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‘विदेह’ १ अगस्त २००८ ( वर्ष १ मास ८ अंक १५ )- part-II

In 'विदेह' १ अगस्त २००८ ( वर्ष १ मास ८ अंक १५ ) - part_I on अक्टूबर 26, 2008 at 9:14 पूर्वाह्न

‘विदेह’ १ अगस्त २००८ ( वर्ष १ मास ८ अंक १५ )- part-II
कथा

रामपुरे सुब्रह्मण्यं शास्त्री इति कश्चन् गृहस्थः आसीत्। तस्य पत्नी शान्ता। तद्द्वौयो अपि सर्वदा अपि कलहः कुरुतः स्म। एतेन् पार्श्वगृहस्याः सर्वे बहुकष्टः अनुभवन्ति स्म। एकदा तम् ग्रामं कश्चन् योगीश्वरः आगतवान्। सः सिद्धिम् प्राप्तवान् इति वार्त्ता सर्वत्र प्रश्रुता। तदा शान्ता तत्र गत्वा योगीश्वरं दृष्टवती। सा वदति- भोः महात्मन्। अस्माकं गृहे सर्वदा कोलाहलः भवति। एतेन् अहं बहुकष्टम् अनुभवामि। पार्श्वे सर्वे जनाः माम् उपहसन्ति। अतः एतस्य निवारणं कृपया वदतु। तदा योगीश्वरः नेत्रे निमील्य किंचित् कालम् उपविष्टवान्। अनन्तरम् उक्तवान्- भद्रे चिन्तां न करोतु। एतस्य परिहारम् अहं वदामि। अहं भवत्यै दिव्यं जलं ददामि। भवती गृहं गत्वा एतद् जलं पत्युः आगमनात् पूर्वं मुखे स्थापयित्वा उपविशतु। अनन्तरं योगीश्वरः जलं दत्तवान्। शान्ता गृहं गतवती। पत्युः आगमनात् पूर्वं जलं मुखे स्थापयित्वा उपविष्टवती। सायंकाले सुब्रमन्यः सर्वाणि कार्याणि समाप्य गृहम् आगतवान्। यदा गृहम् आगतवान् तदा शान्ता तस्मै पानीयं दत्तवती। पानीयं पीत्वा सः कोपेन् उक्तवान्- एतद् किं पानीयम्- एतद् पातुम् एव न शक्यते। अनन्तरं सः बहिः गतवान्- उपविष्टवान्। यद्यपि शान्तायाः कोपः आगतः तथापि सा मौनम् उपविष्टवती- यतः तस्याः मुखे योगीश्वरेण दत्तं दिव्यं जलम् आसीत्। एवमेव कानिचन् दिनानि अतीतानि। तेषां गृहे कोलाहलः एव न श्रुयति स्म। एतेन् पार्श्व गृहस्याः सर्वे संतोषम् अनुभवन्ति स्म। एक मासानन्तरं योगश्वरं दत्तं जलं समाप्तम्। अनन्तरं शान्ता योगीश्वरस्य समीपं गतवती- उक्तवती- भोः स्वामी। जलं सर्वं समाप्तम् अस्ति। अतः पुनः दिव्यं जलं ददातु।
तदा योगीश्वरः मन्दहासपूर्वकम् उक्तवान्- मया दत्तं जलं सामान्यं जलम् एव। भवती यदा जलं पूरयित्वा उपविशति स्म तदा किमपि वक्तुम न शक्नोति स्म। एतेन भवत्याः पतिः अपि किमपि वक्तुं न शक्नोति स्म। यथा एकेन् हस्तेन् करतारणं न भवति तथा एकेन् अपि कलहं न कर्तुं शक्यते। तथा एव अहं श्रेष्टः, अहं श्रेयाम् इत्यपि स्पर्धा अपि न भवति। एतेन् गृहे शान्तिः भवति। योगीश्वरस्य एतद् वचनं श्रुत्वा संतुष्टा शान्ता गृहं प्रत्यागतवती।
(अनुवर्तते)
मिथिला कला(आँगा)
चित्रकार- तूलिका, ग्राम-रुद्रपुर, भाया-आन्ध्रा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी।

एक बेर कुबेर कोनहुना लक्ष्मीकेँ पत्नीक रूपमे प्राप्त कए लेलन्हि आऽ हुनका लेल समुद्रमे एकटा’कोवर’ घर बनेने रहथि। कोबर चित्रमे पुरैनक पात, पुष्पित बांस, मत्स्य,सांप, काछु, नवग्रह, शंख आदिक प्रयोग होइत अछि। धारावाहिक रूपें विभिन्न प्रकारक कोबरक चित्र देल जायत। एहि अंकमे कोबर (पुरैन) देल जाऽ रहल अछि।

अनुवर्तते)
डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।
भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि।

संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि।

आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि।
मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि।
पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि।

शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि।

शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि।

शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि।

अनुश्रुतिक अनुसार शिव मिथिलांचलक सर्वलोकप्रिय देवता छथि। गामे-गाम शिवक पूजन होइत अछि। ओ प्रागेतिहासिक, पौराणिक ओ लोकदेवता छथि। शास्त्र, पुराण, तंत्र, योग आदि ग्रंथसभमे हिनक माहात्म्य ओ दर्शन पाओल जाइछ। शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिलिंगसभक विशाल भारतक धार्मिक एकताकेँ रेखांकित करैत अछि, तहिना काशी ओ मिथिलाक परिकल्पित परिक्रमाक अवधारणा आलोच्य शिवक्षेत्रकेँ महिमामंडन करैत अछि।

शिवक पश्चात् विष्णुपूजनक प्रधानता मिथिलांचलमे अछि। तद्विषयक पुरातात्विक प्रमाणस्वरूप स्थापत्य (मंदिर) ओ मूर्तिसभ एहि विशाल भूभागमे उपलभ्य अछि। एहिठामक जनजीवनमे वैष्णवधर्मिताक साक्षात् दर्शन पंचदेवोपासनामे विष्णुपूजन भस्मी त्रिपुण्डक संगे चन्दन तिलक, रामनवमी, विवाह-पंचमी, जन्माष्टमी, सत्यनारायणपूजा आदि वैष्णवधर्मी अनुष्ठान, चतुःशंख अरिपन, अष्टदल अरिपनक विन्यास, वैष्णवधर्मी कीर्तनिया नाच आदिमे होइत अछि। गुप्तकालमे वैष्णव धर्मकेँ राजकीय संरक्षण प्राप्त भेने ओ अपन उत्कर्षपर छल। तत्युगीन वैष्णवधर्मी पुराणसभमे हिनक महिमा मंडन भेल अछि। विष्णु द्विभुजीसँ चतुर्भुजी भेलाह। समुद्रमंथनसँ प्राप्त लक्ष्मीकेँ हुनक सेवामे लगाओल गेलनि। लक्ष्मीनारायणक परिकल्पना कयल गेल। शेषशायी विष्णुक परिकल्पनाकेँ प्रस्तर शिल्पमे उत्कीर्ण कयल गेल। दशावतारक महिमा मंडनक क्रममे वराह अवतार ओ नरसिंह अवतारक मूर्तिसभ अपेक्षाकृत बेसी पाओल जाइछ। गुप्त राजा लोकनि वराह अवतारक माध्यमे पृथ्वी (साम्राज्य) उद्धारक रूपेँ प्रतीकित कयलनि। मिथिलांचलमे वराह अवतारक एकटा मध्यकालीन सुन्दर प्रस्तर मूर्ति तिलकेश्वरगढ़ (दरभंगा)सँ प्राप्त भेल अछि, जे सम्प्रति चन्द्रधारी राजकीय संग्रहालय (दरभंगा)मे संरक्षित अछि। तहिना नरसिंह अवतारक अभिशिल्पन दुष्टदलनक संदर्भमे कयल गेल, मुदा मिथिलांचलसँ एहि तरहक मूर्ति अप्राप्त अछि। मिथिलांचलमे गुप्त शासनकालसँ पाल-सेन ओ कर्णाट काल धरि वैष्णवधर्मी मूर्ति सभक निर्माण ओ प्रतिष्ठा व्यापक रूपेँ कयल गेल। पालवंशी राजा लोकनिक शासनकालमे यद्यपि सर्वधर्म समभावक (बौद्धमूर्ति अभिशिल्पनक कारणे) प्रधानता छल, मुदा सेन ओ कर्णाट शासन कालमे वैष्णव धर्मकेँ धार्मिक नवजागरणक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। जयदेव, चैतन्य, विद्यापति, चण्डीदास, शंकरदेव आदि एहि सांस्कृतिक युगक साक्षात् वैष्णवधर्मी चेतना पुरुष छलाह, जनिका माध्यमे जनजीवन धरि आन्दोलित भेल।
विष्णुक उल्लेख वेदमे पाओल जाइछ। मुदा पहिने ओ सूर्यक एकटा रूप छलाह। पाछाँ चलि कए एकटा प्रमुख देवता बनि गेलाह। बसाढ़ (वैशाली)क पुरातात्विक उत्खननसँ प्राप्त एकटा माटिक मोहरपर उत्कीर्ण त्रिशूलक अगल-बगलमे शंख ओ चक्र उत्कीर्ण अछि, ई निसंदेह विष्णु प्रतीक थिक। सम्भवतः ओ शिव ओ विष्णुक साहचर्यक सद्भाव प्रतीक अछि। एकटा दोसर मोहरपर उत्कीर्ण वेदीपर राखल चक्रक दुनूदिस शंख उत्कीर्ण अछि, जे निसंदेह वैष्णवधर्मी प्रतीक अछि। ई सभ गुप्तकालीन पुरावशेष अछि। विष्णुक मूर्ति विभिन्न आकार-प्रकारमे बनल मिथिलांचलमे प्राप्त होइछ।, जाहिमे द्विभुजी विष्णुक एक हाथमे शंख ओ दोसर वर मुद्रामे अछि। एहि रूपमे लोकपाल कहल जाइछ। एहितरहक एकटा विशाल विष्णुमूर्ति तिरहुतक कर्णाटकालीन राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ)मे प्राप्त अछि। सिमरौनागढ़मे विष्णुक बहुतरास आदमकद चतुर्भुजी प्रतिमा सभ कंकाली मन्दिरक परिसरमे राखल अछि। विष्णुक माथपर किरीट ओ हाथसभमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्म छाजीत छनि।

मिथिलांचलमे चतुर्भुजी विष्णुक पाल, सेन ओ कर्णाटकालीन पाठरक मूर्तिसभ हुलासपट्टी, भीठभगवानपुर, अन्धरा ठाढ़ी, बिदेश्वर, भवानीपुर, जितवारपुर, जयनगर, नरार, अकौर, हावी भौआर, हावीडीह, पोखराम, लदहो, रखवारी, कनहई, कोर्थ, सोनहद, वोरवा, तुमौल, नेहरा, कुर्सो नदियामी, मदरीया, केवटी, भैरव बलिया, बसुदेवा, हाजीपुर, सोनपुर, सेहान आदिक अतिरिक्त सांस्कृतिक मिथिलांचलक सीमान्त क्षेत्र वाल्मीकिनगर (नेपाल तराइ) मे बहुतरास आदमकद विष्णु मूर्ति सभ प्राप्त भेल अछि। संख्यात्मक ओ गुणात्मक दृष्टिसँ विष्णुक सर्वाधिक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभ मिथिलांचलक अकौर नेपाल तराइक समरौनागढ़ ओ वाल्मीकिनगरमे प्राप्त अछि, जाहिसँ ई निष्कर्ष निकालल जा सकैछ जे ओ सभ वैष्णवधर्मक क्षेत्रमे प्रमुख स्थल छल। अकौर गाममे विष्णुक छहटा प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभ सहजेँ उत्खनित भए प्राप्त भेल अछि। डॉ. सत्येन्द्र कुमार झा डुमरा परसा (मधुबनी)क एकटा विलक्षण विष्णु मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। चारि फीटक एहि मूर्तिक माथपर किरीटक स्थानपर नागफण (सत्ताइस)क अलंकरण कयल गेल अछि, जे शेषनागक प्रतीक अछि। एहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि। सभटा प्रतिमामे विष्णु स्थानक मुद्रामे बनल छथि ओ हुनक पार्श्ववाहिनी रूपेँ चँवरधारिणी लक्ष्मी ओ वीणाधारिणी सरस्वती उत्कीर्ण छथि। पूर्व मध्यकालमे वैष्णव धर्म एहि क्षेत्रक एकटा लोकप्रिय सम्प्रदाय छल।

विष्णुक एहि परम्परित स्वरूपक क्रममे किछु ऐतिहासिक विशिष्ट मूर्ति शिल्प प्राप्त भेल अछि। पहिल वसुदेवा (सिंगिया, समस्तीपुर)सँ प्राप्त विष्णुक वासुदेव रूप। चतुर्भुजी वासुदेवक हाथसभमे अग्निपुराण (अध्याय चौवालिस)क अनुसार उपरक हाथसभमे शंख-चक्र ओ निचलकामे गदा-कमल बनल अछि। माथपर किरीट ओ गलामे ठेहुन धरि वनमालाक अलंकरण। मुख्य मूर्तिक पार्श्व भागमे अनेक देवी-देवता सभ उत्कीर्ण छथि। दोसर अछि अवाम (उजान लग, दरभंगा)क शेषशायी विष्णु (४७” * २६”)। एहिमे शेषशय्यापर विश्राम करैत विष्णुक पैर दाबि रहल छथिन लक्ष्मी। नाभिसँ निकलल नाल कमलपर बैसल छथि ब्रह्मा। तेसर प्रतिमा अछि तिलकेश्वर ( दरभंगा)सँ प्राप्त वराह विष्णु (३४”)। वीर भावमे ठाढ़ एहि चतुर्भुजी मूर्तिक चारूहाथमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्मक अतिरिक्त वाम स्कंधपर पृथ्वी बैसल छथि, जनिक उद्धार विष्णु वराह अवतारक रूपेँ कयलनि। वराहविष्णुक पादभागमे नागदेवी सभ हाथमे क्षत्र ओ कमल धयने छथि। वराह अवतारक एकमात्र स्वतंत्र प्रतिमा एकटा दुर्लभ ओ ऐतिहासिक उपलब्धि मानल जाइछ। तिलकेश्वर महादेव मन्दिरक द्वारखण्डपर कर्मादित्यक शिलालेख तिरहुतामे उत्कीर्ण अछि। संगमपर स्थापित एहि महादेवस्थानमे शिवरात्रिक मेला लगैत अछि। चारिम विष्णु-मूर्तिक एकटा ऐतिहासिक स्वरूप सेहान (वैशाली)सँ प्राप्त अछि, जे मध्यकालीन तिरहुत शैलीमे निर्मित मंदिरमे स्थापित ओ पूजित अछि। सेहानक विष्णु श्रीरामक रूपमे पूजित छथि। रामनवमीक अवसरपर एकटा विशाल मेला लगैत अछि। मूर्ति पालकालीन अछि। जनश्रुतिक अनुसार नरसिंह अवतारक एकटा स्थान पूर्णियाँ जिलाक मानिकथंभ (माणिक स्तंभ) नामक ग्राममे प्राप्त अछि, मुदा मूर्ति नहि अछि। मुदा कटिहार जिलाक वेलंदाक प्राचीन विष्णु मंदिर अपन जर्जर अवस्थामे प्राप्त अछि। एहि तरहेँ वैष्णव धर्मक व्याप्ति वाल्मीकि नगरीसँ लऽ कऽ कटिहार धरि देखना जाइछ। एहि क्रमे पाँचम उपलब्धि सोनपुर (सारण)क कालीमन्दिरक भीतमे अवस्थित एकटा मूर्ति फलक गरुड़वाही विष्णुक अछि, जाहिमे भगवान विष्णु गरुड़पर आरुढ़ भए हरिहरक्षेत्रक गजग्राह युद्धक समापनक लेल गजक आर्तपुकारपर आयल छलाह। सोनपुर हरि (विष्णु) हर (शिव)क नामित क्षेत्र मानल जाइछ। एवं प्रकारे मिथिलांचलमे विष्णुपूजन अनेक रूपमे उपलब्ध अछि।

सूर्य वैदिक देवता ओ विष्णुक एकटा प्रतिरूप जकाँ पूजित छथि, मुदा ओ पंचदेवोपासनामे विशेष रूपमे प्रतिष्ठित छथि। मिथिलांचलमे सूर्यक वैदिक, पौराणिक ओ लौकिक तीनोक समन्वित रूप जनमानसपर अंकित अछि। सूर्यक स्थानक रूपक परिकल्पना मुख्यतः कुषाणकालमे मूर्त भेल। तदनुसार रथारूढ़ सूर्यक माथपर किरीट, दुनू हाथमे कमल-पुष्प, वाम भागक कमरसँ लटकैत तलवार हुनक मुख्य रूप छनि। कालान्तरमे पार्श्वदेवी देवताक अलंकरण सेहो विन्यस्त छल। पार्श्व देवताक रूपमे एक दिस दवात लेने पिंगल ओ दोसर दिस दण्ड लेने दण्डी। पैरमे लम्बा बूट ओ देह रक्षार्थ कवच, पैरक आगाँ बैसल रथवाहक अरुण। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्यूषा उत्कीर्ण अछि। मिथिलंचलमे अनेक मध्यकालीन सूर्य मूर्ति सभ बरौनी जयमंगलगढ़ (बेगुसराय) भीठ भगवानपुर (मधुबनी), अन्धरा-ठाढ़ी (कमलादित्य, मधुबनी), देकुली, असगाँव-धर्मपुर (दरभंगा), कुर्सो नदियामी, रखबारी, परसा, भोज परौल, रतनपुर, विष्णु बरुआर, गाण्डीवेश्वर स्थान, सवास, छर्रापट्टी, अरई, कोर्थ, हावीडीह, डिलाही, नाहर भगवतीपुर, राजनगर, पस्टन, पटला, जगदीशपुर, देवपुरा आदिक अलावा चकवेदौलिया (बेगुसराय), तैयबपुर (वैशाली) आदि स्थान सभमे पाओल गेल एवं ओ प्रतिष्ठित-पूजित छथि। एहि ऐतिहासिक सूर्य प्रतिमा सभमे विशेष उल्लेखनीय अछि- परसा (झंझारपुर, मधुबनी)क सूर्य मूर्ति (४८*२४ सेमी.) जे प्रायः तेरहम सदीक कलाकृति अछि। ओ पालकालीन अलंकरणसँ बनल अछि। दोसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति विष्णु बरुआर (मधुबनी)क अछि, जकरा द्वादश आदित्यक संज्ञा देल जाइछ। एहि मूर्तिमे द्वादश आदित्य उत्कीर्ण छथि। तेसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति अछि, देवपुरा (बेनीपट्टी, मधुबनी) ओ रघेपुरा (दरभंगा)क जाहिमे देवपुराक मूर्तिमे उषा-प्रत्यूषा, दण्ड-पिंगलसँ अलंकृत तथा रघेपुराक सूर्यमूर्ति पालमूर्ति कलासँ भिन्न मिथिला शैलीमे निर्मित अछि। ई सभटा सूर्यमूर्ति पंच्देवोपासनाक एकटा प्रतीक रूपमे पोजित छथि, यद्यपि जनजीवनमे सूर्य पूजा छठीमइयाक रूपमे परम्परीत अछि। मिथिलांचलक चक वेदौलिया (बेगुसराय)मे एकटा प्राचीन सूर्यमन्दिरक प्राप्तिसँ ई धारणा बनैत अछि, जे ओ स्वतंत्र रूपेँ सेहो पूजित होइत छलाह। कन्दाहा सहरसा)मे सेहो एकटा स्वतंत्र ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर अवशिष्ट अछि। सूर्य मूर्तिक प्रभावलीमे उत्कीर्ण अभिलेख स्वयं अपन ऐतिहासिक अस्तित्वक चर्च करैत अछि। अभिलेख नरसिंहदेवक अछि। ओऽ ओइनवार वंशीय छलाह।

पंचदेवोपासनाक मूलमे भगवती केन्द्रित छथि आर मिथिलांचल शाक्तभूमि अथवा शाक्तपीठक रूपमे साधनाभूमि शताब्दियहुसँ बनल अछि। मिथिलांचलमे भगवती अपन अनेक रूपमे मूर्त भए पूजित छथि। वनगाँव-महिषीक उग्रतारा, विराटपुरक चण्डी, धमदाहाक कात्यानी (सहरसा जिलान्तर्गत) क अतिरिक्त उच्चैठ, फुलहर (मधुबनी), करियन समस्तीपुरक गिरीजा, मिरजापुर-दरभंगाक म्लेच्छमर्दिनी, कोइलखक भद्रकाली भगवती, वारी(समस्तीपुर)क भगवती तारा, अन्दामा (दरभंगा)क म्लेच्छमर्दिनी, जरैल-परसौन, कोइलख, भवानीपुर, भण्डारिसम (दरभंगा), भोजपरौल (मधुबनी), कोर्थ (दरभंगा)क काली, देकुली (दरभंगा)क भगवती, बहेड़ी ओ नाहरक महिषासुर मर्दिनी, कटरा (मुजफ्फरपुर) ओ कोइलख (महुबनी)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ) ओ वीरपुर (सहरसा)क कंकाली, सखड़ाक (नेपाल तराइ) छिन्नमस्ता एवं गढ़बरुआरी (सहरसा) ओ भीठभगवानपुर (मधुबनी)क दशमहाविद्यामे परिगणित देवी सभ प्रतिष्ठित ओ पूजित छथि। हम पुनामा-प्रतापनगर (नवगछिया)मे वाराहीक एकटा भव्य, विशाल ओ स्वतंत्र मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। भीठ-भगवानपुर ओ गढ़ बरुआरीक दशमहाविद्या कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भीठ-भगवानपुर कर्णाटराजा मल्लदेवक राजधानीनगर छल एवं गढ़वरुआरी कर्णाटवंशीय गन्धवरिया परमार राजपूत सभक क्षेत्र अछि। डॉ. हीरानन्द आचार्य राजनगर (मधुबनी)मे सेहो दशमहाविद्या भगवतीक मन्दिरक सूचना देने छथि। दशमहाविद्याक पूजोपासना तांत्रिक विधियेँ कयल जाइछ। जयनगरक मन्दिरक ऊपरी भागमे श्रीयन्त्र राखल छल। ध्यातव्य अछि जे खण्डवला कुलक राजा लोकनि शाक्तधर्मी छलाह। दरभंगा राज परिसरक श्यामा मन्दिर “मिथिलेश रमेशस्य चितायां सुप्रतिष्ठा’ चर्चिता साधना पीठ बनल अछि।

मिथिलांचलक शाक्त साधनाक्षेत्रमे पूजित एवं प्रतिष्ठित अन्यान्य देवी सभमे गंगा-यमुनाक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्तिसभ सेहो उपलभ्य अछि। ओना तँ गंगा-यमुनाक मूर्ति प्रायः राजकीय स्थापत्यमे निर्मित होयबाक परम्परा रहल अछि, अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थानमे राखल भग्न लक्ष्मीनारायणक अभिलिखित कर्णाट कालीन प्रस्तर मोर्तिक पार्श्वमे गंगा ओ यमुनाक उत्कीर्ण मूर्ति अवशिष्ट अछि। अभिलेखमे कर्णाट वंशक संस्थापक जेना राजा नान्यदेवक प्रशस्ति श्रीधर लिखने छथि। ठाढ़ीक प्रसिद्धि परमेश्वरी भगवतीक लेल सेहो अछि। गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र प्रस्तर मूर्ति नगर डीह (दरभंगा) ओ बरसाम (मधुबनी)मे प्राप्य अछि। गंगा मकरवाहिनी ओ यमुना कच्छप वाहिनी रूपेँ निर्मित छथि। वाम हाथमे कलश छनि एवं नाना आभूषणसँ अलंकृत अछि।
शाक्त भूमि मिथिलांचलसँ भगवतीक प्रस्तर मूर्तिसभ उच्चैठ (मधुबनी), भोज परौल (मधुबनी), भंडारिसम (दरभंगा) ओ वारी (समस्तीपुर)सँ प्राप्त भेल अछि। उच्चैठक भगवतीक एकान्त साधक कालिदास छलाह। मूर्ति (३३”) चतुर्भुजी अछि। वाम हाथ सभमे त्रिशूल ओ अमृतकलश एवं दहिन हाथमे दर्पण (कमल पुष्पाकार) ओ लघुपात्र अछि। सिर, गला, कान, बाँहि, कलाइ, कमर ओ पैर आदि आभूषण सभसँ अलंकृत अछि। देहमे यज्ञोपवीत ओ वाहनक रूपमे सिंह उत्कीर्ण अछि। भगवती कमलासनपर आसीन छथि। भोज परौलक भगवतीमूर्ति (३५”) उच्चैठक भगवतीक समतुल्य अछि। भगवतीक तेसर प्रस्तर मूर्ति भंडारिसम (दरभंगा)क मन्दिरमे प्रतिष्ठित अछि। एहि चतुर्भुजी मूर्तिक (४८”) दहिन हाथमे खड्ग अछि। भगवती कमलपुष्पपर ललितासनमे बैसल छथि। पादपीठमे सिंह उत्कीर्ण अछि। आर सभटा विन्यास पूर्वत अछि। हिनका भगवती वाणेश्वरी सेहो कहल जाइछ। चारिम मूर्ति वारीर (समस्तीपुर)मे स्थापित ओ पूजित अछि। मुदा भगवती षटभुजी छथि (३४”)। वाम हाथमे ढाल, छतरी ओ अज्ञात पदार्थ एवं दहिन हाथसभमे अक्षमाला, खड्ग ओ अभय मुद्रामे अछि। शेष विन्यास पूर्ववत अछि। पंचम षटभुजी मूर्ति देकुली (दरभंगा)मे स्थापित अछि। एहि भगवती सभमे उच्चैठक भगवतीक स्थान सर्वोपरि अछि।
भगवतीक सौम्य रूप गिरीजाक मूर्तिसभ फुलहर (गिरीजास्थान, मधुबनी, ३७”), मिर्जापुर (दरभंगा, ३२”) ओ कुर्सो नदियामी (दरभंगा)क मन्दिरसभमे संपूजित अछि। पुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक पार्श्वमे गणेश एवं कार्तिकेय उत्कीर्ण अछि। दुनू चतुर्भुजी एवं स्थानक मुद्रामे निर्मित अछि। सत्यार्थीक अवलोकनक अनुसार आलोच्य मोतिमे गिरीजा, राधा ओ लक्ष्मी समन्वित छथि। गिरीजाक मुरलीक अंकन विशिष्ट अछि। हिनक ख्याति म्लेच्छमर्दनीक रूपमे विशेष अछि। भगवतीक महिषासुर मर्दनीक रूप सर्वाधिक लोकप्रिय अछि। मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे महिषासुरमर्सिनी वनाम म्लेच्छमर्दिनीक परिकल्पित शिल्पांकन बेस उपयुक्त छल। मध्यकाल संघर्षक काल छल। एहि परिस्थितिमे महिषासुर मर्दिनी उत्प्रेरक भेलीह। एहि तरहक मूर्तिसभ बरसाम, कुर्सोनदियामी, नाहर, अन्दामा, वैद्यनाथपुर, उजान, बुढेव, पोखराम, नेहरा, हावीडीह, बहेड़ी, सिमरिया भिण्डी, जरैल-परसौन, चौगाम, लावापुर आदि स्थानसभसँ प्राप्त भेल अछि। नवरात्रक अवसरपर प्रायः गामसभमे महिषासुर मर्दिनी दुर्गाक लोकपरिकल्पित मूर्तिसभ प्रतिवर्ष बनैत अछि, पूजित होइत छथि एवं विसर्जित होइत अछि। मूर्तिक परिकल्पना “दानवत्वपर देवत्वक विजय” केन्द्रित अछि।
भगवतीक अन्यान्य रूप सभमे नागदेवी मनसा (भैरव स्थान, मुजफ्फरपुर), विषहरी (नाथनगर, भागलपुर), वशिष्टाराधिता तारा (महिषी, सहरसा), सरस्वती (जयनगर, मधुबनी), काली (कोर्थ, दरभंगा), गजलक्ष्मी (भीठभगवानपुर, मधुबनी), तारा (बौद्धदेवी, वारी,समस्तीपुर) जगतपुर वरुआरी (सहरसा), जयमंगला (बेगूसराय), सहोदरा(नरकटयागंज, प. चम्पारण), पार्वती (करियन, समस्तीपुर), भरवारी, समस्तीपुर आदिक प्राचीन ओ ऐतिहासिक पाथरक मूर्तिसभ मिथिलांचलसँ प्राप्त भेल एवं ओऽ सभ पूजित अछि।
मिथिलाक मध्यकालीन सांस्कृतिक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे पंचदेवोपासनाक परिकल्पना विभिन्न साम्प्रदायिक सद्भावक अनुक्रममे कयल गेल छल, ओ बहुत किछु सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरातलपर फलीभूत भेल। बहुतरास मन्दिरसभ एकर उदाहरण बनल अछि।
मधुश्रावणी-गजेन्द्र ठाकुर
श्रावण मास कृष्ण-पक्षक पञ्चमीसँ शुक्लपक्ष तृतिया धरि नाग आऽ गौरीशंकरक अभ्यर्थना कएल जाइत अछि।
मौना पञ्चमी-श्रावन मास कृष्णपक्ष पञ्चमीकेँ साँपक माए बिसहराक बर्थडे मनाओल जाइत अछि। नवविवाहिताक प्रथम वर्षक मधुश्रावणीक ई प्रथम दिन थिक । धुरखुरपर गोबरक नाग-नागिनपर सिन्दूर-पिठार लगाओल जाइत अछि आऽ पञ्चमीक माटिक थुम्हा घरमे साँप कटला उत्तर झाड़ा-फूकी लए राखि देल जाइत अछि। गोसाउनिकेँ खीर-घोरजाउड़क पातरि आऽ बिसहराकेँ नेबो,झौआ,नीमक पातरि देल जाइत अछि। गोसाउनिक, गौरीक आऽ बिसहराक गीत होइत अछि, पूजा-पाठक बाद पाँच बीनी (फकड़ा-कवित्त) तीन-तीन बेर सुनलाक बाद कथा सुनल जाइत अछि, ई सभदिन कथाक बाद दोहराओल सेहो जाइत अछि।

प्रथम दिनक कथा-

एकटा बूढ़ीकेँ धारमे नहाए काल पुरैनी पात पर पाँचटा जीव देखाइ पड़ैत छन्हि आऽ ओऽ हुनका मौना-पञ्चमीक मोन पाड़ि गाममे लोकसभकेँ पूजा करबाक लेल कहैत छन्हि। किछु गोटे गप मानैत छथि, मुदा किछु गोटे ओकरा फूसि-फटक मानैत छथि। जे सभ पूजा नञि कएलन्हि से रातियेमे मरि गेलाह। सभ दौड़ि कए पाँचो बहिन बिसहरा लग जाइ गेलाह, आऽ हुनका कहलासँ बचल खीर-घोड़जाउड़ मृतकेँ चटा देलन्हि, ओऽ सभ जीबि गेलाह आऽ मरड़ए नाम पड़लन्हि।
पाँचो बिसहरा महादेव सन्तान छलीह। साँपक पोआकेँ देखि एकदिन तमसा कए गौरी हिनकासभकेँ थकुचि देलखिन्ह।
साँझमे साँझक आऽ कोबरक गीत होइत अछि।

दोसर दिनक-कथा

मनसा महादेवक पुत्री छलीह जे जनमितहि युवती भए गेलीह आऽ लाजक रक्षाक हेतु साँप हुनका देहमे लपटाए गेल। गौरी तमसा गेलीह से हुनका कैलास छोड़ि जाए पड़लन्हि आऽ मृत्युलोकमे सभसँ पैघ व्यापारी चन्नू-चन्द्रधर हुनकर पूजा करन्हि से ओऽ इच्छा कएलन्हि, मुदा ओऽ छल महादेवक भक्त से ओऽ वाम हाथे पूजा करबाक गप कहलन्हि। ओकर छओ बेटाकेँ साँप डसि लेलक, मरि जाइ गेल। बुढारीमे चन्नूकेँ बेटा भेलन्हि मुदा ज्योतिषि कहलकन्हि जे हुनका विवाहक दिन कोबरघरमे साँप डसि लेतन्हि। ओहि बच्चाक नाम लक्ष्मीधर-बाला-लखन्दर राखल गेल, छहे-मासमे ओकर विवाह चिर-सोहागनि योगक कान्याँसँ होएब निश्चित भेल। पहाड़पर कोठामे बिज्जी आऽ बिढ़नीक पहराक बीच कान्याँ बिहुलासँ विवाह भेल। मुदा कोहबरमे साँप आयल आऽ हुनका डसि लेलक। बिहुला पतिकसंग केराक थम्हपर गंगाधारमे चलि पड़लीह आऽ प्रयाग पहुँचि गेलीह। ओतए एकटा धोबिनकेँ ओकर बच्चा तंग कए रहल छल, ओऽ ओकरा मारि नुआसँ झाँपि देलन्हि आऽ कपड़ा खीचलाक बाद ओकरा जिआ देलन्हि। दोसर दिन जखन ओऽ अएलीह तखन बिहुला हुनकासँ अपन व्यथा सुनओलन्हि। फेर हुनका संग इन्द्रक दरबार गेलीह आऽ बिसहराक पैर पकड़ि कहलन्हि जे यदि हुनकर पति आऽ छबो भैंसुर जीबि जएताह तखन ओऽ बिसहरा पूजा करबो करतीह आऽ मृत्युलोकमे ओकर प्रचार सेहो करतीह। सभ जीबि गेल आऽ बिसहराक पूजा शुरू भेल।

बिसहरा कथा-कश्यप मुनिकेँ कद्रूसँ एक हजार साँप भेल आऽ कशप मुनि विष झारबाक मन्त्र बनओलन्हि, तपस्या कए मनसँ बिसहरा बनओलन्हि से भेलीह मनसा। ओऽ कैलास आऽ पुष्कर गेलीह फेर बूढ़ तपस्वीसँ हुनकर विवाह भेलन्हि, ताहिसँ आस्तीक नामक पुत्र भेलन्हि। राजा जनमेजयक सर्प-यज्ञमे जड़ल सर्पसभके आस्तीक बचा लेलन्हि। आषाढ़क संक्रान्तिसँ नाग-पंचमी धरि बिसहराक पूजा पसीझक डारिपर होइत अछि।
मंगला-गौरी कथा- श्रुतकीर्ति राजाकेँ बेटा नहि छलन्हि, भगवतीक उपासना कएल। भगवती कहलन्हि जे सर्वगुणी बेटा १६ वर्ष आयुक होएत आऽ महामूर्ख बेटा दीर्घायु होएत, से केहन वर चाही। राजा सर्वगुणी बेटाक वर मँगलन्हि।
मन्दिरक सोझाँक आमक गाछसँ आम तोड़ि ओऽ अपन पत्नीकेँ खुआ देलन्हि आऽ पुत्र जे प्राप्त भेल ओकर नाम चिरायु राखल। १६ वर्ष पूर्ण भेलापर रानीक भाए संगे राजकुमार चिरायु काशी चलि गेलाह। माम भागिन जे काशी लेल बिदा भेलाह तँ रस्तामे आनन्दनगर राज्यमे बीरसेन राजाक पुत्री मंगलागौरीक विवाह होमए बला छल। ओऽ सखी-बहिनपा संग फूल लोढ़ए लेल फुलवारीमे आयल छलीह तँ गपे-गपमे एकटा सखी हुनका राँड़ी कहि देलखिन्ह, तँ ओऽ कहलन्हि जे हम गौरकेँ तेना गोअहरने छी जे जाहि वरक माथपर हमर हाथक अक्षत पड़त से अल्पायु रहबो करत तँ दीर्घायु भए जाएत। ओहि राजकुमारेक विवाह बाह्लीक देशक राजा दृढ़वर्माक बेटा सुकेतुसँ हेबए बला रहए। ओही फुलबारीमे माम-भागिन रहथि, आऽ साँझमे बर-बरियाती सभ सेहो अएलाह। वर महामूर्ख आऽ बहीर छल से ओऽ लोकनि राति भरि लेल चिरायुकेँ वर बनबाक आग्रह कएलन्हि। चिरायु गौरी-शंकरक प्रतिमाक समक्ष सिन्दूर-दान कएलन्हि। कोहबरमे वर कनिआ अएलाह तँ ओही राति चिरायुक १६म वर्ष पुरि गेलन्हि आऽ तखने गहुमन साँप डसबाक लेल आबि गेल। राजकुमारी जगले छलीह आऽ ओऽ गहुमनक सोझाँ दूध राखि देलखिन्ह आऽ पतिकेँ नहि मारबाक आग्रह कएलन्हि। गहुमन दूध पीबि पुरहरमे पैसि गेल, राजकुमारी आँगीसँ पुरहरक मुँह बन्न कए देलन्हि। राजकुमारक निन्द खुजलन्हि तँ ओऽ किछु खाए लेल मँगलन्हि। राजकुमारी हुनका खीर-लड्डू देलन्हि, हाथ धोबाक काल राजकुमारक हाथसँ पञ्चरत्न औँठी खसि पड़लन्हि से राजकुमारी उठा लेलन्हि। वर पान-सुपारी खाए सुतलाह आऽ पुरहरिक साँप रत्नक हार बनि गेल आऽ से राजकुमारी गरामे पहिरि लेलन्हि। भोरमे माम भागिनकेँ लए गेलाह मुदा सुकेतुकेँ राजकुमारी कोबरमे नहि पैसए देलखिन्ह। साल भरिक बाद प्राय विन्ध्याचलसँ जे माम-भागिन घुरि रहल छलाह तँ राजकुमारी कोठापसँ हुनका चीन्हि गेलीह। धूमधामसँ सभ घर कनिआँ लए पहुँचलाह आऽ गौरी आऽ नाग पूजाक महत्व ज्ञात भेल।

तेसर दिनक कथा

पृथ्वीक जन्म- पापसँ पृथ्वी पाताल चलि गेलीह, तखन ब्रह्मा, विष्णु प्रार्थना कए हुनका ऊपर अनलन्हि, फेर ओऽ डगमगाइत छलीह, तखन विष्णु काछु बनि नीचाँ चलि गेलाह, अपन पीठपर राखि लेलन्हि, तैयो ओऽ जल-पर भँसैत छलीह, तखन आगस्त्यक जाँघ तरसँ माटि आनल गेल, विष्णु सेहो माछ बनि माटि अनलन्हि, तकर जोड़न दए पृथ्वीकेँ स्थिर कएल गेल, जे कमी छल से भगवान वराह बनि उत्तर माथसँ पृथ्वीकेँ ठोकि कए ठीक कए देलन्हि।

समुद्र-मन्थन- देवता-दानव सुमेरुपर एकत्र भए समुद्र-मन्थनक हेतु बासुकीनागकेँ मन्दार पर्वतमे लपटाए समुद्रमे उतारल।कूर्मराजकेँ आधार बनाए मूँह दिसनसँ दानव आऽ पुच्छी दिसनसँ देवता नागकेँ पकड़ि मन्दारक मथनीसँ मंथन शुरू कएलन्हि। रगरसँ पर्वतपर गाछ-वृक्षमे आगि लागि गेल। इन्द्र वर्षा कएलन्हि, समुद्रक नूनगर पानि दूध-घी भए गेल, लक्ष्मी, सुरा आऽ उच्चैःश्रवा घोड़ा निकलल से चन्द्रमा-लोकनि लए लेलन्हि। अमृत लेने धन्वन्तरि बहार भेलाह, विष निकलल से महादेव कण्डमे लेलन्हि। गौरी बिसहरा,साँप,बिढ़नी,चुट्टीक मदतिसँ विश महादेवक देहसँ निकाललन्हि। अमृत लेल झगड़ा बझल, विष्णु मोहिनी बनि गेलाह। दैत्य मोहित भए अमृत-कलश हुनकर हाथमे राखि देलन्हि आऽ देवतासँ लड़ए लगलाह। विष्णु सभ देवताकेँ अमृत पिआ देलन्हि। दैत्य राहु भेष बदलि अमृत पीबए चाहलक मुदा चन्द्रमा सूर्य हुनका चीन्हि गेलखिन्ह, अम्र्त मुँसँ कंठ धरि यावत जाइत तावत विष्णु ओकर गर्दने चक्रसँ काटि देलन्हि। मुदा अमृतक जे स्पर्श ओकरा भए गेल छल से ओऽ मरल नहि, मुण्ड भाग राहु आऽ शेष भाग केतु बनि गेल, एखनो कोनो अमावस्यामे सूर्यकेँ तँ कोनो पूर्णिमामे चन्द्रमाकेँ गीड़ैत अछि, मुदा कटल मुण्ड-धरक कारण दुनू गोटे किछु कालक बाद बहार भए जाइत छथि। बचल अमृत विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्रकेँ दए देल गेल।बासुकी नागकेँ माइक श्राप नहि लगबाक आऽ जनमेजयक यज्ञमे भागिन आस्तीक द्वारा सपरिवार प्राणरक्षा होएबाक वर भेटलन्हि।

चारिम दिनक कथा
सतीक कथा- ईश्वरकेँ विश्वक सृष्टि करबाक छलन्हि, से ओऽ पहिने विष्णु, फेर शिव आऽ तखन ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलन्हि। ओऽ तखन देवता-ऋषि-मुनि, शतरूपास्त्री, स्वायंभुव मनु, दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि, दहिना पाँजरसँ दक्ष-प्रजापतिक रचना कएलन्हि। मरीचीसँकश्यप, अत्रिसँ चन्द्रमा, मनुक प्रियव्रत एवं उत्तानपाद बेटा आऽ आकृति, देवहूति आऽ प्रसूति बेटी भेलन्हि। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ आऽ ताहिसँ साठि कन्या भेल। साठिमे आठक विवाह धर्म, एगारहक कश्यप, सत्ताइसक चन्द्रमा आऽ एक गोट जिनकर नाम सती छलन्हि हुनकर विवाह महादेवसँ भेलन्हि। चन्द्रमाकेँ जे सताइस टा पत्नी भेलन्हि ताहिमेसँ ओऽ रोहिणीकेँ सभसँ बेशी मानैत छलाह, से २६ टा बहिन अपन पिता दक्षकेँ कहलनि, ओऽ शाप देलकिन्ह आऽ चन्द्रमाक शरीर घटए लगलन्हि। तखन ओऽ महादेव लग गेलाह तँ ओऽ हुनका अपन कपार पर चढ़ा लेलन्हि। एहिसँ दक्ष महादेवकेँ बारि देलखिन्ह। फेर दक्ष एकटा यज्ञ कएलन्हि आऽ शंकरकेँ नोत नहि देलन्हि। सती नैहर जएबाक लेल जिद पकड़ि लेलन्हि तँ वीरभद्रक संग शिव हुनका पठा देलन्हि। सती चलि तँ गेलीह मुदा अपमान देखि यज्ञकुण्डमे कूदि पड़लीह। वीरभद्र ई देखि दक्षक गरदनि काटि लेलन्हि।महादेवकेँ तमसायल देखि कए देवता सभ प्रार्थना कएलन्हि जे बिना जिअओने यज्ञ पूर्ण नहि होएत से यज्ञक काटल छागरक मूरी दक्षक धरपर महादेव लगा देलन्हि, आऽ ओ जीबि कए बो-बो करए लगलाह, से माहादेव ई देखि प्रसन्न भेलाह। तहियेसँ महादेवक पूजाक अन्तमे बू कहल जाए लागल। महादेव सतीक मृत शरीर लए बताह भेल फिरथि से देखि विष्णु चक्रसँ सतीक टुकड़ा कए देलन्हि आऽ जतए-जतए ओऽ टुकड़ा खसल से सभटा सिद्धपीठ भए गेल। महादेव कैलाश छोड़ि जंगलमे तपस्या करए लगलाह।
पतिव्रताक कथा- एकटा राजा छालाह। हुनका दूटाबेटी छलन्हि- कुमरव्रता आऽ पतिव्रता। कुमरव्रता नन्दनवनमे कुटीमे रहए लगलीह आऽ पतिव्रता विवाह कए सासुर चलि गेलीह। एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक तँ ओऽ शाप दए ओकरा भसम कए देलक। नन्दनवनमे आगि लागल रहए। पतिव्रता अपन बहिन कुमरव्रताक कुटी बचेबाक लेल तुलसीक बेढ़ देलन्हि ताहिमे योगीकेँ भीख देबामे देरी भए गेलैक। योगी तमसाएल तँ पतिव्रता देरीक कारण कहलन्हि। योगी बोनमे गेल तँ देखलक जे सौँसे बोनमे आगि लागल अछि मुदा कुमरव्रताक कुटी बचल अछि। ओऽ कुमरव्रताकेँ एकर रहस्य बतेलक तँ ओहो निर्णय लेलन्हि जे हमहुँ विवाह कए पतिव्रता बनब। भोरमे एकटा कुष्ठरोगीकेँ ओऽ देखलन्हि तँ हुनकेसँ विवाह कए लेलन्हि। पति हुनका कहलखिन्ह जे हमरा तीर्थ कराए दिअ। ओऽ हुनका पथियामे लए बिदा भेलीह तँ रस्तामे जखन पथिया उतारि रहल छलीह तँ चोट लागि कए एक गोट सूली पर लटकल ऋषिकेँ चोट लागि गेलैक। ओऽ भोर होइते पतिक मृत्युक शाप हुनका दए देलन्हि। से सुनि बेचारी सूर्यक उपासना करए लगलीह से पति मृत्यु पाबि फेर जीबि उठलखिन्ह आऽ एहि बेर बिना रोग व्याधिक घुरि अएलन्हि। सती,सावित्री, अनुसूया आऽ बिहुला जेकाँ सतीक अनेक उदाहरण अछि।
पाँचम दिनक कथा

दक्षक पुनर्जन्म भेलन्हि हिमालयक रूपमे, आऽ एहि जन्ममे हुनका उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आऽ सन्ध्या ई पाँचटा कन्या भेलन्हि। हिमालय आऽ मनाइनक बेटी उमा महादेवकेँ प्राप्त करबाक लेल तपस्या करए चलि गेलीह, माय उमा कए रोकलन्हि, से नाम उमा पड़ि गेलन्हि ओऽ वरक रूपमे महादेवकेँ प्राप्त कए लेलन्हि। दोसर पुत्री पार्वती एकदिन कनकशिखरपर गेलीह आऽ बसहापर चढ़ि हुनका संग चलि गेलीह। तेसर पुत्री गंगा रहथि। एक दिन महादेव भिक्षुक भेष धए अएलाह आऽ गंगाकेँ जटामे नुकाए चलि गेलाह।

छठम दिनक कथा

सगर राजाक पत्नी रहथि शैब्या आऽ हुनकासँ असमंजस नामक पुत्र भेलन्हि। दोसर पत्नी वैदर्भीसँ कोनो बच्चा नञि भेलन्हि। वैदर्भी महादेवक तपस्या केलन्हि तँ सए बरखक बाद एकटा लोथ जन्म लेलकन्हि। महादेव अएलाह आऽ लोथकेँ साठि हजार खण्डमे काटि ओतेक तौलामे राखि झाँपि देलनि। ई सभटा किछु दिनमे पुत्रक रूप लए लेलकन्हि। सगर राजाक सएम अश्वमेध यज्ञक इन्द्र व्रोधी भेलाह कारण तखन सगर शतक्रतु इन्द्र भए जएताह। इन्द्र यज्ञक घोड़ाकेँ लए भागि गेलाह आऽ कपिलक आश्रममे बान्हि देलखिन्ह। साठियो हजार पुत्र कपिलपर दौगलाह, ओ तपस्यालीन छलाह आऽ अपन क्रुद्ध आँखि खोलि सभकेँ जरा देलन्हि। वैकुण्डसँ गंगाकेँ अनबाक लेल असमंजस आऽ तकर बाद हुनकर पुत्र दिलीप आऽ तकर बाद तिनकर पुत्र अंशुमान तपस्या करैत-करैत मरि गेलाह। अंशुमानक पुत्र भगीरथक तपस्यासँ विष्णु प्रसन्न भेला आऽ गंगाकेँ मृत्युलोक लऽ जएबाक अनुमति दए देलन्हि। महादेव हिमालयपर जाए स्वर्गसँ उतरैत गंगाकेँ अपन जटामे राखि सम्हारि लेलन्हि, मुदा जे आगू बढ़लीह तँ जहु ऋषिक कुटी दहाए लागल। जहु ऋषि गंगाकेँ पीबि गेलाह। मुदा आग्रह कएलापर ओऽ गंगाकेँ छोड़ि देलन्हि आऽ तहियासँ गंगा हुनकर पुत्री जाह्नवीक रूपमे विख्यात भेलीह। आऽ फेर अन्तमे सगरक पुत्र लोकनि द्वारा, घोड़ाक खोजमे खुनल ओहि खाधिमे खसलीह जे आब सागर कहाबए लागल आऽ एहि तरहेँ सगरक पुत्रसभकेँ सद्गति भेटलन्हि।

गौरीक जन्म- सतीक मृत्युक बाद महादेवकेँ विरक्ति भए गेलन्हि। तखन ताड़कासुर ब्रह्माकेँ प्रसन्न कए महादेवक पुत्रक अतिरिक्त ककरो आनसँ नहि मरबाक वर लए लेलक, देवताकेँ स्वर्गसँ भगा देलकन्हि। तखन देवता लोकनि महामाया दुर्गाक आराधना कएलन्हि आऽ ओ हिमालयक घरमे जन्म लेलन्हि। ओऽ बड़ गोर-नार छलीह से हुनकर नाम पड़ल गौरी। नारद एकदिन हिमालयक ओहिठाम अएलाह आऽ गौरीक हाथ देखि कहलखिन्ह जे हिनकर विवाह महादेवसँ होएतन्हि। हिमालय गौरीकेँ दूटा सखीक संग महादेवक सेवामे पठा देलखिन्ह। देवतागण कामदेवकेँ मित्र वसन्त आऽ स्त्री रतिक संग ओतए पठेलन्हि। गौरी जखन पहुँचलीह तखन कामदेव वाण चलेलखिन्ह। महादेव आँखि खोलि गौरीकेँ देखल। गौरी पूजा कएलन्हि। महादेव हुन्का देखि उपमा देलन्हि,
मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन।
मुदा तखने हुनका होश अएलन्हि ओऽ झाँकुरमे कामदेवकेँ देखलन्हि तँ तेसर नेत्र क्रोधित भए खोलि देखल तँ ओऽ जरि गेलाह। रति मूर्छित भए गेलीह। रतिक विलाप देखि देवतागण अएलाह आऽ कहलन्हि जे ताड़कासुरक वध लेल ई सभटा रचल गेल। महादेव कहलन्हि जे रति समुद्रमे शम्बर दैत्य लग जाथि। कृष्णक पुत्र प्रद्युम्नकेँ ओऽ दैत्य उठा कए लए जायत। जखन प्रद्युम्न पैघ होएताह तखन ओऽ शम्बरकेँ मारि रतिकेँ बियाहि द्वारका लए जएताह। वैह प्रद्युम्न कामदेव होएताह।

सातम दिनुका कथा

गौरी कामदेवक दहन देखि डराए गेलीह। नारद गौरीकेँ तपस्या करए लेल कहलखिन्ह। तपस्याक लेल हिमालय अपन पत्नी मैनासँ पुछलन्हि। गौरी फेर पटोर खोलि देलन्हि आऽ कृष्णाजिन आऽ बल्फर पहिरि सखी संग गौरीशिखर चोटीपर चलि गेलीह। घोर तपस्या देखि ऋषि-मुनि संग नारद महादेव लग पहुँचलाह। महादेव गौरीक परीक्षा लेल भेष बनाए गौरीशिखर पहुँचलाह आऽ महादेवक ढेर-रास निन्दा कएलन्हि। गौरी तमसाए गेलीह तँ ओऽ सोझाँ आबि गेलाह आऽ विवाहक लेल तैयार भए गेलाह।

आठम दिनक कथा
काशीमे सप्तऋषि , वशिष्ठ आऽ वशिष्ठक स्त्री अरुन्धती अएलीह। महादेव हुनका लोकनिकेँ कथा लए हिमालयक ठाम पठओलन्हि। हिमालय आऽ मैनाक आँखिसँ खुशीसँ नोर झड़ए लगलन्हि। कथा स्थिर भए गेल। नारद देवता लोकनिकेँ हकार देलन्हि। चारिम दिन बरियाती लगल। गन्धर्वराजकेँ देखि मैनाकेँ नारदकेँ पुछलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि जे ई तँ देवताक गबैया छी। फेर धर्मराज, इन्द्र सभ अएलाह। नारद सभक परिचए देलन्हि। मैना सोचलन्हि जे ई सभ एतेक सुन्दर अछि तँ महादेव कतेक सुन्दर होएताह। महादेव मैनाक मोनक गप बुझि किछु तमाशा कएलन्हि। महादेव, हुनकर गण, भूत-पिशाचकेँ देखि मैना बेहोश भए गेलीह।

नवम दिनक कथा

मैनाकेँ जखन होश अएलन्हि तँ ओऽ नारद-गौरी सभकेँ बहुत रास बात कहलन्हि आऽ विवाहसँ मना कए देलन्हि। सभ मनबए अएलन्हि तैयो नहि मानलीह। तखन महादेव अपन भव्यरूप देखेलन्हि, तँ मैना देखिते रहि गेलीह। विवाहक कार्य शुरू भेल। परिछनि, अठोंगर, गोत्राध्यायक बद कन्यादान सम्पन्न भेल आऽ ताड़कासुरकेँ मारबाक बाट सोझाँ प्रतीत भेल।
दशम दिनुका कथा

महादेव आऽ गौरीक संभोगसँ जे बच्चा होएत ओऽ पृथ्वीक नाश कए देत, ब्रह्माक ई वचन सुनि देवता लोकनि हल्ला मचा देलन्हि आऽ महादेवक अंश पृथ्वीपर खसि पड़ल। गौरी देवताकेँ सरापलन्हि जे आइ दिनसँ हुनका लोकनिकेँ सम्भोगसँ सन्तान नहि होएतन्हि। पृथ्वी अंशकेँ आगिमे आऽ आगि सरपतवनमे भार सहन नहि होएबाक कारण दए देलन्हि। ओतए छह मुँहबला बच्चा भेल, ओकरा कृत्तिकसभ पोसलन्हि तेँ नाम कार्तिकेय पड़ि गेलन्हि। गणेशक जन्मक बाद महादेव हुनका बजा लेलन्हि, देवतालोकनि हुनकर अभिषेक कए अपन सेनाध्यक्ष बना लेलन्हि। ओऽ ताड़कासुरकेँ मारि इन्द्रकेँ राज्य घुरा देलन्हि आऽ साठिसँ विवाह कएलन्हि।
गणेशक जन्म- माघसूदि त्रयोदशी सुपुष्य विष्णुव्रत एक मासमे समाप्त कए कैलाशमे गौरी-महादेव रमण करए लगलाह। विष्णु तपस्वीक भेष बनाए अएलाह आऽ भूखसँ प्राण रक्षाक गप कहलन्हि। ओछाओनपर अंश खसि पड़ल आऽ गणेशक जन्म भए गेल। समारोहमे सभ अएलाह, शनिकेँ गौरी देखए लेल कहलन्हि, मुदा हुनका देखलासँ गणेशक गरदनि कटि कए खसि पड़ल। विष्णु एकटा हाथीक गरदनि काटि लगा देलन्हि आऽ अमृत छींटि जिआ देलन्हि। गणेशक विवाह दक्षप्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलन्हि।

गौरीक नागदन्त कथा-हिमालयक आऽ मनाइनक चारिम बेटी गौरीक विवाह महादेवसँ भेल। महादेव भाभट पसारि फेर हटा लेलनि।बेटी-जमाएकेँ पुष्ट भार साँठि बिदा कएलन्हि, से सठबे नहि करन्हि। भड़कनि छुलाहि जखन धुरखुर सटि ठाढ़ भेल, तखन सभटा भार बिलाएल। एकबेर गौरी कहलन्हि जे सभक ननदि अबैत छैक, भागिन अबैत छैक। महादेव बहिन अशावरीकेँ बजेलन्हि। हुनका बेमाय फाटल छलन्हि, बेमायमे गौरीकेँ नुका लेलन्हि। गौरी कानथि तँ क्यो सुनबे नहि करन्हि। म्हादेव पुछाड़ि कएलन्हि तँ ओऽ पैर झाड़लन्हि। गौरी भटसँ खसलीह। तहिना ननदि लेल माँछ रान्हलन्हि। सभटा माँछ ननदि खाऽ गेलखिन्ह। गौरी अकछ भए ननदिकेँ बिदा कएलन्हि। गौरी गंगा जल भरए गेलीह तँ पुरबा आऽ पछबा दुनू भागिन जोरसँ बहए लागल। गौरी हाथ जोड़ि हँसी बन्न करए लेल कहलन्हि।

गौरी छिनारि/चोरनी- गौरी कहलन्हि जे छिनारिकेँ माथपर सिंह आऽ चोरनीकेँ नाङरि दए दिऔक। महादेव तथास्तु कहलन्हि। गौरी माछ आनए गेलीह तँ धारक कातमे महादेव भेष बदलि माँछ बेचबाक लेल ठाढ़ भए गेलाह। गौरीकेँ माँछ बेचबासँ मना कए देलन्हि, कहलन्हि जे हँसी-ठट्ठा करब तखने हम अहाँकेँ माँछ देब। गौरीकेँ महादेव लेल माँछ लेब जरूरी छलन्हि से ओऽ हँसी कए माछ आनि, रान्हि महादेवकेँ खोआबए बैसलीह तँ माथपर सिंघ उगि गेलन्हि। दोसर दिन महादेव गौरीकेँ जल्दीसँ खेनाइ बनाबए लेल कहलन्हि, तखने गौरीकेँ दीर्घशंका लागि गेलन्हि। ओऽ जखन दीर्घशंका कए ओकरा पथियासँ झाँपि देलखिन्ह। जखन महादेव ओम्हर अएलाह आऽ पुछलखिन्ह तँ ओऽ लजा गेलीह आऽ गप चोरा लेलन्हि। जखन महादेवकेँ ई कहलन्हि तँ हुनका नाङरि भए गेलन्हि। गौरी छिनारि आऽ चोरनीक चेन्ह मेटएबाक अनुरोध कएलन्हि। तहियासँ ई चेन्ह मेटा गेल।
एगारहम दिनुका कथा

गौरीसँ छोट आऽ हिमालयक पाँचम बेटी संध्यासँ विवाहक लेल महादेव चोरा कए चलि गेलाह। गौरीकँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि। घामे-पसीने भए गेलीह। देहसँ मैल छुटए लगलन्हि तकरा ओऽ जमा केलन्हि आऽ साँप बनाए पथपर छोड़ि देलन्हि। महादेव जखन संध्याक संग विवाह कए अएलाह तखन ओहि साँपमे प्राण दए देलन्हि। गौरीकेँ कहलन्हि जे ई साँप, लीली, अहाँक बेटी छी आऽ एकरासँ खेलएबाक लेल संध्याकेँ अनने छी। गौरी भभा कए हँसि देलन्हि।
नाहर राजा आऽ ताँती रनिक सए बेटामे सभसँ पैघ् बेटा बैरसी महादेव लग नोकरी करए लेल गेलाह। महादेव हुनका कहलखिन्ह जे लीलीकेँ धर्मकुण्डमे स्नान कराए दियौन्ह आऽ सोहागकुण्डमे औँठा डुबा दियौन्ह। मुदा ओऽ उलटा कए देलन्हि। सोहाकुण्डमे डुबलाक कारण सोहाग बड़ पैघ भेलन्हि। मुदा धर्मकुण्डमे मात्र औँठा डुबलन्हि से ओकर लेशमात्र रहलन्हि। से ओऽ बेरसीसँ विवाह करबाक गप कहलन्हि आऽ हुनकेसँ हुनकर विवाह भेल।

रवि दिनुका पतिव्रता सुकन्याक कथा
एकटा राजा- आऽ चरिटा हुनकर रानी छलन्हि। छोटकी रानीटासँ एकटा बचिया सुकन्या भेलन्हि। एक दिन राजा सुकन्या संगे टहलैत छलाह तँ सुकन्या एकटा दिबड़ाक भीड़ देखलन्हि। ओहिमे दूटा चमकैत वस्तु सेहो छल। ओऽ ओहिमे कटकीसँ भूड़ करए चाहलन्हि, तँ ओहिमेसँ शोनित बहार भए गेल आऽ चीत्कार उठल। एकटा मुनि तपस्या कए रहल छलाह आऽ हुनकर दुनू आँखि फूटि गेल छलन्हि। राजा हाथ जोड़ि क्षमा माँगलन्हि तँ ओऽ सुकन्याकेँ सेवाक लेल माँगि लेलन्हि। राजा कुमोनसँ सुकन्याक विवाह ओहि बूढ़ ऋषिसँ करबाए देलन्हि। फेर एक दिन अश्विनीकुमार सुकन्याकेँ भेटलखिन्ह आऽ हुनका लोकनिक संग पतिकेँ गंगा स्नान करेबाक लेल कहलखिन्ह। जखने तीनू गोटे स्नान कए निकललाह तँ एके रंग-रूपक युवा आँखि सहित बाहर आबि गेलाह। आब सुकन्या हुनका चिन्हतथि कोना। तखने ओऽ देखलन्हि जे दुनू देवताक पिपनी तँ खसिते नहि छन्हि से ओऽ अपन पतिकेँ चीन्हि गेलीह। राजा बेटी-जमाएक खुशीमे भोज देलखिन्ह। देवता सभ सेहो अएलाह मुदा देवता सभ श्वनेकुमारकेँ पाँतीमे बैसि कए खाए नहि देमए चाहैत छलाह मुदा राजाक कहलापर हुनका सभकेँ एके पाँतीमे बैसए देलखिन्ह।

बारहम दिनुका कथा

एकटा ब्राह्मणीक सात टा बेटा छलन्हि। छोटकी पुतोहु गरीब घरक छलीह से ससु-ससुर नहि मानैत छलन्हि। हुनका गर्भ भेलन्हि तँ खीर पूरी खएबाक इच्छा पतिकेँ कहलखिन्ह। पति कहलखिन्ह जे माय हम खेत जाइत छी हमर पनपिआइमे आइ खीर-पूरी कनिआक हाथे पठा दिअ। मायकें बुझेलन्हि जे हो नञि हो, ई अपन कनिआकेँ खीर-पूरी खुआओत। से ओऽ पुतोहुक जीहपर लिखि कहलन्हि, जे घुरि कए आबी तँ ई लिखल रहबाक चाही। पुतोहु खीर-पूरी लए खेत पहुँचलीह तँ पति आधा-आधा खाए लेल कहलखिन्ह। मुदा ऒऽ जीह देखा देलखिन्ह। तखन ओऽ पीपरक धोधरिमे खीर-पूरी राखि कहलन्हि जे जाऊ, मायकेँ जीह देखा कए घुर्रि आऊ। जखन ओऽ घुरलीह तँ ओहि धोधरिक बीहड़िमे रहएबला बासुकी साँपक कनिआ, जे गर्भवती छलीह से सभटा खीर-पूरी खाऽ गेल छलीह। ओहि सापिनकेँ बाल आऽ बसन्त दूटा पोआ भेलैक। एक दिन चरबाहा सभ ओकरासभकेँ मारए लेल दौगल तँ छोटकी पुतोहू ओकरा बचेलक। फेर एकर उत्तरमे बाल-बसन्त हुनका वर मँगबाक लेल कहलखिन्ह। पुतोहू वर मँगलन्हि जे एहन कए दिअ जे हमरो नैहरक आस रहए। सैह भेल। बाल-बसन्त विदागरी करेबाक लेल पहुंचि गेलाह मनुष्यरूप धारण कए। सासुरमे बाल-बसन्त रूपमे परिचए दए कहलन्हि जे हमरा सभक जन्म बहिनक द्विरागमनक बाद भेल छल। बिदागरी कराए रस्तामे बीहरिमे पैसि कए जे निकललाह तँ पैघ घर आबि गेल। बासुकीनि स्वागत कए साँझमे सुआसिनक काज साँझमे दीअठिपर दीप जरेनाइ अछि- से कहलन्हि। बासुकीनागक फनपर ओऽ दीप जरबथि तँ ओऽ खौँझाकए पत्नीकेँ कहलन्हि जे एकरा हम डसि लेब। पत्नी मना कएलन्हि जे अजश होएत से बिदा करए दिअ। ससुर चलि जाएत तँ जे मोन होए से करब। बसुकिनी नूआ-लहठी दए बिदा करैत काल धरि ई केलन्हि जे साँप रक्षकमंत्र कनिआकेँ सिखा कए बाल-बसन्तक संग बिदा कए देलन्हि। कहलन्हि जे ई मंत्र सूतएकाल पढ़ि सूतब।

दीप-दीपहरा आगू हरा मोती मानिक भरू धरा।
नाग बड़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन, विषहरा बढ़थु।
बाल बसन्त भैय्या बढ़थु, डाढ़ि-खोढ़ि मौसी बढ़थु।
आशावरी पीसी बढ़थु, खोना-मोना मामा बढ़थु।
राही शब्द लए सुती, काँसा शब्द लए उठी।
होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ।
साँझ सुती, प्रात उठी, पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।
ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट।
भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे आओत।
ईश्वर महादेव, पड़ए गरुड़केँ ठाठ।
आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक।

बासुकी डसए लए आबथि मुदा ई मंत्र सुनि घुरि जाथि। चारिमदिन सासुकेँ डसि तीन बेर नाङरि पटकि घर सोना-चानीसँ भरि देलखिन्ह।

गोसाउनिक कथा- मधस्थ राजाक एकसए एक बेटीक विवाह नाहर राजाक एकसए एक बेटासँ भेलन्हि।सभसँ पैघ भाए बैरसीक विवाह सभसँ पैघ कान्या गोसाउनीसँ भेलन्हि।विवाहकालमे बैरसीक पागसँ पहिल कनिआ महादेवक पुत्री लीली खसि पड़लन्हि। लीली लाबा बिछि खए लागलि।गोसाउनिक पिता मधस्थ सरापलन्हि जे बैरसी डेग पाछाँ पानक बिड़िया खएताह आऽ कोश पाछाँ तिरियासँ गप करताह तँ जीताह नहि तँ मरि जएताह। मुदा बैरसी लीलीकेँ मानथि। सासुरमे गोसाउनि अपन व्यथा दिअर चनाइकेँ कहलन्हि। ओऽ भाइकेँ कहलन्हि जे बाहर घुमि फिरि आऊ। तँ बैरसी ससुरक सरापक कथा कहलन्हि। मुदा चनाइ सभटा व्यवस्था कए भौजीकेँ कहलन्हि जे हम पाँच्-पाँच कोसपर ठरबाक व्यवस्था करब अहाँ भायसँगे भेष बदलि रहू आऽ संगमे पासाक गोटी लए लिअ आऽ तकरा प्रमाण रूपमे गाड़ैत जाएब। सैह भेल। पाँच विश्रामक बाद जखन सभ घुरि अएलाह, तखन गोसाउनिकेँ ओधु, कछु, महानाग, श्रीनाग, आऽ नग्नश्री नमक पाँचटा पुत्र भेलन्हि। लीली बैरसीकेँ कहलन्हि जे ई चनाइक सन्तान छी। मुदा गोसाउनि पासाक गोटी देखेलन्हि। तखन बैरसी लीलीकेँ मालभोग चौर आऽ खेड़हीक दालि आऽ गोसाउनिकेँ लोहाक चाउर आऽ पाथरक दालि सिद्ध करए कहलन्हि। मुदा तैयो लीली बुते सिद्ध नञि कएल भेलन्हि, मुदा गोसाउनि सुसिद्ध कए देलन्हि। ई देखि कए गोसाउनिक शरीर गौरवे फाटि गेलन्हि।

तेरहम दिनुका कथा

राजा श्रीकरक कन्याक टीपणिमे छाती लात, झोँटा हाथ आऽ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब लिखल छल। हुनकर मुइलाक बाद हुनकर बेटा चन्द्रकर जंगलमे एकटा सोन्हि बना कए एकटा चेरीसंगमे दए राजकुमारीकेँ ओतए राखि देलन्हि। जंगलमे सुवर्ण राजाकेँ ओऽ भेँट भेलीह तँ दुनू गोटे जाए लगलाह तँ राजकुमारी साओन सूदि तृतियाकेँ मधुश्रावणी पाबनिक लेल सासुरक अन्न खएबाक आऽ वस्त्र पहिरबाक प्रथाक मोन पाड़ि कहलन्हि जे ई दुनू वस्तु अवश्य पठायब। राजा राज्य जाए कारीगरकेँ वस्त्रलेल कहलन्हि तँ बड़की रानी सुनि लेलन्हि आऽ वस्त्रमे छाती-लात आऽ झोँटा हाथ लिखि देबाक लेल कहलन्हि। कौआकेँ जखन ई वस्त्र पहुँचेबाक भार राज देलन्हि तँ ओऽ रस्तामे कतहु भोज-भात खए लागल आऽ सनेस पहुँचेनाइ बिसरि गेल। राजा सेहो सभटा बिसरि गेलाह। मधुश्रावणी दिन राजकुमारी गौरीक पूजन उज्जर चानन-फूलसँ कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे जहिया राजा भेँटा होथि तहिआ हम बौक भए जाइ। जखन चन्द्रकरकेँ पता चलल जे राजकुमारी विवाह कए लेलन्हि तँ ओऽ खरचा बन्द कए देलन्हि। आब दुनू गोटे राजकुमारी अऽ चेरी सुवर्ण राजाक बड़की रानी द्वारा खुनाओल जाए रहल पोखड़िमे माटि उघए लगलीह। सुवर्ण एक दिन हिनका लोकनिकेँ देखलखिन्ह तँ हुनका सभटा मोन पड़ि गेलन्हि। ओऽ हुनका राज्य लए अनलन्हि। मुदा राजकुमारी बजबे नहि करथि। चेरी सभटा गप बुझेलन्हि तँ राजा कहलन्हि जे ई कौआक गलती अछि। तखन रानी अगिला मधुश्रावणीमे लाल चाननसँ गौर पुजलन्हि आऽ हुनकर बकार घुरि गेलन्हि आऽ सुखसँ जीवन बिताबए लगलीह।

श्रीगणेशजी मधुश्रावणी दिन मए गौरीसँ कहलन्हि जे आइ हम सोहाग मथब आऽ बाँटब। धान-धन्य, काठक तामा, नीम बेल आऽ आमक काठीसँ ओऽ सोहाग मथि सभकेँ बँटलन्हि।

झूलन

साओन मासक शुक्लपक्ष पुत्रदा एकादशीसँ प्रारम्भ भए पाँच दिनक बाद सलौनी पूर्णिमा धरि काठक झूला, आङी, टोपी, चद्दरि , रेशमी डोरीसँ सजावट कए झूला गाओल जाइत अछि।

१०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर
रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित)

मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना।
स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान।
अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥

स्थायी
– – रेग॒म॑प ग॒रेसा
ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ

रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ – म॑
ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग

प प धनि॒ धप धनिसां – – रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा
ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ

अन्तरा

पप नि॒ध निसां सांरें
मिथि लाऽ ऽऽ कोकि

सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा
लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ

रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा
हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ

*गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध।
बालानां कृते

१.डोका-डोकी-गजेन्द्र ठाकुर
२. देवीजी: साक्षरता अभियान ज्योति झा चौधरी
१.डोका-डोकी

चित्र: ज्योति झा चौधरी
१.डोका-डोकी

एक टा छल डोका आऽ एकटा छल डोकी।
दुनूमे बड्ड प्रेम। डोकी कहए तरेगण लए आऊ, तँ डोका तरेगण आनएमे सेकेण्डक देरी भए जाए तँ ठीक मुदा मिनटक देरी नञि होमय दैत छल।

सियारकेँ रहए ईर्ष्या दुनूसँ। से ओऽ कनही सियारिनसँ मिलि गेल आऽ एक दिन जख्नन डोका आऽ डोकी एक्के थारीमे भोजन कए रहल छल, तखन डोकाकेँ बजेलक। एम्हर-ओम्हरक गप कए ओकरा बिदा कए देलक। फेर डोकीकेँ बजेलक ओऽ सियरबा। पुछलक जे अहाँ दुनू गोटेमे बड़ प्रेम अछि, मुदा डोका जे कहलक ताहिसँ तँ हमरा बड़ दुःख भेल। लागए-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छैक। आर किछु पूछए लागल डोकी तावत ओऽ सियरबा पड़ा गेल।

आब डोकी घरमे हनहन-पटपट मचा देलक। डोका लकड़ी काटय बोन दिशि गेल। घुरल नहि। भोरमे एकटा जोगी आएल तँ ओकरासँ डोकी पुछलक जे ई की भेल? जोगिया कहलक जे ई अछि पूर्व जन्मक सराप। जखने अहाँ डोकी पर विश्वास छोड़ब डोका छोड़ि कए चलि जाएत मुदा सातम दिन भेटि जाएत।
मुदा डोकी निकलि गेलि डोकाकेँ ताकए। बगुला भेटलैक डोकीकेँ कहलकैकरुकि जाऊ एहि राति। फेर सियरबा, वटवृक्ष, मानसरोवरक रस्तामे बोनमे हाथी सभ कहलकैक जे एक एक राति रुकि कए जाऊ मुदा डोकी नहि रुकलि। फेर भेटल मूस। ओऽ कहलक जे हमरा संग चलू, हम महल लए जायब, खिस्सा सुनाएब छह रातिक बाद सातम राति बीतत आऽ डोका भेटत। खिस्सा सुनबैत महल दिशि विदा भेल दुनू गोटे। मूस कहलक जे अहाँ हँ-हँ कहैत रहब खिस्साक बीचमे। मूसक खिस्सा कनेक नमगर रहए। डोकी बीचमे हँ कहब बिसरि गेलि। आऽ तकर बाद मूस सेहो खिस्सा बिसरि गेल। कतबो मोन पाड़य चाहलक मुदा मोन नहि पड़लैक। फेर आगू बढ़ल दुनू गोटे। एकटा दीबारिमे भूर कए दुनू गोटे सुरंगमे पहुँचल, तँ दू राति धरि चलैत रहल तखन महल आयल। ओतए डोकी हलुआ बनबए लेल लोहियामे समान देलक आऽ कनेक पानि आनए लेल बाहर गेल तँ मूसकेँ रहल नञि गेलैक आऽ ओऽ लोहियामे मुँह दए देलक आऽ मरि गेल। डोकी घुरि कए ई देखलक तँ कुहड़ि उठल।
बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल
छोड़ल वटक वृक्ष
हाथी सन बलगर
पकड़ल ई मूस।
मूस भैयाक संग लेल बीतल छह राति,
सातम रातिमे ओऽ प्राण गमेलन्हि
आऽ ओकर साँस टुटए लगलैक, मुदा तखने दरबज्जा खुजल आऽ कुरहड़ि लेने डोका हाजिर।
२. देवीजी: साक्षरता अभियान

देवीजी : साक्षरता अभियान
विद्यालयमे आइ बहुत हलचल छल। बड़का सरकारी गाड़ी सामने ठाढ़ छल। बच्चासभ उत्सुक भऽ विद्यालयक अन्दर घुसल। सभकेँ किछु बुझा नहि रहल छल। बादमे प्रार्थनाक समयमे प्रधानाध्यापक सभकेँ सूचित केलखिन ”सरकारक दिस सँ ई निर्देश आयल अछि जे हम सभ देशसॅं निरक्षरता हटाबएमे योगदान करी। ताहि लेल सरकारक दिससॅं पुस्तक आऽ अन्य सामग्री प्रदान कएल गेल अछि। भारतवर्ष निरक्षरतामे विश्वमे सभसॅं आगॉं अछि। आर बिहार राज्य अपन देशमे साक्षरता आऽ स्त्रीशिक्षामे सभसॅं पाछाँ अछि। हमरा सभकेँ एकरा हटाबएमे योगदान करबाक चाही।
विद्यार्थी सभ एहिमे काज करए लेल तैयार छल। सभ देवीजीसॅं पुछलक जे एहि लेल की करए पड़तैक। तऽ देवीजी सभकेँ पढ़ाबए केर तरीका सिखेलखिन। अगिला दिन सौंसे गाममे बात आगि जकॉ पसरि गेल जे रोज सॉंझकऽ स्कूलपर बुजुर्गसभकेँ आऽ जाहि बच्चा सभकेँ आर्थिक कमजोरीक कारण शिक्षा नहि भेट रहल छैक तकरा सभकेँ बिन खर्चाक साक्षर बनाओल जायत। सभकेँ आमंत्रित कएल गेल।
आब प्रतिदिन सॉंझमे भीड़ लागए लागल। विद्यार्थी सभ शिक्षक संगे पढ़ाबएमे व्यस्त भऽ गेलाह। गर्मीक छुट्टीमे सेहो सभ एहि काजमे लागल रहल। दुइए तीन महिनाक प्रयाससॅं गामक सभ बुढ़ बुजुर्गसँ लऽ कऽ उमरगर बच्चा सभ साक्षर भऽ गेल। सभसँ बेसी लाभ स्त्री सभकेँ भेलन्हि, जिनका सभकेँ ई सुविधा भेटबाक कोनो आशा नहि छलन्हि। गाममे अखबारक खपत बढ़ि गेल। आब बुढ़ियो सभ बात करए लगलीह जे देशमे कोन पार्टीक बहुमत अछि आऽ के प्रधानमंत्री अछि। गीत नाद सेहो लिखि कए राखए लगलीह। आऽ अपन नातिन सभकेँ पढ़बाक लेल प्रोत्साहित करए लगलीह। मिथिलांचल, जतए स्त्री सर्वथा सम्मानित रहलि, मुदा शिक्षाक क्षेत्रमे ओकर भाग्य कनिक कमजोर छल, ताहुकेँ दूर करबाक ई प्रयास, आगामी उज्ज्वल भविष्यक प्रतीक छल। स्त्रीशिक्षाक एहेन दीप प्रज्वलित करबाक लेल विद्यालयकँ सरकार दिससँ सम्मानित कएल गेल। प्रधानाध्यापक आऽ सभ शिक्षक सभ अपन विद्यालयक छात्रसभक बहुत प्रशंसा केलखिन जे ओकर सबहक तन्मयतासॅं ई काज सम्पन्न भेल। फेर अगिला अवकासमे एहि कार्यक्रमकेँ आगॉं बढ़ेबाक विचार कएल गेल।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥

१२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर
पञ्जी प्रबंध

पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)
श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ’ संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ’ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ’ संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।
तृतीय छठि
कन्याक प्रपितामहक श्वसुरक – जेना माण्डर मूलक सिहौली मूलग्रामक १.रघुबर झा पुत्र २.फेकू झा तनिक जमाए ३.कंटीर झा, तनिक पुत्र ४.पीताम्बर झा तनिक पुत्र ५.शशिनाथ झा ६.कन्या। एहि मध्य माण्डर सिहौली रघुवर झासँ कन्या छठि छथि
चारिम छठि- फेकू झाक श्वसुर- पाली महिषी मूलक हर्षी झा, यथा (१) हर्षी झा- (२)जामाता-फेकू झा (३) जामाता कंटीर झा (४)पुत्र-पीताम्बर (५) शशिनाथ (६) कन्या. एहि तरहेँ कन्या हर्षी झासँ छठम स्थानमे छथि तैय हेतु ई चारिम छठि भेल।

पाँचम छठि- कन्याक पितामहक श्वसुरक पितामहसँ कन्या छठम स्थान-जेना सकराढ़ी मूलक परहट मूलग्रामवाला (१) ब्रजनाथ झा (२) हुनक बालक हर्षनाथ झा (३) हिनक बालक सिद्धिनाथ झा (४) हिनक जमाय पीताम्बर झा (५) तनिक बालक शशिनाथ झा (६) हिनक कन्या- अस्तु, सकराढ़ी परहट ब्रजनाथ झा पाँचम छठि कहौताह।
(अनुवर्तते)

१३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर
श्रीकर-
श्रीकर प्रथम मैथिल निबन्धकार छलाह। विज्ञानेश्वर, हरिनाथ, जीमूतवाहन चण्डेश्वर ठाकुर ई सभ श्रीकरक विचारक उल्लेख कएने छथि। श्रीकर एहि हिसाबसँ सातम शताब्दीक बुझना जाइत छथि।
श्रीकर याज्ञवल्क्य आऽ लक्ष्मीधरक बीचक सूत्र छथि। ओऽ कल्पतरु लिखलन्हि, जाहिमे १४ भाग छल, मुदा हुनकर कोनो कार्य एखन उपलब्ध नहि अछि।
श्रीकरक अनुसार आध्यात्मिक लाभ उत्तराधिकारक लेल आवश्यक अछि। चण्देश्वर ठाकुर अपन राजनीतिरत्नाकरमे श्रीकरक सिद्धांत ई सिद्धांत रखने छथि, जे गरीबक अधिकार राजा आऽ राज्यक सम्पत्तिमे छैक।

१५.मैथिली भाषापाक रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर
इंग्लिश-मैथिली कोष
मैथिली-इंग्लिश कोष

इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।
मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ।
रसमय कवि चतुर चतुरभुज शब्दावली
रसमय कवि चतुर चतुरभुज- विद्यापति कालीन कवि। मात्र १७ टा पद्य उपलब्ध, मुदा ई १७ टा पद हिनकर कीर्तिकेँ अक्षय रखबाक लेल पर्याप्त अछि। उदाहरण देखू-
दिन-दिन दुहु-तन छीन, माधव
एकओ ने अपन अधीन।
हे कृष्ण! दिनपर दिन दुनूक तन विरहसँ क्षीण भेल जाऽ रहल अछि, आऽ दुनूमे केओ अपन अधीन नहि छथि।

विहि- विधाता
सञानि- युवती
तनु- वयश, देह
आँतर- अन्तर, भीतर
गोए- नुकाएब
वेकत- व्यक्त
गेहा- ठाम
परि- प्रकारे
विरहानल- विरहक आगि
काँती- कान्ति
धमित- धिपाओल
निरूपए- निरीक्षण
परिहर- उपेक्षा
अचिरहिँ- अल्पकालहि
वामे- प्रतिकूल
निअ- निज, अपन
मलयज- चानन
सयानि- विरह विदग्धा नायिका
धनि- धन्या-नायिका
हेरसि- निहारैत
हरषि- हर्षित भए
परिहरि- मेटाय
नखत- तरेगण
मधुरि-दल- उभय-ओष्ठ
मनसिज- कामदेव
अवनत- नीचाँ झुकनाइ
हुतासन- ज्वाला
(अनुवर्तते)
मैथिलीक मानक लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
1.
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा
जकर,तकर जेकर, तेकर
तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
अछि ऐछ, अहि, ए।

मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य अग्राह्य
एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20.
ग्राह्य अग्राह्य
1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए
61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
किछु आर शब्द
मानक मैथिली_३
तका’ कए तकाय तकाए
पैरे (on foot) पएरे
ताहुमे ताहूमे
पुत्रीक
बजा कय/ कए
बननाय
कोला
दिनुका दिनका
ततहिसँ
गरबओलन्हि गरबेलन्हि
बालु बालू
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
जे जे’
से/ के से’/के’
एखुनका अखनुका
भुमिहार भूमिहार
सुगर सूगर
झठहाक झटहाक
छूबि
करइयो/ओ करैयो
पुबारि पुबाइ
झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
पएरे-पएरे पैरे-पैरे
खेलएबाक खेलेबाक
खेलाएबाक
लगा’
होए- हो
बुझल बूझल
बूझल (संबोधन अर्थमे)
यैह यएह
तातिल
अयनाय- अयनाइ
निन्न- निन्द
बिनु बिन
जाए जाइ
जाइ(in different sense)-last word of sentence
छत पर आबि जाइ
ने
खेलाए (play) –खेलाइ
शिकाइत- शिकायत
ढप- ढ़प
पढ़- पढ
कनिए/ कनिये कनिञे
राकस- राकश
होए/ होय होइ
अउरदा- औरदा
बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
चलि- चल
खधाइ- खधाय
मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
कैक- कएक- कइएक
लग ल’ग
जरेनाइ
जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
होइत
गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
चिखैत- (to test)चिखइत
करइयो(willing to do) करैयो
जेकरा- जकरा
तकरा- तेकरा
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
हारिक (उच्चारण हाइरक)
ओजन वजन
आधे भाग/ आध-भागे
पिचा’/ पिचाय/पिचाए
नञ/ ने
बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
तखन ने (नञ) कहैत अछि।
कतेक गोटे/ कताक गोटे
कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
लग ल’ग
खेलाइ (for playing)
छथिन्ह छथिन
होइत होइ
क्यो कियो
केश (hair)
केस (court-case)
बननाइ/ बननाय/ बननाए
जरेनाइ
कुरसी कुर्सी
चरचा चर्चा
कर्म करम
डुबाबय/ डुमाबय
एखुनका/ अखुनका
लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
कएलक केलक
गरमी गर्मी
बरदी वर्दी
सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
एनाइ-गेनाइ
तेनाने घेरलन्हि
नञ
डरो ड’रो
कतहु- कहीं
उमरिगर- उमरगर
भरिगर
धोल/धोअल धोएल
गप/गप्प
के के’
दरबज्जा/ दरबजा
ठाम
धरि तक
घूरि लौटि
थोरबेक
बड्ड
तोँ/ तूँ
तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
तोँही/तोँहि
करबाइए करबाइये
एकेटा
करितथि करतथि
पहुँचि पहुँच
राखलन्हि रखलन्हि
लगलन्हि लागलन्हि
सुनि (उच्चारण सुइन)
अछि (उच्चारण अइछ)
एलथि गेलथि
बितओने बितेने
करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
करएलन्हि
आकि कि
पहुँचि पहुँच
जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
से से’
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
फेल फैल
फइल(spacious) फैल
होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
फेका फेंका
देखाए देखा’
देखाय देखा’
सत्तरि सत्तर
साहेब साहब

VIDEHA FOR NON RESIDENTS

1.VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT

2.Maithils and Goa
THE COMET- English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti.

YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार
Year 2008
ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी

madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी
raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया

sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी

kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत

chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र

Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी

karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा

agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम
pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ

vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन

srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत
matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या

kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन

vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति

patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी
kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस

deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा

bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया

khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना

chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य

samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना

akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी

devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा
shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ

navan parvan 4 dec. नवान पार्वन

vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी

Year 2009
makar sankranti 14 january मकर संक्रांति

narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी

mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या

sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा

achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी

mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन
holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत

ramnavmi 3 april रामनवमी

mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल

akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया
shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त

janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी

gangadashhara 2 june गंगादशहरा
somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या
jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ

saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी
aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा

VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT—

Basarh seal shows that in Tirabhukti, the Kumaumatya was entrusted with the district administration to the provincial governors called uparika.
The Panchobh copper-plate grant deed of Ramagupta appears to continue the dominance of Later Guptas over the Southern part of the province . Sangramagupta granted a village Vanipama in district Jambuvani to a Brahmana called Kumira Swami of Sandilya Gotra,.learned in Yajurveda and belonging to Kola chanula.
After the Guptas, Mithila formed a part of Harsha’s Empire which included Lord of Five Indies have been interpreted as, Lord of Punjab, Kanyakubja, Mithila, Bengal and Orissa.

Harsha left no son to succeed him, Arjuna or Arunusva, in¬charge of Tirabhukti, claimed imperial status and forced neighbouring provinces to submit to him. Madhavagupta who became independent, must have resisted the pretensions of Arjuna. A chinese mission was going to Magadha and Arjuna attacked the mission. This assault brought about the invasion of his kingdom by the Tibetan army swooped down upon Tirhut, the kingdom of Arjuna and stormed his capital and also other towns of the kingdom. He was captured and it was quite possible that Tirabhukti was brought under Tibetan imperialism aided by the Nepalese army. King of Tibet,
established his sway over Mithila, along with Nepal. Tibetan rule in Tirhut lasted only for about half a century A. D. 647-8 to 703 A.D.
Arjuna attacked a Chinese mission killed most of the members of the mission and plundered their property. Want hiuen-tse fled to Nepal, secured 7,000 soldiers from Nepal and 1200 from Tibet and returning to Indian plains, disastrously defeated and imprisoned Arjuna and took him a captive to China.

Gopala : The palas of Bengal extended their influence over the whole of Eastern India¬. The Palas inscriptions of earlier times do not allude at all to any glorious and legendry descent as they were Buddhists. The foundation of the Pala dynasty in Bengal goes back to Gopala, put an end to the state of anarchy which prevailed in Bengal after the death of Sasanka.
Gopala is also credited with the foundation of the Nalanda Vihara , reduced Magadha also under his power.

Dharmapala (c, 783-818 A. D.) really raised the glory of Palas to Imperial heights, Mithila was an integral part of its central stru-cture being directly administered by the king himself. Dharmapala fought with the Pratiharas and made himself the real master of Kanauj and installed his protege chakrayuddha to the throne as a vasal ruler.
The Karnatas and the Latas are mentioned among royal officers in the Nalanda Inscription of Dharmapala.
Devapala (c. 818-850 A D.) continued his hold over Mithila, Mudgagiri (Munger) became an important administrative centre.
Badal pillar inscription of Narayanapala- the victories of the time of Devapala are credited to the hereditary ministerial family, Darbharai and his grandson Kedara Mishra who were Maithil. Devapala’s reign is the high water mark of the Pala imperialism.

Bhagalpur Inscription definitely uses the word Tribhukti for Monghyr.

Vigrahapala I is the sams as Surapala mentioned in the Hadal Pillar inscription of Guravamisra,, because it is the only name mentioned between Devapala and Narayanpala, and again in the Bhagalpur grant.
Narayanpala (c. 863-916 A.D.) again Pala domination over Mithila. granted from Mudgagiri (Monghyr) a village in Tirabhukti to the Shrine of Siva.

The Bhagalpur copper Plate of Narayana¬pala – Guravamigra was holding a high office-that of a dutaka of a royal grant. After his accession Narayanapala became reconciled with the mini¬sterial family and pardoned Guravamisra for the part that he or his father might have played during the internal troubles in the family.
The Dighwa-Dubauli plate was issued by Mahendrapala -a village grant about 40 Kms. South east of Gopalaganj in the Saran District- , hold of Mahendrapala over North Bihar. His last known date is 907-08 A.D.
Mahipala’s authority over Tirabhukti is proved by two identical ima¬ges inscriptions found in the village of Imadpur in the Muzaffarpur.
In 1019 A.D. Kalachuri Gangeyadeva was ruling over Tirhut, and therefore Mahipala I must reconquered it from Kalachuris .
Nanyadevaof Mithila who came to the throne in 10th century AD.

“Gaudadlivaja” -the correct reading being ” Garudadhvaja”, few possibility of identifying Gatigeyadeva of Tirabhukti with the Kalachuri King.Ganga or Gahga-deva, son of Nanyadeva (1097-1147 A. D.).
Mithila might have passed into the hands of some other ruler than the Palas.

Ramapala attempted a partial rejuvenation. Chedis of Tripuri, the Karnata’s of Mithila, the Raivartas of North Bengal. the Rashtrakuta of Pithi (in Bihar), the Chand¬isis of Kanauj and the Senas of Eastern Bengal hammered at the Pala king¬dom, which ultimately disappeared by 12th century A. D.
Ramapala (c. 1084-1130) conquered Mithila from Raja king of Kaivartas.
Vaidyadeva’s Kanauli copper-plate refer to the conquest of the land of Rampala’s father by the expression “Janakabhu ” and not that of Mithila.
Dharmapala founded the famous Vikramasila Vihara .
The His¬tory of the 84 Siddhas and that of the celebrated Maithili poems called Chariapadas clearly show how valuable the influence of the Pala rulers was in the history of Buddhism and its thought.
By storming the capital of the Paramara King Bhoja I , destroying the Kalachuri King Karma, the Chalukya king Somesvara I paved the way for the Karnatic domination in North Indian politics
like Gahadavalas of Kanauj (or Kashi), the Senas of Bengal and Nanyadeva of Mithila.
Vijayasena (c 1095-1158 A.D.) made an attempt to conquer Mithila also. Nanyadeva claimed to have broken the power of Ganda and Venga- Nanyadeva’s son Gange¬deva, claimed to be the lord of Gauds , encounter of Vijayasena and Nanyadeva was indecisive and that Vijayasena’s attempt to bring under his domination, the whole of the basic Pala Empire met with a failure in so far as Mithila was concerned
Vallalasena
Vallalasena (c. 1158-1179 A. D.)-Vallala Charita – dominations of Vallalasena comprised five province, viz., Vanga, Varendra, Radha, Bagdi and Mithila.
Lakshmanasenu (c. 1179-1205 A. D) was perhaps one of the greatest Kings of Bengal. His court was adorned by emiment poets- Umapatidhara Maithil ,Govardhanuclrarya was certainly a Maithil. Vidyapati records the story of an actor who died while impersonating Rama’s viraha before his court , an-era in Mithila after him- one Lakhanackanda in the Ragatarangini of Lochana.
Chronicle of one Mukunda Sena is preserved in Nepal Durbar Library.
Karnata kings were in the modern province of Bihar from even the 6th Cen. A. D,brought with him Karnatic pandits to propagate their culture. Nanyadeva brought scholars rldharadasa, the author of the Sadukti¬karpamrita. A great .scholar and Vidyaguru of Vacha¬spati, Trilochana might have come to Mithi¬la along with the Kings of Karnata .

Ajay Thakur, presently living at Vasco da Gama, Goa.is associated with Broadcast Journalism. Presently he is doing research study on Goa and Maithils.
GOA IS PARASHURAM’s MITHILA

It is Sunday. About 6 pm in the evening. It is raining outside the Saibaba Temple on the outskirts of Cuchelim in Mapusa, Goa. Inside Lalan Jha clears his throat “laale laale arhul kerka aabait achi”. There is a hush. A lone voice “Bhaiya, hum sunn ney to cheliyaah, muda ahaa pher sau kahiyon”. Lalanji breaks into the song as the 25 strong crowd accompanies him. The song Maithili, the place Konkan. What is the connection. This is no ordinary temple, this is no ordinary place, this is no ordinary land. And this is no ordinary connection.

If I say Goa to You, what will come to your mind. Beautiful white beaches, white skinned angrez wearing less or no clothes lying or swimming in sea, people wearing skirt and blouse, drinking wine-beer-whisky, indulging in all vices. Let Me disappoint You. And take You to a Goa that is a part of Mithilaanchal. And it would not be wrong to say Goans are from Mithilaanchal.

The famous singer, Lata Mangueshkar comes from a small village called Mangueshi. This village is named after the resident God Shri Mangesh. An avatar of Shiva. The history of Shri Mangesh or (Shri Mangueesh or Shri Mangireesh) dates back to the Puranas. In the Ramayana we know of how Lord Parashuram wiped the Kshatriyas off the face of Earth thrice was doing penance when Rama broke Shiva’s Bow in Janakpur (Capital of Mithila / Tirhut), Parashuram stormed in to Janak’s (Sita’s Father) Court to kill Rama as he (Parashuram) had sworn to wipe all Kshatriyas from Earth. But when Rama told him that his (Parashuram’s) time was over and that he (Ram) was his (Parashuram’s) own next Avatar (both Parashuram and Ram are Vishnu’s Avatar or reincarnation)…Parashuram apologised and left the court.

The Sahyadri Khand of Skand Purana says that Parshuram invited 66 Panch Gaud Brahmins belonging to 10 gotras from Trihotra (believed to be Tirhut in Bihar) to Kushasthal (now known as Kutthal or Cortalim, Goa) for performing the Yagya after wiping out the Kshatriyas. 96 families of the Goud (meaning northern) Saraswats came to the southern half of India and hence carried the appellation of ‘northern’ in the form of the word Goud. In view of the 96 families who formed 96 settlements in Goa – Sasashti (66) is now called Salcette, then Tissuari (30) which is now known as Tiswadi. There were further settlements in Baradesh (12 settlements) now known as Bardez where the 16th International Maithili Conference was held.

The Gowd Saraswats have built many temples in Goa like the Ramnathi temple in Loutolim, and the Mangueshi and Shantadurga temples in Kushasthali and Quellosim along with people from the other Hindu castes. Each group had brought with it the idol they used to worship and installed it in the villages donated by Parshuram out of the land reclaimed by him from the sea. The legend has it that his arrow hit Banahalli (Benaulim in Goa) where Lord Varuna (Sea) stepped back and released a fertile land. Even today, Benaulim has acres of fertile land where paddy is grown which is the only area, which has proofs of being retrieved from sea.

While the Tiswadi commune was migrants from Kanyakubja, Shashatis were from Mithila. There is a view that these settlements together were 96 and referred as Sahanavis (Saha means six and Navi means ninety) and later as Shenvis. These settlers belonged to 10 Gotras – Bhardwaja, Koushika, Vatshya, Kaundinya, Kashyapa, Vasishtha, Jamdagni, Vishwamitra, Gautam and Atri.

Those belonging to the Vatsa and Kaundinya gotra received Kushasthal as gram dan and installed in the village their family deity, Shri Mangireesh. The Purana explains that the Bramha had established the Shivalinga at Monghir in Trihotra (Tirhut) and it came to be known as Mangireesh or Mangeesh.

Once settled down, they all continued in their traditional professions of administration and education. Those Saraswats who were intelligent and lucky got royal patronage and positions in governance in due course of time. But the opportunities in these familiar professions were limited in Goa at that time. So some enterprising Saraswats branched out into the practice of trading. The successes of these pioneering Saraswat traders encouraged many other Saraswats to whole-heartedly adopt trading as a mainstream profession.

So while we are yet to see a Maithil Tata or Birla, Goa is actually led by Salgaocars, Dhempos, Timblos & Chowgule all Goud Sarwaswat Brahmins from Tirhut or Mithila.

Today there are more than 2000+ Maithils who stay in Goa and can be found mostly in and around Mapusa, the shipyards dotting Zuari and in the Indian Navy. But there is a lot of commonality that still exists if not culturally then definitely genetically. Just like our Kuldevi they have a Kuldevata in each household. A lot of stress is given in the practise and understanding of vedic rituals just like us.

In habits they love the fish as we do. Just like us they lay more stress ineducation first then getting into profession. Respect to elders, joint family system above nuclear families and stress on karmakaand. Goans are quite like us.

This place is as peaceful as Mithila (all of us agree it is that part of Bihar which has very low crime rate). The umpteen number of ponds and water bodies of Goa reminds Maithils of the umpteen pokhars (pond) and dhars (streams) of the Kamala Balan plains.

So when Railway Minister Lalu Yadav announced the starting of Vasco – Patna Express on our demands, the thought that crossed my mind was isn’t it strange that our forefathers followed the same route years ago to discover Go-rashtra or Goa now, generations will take a train to recreate the historic journey”? I took the route long ago, Why don’t You?

English Translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor’s choice award from http://www.poetry.com and her poems were featured in front page of http://www.poetrysoup.com for some period.Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
SahasraBarhani:The Comet
Environment of outside was warm with the discussion of maintenance of wrestling spot. The game of wrestling in morning was really enjoyable. Children and youths of all ages used to gather in the morning. The ground of wrestling place was as soft as a mattress. It was made by ploughing and filtering the soil. Jhingur Babu was missing his son not finding him in the group of other children. People used to console him by reminding how important the study of his son was because of what he is apart from him. Earlier there was only one wrestling loving Thakur family in the village that came from Akkour years ago. Now there are five such families. The Thakurs have now got an equal share in the distribution of fish of dakhi pond, equivalent to a tola of village. Now there are eight families participating in wrestling considering children belonging to the same age group of Kalit. These boys had already achieved the dignity of being recognised as wrestlers. A messenger reached with a message written in Tirhuta on a bhojpatra. After giving one small bucketful of water and a lota to the messenger Jhingur Babu read the letter. It was probably an invitation for sacred thread ceremony called upanayan sanskaar. “Don’t forget to visit the fair of Paratapur”, He insisted to the messenger. He felt a true affection towards the relative related to the old generations of his family through mool and gotra. He started reading letter in his courtyard:
Respected Jhingur Babu! As adorable as Lord Vishnu! Please accept Gulab’s millions pranaam (great respect) to your sacred feet. Everything is fine here. I am very pleased to announce the sacred thread ceremony of my two sons – Shree Ganesh and Shree Chandramohan. Your great grandfather and my great grandfather were classmates. My grandfather had instructed me to be in touch with people of same gotra. Any news whether it is good news or sad news should be exchanged within our villages otherwise ignorance of maintenance of ashauch may prove harmful for both of us in future. At present I would like to request presence of five of you respected thakurs in this auspicious ceremony. You are supposed to be aacharya of my elder son. The area around Partapur was visited by you so lots of people are curious to talk to you. Your arrival on the first Monday of the next month will assure the flawless continuation of all preparation. The ceremony will be started from the following Wednesday. Good bye.
The sabhagachhi- the famous meeting place used to be under dense woods of Partapur at the bank of the river Balan. The river of Balaan was very deep and calm. Once a huge tree from Himalayas fell into it and blocked its way. The river was split into two parts. In this way a new river Kamala was born. The river of Balaan is flowing towards Jhanjharpur and Kamala is directed towards Maihath, Narua and Gariyar. Balan is very deep and clear. No sand peep through it; on the contrary, Kamala is not so deep but very wavy and very destructive. Sand and water started disturbing the land adjacent to this river in flood. Depth of Balan is same throughout the year. Crossing it without boat is not possible even in summer. But, Kamala is shallow enough to be crossed by pedestrians in summer. The previous spot of sabhagachhi in Partapur was destroyed by one of such destructive floods by Kamala and the sabhagachi place was shifted to the village of Saurath. But, in the age of Jhingur Babu, Partapur used to be the centre of panchkoshi- the area that conserves the authentic Mithila culture. Although Sabhagachi was shifted to Saurath later on, Partapur remained as the centre of panchkoshi.
“Kalit is returning on day after tomorrow, I will take him to Akkour. The poor boy! He has been apart from family for a long time. I will take him to his maternal uncle’s place and my sister’s place this time.” Jhingur Babu thought.

As per plan both father and son reached Ekkour. Jhingur Babu didn’t find this himself a stranger in this village in any respect. The usual tradition of intellectual discussion was going on in gathering of scholars there too. The topic was the British rule and Indian Army structure. Being a part of army Mangaru Babu had witnessed many wars in his red uniform. He started describing his experience of accompanying Sir Charles Napier in the British 1867-68 expedition to Abyssinia. He also described how lack of time was resulted in faded uniform in lieu of red uniform to the soldiers in the second war of Afghanistan. The same uniform became famous as khaki uniform after that. The Enfield rifles used in 1857 revolt of Indians struggling for freedom are replaced by bigger snider rifles in 1887. Mangaru Babu also talked about Congress. On the other hand Jhingur Babu became busy in listing and estimating things for coming feast. Kalit too found companions to play with. Fannu Babu from Raje village was also present among those scholars. His sister and brother-in-law were living in Ekkour so he used to visit the village quite frequently. He had not seen Kalit in that village earlier. He became curious about Kalit. When Fannu Babu came to know that Kalit was Jhingur Babu’s son he went to him. There he came to know that getting permanent employment in Jamindari, Kalit got the authority to collect cess in Mithila region on behalf of Darbhanga Raja and he was to go to Katihar for that work. Meanwhile, Kalit had also completed study of Farsi and English. As long as Kalit’s marriage was concerned, Fannu Babu was also looking for an appropriate groom for his daughter. Then it was agreed that Fannu Babu would visit Partapur Sabhagachi and give Jhingur Babu a chance to host him. But as soon as that marriage proposal was known relatives of Jhingur Babu they forced him to finally fix the marriage and complete the formality of Siddhant in Bharam. He was suspecting his wife’s refusal but, against his anticipation, his wife was filled with ecstasy when she heard that. All her worries, that had been for last four days, seemed to be disappeared at once.
There were only two options of transportation- walking of feet or bullock cart. The barat started its auspicious journey- Groom in a mahfa, young people on feet and other elders on bullock cart. The group of servants were following them. A warm welcome was performed in arrival of barat at the door by the people from bride-groom side. As soon as they reached the bride-groom’s house a barber washed their feet; perfume was spread; posies were presented; and snacks were served. And then chatting was started – intellectual as well as humorous. The courtyard was venue for all rituals of marriage and the guest-area in outside place of social meeting. The conversation of barat was interrupted by some querries like “where is jewellery?”, “who will present gift to bride at the time of ghoonghat”, and “where is sari for ghoonghat?” every now and then. In this way, the environment of courtyard as well as the environment of outside of the house was filled with joy till 5 o’clock of the morning. The sacred thread of marriage was tied on the couple’s arms that remained for four days. After that marriage was completed. After few days passed, Jhingur Babu informed the auspicious day and Kalit returned to his parent’s place from in-law’s house. Now he had to start for Katihar. It was an emotional moment for Kalit to apart from his mother and other people of the village. He started to Katihar after bidding them bye.

Crossing the area destructed by the river of Koshi Kalit reached Katihaar and became expert in his work very soon. Due to overburden of work he called his cousin and nephew to share the work. It didn’t take time to gain good fame for Kalit. People living in that area had very bad experience regarding the final settlement of Jamindari. Kalit had removed the corruptions in the work. But the destiny had decided something else for him. Kalit’s mother died before the second marriage that is arrival of bride in her in-laws house. She had many dreams about her daughter-in-law. Sometimes she used to say that she would fight with her daughter-in-law to test Kalit that whom he would support. Jhingur Babu stared being very miserable. Kalit told him to come with him. But it was not easy for him to leave the place where he had spent all his life yet.

Kalit’s second marriage ceremony was settled on third year of first marriage. Jhingur Babu was little bit relaxed after that. He told to Kalit that when Kalit had been living out of house most of the time for his studies, Buchia was taking care of the parents. He was thinking that he would find a groom for Buchia himself but death of his wife had made him very weak. He added, “As you are self-dependent now. If someone has a son as young as five years old people use to tell him that he shouldn’t worry as he has a five year old son. And you’re well educated and earning son.” After handing Buchia’s hand over to his daughter-in-law Jhingur Babu died. Kalit had never seen him in so hurry. He used to be cool and patient. He used to worry about the fruits of his harvest. But separation from his life partner made him so impatient that he didn’t wait for crop harvest.

While staying in Katihaar, Kalit kept on worrying about marriage of Buchia. He never had such worries when his father was alive. But now he had to prove that Buchia was not an orphan in absence of her parents. Marriage proposal couldn’t be raised till first death anniversary of Kalit Babu. After giving a grand feast to villagers on the first death anniversary of his father Kalit had started the searching the groom for Buchia. He had visited the Paratapur Sabhagachhi but he didn’t find any groom suitable for Buchia. The leave of fifteen days from work was wasted. While working he came to know about some Maithil families from Giddhhaur, Baarh etc. the villages situated on the south of the river of Ganges. He liked a boy from Baarh who was working in estate of Giddhaur.
He visited Giddhaur to meet the boy without delaying. The boy possessed impressive personality. Seeking address from the boy he reached Baarh and talked to boys father. The marriage proposal from Panchkoshi had reached the village after a long time so none was intended to refuge it. After fixing everything and completing the formality of registration called Siddhant in Bharam he reached Mehath. Everyone was shocke to know this. So was the father, so is the son. Jhingur Babu had done the same thing when he fixed Kalit’s marriage; after doing Siddhant he informed everyone. Same thing is repeated by Kalit. However marriage was fixed outside the familiar area but since Kalit had been living in that area so having faith in Kalit’s experience and decision everyone in village accepted this marriage happily. The entire Tole started preparation of that marriage. Buchia would not have any problem. She was blessed with all good qualities. Either it is question of singing song or cleaning worship place she was expert. She could make thousands of Mahadev so efficiently in a minute. Wherever she would go she would enlighten the place.

Marriage ceremony was finished in the best traditional way. The groom side has proposed the second marriage to be followed immediately but Kalit didn’t agree so they had to return with the print of hand of the bride. Kalit’s wife was very good and she had established sisterhood with Buchia. Buchia was also fond of her sister-in-law. The second marriage was fixed in the third year. The maid who was sent with Buchia to her in-laws place started explaining about that place. Kalit’s wife became emotional. She used to ask Kalit about the village of Barh. Everything can be settled by time. Buchia had come twice or thrice from her in-law’s place, her sister-in-law became relaxed. In this way Kalit had become alone again. He had to spent the threatening nights with his wife, two daughters and a son on the bank of the Mahadev pond during the earthquakes of 1934. After that he went to Katihaar again. The reason was the consequences of several earthquakes that had been occurring for a month. But wife had started worrying about the house. His old house was destroyed in the earthquake so Kalit had made a new house on the side of the fulwadi. He established his new house in the new land after giving the old land to his relatives. He got one more son and one more daughter afterwards. Family life of Kalit had started going on as usual. Good days don’t take time to pass. His daughters grew as well. However own child always seems to be a child but it was time to arrange marriages for daughters. His first daughter got married to Kachhabi and the second one to Kharak. Family of Kachhabi was also employed in Raja’s place. It was a royal ceremony, horse, mahfa etc. etc. But the first daughter died while giving birth to her daughter who started living with Kalit’s family. However, she was also not blessed with long life and died at the age of five years after being suffered by a stomach pain. Kalit Babu kept on witnessing all this facts of life and deaths. Sometimes the villagers were suffering Cholera sometimes Plague and many more. As soon as one dead body was burned another death used to be noticed. But Kalit’s family was untouched.
Kalit had been rewarded by promotion and growing fame every now and then. His cousin and nephew’s family were living with him as usual. His both sons were studying in Kejariwar High School. After finishing marriage ceremony of his third daughter in Aamarupi, a village near Tamuria, he became relaxed. His elder son got married and he had full confidence in his younger son’s academic talents. But he also knew that his younger son was very superstitious. Because once a rumour spread that in dense fields of gram some miserable things used to happen then his younger son went to see that. When it was time to select one subject from Science and Arts Kalit Babu agreed with his younger son to opt Science. Many people told him that Satyanarayan Babu and many boys couldn’t pass in science so they had to restart by selecting Arts. But Nand didn’t agree. Rather, he had opted for Maths amongst other Science subjects. Kalit thought that by studying science Nand would not believe in the invisible but omnipresent God anymore. Kalit seemed to be very carefree after that. Once he returned from Katihaar and was washing his hands after coming from toilet , suddenly lota fell out from his hand and he himself fell down on the ground. His wife ran to him but it was too late. Life comes once and goes once as well. Nand had witnessed his father’s death. This form of death had always remained unique and mysterious for Nand. The authenticity of Scientific principles were diminishing in front of the power of almighty God for Nand.

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रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल।
सिद्धिरस्तु

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