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विदेह १५ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक २०-part-ii

In विदेह १५ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक २० on जनवरी 13, 2009 at 4:40 अपराह्न

विदेह 15 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 8-part-ii
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
अपन-अपन दुख
ओहि राति पत्नी दुखित छ्लीह । पीठ मे दर्द होइत रहनि। घरक भितरिया बरंडा पर खाट पर पड़ल छलीह। निन्न नहि होइत छलनि। धीयापूता क आवाजाही, गपशप, खटखुट निन्न नहि होअय दनि। ओ अति ध्वनिग्राही छथि। सेंसिटिव माइक्रोफोन जकाँ छोट-छोट ध्वनि-तरंग सँ कम्पित भs जाइत छथि। धीयापूता केँ बरजैत धथिन — अनेरो टहल-बूल नहि, हल्ला-गुल्ला नहि कर, रेडियो नहि बजा। कतेको बेर अड़ोस-पड़ोस सँ अबैत टी.वी. या रेडियोक आवाज सुनि कs पुछैत छथिन—‘अपन रेडियो बाजि रहल अछि ?’
सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। धीयोपूतोक अपन संसार छैक। ओ सभ कखनो मायक बात सुनैत अछि, कखनो नहि सुनैत अछि आ संसारक अपन कल्पनाक रमणीयता मे डूबल रहैत अछि। अवहेलना सँ पत्नीक खौंझ बढ़s लगैत छनि। तनाव चरम सीमा पर पहुँचि जाइत छनि तs चिकरि उठैत छथि आ धीयापूता केँ सरापS लगैत छथि। धीयापूताक कोमल भावुक संसार आइना जकाँ चूर भs जाइत अछि। ओहि राति हम कनेक देरी सँ घर घूरल रही। देर सँ घुरब पत्नीकेँ पसिन्न नहि छनि। हमर ई दिनचर्या हुनका लेल घोर आपत्तिजनक आ विपतिजनक। देर सँ घुरबाक अर्थ अछि देर सँ सूतब आ देर सँ सुतबाक अर्थ अछि पत्नीकेँ देर धरि कम्पित करैत रहब।
तs ओहि राति घर पहुँचला पर परिस्थिति बूझबा मे भांगठ नहि रहल जे भानस –भात नहि भेल अछि, पत्नी कोनो कारणे सूतलि छथि। एना कतेको बेर भेल अछि। सूतलि रहथु , विघ्न नहि होनि ई चेष्टा करैत धीयापूताक सहयोग सँ हम भानसक उधोग मे लागि गेल रही । मुदा पत्नी निन्न्मे नहि छलीह; कलमच पड़ल छलीह। एहि परिस्थितिक लेल जेना सफाइ दैत आ अपन जागरण तथा कष्ट केँ जनबैत पत्नी अचानक चनकि उठलीह — ‘आब अखन सँ शुरू भs गेलैक गाँड़ि घुमौनाइ। हौ बाप, ई सभ कखनो चैन नहि दैत अछि। भगवान, मौगति दैह !’
एकटा सनसनाइत तीर सन शांति पसरि गेल । पत्नी उठि कs दोसर कोठली चल गेलीह।
घंटा- दू घंटा बीतल। ओहि दिन बहुत थाकल रही। सोचलहुँ खा कs सूति रही। पत्नी केँ जखन निन्न टुटतनि, खा लेतीह। निन्न मे उठा देला पर हुनका फेर निन्न आयब कठिन होइत छनि। तेँ हुनक भिड़काओल केबाड़ केँ आस्ते-आस्ते ठेलि चछरि लेबा लेल भीतर गेलहुँ। मुदा हमर पदचाप आ उपस्थिति सँ हुनक निन्न टूटि गेलनि। हुनका जागल बूझि हम कहलियनि- ’खा लियs।’ ओ करोट फेरलीह, बजलीह किहु नहि।
हम दोसर कोठली मे जा कs सूति रहलहुँ। पता नहि कतेक राति भेल हेतैक । हमरा क्यो जगा रहल छल । निन्न केँ ठेलैत हम अख्यास करs लगलहुँ के अछि, की कहि रहल अछि। ठीक-ठीक मोन नहि पड़ैत अछि, मुदा लगैत अछि हमर आँखि नहि खुजल रहय। कान मे पत्नीक स्वर आयल, लेकिन बुझायल नहि ओ की कहि रहल छथि । पुछलियनि – ‘की कहैत छी?’
कहलनि— ‘की भेल अछि? एना कियैक करैत छी?’
हम सोचय लगलहुँ , हमरा की भेल; हम कोना करैत रही। तखन ध्यान गेल, गला मे कफ फँसल अछि। खखारि कs ओकरा गीड़ैत अन्दाज कयलहुँ हम घर्राइत रहल होयब आ पत्नी डरि गेल हेतीह।
हम फेर लगले निन्न पड़ि गेलहुँ। पता नहि कतेक समय बीतल हेतैक। घंटा कि आध घंटा । पत्नीक आवाज कानमे आयल- ‘सुनै नइँ छिऐ ?’
पुछ्लियनि—‘की?’
कहलनि—‘लोककेँ सूतs देबैक कि नहि ?’ देखलियनि चौकी सँ कने हटि कs ठाढ़ि छलीह । हमरा भेल हम फेर घर्राय लागल होयब। गरामे अटकल कफ केँ घोंटैत स्नेह सँ पत्नी केँ पुछलियनि- ‘भोजन कयलहुँ?’
पत्नी कोनो जवाब नहि देलनि आ चल गेलीह। भेल जे खा लेने हेतीह तेँ नहि बजलीह। एहि बेर निन्न तुरन्ते नहि आयल। चिन्ता भेल कफ किएक बढ़ि गेल अछि । मोन पड़ल पत्नी कतेक डेरा गेल छलीह। फेर पता नहि कखन निन्न पड़ि गेल ।
भोरमे पत्नी सँ पुछलियनि— ‘रातिमे दू-दू बेर किएक जगौने छलहुँ’, तs कहलनि- ‘पारा जकाँ डिकरैत छलहुँ तेँ।’
हमरा एहि जवाबक आशा नहि रहय, तेँ एहि पर हठात विश्वास नहि भेल । पहिने एना कहियो नहि भेल रहय । हमर ठड़ड़ सँ अकच्छ भs कs ओ कहियो जगौने नहि छलीह । तखन हमर ओ कफ आ घरघरी कोनो भ्रम रहय ? हमरा भीतर जेना किछु कचकल। कने चुप रहि पुछलियनि— ‘खयने छलहुँ कि नहि ?’ कहलनि— ‘हँ, लोक ताला मारने रहैत छैक आ हम खा लैत छिऐक।’
हमरा बुझा गेल रातिमे धीयापूता खा-पी कs सूति गेल होयत आ भनसाघर मे ताला लगा देने हेतैक। पत्नी अपन भूख आ हमर फोंफसँ कुपित भs कs हमरा उठबैत छल हेतीह। हम उठि गेल रहितहुँ तs ओ खइतथि आ खइतथि तs निन्न पड़ि जइतथि । ओ तामसे भेर भेल भूखल रहि गेलीह। ठड़ड़ आघरघरीक दू टा संसार अछि। सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। संसारक अपन-अपन सुख होइत छैक, अपन-अपन दुख होइत छैक ।

२.विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब “कन्यादान” (हरिमोहन झा), “राजा पोखरे में कितनी मछलियां” (प्रभास कुमार चाऊधरी), “बिल टेलर की डायरी” व “पटाक्षेप” (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक ‘लोक’ पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक “मिथिला की लोक कथाएं” व “गोनू झा के किस्से” के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह “बन्द कमरे का कोरस” व “चल खुसरो घर आपने” तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह “खोह स’ निकसइत” छन्हि। हिनक लिखल नाटक ‘दूसरा आदमी, दूसरी औरत’ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक ‘पीर पराई’क मंचन, ‘विवेचना’, जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक ‘ऐ प्रिये तेरे लिए’ के मंचन मुंबई व ‘लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम’ के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। ‘आओ तनिक प्रेम करें’ के ‘मोहन राकेश सम्मान’ से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। “अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो” सेहो ‘मोहन राकेश सम्मान’ से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक “भाग रौ” आ “मदद करू संतोषी माता” अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।

विभा ‘दुलारीबाई’, ‘सावधान पुरुरवा’, ‘पोस्टर’, ‘कसाईबाड़ा’, सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म ‘धधक’ व टेली -फ़िल्म ‘चिट्ठी’मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक ‘मि. जिन्ना’ व ‘लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम’ (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
‘एक बेहतर विश्र्व– कल के लिए’ के परिकल्पनाक संगे विभा ‘अवितोको’ नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास ‘थिएटर व आर्ट– सभी के लिए’ पर अछि। ‘रंग जीवन’ के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के ‘विशेष’ वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, ‘विशेष’ बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।

श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि।
प्रस्तुत अछि विभाजीक कथा आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक। एहि कथापर हिन्दीमे विभाजीक नाटक लिखल गेल “आओ तनिक प्रेम करें” जकरा २००५ ई. मे मोहन राकेश सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल।

आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक
‘हे ये…, कत’ गेलहुँ? आऊ ने एम्हर।’
‘की कहै छी? एम्हरे त’ छलहुँ तखनी स’। कहू, की बात?’
‘किछु नञि! मोन होइय’ जे अहाँ अईठाँ बैसल रही।’
‘धुर जाऊ! अहूँ के त’ … एह! एतेक काज सभ पसरल छै। बरखा-बुन्नीक समय छै। दिन मे अन्हार भ’ जाइ छै। तइयो अहाँ कहलहुँ त’ बैसि गेलहुँ आ देखियौ जे लग मे बैसल-बैसल अनेरे कएक पहर निकलि गेलै। ताबतिमे त’ हम कतेको काज छिनगा नेने रहितह।ँ!’
‘आहि रे बतहिया ! सदिखन काजे-काज, काजे-काज ! यै, आब के अछि, जकरा लेल एतेक काज करै छी। सभ किओ त’ चलि गेल हमरा-अहाँ के छोड़ि के, जेना घर स’ बाहर जाएत काल लोग घरक आगू ताला लटका दै छै। हे बूझल अछि ने ई कहबी जे सभ किओ चलि गेल आ बुढ़बा लटकि गेल। तहिना हम दुनू लटकि गेल छी अई घर मे।’
‘एह! छोड़ू आब ओ गप्प सभ। आ हे, अपना धिया-पुता लेल एहेन अधलाह नञि बाजबाक चाही। आखिर हुनको आओरक अपना-अपना जिनगी छै। बेटी के त’ अहां ओहुनो नञि रोकि क’ राखि सकै छी। आनक अमानति जे भेलै। बाकी बचल दुनू बेटा त’ बूझले अछि जे जामुन तडकुन खेबाक आब हुनकर उमिर नञि रहलन्हि। एहेन-एहेन गप्प पर त’ ओ सभ भभा क’ हँसि पड़तियैक।’
‘नञि! से हम अधलाह कत’ सोचलहुँ आ कियैक सोचब। एतेक बूड़ि हम थोड़बे छी। मुदा, जे मोनक पीड़ा अहूँक संगे नञि बाँटब त’ कहू, जे हम कोम्हर जाइ।’
‘कतहु नञि! अहि ठाँ बैसल रहू। हम अहाँ लेल चाय बना क’ आनै छी। अहाँ जाबति चाय पियब, ताबति हम भन्सा-भात निबटा लेब।’
‘ठीक छै, जाऊ! अहाँ आओर के त’ चूल्हि-चौकी आ भन्सा भात स’ ततेक ने फैसिनेशन अछि जे किओ किछु कहैत रहय, अहाँसभ स’ ओ छूटि नञि सकैय’।
‘से नञि कहू। आई कोनो लड़की कि जनीजात चूल्हि मे सन्हियाय नञि चाहै छै। मुदा ओकरा आओर के त’ जन्मे स’ पाठ पढ़ाओल जाइ छै जे गै बाउ, बेटी भ’ क’ जनमल छें त’ चूल्हि स’ नाता त’ निभाबहि पड़तौ। कतबो पढ़ि-लिखि जेबें, हाकिम-कलक्टर भ’ जेबें, मुदा भात त’ उसीनही पड़तौक। आब हमरे देखि लिय’। हम की पढ़ल-लिखल नञि छी कि नौकरी मे नञि छी। माय-बाउजी भने पाइ स’ कने कमजोर छलाह, मुदा मोन स’ बहुत समृद्घ। तैं त’ पढ़ौलन्हि-लिखौलन्हि। नौकरी लेल अप्लाई केलहुँ त’ नीके संयोगे सेहो भेंटि गेल। आर नीक कही अपन तकदीर के जे अहाँ सन जीवन साथी सेहो भेटल जे डेगे-डेग हमर संग रहलाह। मुदा तइयो देखियौ जे बेसिक फर्क जे छै, से अहूँ की बिसरि सकलहुँ? आइ धरि कहियो कहलहुँ जे सपना, रह’ दियऊ अहाँ भानस-भात । हम क’ लेब कि घर ठीक क’ लेब कि धिया-पुता के पढ़ा लेब।’
‘आब लगलहुँ अहूँ रार ठान’। ताइ स’ नीक त’ सएह रहितियैक जे अहाँ किचन मे जा क’ अपन काज करू। हँ, चाय सेहो द’ दिय’।’
‘से त’ अहाँ कहबे कहब। बात लागल जे छनाक स’। अहिना त’ अहाँ आओर हमरा आओरक अबाज के बंद करैत एलहुँए।’
‘सपना, अहाँ एना जुनि सोचू। आई तीस बरख स’ हम दुनू एक संगे छी। पूर्ण भरोस स’, संपूर्ण आत्मसमर्पण, विश्र्वास आ सहयोग स’। हमरा बुते जे भ’ सकल, कहियो छोड़लहुँ नञि। ठीक छै जे हम कहियो एक कप चायोटा नञि बनेलहुँ, मुदा आदमी आओरक सहयोग देबाक माने की खाली भन्से मे घुसनाई होई छै? अहाँ मोन पाडू, हम कहियो कोनो बात पर टोकारा देलहुँ? अहाँ जे पकाबी, जे खुआबी, जे पहिराबी, जेना अहाँ राखी। कहियो कोनो आपत्ति कएल की।’
‘हमरा हँसी आबि रहलए अपन एहेन समर्पित पति पर।’
‘मुदा हमरा नञि आबि रहलए। हमरा गर्व अछि अपन एहेन सहयोगी पत्नी पर जे हमर कन्हा स’ कान्हा मिला क’ हमरा संगे-संगे चललीह। मुदा, आई ई सभ उगटा-पुरान कियैक?’
‘टाइम पास कर’ लेल आ अहाँ जे कहलहुँ, अई ठाँ बैस’ लेल, त’ बैसि के अहाँक मुंह त’ नञि निरखैत रहि सकै छी ने।’
‘निरेखू ने, किओ रोकलकए अहाँ के कि टोकलकए अहाँके।’
‘धुर जाऊ, अहूँ त…! आब ओ सभ संभव छै की? अरे, जहिया उमिर छल, जहिया समय छल, तहिया त’ कहियो हमर मुंह निरेखबे नञि कएलहँु आ नहिए निरखही देलहुं। चाहे हम किछुओ पहिरि-ओढ़ि ली, चाहे बाहर स’ हमरा कतेको प्रशंसा भेटि जाए, अहाँक मुंह स’ तारीफक एकटा बोल सुन’ लेल तरसि गेलहुँ। बोल त’ बोल, एकटा प्रशंसात्मक नजरियो लेल सिहन्ता लागले रहि गेल। आ तहिना अहांक पहिरल ओढ.ल पर कहियो एपी्रशिएट कएलहुँ, तइयो मुंह एकदम एके रस – शून्य, भावहीन …’
‘एह! एना जुनि कहू। अहाँक सज-धज देखिक’ हमरा जे प्रसन्नता होइत छल, से हम कहियो ¬नञि शेयर कएलहुँ अहाँ स’, से कोना कहि सकै छी। दिनभर अहाँक रूप आँखिक सोझा नचैत रहैत छल आ राति मे ओ सभटा प्रशंसा रूपाकार लेइत छल। तहिना अहांक मुंह स’ अपन, प्रशंसाक बोल भरि दिन चानीक घंटी जकाँ मोन मे टुनटुन बाजत रहैत छल आ मोन के उत्फुल्ल बनौले रहै छल। मुदा, अहाँ कहियो ओहि समय कोनो सहयोगे नञि देलहुँ या कहियो संग देबो केलहुँ त’ बड्ड बेमोन से’। हम कहियो पूछलहुँ जे अएं यै, एना कियैक करै छी अहाँ? अहींक मर्जी मुताबिक हम ओहूठाँ चलैत रहलहुँ।’
‘हे! सरासर इल्जाम नञि लगाबी। देखियौ, हमरा लेल जेना अहाँ महत्वपूर्ण छी, तहिना अहाँक प्रत्येक बात हमरा लेल महत्वपूर्ण अछि। हम अहाँक संग नञि देलहुँ अथवा बेमोन स’ देलहुँ त’ कियैक ने अहाँ पूछलहुँ कहियो, अथवा हम झँपले-तोपले किछु कहबो केलहुँ त’ कियैक ने तकरा पर बिचार केलहुँ, कहियो खुलिक’ चर्च केलहुँ.। … हे लिय’…, चाय लिय’… अपनो लेल बना लेलहुँ। भन्साघर स’ चिकरि चिकरि क’ बाज पड़ै छल। किओ सुनितियैक त’ कहतियैक जे बतहिया जकाँ एकालाप क’ रहल छै कि ककरो संगे झगड़ि रहल छै।’
‘चाय त’ बड्ड दीब बनलए।’
‘एह! याहि टा गप्प पहिनहुँ कहियो कहने रहितहुँ। अई तीस बरख में आइए नीक चाय बनलैय’ की?’
‘छोड़ू ने पुरना गप्प सभ! आब धीया-पुताक घर में ई सभ कथा-पेहानी नीक लागतियैक की?’
‘कियैक ने नीक लागतियैक? ई सभ त’ जीवनदायी धारा सभ छै जाहि स’ जीवनरूपी वृक्षक डाल-पात सभके भिन्न भिन्न स्रोत स’ जीवनशक्ति भेटैत रहै छै। अरे, धिया-पुताक सोझा अहाँ कहिये दितहुँ त’ अई मे कोनो ऐहन अधलाह कर्म त’ नञि भ’ जइतियैक जाहि स’ ओकरा आओरक आगाँ हमरा आओर के शर्म कि झेंप महसूस होयतियैक!’
‘अहाँ बात के तूल द’ रहल छी।’
‘नञ! स्थितिक मीमांसा क’ रहल छी। चीज के रैशनलाइज क’ रहल छी।’
‘हमरो दुनूक जिनगी केहेन रहलए। नेना छलहुँ त’ पढ़ाई, पढ़ाई, पढ़ाई! माय-बाउजी कहैत छलाह जे बाउ रौ, इएह त’ समय छौक तपस्याक। एखनि तपस्या क’ लेबें त’ आगाँ एकर मधुर फल भेटतौ। पढ़ बाउ, खूब मोन लगाक’ पढ़ ! आ हम पढ़ैत गेलहुँ – फर्स्ट अबैत गेलहुँ। नीक नोकरीयो लागि गेल। बाउजी सत्यनारायण भगवानक कथा आ अष्टयाम सेहो करौलन्हि। हुनका बड्ड सौख छलै जे हुनकर पुतौहु पढ.ल-लिखल, समझदार आ मैच्योर्ड हुअए। तकदीरक बात कहियौ जे हुनकर ईहो सेहन्ता पूर्ण भ’ गेलै। हुनका अहॉँ सन पुतौहु भेटलै, रूप आ व्यवहारक गरिमा स’ परिपूर्ण।
‘चाय त’ सठि गेल। आओरो ल’ आबी की?’
‘नञि! हमरो जिनगी सोगारथ भेल अहाँ के पाबि क’। कतेको परेशानी भेल, अहाँ सभस’ निबटैत गेलहुँ, एकदम स’ धीर थिर भ’ क’।’
‘त’ की करितहुँ! जहन हम दुनू प्राणी एकटा बंधन में बंधा गेलहुँ त’ तकर मान मरजाद त’ निभाबही पड़तियैक ने! आ कथा खाली हमरे आ अहाँटाक संबंध धरि त’ सीमित नञि रहै छै। एकर विस्तार अहाँक परिवार, हमर परिवार आ फेर अपन बाल-बच्चा धरि होइत छै, आ हे, एहेन नञि छै जे हम सीता-सावित्री जकाँ मुंह सीने सबकुछ टॉलरेट करैत गेलहुँ। कएक बेर हम अपन टेम्पर लूज केलहुँ। मुदा अहाँक तारीफ, अहाँ अपन टेम्पर कहियो नञि लूज केलहुँ।’
‘महाभारत स’ बच’ लेल। आह! पत्नीक आघात स’ कोन एहेन मनुष्य अछि जे बाँचि सकलए।’
‘मजाक जुनि करू! अहँू सीरियस छी त’ हमहूँ सीरियस छी। हमर अपन इच्छा छल नान्हिटा स’ जे पढ़ब-लिखब। पढ़ि लिखिक’ अपना पएर पर ठाढ़ होएब। आर्थिक परतंत्रता अस्वीकार्य छल। हमरा अई बात पर पूर्ण संतोख अई जे हमर ई इच्छाक पूर्ण आदर आ सम्मान भेटल अहां स’। हमर नौकरी पर हमरा स’ बेसी प्रसन्नता अहाँक बाउजी के भेल छल। हमर एकगोट संगी हमरा चेतौने छल जे देखब, बुढ़बाक खुशी अहाँक पगार ओसुलबा स’ त’ नञि अछि। हमरो लागल छल। मुदा धन्न कही हुनका, नञि कहियो पुछलन्हि जे हमरा की आ कतेक दरमाहा भेटैय’ आ नञि कहियो ओकरा मादे कोनो खोजे-पुछारी कएलन्हि। सएह अहँू संगे भेल। अहँू कहियो नञि पूछलहुँ जे हम की सभ करै छी। अपन पगार के कोना खर्चै दी॥ हमरा त’ कएक बेर इएह होइत रहल जे अहाँ पूछै छी कियैक ने? तहन ने हम अपन आमदनी आ आमद स’ बढ़ल खर्चाक हिसाब अहाँ के दितहुँ। नतीजा, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कएलो सन्ता कहियो आर्थिक रूपे स्वतंत्र नहिं भ’ सकलहुँ। कहियो अपना मोने अपना ऊपर किछु खर्च नञि क’ सकलहुँ। अहाँ संगे ई नञि छल। अहाँ त’ ‘ईट, ड्रिंक आ बी मेरी’ मे यकीन करैत एलहुँ आ एखनो करै छी।’
‘अई मे अधलाहे की छै? मनुक्खक अई जिनगी मे अछिए की? खाई, पीबि, मस्त रही।’
‘भने ओहि मे सभ किओ सफर करी।’
‘से कोना? कहियो अहाँके हम कोनो कष्ट देलहुँए?’
‘किऐक ने? कोनो समय एहेन नञि भेल जे कोनो खास खास बेर पर हमर नोर नञि खसल हुअए। कहियो कोनो काज-परोजन भेल, कि तीज तेवहार कि ककरो बर्थ डे कि वेडिंग, सभठाँ त’ पल्ला झाड़ि लेइत अएलहुँ जे पाई नञि अछि।! तहन हम की लोकक ओहिठाँ खाली हाथे पहुँचतहुं आ कहितहुं जे हमर हस्बैंड कहै छथि जे हुनका लग पाइ नञि छै तैं हम आओर हाथ झुलबैत चलि ऐलहुँए। किओ पतियैतियैक।’
‘अहाँ लग त’ रहै छल ने।’
‘हँ, कियैक ने कहब। ई बुझलहुँ जे ई ‘छल’ के मेंनटेन करबा लेल हम कतेक बेर अपन मोन के मारि-मारि के राखलहुँ।’
‘एह छोड़ू ई सभ गप्प। खाएक लेल की बनाएब?’
‘जे कही अहाँ? हमरा आओर के त’ ईहो कहियो स्वतंत्रता नञि रहल जे अपना मोने, अपन पसीनक खाना बनाबी।’
‘फेर ब्लेम! आइ अहाँ के भ’ की गेलए?’
‘अहाँ संग लड़ियाएबक खगता। जिनगी भर जकरा लेल अहां पलखतियो भरि समय नञि देल।’
‘हम अहाँके संतुष्ट नञि क’ सकलहुँ कहियो, अहाँ से कह’ चाहै छी?’
‘हँ, सएह कह’ चाहै छी?’
‘बाई एवरी पॉसिबल वे?’
‘यस, बाइ एवरी पॉसिबल वे?’
‘फिजिकली, मेंटली, मौनेटरली, सेक्सुअली।’
‘हँ, सभतरहें।’
‘अहाँ हमरा कमजोर बना रहल छी।’
‘अहसास करा रहल छी।’
‘अपन परिस्थिति पर गौर नञि क’ रहल छी। हम बिजी, अहां बिजी। हमर अएबाक-जेबाक कोनो निश्चित समय नञि। अहाँके ऑफिसक संगे-संगे घरक, धिया-पुताक जिम्मेवारी। बखत कत’ छल जे प्रेम-मुहब्बतक मादे सोचितहुँ।’
‘तैं त’ जीवन झरना सुखा गेल ने? व्यस्तता त’ जिनगीक अभिन्न अंग छियै। तैं, अई व्यस्तताक कारणे हम आओर कहियो की नहाएब-धोएब आ कि कपड़ा पहिरब छोड़ि देलियै, वा बिसार गेलियै?’
‘धिया-पुताक घर मे, आई कुंड बी सो फ्रैंक …’
‘व्यर्थ इल्जाम द’ रहल छी। फ्रैंकनेसक माने ई नञि जे अहाँ हमरा कोरा मे बैसेने रहू सभ समय। फ्रैंकनेस माने छै फुल व्यवहारक, फुल अप्रोचक फ्रैंकनेस। अहाँ से फ्रैंक नञि भेलहुँ, नतीजा हम नञि भ’ सकलहुँ, नतीजा धिया-पुता सभ नञि भ’ सकल।’
‘धिया-पुता के त’ बड्ड नीक जकाँ राखलहुँ। बेटीयो जीन्स आ मिनी पहिरि क’ घूमल, फ्रेंड्स सभक संगे सिनेमा गेल, पार्टी कएल, कहियो टोकारा नञि केल।’
‘मुदा, कहियो फ्रैंक भ’ क’, खुलिक’ गप्प-सप्प सेहो त’ नञि कएल। एकदम फॉर्मल फैमिली बनिक’ रहि गेल अपन परिवार। ई हमर कहबा नञि, अहाँक बेटीयेक कहब अछि।’
‘अही स’ सभ किओ सभ किछु कियैक कहैत अछि। हमरा स’ त’ आइ धरि किओ किछु नञि कहलक?’
‘अहाँ से मोके कोम्हर देलियै? तैं त’ कहलहुँ, बेहद फॉर्मल फैमिली।’
‘चलू छोड़ू, आब फेर स’ शुरू करब जिनगी – सभटा शौख पूरा क’ देब।’
‘जिनगीक ओ बीति चुकल 30 साल आ तीस वर्षक पल-पल पहिने घुरा दिय’।’
‘जे भ’ सकै छै से कहू।’
‘त’ कहू जे भन्सा की बनाबी? छीमीक खिचड़ी कि छीमीक परोठा।’
‘आब जे अहाँ खुआबी। बजला पर कहब जे हम अहाँ के मौके नञि देइ छी।’
‘से त’ कहबे करब। अपरोक्ष रूप स’ अहाँक पसीन-नापसीन पूरा घर पर हावी रहलै।’
‘से कोना?’
‘चलू, भन्से से शुरू करी। अहाँ के सौंफ देल मलपुआ पसीन नञि, इलाइची देल खीर, सेवई पसीन नञि। आ हमरा आओर के ओ सभ बड्ड पसीन। हमरा बिन सौंफक पुआ आ बिनु इलाइचीक खीर सेवई बनेबाक आदत पार’ पड़ल।’
‘त’ ई त’ नञि कहलहुँ जे अहाँ आओर नञि खाई।’
‘ईहो त’ नञि कहल जे ठीक छै, कहियो-कहियो हमहूं सौंफ-इलायचीबला पुआ, खीर, सेवई खा लेब, तहन ने बुझितहुं? आ अपना स्वादक अनुसारे अलग स’ चीज बनाबी, ई कोनो जनीजात स’ पार लागलैये जे हमरा स’ लागितियैक।’
‘अच्छा, आगां बढू।’
‘बढ़ब, पहिने भन्सा चढ़ाइए आबी।’
‘आइ उपासे पड़ि जाइ त’ केहेन रहत। तखनि स’ अहाँक मुंह स’ भानस-भानस सुनि क’ कान पथरा गेल आ पेट अफरि गेल।’
‘उहूँ! एखनि त’ डिनर गोल क’ देब आ अधरतिया के हाँक पाड़ब जे हमरा भूख लागलए। उठू, किछु अछि बनल त’ दिय’। किछु नञि अछि त’ ऑमलेटे ब्रेड सही।’
‘जाऊ तहन, जे मर्जी हुअए, करू।’
‘हे, हम एखने गेलहुँ आ एखने एलहुँ। ताबति अहाँ बउआक ई मेल पढ़िक’ ओकरा जवाब पठा दियऊ।’
‘हँ, ओहो लिखलकए जे बड्ड नीक लागि रहलए। अपन देश स’ एकदम अलग, सभकिछु एकदम व्यवस्थित। मर्यादित, संतुलित। आखिर अमेरिका छियई ने। धन्न कही आईटी बूम के जे बच्चा सभक रोजगारक नव अवसर भेंटि रहल छै। भारतीय कंप्यूटर इंजीनियर्स के कतेक डिमांड छै फॉरेन कंट्री मे। देखबै जे दस मे स’ तीन टा इंजीनियर अमेरिका त’ आन आन देशक रूख क’ रहल अछि।’
‘प्रतिभाक पलायन थिकै ई। इंर्पोटेस ऑफ टेक्नॉलाजी संगे इंपोटेंसी ऑफ अवर टैलेंट छै। बाहरी टेक्नॉलॉजी पर बिढ़नी जकाँ लूझै छी। ओ सभ रोटी देखबैत अछि, हम सभ कुकुर जकाँ बढ़ि जाइ छी।’
‘अहाँक बेटो बढ़ल अछि, से जुनि बिसरी।’
‘हम इन जेनरल कहि रहल छी। अपन देशक त’ ई स्वभावे बनि गेल छै, घरक जोगी जोगड़ा, आन गामक सिद्घ। इंटर्नल टैलेंट के पहिचान’ लेल, रिकग्नाइज कर’ लेल पहिने कोनो बुकर प्राइज, ऑस्कर अवॉर्ड, नोबल प्राइज चाही, नञि त’ सभ किओ फ्रॉड, धोखेबाज …’ अपने ओहिठां त’ लोक आओर एतेक तरहक एक्सपेरिमेंट करैत अछि। लोक कतेक महत्व दइत छै।’
‘से सभ त’ छै। ई नियति हमही आओर बनाक’ राखल अछि। तैं त’ आइ अनिमेष हमरा आओर लग नञि अछि। अमेरिका मे अछि। पता नञि कहिया घुरत?
‘आ जौं नञि घुरलै आ ओम्हरेक मेम ल’ आनलक तहन?’
‘तहन की? अहाँ सासु पुतौहु रार मचाएब। हमर काज त’ आशीर्वाद देबाक धरि अछि। से भूमिका हम निबाहि लेब।’
‘त’ सभटा सासु अपना पुतौहु स’ रारे मचबै छै? हमही दुनू सासु-पुतौहु मे ई देखलहुँ कहियो? आब अनिमेष जकरा स’ विवाह करौ, हमरा लेल धन सन! हमरा कोना आपत्ति नञि!’
‘भन्सा भ’ गेल त’ दइए दिय’। खाअक’ सूतब।’
‘एतेक जल्दी?
‘थकान लागि रहल अछि।’
‘पहिल बेर एतेक बतियौलहुँए ने? हरारति त’ लागबे करत। घरवाली संग एतेक बेसी गपियेनाइ कोनो मजाक बात छै!’
‘हे, एके प्लेट मे निकालू ने।’
‘आई एतेक प्रेम कथी लेल ढरकि रहल अछि?’
‘सभटा पिछला हिसाब रफा-दफा कर’ लेल।’
‘त’ पुरनका तीस बरख पहिने घुराऊ!’
‘से त’ नञि भ’ सकैय’, मुदा पुरना तीस बरख के अगिला तीस बरख मे मिलाक’ जिनगीक ताग के आओर मजबूत करबै। आऊ! बैसू एम्हर। हे, लिय। हमरा हाथे खाऊ!’
‘हमरा डर होइयै जे हमर हार्ट फेल नञि भ’ जाए।’
‘नञि होएत। आ हेएबो करत त’ हमहूँ संगे-संगे चलि जाएब। हे, लिय’ ने। खाऊ ने। अहींक हाथक बनाओल त’ भोजन अछि।’
‘हम अपने हाथे खाएब। दोसराक हाथे खएला स’ पेट नञि भरत।’
‘मोन भरत। आई पेट भर’ लेल नञि’, मोन भर’ लेल खाऊ।’
‘तहन त’ आओरो नञि खाएब। मोन जहन भरिए जाएत त’ जीबि क’ की करब? मोनक अतृिप्त त’ जिनगी जिबाक बहाना होइ छै।’
‘ई सभ फिलॉसफी छोडू आ खाना खाऊ। अरे, अरे, दाँति कियैक काटलहुँ।’
‘भोजन में चटनी नञि छल नें, तैैं…’ हे, भ’ गेल। आब नञि खाएल जाइत हमरा स’।’
‘ठीक छै। चलू तहन।’
‘कत’।’
‘चलू त’ पहिने। आई चलू, हमर कन्हा थाम्हि क’ चलू। अइ्‌ दुनू बाँहक घेरा मे चलू।’
‘व्हाई हैव यू बीकम सो रोमांटिक?’
‘कहलहुँ ने जे पछिला तीस बरख के अगिला तीस बरख मे शामिल कर’ जा रहल छी। हे, इमानदारी स’ कहब’, अहां के नीक लागि रहलए हमर ई स्पर्श!’
‘कोनो भावना नञि उमड़ि रहलए। अहाँ ईमानदारीक प्रश्न उठाओल, तैं कहि रहल छी।’
‘आब?’
‘ऊँहूँ।’
‘आब? मोनक दरवज्जा बंद क’ क’ नञि राखू। कनेक फाँफड़ि छोड़ि दियौक। भावनाक बयार के घुस’ दियौक।’
‘हमरा रोआई आबि रहलए।’
‘त’ कानि लिय’ अई ठाँ, हमर छाती पर माथ राखिक’। मोन हल्लुक भ’ जाएत।’
‘बेर-बेर सोचना आबि रहल अछि पुरना दिन। तखन कियैक ने … एतेक व्यस्तताक की माने भेलै जहन हमही दुनू अपना के अपना दुनू स’ अलग ल’ गेलहुँ।’
‘माने छलै ने? अपन जिनगी बनेबाक। धिया-पुताक जिनगी बनेबाक। ई सभ लक्ष्य छल आ अर्जुन जकाँ हम सभ ओहि लक्ष्यक प्राप्ति लेल चिड़ैक आँखिक पुतली धरि तकैत रहलहुँ।’
‘हमर पलक मिझा रहलए।’
‘मिझाए दियऊ। बन्द पलक, फुजल अलक। एखनो अहाँक केश ओतबे नरम, आ मोलायम अछि।’
‘आब त’ सभ टा’ झड़ि गेलै।’
‘जे छै से बहुत सुंदर छै। आह! मोनक कोन्टा मे ठेलि-ठूलि क’ राखल सुषुप्त भावना सभ… जेना छोट-छोट फूँही बनिक’ रोम-रोम के भिजा रहल अछि। रोम-रोम भुलुकि रहल अछि। ई की अछि?’
‘अहसास। हमहँू अई अहसासक फूंही मे भीजि रहल छी। अहाँक तन स’ माटिक सोन्हपनि आबि रहल अछि। थाकल दकचाएल जिनगी मे एकगोट नव संचार आबि रहलए। नस-नस वीणाक तार जकाँ झंकृत भ’ रहलए। सृष्टिक ई अमूर्त आनंदक क्षण अछि, दिव्य, भव्य, अलौकिक !’
‘एक-एक साँस स’ बजैत स्वर्गीय संगीत। आइ धरि कहियो नञि अनुभव कएने छलहुँ। आई अनुभव क’ रहल छी।’
‘आऊ, अई अनुभव सागर मे डूबि जाइ- गहीर, आओर गहीर, कामनाक सीपी फोली! भावनाक मोती बटोरी। आसक ताग मे ओइ मोती के गँूथि माला बनाबी आ दुनू एकरा पहीरि ली।’
‘जिनगी एतेक सुंदर नञि लागल पहिने कहियो।’
‘मौने मुखर रहल सदिखन। आई शब्द मौनक देबाल के ढाहि रहल अछि।’
‘ढह’ दियऊ ! सभटा वर्जना ढह’ दियऊ !’
‘जिनगीक बदलइत रूप किओ नञि बूझि सकलए। अहाँक रोम-रोम स’ झरैत ओस बुन्न ! एक-एक श्र्वास स’ अबैत जुही, गुलाब, मौलश्रीक सुगंधि। आऊ, डूबि जाइ अइ मे!’
‘———‘
‘———‘
‘———‘
‘———‘
‘जिनगी पहेली अछि, बुझौअल अछि।’
‘ऊँहूँ! जिनगी जिनगी अछि।’
‘माने?’
‘माने की? एखनि धरि मतलबे बूझ’ मे लागल छी? धुर जाऊ! अहाँ बड्ड ओ छी।’
‘ओ छी, माने केहेन छी?’
‘ओ माने ओ। आओर किछु नञि!’
‘अहूँ एकदम नेन्ना जकाँ करै छी।’
‘नेन्ना त’ बनिये गेलहुँ। अहाँ नञि बनलहुंए की?’
‘बनलहुँए ने।’
‘तहन?’
‘तहन की?’
‘तहन माने जिनगीक रूप देखी आ मस्त रही।’
१. रिस्क आऽ मैथिल- ब्रज कु. कर्ण 2. कोना बचत मिथिलाक स्मिता ?- ओमप्रकाश झा

बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)।
रिस्क आ मैथिल
मुद्दा व्यवसाय
विकसित देश वा विकसित राज्यक पाछु यदि सुक्ष्म रूपसॅं देखु तॅं भेटत जे ओहि क्षेत्रक व्यवसाय विकासक मुल कारण अछि। मिथिलामे विद्वान वा ज्ञानी मैथिलक कमी नहि। व्यापारी वर्ग नोइसो बराबरि नहि।
मैथिल व्यापारो करताह ?
सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी समाज मिथिलामे अपन व्यवसायमे मैथिल जकॉं संस्कार अपनोने के साथ केवल ५० सालमे बढ़िया धाक जमा लेलाह, परन्तु हम मैथिल जे छी जे डींग हकैसॅं फुर्सतेऽ नहि भेट रहल अछि।
मैथिल मिथिलामे की करताह ?
मिथिलामे किछु मैथिलके देखबाऽ मे आयत जे़ मिथिलाक सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी के व्यवसायमे नौकरी करताह।
हिन्दी अखबार मॉंगि कए पढ़ताह़ परञ्च मिथिलाक विद्वान वा ज्ञानी अखबार प्रिन्ट आ बाजार मे आनबाक जोखिम नहि ऊठैऽताह।
मिथिलामे चाहक दुकान पर प्रतिदिनक दिनचर्यामे लालु के लालूवाणी पर अखण्ड बहस करताह।
मिथिलामे सुइदसॅं किछु मैथिल सुइदखोर व्यवसायमे वृद्धि केलाह हऽ। कोनो नियमके पालण नहि़ कए रहल छथि। अपन नियम बना कऽ अपराध मे रमल छथि। मिथिला बैंकक शुरआत होए अपराधी सुइदखोर मैथिल के झेलनाइ एकटा बढ़ पैघ अपराध अछि।
!!!!Great Risk !!!!
मुदा बहुतो अछि़ पर रिक्सो सॅं ज्यादा भयावह।
सन २००१क जनगणणा के अनुसाऱ मिथिलाक आबादी करीब ६ करोड़ छल। जाहिमे़ व्यवसायिक वर्ग २ प्रतिशतो कम।
बहुतोसॅं पुछलहु़ जे एतबा प्रतिशत कियाक कम अछि़ परञ्च एकर कारण की से नहि जानि सकलहुं।
मिथिलासॅं आयात आ निर्यातक बातेऽ छोड़ू, व्यापार तॅं बद सँ बदतर
मिथिलाक पाँच जिलाक केस स्टडी:

पांचो जिलाक कुल आबादी सन २००१ जनगणनामे करीब एक करोड़ अठाइस लाख छल। जनसंख्या अनुमानित ५ वा ७ प्रतिशतसॅं प्रतिसाले वृद्धि भऽ रहल अछि। एकटा बात महसूस भऽ रहल अछि जे मिथिलामे गरीबी कम भेल अछि। यदि़ सन १९८० सॅं पहिने हरेक गॉवमे हरेक दिन ४ या ५ घरमे उपवास रहैत छलैक़ परञ्च से उपवास आब गरीबीक उपवास पुजा पाठक उपवास होइत अछि।
मुदा भौतिक सुविधाक पिछड़ापन तॅ पारकाष्ठा पर अछि। जिनगी भगवानक भरोसे।
पांचो जिलाक मैथिल पर यदि ध्यान देल जाए तॅं एकटाक सदस्य परिवारमे नौकरी करयबाला बॉकी आश्रित सदस्य किछु नहि करयबाला बल्कि गप छटय बाला आ शान बघारय वाला।
पर आश्रित भेनाए अपनेमे एकटा रिक्स एहन जे भावुक जरूरतसॅं ज्यादा आ कर्मठहीन ज्यादा बनाबैत अछि। !!!!ग्रेट रिस्क !!!!

जनसंख्याक वृद्धि मानु जे कष्टक पहाड़। हर क्षण हरेक दिस स्थिति दयनीय हेबे कड़त।
मिथिलामे मैथिल रिक्स लेताह ?
मिथिलामे मैथिल तॅं अपन जिनगीक रिक्स लेबाऽमे सर्वोपरि छथि। जेना की़ सोचु ऩदि के ऊपर जड़ जड़ हालमे पुल ओहि पर खचाखच बस़ आ रेल गाड़ी जाहिमे छत सेहो भड़ल। फोटो देखल जाए।

सोचु कनिऽ जे जिनगी आओर मौत के बीच केवल एकटा रिक्स फैक्टर अछि।
मैथिल जिनगीक रिक्स हर क्षण।
मिथिलामे जिनगीक रिक्स बड़ आसान पऱ व्यापारक रिक्स बड़ कठिन अछि।
शेष मंथन अगला अंकमे।
2. कोना बचत मिथिलाक स्मिता ?- ओमप्रकाश झा

ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी।

कोना बचत मिथिलाक स्मिता ?

आई जहन अपना सबहक चहुतरफ़ा विकास भ रहल अछि त हम सब अपन महत्वांक्षा के पाबि के अत्यधिक प्रसन्न भ रहल छी,हेबाको चाही। मुदा कि महत्वाकांक्षा के रथ पर सवार भ कअ हम सब कतेक मगरुर नहि भ गेल छी जे अपन स्मिता अपना स कोसो दूर पाछु छुटि रहल अछि। मुदा तकरा समेतनिहार कियो नहि अछि। आय अपना अहिठामक युवा वर्ग अत्यधिक दिग भ्रमित भ रहल अछि,ओकरा कियो सहि मार्ग दर्शक नहि भेट पाबि रहल अछि। अखुनका समय कतेको पाबनि तिहार क महिना आबि गेल अछि आ कतेको गाम मे दुर्गा पूजा के अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कैल जायत अछि मुदा किछु वर्ष पूर्व मे चलु-आइ सअ आलो पहिले हर गाम मे युवक सब नाटक खेलाय छलाह,महिनोतक रामलिला ले आयोहन होयत छल,ओ सब आय कतह चलि गेल छथि। कि आर्केस्ट्रा आ परोसी (तवायफ़) के नाच मे ओ सब हरा गेल छथि। परोसजी के कार्यक्रम इ असर पड़ैत अछि जे मंदिरक कार्यकर्ता सब सेहो एकर मजा उठाबअ लागैत अछि। इमहर मौका पाबि कुकुर,बिलाड़ि मैया के प्रतिमा के सेवा मे लागि जाइया। देखने हैब जे कुकुर मुर्ती के चाटि रहल अछि। उमहर हम सब अपन तीन पुस्तक (पुरुखा) संग माने बाप- बेटा आ पोता समेत बाईजी पर पाई लुटाबय के अवसर के नहि गवांबैत छी। अधिकतर गोटे अहि स अवगत होयब।
दोसर कतअ जा रहल अछि अपन संस्कार? हयउ,आब शायद कतौ महिनो तक चलैबला रामलिलाक तम्बु गाम मे देखायत होयत? हम अपन छोट सनक अनुभव अपने संग बांटअ चाहब। पहिले रामलीला के टोली के कियो माला (मने एक दिनक भोजन) उठेनिहार नहि होइ,माने इ जे मात्र पेटे पर जे टीम सबहक मनोरंजनक वास्ते तैयार रहैत छल,ओकरा अपन समाज नकारि देलक मुदा आखन प्रायःहर छोट पैघ शहर अतह तक कि देशक राजधानी मे दुर्गा पूजा के अवसर पर लाखो आदमी रामलीलाक खुब लुफ़्त उठबैत छैथ। कतो कतो तअ रामलीला देखै के लेल टिकट सेहो लागैत अछि,कि हम झूठ बाजि रहल छी। एना मे दु टा गप्प जे हमरा स्पष्ट भेल-पहिल जे लोक के ओहि प्रति ओ रुझान नहि रहलन्हि जे कि बाईजी के नाच मे वा कौआल-कौआली मे जे कि राति भरि सबके गरिया क चलि जाइया आ हजारो आदमी मंदिरक आस पास ततबाक गोत गोबर कअ दैत छथि जे अगिला किछु महिना तक उमहर नहिये जाय मे कुशल बुझैत छी। अहि स गामक कलाक ह्रास खूब पैघ स्तर पर भेल अछि,सब गोटे बुझिति अंजान छी।
तेसर आ गंभीर गप्प इ जे समाज मे जे भाई चारा प्य््रव मे छल कि ओ खत्म भ गेल अछि। कि अपन समाज ततेक गरीब तअ नहि भ गेल अछि जे आहिठम दस गोटे के भोजन करेनाय आय कठिन भ गेल अछि। एकर एकटा छोट सनक उदाहरण हम देबअ चाहैत छी जे जौं अंहा सब मे स किछु आदमी दिल्ली-बंबई स कमा क मास दिनक लेल गाम जायत होय तअ अनुभव करैत होयब जे गाम मे बीतल समय के संगे संग अपनेक मेंटिनेन्स पर होय वला खर्च मे कटौति सेहो सबगोटे व्यक्तीगत अनुभव के गहराई स देखु। अखन बस अतेबैक।
इति
महाप्रकाश (१९४६- ), जन्म वनगाँव, सहरसा। १९७२ ई. मे पहिल कविता संकलन “कविता संभवा”।
आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा नाम जे सर्वाधिक स्वीकृत आ प्रसिद्धि पौलक अछि, ओ थिक- सुभाष चन्द्र यादव। सुभाषक कथा-यात्रा पर दृष्टिपात करैत ई लगैत अछि जे ओ कथाक अन्वेषण कयलनि अछि। प्रायः लेखनक आरम्भ करिते ओ अनेक स्थान आ अनेक भाषाक यात्रा शुरू कयलनि। ई यात्रा वा भटकाव, जे हुनक नियति सेहो रहल अछि, हुनका अनुभव सँ लैस कयलक, तीक्ष्ण दृष्टि देलक आ अपन समकालीन सँ अलग विशिष्ट सांचामे ढालि देलक।
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
ओ एकटा अलग भाषा-संस्कार, शब्द-संस्कार ग्रहण कयलनि जे अपन स्वरूप मे व्यासजन्य अछि। लेकिन ई स्वरूप कतहु सँ ओझराबैत नहि अछि, अपितु कलाक सहजता आ सहजताक कला केँ विलक्षण ढंगेँ उद्घाटित करैत अछि। ओ अपन कथा मे परिवेशक कोनो पैघ आयोजन कि पसारमे नहि फँसैत छथि; हुनक अनुभवसिद्ध भाषा, अविकल्प शब्द सहजहि अपेक्षित परिवेश आ यथार्थ केँ एकटा पैघ फलक दऽ दैत अछि। सुभाष कोनो राग-विरागक उत्तेजनामे जतेक लिप्त छथि, ओतबे निर्लिप्तो। सुभाषक जीवन आ साहित्य ऊपर सँ जतेक शांत आ स्थिर बुझाइत हो, भीतर सँ ओतबे अशांत आ अस्थिर अछि। हुनक अन्तर्दृष्टि स्याह आ सफेदकेँ निर्ममता सँ उद्घाटित करैत अछि। हुनक रचनाकार समयक समुद्र मे डूबि-डूबि मोती-माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि।

२.स्वरक माला गँथती अंशु- जितेन्द्र झा

हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि । ई कहब छन्हि अंशुमालाक । अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि।
अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि । दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि । तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल’ रहल छथि । बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ’ क’ मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि ।
एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि ।
मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि । दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं । ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक’ रह’ पडलनि । मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, ‘जनता जे सुनऽ’ चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि । पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि ।
मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान’ लेल तैयार नहि छथि । धुन वा लयक अभाव नहि, स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि । एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि । मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासं सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि । ‘सभसँ पैघ कमजोरी स्रोतामे छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया’ प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि । मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि । मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे स्रोतासँ भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही ।
मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि । मैथिली कलाकारकेँ आब’ बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि । मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि ।
अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब’ लेल आगु नञि आओत।

१.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.
स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
१.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (आगाँ)
रङ्ग रस होरी हो। गाबह सब मिलि रङ्ग॥
रहसि-रहसि सब फागु सुहागिन गाबय मनक उमङ्ग।
पहु परदेश विताओल हमरा (सरिवहे) भेल मनोरथ भङ्ग॥
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-१४)
एहि नाटकक होलिकोत्सवक दृश्य अत्यन्त मनोरम अछि। रंग अबीरक प्रयोग होरीक हुड़दंग मचल अछि। ओहि अवसरपर राजसभाक प्रत्येक पात्र रंग अबीरसँ बोरल अछि। लोक होरीक हुड़दंग मचयबा आ उधम मचयबामे अस्त-व्यस्त अछि। राज्यादेश अछि जे एहि अवसरपर जे अनैच्छुक होथि तनिका एहिसँ फराके राखल जाय अन्यथा रंग-अबीरक सराबोर राज्याधिकारी लोकनि राजभवनमे उपस्थित छथि। राजभवन दिस जाइत नगरक शोभा ओ होलिकोत्सवक विकृत रूप दृष्टिगत होइछ। सभ एक दोसराक संग हँसी-मजाकमे व्यस्त देखल जाइछ। एहि अवसरपर बसन्तक राजाकेँ आशीर्वाद दैछ:
महाराजक मन हरलक नटी, कहो लोक अपवाद।
सयवर्षसँ जनि जीवी हारी हम दैछी आशिर्वाद।
(सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-१४)
शलाका पुरुष जीवन झाकेँ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ अपन नाटकमे एकर पालनार्थ उपयुक्त अवसर बहार कऽ लेलनि।
कीर्ति पुरुष जीवन झा अपन नाटकादिमे धार्मिक भावनाक चित्रण सेहो अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि जे हुनक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक पृष्ठपोषक हैबाक प्रमाण दैछ। सामवती पुनर्जन्ममे अर्थोपार्जनार्थ सामवान आ सुमेधा विदर्भराजक ओतय दम्पत्ति-रूपमे पूजनार्थ नियुक्त होइत छथि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे सुन्दर-संयोगक कथानकक श्रीगणेश वैद्यनाथधामक प्रांगणसँ आरम्भ होइछ तथा ओकर अन्त सेहो ओतहि भऽ जाइछ। नर्मदासागर सट्टकमे नाटककार कपिलेश्वरमे शिवार्चनाक चर्चा कयलनि अछि। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर लोक स्नानार्थ गंगा-कमला जाइत अछि जे हमर सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवनक अविभाज्य अंगक रूपमे चित्रित अछि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टिएँ जखन हिनक नाटकादिक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे ई परम शिवभक्त परायण रहथि जे हिनक नाटकादिमे प्रयुक्त नचारी आ महेशवाणीसँ भऽ जाइत अछि।
मिथिलांचलक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि ठामक निवासीक वैशिष्ट्य रहल अछि जे सात्विक भोजनक पक्षपाती रहलाह अछि। एतय तामसी भोजन सर्वथा वर्जित मानल जाइछ। एहि परम्पराक पालन नाटककार स्थल-स्थलपर अपन नाटक मे कयलनि।

२. डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
नायक देवकान्त सुशिक्षित, निविष्ट, कर्मनिष्ठ आ ज्ञानी युवक छथि। हाइ
कोर्टमे कार्यरत विशिष्ट व्यक्तिक पुत्रा आ प्रतापी रईसक पौत्रा छथि। कलाप्रेमी, कलाकार, प्रतिष्ठित, साहसी, उदार आ परोपकारी। सुशीलाक रुग्न पति अनिरुद्ध बाबूक टूटल गाड़ी कमलदहमे फँसल छलनि, ओ लोकनि के छथि, तकर सूचना देवकान्तकें नहि छलनि, तथापि हुनका सहयोग देब; सुलतानगंजमे नाहसँ डूबैत दम्पतिकें बचाएब; कुलानन्दक संग सुशीलाक प्रवासक जानकारी रहितहु, हुनका आर्थिक सहयोग देब — ई सब आचरण देवकान्त उदारता आ मनुष्यताक परिचायक थिक। एकर अलावा देवकान्तक गम्भीर आ जिद्दी स्वभावक चित्राण सेहो भेल अछि। मुदा देवकान्तक जिदसँ हुनकर अपन जे किछु बिगड़ि गेल हो, आनक किछु नहि बिगड़लनि।
परंच मूल बात अछि सुशीला आ देवकान्तक अनुरक्तावस्थाक मनोविश्लेषण। अइ विश्लेषणमे उपन्यासकार सहजहिं चमत्कृत करै छथि। अइ अनुरक्तिक कथाकें माँसल आ उन्मादक बना क’ पाठकक कामेच्छा आ कुत्सा बढ़बै लेल नहि; समाज व्यवस्थामे चलैत अयथार्थ आदर्श आ मर्यादाक प्रति पाठक/भावककें उद्वेलित करै लेल। एहि चित्राणमे राजकमल चौधरीक मनोविश्लेषणात्मक शिल्प अत्यन्त प्रभावकारी साबित भेलनि अछि। उपन्यासतँ मानव जीवनक यथार्थक आख्यान होइत अछि, जाहिमे घटना चक्र आ स्थान-काल-पात्राक आश्रय लेल जाइत अछि। मूल कथाक संग-संग कतोक आनुषंगिक कथा अबैत अछि आ अइ सब क्रियामे चरित्रा-चित्राणक अमूल्य योगदान होइत अछि। चरित्रा-चित्राणेक माध्यमे कथानकमे प्रवाह अबैत अछि आ लक्ष्य प्राप्तिक बाट सोझराइत अछि। उपन्यासक पात्राक चारित्रिाक फलक जतेक सोझराएल रहत, ओकर अभिक्रिया आ आन पात्राक संग कथोपकथन स्पष्ट आ गत्यात्मक हैत। जें कि कोनो व्यक्तिक एक-एक आचरण ओकर मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि, चरित्रा चित्राणमे मनोविश्लेषणक महत्व सर्वोपरि होइत अछि।
स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय साहित्यमे एहेन देखल गेल अछि जे रचनाकार लोकनि अपन हरेक पात्राक आचरण ओकर मनोविश्लेषण करैत अंकित केलनि अछि, राजकमल चौधरी अइ काजमे सर्वाधिक अग्रगामी, प्रयोगधर्मी आ नवतामूलक साबित भेलाह अछि। चरित्रा चित्राणक प्रसंग प्रेमचन्द सेहो एहि तथ्यक समर्थन दै छथि जे चरित्रा चित्राण जतेक स्पष्ट, गतिशील आ विकासमान रहत, उपन्यास ओतबे बेसी प्रभावकारी हैत। प्रेमचन्द इहो स्वीकारलनि जे मनोवैज्ञानिक सत्यक आधार पर कथा उत्तम कोटिक हैत। राजकमल चौधरीक सम्पूर्ण कथा संसार तँ मनोविश्लेषणसँ भरल अछि, आलोच्य उपन्यास ÷आदिकथा’क तँ मूल आधारे मनोविश्लेषण अछि। कहै लेल ई कथा सुशीला आ देवकान्तक प्रेम कथा थिक, मुदा दू मेसँ एको कखनहुँ किनकहु मुँह फोड़ि कए नहि कहलखिन जे हम अहाँसँ प्रेम करै छी। सौंसे समाजमे केओ ई नाहि घोषित केलनि जे दुनूमे प्रेम अछि। समाज, आ कि कुलानन्द, आ कि हरिनगर वाली (अनिरुद्ध बाबूक दोसर पत्नी, सुशीलाक माँझिल सौतिन, महानन्दक माइ, कुलानन्दक सतमाइ) अइ अनुरक्तिकें मोने मोन छिनरपन मानलनि। मुदा, ई कथा एकटा दुखान्त प्रेम-कथा थिक। सम्पूर्ण कथा सबहक मोनेमे बनैत, बढ़ैत रहल। पात्राक व्यक्तित्व, प्रवृत्ति, क्रिया-कलाप, रागात्मक मनोवेग आदिक चित्राणसँ घटना चक्र, परिस्थिति आ परिवेश सुगठित आ प्रभावकारी भेल अछि। पात्राक इच्छा-अनिच्छा, पसिन-नापसिन, क्रोध-घृणा-प्रेम, राग-अनुराग, भोगेच्छा आदिसँ कथानकमे स्वाभाविकता आ विश्वसनीयता आएल अछि।
कोनो मनुष्य प्रेम करए, घृणा करए, मारि करए, समर्थन आ विरोध करए, पूजा करए, व्याभिचार करए–ई सबो टा आचरण ओकर जीवन दर्शनसँ निर्धारित होइत अछि, जकर जानकारी ओकर मनोविश्लेषणसँ भेटैत अछि। परिवेश, प्रशिक्षण, संस्कार, प्रतिभा, अनुभव आदिक समन्वित प्रभावमे कोनो व्यक्तित्व अपन जीवन दर्शन दिढ़ करैत अछि; मुदा मनुष्य जाति जें कि सामाजिक पशु थिक, कतोक परिस्थितिमे ओकर समस्त जीवन-दर्शन विवश भ’ जाइत अछि।
मनोविज्ञान कहैत अछि जे कोनहुँ क्रियाकें निष्पादित करबामे कर्त्ताक धारणा महत्वपूर्ण होइत अछि। मनुष्यक आजन्मक संस्कार, अतीतक समस्त बिसरल घटना, जीवन भरिक अनुभूति ओकर अवचेतनमे विराजमान रहैत अछि, समय पाबि कए ओएह सब बात ओकर प्रवृत्ति, आचरण आ धारणाकें निर्देशित करए लगैत अछि। आदिकथा उपन्यासक विभिन्न चरित्राक मनोविश्लेषणमे ई समस्त तत्व प्रभावी अछि। एहि उपन्यासक रचनाकाल धरि भारतीय स्वाधीनताक एक दशक बीत चुकल छल। मुदा मिथिलाक लोक–की पण्डित, की मूर्ख; की सामन्त, की मजूर…आदिम सभ्यताक मानसिकतामे जी रहल छल। पुरुषवादी अहंकारक एहेन फोंक प्रदर्शन तँ आदिमो युगमे नहि छल, जतए स्त्राीकें बच्चाक जन्म देब’ बला मशीन; पुरुषक कामेच्छा अथवा कुत्सा शान्त कर’ बाला यन्त्रा; घर-अंगना सम्हार’ वाली परिचारिका; आ पुरुषक मुँहें प्रशंसा सूनि पुलकित रह’ वाली पोसुआ पशुक अलावा आओर किछु नहि बूझल जाइत हो। आसुरी भोग-विलास आ ढोंग-पाखण्ड-अन्धविश्वास-धर्मभीरुताक प्रवंचनामे सौंसे मिथिला डूबल छल। जखन कि सौंसे देशक प्रगतिशील समाजमे जीवनक जटिलता, विचित्राता पर चिन्तन-मनन
फैलसँ भ’ रहल छल। लोक आधुनिक भावबोधसँ जीवनकें देखए लागल छल। मानव जीवनक उज्ज्वल आ कलुष भाव पर तुलनात्मक चिन्तन होअए लागल छल। एहना समयमे मैथिलीमे प्रभावकारी उपन्यास लिखबाक एकहि टा शिल्प भ’ सकै छल–से छल मनोविश्लेषणात्मक चरित्राांकनसँ वस्तु स्थितिकें नाँगट करबाक कौशल। हमरा मनोविश्लेषण केने हरिमोहन झा ÷कन्यादान’मे मैथिलक विदूषकीय आचरणक धज्जी उड़ा देलनि, मुदा मैथिल लोकनिकें ओहेन प्रहारक व्यंग्य, हास्य बुझेलनि। आचार्य प्रवर लोकनि उदारतापूर्वक हुनका हास्य सम्राटक उपाधि द’ देलखिन।

वस्तुतः ÷आदिकथा’क कथ्यो एहने अछि जे मनोविश्लेषणक अलावा दोसर कोनो सरिआएल बाट ताकलो नहि जा सकै छल। यौवनक अटट दुपहरियामे कोनो स्त्राीकें निश्चित रूपें कोनो सम्पूर्ण पुरुषक छाहरि चाही; पुष्पवती-फलवती हेबा लेल आतुर अथवा मुदित-पुलकित हेबा लेल उत्सुक-उत्फुल्ल कोनो हरियर लताकें कोनो मजगूत डारिक आसरा चाही। सुशीला एहने उत्तप्त स्त्राी आ एहने अलसाएल लता छथि; हुनका देवकान्त चाही छलनि मुदा अनिरुद्ध भेटलखिन; चाननक गाछ चाही छलनि, मुदा भाँटि-भँगरैया भेटलखिन। स्त्राीक जीवनमे अर्थसँ बेसी सार्थक बहुत किछु होइत अछि, से बात मैथिल प्रतिनिधि अनिरुद्ध, हुनकर स’र-कुटुम, सम्बन्धी-सरोकारी नहि बूझि रहल छलखिन; एते धरि जे कुलानन्दोकें तकर खाहिस नहि भेलनि।
गम्भीरतापूर्वक देखल जाए तँ अइ उपन्यासक अधिकांश घटनाचक्र चरित्राक मोनहिमे घटित भेल अछि। सभ क्यो अपन मन्तव्य संकेतहिमे व्यक्त केलनि अछि, किनकहु धारणा स्पष्ट बोलीमे स्पष्ट नहि भेल अदि।
अनिरुद्ध बाबू सन अशक्य आ वृद्ध जमीन्दारक भौतिक सम्पदा, सांसारिक असार-पसार, सतौत सन्तानक कारणें बेटा, पुतोह, धी, जमाइ, नाति-पोतासँ भरल-पुरल घर पाबियो कए कामदग्धा सुशीला अतृप्त छथि। अतृप्त कामेच्छाक दमन हेतु हफीमक सेवन करए लगै छथि। उत्तेजनामे कएल आचरणक सूचना पाबि लजा जाइ छथि, कामातुरा प्रवृत्तिक होइतहु सामाजिक आदर्श आ कौलिक मर्यादाक पालनमे अपनाकें ध्वस्त करैत रहै छथि, नहुँ-नहुँ जरबैत रहै छथि। रुग्ण पति संग यात्राा करैत अचानक देवकान्तसँ भेंट होइ छनि। देवकान्तक यौवन, स्वास्थ्य, पराक्रम, कला प्रेम, उदारता आ सौहार्द देखि हुनकासँ मोने प्रेम करए लगै छथि। परम शिष्ट, धीर, प्रशान्त सुशिक्षित, उदार आ दृढ़ प्रतिज्ञ देवकान्त मोनमे सेहो प्रेमक तरंग अहिना उठैत अछि। आ, दुनूक प्रेमांकुर तीव्र गतिसँ पसर’ लगैत अछि। मुदा जहिना दुनूक मामि-भागिनक सम्बन्ध-कथा सुनिश्चित होइत अछि। प्रेमक उद्वेग भीतरे-भीतर सुनग’ लगैत अछि। किन्तु प्रेम होइत अछि आगि, ओकरा पर काँच-कोचिल जते झाँपन देल जाए ओ आओर तीव्रतासँ, अधिकाधिक उत्तापसँ प्रज्ज्वलित होइत अछि। पे्रमक ई तीव्र उत्ताप सामाजिक मर्यादाक जर्जर सूत्राक कारणें अन्नतः सुखान्त परिणति धरि नहिएँ पहुँचैत अछि। मुँह फोरि कए अइ प्रेमाभिव्यक्तिक अवसर धरि दुनूकें हाथ नहि अबै छनि। दुनू भीतरे-भीतर सुनगैत रहै छथि। मनोविश्लेषणक आधार पर दुनूक आचरणमे देखल जा सकैत अछि जे दुनूक मोनमे आगि कोन गतिसँ धधकि रहल अछि।
सौन्दर्यक प्रति आकर्षण मनुष्यक स्वाभाविक आचरण होइत अछि। चाहिओ क’ कोनो व्यक्ति सौन्दर्यक उपेक्षा नहि क’ सकैत अछि। सौन्दर्य बोध, आ अनुरक्ति कर्मक अपन शास्त्रा आ विधान होइत अछि, जे अलग-अलग प्राणीक आन्तरिक-बाह्‌य परिस्थिति आ मनोदशासँ निर्देशित होइत अछि। भूखसँ व्याकुल कोनो बरदकें लहलहाइत घास, आ कि सूखल नार-पुआरमे सौन्दर्य भेटतै, अनुरक्ति हेतै। मुदा घास अथवा नार-पुआरक घेराव, आ कि बरदक गरदनिक पगहा, आ कि मुँहमे लागल जाबी…अइ भोगक बाधक बनि सकैत अछि।…सुशीला परम सुन्दरी छथि। वयस, तदनुकूल सौन्दर्य, यौवन, आचरण, ओज, भाव आदि भादबक बाढ़ि जकाँ, उमड़ैत मेघ जकाँ उपरौंझ क’ रहल छनि। ब्राह्म मूहूर्त्तमे निश्चिन्त निद्रा आ अलस मुद्रामे हुनका सूतल देखि देवकान्त दिव्य-दर्शनक अनुभव केलनि। नारी-सौन्दर्यक एहन दिव्य-दर्शन हुनका जीवनक पहिल अवसर छल, एकटा सुमधुर स्वप्न छल। वस्तुतः –हृदय कोनो सीमा-बन्धन नहि मानै’ए। कहियो नहि मानि आएल अछि।– देवकान्तक मोनमे प्रेमक लहरि उमड़ैत रहै छनि। सुशीला मामीसँ भेंट करबाक इच्छा होइत रहै छनि, तै ले’ मातृक (रामपुर) जाए पड़तनि। मुदा रामपुर नहि जेताह। इच्छा होइ छनि, मुदा अपनहि इच्छासँ भय होइ छनि। मातृक-पैतृक मर्यादा पर, अथवा सुशीला मामीक शील पर, अथवा अपन व्यक्तित्व पर आँच लागि जेबाक भय होइ छनि। मोने-मोन सुनगैत रहै छथि, मुदा मातृक जा क’ सोझाँ-सोझी सुशीलाकें कहि नहि अबै छथि–मामी, सोना मामी, हमरा अहाँसँ प्रेम भ’ गेल अछि। हम अहाँ बिना नहि रहि सकब। अहाँ सन ऊर्वर ऊर्जस्वित, उत्तेजनामयी, कामातुरा रूपवतीक वेगमय ज्वारकें हमर वृद्ध, अशक्य मामा नहि थाम्हि सकताह, हम थाम्हि लेब। अहाँ हमरा संग चलू। संग-संग रहब। जीवनकें जराएब नहि, स्वाहा नहि करब, जीब…।
(अगिला अंकमे)
२. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
सातम दिन :
३१ दिसम्बर १९९०, सोमवार :
आहि भोरे जहन हम उठलहुं तऽ सब पहिनेहे उठि गेल छल।हम जल्दीसऽ तैयार भऽ गेलहुं। फेर सब संगे मंदिर पहुंचलहुं।विभिन्न देवी देवताक दर्शन भेल।तकर बाद हम इम्हर उम्हर घुमति रहुं।तकर बाद पुनःभोजन आऽ फेर बकरेश्वर दिस विदा।रस्तामे शिक्षक सब बतेला जे विद्यालय के संचालनमे हुनकासबके की की दिक्कत होएत छैन।अहि तरहे हमसब अपन अपन परेशानीक आदान प्रदान करैत रहलहुं।हमरा सबके तहन अनुभव भेलजे कखनो काल सामनेक परिस्थिति सऽ उत्तेजित भऽ हम छात्रगण शिक्षक सबदऽ गलत धारणा बना लैत छी।जे की बहुत गलत छै।हॅं तऽ हमसब बकरेश्वर पहुंचलहुं।सॉंझक ६ बाजल छल।आहि १९९० के आखिरि दिन छल ताहि द्वारे हम सब अपन अपन समान सैंतकऽ सांस्कृतिक कार्यक्रमक तैयारीमे लागि गेलहुं। ताहि बीचमे हमरा सबके हेडमास्टर के तरफ सऽ बुलावा आयल।हमसब डेरा गेलहुं जे हमर सबमे सऽ एकटा छौड़ी ककरो समान फेक देने रहै तैं सबके डपटै लेल बजायल जा रहल अछि।अहि तरहक आशंका सऽ डेरा हमसब जहन ओतऽ पहुंचलहुं तऽ सब छौड़ा सब बहुत खुश छल तहान हमसब कनिक खुश भेलहुं। लेकिन फेर मुड गड़बड़ा गेल ।कियो बाजल जे छौड़े सब शिकायत केलक तैं ओ सब तऽ खुश हेबे करत।हमसब बैसकऽ शिक्षक के प््रातीक्षा करऽ लगलहुं।मुदा जखन ओ एला तऽ हुन्कर हाथमे छड़ीके स्थान पर एक कॉपी छलैन आ ओ मुस्कुरा रहल छलैथ।आबिकऽ ओ घोषित केलैथ जे मृगांक नामक एक छात्रक आहि जन्मदिवस अछि तैं हम एकटा स्वरचित कविता सुनायब।ई सुनैत देरी हमसब खुशीसऽ उछलि पड़लहुं।आब की छल हमसब कविता सुनलहुं मिठाई खेलहुं आ भोजन कऽ पुनथ नाटकके तैयारीमे लागि गेलहुं। ठीक एगारह बजे हमसब एक कोठलीमे जमा भऽ कार्यक्र्रम प्रारंभ केलहुं।हमहु एक नाटकमे भाग लेलहुं जाहिके डाइरेक्टर आ राएटर सेहो हम रही।फेर बारह बजे रातिकऽ समूहगान संगे नववर्षक स्वागत केलहुं।शिक्षक सब सेहो अपन कार्यक्रम प्रस्तुत केलैथ।अन्ततः हम सब सुतै लेल जाय लगलहुं। जाय सऽ पहिने हमसब गुडनाइट’ वा शुभरात्रि’के स्थानपर हैपी न्यू इयर’ वा द्यनववर्षक शुभकामना’ बाजि रहल छलहुं।
५.पद्य
५.१.श्यामल सुमनक-अभियान
५.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (पाँचम खेप)
५.३.महाकाव्य- बुद्ध चरित
५.४.डॉ पंकज पराशरक 4 टा कविता ज्योतिक -पतझड़क आगमन
५.५.विनीत उत्पलक ५ गोट कविता
५.६. महेश मिश्र “विभूतिक” कविता गङ्गा-स्तुति

श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर जिला सहरसा बिहार। स्नातक शिक्षा:अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा। प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर। स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन।
अभियान

देश-प्रेम के भरल भाव सँ, नित निर्माण करै छी!
सहज-भाव सँ संविधान के, हम सम्मान करै छी!
तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!!

सड़क, रेल, बिजली जुनि पूछू, बाढ़ भेल सौभाग्य हमर!
विद्यालय बिनु पढ़य नै बच्चा, छी बड़का दुर्भाग्य हमर!
आजादी सँ भेटल की हमरा, सब किछु ध्यान धरै छी!
बिना विकासक कष्ट मे रहितहुँ, राष्ट्रक गान करै छी!
तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!!

सब चुनाव के बेर मे पूछथि, बाकी सब दिन रहता कात!
आजिज छी आब सुनि-सुनिकय, हमसब हुनकर मीठका बात!
एक अंग मिथिला भारत के, व्यंग्यक बाण सहै छी!
सहनशीलता हमर एहेन जे, एखनहुँ मान रखै छी!
तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!!

हरेक साल मिथिलावासी मिलि, जाइछी जेना बाबाधाम!
तहिना चलू एक बेर संसद, किछु नै किछु भेटत परिणाम!
उन्नत मिथिला के खातिर हम ई अभियान करै छी!
राश्ट्र-भक्ति मे मिलिकय श्रद्धा-सुमन प्रदान करै छी!
तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!!

. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस “राधा” जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर “विदेह”मे गुञ्जनजीक “राधा”क पहिल खेप।-सम्पादक।
गुंजनजीक राधा
विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल।
अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक ।
आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल-
जगमगाएल अछि। सुस्वागतम!
लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी।

राधा (पाँचम खेप)

अहां चुप छी चुप्प अछि संसार
अहां नहि तं सब किछु चुपचाप
ओना तं चलिये रहल सब नित्य
मुदा नहि बूझब इयेह अछि सत्य
मनहि मन लोकक मिझायल दीप
राति तं राति, दिन सेहो
भ’ गेल छैक निष्प्राण नीरस आ
उदास अन्हार !
बजैये बड़दिव चलैये-फिरैये लोक
किन्तु नहि किछु लसि बोली मे
ने रस करबा मे कोनो काज,
हम तं सहजहिं पड़ल छी ओछाओन
तें एकर अलावे जे अहंक
मानस-संग मात्र अवलंब श्वांसक
ओना सब टा बन्द, हमरा लेल
आशा आ मनोरथ केर सब केबार
ओना तं चलिये रहले समय
भोर दुपहरि सांझ, रातिक चालि
जगतक नित्य केर सब कारबार !
हमर सबकिछु बन्द अछि,
सप्पत अधमृत ई संसार,
प्राणाधार !
१४/४/०५

1.डॉ पंकज पराशर 2.ज्योति
श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
१. बखरी

गै दाइ बखरी!
बखरी के तँ बकरियो होइत छैक हक्कलि डाइन
आ बूझल नहि छौक जे निःशब्दा रातिमे
कोना गाछ हँकैत छैक ओहिठामक मौगी!

कानमे जड़ी दऽ कए बंगालिन सब
राखि लैत छैक भेंड़ा बना कए पुरुख-पातकेँ
से तँ बूझले हेतौ ने!

एहि लोकाख्यानक बीच हम बौआइत हम सोचैत छी
जँ बखरीक बकरियो धरि होइत छैक डाइनि
तँ बखरीक अस्मितासँ जुड़ल सलोना
कोना एखन धरि बाँचल अछि एतेक सलोना!

जा हे बखरी-सलोना!
अनंत कालसँ अभिशापित बखरीक अतीत खाहे जे रहल हो
मुदा आजुक बखरी तँ भाइ! एकदम अछि खखरी!

खखरी-पटभड़ भेल बखरी आइ छुछुआइत अछि
बकरी-छकरी जकाँ एहि बाधसँ ओहि बाध
एहि खेतसँ ओहि खेत दू गाल अहरा लेल अपस्याँत
बखरीक चिल्का सब देसक कोन-कोनमे

भूगोलमे रहितो मिथिलाक इतिहाससँ अभिशापित
मैथिल-संस्कृतिक अवैध संतान बखरी
किएक नहि भऽ सकल कहियो तेहेन जेहेन अछि सकरी?

जेहेन कोइलख जेहेन राँटी जेहेन मँगरौनी
सलोनाक अछैतो तेहेन किएक नहि बखरी?
खखरी सन आइयो किएक फटकल अछि बखरी
मिथिलाक इतिहाससँ बाहर?

२. धानक खेत

गम्हरल धानक खेतमे जखन बहराइत अछि पहिल शीश
दुधमुँह नेना सन तन्नुक-तन्नुक
आ बसातक पहिल झोंक जकाँ खसैत अछि खेतमे
लाखक-लाख भंख
तँ दू टा पुत्रकेँ जन्म दइयो कऽ निःपुत्र भेल
मुनिया मायक मुँहपर पिरी छिटकि जाइत छनि

एतय हम बेटीक कन्यादानक चिन्तामे डूबल छी
मुदा मुनिया बापक करेज देखियनु बाऊ
जे बैसल छथिन निश्चिन्त भऽ कए
डेढ़ बरखसँ डिल्लीमे

ने कोनो चिट्ठी-पतरी ने गाम अयबाक गप
छुच्छे फोन टा करैत छथि
पल्टी मायक ओहिठाम मासक कोनो रविकेँ ओंघायल जकाँ
गाम-घरक चिन्तासँ उदासीन

बटेदारक कृपासँ कोनहुना रोपायल एहि बेर
दस कट्ठा खेत
जे जीबैत छी अगहनक आसमे
नहि तँ सिदहा के चिन्तामे पड़ल रहितहुँ बाले-बच्चे उपास

-एहि सबटा खेरहाक बीच उड़ैत रहल
मुनिया मायक आँखिमे हेंजक-हेंज भंख
शीशसँ आच्छादित दूध भरल धानक खेतमे

३. एमहर गाम
एमहर कइक बरखसँ नहि सुनगल अछि
सोनाय कमारक भाठि कचिया-खुरपीमे बेंट
आ हरक फाड़ पिटयबाक लेल धुरियायले पएरे कोनो हरबाह
नहि आयल अछि एमहर

कहलनि बीसो बाबू-के जोतत हर एहि ट्रैक्टर युगमे
अटंट दूपहरमे पितायल बड़दक संग सुखायल देह लेने
के घुरत आब हराठसँ
कान्हपर कटही हरमे लाधल पालो केर
बोझसँ स्वयं बड़द भेल

जखन हर नहि तँ हरबाहक कोन बेगरता
फाड़ पिटयबाक कोन चिन्ता
एहि ट्रैक्टर युगमे मनुक्खक कोन आवश्यकता?

…से कहैत छी भाइ
जे एहि बेर नहि मानलक ककरो बात आ चलि गेल पंजाब
हमरा गामक एकघरा हज्जाम कंतलाल ठाकुर
मायपर तामसेँ बड़बड़ाइत-
कमाय नहि धमाय
अनेरो फाटय बेमाय

बड़की काकी केर श्राद्धमे एहि बेर
जखन नहि आयल क्यो हज्जाम
तँ आन गाम विदा होइत झूर-झमान हमर पित्ती
कालबिद्ध उदासीक खोहमे
पानक सरंजाम मोटरी बन्हनेँ खेते-खेत बौआइत
सुमरित तमोली आब नहि करैत अछि ढोनि

एमहर विलुप्त भेल अछि
गामक भाषासँ सेहो जऽन आ बोनि
थथमारिकेँ किछु चीजकेँ जोगयबाक प्रयासमे
उपहासक पात्र बनल हमर बाबा
लिखलनि अछि चिट्ठी जे ओहो अओताह दिल्ली
किछु काज-उदेम करताह एहू उमेरमे
किछु नहि तँ पानिये भरताह
ककरो चिल्केकेँ डेबताह
मुदा गाममे आब किन्नहु नहि रहताह

भकोभन्न देहरिपर जरैत माटिक दीप केर इजोतमे
तकैत छी हम सुन्न घरक नीरवतामे
सुकरातीक ओरियाओन ज्योतिक्षीण आँखिक प्रत्याशा केर
खंड-खंड चिनगी अपन गाममे

सिरपंचमीमे आब ठाढ़ नहि होइत अछि ककरो हर
आ ने जाइत अछि लऽ कए कमरसारि ककरो हरबाह

एमहर कइक बरखसँ एहिना बीतल अछि सिरपंचमी
कहलनि बीसो बाबू-लोथ भेल
भोथ भेल कोदारि-खुरपी
आ हर-फाड़क मादे

जूड़शीतलमे आब जुड़ाइत अछि ट्रैक्टरक पहिया
आ गाममे नहि बाँचल अछि एहेन कोनो घर
जकर खेत नहि लागल हो भरना आ नहि बटैया

४.भूत
घैलक-घैलक पानि उघि कए
जे किसुन महतो लगेलनि
मालदह आमक गाछी
आ एतेक टाक परिवार-
से हुनके लेल
आब भऽ गेलनि
दिनकेँ गाछी रातिकेँ भूत।
2. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति

पतझड़क आगमन
पतझड़क आगमन
दहैक रहल वातावरण
संतरा, पीयर, लाल, भूरा
रंग सऽ भरल पूरा
प्रकृति जेना भेल जीर्ण
मौलाएत झड़ैत तृण-तृण
विविध रंगके त्यागिकऽ
गेरूवा वस्त्र धारिकऽ
विदा भेल लेबऽ सन्यास
ताहि पर सुर्योदयक आकाश
धरतीपर जे आगि छल
ताहिमे ओहो लिपटल
आकि अछि दर्पण जकॉं
पृथ्वीक रूप देखाबैत जेना
अकरा शीतल करैलेल
साधु तपस्यामे लीन भेल
जहिया हिमक बरखा हैत
अस्वच्छता जखन दूर हैत
तहिया सऽनवजीवनक प्यास
लायत सुखद वसंतक अभिलाष।

१.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .।
१. इन्द्रप्रस्थक कथा

युग-युग सं
लिखल जा
रहल छैक
इन्द्रप्रस्थक कथा

द्वापर मे
अहि ठाम
छल पांडवक
राजधानी

जकरा पावैक लेल
अठाराह दिन तक
भएल महाभारत
मारल गेल हजारों लोक

समय बदलल
आब नहि छथि ओ पांडव
नहि ओ कौरव
मुदा, आबो मारल जाइत अछि लोक

तहिया उजड़ि गेल छल
गामक-गाम
आई कामनवेल्थक नाम पर
उजड़ि रहल छैक गरीबक झोपड़ी

हम पूछैत छी
शिखंडीक आगू कs
रचल गेल छल षड्यंत्र
सत्ताक लेल

भाई-भाई कs
दुश्मन भेल
मारि-काटि कs
करलक वंशक नाश

आब अहि इन्द्रप्रस्थ मे
वर्ल्ड क्लासक नाम पर
रचल जाइ अछि षड्यंत्र
गरीब कए भगाबैक लेल.

२. नौकरी उर्फ़ आजीवन कारावास

नेना मे अहां
घोइट-घोइट कs
याद करैत रहियै
किताबक पन्ना

सोचैत रहियै
खूब पढ़ि-लिख कs
नीक सन
नौकरी पाइब

तहि लेल
दिन-रात
घिसैत रहि कलम
क्लास मे आबैत रहि प्रथम

मुदा,
जखन नहि भेटल
सरकारी नौकरी तs
प्राइवेट नौकरी करै परल

एहि समय मे
नहि अपन लेल समय
नहि परिवारक
भरण-पोषणक लेल पाई

एहि ठाम
विकट परिस्थिति मे
मन परैत छैक
बरटोल्ड ब्चेस्ट

हुनकर कहब छ्ल
एक गोटा कs
कम तनख्वाह देब
माने छल आजीवन कारावास

हम पूछैत छी
अहां कहू या बताऊ कोन नीक
कम तनख्वाहक नौकरी
वा आजीवन कारावास

एक ठाम, अहां कs
दुनिया भरिक दायित्व
मुदा, नहि रहैत शांति

दोसर ठाम, अहां क
दुनिया भरिक शांति
मुदा,
नहि रहैत कोनो दायित्व.

३. जाइत-पाइत

जाइत-पाइत धर्म-संप्रदायक
लकए जखन ताहि
एक-दोसर कs देखए नहि चाह्बै
तखन धरि आहंक कल्याण नहि होइत

जखन अहां जनइत अछि
कर्मक आधार सं
बांटल गेल रहए
जतिक भेद

तखन अहांक ई भड़ास
आओर ई तामस वा चिचियाइब
देखि कs
हंसी आबैत छी हमरा

जहि जुग मे
जेकरा जे नीक लागल
अहिने धर्म वा संप्रदाय
बनौउने छैक

जकरा जाहि सं चित जुड़्लाह
तहि सं जुड़ल
जकरा जाहि सं चित नहि जुड़ल
से नहि जुड़ल

ओहिना मे अहां जे
दोसरा कs गाइर-फ़जीहत करैत छी
आहि सं केकरो नहि
बस अप्पन पहचान बताबैत अछि.

४. एक धुर जमीन

एक धुर जमीनक लेल
जे अहां चिचिया रहल छी
की सोचैत छी
अहां संगे लs जाइब

एक धुर जमीन सं
किछु नहि होइत
सालों कि हजारों साल सं
जमीन ओहि ठाम छैक

आई छी अहां
काइल नहि रहब
जे अहांक जमीन छेकेन छथि
ओ सेहो नहि रहताह

मरलाहक बाद
चारि हाथ जमीन चाहि
अंतिम संस्कार लेल
तकरा बाद सब छी माइट

तखन एक धुर माइट लेल
कथि ले मरैत छी
कथि ले चिचियाइत छी
कथि लेल मन मलिन करैत छी

तs सुनु, नहि करू
ई माइट लेल हाय-हाय
कोनो एहन काज करू
माइट कि सभक दिल मे बैइस जाऊ.

५. चंद्रमुखी

अंगप्रदेशक लोक नहि
जनैत अछि चंद्रमुखी कs

सुखी अछि जे सभ कियो
ओकरा नहि जनैत अछि
दुखी अछि जे कियो
ओकरा जनैत अछि

जे जनैत अछि
शरतचन्द चट्टोपाध्याय कs
देवदास कs ओ जनैत अछि
जनैत छैक सेहो अंगप्रदेश क

अंगप्रदेशक निवासी छलीह चंद्रमुखी
नगरवधू नहि मुदा
ओकरो सं कम नहि छलीह
जोगसर मे हुनकर कोठा छलाह

शरतचन्द गेलाह
हुनकर संग चंद्रमुखीक आत्मा
अंगप्रदेश कs छोड़ि देलखिन
आब नहि ओ ठाम, नहि ओ ठिकाना

जे पारो व देवदास कs जनैत अछि
चंद्रमुखीक तकलीफ़ जनैत अछि
जे नहि जनैत अछि
अनजान बनल अपने मे रमल अछि.

महेश मिश्र “विभूति”
महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक।
गङ्गा-स्तुति

जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे।
बड़ भागी नर, कल्पवास कर, नित दिन सुलभ विमल तरङ्गे।। जय माँ गङ्गे..
सदिखन दर्शन, नित दिन मज्जन, नित दिन निर्मल काया अङ्गे।
मानस विमल वो निर्मल काया, चिन्तन, मनन, भजन नित सङ्गे॥ जय माँ गङ्गे…
कथा-श्रवण , कीर्तन मनमोहक, पल-पल कटते अनुपम ढङ्गे।
चिन्तन, मनन, भजन सुखदायक, निशिवासर लभते बहुरङ्गे॥ जय माँ गङ्गे…
मन-मल-रेचन, भव-भय-मोचन, त्रिविधताप भवसागर भङ्गे।
विमल “विभूति” मोक्षदायिनी, सादर सुलभ; होहु नहिं तङ्गे॥ जय माँ गङ्गे…
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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