-डॉ प्रेमशंकर सिंह
शोध लेख-१.स्व. राजकमल चौधरी (देवशंकर नवीन)
यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी
कोसी गद्य १. श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर २. स्व. श्री राजकमल चौधरी
कथा-निबन्ध
१. शम्भू कुमार सिंह २. कुमार मनोज कश्यप
शंभु कुमार सिंह, जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, मैट्रिक धरि गामहि सँ, आइ.ए., बी.ए.मैथिली सम्मान, एम.ए.मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु] उत्तीर्ण 1995, “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर वर्ष 2008, ति.माँ.भा.वि.वि.भा.बिहार में शोध-प्रबंध जमा (परीक्षाफल प्रतीक्षारत)। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता आ निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे, शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे कार्यरत।
(समसामयिक निबंध)

जाग’ जाग’ महादेव !

मिथिला, अनादिकालसँ धर्म, शिक्षा, साहित्य संस्कृति आदिक विशिष्टताक लेल अद्वितीय रहल अछि। एतय एक-सँ बढ़ि कए एक मुनि, मनीषी, तपस्वी भेल छथि, जिनका सभक उपदेश आ आचरण आइयहुँ ओतबे प्रासंगिक अछि। मुदा अनेकानेक कारणसँ आइ बड़ तीव्र गतिएँ सामाजिक विवर्तन भ’ रहल छैक। एहि बदलैत सामाजिक परिस्थितिमे कोन वस्तु आ संस्कार ग्राह्य छैक आ कोन अग्राह्य ताहि विषयकेँ ल’ क’ लोकमे भयंकर द्वन्द्व आ संघर्षक स्थिति उत्पन्न भ’ गेल छैक। मूल रूपसँ पाश्चात्यवादी सभ्यताक अन्धानुकरण ओ आन-आन कारणेँ, लोक अपन सभ्यता, संस्कृति, सँ विमुख भेल जा रहल अछि, परिणामस्वरूप, समाजमे भूख, भय, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, बेरोजगारी आदिक समस्या दिनानुदिन गंभीर भेल जा रहल छैक। लोक एहि सभ समस्यासँ मुक्तिक लेल अपस्यांत अछि, बैचैन अछि। ओकरा कोनो रस्ता नहि भेटि रहल छैक। मानसिक अशांतिक शांतिक लेल लोक भगवानक शरण मे आबि रहल अछि (ओकरा लागै छैक आब यैह टा रस्ता बचि गेल अछि)। यैह कारण अछि आइ जतय देखू ततहि थोकमे धर्मक दोकान खुजि गेल छैक। हमरो संग सैह भेल, विभिन्न प्रकारक विसंगति आ झंझावात तेना ने हमरा नचार क’ देलक जे हमहुँ अंततः धर्महिक शरण मे गेलहुँ।
ई संयोगे छल जे ताहिदिन हमरा सभक दिस धर्मक एकटा टटका दोकान खुजल छलैक- जाग’ जाग’ महादेव! मिथिलाक लेल ई कोनो नव धर्म आ नव संप्रदाय नहि छलैक, हँ, एकटा बात नव अवश्य कहि सकैत छी जे एहिमे बस अहाँ देवाधिदेव महादेवकेँ ‘गुरू’ बना लिअ, आ कि सभ समस्या छू मंतर। हम अपन अनुभव कहि रहल छी, जहिया सँ हम महादेवकेँ गुरू बनैलियन्हि हमर सभटा समस्या सरिपहुँ छू-मंतर भेल जा रहल अछि। महादेवमे दम छनि, से हमर धारणा दिनानुदिन दृढ़ भेल जा रहल अछि। यैह कारण थिक जे कतहुँ अबैत-जाइत, माने जतय कतहुँ महादेवक मंदिर, फोटो देखैत छी, मोने-मोन जाग’ जाग’ महादेव! कह’ लागैत छी।
यैह परसूका बात थिक हमरा एक आवश्यक काजे गामसँ सहरसा जयबाक रहय, ने जानि कोन कारणेँ ओहिदिन गाड़ी-घोड़ा बन्न छलैक, हम पयरे चलि देलहुँ। हमरा गामसँ लगभग 10 कि.मी. क दूरी पर महादेवक एकटा मंदिर छैक, बड़ भव्य, प्राचीन आ सिद्ध। गरमीक दिन रहैक, रौद कपारे पर लागैक। सोचलहुँ मंदिरमे जाग’ जाग’ महादेव ! क’ लैत छी, आ कने काल प्रांगणक एहि विशाल बरक गाछतर चबूतरा पर सुस्ता लेब। मंदिरमे माथ टेकि चबूतरा लग आबि बैसि गेलहुँ। हमर मोन कने अशांत रहय तैँ ओतय ध्यानक मुद्रामे बैसि महादेवक स्मरण कर’ लागलहुँ, आकि एहन आभास भेल जे सरिपहुँ साक्षात् महादेव हमरा समक्ष आबि गेलाह।
आबितहि पुछलैथ– की यौ शिष्य! की हाल-चाल ?
हम कहलियनि– हे गुरू! से तँ अहाँ जनिते छी ?
ओ कहलनि– चिन्ता जुनि करू शिष्य! सभ समाधान भ’ जेतैक।
हम कहलियनि– हे महादेव! जखन अहाँ लग सभ समस्याक एतेक त्वरित उपचार अछि तखन अपनेक एहि संसारमे एतेक प्रकारक रोग-शोक, व्यभिचार, अनाचार, अत्याचार आदि किएक ?
ओ कहलनि– शिष्य, “मोन चंगा तँ कठौत मे गंगा” अहाँ पहिने हमर अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत छलहुँ ? नहि ने? मुदा आइ जखन अहाँक मोनक श्रद्धा जागृत भेल तँ देखिये रहल छी जे हम साक्षात् अहाँक समक्ष उपस्थित छी।
हम कहलियनि– एकर माने भेल जे अहाँ अपन शिष्ये टा पर कृपा करैत छी, वैह टा अहाँक संतान थिक, आ आर सभ ? की ई प्रश्न अहाँक ‘जगतपिता’ उपाधि पर प्रश्न चिह्न नहि अछि?
ओ कहलिन– कथमपि नहि शिष्य हमरा लेल सभक मान बरोबरि अछि। जाधरि धर्म आ कर्मक गणितकेँ लोक नहि बूझत ताधरि ई समस्या, ई भेद रहबे करतैक। एहिमे हमर कोन दोख। अहीं जे अपन सभ काज-धन्धा छोड़ि कय एतय दिन-राति जाग’ जाग’ महादेव! करैत रहब तँ अहाँकेँ की बुझाइत अछि जे महादेव….।
हे महादेव! हमरा सन मन्द-बुद्धि, धर्म आ कर्मक तत्त्वकेँ कोना बुझत? हम तँ बस एक्कहिटा चीज बुझैत छी, महादेव! आर किछु नहि।
बस! बस! बस! अहाँक श्रद्धा, विश्वास आ सत्कर्म सैह थिकाह महादेव, सत्यं शिवं सुन्दरम्।
हे महादेव! ई बूझब तँ हमरालेल आर जटिल भ’ गेल, सत्य, सुंदर आ शिव केँ बुझ’क सामार्थ्य हमरा कतय?
अपन संस्कार, संस्कृति, लोकाचार, भाषा-साहित्य, धार्मिक आचरण, आदिकेँ बुझू, यैह सत्य थिक, यैह सुंदर थिक, यैह शिव थिक।
बेस, आब कने-कने बुझलहुँ। हे महादेव! आर सभ छोड़ू एकटा बात बताऊ,
एहि गामक अधिकांश लोकनि पढ़ल-लिखल छथि, ज्ञानी छथि, अपन परंपरा, अपन संस्कारादिक प्रति जागरूक छथि तकर पश्चातो हमरा बुझने कतहुँ ने कतहुँ……..।
औ शिष्य! आइ-काल्हि जे जतेक बेसी पढ़ल-लिखल लोक छथि से ततबे बेसी मूर्ख।
ई अहाँ की कहि रहल छी, एहन भ’ सकैत अछि जे कखनहुँ-कखनहुँ पढ़लो-लिखलो लोकसँ गलती भ’ जाइत छैक, मुदा तकर जतेक परिमाण अहाँ बता रहल छी से बात हमरा नहि पचि रहल अछि।
औ शिष्य! कहब तँ छक द’ लागत। ई कोनो गुटका (पान-मसाला) छियैक जे पचि जायत। अहीं कहू, अहाँ जे भरि दिनमे 10 पुड़िया गुटखा खा जाइत छी से कोना? ओहि पुड़िया पर नहि लिखल छैक जे “तम्बाकू चबाना स्वास्थ के लिए हानिकारक है”। हे ओहि महाशयकेँ देखियौक, ओ राजधानीक जानल-मानल डॉक्टर छथि, घंटे-घंटे पर सिगरेट (ओहो किंग साइज) पीबैत छैक, जखन की सभटा सिगरेटक पैकेट पर लिखल रहैत छैक, “धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” एतबे किएक, हे ओमहर ओहि होर्डिंग पर पढ़ियौक- “सिगरेट पीने से कैंसर होता है, जनहित मे जारी, कैप्सटन फिल्टर, आखिरी कश तक मजेदार।”
(हमर माथ शरम सँ झुकि गेल) से जे हो मुदा एहिठामक लोक धर्माचारी आ……..।
महादेव- हँ, हँ, से त’ अवश्ये, तहिया सँ ठीके आइ काल्हि हमर पूजा पाठ करयबलाक संख्या बढ़ि गेल अछि। मुदा ……..।
मुदा की ?
आब लोकमे ओ भाव नहि रहलैक।
आब लोक हमर पूजा कर’ नहि अबैयै, हमरासँ ‘डील’ कर’ अबैये।
बुझलहुँ नहि, कने स्पष्ट करू।
की-की सभ स्पष्ट करी शिष्य! सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थामे घून लागि गेल छैक। एकहकटा जँ फरिछा-फरिछा अहाँकेँ कह’ लागी तँ कैक दिन धरि एहिना अहाँ केँ ध्यानमग्न रह’ पड़त। जिज्ञासा कएलहुँ अछि तँ लिअ हम किछु ‘डील’ केर बानगी अहाँकेँ सुना दैत छी…..
एकटा (बालक)— हे महादेव! बाप कहैत छलाह पढ़’क लेल तँ हम गुल्ली-डंडा खैलयबामे भरि साल मस्त रहलहुँ, एहिबेर कहुना पास करा दिय’ तँ ……
एकटा नवयुवक –- हे महादेव! एहिबेर देवघर जयबाकाल हमरा जाहि ‘मालबम’ सँ परिचय भेल छल तकरहिसँ हमर बियाह करा दिअ तँ…..
एकटा नवयुवती— हे महादेव! अहाँ हमरा कोनो नीक निर्देशकक सिनेमामे माधुरी दीक्षितक ‘धक-धक’ वला रोल दिआ देब तँ……
दोसर नवयुवती— हे महादेव! अहाँक देल गेल रूप–गुण सँ संपन्न रहितहुँ हमर बियाह नहि भ’ रहल अछि, हमर माय-बाप विक्षिप्त भ’ गेल छथि। एहि दुनियाँ सँ सबटा दहेजक दानव केँ एक्कहि दिन उठा लिअ तँ….

एकटा प्रौढ़— हे महादेव! जानैत-बुझैत ‘मनीगाछी’क कोठा पर बेर-बेर जाइत रहलहुँ तैँ आइ ‘एडस’ सन लाईलाज बीमारीसँ ग्रस्त छी—जँ अहाँ हमरा एहि सँ मुक्ति दिया दी तँ….
एकटा बेरोजगार— हे महादेव! पढ़ि-लिखि कए झाम गुड़ैत छी, जँ अहाँ हमरा एकबेर लादेनसँ भेंट करा दी तँ……..
एकटा वृद्ध दम्पति- हे महादेव! अपनेक दयासँ हमरा बेटा-पुतोहुकेँ कोनो कमी नहि, मुदा हमरा दुनू परानीक पेट ओकरा सभक लेल पहाड़ सदृश छैक। जँ अहाँ हमरा एहि जन्मसँ मुक्ति दिया दी तँ अगिला जनममे …………
एकटा राजनेता— हे महादेव! हमरा पार्टीक सरकार बन’मे एक्केटा सीट घटैत छैक। हम निर्दलीय महाप्रलय सिंह केँ तीन करोड़ टका देब’ लेल तैयार छी अहाँ ओकर मति फेरि दिऔक, जँ हमर सरकार बनि गेल तँ………….
एकटा व्याख्याता— हे महादेव! भरि जिनगी चोरि आ जोगाड़क बलेँ नीक अंक सँ पास होइत रहलहुँ आब व्याख्याता छी। छौंडा सभकेँ ततेक ने नेतागिरीक चस्का लगा दिऔक जे साल भरि महाविद्यालय आ विश्वविद्यालयमे ताला लटकले रहय। जँ एहन संभव भ’ जाय तँ…..
एकटा अछूत-– हे महादेव! एक्के हार-मांस, एक्के खून, तकरा पश्चातो लोक हमरा अछूत बुझैये। हमरा संग जे भेल से भेल हमरा बेटाकेँ एहन दंश नहि झेलय पड़य। जँ एहन भ’ गेल तँ….
एकटा शराबी — हे महादेव! पीबैत-पीबैत, सभटा धन-सम्पति स्वाहा भ’ गेल। तीन दिनसँ एक्को ठोप नहि भेटल अछि, हम अपन बेटी सुगियाकेँ ओहि दारूवाला लग…..जँ एक्को बोतल दिआ दी तँ….
मैथिली (भाषा) – हे महादेव! अहाँ तँ जानिते छी जे हमर गौरव, मान, मर्यादा, कहियो मिथालाकेँ के कहए जगत्ख्याति प्राप्त कएने छल, मुदा आइ अपनहि घरमे हम उपेक्षित छी। ओना आइ काल्हि मैथिलीक लेल तथाकथित संघर्षकर्ता लोकानि एतयसँ दिल्ली धरि धरना-प्रदर्शन कर’ चलि जाइत छथि, मुदा सबटा फुसि थिक, सबटा मिथ्याडंबर, तैँ जाधरि हमरा अप्पन घरमे सम्मान नहि भेटत ताधरि हम अपन गौरवकेँ पुनः प्राप्त नहि क’ सकैत छी। जँ एहने स्थिति रहलैक तँ भ’ सकैछ जे हम कहियो निर्वस्त्र भ’ जाएब। हे जगतपति! अहाँ मैथिल लोकनिमे मैथिलीक प्रति नवजागृति आनि दिऔक। एहिसँ अहाँकेँ सेहो लाभ हैत– फेर कवि विद्यापतिक श्रुतिमाधुर्य नचारीसँ अहाँक मंदिरक वातावरण आप्लावित भ’ जाएत। हम कंगालिन छी, हमरा अहाँकेँ देबाक लेल किछु अछिए नहि, तैं हम की ‘डील’ करी ! हे महादेव सुतल किएक छी, जागू ! एहि अबलाक व्यथा सूनू-जाग’ जाग’ महादेव…..
मैथिली ततेक जोरसँ चीकरलीह जे हमर ध्यान दुटि गेल। ने जानि आब कहिया महादेव दर्शन देताह।
२. कुमार मनोज कश्यप

कुमार मनोज कश्यप
जन्म: १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

हारल मनुक्ख

बरी काल सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छलहु बस के। गामक कोनो बस आबिये नहिं रहल छलै। एक तऽ प्रतिक्षा ओहिना कष्टप्रद, तहु मे जेठक दुपहरिया मे। रौद आ पब्लिक ट्रांसपोर्टक स्थिति —- खिन्न भऽ गेल मोन। समय बितेबाक आर कोनो साधन नहिं देखि, मोन नहिंयो रहैत ठंढा पिबाक लेल बढि गेलहु सामने के रेस्टोरेंट दिस — छाँह तऽ भेटबे करत, सँगहि प््रातिक्षा के घड़ी सेहो बितत। बस एबा मे एखन आधा घंटा सँ कम समय नहिंये लगतैक।

रेस्टोरेंट के तजबीज करैत आगू बढल जाईत छलहु कि केयो रस्ता रोकलक – जिर्ण, मलिन, बृद्ध नहिंयो रहैत बृद्ध सन – लाठी लेने ” भैया! दू रुपैया हुअय तऽ दऽ दियऽ, ट्रेकर पकड़ि गाम चल जायब। पायरे नहिं गेल भऽ रहल आछ ।” आबाज मे एकटा संकोचक सँग दयनियता साफ झलकैत छलैक । तखने हमरा आगु मे नाचि गेल भीख माँगबाक नव-नव ढ़ब़ मोन परऽ लागल पढ़ल आ सुनल खिस्सा सभ जे कोना लोक ठका गेल ई सभ ढ़ब पऱ। ओकर याचना के अनसुना करैत हम बढ़ि गेलंहु रेस्टोरेंट दिस ।

बस अयला पर ख़िडकी कात सीट पर बैसि सुभ्यस्त भेलंहु। कने काल मे बस चलि पड़ल। रस्ता कात मे सहसा ककरो पर नजरि पड़ि गेल़ चौंकलंहु – ‘ई वैह आदमी तऽ नहिं जे हमरा सँ दू रुपैया मँगैत छल?’ दिमाग पर जोर देलहुँ हँ ई तऽ वैह आदमी आछ़़क़हुना- कहुना कऽ डेग बढबैत लगभग घिसियैत जँका –चलल जा रहल आछ गंतव्य दिस। ई दृश्य हमरा विचलित करऽ लागल़ हमर अंतरात्मा कचोटि उठल – ‘दू रुपैया! मात्र दू रुपैयाक लेल बीमार – असक्क के पायरे जाय पड़ि रहल छैक आ तों मोन नहियो रहैत दस रुपैया ठंढा पी कऽ बर्बाद कऽ देलह! धिक्कार एहन मनुष्यता के!’ अपराध बोध सँ हम आकाश दिस देखैत ओकर शून्यता मे विलिन भेल जा रहल छी।
पुस्तक-समीक्षा
१.नो एण्ट्री: मा प्रविश (प्रेमशंकर सिंह, गजेन्द्र ठाकुर) २. उदाहरण (कमलानन्द झा, देवशंकर नवीन)
नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ उदयनारायण सिंह “नचिकेता”
समीक्षा १.: -प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह
स्वाधीनोत्तर कालावधिमे सांस्कृतिक आऽ साहित्यिक गतिविधिकेँ नव आयाम प्रदान करबामे मिथिलाञ्चलक प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयासक परिणाम आऽ प्रतिफल थिक महानगर कोलकाताक अवदान मैथिली नाटक ओ रंगमंचकेँ नव-दिशा प्रदान करबाक दिशामे जतेक प्रयास कयलक अछि आ वर्तमानमे कऽ रहल अछि ओ निश्चित रूपेँ एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक पृष्ठभूमिक निर्माण करबामे सराहणीय भूमिकाक निर्वाह कयलक, जाहिसँ मैथिली आऽ मिथिलाञ्चलक विकास-यात्राकेँ अग्रगति करबामे सहायक सिद्ध भेल। एहि महानगरसँ मैथिली काव्य-यात्रामे अपन शैशवावस्थामे प्रवेश कऽ कए, नवचेतनावादक प्रवर्तक बनि कऽ मैथिली नाटक ओ रंगमंचक क्षेत्रमे अपन प्रयोगधर्मिताक कारणेँ एक नव कीर्तिमान स्थापित कयनिहार नाटककारक रूपमे अवतीर्ण भेलाह। बीसम शताब्दीक अष्टम दशकमे प्रयोगधर्मी नाटककार जे स्वयं कुशल अभिनेता सेहो छथि, ओ छथि उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (१९५१) जे एकपर-एक मौलिक प्रयोगधर्मी नाटकक रचना कऽ कए नाटक ओ रंगमंचकेँ एक नव-दिशा देबामे अहं भूमिकाक निर्वाह कयलनि। विगत वर्षान्तमे हुनक सम्मानमे चेतना समिति पटना द्वारा आयोजित एक समारोहमे हम अपन भाषणमे कहने छलियनि जे काव्यक क्षेत्रमे तँ अहाँ ख्यात प्राप्त कएनहि छी, किन्तु नाटकसँ विमुख नहि होउ आ नाटक लिखू। हमर ओ वाक्य हुनका स्पर्श कयलकनि तकरे प्रतिफल थिक जे एक पैघ अन्तरालक पश्चात् ओ “नो एण्ट्री: मा प्रविश” नाटक लऽ कए मैथिली नाट्य-प्रेमी जनमानसक सम्मुख प्रस्तुत भेलाह अछि जे निश्चित रूपेँ नाटक ओ रंगमंचक निमित्त एक अभिनव घटना कहि सकैत छी।
टी.एस. एलियटक कथन छनि जे वाङमयी कलाक चरम उत्कर्ष तखन देखबामे अबैछ जखन रचनामे नाटकीयता कवित्व दिस झुकल दृष्टिगत हो आ कवित्व नाटकीयता दिस। उपर्युक्त कथनक परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क इएह स्वरूप हमरा समक्ष अबैत अछि, जे नाटककार समाजक यथार्थ स्वरूपकेँ प्रस्तुत करबाक उपक्रम कयलनि अछि जाहिमे नाटकीयता आ कवित्व-शक्तिक अद्भुत समन्वयात्मक स्वरूप पाठककेँ उपलब्ध होइत छनि। मनुष्य जन्मजात क्यो नीक वा अधलाह नहि होइछ, प्रत्युत ओकरा समक्ष एहन परिस्थिति आबि कऽ उपस्थित होइछ जाहिसँ वाह्य भऽ कए ओ कर्ममे संलिप्त भऽ कए तदवत् कार्य करैछ, जकर फल ओकरा एही जीवनमे भोगए पड़ैछ। कारण मानवक सर्वोपरि इच्छा रहैछ जे सांसारिक जतेक सुखोपलब्धि थिक तकर उपलब्धि ओकरे हो, किन्तु ओ बिसरि जाइछ जे ओ जेहन कर्म करत तदनुरूपेँ ओकरा फलोपलब्धि सेहो होयतैक।

वैश्वीकरणक फलस्वरूप मानवक इच्छा-शक्तिक एतेक बेसी बलवती भऽ गेल अछि ओ चिर-नूतनताक आग्रही भऽ ओकर अन्वेषणमे लागि, ओकर अनुयायी भऽ कए अपन पुरातन दुःख-दर्द, मान-अपमान, ग्लानि-मर्यादा आदिक इतिहासक पन्नामे ओझरायल रहब श्रेयस्कर नहि बुझैत अछि, अत्याधुनिक परिवेश वा परिस्थितिक कारणेँ उत्पन्न आधुनिकता आ पुरातन पोंगा-पन्थी विचारधारामे वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे समन्वय नहि स्थापित कयल जाऽ सकैछ, कारण मनुष्यक इच्छा शक्ति अनादि आऽ अनन्त थिक तकरा नियन्त्रित करब दुःसाध्य थिक। मनुष्य परिस्थितिसँ प्रेरित भऽ कए अपन मानसिक सुखोपलब्धि निमित्त विश्वक रंगमंचपर उपस्थित भऽ विविध रूपा अभिनय करैछ तकर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ विविध कलाक प्रदर्शन करैछ तकर परिणाम ओकरा एत्तहि भोगय पड़ैछ, तथापि मानव स्वर्ग-नरकक द्वन्दमे सतत जीवित रहबाक आकांक्षी रहैछ।

प्रयोगधर्मी नाटककार जनमानसमे जे ज्वार आयल अछि, जे लहरि परिव्याप्त भऽ गेल अछि जे ओ अपन अधिकार आऽ कर्तव्यक हेतु एतेक बेसी साकांक्ष भऽ गेल अछि जे ओ सिद्धांतकेँ स्वीकार कऽ कए, ओकर अनुयायी भऽ कए ओ आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे दृष्टिबोध कऽ रहल अछि। मानव-समाजक पुरातन इतिहासपर दृष्टिपात कयलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे चाहे सतयुग हो, द्वापरयुग हो, त्रेता युग हो वा कलियुग हो सब समयक प्रामाणिक इतिहास साक्षी थिक जे अत्याचार-अनाचार, दुःख-दर्द, सुख-समृद्धि, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि-आदिक प्रबल आकांक्षी रहल अछि मानव समुदाय। किन्तु आधुनिक युगक सर्वोपरि उपलब्धि थिक देश-प्रेमक अपेक्षा विश्व-प्रेम। एकर परिणाम प्रत्यक्ष अछि जे जनमानससँ लऽ कए राजनीति दल सेहो समन्वयवादी भऽ कए ओकर अनुगामी जकर प्रमाण थिक सम्मिलित सरकार।
प्रस्तुत नाटक एक प्रतीक नाटक थिक, कारण एहिमे सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एकर कथामुखकेँ उत्थापित कऽ कए प्रतीक योजना नियोजित कयलनि अछि, नाटककार जाहिमे समाजक सब वर्ग यथा चाहे ओऽ चोर हो, उचक्का हो, पाकेटमार हो, नेता हो, अभिनेता हो, कलाकार हो, साहित्यकार हो, बीमा कम्पनीक एजेण्ट हो, प्रेमी-प्रेमिका हो, उच्चवंशीय महिला, अप्सरा हो, नृत्यांगना हो, रद्दी कागज बेचनिहार वा किननिहार हो, नेताक चमचा हो सभक मानसिक पृष्ठभूमिमे प्रवेश कऽ कए नाटककार एक मनोवैज्ञानिक सदृश ओकर साइको-एनालिसिस करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे सभक आन्तरिक अभिलाषा रहैछ जे वैह समाजक सर्वश्रेष्ठ प्राणी थिक आऽ स्वर्ग जएबाक अभिलाषाक पूत्यर्थ तद्वत कार्यमे संलिप्त भऽ जाइछ। अन्ततः सब एकत्रित भऽ कए स्वर्गक फाटक लग क्यू लगबैछ, किन्तु चित्रगुप्त द्वारा ओकर कयल गेल कार्य-विवरणी प्रस्तुत कऽ कए पुनः पृथ्वीपर प्रत्यागत हैबाक आदेश दैत छथि आऽ ओतए नो एण्ट्रीक साइन बोर्ड लागि जाइछ आऽ यमराज सेहो प्रत्यागत भऽ जाइछ। इएह द्वन्द्व नाटकमे सर्वत्र दृष्टिगत जे एकर एक नवोपलब्धि थिक।
एहि नाटकक वैशिष्ट्य अछि जे मैथिलीमे प्रथमे-प्रथम ने तँ अंक विभाजन अछि ने दृश्य-विभाजन कयलनि, प्रत्युत सम्पूर्ण नाटककेँ प्रयोगधर्मी नाटककार चारि कल्लोलमे विभाजित कऽ कए वर्तमान समाजक सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ समाहित कयलनि अछि जे एहने लहर समाजान्तरगत परिव्याप्त अछि। पत्रोचित भाषाक प्रयोग आऽ छोट-छोट वाक्य-विन्यास, नाटकीयता कवित्व-शक्तिसँ ओत-प्रोत रहलाक कारणेँ ई नाटक दर्शकपर अमिट प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करत से हमर विश्वास अछि। सम्पूर्ण नाटकान्तर्गत अनेक स्थलपर छोट-छोट गेय पदक प्रयोग कऽ कए एकरसताक परिहार करबामे सहायक भेल अछि। नचिकेता स्वयं अभिनेता छथि, तेँ मैथिली रंगमंचक यथार्थ स्थितिसँ चिर-परिचित छथि जे मैथिलानी रंगकर्मीक अभाव अछि तेँ एहिमे अत्यल्प महिला पात्रकेँ समायोजित कयलनि अछि जे एकर मंचनमे व्यवधान नहि हो। भविष्यमे आर अभिनव प्रयोगधर्मी नाटककारक कृतिक अपेक्षा मैथिली रंगकर्मीकेँ बनल रहत जकर ओऽ पूर्ति करताह।

२. नो एण्ट्री: मा प्रविश- प्रोफेसर उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
विवेचना: गजेन्द्र ठाकुर
नचिकेता जीक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश विदेह- ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपेँ लगातार ८ अंकमे पत्रिकाक आठम अंक (तिथि १५ अप्रैल २००८) सँ पन्द्रहम अंक (तिथि १ अगस्त २००८) धरि ई-प्रकाशित भए सम्प्रति प्रेसमे प्रिंटक लेल गेल अछि। आब ई सभटा अंक पी.डी.एफ. रूपमे विदेह आर्काइवमे डाउनलोडक लेल उपलब्ध अछि। लगातार १२० दिन ई नाटक वेबपर रहल आऽ ५० देशक २५० स्थानसँ १५९६० पाठक एकरा पढ़ि चुकल छथि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा), आऽ एहिमे आर्काइवसँ विदेहक पुरान अंक डाउनलोड कएल गेल संख्या नहि जोड़ल गेल अछि।

नाटकक कथानक: प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे मुदा धूर्त-समागम अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (वा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतए बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। क्यो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आऽ चोरि करए काल मारल गेल चोर, उच्चक्का आऽ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखऽमे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर चोर आऽ उचक्का दुनू गोटेकेँ कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दए अबैत छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैत अछि, अंगा छोड़बाक लेल कहैत अछि। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैत अछि तखन उच्क्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइत अछि आऽ पॉकेटमारपर मारि-मारि कए उठैत अछि। मुदा जखन चोर कहैत छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल ओकर जकाँ माँजल चोर नहि, आऽ उच्क्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नञि सकल, तखन उच्क्का महराज चोरक पाछँ पड़ि जाइत छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैत अछि आऽ उच्क्काकेँ कहैत छन्हि जे अहाँकेँ नहि हमरा कहलक। संगे ईहो कहैत अछि जे चोरि तँ ई तेहन करए जनैत अछि जे गिरहथक बेटा आऽ कुकुर सभ चोरि करैत काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलक आऽ हमर खिधांश करैत अछि। बड़का चोर भेलाऽ हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नहि कए पबैत छथि जे ओऽ चोर थिकाह। ताहिपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबैत छन्हि। तखन ओऽ चोर महराज एहि गपपर दुख प्रकट करैत छथि जे नहि तँ ओहि राति एहि पॉकेटमारकेँ चोरिपर लए जएतथि आऽ ने ओऽ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आऽ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छलाह, गुम्म भेल सभटा सुनैत छथि आऽ दुख प्रकट करैत छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब तँ स्वर्ग केहन होएत से नहि जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी एहि विषयपर पढ़ैत छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो एकर एहि स्थलपर प्रारम्भ होइत अछि जे एहि नाटककेँ संगीतक बना दैत अछि। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लैत छथि आऽ बटुआ साफ अए दैत छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भए जाइत अछि मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैत छथि ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओहि पार ई बटुआ आऽ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नहि अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजैत छथि जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नहि चलबाक विषयमे टीप दैत छथि जे हँ ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसरक पत्नी बनब। आब एहि गपपर घमर्थन शुरू भए जाइत अछि। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दैत छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेतीह। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दए बहसमे शामिल भऽ गेल छथि ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की सभ कहैत छथि। मुदा पॉकेटमार कहैत अछि जे भीतरमे सुख नहि दुखो भए सकैत अछि। एहिपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भए जाइत छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्रपर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। एहि बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आऽ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि जे ई अद्भुत नीलामी, जे करबाऽ रहल अछि पॉकेटमार आऽ शामिल अछि चोर आऽ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आऽ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भए जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करैत छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आऽ अकास-पताल कहैत छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहैत छथि जे सभ गोटे सत्य छी आऽ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नहि बजलहुँ। फेर बजैत-बजैत ओऽ कहए लगैत छथि क्यो चोरि काल मारल गेलाह (चोर ई सुनि भागए लगैत छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लए अनैत छन्हि!) तँ क्यो एक्सीडेन्टसँ आऽ एहि तरहेँ सभटा गनबए लगैत छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मॄत्य्क एतए आयल छथि से हुनकहु लोकनिकेँ नहि बुझल छन्हि! बीमा बाबू कहैत छथि जे ओऽ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतए छथि! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइत छथि कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहैत छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइत छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहतीह आऽ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतएसँ गेनाइ तँ संभव नहि मुदा ई भऽ सकैत अछि जे दुनू जोड़ी माय-बाप(!)केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतहि बजबाऽ लेल जाए। मुदा अपना लेल माय-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नहि छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग कराऽ दैत छथि आऽ कन्यादान करैत छथि बजारी।
दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि एहि भाषसँ, जे क्यो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भए आबि चुकल छथि आऽ नेताजीक अएबाक सभ क्यो प्रतीक्षा कए रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दए नेताजीक विलम्बसँ अएबाक (मृत्युक बादो!) क्षतिपूर्ति कए रहल छथि, गीतक योग दए। एकटा गीत चोर नहि बुझैत छथि मुदा भिखमंगनी आऽ रद्दीबला बुझि जाइत छथि, ताहि पर बहस शुरू होइत अछि। चोरकेँ चोर कहलापर आपत्ति अछि आऽ भिखमंगनीकेँ ओऽ भिख-मंग कहैत अछि तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैत छथि जे ओऽ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे एहि नगरमे कला-वस्तु क्यो नहि किनैत अछि आऽ चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेलीह। चोर कहैत अछि जे मात्र ओऽ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैत अछि। नव बात कोनो नहि अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइत छथि आऽ लोकक चोर, उच्क्का आऽ पॉकेटमार होएबाक कारण, समाजक स्थितिकेँ कहैत छथि। तखने एकटा वामपंथी अबैत छथि आऽ ओऽ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आऽ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लए पुनः प्रस्तुत होइत अछि आऽ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कए दैत छथि।
तेसर कल्लोल: आब नेताजी आऽ वामपंथीमे गठबंधन आऽ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भए जाइत अछि। नेताजी फेर गीतमय होइत छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाकक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करैत छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप नव गप कहि जाइत छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने क्यो नेता नहि बनि सकैत अछि आऽ दोसर जे चोर नेता नहि बनि सकैछ (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नहि छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबैत छथि आऽ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइत अछि। अभिनेता, नेता आऽ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि! ई पुछलापर की कतार किएक बनल अछि ताहिपर चोर-पॉकेटमार कहैत छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनएबाक (आऽ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि।
चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लैत छथि आऽ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करैत छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आऽ बन्न सेहो होइत छल। नंदी भृंगी पहिनहि सूचित कए देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नहि मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओहिपार की अछि ताहि विषयमे सभ क्यो अपना-अपना हिसाबसँ अनुभवक उत्तर दैत छथि। चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई सभटा छैक ओहिपार। नंदी-भृंगी सूचित करैत छथि जे एहि गेटमे प्रवेश निषेध छैक, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छैक। आहि रे ब्बा! आब की होए! नेताजीकेँ पठाओल जाइत छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतए मन्द भए जाइत छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी केर खिंचाई शुरू होइत छन्हि असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कए लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आऽ शश योग कहैत अछि जे सत्तरि से ऊपर जीताह से ओऽ आऽ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइत अछि। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइत छथि आऽ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैत अछि। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लए कराड़ीमे भुनबाक लेल बाहर लए जाइत छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लए जाइत छथि आऽ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबैत छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आऽ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटैत छन्हि ढोल-पिपहीक संग हुनका बाहर लए गेल जाइत अछि। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ…बजैत छथि तँ अभिनेता जी रोकि दैत छथि जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीक अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करैत छथि। हुनको पठा देल जाइत छनि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ ने स्वर्ग-नर्क अछि आऽ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइत छन्हि। मुदा वामपंथी कहैत छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि मुदा एखन जे सोझाँ घटित भए रहल छन्हि ताहिपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहैत छथि जे भऽ सकैत अछि , जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न होए, जतए घुसए जाएब ओतए लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछैत छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति? वामपंथी कहैत छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छैक मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कहाँ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर प्रयास करैत अछि। ताहिपर हुनका संग चोर-उचक्का आऽ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइत अछि ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैत अछि आऽ ई जिज्ञासा करैत अछि जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा एहिसँ आगाँ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहैत छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैत छथि, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहैत छथि मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि जे एतुक्का निअम बदलल जएबाक आऽ कतेक गोटेकेँ पृथ्वपर घुरए देल जएबाक चरचा सर्वत्र भए रहल छथि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि क्यो भुनए लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर)। आब क्यो नहि आबए बला बचल अछि, से सभ कहैत छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आऽ यमराज अपन मुकुट उतारि लैत छथि आऽ स्वाभाविक मनुक्ख रूपमे आबि जाइत छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतए छलीह, हँसि दैत छथि। भृंगी उद्घाटन करैत छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि! कोन अभिनय, तकर विवरण मुहब्बत आऽ गुदगुदीपर खतम होइत अछि तँ भिखमंगनी कहैत छथि जे नहि एहि तरहक अभिनय तँ ओतए भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आऽ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नहि छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहैत छथि जे ओऽ तखने बजतीह जखन एहि दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझतीह जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दए सकैत छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतहु नो एण्ट्री! यमराज खखसैत छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भए गेल छथि! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ क्यो एक कात लए जायल जाइत छथि मात्र यमराज आऽ निभा मंचपर रहि जाइत छथि। यमराज निभाक सोझाँ सुनू ने निभा… कहि रुकि जाइत छथि। सभक उत्साहित कएलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दैत छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ैत छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नहि होथि! ओऽ चाभी रमणी मोहनकेँ दए दैत छथि मुदा ओऽ ताला नहि खोलि पबैत छथि। फेर निभा अपने प्रयास करए लेल आगाँ बढ़ैत छथि मुदा चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नहि खुजत। महिला ठकए लेल चाभी देबाक बात कहैत छथि। सभ क्यो हँसी करैत छनि जे मोन कतए छोड़ि अएलहुँ? ताहिपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आऽ निभा मोन संजोगि कए ताला खोलबाक असफल प्रयास करैत छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबए लगैत छथि जकर तात्पर्य ईएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतए अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आऽ करेज कहैत अछि मैना-मैना, तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए।

विवेचन: भारत आऽ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आऽ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”।
भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नहि। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतहु चरचा नहि अछि।
अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दैत छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आऽ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आऽ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु होए से आवश्यक नहि, नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि तँ कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आऽ नहिए कोनो प्रासांगिक, कारण एहिमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नहि अछि। जे बजारी उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ैत छथि से कनेक कालक बाद गौण परि जाइत छथि। जाहि उच्क्काक सोझाँ चोर सकदम रहैत अछि से किछु कालक बाद, किछु नव नहि होइछ केर दर्शनपर गप करैत सोझाँ अबैत छथि। जे यमराज सभकेँ थर्रेने छथि से स्वयं निभाक सोझाँमे अपन तेज मध्यम होइत देखैत छथि। भिखमंगनी हुनका दैवी स्वरूप उतारने देखैत हँसैत छथि तँ रमणी मोहन आऽ निभा सेहो हुनका आऽ चित्रगुप्तकेँ अन्तमे अपशब्द कहैत छथि। वामपंथीक आऽ अभिनेताक सएह हाल छन्हि। कोनो पात्र कमजोर नहि छथि आऽ रिबाउन्ड करैत छथि।
कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आऽ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आऽ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मिश्र इतिवृत्तिक होएबाक कोनो टा गुंजाइश तखने खतम भए जाइत अछि जखन चित्रगुप्त आऽ यमराज अपन नकली भेष उतारैत छथि आऽ भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहैत छथि जे ई भिखमंगनी सेहो हमरे सभ जेकाँ कलाकार छथि! मात्र यमराज आऽ चित्रगुप्त नामसँ कथा इतिहास-पुराण सम्बद्ध नहि अछि आऽ इतिवृत्ति पूर्णतः उत्पाद्य अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आऽ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। ताहि हिसाबसँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आकस्मिक घटना आदि जाहि सरलताक संग फ्लोमे अबैत अछि जे ई नाटक सरल कथानक आधारित कहल जाएत। फेर अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आऽ इतिहास एहि तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मनैत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश केँ काल्पनिकमूलक श्रेणीमे एहि हिसाबसँ राखल जाएत। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र, य़शस्वी आऽ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे जे चरित्र सभ छथि ताहिमे सभ चरित्रमे सत् असत् केर मिश्रण अछि। निभा उच्चवंशीय छथि मुदा रमणी मोहन जे बलात्कारक बादक पिटाई केर बाद मृत भेल छथि हुनकासँ हिलि-मिलि जाइत छथि। भिखमंगनी मिथिला चित्रकार अनसूया छथि। दुनू भद्रपुरुष बजारी आऽ चारू सैनिक एहि प्रकारेँ बिन कलुषताक सोझाँ अबैत छथि। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आऽ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। बजारी आऽ दुनू भद्रपुरुष संगीतक बेश प्रेमी छथि तँ रमणी मोहन प्रेमी-प्रेमिकाकेँ देखि कए ईर्ष्यालू, सैनिक सभ शान्त छथि क्षत्रियोचत गुण सेहो छन्हि से धीरोदत्त आऽ धीरप्रशान्त दुनू छथि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि प्रकारक विभाजन सम्भव नहि अछि।
भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आऽ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत छथि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांत आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आऽ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे उलझन अबैत अछि, अन्तिम दू मे सुलझन।
कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आऽ कार्य अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे बीया अछि एकटा द्वन्द मृत्युक बादक लोकक, बीमा एजेन्ट एतए बिनु मृत्युक पहुँचि जाइत छथि। यमराज आऽ चित्रगुप्त मेकप आर्टिस्ट निकलैत छथि। विभिन्न बिन्दु द्वारा एकटा चरित्र ऊपर नीचाँ होइत रहैत अछि। पताका आऽ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे ओऽ धरणापर खतम भए जाइत अछि! अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आऽ अवसान कहैत छथि। आब आऊ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आऽ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आऽ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आऽ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आऽ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आऽ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आऽ कार्यकेँ जोड़एबला। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मुख/ प्रतिमुख आऽ निर्वहण सन्धि मात्र अछि, शेष दू टा सन्धि नहि अछि।
पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आऽ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे स्थान एकहि अछि, समय लगातार आऽ कार्य अछि द्वारक भीतर पैसबाक आकांक्षा। दू घण्टाक नाटकमे दुइये घण्टाक घटनाक्रम वर्णित अछि नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कार्य सेहो एकेटा अछि। अभिनवगुप्त सेहो कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नहि होए आऽ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नहि होय। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कल्लोलक विभाजन घटनाक निर्दिष्ट समयमे भेल कार्यक आऽ नव कार्यारम्भमे भेल विलम्बक कारण आनल गेल अछि। मुदा एहि त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आऽ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओऽ समर्थन कएलन्हि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि तरहक कोनो समस्या नहि अबैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आपसी गपशपमे- जकरा फ्लैशबैक सेहो कहि सकैत छी- ककर मृत्यु कोना भेल से नीक जेकाँ दर्शित कएल गेल अछि।
भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आऽ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आऽ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे पहिल कल्लोलक प्रारम्भमे ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एतए दृश्यत्वकेँ प्रधानता देल गेल अछि। पश्चिमी रंगमंच नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भारतीय विधानकेँ अंगीकृत कएल गेल- जेना मृत्यु प्राप्त सभ गोटे द्वारा स्वर्ग प्रवेश द्वारक अदृश्य देबाड़क गपशप आऽ अभिनय कौशल द्वारा स्पष्टता। अंकिया नाटमे सेहो प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आऽ एतहु अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। नो एण्ट्री: मा प्रविश मैथिलीक परम्परासँ अपनाकेँ जोड़ने अछि मुदा संगहि इतिहास, पुराण आऽ समकालीन जीवनचक्रकेँ देखबाक एकटा नव दृष्टिकोण लए आएल अछि, सोचबाऽ लए एकटा नव अंतर्दृष्टि दैत अछि।
ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया केर परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत नचिकेताजीक नो एण्ट्री: मा प्रविश तार्किकता आऽ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि। वामपंथीकेँ यमराज ईहो कहैत छथिन्ह, जे वामपंथी देखि रहल छथि से सत्य नहि सपनो भए सकैत अछि। विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई नाटक। सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। चोरक अपन तर्क छन्हि आऽ वामपंथी सेहो कहैत छथि कि चोर नेता नहि बनि सकैत छथि मुदा नेताक चोरिपर उतरि अएलासँ चोरक वृति मारल जाए बला छन्हि। नाटकमे आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आऽ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। यमराज आऽ चित्रगुप्त तक मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। उत्तर आधुनिकताक ई सभ लक्षणक संग नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एके गोटेक कैक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, जेना उच्चवंशीय महिलाक। कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नहि लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भए जएत तकर कोनो ठेकान नहि। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आऽ चरित्र सभक नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि अछि। यदि अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचए बला विद्यमान छथि। कारण, नियन्त्रण आऽ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आऽ नारीवादी दृष्टिकोण आऽ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि।
एहि तरहेँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे उत्तर आधुनिक दृष्टिकोण दर्शित होइत अछि, एतए पाठक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द नाटकक अंतमे दर्शित भेल से उत्तर-आधुनिक युगक पाठककेँ आश्चर्यित नहि करैत छन्हि, किएक तँ ओऽ दैनिक जीवनमे एहि तरहक द्वन्दक नित्य सामना करैत छथि।
ई नाटक मैथिली नाटक लेखनकेँ एकटा नव दिशामे लए जाएत आऽ आन विधामे सेहो नूतनता आनत से आशा कए सकैत छी।
२. उदाहरण
पुस्तकक नाम – उदाहरण
सम्पादक – देवशंकर नवीन
प्रकाशक – प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मन्त्राालय
भारत सरकार
पृष्ठ – २७४
मूल्य – २०० टाका मात्रा
१.कमलानन्द झा,हिन्दी विभाग,सी.एम. कॉलेज,दरभंगा
मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन : उदाहरण
पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै’छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन्‌ २००५) आ सन्‌ २००७मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन्‌ २००७) पाठकक बीच लोकप्रिय भ’ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क’ आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि।
उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकर्त्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चौधरीक कथा ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह।
पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ÷भए प्रकट कृपाला’ साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ÷पेज थ्री’ जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। कॉरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ’ जाउ।
लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ÷विधिक विधान’मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ÷त्यागपत्रा’मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ’ सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा कॉलेजमे पढ़’ चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर’ चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ÷और भी ग़म हैं’ कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकें विस्तृत आयाम नहि द’ पबैत अछि। मनमोहन झाक कया ÷फयदा’मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क’ स्त्राी जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि।
स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ÷मकड़ी’ अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क’ ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल’ क’ अपन व्यक्तित्वकें विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क’ क’ भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य
केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ÷पेंपी’ पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ’ सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ÷भोजन’ कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क’ जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क’ ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि।
राजकमल चौधरीक ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’, धूमकेतुक ÷भरदुतिया’, गंगेश गुंजनक ÷अपन समांग'(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ आ अशोकक ÷तानपूरा’ एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ÷भरदुतिया’ व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकें नहि छोड़लक। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त’ आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त’ ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ’ गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त’ ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि– रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं…।”
अशोकक कथा ÷तानपूरा’ मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार क’ देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त’ दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स’ख हुनक बेटाकें रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ’ पुत्राक एहि अव्यावहारिक स’ख’क केठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि।
संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क’ रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ’ गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै+छ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त’ एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क’ रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ÷नागदेसमे अयनाक व्यवसाय’मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त’ केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क’ यथार्थ बनल रहल अछि।
मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ’ रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि
आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिाकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ÷चितकबड़ी इजोरिया’ आ ÷रूपांतर’ कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ÷नेपथ्य अभिनेता’ आ ÷जहां पमन को गमन नहीं’ आदि लीकसँ हटि क’ लिखल गेल कथा थिक। ÷उदाहरण’मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चौदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि।

२.देवशंकर नवीन-अदद्दी पेनकें मजगुत करबाक आवश्यकता
मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ÷परसुख देबामे परमसुख’क आनन्द लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क’, अपन सब किछु गमाइओ क’, दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर’बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन, केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर’बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ’रमे परसौतीक काज करबाब’वाली स्त्राीकें दाय कहि
क’ सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ’रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय कहबाक परम्परा अछि।
अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामर्थ्य, आ पलखति रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़ भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै’ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक, तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।… तें पूजा पाठमे लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।…लक्ष्यपूर्ति त’ नहिएँ भेल, उनटे लोक धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल, परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि।
कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल। डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी… आदि समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार ह’र-फार, चौकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह…। सम्पूर्ण समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह।
सिरपंचमी दिनक ह’र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो… बिना सर्वजातीय, सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ’ गेल अछि।
मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब’रक कानमे हुनकर खानदान लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क’ सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क’ रहल अछि। नदीमे ठाढ़ भ’ कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि होएत। नेत अइ स’ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल। ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष, शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम, सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा, विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क’ पबै’ए। मिथलाक उदारता आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल…ई समस्त बात सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल।
कोनो स’र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे टोलमे लोक बिलहै छल।…कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत… मुदा तकर अछैत एहि पद्धति आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल
जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ’रमे एक साँझ भोजन करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककें उद्बुद्ध करै छल जे बेटी! आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि कए अपन विवेकसँ चलिह’, आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह’। इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द’ कए तय होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि; गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि?
मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त’ मान्यताक सन्दर्भ बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़ ब’र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि, अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्‌, सकल समाजक सम्मुख ओ व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि–हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब!
अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम, चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव, संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि।
कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त’हमे जाइ तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल’ क’ अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि। अधिकांश समय भनसे घरमे बितब’ पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस’ नहि दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब’ लगलथि। आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत। वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक अछि।… आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?… घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो क्रियाक विकृति प्रचारित भ’ जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल पेटू होइत अछि, से सब जनै’ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह, तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल।
स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा (आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि… सबहक स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क’ सकै छलाह। ई लोकनि आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे
जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल।
हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी, सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन, कराम, खाट, सीक, अरिपन… सब किछु लुप्तप्राय भ’ गेल। एते धरि जे ई शब्द आ क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस’र चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल, पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे कमे काल अबै’ए।
मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत–कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि देखेलै। ÷रंग उड़ल मुरूत’ कथामे मायानन्द मिश्र आ ÷रमजानी’ कथामे ललित मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।…
ख’ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल। सीक’क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ’ गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच’ लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकॉर्ड क’ कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क’ कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट क’ कए लाक सुन’ लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर’ लागल। … अर्थात्‌ जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर विकासक सम्भावना स्थगित रहत।
अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द’ कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा जखन मिथिलाक लोके ओ ÷लोक’ नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ लोक-परम्पराक रक्षा के करत?
प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
२.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन

उनैसम शताब्दीक पंचम दशकमे आधुनिक मैथिली साहित्यक क्षितिजपर एक प्रतिभासम्पन्न साहित्य मनीषीक आविर्भाव भेल जे अपन नवोन्मेषशालिनी प्रतिभाक प्रसादात परिप्रदीत्पि प्रकाश पुञ्जसँ बीसम शताब्दीक प्रथम दशक धरि अबैत-अबैत मैथिली नाट्य-साहित्यक पूर्ववर्ती परम्परामे क्रान्तिकारी परिवर्तन आनि, परवर्ती युगक नाट्यकार लोकनिक हेतु एक उन्मेष, नमोन्मेषक नेतृत्व नवीन नाट्य गद्यक जनक, प्रगतिशील विचारक, संवेदनशील मनोवृत्ति, कल्पनाशील मस्तिष्क, सरस रोमांचक अनुभूति एवं मैथिल समाजमे परिव्याप्त समस्याक प्रति अतिसाकांक्ष भऽ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि, ओऽ रहथि शलाका पुरुष कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२)। राजदरबारसँ सम्पोषित रहितहुँ ओऽ जन-जनमे चेतनाक दीप जरौलनि, कण-कणमे उत्साह पसारलनि आऽ क्षण-क्षणमे सर्जनाक दिशा निर्दिष्ट कयलनि। युगपुरुष जीवन झाक सम-सामयिक समाज आऽ साहित्य बौद्धिक उत्तेजनाक लहरिसँ गुजरि रहल छल। राजनीति, समाज नीति, अर्थनीति, धर्मनीति, संस्कृति, संगीत, नाटक एवं चित्रकारीपर वैज्ञानिक प्रभावक फलस्वरूप परिवर्तन, परिवर्धन, परिमार्जन प्रारम्भ भऽ गेल छलैक। शिक्षाक नवज्योतिक फलस्वरूप सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक चेतनाक उदय भेल, जकर स्वाभाविक अभिव्यक्ति हिनक नाटकादिक प्रमुख केन्द्र बिन्दु थिक।

ओऽ एक दूरदर्शी साहित्य चिन्तक सदृश आशा-निराशाक मिलन-बिन्दुपर जनमानसकेँ देखलनि। ओऽ नैराश्यक अन्धकारमे आशाक दीप जरौलनि। युगीन परम्पराकेँ नीक जकाँ चिन्हलनि तथा युगानुभूति एवं कालक सत्यताक कोनो स्थितिकेँ अभिव्यक्त करबाक शक्तिकेँ दमित नहि कऽ पौलनि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामाजिक विषमताक हुँकार, तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक उपस्थापनमे अक्षर पुरुष प्रमाणित भेलाह। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिसँ जखन हम हिनक नाटकादिक परीक्षण-निरीक्षण करैत छी, तखन हम ओकरा समसामयिक सामाजिक स्थितिक दर्पण, सांस्कृतिक वैभवक धरोहरि आऽ आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त समाजक यथार्थ एलबम कहि सकैत छी। ई सर्वविदित सत्य थिक जे ओहि कृतिकारक कृतित्व अक्षय रहैछ, जे सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवनक वास्तविक प्रतिनिधित्व करैछ, जनिका हृदयमे उपर्युक्तक प्रति पूर्ण आस्था रहैछ तथा ओकर अधःपतनकेँ जनमानसक समक्ष रेखांकित कऽ सचेष्ट हेबाक प्रेरणा दैछ, कारण साहित्य तँ हमर जीवनानुभूतिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ।

युगपुरुष जीवन झाक नाटकादिक प्रेरणास्रोत थिक नवीन जागरणक ज्योति। अपन सजग आँखिएँ ओऽ देश-देशान्तरक विकासोन्मुख गतिविधिपर दृष्टि निक्षेप कयलनि, एहि विषयक अनुभव कयलनि जे मैथिल समाजमे नवजागरणक अभाव अछि। ई अपन नाटकक कथानकक चयनक निमित्त मिथिलाक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थिति दिस दृक् पात कयलनि तथा अपन युगक वास्तविक समसामयिक स्थितिक रूपायन ओहिमे कयलनि।

संस्कृत पण्डित रहितहुँ जीवन झा आधुनिकताक पूर्णपक्षपाती अपन कृतित्वमे दृष्टिगत होइत छथि। मिथिलांचलमे परिव्याप्त वैवाहिक समस्या छल तकरा केन्द्र-बिन्दु बनाय सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे देशोन्नितिक निमित्त नाटकक माध्यमे जन-आन्दोलनक प्रेरणा देलनि, कारण मिथिला मोद ओ मैथिल महासभाक आविर्भावसँ पूर्वहि ई अपन नाट्यकृतिमे ओकर समाधानार्थ विचार प्रस्तुत कयलनि। मैथिल समाजमे तिलक-दहेज, जाति-पाँजिक नामपर कन्यापर होइत अत्याचार एवं अन्याय एवं अन्य सामाजिक कुप्रथापर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ अपन आलोचनात्मक दृष्टिकोण जनसामान्यक समक्ष प्रस्तुत कयलनि।

सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ आधार बनाय ई मैथिलीमे नाट्य-लेखनक शुभारम्भ कयलनि। हिनक तीन सम्पूर्ण नाटक-सुन्दर संयोग (१९०४), सामवती पुनर्जन्म, नर्मदा सागर सट्टक एवं खण्डित मैथिली सट्टक समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिक उद्देश्य निर्धारणमे सहायक होइछ। वस्तुतः हिनक नाटकादिमे मैथिल समाजक विश्वास एवं संस्कारक प्रतिबिम्ब भेटैछ, जकरा माध्यमे ओ उच्च जीवनक प्रतिष्ठाक आकांक्षी भेलाह। हिनक सम्पूर्ण नाट्य-साहित्यमे व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तरक सन्निवेशक कारणेँ मिथिलांचलक वातावरणमे परिव्याप्त अछि।

विवाहक चौमुखी समस्यापर आधारित वासना, प्रेम, मिलन आऽ विछोह यद्यपि हिनक नाटकक केन्द्र-बिन्दु थिक, जकर समाजशास्त्रीय एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन अपेक्षणीय अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे मैथिल सामाजिक जीवनक अधिकाधिक प्रामाणिक रूप “सुन्दर संयोग” एवं “नर्मदा सागर सट्टक”मे प्रस्तुत करबामे ओऽ सफलता प्राप्त कयलनि। हिनक नाटकादि मात्र मनोरंजनक हेतु नहि, प्रत्युत जीवनक गम्भीर समस्याक समाधान करबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भऽ रचना कयलनि। एकर नायक-नायिका मिथिलांचलक परम्परागत कुलीन प्रथाक रूप प्रदर्शित करैछ। यद्यपि “सामवती पुनर्जन्म”क कथानक पौराणिक पृष्ठभूमिपर आधारित अछि, तथापि ओकर प्रत्येक पात्र समसामयिक समाज, संस्कृति एवं आर्थिक पृष्ठभूमिमे उतारल गेल अछि।

“सुन्दर संयोग”मे नाट्यकार समाजक ओहि मानसिक स्थितिक विश्लेषण कयलनि अछि, जे जाति-पाँजि, कुलीनता, बिकौआ प्रथापर प्रचलित बहु-विवाह आऽ पत्नी-परित्यागक सन विकृतिसँ उत्पन्न होइत छल। तथाकथित कुलीन-जन अनेक बियाह करैत रहथि आऽ पत्नीकेँ नैहरमे छोड़ि दैत रहथि। भलमानुसक पत्नीक जीवनगति इएह छलैक। विवाह कऽ कए जाथि आऽ जीवन भरि वापस नहि आबथि। दाम्पत्य सुख एहन कन्याक निमित्त जीवन भरि अननभूत सत्य बनल रहि जाइत छलैक। ओऽ ने तँ कुमारिए रहैत छल आऽ वास्तवमे सधवे। सधवा रहितो वैधव्य-वेदना सहैत रहैत छल। एहन स्थितिक चित्रण निम्नस्थ पंक्तिमे व्यञ्जित भेल अछि:

सीमन्तक सिन्दूरक रेखासँ छी हम धनमन्ती।
हाथक दू लहठीसँ होइछ सधवामे नित गनती।
मिथिलांचलमे कुलीनताक बलपर प्रतिवर्ष विवाह करब सामान्य बात छल। समाजमे एहन परम्परा प्रचलित छलैक जे एक ठाम विवाह आऽ चतुर्थी सम्पन्न कऽ कए दोसर ठाम पुनः विवाह करैत छलाह। कुलीन व्यक्ति विवाहोपरान्त पलटिकऽ जयबाक प्रयोजन नहि बुझैत रहथि। समयक क्रममे अपन पत्नीक आकृति आऽ सासुरक लोककेँ बिसरि जाथि। अत्यल्प परिचयक कारणेँ सर-कुटुम्बकेँ नहि चिन्हब तँ सर्वथा स्वाभाविक।
एहन विषम स्थितिमे कन्याक माता-पिता, समाज आऽ कन्याकेँ केहन मानसिक यातना होइत छलैक, निराशा आऽ विषादसँ आछन्न मनःस्थितिमे कोना जीवन-यापन करैत छल से स्वतः कल्पनातीत छल। कोनो सौभाग्यशालिनी कन्याकेँ पुनः दाम्पत्य जीवन प्राप्त होएतैक, कतेक उल्लास होयतैक, केहन हर्ष होयतैक, ओहो काल्पनिक अछि।
मिथिलांचलमे प्रचलित कन्यादानी शब्द ओही परिणीता; किन्तु परित्यक्ता नारीक यातनामय इतिहासकेँ अपनामे समेटने अछि।
युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक सामाजिक वातावरणमे परम्परा परिव्याप्त छल। सामाजिक जीवनमे ई प्रतिष्ठाक विषय छल। नाटककार एहि सामाजिक परिस्थितिसँ पूर्ण अवगत रहथि। एकर दुष्प्रभावकेँ ओऽ अनुभव कयने रहथि। समाजक ओहि परिवेशमे कन्यापक्षक मानसिक अन्तर्द्वन्दकेँ ओऽ सुन्दर संयोगमे अभिव्यक्त कयलनि। समाजक समक्ष ओऽ सुन्दर मिश्र कए सदृश आदर्श पुरुषक रूपमे प्रस्तुत कयलनि।
सुन्दर मिश्र अपन सासुरक प्रत्येक व्यक्ति, अपन पत्नीकेँ तखने चिन्ह जाइत छथि, जखन हरदत्त पण्डा हुनक ससुरक पूर्व पुरखाक नाम गाम बाँचैत छथि। ओऽ चतुर्थी दिन पत्नीक अस्वस्थताक कारणेँ सासुर छोड़ि देने रहथि। ओऽ अपन पत्नी पर्यन्तकेँ नहि चिन्ह पौने रहथि। इएह स्थिति तँ सरलाक ओकर माय, ओकर परिवार, ओकर सखी-बहिनपा ओऽ समाजक छलैक। किन्तु सभक मनमे आशाक किरण छलैक जे भलमानुस सुन्दर मिश्र विवाह कऽ कए चल गेलाह तँ आने बिकौआ वर जकाँ नहि जे आबथि। एहि मानसिकताक अभिव्यक्ति सरस्वतीक कथनमे अभिव्यक्त भेल अछि। जखन ओऽ वैद्यनाथकेँ प्रार्थना करैत छथि; “हे वैद्यनाथ! जे जे कबुला कैल सभ मनोरथ पुरल, आब जमाइकेँ कुशल पूर्वक देखी से वरदान दिअ” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ १२)।
सरस्वतीक मनोभाव अत्यधिक पल्लवित भेल अछि, जखन ओऽ अनचीन्हेमे (अपन जमाय) सुन्दर मिश्रकेँ कहैत छथिन, “हे बाबू! बड़ पुण्य रहैत तँ एकर ई वयस भेलैक जमाय चुर्थि अहिक दिन एकरा दुखित छोड़िकेँ जे गेलाह से आइ धरि उदेशो ने पबै छिऐन्ह! (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-१४)।
जखन पण्डाइन संकेत करैत छथिन जे पण्डित बाबू सरलाक वर थिकथिन तखन हुनक निराशा व्यक्त होइत छनि, “एहन हम गहमर कहाँ जे जमायकेँ देखब परन्तु वैद्यनाथ बड़ गोर थिकाह”। (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-१९)
सरलाक मनोव्यथा तावत धरि अव्यक्त रहैछ जावत धरि ओकरा संकेत नहि भेटैछ जे पण्डित बाबू सम्भवतः ओकरे वर थिकथिन। तत्पश्चात् ओकर विरह व्यथाक अभिव्यक्ति भेल अछि। मुदा ओऽ सामान्य विरह नहि थिक। सरलाक कथन गद्य आऽ गीतमे सामाजिक परिवेश-जन्य विषाद बजैत अछि, “हे वैद्यनाथ! ऐ तरहेँ दुखिनीकेँ किए सतबैत छहक~ (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-२०) मे “दुखिनी” शब्दक मार्मिकताक अनुभूति तखने भऽ सकैछ, जखन ओहि समयक सामाजिक परिवेशक अनुभव हो। ओहि सामाजिक कुप्रथाक पृष्ठभूमिमे सरलाक कथन विशेषार्थ बोध भऽ जाइछ;
एतदिन शिवपद सेवल, केवल एतबहि काज।
से प्रसन्न वर भाषल राखल मोर कुल लाज॥
(सुन्दर संयोग, पृष्ठ-१८)
बुझा देमक चाही कौखना अनजानकेँ कनिएँ।
जे ई अपराध छौ तोहर किए हमरासँ रुसल छी॥
सरलाक विरह समाजशास्त्रीय विषय थिक जे समाजक परिस्थितिसँ उत्पन्न भेल अछि। एहि तथ्यकेँ नआट्यकार अन्तमे स्पष्ट करैत छथि। सुन्दर सासुरसँ गाम जयबाक जखन प्रस्ताव करैत छथि, तखन उद्विग्न भऽ जाइछ, “हमरा बुझि पडैए जे एहि लोकक मन फेरि अन्तऽ गेलैका” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३३)। ओऽ सुन्दरकेँ कहैत छथिन, “और नहि किछु, जे फेरि ओएह बरहमासा सवने गाबक पड़ै” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३४)।
सुन्दर जखन ओहि बारहमासा गीतक जिज्ञासा करैत छथिन तँ सरलाक उत्तर थिक, “छओ मासक प्राप्त खन लोक वाजै जे आब नहि औथीन तखनसँ कादम्बरी बहिनक संग इएह गीत सब गबै छलहुँ। (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-३४)
सुन्दर संयोग नाटकक कथानक सामान्य प्रेम-कथाक परिधिमे नहि राखल जाऽ सकैछ। ओऽ थिक मैथिल समाजमे प्रचलित नारी-यातनाक मानस इतिकथा। प्रकारान्तरेँ नाट्यकार ओहि प्रथाक प्रति अरुचि प्रदर्शित करैत समाधान रूपमे सुन्दर सदृश आदर्श पुरुषक प्रयोजनीयता देखौलनि। सुन्दरमे आदर्श पतिक प्राण प्रतिष्ठा कऽ कए नाट्यकार समाजकेँ कान्ता सम्मति उपदेश देलनि।
हिनक नाटकमे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे व्याप्त विवाह सम्बन्धी कुप्रथादिक प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रतिफलित भेल अछि, तकर विश्लेषणसँ प्रतिभाषित होइछ जे नाटककार सामाजिक सुधारक प्रति पूर्णतः साकांक्ष रहथि। विवाह सदृश अतिमहत्वपूर्ण संयोजनमे निरीह पात्री होइछ, कन्या सामवती पुनर्जन्मक प्रस्तावनामे नटीक कथन थिक:
कन्या कुल मर्यादामे बान्हलि कूजय मुँह न बकार।
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ ३)
समाजमे कन्याकेँ पुत्रक अपेक्षा न्यून मानल जाइत अछि जे सर्वथा अनुचित। तेँ तँ गौतमीक कथन थिक; “तखन पुत्र वा कन्या दु टा संसारमे ह्वै छैक। हम तँ बड़ि प्रसन्न छी”। (सामवती पुनर्जन्म पृष्ठ-२३)
जीवन झा कालीन मिथिलांचलक समाज दुइ वर्ग सम्पन्न वर्ग एवं विपन्न वर्गमे विभाजित छल। ताहि कारणेँ स्वजातिमे जाति-पाँजि, कुलीन-अकुलीन, सोति-जोग, भलमानुस, जयवार, पठियार इत्यादिक विचार समाजमे घून जकाँ लागल छलैक। एकरे फलस्वरूप कन्या-विक्रय, बिकौआ प्रथा, बहुविवाह प्रथा आऽ अनेक अमानुषिक समस्याकेँ जन्म दैत छल। ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। “नर्मदा सागर सट्टक”क
(अगिला अंकमे)
१.स्व. राजकमल चौधरी
१.स्व. राजकमल चौधरी
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास)
ग’रसँ देखला पर बात तय होइत अछि जे उपन्यास भारतीय साहित्यक सबसँ गतिशील विधा थिक। भावककें एतए अपन तथा परिवेशक सम्यक्‌ चित्रा सम्पूर्ण वैविध्यक संग भेटैत अछि। एहि तथ्यमे सेहो किनकहु कोनो संशय नहि छनि जे साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव समाजमे आधुनिक सभ्यताक विकासक फलस्वरूप भेल। विज्ञान एवं तकनीकी विकासक फलस्वरूप यूरोपमे सतरहम शताब्दीमे पूंजीवादक पाँखि पसरल, सामाजिक परिवर्त्तनक झोंक आएल, आ साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव भेल। मुदा से भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत नहि थिक। विहंगम दृष्टिसँ देखी तँ भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत सन्‌ १८५७क प्रथम स्वाधीनता संग्राम, आ तकर निराशाक कारणें भारतीय बुद्धिजीवीक बीच जाग्रत चेतनाकें मानल जाएत। एकर सूत्रा उनैसम शताब्दीक प्रारम्भिक कालमे भारतीय बौद्धिक जन’क मोनमे उठल नव चेतनासँ सेहो जुड़ैत अछि, राजा राममोहन राय द्वारा समर्थित नवजागरणसँ सेहो जुड़ैत अछि, ÷बंगाल नवजागरण’ आ ÷महाराष्ट्र प्रबोधन’सँ सेहो जुडै+त अछि। हिन्दी पट्टीमे अइ नवजागरणक हवा थोड़ेक देरीसँ आएल। मुदा भारतेन्दु मण्डलक बुद्धिजीवी वर्ग सम्पूर्ण तत्परता आ प्रतिबद्धताक संग एकर उद्घोष केलनि, परिणति धरि पहुँचौलनि।
हिन्दीमे उपन्यास लेखन नवजागरण कालहिमे प्रारम्भ भेल। ÷परीक्षा गुरु'(१८८२) ÷त्रिावेणी'(१८९०) आदि औपन्यासिक कृतिसँ लाला श्रीनिवास दास आ किशोरी लाल गोस्वामी एहि विधाक शुभारम्भ केलनि। डेढ़-दू दशक बाद हिन्दी उपन्यास अपन पूर्ण ज्योतिक संग दैदीप्यमान होअए लागल। जयशंकर प्रसादक ÷कंकाल'(१९२९), ÷तितली'(१९३४); जैनेन्द्र कुमारक ÷परख'(१९२९), ÷सुनीता'(१९३५), ÷त्यागपत्रा'(१९३७);
प्रेमचन्दक ÷सेवासदन'(१९१६), ÷प्रेमाश्रम'(१९१८), ÷रंगभूमि'(१९२६), ÷गोदान'(१९३७) आदि उपन्यासक प्रकाशन भ’ चुकल छल। देवकी नन्दन खत्राीक ÷चन्द्रकान्ता'(१८८८) आ ÷चन्द्रकान्ता सन्तति'(१८९६) तँ एहि सबसँ पूर्वहि प्रकाशित भ’ कए ख्याति अर्जित क’ चुकल छल। जनतब अछि जे भारतीय भाषा सबमे सबसँ पहिने बंगलामे उपन्यास लेखन शुरुह भेल।…मैथिलीमे उपन्यास लेखनक प्रारम्भिक अवधि थिक सन्‌ १९१४-१९३३, अर्थात्‌ ÷निर्दयी सासु’सँ ÷कन्यादान’क रचनाकाल धरि। एहि मध्य कैक टा उपन्यास लिखल गेल, मुदा एहि समय धरि हिन्दी आ आन भारतीय भाषाक उपन्यासक प्रगति देखैत विषयक विस्तार आ शिल्प-शैलीक नूतनताक दृष्टिएँ उल्लेखनीय उपन्यास थिक–निर्दयी सासु(जनार्दन झा ÷जनसीदन’)१९१४, रामेश्वर(जीवछ मिश्र)१९१६, सुमति(रासबिहारी लाल दास)१९१८, मनुष्यक मोल(कुमार गंगानन्द सिंह)१९२४, मिथिला दर्पण(पुण्यानन्द झा)१९२५, पुनर्विवाह(जनार्दन झा ÷जनसीदन’)१९२६, चन्द्रग्रहण(कांचीनाथ झा ÷किरण’)१९३२, कन्यादान(हरिमोहन झा)१९३३ आदि।
एहि आँकड़ाकें देखैत ई लगैत अछि जे मैथिली उपन्यासक मूल लेखन नहि किछु तँ दू-अढ़ाइ दशक पाछू आबि कए प्रारम्भ भेल, आ शीघ्रे माटि पकड़ि लेलक। ध्यान रखबाक थिक जे पहिने बिहार आ बंगाल एकहि प्रान्त छल, कलकत्ता तकर प्रशासन केन्द्र छल। सन्‌ १९१२मे बिहार-बंगाल विभाजित भेल मुदा मिथिलाक लोकक सम्पर्क कलकत्तासँ बनले रहल। उल्लेखनीय अछि जे स्वातन्त्रयोत्तर काल, अथवा ताहूसँ आगू, आपातकालक बाद धरि रोजगारक टोहमे विभिन्न आयुवर्गक मैथिल दिल्ली, पंजाब, गुजरात महाराष्ट्र दिश अपन रुखि केलनि, मुदा एखनहुँ धरि कलकत्ता-प्रेमसँ मैथिल लोकनि पूर्णतया मुक्त नहि भेल छथि।… मैथिली उपन्यासक उद्भवक स्रोत बौद्धिक जन’क स्वानुभूति, अंतःप्रेरणा, मिथिलाक समकालीन परिवेश, मानव जीवनक विसंगति, फिरंगी शासकक अत्याचार…जे रहल हो; मुदा सम्भव ईहो अछि जे बौद्धिक जनकें एहि विभाजनसँ ÷निज भाषा’ अर्थात्‌ ÷मातृभाषा’क उन्नति लेल; सर्वथा नव विधा उपन्यासक लेखन लेल प्रेरणा जागल होइन।
मैथिलीमे उपन्यास लिखाएल तँ जाए लागल खूब, मुदा तदनुसार सर्वविधि विकास नहि भेल–एहि तथ्यकें स्वीकार’मे संकोच नहि कर’क चाही। मिथिलाक नव बौद्धिक वर्गक मध्य सब तरहक जागरूकता आ चेतनाक अछैत मैथिलीक उपन्यास लेखन मिथिलामे स्त्राीक दयनीयता पर कनैत रहल। एते धरि जे वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी’ धरिकें सन्‌ १९४६ मे ÷पारो’क परिस्थिति पर कान’ पड़लनि, जे सन्‌ १९१६सँ १९३७ धरिक अन्तरालक दुनियाँ भरिक औपन्यासिक उत्थान देख चुकल छलाह। जँ पहिनेक उपन्यासकार कनेको साहस केने रहितथि, तँ सम्भव छल, जे ÷नवतुरिया’मे जे डेग यात्राी उठौलनि, से डेग ÷पारो’एमे उठि जइतए। चेतना आ बौद्धिकताक दृष्टिएँ मिथिला क्षेत्रा सदासँ आगू रहल अछि, तथापि उपन्यास लेखनक विकासोन्मुख धारामे मैथिली एहि तरहें पछुआएल रहल, तकर मूल कारण रचनाकारक जीवनानुभूति आ रचना-दृष्टिक कमजोरी नहि छल; मूल कारण छल मिथिलाक जनपदीय परिस्थिति आ आम नागरिकक मानस लोक।
भारतीय स्वाधीनताक दशक भरि बाद सन्‌ १९५८मे राजकमल चौधरीक पहिल मैथिली उपन्यास ÷आदिकथा’ प्रकाशित भेल। एहि समय धरि मैथिली उपन्यासक भण्डार कोनो तेहेन झुझुआनो नहि छल। ÷चन्द्रग्रहण’, ÷पारो’ आ ÷नवतुरिया’ सनक विशिष्ट उपन्यास सब प्रकाशित भ’ चुकल छल। ÷पारो’ क कथावस्तु आ घटनाक्रम पर मिथिलाक कट्टरपन्थी लोकनि वितण्डा ठाढ़ क’ चुकल छलाह। असलमे मिथिला क्षेत्राक सामान्य जनजीवनक समस्या ओहि समय धरि विकराल छल। पंजी-प्रथा आ जमीन्दारी संस्कारसँ मिथिलाक जे वर्ग आक्रान्त छल, ओएह वर्ग सामाजिक व्यवस्थाक नीति-निर्धारक होइ छल। पंजी-प्रथाक कारणें मिथिलामे स्त्राी जातिक स्थिति दयनीय छल। बाल विवाह, बेमेल विवाह, बहु-विवाह, वृद्ध विवाह सन कुरीति पंजीए प्रथाक परिणति छल। तथाकथित उच्च कुलशीलक पुरुष अनेक बेर विवाह क’ लै छलाह। कतोक किशोरी अथवा युवतीक विवाह, पिता आ पिमामहक उम्रक लोकसँ भ’ जाइ छल। अइ किशोरी आ युवतीक पितावर्ग ओइ जमीन्दार लोकनिकें अपन उद्धारक बूझै छलाह आ तृप्त भेल घोषित करै छलाह जे बेटी आब रानी बनि राज करतीह, बेटीक मोन आ मनोभावकें बूझब ओ अपन दायित्व नहि मानै छलाह। जाहि समाजमे वैज्ञानिक विकासक कोनो टोप-टहंकार पहुँचि नहि सकल छल, ओतएक लोक अपन जीवन व्यवस्थाकें एतेक यान्त्रिाक बना नेने छल, जे ओहि बेटीक बाप-माइकें ई नहि बुझाइन जे एकटा स्त्राी लेल अन्न-पानि, जमीन-जथा, गहना-जेबरे टा सब किछु नहि होइ छै; कोनो स्त्राीक मनोवेगक उत्ताप-अनुताप, युवावस्थाक दैहिक भार सेहो बड़ अर्थ रखै छै। स्त्राी मनोवेगक अइ दशाक बोध ओहि उच्च कुल-वंशीय जमीन्दारकें सेहो नहि होइ छलनि। अइ तरहक विवाहक परिणति दू दिशामे होइ छल — की तँ जवानीक उमेर अबैब-अबैत किशोरी विधवा भ’ जाइथ, आ कि वृद्ध पति संग जवान पत्नीक रति-विलास सुखकर नहि पाबि कुण्ठित होइत रहथि। दुनू परिस्थितिमे देहक भार कोनो जवान पुरुखकें सौंप देबा लेल ओ युवती विधवा, अथवा अतृप्त सधवा ललायित रहै छलीह। राजकमल चौधरीक ÷आदिकथा’ उपन्यास एहने अतृप्त सधवा अथवा कामातुर
विधवाक कथा थिक जे अभिलाषा आ मर्यादाक दू छोरसँ तानल-छानल छथि।
÷आदिकथा’क नायिका सुशीलाक विवाह वृद्ध जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूसँ भेलनि। दुनूक वयसमे एक पीढ़ीक अन्तर छलनि। सुशीलाक उमेर अपन सतौत बेटा कुलानन्दसँ मेल-जोल खाइ छलनि। पहाड़ी नदी, अथवा कोशीक बाढ़ि, अथवा समुद्रक ज्वारि सन सनकी सुशीलाक जवानी आ देह-तन्त्रा कोनो मर्यादाक बन्हन मान’ लेल तैयार नहि छलनि, मुदा घून खाएल चौकठि-केबाड़ सन मिथिलाक कौलिक मर्यादामे तकरा छेक क’ रखबाक प्रयास कएल जाइ छल। अइ जर्जर मर्यादाक पुल पर सम्हरि-सम्हरि क’ पैर राखि जीवन पार कर’ चाहै छलीह, मुदा बीचहिमे अनिरुद्ध बाबूक भागिन देवकान्तक कान्तिमय रूप, चट्टान सन काया-काठी देखि सुशीला, अर्थात सोना मामीक मोन सम्हरि नहि सकलनि, ओ बहकि जेबाक उद्यम नहि केलनि, मुदा बहकि जएबासँ अपनाकें रोकि राखब एते आसानो नहि छलनि। सुशीलाक अतृप्त वासना आ दमित अभिलाषाक संकेत देवकान्तकें लागि जाइ छनि। अइ दुनू चरित्राक मनोविश्लेषण अइ उपन्यासमे बेस सूक्ष्मतासँ भेल अछि। बीचमे आओरो कतोक घटना-उपघटनाक माध्यमे मूल कथाकें माँसल आ प्रभावकारी बनाओल गेल।
मामि-भागिनक कामातुर अनुराग सामाजिक रूपें स्वीकार्य नहि अछि, तें एहि उपन्यासक कथानक मिथिलाक पुरातन विचारक लोककें पसिन नहि पड़लनि। कहल गेल जे ई कथा सत्य नहि सत्यानुरूप अछि, एहिमे अमर्यादित सत्यक वर्णन अछि, नायक-नायिकाक मनोवृत्ति अथवा मानसिक उद्वेलनक चर्चा करै काल लेखककें उचितानुचितक ध्यान रखबाक चाही, सामाजिक बन्धक अवहेलना क’ कए कथामे विश्वसनीयता अनबाक आग्रह नहि हएबाक चाही, मामि-भागिनक कामजनित आकर्षण मर्यादाक उल्लंघन थिक।… हमरा जनैत ई समस्त धारणा पाखण्ड थिक। वस्तुतः उपन्यासकार कोनो अखबारक सम्वाददाता नहि होइत छथि जे ओ सत्य घटनाक रिपोर्ट लिखता। कथा आ कि उपन्यास सम्भाव्यक संकेत, वर्त्तमानक विश्लेषण आ अतीतक अनुस्मरण करैत अछि; घटितक सूचना द’ देब मात्रा ओ अपन दायित्व नहि बूझै छथि। आदर्श स्थितिसँ कथा, उपन्यासकें परहेज नहि होइत अछि, ओ तँ आदर्शेक अनुसन्धानमे लिप्त रहैत अछि; मुदा अयथार्थ आदर्श ओकरा लेल उपेक्षणीय अवश्य होइत अछि। अही उपन्यासक प्रसंग राजकमल चौधरीक कहब छनि– सोनामामीक प्रति देवकान्तक प्रेम बड्ड आदर्श थिक। आ, अही आदर्शक रक्षाक कारणें देवक जीवन स्वाहा भ’ गेल छइन। आब अहीं कहू; जे भस्म करए, आगि लेसने रहए, से आदर्श कोना, अनुकरणीय कोन तरहें? हम सामाजिक मर्यादाक पूजा करइ छी, आ (अयथार्थ) आदर्शवादिताक घोर विरोध।
आदिकथा उपन्यास पर जे लोकनि मर्यादाक उल्लंघनक दोहाइ देलनि, ओ लोकनि अनिरुद्ध बाबूकें अमर्यादित पुरुष नहि कहलनि, जे अपन अशक्य अवस्थामे सन्तानहुँसँ छोट वयसक युवतीकें पत्नीक रूपमे वरन्‌ केलनि। सुशीलाकें जखन अतृप्त मनोवेगक दौरा पड़लनि तखन श्वसुर स्थानीय जोतखी जी आडम्बर पसारलनि जे हुनका पर प्रेतनी सवार भ’ गेलखिनहें। आ, भूत झारबाक बहन्नें वधू-स्थानीय सुशीलाक बाँहि, पाँजर पकड़बाक आचरण गामक लोककें अमर्यादित नहि लगलनि। किऐक तँ अइ समस्त आचरणक फैंटेसीमे मिथिलाक समाज प्रारम्भहिसँ जीबैत आएल छल।
मनुष्य जें कि एकटा जटिल प्राणी थिक, तें मनुष्यक समस्त मानसिक प्रक्रिया विचित्रा जटिलतासँ आबद्ध रहैत अछि। हजारह बर्खक विकास-यात्राामे मनुष्यक सभ्यता आइ जाहि स्थिति धरि पहुँचल अछि, ताहिमे विवेक धारणक विराट भूमिका अछि। मर्यादाक रक्षा विवेकहीन आचरणसँ नहि भ’ सकैत अछि। मर्यादाक निर्वाहमे एक ठाम देखाओल गेल विवेकहीनता अनेक अमर्यादाक जननी होइत अछि, एहि सत्यक उपेक्षा केनिहार लोक पारो, आकि आदिकथा सन उपन्यासक कथा पर अँगुरी उठबैत छथि।
मैथिलीमे लिखल राजकमल चौधरीक तीन गोट उपन्यास उपलब्ध अछि –आदिकथा, आन्दोलन आ पाथर-फूल। एकर अलावा हंसराजक नामे १९.११.१९५९ सँ ०६.०१.१९६०क बीच एक पत्रामे राजकमल चौधरी लिखने छथि… जनवरीमे एकटा मैथिली उपन्यास लिखब हम — बटगमनी। एकटा एहन युवती पर जे भरि निजगी विभिन्न लोकक संगें पड़ाएल घुरइ’ए। कथाक विस्तार जनकपुरसँ पूर्णियाँ धरि रहत।– कहि नहि ई उपन्यास लिखल गेल अथवा नहि। आदिकथा आ आन्दोलन तँ पहिनहिसँ पाठक लोकनिकें उपलब्ध छलनि। पाथर-फूल उपन्यास हेबनि धरि अनुपलब्ध छल। आखर (राजकमल विशेषांक)मे जीवकान्त अपन निबन्धमे राजकमल चौधरीक पंक्ति उद्धृत कएने छथि — एक गोट उत्साही युवक ओकरा (÷पाथर-फूल’ उपन्यासकें) प्रकाशित करौलनि, मुदा ककरो कहला पर जे उपन्यासक अश्लीलताक कारणें प्रकाशक बन्हा जेताह, प्रकाशित मैटर ओ (प्रकाशक) डैमेज करबा देलनि। — मुदा सुकर भेल जे दू बर्ख पूर्व तारानन्द वियोगी ओहि उपन्यासक एकमात्रा प्रति कतहुसँ नष्ट-भ्रष्ट स्थितिमे उपलब्ध केलनि। सम्पूर्ण पोथीमे दीवार
महाशय आर-पार एकटा भोकाँड़ क’ देलखिन। ओही स्थितिमे ओकर छाया प्रति करवा कए बीचसँ पंक्तिकें जोड़ल गेल अछि। जोड़ल शब्दावलीमे राजकमलक शैली आ गरिमा अक्षुण्ण रहि सकल — से कहब कठिन अछि, मुदा एते तय अछि जे उपन्यासक रसबोधमे कोनो बाधा उपस्थित नहि होइत अछि। एकर अलावा आओरो एकाध उपन्यासक चर्चा अछि, मुदा तकर कोनो सूत्रा एखन धरि उपलब्ध नहि भेल अछि।(अगिला अंकमे)

डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।
डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलाश जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल यायावरीक प्रस्तुत अछि ई दोसर खेप।
यायावरी

हमर एक बंगाली मानवशास्त्री मित्र छथि। हुनकर नाम छन्हि डॉ अभिक घोष। बहुत समर्पित लोक। अपन विषय मानव-विज्ञानक प्रति घोष साहेबकेँ अगाध प्रेम छन्हि। आइ-काल्हि पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़मे मानव-विज्ञान पढ़ा रहल छथि। झारखण्डक मुण्डा जनजातिपर पी.एच.डी. केने छथि। हालहिमे घोष साहेब हमरा लग हमर पुत्र शशांककेँ देखबाक हेतु दिल्ली आएल छलाह। हुनकासँ हम अपन नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक सम्बन्धमे चर्चा केलहुँ। ओऽ बहुत प्रसन्न भेलाह। कहलन्हि “कैलाशजी, हमर पत्नी उत्तर-पूर्व भारतक छथि। ओऽ हमेशा हॉफलोंग केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हालहिमे हम एक संगोष्ठीमे भाग लेबाक हेतु कलकत्ता गेल रही। ओतए सेहो हॉफलोंग केर प्रसंग चललैक। कलकत्तामे बंगालक एक प्रसिद्ध पत्रकार अमिताभ चक्रवर्ती हमरा कहलन्हि जे नॉर्थ कछार हिल्स भारतक स्वीटजरलैण्ड थीक”।

डॉ अभिक घोषक एहि बातपर हम कहलियन्हि “अभिकजी, हमरा अइ बातक जानकारी दियऽ, की अमिताभ चक्रवर्ती अरुणाचल प्रदेशक तवांग गेल छलाह”?
“हँ हँ, अनेको बेर”। अभिक फटाकसँ बहुत आत्मविश्वासक संग हमर प्रश्नक उत्तर देलन्हि। फेर ओऽ एहि बातकेँ स्पष्ट करए लगलाह, “देखू। दुनू स्थानक अपन-अपन महत्व छैक। तहिँ तुलना करब उचित नहि। पुनःश्च हम तवांग गेल छी, परन्तु नॉर्थ कछार हिल्स जयबाक अवसरसँ एखन धरि वंचित छी। ताहिँ एहि सम्बन्धमे कुनो टिप्पणी करब यथोचित नहि”।
हमरा दिस मुँह कय आँखिक भंगिमाकेँ हमरापर सत-प्रतिशत केन्द्रित करैत डॉ अभिक घोष हमर ध्यानकेँ अपन कथ्यपर आकर्षित करैत कहलाह, “कैलाशजी, अहाँ एहि विषयपर सोचबाक लेल एवं निर्णय लेबाक लेल सही आदमी छी। कारण अहाँ दुनू स्थान-तवांग आऽ नॉर्थ कछार हिल्स- केर चप्पा-चप्पा घुमल छी”।
हम डॉ अभिक घोषक बातपर अपन मूरी हिला देल। कनिक कालक बाद हम नॉर्थ कछार हिल्सक परिवेशमे एक बेर पुनः मानसिक रूपसँ पहुँचि गेलहुँ। जुआएल, पाकल, सुखाएल, कुम्हलाएल, अधपाकल, खिच्चा, कोमल, हरियर, गाँठसँ भरल झुण्डक-झुण्ड बाँसक बीट हमरा मोनमे स्मरण आबए लागल। कल-कल करैत टेढ़-टाढ़ नदी, सुन्दर हरियर पहाड़ी, नव बालक-बालिका, युवक, युवती एवं वृद्ध अपन परम्परागत बहुरंगी वस्त्रमे नचैत-गबैत विभोर भेल हमर मानस पटलपर रंगमंचक अद्वितीय नायक एवं नायिका जकाँ स्मरण होमय लागल; लागल जेना सरिपहुँ हम सेकेण्डोमे दिल्लीक शोरगुलसँ हजारो किलोमीटर दूर असम राज्य केर नॉर्थ-कछार हिल्समे पहुँचि गेलहुँ। की धरती, की पहाड़, की संस्कृति आऽ केहेन आत्मीय आऽ रमनगर लोक! जतेक प्रशंसा करी कम। अनुभूतिकेँ याद करैत आत्मिक प्रसन्नता होइत अछि।

यायावरीकेँ आगाँ बढ़बैत पुनः नॉर्थ कछार हिल्स चली।
बात बांसक करैत रही। साधारणतया ५०-६० वर्षक अन्तरालमे बांसमे एकाएक फूल आबय लगैत छैक। फूल केहेन तँ धानक धानक सीस जकाँ। दाना सेहो धाने जकाँ। फूल पकलाक बाद नीचाँ खसय लगैत छैक। मूस सभ ओहि फूलकेँ धान बुझि झुण्डक-झुण्डमे आबि ओकरा कुतरनाई प्रारम्भ कऽ दैत छैक। मूसक संख्या आवश्यकतासँ अधिक भऽ जाइत छैक। फलस्वरूप जखन धानक खेतीक समय होइत छैक, तखन जतेक धान लोक सभ बीयाक रूपमे बाऊग करैत अछि, मूस सभ एक-एकटा धानक बीयाकेँ खाऽ जाइत छैक। लाख प्रयासक बादो लोक धान उगेबामे असमर्थ भऽ जाइत अछि। परिणाम ई होइत छैक जे घोर अन्नक आपदा समस्त क्षेत्रमे व्याप्त भऽ जाइत छैक। एहि आपदासँ अरुणाचल प्रदेश आऽ सिक्किमकेँ छोड़ि लगभग समस्त उत्तर-पूर्व भारतक भू-भाग कहियो ने कहियो तवाह होइते टा अछि। हालांकि आइ काल्हि सरकारी मदति भेटैत छैक। कृषक सभ सेहो जागरुक भेल जाऽ रहल छथि; समय रहिते मूस मारबाक एवं मूसकेँ भगेबाक पूर्ण इन्तजाम कएल जाइत छैक। आब कल्पना कऽ सकैत छी जे एहेन विभिषिकासँ हानि कम हेतैक।

बांसक फुलेनाइक चर्चा करैत छी तँ अरुणाचल प्रदेशक चर्चा केनाई अनिवार्य। जेना कि बता चुकल छी जे एहि प्रदेशक लोक एहि विभिषिकासँ नहि प्रभावित होइत छथि। एकर कारण ई जे अरुणाचल प्रदेशक तमाम भू-भागक आदिवासी लोकनि मूस पकरबामे निपुण होइत छथि। एतबहि नहि मूस हिनका लोकनिक बहुत रुचिगर भोजन छन्हि। जखन हम लोअर दिवांग घाटी आऽ लोहित जिलामे भ्रमण करैत रही तँ लोक सभकेँ (विशेषण रूपेण इदू मिसमी, दिगारु मिसमी, मिजो-मिसमी तथा खामती जनजाति) मूसक शिकार करैत आऽ ओकर मांस खाइत देखलहुँ। एहि परम्पराक नीक परिणाम ई होइत छैक जे बांस फुलेलाक उपरान्तो मूसक जनसंख्यापर नियन्त्रण बनल रहैत छैक, आऽ एतय केर लोक बांस फुलेला उपरान्त होमय बला विभीषिकासँ बचल रहैत छथि।

हमरा लोकनि नॉर्थ कछार हिल्स केर तमाम जनजातिक स्त्रीगण सभकेँ जिलाक तमाम क्षेत्रसँ बजा समाजक विकास एवं सांस्कृतिक उन्नतिमे नारीक योगदानपर अलग-अलग जनजातिक महिलाकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ विचारसँ अपना-आपकेँ अवगत कराबय चाहैत रही। स्पष्ट कऽ दी जे ई एकमात्र कार्यक्रम नहि छल। अनेक कार्यक्रममे ईहो एकटा महत्वपूर्ण कार्यक्रम छल। एकर परिणामसँ हम गदगद भेल रही। ई कार्यक्रम पाँच दिन चलल। पाँचो दिन महिला लोकनि हमरा लोकनि केर अनुमानसँ ज्यादेक संख्यामे उपस्थित छलीह। सभ दिन अपन परम्परागत वस्त्र, आभूषण एवं दैनिक जीवनक रूपरेखा प्रस्तुत करैत। भेल जे श्रृंगारक जंगलमे छी। एहेन जंगल जकर कल्पना मात्र कैल जाऽ सकैत अछि। वास्तवमे एहेन रंगमंच- उत्साहमय आऽ जीवन्त जीवनक आऽ संस्कृतिक निर्माण असंभव। परन्तु छल तँ सत्य आऽ संभव भेल अनुपम दृश्य!

हरेक महिला समूहमे हमरा लोकनिक तीन-चारि कार्यकर्ता साक्षात्कार करबाक हेतु तथा अधिकसँ अधिक जानकारी प्राप्त करबाक हेतु तत्पर छलाह। एहि कार्यकर्ता लोकनि केर चुनाव हमरा लोकनि अपन सहयोगी-संस्था- श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सहयोगसँ केने रही। तमाम कार्यकर्ता स्थानीय छलाह एवं हॉफलोंग हिन्दी, अंग्रेजी आऽ असमिया भाषाकेँ झूरझार बाजैत आऽ लिखैत छलाह। कार्यकर्तामे आधासँ अधिक लड़की सभ छलीह।
हम प्रतिदिन प्रातः सभ समूहकेँ मुख्य हॉलमे बैसा अपन कार्यशालाक उद्देश्यक जानकारी सहभागी लोकनिकेँ दैत छलियन्हि। अगर किनको कुनो तरहक संशय रहल तँ तकरो निराकरण करबाक प्रयास करैत छलहुँ। अपन संस्कृति, संस्कार एवं संस्कारक नीक चीज एवं परम्पराक रक्षा आधुनिकताकेँ स्वीकारैत केना करी ताहिपर हम प्रभावपूर्ण ढंगसँ जोर दैत छलहुँ। हमरा एना बुझना जाइत छल जेना सहभागी महिला लोकनि एवं स्थानीय पत्रकार सभ हमरासँ प्रभावित छलाह। स्थानीय अखबारमे एवं टेलीविजनपर नित्य समाचार अबैत छल। प्रति दिन सांझमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक, आऽ अन्ततः भोजन (रात्रिक भोजन)सँ पहिने कार्यकर्ता लोकनि हमरा दिन भरिक क्रिया-कलापक सम्बन्धमे संक्षिप्त जानकारी दैत छलाह। ओहि जानकारीक आधारपर हम अगिला दिन की करी तकर निर्देश दैत छलियन्हि।

कार्यक्रम अपन पूर्ण गतिसँ चलि रहल छल। एक दिन साँझमे हम चाह पिबैत रही। ओतए दिमासा जनजातिक किछु महिला हमरा लग आबि निवेदन केलन्हि, “श्रीमान्! कनी हमरा लोकनिक कार्यशालामे चलब?”
हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य जाएब”। आऽ चाहक प्याला हाथमे लेने विदा भऽ गेलहुँ। हमर एहि व्यवहारसँ ओऽ सभ गदगद भऽ गेलीह।
जखन हम पहुँचलहुँ तँ ओतए केर माहौल दोसरे जकाँ रहैक। तीन स्थानीय पत्रकार अपन कैमरा संग आऽ एक टी.वी.पत्रकार गुवाहाटीसँ आयल छलाह। ई महिला लोकनि हमरा पत्रकारक समक्ष अपन परम्परामे हाथक बनाओल कलात्मक चद्दरिसँ स्वागत करक हेतु बजेने छलीह। हम एहि बातकेँ सुनि कनी घबरेलहुँ। कारण एहि तरहक परम्परामे हमरा नेतागिरी केर दुर्गन्ध बुझना जाइत अछि। परन्तु दिमासा महिला लोकनिक स्नेहकेँ अपमानित हम नहि करय चाहैत रही। ताहिं चद्दरिकेँ स्वीकार कएल। एकर बाद देखैत छी जे तमाम जनजाति समूहसँ दू-तीन महिला चद्दरि, गमछा आदि लय हमर स्वागत हेतु आयल छथि। लोकक स्नेह देखि मोन भरि आएल। सभसँ भेँट स्वीकार कएल। फेर सोचए लगलहुँ: “जखन ई सभ एतेक नीक छथि तँ आतंकवादी गति-विधि, खून-खरापा किएक? की समस्याक समाधान लोक सभसँ मिलि कऽ नहि भऽ सकैत अछि”? ई बात सोचए लगलहुँ। लोकक प्रेममे आकंठ भऽ गेलहुँ। अतबेमे कार्बी जनजाति समूहक तीन महिला अयलीह। ओऽ सभ कहलन्हि: “श्रीमान्, कनी हमरा सबहक कार्यशालामे पाँच मिनट हेतु चलबैक”?

हम बिना किछु कहने अपन मूरीकेँ स्वीकारात्मक अवस्थामे हिलबैत कार्बी महिला सबहक कार्यशाला दिस प्रस्थान केलहुँ”।
ओतए गेलाऽ पर दलक महिला लोकनि कहय लगलीह: “श्रीमान्, अहाँ लोकनि प्रथम बेर हमरा सभकेँ ई अवसर देलहुँ अछि जे हम सभ अपन समाज, अपन संस्कृति, अपन परम्परा दिस ताकी। परम्पराक ताकतिकेँ आँकी। एतए तँ इसाईयत, आधुनिकता, शिक्षा एवं आतंकवादक कारणेँ लोक सभ परम्परा बिसरल जाऽ रहल अछि। अपन जनजातिक ढंगसँ रहनाई, व्यवहार केनाई, खेनाई-पिनाई, गीत-नृत्य आदि तँ आजुक युगमे पिछड़ापनक निशानी छैक। किछु जनजातिक लोक जे इसाईयतकेँ अपन धर्म स्वीकार कऽ लेलन्हि अछि, तनिका लोकनिकेँ विवाह आदिक तमाम रीति क्रिश्चियन रीतिक अनुरूप करए पड़ैत छन्हि। गिरजाघरमे विवाह केनाई, आधुनिक वस्त्र अर्थात् पेन्ट-शर्ट पहिर कऽ विवाह केनाई। ओऽ लोकनि चाहैतो अपन जनजातिक सनातनीक परम्परासँ विवाह, जन्म-संस्कार एवं मृत्यु संस्कार नहि कऽ सकैत छथि। लेकिन अहाँक कार्यशालाक बाद हमरा लोकनि एहि तथ्यपर गंभीरतासँ विचार कऽ रहल छी। धर्म कुनो भऽ सकैत अछि, परन्तु स्थानीय परम्पराक पालन अवश्य हेबाक चाही। स्थानीय परम्परा धरती, एतए केर वातावरण, पानि, पहाड़, परिस्थिति जे अटूट रूपेँ जुड़ल छैक। ई सभ बात हमरा लोकनि अहीँ सबहक कारणेँ एहि कार्यशालाक माध्यमसँ बुझि सकलहुँ अछि”।

हम मोनहि मोन प्रसन्न भेलहुँ आऽ अपन संस्थाक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीक दूरदर्शितापर आश्चर्य होमए लागल हमरा। जखन-कखनो ओऽ हमरा एहि तरहेँ अनेक चीज संगे करय कहैत छथि, तखन हमरा बुझाइत छल जे ई हमरा मनुक्ख नहि सर्वशक्तिमान भगवान बनबय चाहैत छथि, जे कहियो सम्भव नहि थीक। एतेक चीज कहीं एक संगे संभव छैक? परन्तु आइ पता चलि गेल जे अगर नीक भावनासँ सही ढंगसँ कार्य कएल जाय तँ सभ किछु संभव छैक। ओहो मनुक्ख द्वारा। एहि हेतु भगवान बनक कुनो प्रयोजन नहि।
हम ई बात सोचि रहल छलहुँ। एकाएक एक परम्परागत परिधानमे सजल कार्बी महिला हमरा लग अयलीह आऽ कहलन्हि: “मिश्रा साहेब, एक बात कही”?
हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य कहू”?

ओऽ महिला बजलीह: “ अहाँ जखन संस्कृति इत्यादिक सम्बन्धमे हमरा लोकनिसँ बात करैत छी तँ बड्ड नीक लगैत अछि। आब हम सभ विचार केलहुँ अछि जे सप्ताहमे कमसँ कम एक दिन अपन परम्परागत वस्त्र एवं गहनामे अवश्य रहब। लेकिन एक चीज हमरा सभकेँ पहिले दिनसँ परेशान कऽ रहल अछि। अहाँ मिथिलासँ छी। पढ़ल-लिखल छी। समस्त भारतक परम्पराकेँ जनैत छी। परम्पराक नीक चीजकेँ पालन हो आऽ ओऽ चीज शाश्वत रहय ताहि लेल प्रयासरत छी। परन्तु अहाँ कहियो अपन परम्पराक वस्त्रमे हमरा सभ लग नहि अएलहुँ। हमरा सभकेँ एहि चीजसँ आश्चर्य भऽ रहल अछि। हमरा लोकनि एहि विषयपर काफी विचार-विमर्श कएल आऽ अन्ततः एहि निष्कर्षपर पहुँचलहुँ जे अहाँसँ एहि सम्बन्धमे बात करी। आशा अछि अहाँ हमरा लोकनिक भावनाकेँ सही अर्थमे लेब। एकरा अन्यथा नहि मानब”।

हम बिना कोनो देर केने अपन गलतीकेँ स्वीकार कऽ लेलहुँ। हम ओहि कार्बी महिलाकेँ कहलियन्हि: “ई हमर घोर गलती थीक। शायद दिल्ली शहरक जीवन चक्रमे फँसि हम अपन परम्परासँ दूर भऽ गेल छी। हमरा अहाँक विचार उत्तम लागल। अहाँ हमरा अपन मोनमे अपन मैथिली परम्परा आऽ संस्कारक प्रति घोर आस्था जाग्रत केलहुँ, ताहि लेल हम अहाँक प्रति हृदयसँ आभार व्यक्त करैत छी। अहाँ बातकेँ अन्यथा भला केना लऽ सकैत छी? हम अहाँकेँ वचन दैत छी, जे हम आब जतए कतहु जाएब एक जोड़ धोती-कुर्ता अवश्य लऽ जाएब आऽ कमसँ कम एक दिन अपन मिथिलाक परम्परागत परिधानमे अवश्य रहब”।
हमर एहि बातसँ ओऽ कार्बी महिला बड्ड प्रसन्न भेलीह। एकर बाद हम कार्बी कार्यशालासँ दिमासा जनजातिक कार्यशाला दिस गेलहुँ।
दिमासा जनजातिक महिला लोकनिक कार्यशालामे एहि बातपर चर्चा चलैत रहैक जे शहर (अर्थात् हॉफलोंग) केँ साफ एवं स्वच्छ रखबाक लेल महिला सभकेँ की करक चाही।

हम पुछलियन्हि: “अहाँ सभ एकटा बातक उत्तर दिअ। की एहि हॉफलौंग शहरमे गन्दगी नहि फैलैक, एतय मच्छड़ आदिक प्रकोप नहि हो, ट्रैफिक निअमक पालन होइक, ई कर्तव्य ककर छैक? सरकारक? प्रशासनक? पुरुषक? नेताक? आकि आनो ककरो? अहूँ लोकनिक अर्थात् एतय केर सजग महिला सभक सेहो”?
हमर एहि प्रश्नक उत्तर देमाक हेतु एक अधेर महिला अयलीह। ओऽ कहलन्हि: “श्रीमान् शहर तँ सबहक छैक। की महिला आऽ की पुरुष! एकटा उदाहरण हम एहि सम्बन्धमे देमय चाहैत छी। किछु दिन पूर्व हॉफलोंग शहरमे मलेरियाक भयंकर प्रकोप भेलैक। चारु कात गन्दगी पसरल रहैक। सड़कपर सफाई नहि। ककरो एहि बातक चिन्ता नहि। नॉर्थ कछार ऑटोनोमस काउन्सिलक अधिकारीगण एवं नेता लोकनिसँ दिमासा महिला एसोसिएशन केर सदस्य सभ बात केलन्हि तँ ओऽ लोकनि आश्वसन देलाह परन्तु ओहि आश्वासनपर कोनो कार्यवाही नहि केलन्हि। मलेरियाक कारणेँ स्त्रीगणक जीवन नर्क बनल छलैक। बच्चा सभ ज्यादे परेशान। बच्चाक कारणेँ मायो परेशान। की करु की नहि। अन्ततः हमरा लोकनि शहरक सफाई करक बीड़ा स्वयं अपना हाथमे लेल। करीब पचास महिला एकत्रित भेलहुँ। पच्चास टा बाढ़नि, पच्चास पथिया, पाँच कोदारि कीनल आऽ सफाई केर अभियानमे लागि गेलहुँ। सर्वप्रथम जिलाधिकारीक ऑफिसक बाहरक गन्दगीकेँ साफ करए लगलहुँ, फेर ऑटोनोमस काउन्सिलक दफ्तर, फेर शहरक रोड। सामान्य जनता सँ गीत गाबि-गाबि एवं अपन सफाई अभियानसँ शहरकेँ साफ रखबामे मदति करबाक निवेदन करय लगलहुँ। एक दिन तँ लोक सभ हमरा सभपर ध्यान नहि देलाह। परन्तु दोसर दिन पत्रकार सभ एहि बातकेँ उजागर केलन्हि आऽ सरकार, प्रशासन एवं नेताक अकर्मण्यताक बारेमे लिखय लगलाह। आब लोक सभकेँ एहसास भेलन्हि जे गलती भेल। तेसर दिन एकाएक समस्त प्रशासन साकांक्ष भऽ गेल आऽ चप्पा-चप्पामे सफाई होमए लगलैक। हमहूँ सभ जनता लोकनिसँ साफ एवं स्वच्छ रहबाक निवेदन करैत रहलहुँ। शहर हमर अछि तँ एकर ध्यानो हमरे सभकेँ राखए पड़त”।

दिमासा महिलाक एहि जवाबसँ लागल जे नीक चीजक श्रीगणेश संसारक छोटसँ छोट कोनसँ भऽ सकैत अछि। समाजमे जागृति लेबाक लेल महिला वर्गक योगदान अतुलनीय भऽ सकैत अछि। दिमासा महिला हमरा कहलन्हि: “श्रीमान्, हमरा लोकनिक आनो अनेक तरहक समाजक समस्या छैक जाहिपर एकजुट भए कार्य करए चाहैत छी। पुरुषक शराब पीनाई, एकसँ अधिक पत्नी रखनाई आदि किछु एहन विषय छैक जाहिपर हमरा लोकनि गम्भीरतासँ सोचि रहल छी”।
हम जवाब देलियन्हि: “अहाँ लोकनिक प्रयास प्रशंसनीय अछि। अहाँक प्रयोग प्रभावकारी अछि। एहि तरहक प्रयोग सूतल प्रशासन एवं अधिकारी सबहक निन्द खोलबाक नीक औषधि थीक। हमरासँ जतेक मदति संभव भऽ सकत से हम करब”।

ओऽ महिला कहलीह: “दिमासा महिला उत्थान समिति नामक एक संस्थाक गठन हमरा लोकनि केलहुँ अछि। एकरा हमरा लोकनि दिल्लीसँ अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे रजिस्ट्रेशन करबय चाहैत छी। एहि पंजीकरणमे अहाँक सहायता चाही। अगर पंजीकरण भऽ गेल तँ हमरा लोकनि अनेक तरहक कार्य करब”।
हम उत्तर देलियन्हि: “अहाँ लोकनि जखन चाही दिल्ली आबि जाऊ। हम दू-तीन दिनक भीतर अहाँ संस्थाक पंजीकरण अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे पंजाब रेगुलेशन एक्ट केर अन्तर्गत सोसाइटीक रूपमे करबा देब। एहिमे कोनो तरहक पैसा इत्यादि नहि लागत”।

दिमासाक बाद हम जेमि नागा महिला समूह द्वारा आयोजित कार्यशाला दिस बढ़लहुँ। जेमि नागाक सम्बन्धमे ई जानकारी देनाई उचित जे ई नागा मात्र असम टा मे रहि गेल अछि। आन राज्यमे तीन नागा मिलि एक जिलियांगरोंग (zeliangrong) बनि जाइत अछि। तहिँ नागा बहुल प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणीपुरमे एकर स्वतंत्र अस्तित्व नहि रहि जाइत छैक। सच पूछी तँ जेमि जनजातिक महिला सबहिक आभूषण एवं वस्त्र सभसँ आकर्षक आऽ मनोहारी लागल। जेमि महिला लोकनि कहलीह जे हुनकर सबहक अपन महिलाक संस्था छन्हि। संस्थाक उद्देश्य जेमि नागा समुदायमे अपन संस्कृति आऽ परम्पराक रक्षा केनाई छैक। एक उद्देश्य इहो जे एहि समुदायक लोक इसाईयतकेँ नहि स्वीकार कय अपन मूल जनजातीय धार्मिक मान्यता आऽ आस्थासँ जुड़ल रहथि। नागालैण्डमे लगभग ९५ प्रतिशत नागा समुदाय केर लोक इसाई भऽ चुकल छथि, स्थिति कमो-बेश मणीपुरक नागा समुदायक सेहो यैह छन्हि। परन्तु सौभाग्यसँ नॉर्थ कछार हिल्स केर जेमि नागाक अधिकांश परिवार एखनहुँ धरि अपन मूल मान्यता, धर्म, देवी-देवता, पूजा-पद्धति आदिसँ जुड़ल छथि।

जिमि नागा महिला समूहमे एकटा २७ वर्षीय अविवाहित युवती भेटलीह। हुनकासँ पताचलल जे जिमि नागाक महिला सभ अपन संस्कृतिक रक्षाक प्रति बड्ड सचेत छथि। ओऽ २७ वर्षीय नागा नायिका हमरा ईहो बतेलीह जे ओऽ तीन वर्ष धरि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर मुख्यालय नागपुरसँ प्रशिक्षण लय आयलि छथि।

हम कहलियन्हि: “अहाँकेँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर वातावरण केहन लागल? ओतए केर लोक सभ हिन्दू धर्मक प्रति अनेरे निष्ठा तँ नहि जगेबाक प्रयास कयलन्हि? एहि सभ कारणेँ अहाँकेँ अपन जनजातीय धार्मिक विश्वास आऽ रीति-रिवाजपर कोनो आघात तँ नहि पड़ल”?

हमर प्रश्नक उत्तर दैत नागा नायिका कहलन्हि: “की कहि रहल छी श्रीमान्! ओऽ लोकनि तँ हमरा सभकेँ हमेशा यैह कहलन्हि जे अपन मान्यता, धर्म, परम्परा आदिक त्याग नहि करू। अगर परम्परामे कोनो अन्ध-विश्वास अथवा विनाशकारी तत्व अछि तँ ओकर निदान अवश्य करू। जेना हमरा लोकनि परम्परासँ जानवर आदिक बलि चढ़बैत छी। ओऽ सभ कहैत छथिकि अगर संभव भऽ सकय तँ कमसँ कम मिथुन, साँढ़ या भैंसाक बलि दिअ। जिमि नागा समुदायमे बियाहल स्त्रीगण सिन्नूर नहि लगबैत छथि। फेर कोनो लड़कीकेँ देखि ई पता कोना लगाएल जाऽ सकैत अछि कि ई लड़की कुमारि अछि आकि व्याहता? परम्परागत संस्कृतिकेँ अगर पालन करी तँ ई बात सहजतासँ पता चलि जाइत अछि। परम्परा तँ ई छैक जे कुमारि कन्या विवाहसँ पहिने कपारक आगाँ किछु केशकेँ आधा कटा ओकरा कपारपर लटकबइत अछि। संगहि कनपटीपर केश विन्यास करैत अछि। एहिसँ सहजतासँ पता चलि जाइत छैक कि फलाँ-ने-फलाँ लड़की कुमारि थीकि”।

हम ओहि नागा नायिकासँ प्रश्न केलियन्हि: “अहाँ ई बताऊ जे व्याहता महिला केर पहचान फेर कोना होइत छन्हि”?
हमर प्रश्नक जवाब दैत ओऽ नागा नायिका कहय लगलीह: “विवाह होइते नागा महिला कपार परक केसकेँ कटेनाई बन्द कऽ दैत छथि आऽ केसकेँ कपारपर नहि लटका माथक सीथ दिस ऊपर कय बान्हय छथि। संगहि विवाह होइते मातरि नागा महिला कनपट्टी बला किछु लट दुनू कात कटा लैत छथि। एहिसँ कियोक सहजतासँ पता लगा सकैत अछि कि फलाँ ने फलाँ स्त्रीगण व्याहता थीकि”।

नागा नायिका फेर हमरा कहय लगलीह जे प्रतिवर्ष समस्त बराक घाटी आऽ नॉर्थ कछार पहाड़ी केर जेमि नागा लोकनिक महिला सभ जनवरी-फरवरी मासमे कोनो दिन कोनो-ने-कोनो जिमि नागा गाँवमे जुटान करैत छथि। मर्दक कोनो प्रयोजन नहि। प्रत्येक जिमि नागा गामक महिला सभमे एक प्रधान, एक सहायक तथा एक ट्रेजरार होइत छथि। मर्दक कार्य केवल एतेक जे शामियाना लाबथि, स्टेज बनाबय इत्यादिमे महिला लोकनिकेँ मदत करथि। हजारक संख्यामे स्त्रीगण सभ अबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहबाक एवं खेबाक इन्तजाम गामक महिला सभ करैत छथि। प्रत्येक घरमे तीन-चारि या सामर्थ्यक हिसाबे कम-ज्यादे महिला सभ रहि जाइत छथि, जाय कालमे अतिथि गामक महिला सभकेँ अपना संगे आनल चाऊर, किछु पाई, हरियर तरकारी आदिक संग किछु पाई दऽ दैत छथिन्ह। एहिसँ ककरोपर कोनो अनेर भार नहि पड़ैत छैक। प्रत्येक वर्ष नव पदाधिकारीक चुनाव होइत छैक, एवं अगिला वर्षक जुटान कोन गाममे हैत तकर निर्णय सेहो लेल जाइत छैक।

एहि महिला सभाक उद्देश्य मूल रूपेण परम्परागत जिमि नागा जनजातिक परम्पराकेँ महिला लोकनिक माध्यमसँ बचेबाक थीक। ई सभा एक सांस्कृतिक जनचेतना थीक। एकर सूत्रधार छलीह महान स्वतंत्रता सेनानी आऽ परम गम्भीर, चतुर्मुख प्रतिभासँ सम्पन्न जेलियांगरोंग नागा समुदायक रानी गैदीन्लयू (Gaidinliu)। गैदीन्ल्यूक जन्म आजुक मणीपुर प्रान्तमे २६ जनवरी १९१५ ई. मे भेल छ्लन्हि। हुनकर गाम तामेंगलोंग जिला अन्तर्गत तौसेम सब-डिवीजनमे छन्हि। गामक नाम लोंगकाओ छैक।

कहल जाइत छैक कि प्रारम्भहिसँ गैदीन्ल्यू जिनका कि स्थानीय लोक सभ रानी माँ कहैत छन्हि, बहुत प्रतिभासम्पन्न आओर साहसी छलीह। ब्रिटिश सरकारक सामाजिक आर राजनैतिक क्रिया-कलाप देखि तेरह वर्षक छोट अवस्थामे रानी माँ विचलित भऽ गेलीह आऽ एकरा विरुद्ध संघर्षक बिगुल बजेबाक प्लान करए लगलीह। किंवदन्ती तँ ई छैक जे छोटे उमरिमे रानी माँ मे दैविक शक्ति प्रवेश कऽ गेलन्हि। हुनकर एहि आश्चर्यजनक शक्तिक भान सर्वप्रथम हुनक पिताकेँ भेलन्हि। रानी माँ के तेरहम अवस्थामे पहुँचैत एहि बातक अनुभूति होमय लगलन्हि जे अंग्रेज सभ प्रशासनके मादे आऽ पुनः क्रिश्चियन मिशिनरी केर माध्यमसँ आजुक तीन उत्तरपूर्वी राज्य- असम, नागालैण्ड आऽ मणीपुर- केर नागा जनजातिक तमाम उपजाति सबहक संस्कृति, संस्कार आऽ परम्पराक नाश कऽ रहल अछि। ठीक ओही क्षण रानी माँ हैपु जदोनांग नामक नागा विद्रोहीसँ भेँट केलन्हि। जदोनांग रानी माँ केँ बतेलखिन्ह जे केना क्रिश्चियन मिशिनरीक लोक सभ स्थानीय संस्कृति आऽ संस्कारक सर्वनाश कऽ रहल अछि। जदोनांग महोदयक दर्शनसँ प्रभावती भय रानी माँ हुनकर परम अनुयायी भऽ गेलीह। फेर की छल १९२७ ई. मे एकाएक लोक सभ आन्दोलन प्रारम्भ कऽ देलक। रानी माँ ओहि आन्दोलन केर प्रमुख सूत्रधारमे एक छलीह। लोक सभ एकाएक अंग्रेजक शुल्क आऽ बलपूर्वक बेगारीक प्रथाक विरोध करय लागल। सबतरि हड़ताल पडि गेलैक। धीरे-धीरे चारि-पांच वर्षमे आन्दोलन अपन पराकाष्ठापर चढ़ि गेल। दुर्भाग्यसँ ओहि समय हैपू जदोनांगकेँ अंग्रेज सभ छलसँ कैद कऽ लेलकन्हि आऽ कनिकबे दिनक बाद २९ अगस्त १९३१ ई. मे आजुक मणीपुर राज्यक राजधानी इम्फालमे फाँसीपर निर्दयतापूर्ण ढंगसँ चढ़ा देलकन्हि। एहि घटनासँ रानी माँ बड्ड दुखी भेलीह, परन्तु अपन निश्चय पर चट्टान जकाँ ठाढ़ि छलीह।

आब आन्दोलन केर समस्त कमान रानी माँ के हाथमे आबि गेलन्हि। कतेक ठाम हुनकर गुरिल्लानुमा अनुयायी सभ अंग्रेज सभकेँ पश्त कएलक। अंग्रेज सिपाही सभ रानी माँ के युद्ध कौशलसँ त्राहि-त्राहि करय लागल। अही नॉर्थ कछार धरतीक हंगरुम नामक गाममेअंग्रेज सिपाही आऽ रानी माँक समर्थकक बीच भयानक संघर्ष भेलैक। बादमे घोर तामसमे आबि अंग्रेज सभ समस्त गामकेँ आगिमे झोँकि देलकैक। जान-मालक बड्ड क्षति पहुँचलैक। एतबहि नहि अंग्रेज अधिकारी लोकनि एक गुप्त मीटिंग केलन्हि जाहिमे ई निर्णय लेल गेलैक जे कियोक रानी माँक हुलिया बताओत तकरा प्रशासन दिससँ पाँच सय टका इनाम देल जेतैक। परन्तु रानी माँक प्रति कछार हिल्स, मणीपुर तथा नागालैण्डक लोककेँ बड्ड श्रद्धा छलैक। दुर्भाग्यसँ वर्तमान नागालैण्ड प्रान्तक पोइलवा गाम सँ १७ अक्टूबर १९३२ ई. मे अंग्रेज सैनिक रानी माँ केँ बन्दी बना लेलकन्हि। एहि सैन्य टुकड़ीक संचालन कैप्टन मैकडोनाल्ड करैत छलाह।

रानी माँक दुनू हाथ बान्हि देल गेलन्हि। रौदमे बान्हल हाथ उठेने ठाढ़ छलीह। एक रस्ता चलैत बूढ़केँ नीक नहि लगलन्हि। तमसा कऽ बाजि उठलाह: “सर्वनाश हो अहाँ लोकनिकें। लाजे मरि नहि होइत अछि। एक महिलाक दुनू हाथ बान्हि ऊपर उठेने छी। मर्द छी तँ हाथ खोलि दियौक”?

ताहिपर अंग्रेज सिपाही बूढ़ापर चिचिआए लगलन्हि। बूढ़ो आव देखलाह ने ताव। उठेलन्हि एकटा पाथर आऽ प्रहार कऽ देलन्हि। संयोगसँ अंग्रेज सिपाही बचि गेल। तुरतहि बूढ़ाकेँ कैद कऽ लेलकन्हि। तीन मासक बाद बूढ़ाक उम्रकेँ ध्यानमे रखैत हुनका जेहलसँ रिहा कऽ देल गेलन्हि। रानी माँ इम्फाल, तूरा, कोहिमा आऽ शिलांगक जेहलमे अपन समय बिताबय लगलीह।

१९३७ ई. मे पण्डित जवाहर लाल नेहरू रानी माँ सँ शिलांगक जेहेलमे भेंट केलथिन्ह आऽ हुनका प्रति अपन सम्वेदना व्यक्त केलाह। हुनका जेहलसँ बाहर निकालबाक प्रयास सेहो पण्डितजी करय लगलाह। नेहरू जी रानी माँकेँ पहाड़ीक बेटीक संज्ञा देलथिन्ह आऽ हुनकर नामक संग सर्वप्रथम रानी जोड़ि देलथिन्ह। नेहरू जी रानी माँक तुलना जॉन ऑफ आर्क आऽ रानी लक्ष्मीबाई सँ केलथिन्ह। हालांकि रानी माँ केँ छोड़ेबामे नेहरूजी असमर्थ रहलाह।
अन्ततः भारतक आजादी भेटलाक उपरान्त १४ अक्टूबर १९४७ ई. मे लगभग १५ वर्ष विभिन्न जेलमे रहलाक बाद रानीमाँ आजाद भेलीह।

हालांकि किछु वर्षक बाद रानी माँ अपन जनजातीय धर्म एवं संस्कारपर क्रिश्चियन संस्था द्वारा आघात बर्दाश्त नहि केलन्हि आऽ पुनः अण्डरग्राउण्ड भय संघर्ष करय लगलीह। १९६० ई मे सेहो हुनकर लगभग ३०० समर्थकक जान चलि गेलन्हि। बादमे रानी माँकेँ १९७२ ई. मे ताम्रपत्र स्वतन्त्रता सेनानी अवार्ड, १९८१ मे पद्म भूषण आर १९८३ मे विवेकानन्द सेवा अवार्ड देल गेलन्हि।
अन्ततः १७ फरबरी १९९३ केँ लगभग ७८ वर्षक अवस्थामे रानी माँ पंच तत्वमे विलीन भऽ गेलीह।

एखनहुँ धरि स्त्रीगण सभ (विशेष तौरपर नॉर्थ कछार हिल्स केर जिमि नागा जनजातिक स्त्रीगण) सभ रानी माँ केँ सामाजिक आऽ राजनैतिक चेतनाक मन्त्रकेँ स्मरण करैत अपन संस्कृति आऽ सभ्यताक रक्षामे लागलि छथि।
नॉर्थ कछार हिल्समे अनेको तरहक प्रयोग हमरा लोकनि कएल। आन प्रयोग सभ पूर्णतः शैक्षणिक आऽ दार्शनिक छल। तँहि पाठकसँ ओहि विषय सभपर चर्चा कय हम अनेरे बोर नहि करय चाहैत छियन्हि। नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक यायावरीकेँ एतय अन्त कऽ रहल छी।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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