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विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२

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विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२

‘विदेह’ १ नवम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ११ अंक २१ ) एहि अंकमे अछि:-
एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव 2.अनलकांत
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.५.1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र
२.६. 1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति
२.७. रिपोर्ताज- 1.अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ 2. नवेन्दु कुमार झा 3. नेपाल चिन्हएबाक अभियान – जितेन्द्र झा .
२.८. 1.विचार-राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत,श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार2. विद्यापति-निमिष झा
३.पद्य
३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा 3. अशोक दत्त 4.निमिष झा
३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (सातम खेप)
३.३. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर
३.४. टेम्स नदीमे नौकाविहार-ज्योति
३.५. १.विद्यानन्द झा २.अजीत कु. झा ३.विनीत उत्पल
३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. पंकज पराशर
३.७. 1.धीरेन्द्र प्रेमर्षि 2. धर्मेन्द्र विह्वल 3.जितमोहन झा
३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी

(आगाँ)
४. महिला-स्तंभ
५. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी
६. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ)
7. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
7.1Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR
7.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti
8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)
विदेह (दिनांक १५ नवम्बर २००८)
१.संपादकीय (वर्ष: १ मास:११ अंक:२२)
मान्यवर,
विदेहक नव अंक (अंक २२, दिनांक १५ नवम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल।
अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि।
प्रस्तुत अछि हिनकर कविता “परछाइयाँ”(कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर)

छाह सभ

अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ,
यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे।
बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे,
जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ।
आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि
सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान।
देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला,
हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ
असगर एकटा कौआ उजाड़मे।
कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक,
आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी।
सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन,
सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन।
सभटा देवता हमर अपन छाह छथि,
सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन।
सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ,
सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन।
केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार!
देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे।
हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर,
राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि।

समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि।

भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओऽ २ वर्ष धरि रहत।

संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ नवम्बर २००८) ६३ देशसँ १,२०,९२३ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in

अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें

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मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00
राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00
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उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00
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कविता-संग्रह

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जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00
कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00
लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00
फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00
कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00

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अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत

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बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ

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पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II
गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
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मोबाइल नं.9868380797,
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श्रुति प्रकाशनसँ
१.पंचदेपोपासना-भूमि मिथिला- मौन
२.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव
५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर
६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर , नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा)
श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८
Website: http://www.shruti-publication.com
e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com
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२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ’ गेल।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक “नो एंट्री: मा प्रविश” केर ‘विदेह’ मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल ‘विदेह’ केर समक्ष “श्रुति प्रकाशन” केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com
महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) ‘विदेह’ द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) ‘विदेह’ द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा’ रहल गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), ‘गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , ‘भालसरि’ (पद्य संग्रह), ‘बालानां कृते’, ‘एकाङ्की संग्रह’, ‘महाभारत’ ‘बुद्ध चरित’ (महाकाव्य)आऽ ‘यात्रा वृत्तांत’ विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।
महत्त्वपूर्ण सूचना (४): “विदेह” केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत।
महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि।
मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि।
२.गद्य
२.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव 2.अनलकांत
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
२.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.५.1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र
२.६. 1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति
२.७. रिपोर्ताज- 1.अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ 2. नवेन्दु कुमार झा 3. नेपाल चिन्हएबाक अभियान – जितेन्द्र झा .
२.८. 1.विचार-राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत,श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार2. विद्यापति-निमिष झा
कथा
१. सुभाषचन्द्र यादव २. श्री अनलकांत

चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
आतंक
ओ कहियो हमरा संग बी. ए. मे पढ़ैत रहय । ओकरा सँ जँ फेर भेंट नहि होइत तऽ मनो नहि पड़ितय जे ओ कहियो संग-संग पढ़ैत छल। हम ओकरा चिन्हबो नहि कयलिऐक । वैह चिन्हलक आ नाम लैत टोकने रहय — ’चिन्है छी ?’
ओकर आत्मविश्वास आ मैत्रीपूर्ण स्वरसँ कनेक चकित आ प्रसन्न होइत हम मोन पाड़य लागल रही जे ओ के अछि ।
एम. पी. क एलेक्शन होमय बला रहैक । हम एलेक्शन ड्यूटीमे आयल रही। ओहो एलेक्शने ड्यूटी मे होयत । ढेरी लोक एहि काजसँ आयल रहय । ओ स्नेह-भाव सँ मुस्किआइत रहय जेना बिसरि जेबाक उलहन दैत हो । ओकर मुस्कीसँ हम अपनाकेँ असहज आ हास्यास्पद अनुभव करऽ लागल रही । एहन स्थितिमे ओकरा चिन्हब आ ठेकनायब मुश्किल छल ।
’नहि चीन्हि सकलहुँ।’ – हम हारि कऽ कहलिऐक। ओकरा नहि चीन्हि सकबाक हमरा ठीके अफसोस भेल रहय ।
’हम हरिवंश !’ – ओ अपन परिचय देलक ।
’अरे, हरिवंश ! ओह, एकदम्मे नहि चीन्हि सकलहुँ । ततेक दिन भऽ गेलै आ एहि बीच अहाँ ततेक बदलि गेलहुँ जे चिन्हब कठिन छल । हम कहियो अंदाजो नहि कऽ सकैत रही जे अहाँ सँ एतेक दिनक बाद आ सेहो एहिठाम भेंट भऽ जायत । कतऽ छी ?’ – अपन न्यूनता केँ झाँपक लेल हम एक्के साँसमे ई सभ कहि गेल रही ।
हरिवंश हमर मित्रक मित्र रहय। ओकर संग-साथमे कतेको समय बीतल होयत । मुदा ने हम ओकर आत्मीय बनि सकलिऐक ने वैह हमर आत्मीय बनि सकल । हमर आ हरिवंशक बीचक सम्बन्धकेँ फरिछायब कठिन अछि । ओकरा औपचारिके कहब बेसी ठीक होयत । भेंट तऽ होइत रहय, किन्तु भेंटक आवृत्तिक अनुपातमे जे घनिष्ठता हेबाक चाही से नहि भेल । सिल पर पड़त निसान बला कहबी टा चरितार्थ भेल । हम एक-दोसराकेँ चीन्हि गेलहुँ फेर कहियो नहि बिसरबाक लेल । तखन ई सभ कोना घटित भेल ? हम कोना ओकरा बिसरि गेलिऐक ? भरिसक हरिवंश सँ भीतरी लगाव नहि हेबाक कारणे एना भेल हैत वा जीवनमे आयल अनेक परिवर्त्तनक कारणे भेल होइ। लेकिन तखन ओ किएक ने बिसरल ? ओकरा बिसरब भरिसक हमरे स्मृति-दोषक परिणाम छल ।
हरिवंश जे कहलक ताहिसँ पता चलल जे ओ हमरे कामत वला ब्लॉकमे बी. डी ओ. अछि आ अखन एलेक्शनमे ट्रांसपोर्टबला काज सम्हारय आयल अछि। ई जनिते हमर स्वार्थ-बुद्धि सक्रिय भऽ उठल । कामतबला ब्लॉकमे कैक सालसँ लसकल दाखिल खारिजबला काज मोन पड़ि गेल आ अखन जे ट्रांसपोर्टबला काजसँ आयल छी से हरिवंशक रहने कोनो बढ़ियाँ जीप भेटि जायत । नहि तऽ कोन ठेकान जे जीपक बदलामे ट्रेक्टरे दऽ दिअय। हमरा दिमागमे ईहो बात तुरंत आबि गेल जे आब एलेक्शनक एहि हूलिमालि आ बालु-गरदासँ जान बचत; जल्दिए छुटकारा भेटि जायत । अपन ई सभ फायदा देखि हरिवंशक प्रति जेना अतिरिक्त स्नेह उमड़ि आयल । ओहि स्नेह-प्रवाहमे हम ओकरा कहलिऐक – ’अरे वाह ! अहाँ तऽ हमर कतेको काज कऽ सकैत छी । एकटा तऽ ई जे अहींक ब्लाक मे हमर दाखिल-खारिज वला काज कैक सालसँ अटकल अछि आ दोसर जे हमरा नीक सन जीप दिआ दिअऽ।’
ई सभ सुनि हरिवंशक चेहरा पर जे स्नेहसिक्त दोस्ताना मुस्की रहैक से लुप्त भऽ गेलैक आ तकर बदलामे एकटा कामकाजी उबाऊ भाव आबि गेलैक । ओ बाजल — ’कहियो ब्लाक
आउ, भऽ जेतै ।’ आ गाड़ीवला कागज हमरा हाथसँ लैत एकटा टेबुल दिस बढ़ि गेल । हम ओकर पछोर धऽ लेने रही । हरिवंशक मुँह-कान आ देह-दशा सम्पन्न लोक जकाँ गोल-ठोल आ भरल-पूरल रहैक । ओकर फूलपैंट-कमीज साफ झकझक आ क्रीजसँ तनल रहैक । जूता चमचमाइत रहैक। ओकर पहिरावा उच्चपदस्थ पदाधिकारीक अनुरूप दर्प आ प्रभुत्व बला प्रभाव छोड़ैत रहैक । टेबुल लग लग पहुँचि टेबुलक चारूकात घोदिआयल लोककेँ ठेलैत आ ’हटू’ कहैत हरिवंश कुरसी पर जा कऽ बैसि गेल । हम कुरसीक कातमे ठाढ़ भऽ गेल रही । ओहिठाम और कोनो कुरसी नहि रहैक जे हरिवंश हमरा बैसऽ लेल कहैत । कागजी औपचारिकता पूरा केलाक बाद ओ हमरा जरूरी कागज सभ दऽ देलक । हम ओहि स्थान दिस विदा भऽ गेलहुँ जतय जेबाक लेल ओ कहने रहय । गाड़ीक ड्राइवर कोम्हरो चल गेल छलै आ ओकर प्रतीक्षा मे हमरा आध घंटा आरो बिलमय पड़ल । ओहि आध घंटामे हरिवंश सँ एक बेर और भेंट भेल आ कनेक काल घरौआ गपशप होइत रहल । बाल-बच्चा, ओकर पढ़ाइ-लिखाइ आ आन दोस्त मित्रक सम्बन्ध मे ।
वोटक गिनतीक समय हरिवंश सँ देखा-देखी भेल, गप्प नहि भऽ सकल । यद्यपि ओकरा देखिते हमरा भीतर बिजली जकाँ एकटा भावावेग चमकल , मुदा परिचय आ मित्रताक सुखायल स्त्रोतक कारणे ओ भावावेग बिला गेल । हरिवंश किछु नहि बाजल । ओ मौका अनौपचारिक गपशप लेल रहबो नहि करैक । ओ अपन वरिष्ठ पदाधिकारी सभक बीच बैसल रहय ।
एहि सुखायल भेंटक कैक मास उपरान्त एक दिन ओ बजारमे टकरा गेल । ओ हाथमे झोरा लेने तरकारी कीनय जाइत रहय । ओहि दिन ओ हमरा व्यस्त आ अन्यमनस्क बुझायल। जल्दी-जल्दी मूर-टमाटर बेसाहलक आ चलि गेल । हम ओकरासँ हालचाल पूछितिऐक, लेकिन ओकर चेहरा देखि कऽ हालचाल पुछनाइ नीरस आ फालतू बुझायल। मुदा निरर्थकताक अनुभव करितो जे गप हम शुरू कयलहुँ सेहो निरानंदे छल । हम ओकरा कहलिऐक – ’एहि बीच कतेको बेर सोचलहुँ जे ब्लॉक जाइ, लेकिन सोचिए कऽ रहि गेलहुँ।’
’आउ । कोनो सोम वा बुधकेँ आउ, जहिया कर्मचारी रहैत छैक ।’ – नितान्त व्यावहारिक आदमी जकाँ कारोबारी अंदाजमे ई कहैत ओ चल गेल ।
बहुतो दिन बीतल । हम सोचि कऽ रहि जाइ । लेकिन एक दिन ठानि लेलहुँ जे आइ जेबाक अछि । ब्लॉक पहुँचैत छी तऽ हरिवंशक पते नहि । ओ राँची चलि गेल रहय । दुर्भाग्य ! बादमे जहिया कहियो ब्लॉक जाय दिआ सोची तऽ हुअय जे नहि जानि हरिवंश ओतय होयत कि नहि आ एहि दुविधामे गेनाइ टरैत रहल ।
किन्तु एनामे काज कहियो नहि भऽ सकत, ई सोचि विदा भेलहुँ । भरि रास्ता मन भारी रहल । ब्लॉकक गेट पर जे पहिल व्यक्ति भेटल तकरा सँ पुछलिऐक जे हरिवंश अछि कि नहि । हरिवंश अछि ई जानि मन हल्लुक भेल । हरिवंशकेँ ताकय लगलहुँ । ब्लॉक वला मकानक आगू मैदानमे हरिवंश कुरसी-टेबुल लगौने बैसल रहय आ करीब डेढ़ सौ आदमी ओकरा घेरने रहैक । ओ वृद्ध लोककेँ भेटय वला पेंशनक सत्यापनमे लागल रहय । एहन समयमे लोककेँ ठेलि-धकिया कऽ ओकरा लग पहुँचब कठिनाह छल आ उचितो नहि बुझाइत रहय । पता नहि ओहिठाम बैसक लेल फाजिल कुरसियो हेतैक कि नहि । तेँ प्रतीक्षे करब श्रेयष्कर बुझायल । चाह पीलहुँ , पान खेलहुँ आ तकर बाद भीड़ छँटबाक बेचैन प्रतीक्षामे एम्हरसँ ओम्हर टहलैत रहलहुँ ।
हरिवंश अपन चेम्बरमे बैसि गेल रहय । जखन हम ओकर चेम्बर मे प्रवेश केने रही तखन एक व्यक्ति और कुरसी पर बैसल छल । हाथ मिलबऽ लेल हाथ बढ़ाबी आ एकरा अपन हेठी बूझि जँ ओ हाथ नहि बढ़ौलक तऽ भारी अपमान होयत, ई सोचि हम एकटा हाथ उठा ओकर अभिवादन केलिऐक । जेना मोन पड़ैत अछि, जवाबमे ओ भरिसक हाथ नहि उठौने रहय ने बैसऽ लेल कहने रहय । अभिवादन करैत आ ओकर संकेतक प्रतीक्षा केने बिना हम बैसि गेल रही । स्निग्ध आ कोमल किंतु अल्पजीवी मुस्की संगे ओ हमरा सँ पुछने रहय – ’कोना छी ?’
’बस चलि रहल छै ।’ – हमर एहि शुष्क औपचारिक उत्तरसँ वार्त्तालाप भंग भऽ गेल ।
खाद-बीज, सीमेंट, पंपसेट आ बोरिगं बला आवेदक सभ एक-एक कऽ आयब शुरू कऽ देलकैक ।
’खाता नंबर की अछि ?’ – बोरिगं बला एकटा आवेदकसँ हरिवंश प्रश्न केलकै ।
’नहि मोन अछि।’
’खेसरा नंबर ?’
’नहि मोन अछि ।’
’कतेक रकबा अछि?’
’पता नहि ।’
’भागू एतय सँ ।’ – कहैत ओकर आवेदनकेँ हरिवंश नीचा फेकि देलकै । ओ व्यक्ति हतप्रभ भेल किछु काल ठाढ़ रहलै आ दरखास्त उठा धड़फड़ाइत निकलि गेलै ।
लोक एहिना आबय, हरिवंश किछु पूछै आ ओकर दरखास्त फेकि दैक। एहि समस्त कार्य-सम्पादनमे ओकर आवाज अत्यन्त कर्कश आ चेहरा कठोर रहैक । ई देखैत-देखैत हमरा घबराहटि होअय लागल । बुझायल जेना हमहीं आवेदक छी आ हरिवंश हमरे डाँटि आ अपमानित कऽ रहल अछि । हरिवंश अज्ञात ढँगसँ भीतरे-भीतर हमरा आतंकित कऽ देने छल ।
अंत मे ई कहि दी जे हरिवंश दाखिल खारिज लेल सी. ओ. सँ हमर परिचय करा कऽ चल गेल, लेकिन ओ काज अखन धरि नहि भेल अछि । हरिवंशक आदमी हेबाक कारणे घूस नहि देत, भरिसक यैह सोचि सी. ओ. काज नहि कऽ रहल अछि । हम फेर जा कऽ हरिवंश केँ नहि कहलिऐक । हरिवंश सँ भेंट करबाक इच्छे नहि होइत अछि । ब्लॉकक नाम लैते हरिवंशक ओ रूप मोन पड़ैत अछि आ घबराहटि होअय लगैत अछि।

अनलकांत(1969- ), मैथिली त्रैमासिक “अंतिका”क सम्पादक। हिन्दीमे दूटा कथा संग्रह प्रकाशित।
असोथकित-अनलकान्त

प्राइवेट वार्डक बिस्तर पर पड़ल-पड़ल ओ सामनेक टेबुल पर राखल एक मात्र
खाली गिलास मे बड़ीकाल सँ ओझरायल छल। काँचक ओ मामूली सन गिलासओकरा देखैत-देखैत रूप बदल’ लागल छलै। एक बेर ओकरा लगलै जे ओहि खाली गिलास मे नीचाँ सँ अनायास पानिक सतह ऊपर उठ’ लगलै आ अगिले क्षणगिलासक चारूभर पानि खसैत सेहो ओकरा प्रत्यक्षे जेना बुझेलै! ओ झट आँखि मूनिलेलक। बड़ीकाल पर आसते-आसते फेर ओ आँखि खोललक। गिलास पूर्ववत
खाली छलै। ओ फेर निश्चेष्ट गिलास पर नजरि गड़ा देलक। कोठली मे देबालघड़ीक टिक्-टिक् केर हल्लुक-सन आभास छलै।
किछुए क्षण बीतल हैत कि ओ देखलक गिलासक आकृति एक लय-क्रम मेपैघ होअय लगलै! एक बेर ओकरा लगलै, ई तँ कुंभकरणक पेट थिक! तत्क्षणे फेरबुझेलै, ई विशाल बखारी थिक!…भरि पेट भात लेल रकटल मोन-प्राण मे पेटक
संग बखारीक स्मृति ओकरा नेनपने सँ खेहारने आबि रहल रहै। परेशान जकाँ भ’क’ ओ अपन नजरि ओकहर सँ हटाब’ चाहलक कि ओकरा बुझेलै जे माथ मे किछु चनकि रहल छै आ देह मे तागति सन किछुओ ने रहि गेल छै। ओ अपना केँ बड़असहाय-असोथकित बुझि फेर आँखि मूनने रहय कि तखने एक टा सर्द-सन हाथओकरा माथ पर बलबला आयल घाम पोछ’ लगलै। कोठली मे तखन ओकर पत्नीमात्र छलि, मुदा ओकर हाथ ओहन सर्द हेबाक अनुमान नइँ छलै ओकरा। ई फराक जे ओकर आत्मा मे खरकटल खरखर हाथक धन्नी-हरदि वला गमक आँखि नइँ खोल’ देलकै।
हठात् हल्लुके सँ केबाड़ ठकठका क’ ककरो भीतय अयबाक आभास भेलै,तँ नइँ चाहैतो ओ आँखि खोलि देलक। नर्स छलि। नर्सक आगू-आगू ओकर मुस्कीछलै। ओकरा मन मे स्फूर्ति जकाँ अयलै। नर्सक मुस्कीक उतारा मुस्किए सँ देलक।एक नर्से टा तँ छलै जकर आयब ओकरा बड़ सोहाबै छलै। डाकटरो सँ बेसी। एक टामधुर-सन धुन ओकर धिरछायल मोन केँ छुबलकै। एक खास किसिमक निसाँ मेआँखिक पल झपा गेलै।
कनेकाल बाद ‘मनोहर कहानियाँ’ मे डुबलि पत्नीक पन्ना पलटबाक स्वरओकरा कर्कश जकाँ लगलै। भीतर सँ कचकचा गेल छल। पत्रिका मे डुबलि पत्नीदिस तकबा सँ बचैत, नइँ चाहैतो फेर सामनेक टेबुल पर राखल खाली गिलास दिसताक’ लागल।
किछुए क्षण बीतल हैत कि गिलास फेर रंग-रूप बदल’ लगलै। ओकराअपन दिमाग पर बेस दबाव बुझेलै। ओ नइँ चाहैतो बाजल, ”टेबुल पर सँ एहिगिलास केँ हटाउ!…”
पत्नी पछिला तीन दिन सँ बेसी खन ओकरा संग छलि। पहिल दिन तँ मारतेफजहति करैत भरि दिन ओ बड़बड़ाइते रहि गेल छलि। कतेको केओ बुझारति कि अनुनय-विनय कयलकै, ओकरा पर तकर असरि नइँ भेलै। एकदमे झिकने जाइतरहलि, ”सब हमरे घर बिलटाबै पर लागल यए। धियापुता केँ के देखतै? अयँ! जकरा कपार पर दू-दू टा अजग्गि बेटी रहतै तकर ई किरदानी?… काज-धंधाक चिंते ने! हरखन दोसे-मीत! सब दिन नाटके-साहित्य आ दरुबाजीक मोहफिल! देखौ, आइ केओ ताकहु अयतै!…” एहने-सन मारते रास बात! मुदा ओ एको बेरमुँह नइँ खोललक। दोसर दिन पत्नीक बाजब स्वाभाविके रूपेँ कने कम भेलै, मुदा ओकर मुँह सिबले रहलै। तेसरो दिन ओकरा ओहिना गुमसुम देखि पत्नीक भीतरआतंक जकाँ किछु पैस’ लगलै। से ओहि दिन गुकमी जकाँ लधने ओ ओकराबजबाक बाटे ताकि रहल छलि। एहन खन पतिक आदेश ओकरा नीक लगलै। ओ उठलि आ गिलास हटा बगलक अलमारी मे रखै सँ पहिने पानि लेल पूछलक। ओमुड़ी डोला नासकार कयलक।
पत्नीक भीतर किछु कचकि जकाँ उठलै। आँखि डबडबा गेलै।…
एकरा एहि अस्पताल मे भर्ती दोसे-मित्र सभ करौने छलै। ओकरे सभक समाद पर ओ बताहि जकाँ छोटकी बेटीक संग भोरे-भोर भागलि आयलि छलि।ओकर लाख फजहति आ बड़बड़ाहटिक बादो इलाजक सभ टा व्यवस्था वैह सभ क’ रहल छल। ओकरा बेसी बजबाक साफल ई भेलै जे कैक गोटे बाहरे सँ हालचाल ल’, सभ टा व्यवस्था बुझि-गमि, घुरि जाइ छल। से थाह पाबि गेलि छलि ओ।
क्षण भरिक लेल तँ ओकरा अपन कड़ैती आ बजबाक प्रभाव पर गौरवे जकाँ
भेलै। ओकरा लगलै जे एहि तरहेँ ओ अपन घरवला केँ मुट्ठीमे क’ सकै अछि। मुदापतिक पीयर चेहरा देखिते ओकरा भीतर पैसल अदंक आशंकाक झड़ी लगा देलकै। ओ चोट्ïटे उठलि। पयर मारि आस्ते सँ बाहर भेलि।
पैघ सन गलियारा पार क’ ओ रिसह्रश्वशनक आगूक गुलमोहर लग ठाढ़ भेलि।
अस्पताल प्रांगणक सामनेवला छोर पर बेरू पहरक रौद मे बैसल किछु गोटे पर ओकर नजरि गेलै। ओ दूरे सँ चिन्हैक प्रयास क’ रहलि छलि कि ओकहर सँ दू गोटेलपकि क’ ओकरा लग अयलै, ”की, कोनो बात?” ई दुनू ओकरा पतिक सब सँ
पुरान मित्र छलै। ओकरा बियाहो सँ पहिनेक सहमना, लंगोटिया!…जकरा सभक
ताधरि किछुओ फराक नइँ छलै। बियाहक बादो चौदह-पंद्रह वर्ष धरि प्राय: ओहिनारहलै। शुरूक पाँच साल तँ आश्रमो संगे रहलै जावत्ï अलग-अलग ठाम चाकरी नइँ भेटलै। एहि मे पहिल ओ छल जे ओकरा ‘कनियाँ गै’ कहै छलै आ ‘वर बाबू’ कहैत जकरा सँ ओ हँसी-मजाक मे सदति साँय-बौहुक अदला-बदली करबाक गपशप करै छलि। मुदा तखन ओकरा मुँह सँ बहरायल वाकय संबोधनहीन छलै। दोसर, छात्र-जीवन मे भनसाघरक इंचार्ज रहबाक कारणेँ शुरूहे सँ ओकरा सौतिन कहै छल। मुदा तखन तीनूक संबंधक कोनो टा पहिचान नइँ छलै। ई स्थिति ओकराबड़ दारुण जकाँ बुझेलै। एक बेर ओकरा मोन मे अयलै जे वैह ओहि संबोधन सँ पुकारय, मुदा से भेलै नइँ। ओ अपन भावना पर कठोरता सँ लगाम लगौलक, ”की करबै आब, हमर तँ घरे बिलटि गेल। तै पर सँ ओकर गुमसुम रहब!…” सेरायलआ घबड़ायल सन स्वर बहरेलै। कनेक असमंजसक बाद पहिल दोस्त जे कह’ चाहैत छल, से नइँ कहिओहिना किछु बाजि देलक, ”ठीक भ’ जयतै। डॉकटर सँ हमरा गह्रश्वप भेल यए।”
”नइँ! …कोनो चिंताक बात नइँ!” दोसर तोस देब’ चाहलक।
एहन जवाब ओ नइँ सुन’ चाहने छलि। मुदा ओकरा बस मे किछु ने छलै।आब ओ पहिनेक स्थिति मे नइँ घुरि सकै छलि जकरा सँ कहियो पिण्ड छोड़बैतनीक लागल छलै। ओकरा मुँह सँ बहरेलै, ”घुटनाक अलावा डॉकटर तँ कहै छै,
सब कुछ नॉर्मल है!

”हँ, सैह तँ! …” पहिल जल्दी सँ जवाब ताकलक, ”रसेरस सब ठीक भ’ जयतै।’
”हँ! हँ!…” दोसरक चेहरा पर टार’क भाव बेसी साफ छलै।

हारिक’ ओ वार्ड दिस घुरलि, ”आउ ने, कनेकाल हुनके लग..”
गाछ ओकरा लगीच अयलै। सिरमा लग। दुनूक नजरि मिललै। ओ निहालभ” गेल।
ओ किछु बाज’ चाहलक, तँ ओकरा अपन पत्नीक उपस्थितिक भान भेलै।
गाछ सेहो किछु बाज’ चाहलक, मुदा कोठली मे ओकरा मीतक कयाहता छलि। गाछओकरा बेडे पर सटिक; बैसि रहल। दुनूक हाथ एक-दोसराक हाथ मे छलै। दुनूक हाथ गरम छलै।
”चाह-ताह बाहर सँ एत’ आबि सकै छै ने?” दोसर बुदबुदायल।
तखने ओकर पत्नी उठलि, ”लगले अबै छी”‘ आ कोठली सँ बाहर भ’गेलि। ओकरा पाछाँ लागल दोसर मीत सेहो बहरायल।
किछु पल बीतल कि ओ पड़ले-पड़ल फुसफुसायल, ”ककर्यू मे ढील बुझाइ
छौ!..”
”नइँ-नइँ!… अपना सब घर-परिवार लेल सही समय पर किछु ने सोचलौं।तकर सब टा दु:ख एकरे सब केँ भेलै।” गाछ आब झुकि जकाँ आयल छल।
ओ किछु क्षण चुपचापे रहल। फेर एकहर-ओकहर ताकि बाजल, ”रौ बुडि़!
हमरा सभक लेल अपने टा घर कहिया घर छल? हमसभ तँ सभक घर-परिवार केँ अपने बुझैत रहलौं।” बेड पर पड़ल देह जेना मोन संग उड़’ चाहै छल।
”जँ सैह रहि जाइत शुरू सँ अंत धरि तँ कोनो दु:ख नइँ छल मीत! मुदा एक
एहन मोड़ पर आबि हम सभ अपन आरि बेराब’ लगलौं जत’ पछिलुको कयलधयल सभ टा पर पानि फिरि गेल। ने घरक रहलौं ने घाटक।…” आब गाछ साक्षात मनुकख भ’ गेल छल।
”ई तों की कहै छें?… हम तँ एखनो एकरे पाछू सब किछु न्योछावर कयनेछी। के अछि आइ हमरा सँ बेसी कयनहार?’
”यैह!… यैह भेलौ सीमा! दोसर केओ तोरा सँ बढि़ नइँ किछु करै यए तेँ तों आगू किएक बढबें!… आ ई त्याग-न्योछावर-कथा मंचे टा सँ शोभै छै। हम-तों जतेक ने न्योछावर करबाक गपशप करै छी, से सब वास्तव मे आब कैरियर चमकाबैक
साधन भ’ गेल यए। जेँ केओ दोसर हमरा सब सँ आगू बढि़ सक्रिय नइँ अछि, ते हमरासभक ई अधकचरा प्रयास पैघ अभियान कहाबै यए। मुदा ई जानि ले जे हमरासभक ई प्रयास एक टा बिजुका सँ बेसीक ओकाति नइँ रखै अछि जकरा सँ बड़ीकाल पर ओ आँखि फोललक। सामनेक खाली टेबुल पर ओकर नजरि गेलै, तँकिछु चिड़ै-चुनमुनी डराइत होइ तँ होइ, सुग्गर-हरिन आकि नीलगाय पर कोनोओकरा टेबुलक सतह सहाराक रेगिस्तान बुझेलै। टेबुलक पार बैसल लोकक आकृति असरि नइँ पड़ै छै।’ मीत आवेश मे आबि गेल छलै।रेगिस्तानक छोर परक गाछ लगलै। ओ ओहि गाछक हरिअरी पर नजरि टिकौलक। जवाब मे एखनो ओ बहुत रास तर्क द’ अजेय रहि सकै छल। यैह तँ ओकरआँखि तृप्त भ’ गेलै। शकित छलै। मुदा एक तँ ओहि बातक कने असरि पड़ल छलै आ दोसर, पत्नीक घुरिक’ आब’ सँ पहिने ओकरा किछु आर जरूरी बात पूछबाक छलै। से शांत होइतमद्धिम स्वर मे बाजल, ”एखन से सब बतायब जरूरी नइँ छै। कहले बात कते कहबौ? …सुन, एक टा जरूरी बात!…”आ फुसफुसायल, ”ओत’ रंगशालाक
हॉल मे हमर किछु भेटबो कयलौ?”
”की?” गाछक पात-पात खिलखिला क’ हँसल।
”हमर कुञ्जी?”
”हँ! …ओ कत’ जायत? मंचक काते मे छल।”
”दे!…”
”बाकस मे बंद क’ राखि देने छियौ। पहिने ठीक तँ हो!”
”शहर मे कोनो चर्चा?”
”हँ, कल्पना मंचक छौंड़ा सब एक टा रीमिकस तैयार कयलक अछि—
कुञ्जी हेराय गेल भाँगक बाड़ी मे…” क्षणभरि बिलमि फेर नहुँए बाजल, ”आचार्यक ‘मुसल आ मुसलमान” कथाक मंच प्रस्तुति आइ मुजकफरपुर मे छिऐ जत’ सहरसा सँ जनकपुर धरिक लोक जमा भ’ रहल छै। एत’ सँ कल्पनो वला सभ गेल छै!..”
ओकरा पर तनाव जकाँ बढि़ गेलै। क्षणेभरि कोठली मे भारीपन रहलै! तखने
चाहक ट्रे लेने एक टा छौंड़ाक संग ओकर पत्नी आ दोसर मीत घुरि अयलै।
रसेरस फेर टेबुल पर रेगिस्तान पसरि गेलै आ गाछ तकर ओहि पार चलि
गेल।
ओ दोसर मीतक मदति सँ गेड़ुआक सहारें ओठङि गेल छल। पत्नीक हाथ सँ
कप पकड़लक। फेर एक टा बिस्कुट लÓ नहु-नहु कुतरैत कतहु हेरा गेल छल।
चाहक घोंट लैत ओतÓ शुरू भेल बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ, कयाह-दान आमहँगाइक संग-संग क्रिकेटक गह्रश्वप ओकरा जोडि़ नइँ पाबि रहल छलै।
साँझक अन्हार जखन बाहरक वातावरण केँ गाढ़ कर’ लागल छलै आ साँझुक
राउण्ड पर आयल डॉकटर देखिक’ जा चुकल छलै, घर सँ टिफिन बॉकसवला झोड़ानेने एक टा नवोदित कवि मित्र आबि गेल छलै। राति मे ओहि नवतुरिए केँ रुकबाक छलै।
किछु काल बाद ओकरा पत्नीक संगे ओकर दुनू मीत घर विदा भेल।नवतुरिया कवि सेहो पानिक बोतल आन’ लेल बहरायल छल कि पहिल मीत गेटक बाहर सँ घुरिक’ ओकरा लग अयलै आ एक टा कने पैघ सन कुञ्जी हाथ मे दैत कहलकै, ”ले! …एकरा बिना तोरा नीन नइँ हेतौ!” आ झट बहराय गेल।
ओ एक बेर ठीक सँ ओहि कुञ्जी केँ देखलक। बड़ पुरान होइतो सब तरहें नव छलै। पुलक सँ भरि तुरंत जेब मे राखि लेलक। पानि ल’क’ घुरल नवतुरिया प्रेम सँ भोजन लगौलकै। नवतुरियाक आवेशभोजन मे रुचि बढ़ा देलकै। तेँ खाय क’ पड़ल तँ नवतुरियाक दू गोट कवितोसुनलक। चाबसी द’ सब चिंता सँ ध्यान हटा आगू मे जे फिल्म छलै तकरसफलताक कल्पना मे झिहरि खेलाय लागल। नीन किछु जल्दिए आबि गेलै।
ओ देखलक जे ओकर किताब लोकसभ लाइन लगाक’ कीनि रहल छै।मारते रास चैनलवला सभ घेरने छै। ओ जल्दी-जल्दी किछु बाजि एक टा उज्जररंगक कार मे बैसि जाइ अछि। कार अज्ञात दिशा मे जा रहल छलै कि नीन टूटि गेलै।
ओ फेर आँखि मूनि जल्दी सँ जल्दी ओहि सपना मे जयबाक चेष्टा कर’ लागल।
एहि बेर ओ देखलक जे ओकरा ढाइ लाखक कोनो पुरस्कार भटलै। ओकरासकमान मे पुरस्कार प्रदाता नौकरशाह सभक दिस सँ रंगमंडलक समस्त सदस्यक संगहि वरिष्ठ पत्रकार आ साहित्यकार लोकनिक बीच भव्य पार्टी चलि रहल छै।…अचानक ओहि बीच ठाढ़ एक टा अद्र्धविक्षिह्रश्वत सन युवक चिचिया लगै छै, ”अहाँ सभ अवसरवादी छी! पूजीपतिक दलाल छी!…” कि तमसाक’ ओत’ जमा सभ केओ अपना-अपना गिलासक दारू ओहि युवक पर फेकि दैत छै।… आ ततेक दारू ओकरा पर खसै छै जे ओ युवक बगलक नाली मे बहि जाइ छै!…
अचानक फेर ओकर नीन टूटलै। एहि बेर ओकर छाती जोर-जोर सँ धड़कि
रहल छलै।कनेकाल मे ओकर मोन स्थिर भेलै, तँ ओ नवतुरिया कवि दिस ताकलक। ओओकरा बेडक दहिना कातक सोफा पर नीन छलै।
ओकर बामा हाथ अनायास पेंटक जेब मे गेलै आ अगिले पल कुञ्जी ओकरा आँगुरक बीच छलै। बड़ीकाल धरि ओ ओहि कुञ्जी केँ देखैत रहल। कुञ्जीदेखैत-देखैत ओकरा अपन वियारंगक ओ अन्हार मोन पडि़ अयलै जे ओकर कुञ्जी तँ गिडऩहि छलै, ओकरा एहि बेड धरि पहुँचा देलकै। वियारं ओहि विद्यापति यात्रीरंगशालाक संक्षिह्रश्वत नाम छलै जकर ओ अध्यक्ष आ निर्देशक छल। जतÓ पछिला दससाल मे सभ सँ बेसी नाटक ओकरे निर्देशन मे भेल छलै। जतÓक ओ सभ सँ सकमानित आ सर्वेसर्वा छल। जत’ पहिल मंजिल पर ओकरा एक टा पैघ सन कक्ष भेटल छलै। ओहि कक्ष सँ नइँ मात्र वियारंक सभ टा गतिविधि संचालित करैत छलओ, ओकर समस्त हित-मीतक चौपाल वैह छलै। मुदा ओहि रातुक अन्हार!…
…असल मे ओइ दिन बेरू पहर अशोका मे बालीबुडक एक टा पैघ प्रोड्ïयूशरसंग ओकर मीटिंग सफल भेल छलै। भूमि समस्या आ सशस्त्र आन्दोलन सन विषय
पर ओ एक टा मसालेदार फिल्मक लेल स्क्रीह्रिश्वटंग आ सह-निर्देशनक एग्रीमेंट साइन कयने रहय। तकरा बाद शैकपेनक दौर जे शुरू भेलै से प्रोड्ïयूशरक उड़ान-समयक कारणें सँझुका आठे बजे धरि चललै। ओतÓ सँ ओ बाहर भेल तँ ऑटो मे बैसैतअपन सभ सँ करीबी कॉमरेड दासक मोबाइल पर पहिल सूचना देलक। दास नगरक सभ सँ बेसी प्रसार संकयावला दैनिक समाचार पत्रक कयूरोचीफ रहय। ओ तत्कालओकरा अपन दकतर बजा लेलकै। दासक केबीन मे ओकरा पहुँचिते तय भेलै जे एहि उपलकिध केँ खास दोस्तसभक बीच सेलिब्रेट कयल जाय। से ओतहि सँ फोन कÓ चारि-पाँच गोट ‘हमह्रश्वयालाÓसाहित्यकार-पत्रकार-रंगकर्मी केँ साढ़े दस बजे धरि वियारं पहुँचबाक सूचना देल गेलै। फेर ओ दासेक खटारा एलएमएल वेस्पा पर पाछाँ बैसि विदा भेल छल। रस्ता मे महात्मा गांधी चौक पर चारि-चारि ह्रश्वलेट चिकन आ पनीर फ्राइ पैक करबौलक। काजू, मूँगफली आ दालमोटक संगे सलादक व्यवस्था कÓ चारि डिकबासिगरेट सहित दू टा पैघ-पैघ पॉलिथीन पैकेट मे लेलक। दासक डिककीक झोड़ा मेरमक बड़का-बड़का बोतल रखैत आधा सँ कमे बचल अद्धा टकरेलै। ओकराबगलक जूस दोकानक पाछाँ दुनू मीलि खाली करैत अमेरिकन पॉलिसीक चर्चा करÓलागल छल। अपन-अपन सिगरेट जराय जखन ओतÓ सँ विदा भेल, तँ साहित्यअकादेमी आ मनुवादक व्याकया शुरू भेल छलै।
कनेक तेज सन चलैत बसात जाड़क प्रभाव बढ़ाबÓ लागल छलै। मुदा ओ दुनूमौसम केँ ठेङा देखबैत वियारं दिस जाइत अपना मे मस्त छल। तेहन मस्त जे साँझेसँ शुरू झिस्सी केँ ‘इन्जॉयÓ कÓ रहल छल।
तखन ओ सभ वियारं सँ किछुए दूर नेहरू स्टेडियम वला मोड़ पर छल कि दूटा घटना एक संग घटलै। एक, बुनिआयब तेज हेबाक संगे बसात बिहाडि़ जकाँ रूपलÓ लेलकै आ दोसर, दासक जेब मे राखल मोबाइल अंग्रेजी धुन पर चिचियाबÓलगलै। कात मे स्कूटर रोकि दास एको मिनट सँ कमे गह्रश्वप कयलक आ पाछाँ घुमिबाजल, ”रौ, समान सभ लÓकÓ तों जो वियारं। एखन साढ़े नौ भÓ रहल छौ। हम एक घंटा मे अयबौ। संपादकक आदेश छै, की कÓ सकै छी?… चल गेटक बाहरछोडि़ दै छियौ।”
खराब मौसमक बादो गेट सँ दूरे पॉलिथीन पैकेट आ झोड़ा थमा दास स्कूटरमोडि़ फुर्र भÓ गेलै। ओ वियारं बिल्डिंग दिस तकलकै। सभ किछु अन्हार मे डूबल
छलै। गेटक दुनू कात स्थित विद्यापति आ यात्री बाबाक प्रतिमा धरि देखा नइँ पडि़ रहल छलै, तँ कालिदास-शैकसपीयर सन-सन मारते रास नाटककारक देबाल मेजड़ल छोट-छोट पाषाण मूर्ति कतÓ लखा दैतै। हवा प्रचंड भÓ गेल रहै आ बुन्नीआर तेज। ओ धतपत आगू बढ़ल। ग्रील-गेट फोलि अन्हार पैसेजक मुँहथरि परठमकल। चिकरिकÓ रमुआ चौकीदार केँ दू-तीन बेर शोर पाड़लक। मुदा कोनो
उतारा नइँ भेटलै। एहन मौसम मे राति-बिराति ककरो नइँ अयबाक अनुमान कÓ ओसरबा साइत घर पड़ा गेल रहय! बिजली नइँ रहै आकि स्वीचे लग सँ काटि देनेछलै ढोहरीक सार, से नइँ कहि। ओकरा अपना हाथक पॉलिथीन पैकेट धरि नइँ सुझि रहल छलै। आखिर कहुनाकÓ सीढ़ी तकबाक साहस कÓ ओ एक टा पयर आगू बढ़ौनहि रहय कि गेटक सटले कतेको युग सँ ठाढ़ बडग़ाछक एक टा पैघ सनडारि टूटिकÓ हड़हड़ाइत गेट पर खसलै। ओकरा लगलै, पृथ्वी दलमलित भÓ गेलैआकि ओहि गाछ संग पूरा वियारं बिल्डिंग भरभराकÓ खसि पड़लै! कतÓ गेलै पॉलिथीन पैकेट सभ, कतÓ खसलै झोड़ा आ कोकहर अपने ढनमनायल; तकर कोनो ठेकान नइँ रहलै!…बड़ीकाल बाद होश अयलै, तँ ओ कराहि जकाँ रहल रहय। ओकरा पयरलग भीजल सन किछु डारि-पात बुझेलै आ माथ लग सर्द देबाल। देबाल टोबÓक क्रम मे ओकर हाथ अपना माथ पर गेलै। ओतÓ लसलस सन किछु सटल जकाँ बुझेलै। ओ ओकरा रगडि़कÓ पोछबाक प्रयास कयलक, तँ भीतर सँ पातर सन दर्दहुल्की मारलकै।
तखन ओकरा ई बुझबा मे भाँगठ नइँ रहलै जे ओकर कपार फुटि गेलै आताहि पर शोणितक थकका जमि गेल छै। मुदा तैयो ओकरा ई भान नइँ भÓ रहल रहैजेे ओ कतÓ, किऐ आ कोन परिस्थिति मे पड़ल छलै।…
किछु क्षण आरो बीतलै तखन ओकरा नीचाँ सीमेंटक सतहक भान भेलै। कि पयर मोडि़ हड़बड़ाकÓ बैसल आ घबड़ाकÓ चारूकात हथोडिय़ा मारÓ लागल।अचानके ओकरा हाथ मे काँचक एक टा चोखगर टुकड़ी गड़लै आ दर्द सँ सिसिया उठल। मुदा क्षणे बाद ओ फेर हथोडिय़ा दÓ रहल छल। हथोडिय़ा मारैत ओबदहवाश छल। कि एक ठाम फर्श पर किछु तेजगंधवला तरल पदार्थ बुझेलै। ओहि गंध केँ परखÓ मे थोड़ समय लगलै, मुदा जहिना ओकरा गंधक पहिचान भेलै कि सभ किछु स्मरण भÓ अयलै।आब ओ जल्दी-सँ-जल्दी सीढ़ी ताकबा लेल व्यग्र छल। ओकरा कोनोहालति मे शीघ्र पहिल मंजिल पर स्थित अपन कक्ष मे पहुँचबाक छलै। ओहि कक्षमे जतÓ इजोतक कैक टा वैकल्पिक साधन रखने छल ओ। ओकर कुञ्जी ओकराजेब मे छलै। बामा जेब मे हाथ दÓ कुञ्जी छूबिकÓ ओ आश्वस्त भेल। कि ओकरा कोना क्षण अपन संगी सभक आबि जयबाक आशंका भेलै। अन्हार मे घड़ीअकाजक छलै, से झट ओ दहिना जेब मे राखल मोबाइल निकालÓ चाहलक जाहिसँ अन्हारो मे समयक ज्ञानक संग क्षीण-सन इजोत सेहो भेटि सकै छलै। मुदा जेबसँ बहरेलै दू-तीन भाग मे अलग-अलग भेल मोबाइलक पार्ट-पुर्जा! आब ओकरघबड़ाहटि आरो बढि़ गेल छलै। अन्हारक सोन्हि मे ओ तेना भुतिया गेल जे दिशाक कोनो ज्ञाने ने रहि गेल छलै। आरो किछु काल धरि बौअयलाक बादो जखन थाह नइँ लगलै, तँ अन्हारक कोनो अज्ञात स्थल पर ओ सुस्ताबÓ लागल छल। सुस्ताइत-सुस्ताइत ओकरा भीतरहँसी जकाँ किछु फुटलै। ओकरा मोन पड़लै जे एतबे टा जिनगी मे ओ कतेक बिहडि़धाँगि आयल छल। लगभग एक दशक तँ अण्डरग्राउण्डे रहल छल। केहन-केहन कठिन ऑपरेशन सफल कयने छल। कतेक मुठभेड़, कतेक काउन्टर मे बमगोलीक बीच सँ निकलि आयल छल ओ!… ओकर ई इतिहास आइयो कतेको युवा केँ प्रेरणा दैत छलै।अपन स्वर्णिम अतीतक स्मरण सँ ओकरा भीतर साहसक संचार भेलै।उठिकÓ सावधान मुद्रा मे ठाढ़ भेल आ दृढ़ निश्चय कÓ एक सीध मे थाहि-थाहिकÓबढ़Ó लागल। किछुए क्षण बाद सहसा ओकरा ठेहुन सँ किछु टकरेलै। हाथ सँ छूबिकÓ ओ परखलक—आगू मे कुर्सी छलै। फेर हाथ बढ़ाय कÓ ओ एकहर-ओकहर टटोललक—कुर्सीक पतियानी लागल छलै। तत्काल ओकरा बुझबा मे आबि गेल छलै जे ओ फुजले रहि गेल दुआरि सँ मेन हॉल मे आबि गेल छल। तखन कुर्सीदर-कुर्सी पकड़ैत ओ बीचक रस्ता धÓकÓ सभ सँ आगूक कुर्सी धरि पहुँचि गेल।एतÓ पहुँचि ओकरा सब किछु सुरक्षित जकाँ बुझेलै। से ओ ततेक आश्वस्त भÓ गेलजे आराम सँ ओहि कुर्सी पर बैसि पयर पसारि देलक।आब ओकरा मेहमान मित्र सभ सँ पकड़ेबाक कोनो चिंता नइँ रहलै। तेँ धीरे धीरे ओ ओकरा सभ केँ बिसरय लागल छल। कि तखने सेलिब्रेट करबाक अवसरक महकाा मोन पड़लै। मोन मे कनेक कचोट भेलै। मुदा एते पैघ नाट्ïय-अनुभव ओकरासभ स्थिति मे तालमेल बैसायब सिखा देने छलै।
आब ओ सहज भÓ जयबाक स्थिति मे आबि रहल छल कि ठीक तखने मंचक बीचोबीच खसैत प्रकाशक एक फाँक मे ओकर प्रतिरूप ठाढ़ देखा पड़लै।क्षणभरि मुरुत जकाँ ठाढ़ रहलाक बाद प्रतिरूप अचानक बाजल, ”रौ मीत, किऐदु:खी छें?ÓÓ
”अयँ!… तों के?” ओ अकचकाइत पूछलकै।
”नइँ चिन्हले हमरा?… कोनो बात ने! चिंता नइँ करय, दुनिया एहिना चलै छै!” प्रतिरूप मुस्किआइत कहलकै।
”मुदा छें के तों?” ओ फटकारैत पूछलकै आ उठिकÓ ठाढ़ भÓ गेल।
”हमरा चिन्हि कÓ की करबें? दुनिया तोरा चिन्है छौ! दोसर खेमाक लोक के गरियाबैत रह! ओ सभ पतीत छै, कुपमंडुप छै, समाज केँ पाछाँ लÓ जायवला छै।ओकरा ई सभ कहला मात्र सँ समाज बदलि जयतै आ तों महान भÓ जयबै! फेरअंग्रेजी बोहु-बेटी घर अयतौ। स्टेटस बदलि जयतौ! बेचारी बहिन हिंदी बड़अलच्छी, बाड़हनि झाँट!…ÓÓ प्रतिरूपक स्वर संयत छलै।
”तों हमरा पर व्यंग्य करै छें?” ओ फेर बिगड़लै।
”व्यंग्य?… एहि सभ पर तँ तोरा महारत छौ। बस लिखैक फुर्सति नइँ छौ। नेतँ आलोचक जीक गुरुद्वारा मे माथ टेकिते कोर्स मे लागि गेल रहितौ। आचार्यक प्रसाद पबिते साहित्य अकादेमी भेटि गेल रहितौ!”
”हम कोर्सक भूखल नइँ छी। आचार्य आ आलोचक जी केँ ठिठुआ!…
साहित्य अकादेमी चाहबे ने करी हमरा! हम ओहि पर थुको फेकÓ नइँ जायब। हमतँ व्यापक सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षी छी। समातामूलक वैज्ञानिक सोचक आग्रही। सदिखन जनते टा हमरा नजरि मे रहै अछि।” ओ आक्रोश सँ भरल स्वर मे गरजलक।
प्रतिरूप थपड़ी पाडय़ लगलै, ”वाह! वाह! कतेक कर्णप्रिय लगैत अछि ईसब! अद्ïभूत!… जँ सरिपहुँ एना होइतय!…सय मे निन्यानबे टा मैथिली भकत दुमुँहेबहराइतय?…”
ओ छड़पि कÓ मंच पर चढि़ गेल छल, ”तोरा बुझल नइँ छौ, मंच परडायरेकटरक इच्छाक विरुद्ध केओ एको क्षण ने रहि सकै अछि! जल्दी भाग! हम
की कÓ सकै छी से बुझले ने छौ तोरा!”
”डायरेकटर छें तों?… धुर्र! अपन कोठलीक ताला तँ खोलिए ने सकै छें! जोतँ अपन कोठली?…” प्रतिरूप ओहिना ठाढ़ रहलै।
ओ तामसे कँपैत कुञ्जी निकालि लेलक, ”देख, देख कुञ्जी हमरा हाथ मेअछि। देख!…” कि तखने ओरा हाथ सँ छिटकि क’ दर्शकदीर्घा दिस गेल कुञ्जीअन्हारक समुद्र मे डूबि गेलै।
अचानक प्रतिरूप जोर-जोर सँ हँसैत ठहाका लगब’ लागल।
अपमान सँ माहुर होइत ओ प्रतिरूप केँ मारै लेल दौड़ल। प्रतिरूप अलोपितभÓ गेलै। मुदा अन्हार मंच पर ओ बताह जकाँ दौडि़ रहल छलै। कि हठात चारि फुटनीचाँ मंचक आगू मे ओ अरर्रा कÓ खसल—धड़ाम! …  
अस्पतालक बेड पर पड़ल-पड़ल ओकरा लगलै, भीतर सँ ओ खुकख भÓ गेल,
एकदम कोढि़ला!…
देह पसेना-पसेना छलै! कंठ सुखाय लागल छलै। बामा हाथक कुञ्जी दहिना जेब मे नुकबैत बड़ प्रयास कÓ ओ बगलक सोफा पर सूतल नवतरिया कवि केँ आवाज देलक।
अकचकाइत जागल ओ कवि ओकरा संकेत पर गिलास मे पानि भरि आनलक।ओकरे सहारा पाबि माथ अलगा कÓ ओ दू घूट पानि पीबि असोथकित जकाँ पडिऱहल।
नवतुरिया दया भरल नजरिएँ एकटक ओकरा देखैत रहलै। सामनेक खिड़कीक
साफ होइत काँच भोरक आभास दÓ रहल छलै।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल
बात बहुत पहिनेक थिक , हम बच्चे छलहु“ । बाल्यकालक लगभग बातसभ लोक प्रायः बिसरिये जाइत अछि । मुदा स्मृतिमे किछु एकदम स्पष्ट बैसल रहि जाइत छैक । जेना कि कोनो दूर ठाढ मनुख स्पष्ट नहि देखयलोपर ओकर कद–काठी, लत्ता–कपडा, भाव–भङ्गिमा आ’ जाहि घर–बारीमे ठाढ भद्र ओ अपन जन–बनिहारके“ देखि रहल अछि तैसभके“ मिलाकय हमरासभ ओहि ठाढ≥ व्यत्तिmके“ ठेकानि लैत छिऐक जे ओ तद्र परमपरिचित फलाना छथि । तहिना किछु स्मृति धोंकाएलसन देखाइत अछि जकरा ठेकानयलेल कल्पनाक मदति लेबय पड≥≥ैत छैक ।
स्मृतिक आधारपर कोनो पहिलुका घटनाके“ त्रmमबद्ध तथा अर्थयुत्तm बनाबयहेतु कल्पनाक सहयोग आवश्यक भद्र जाइत छैक से बुझना जाइछ । उदाहरणार्थ, जेना पुरातववेत्तालोकनि कोनो खडहरमे उपलब्घ र्इंट, पाथर, भूमिक बनौट, किछु आकारमय काठक रचनासभ आ’ गृहनिर्माणमे प्रयुत्त आवश्यक अन्य सामग्रीसभक आधारपर बहुत पहिने ठाढ कोनो राजप्रासादक वर्णन कद्र दैत छथि ।
लोकसभ पूछत — ई कथा ठीके साचे छैक ? … अथवा एकगोट गल्प मात्रे अछि ई ? एहि सन्दर्भे हमरा एतबा कहबाक अछि जे ई ४० बर्ष पहिने हमर बाल्यकालक भावनामय दुनिया“मे घटल एकगोट घटना थिक आ’ एतेक दिनक बाद अपन स्मृतिक दूरबीनस“ आई हमरा ई जेहन देखाइत अछि तथा वत्र्तमानस“ संयोजनक पश्चात् जेहन एकर आकार बनि कद्र भद्र गेल छैक, हम तकरेटा ओहिना ओही रुपमे वर्णन कद्र रहल छी ।
ह“, त कहि रहल छलहु“, बात बहुत पुरान थिक । हमरासभक गुमस्ता आ’ घरक परम हितैषी मिसरजीके“ अपन कोनो काजस“ दडिभङ्गा जएबाक तैयारी करैत देखि हमहु“ जीद्द करय लगलियन्हि — मिसरजी, हमहु“ जायब †
अहा“ कतय जाएब, बौआ ? हमरा एकगोट काज अछि । काल्हिये तद्र हम दौडले फिरि जाएब † बेकारे हरान होमए कथीले जाएब ? ”
हम अपन जीद्द नहि छोडलहु“, कहलियन्हि — हम दडिभङ्गा कहियो नहि गेल छी । ”
ओहिठाम देखय लायकक किछुओ छैक, बौआ ? ”
कहादोन दडिभङ्गा महाराजक दरबार छन्हि, हथिसार छन्हि, बडका अस्तबल छन्हि, कचहरी छन्हि आ’ बडका–बडका घरसभ छैक … नहि मिसरजी, हमहु“ जाएब । ”
हमर जीद्द जीतल । हमहु“ एकगोट छोटका मोटरी लद्र कद्र मिसरजीक संगे दडिभङ्गा अयलहु“ । तहियाक दडिभङ्गा स्टेशन बुझू तद्र कङ्काले जका“ छल । निच्चामे पातर अलकतरा बिछायल बडका प्लेटफारम आ’ भितरस“ सटल एकगोट नाम टेबुलपर बाहरक कोलाहलस“ एकदम निद्र्वन्द्व भद्र मुडी गोंतने स्टुल–स्टुलपर बैसि अपन काज करैत स्टेशनक कर्मचारीसभ । दोसरकात जिल्लाक बडका–बडका पदाधिकारीसभ ( जे तखने स्टेशनपर आयल रहैत छलाह । ) विश्राम करैत छलाह जतए कोरमे लाल मगजी लागल बेंतक गोनरिसनक बडका पंखा लटकल रहैत छल जकरा एकगोट करिकबा कुल्ली डोरी नेने बाहर भीतमे अडेंस लगोने औंघाइत घिचैत आ’ छोडैत रहैत छलैक । जेना–जेना डोरी तनाइत छलैक तेना–तेना भीतर कोठरीमे पंखाक डण्टी मचमचाइत हिलैत छलैक । भीतरक लोहाक घिरनी सेहो ओही सुरमे आब खसत तब खसत होइत खिर्र करैत नचैत रहैत छलैक … एकटा प्लेटफारमस“ दोसरपर जाएबला बडका पुल तद्र निःसन्देह कङ्काले सन छल, गणितक गुणन चिन्हक आकारमे बनाओल ओकर घेरा लाल रंगमे रङ्गल रहैत छलैक । … ओना भरिदिन कोनो दैत्य जका“ ठाढ आ’ स्टेशनक सम्पूर्ण वातावरणक घोरल अस्तित्वके“ छपने ओ पुल रेल अबिते लोकसभक अकारणक व्यग्रतास“ थरथराय लगैत छल । … ओहिना स्टेशनोपर … जखन गाडी अबैत छलैक तखन अत्यन्त चहलपहल, दौडधूप, भागमभाग, असंख्य कण्ठक तुमुल हाहाकार आ’ ताहिपर पान–सिगरेट–बीडी बेचयबलासभक कण्ठफोरबा चिकडनाईक साम्राज्य भद्र जाइत छलैक । गाडी स्टेशनपर पहुचिते कतय ने कतयस बेहिसाब असंख्य कुल्लीसभ बरबराकय पूरा प्लेटफार्मपर आ’ डिब्बा–डिब्बामे भरि जाइत छल तथा पसिंजरक मोटासभपर हाथ धरैत बुझू ने कब्जे करैत कहैत छल — एक्के पैसामे बाहर … पहुचा देब । ”
दडिभङ्गा स्टेशनपर पहुचयस“ बहुत पहिनहिं पसिंजरसभ अपन–अपन मोटरी–चोटरी मिलाबय लागल छल । डिब्बामे हलचल मचि गेल छलैक । … मिसरजी सेहो उठिकय अपन मोटाके देखलन्हि । सुरक्षित छलन्हि । बहुतो पसिंजर अपन–अपन समान गनय लागल — जम्मा कएगोट छल, अय … ? एहिठाम त सातेटा देखैत छी । … हू“ भेटल, एकटा मोटरी ओम्हर छल ।” बूढपुरानसभ धियापुताके“ सम्झाबय लगलखिन्ह — हे रौ, एम्हर–ओम्हर नहि करिहे हेरा जएबे । … दडिभङ्गामे बड्ड भीडभाड रहैत छैक । हमरासभके“ पकडने रहिहे … नहि छोडिहे ” घोघस झापि–तोपिकय अपनाके“ समेटने महिलासभ असंयत भद्र हडबडायल दृष्टिये“ चारुकात देखय लागलि छलि । … हम तद्र पहिनहिस“ हडबडायले छलहु“, डिब्बामे चञ्चलता अबिते चटपट अपन मोटरीसहित उठि ठाढ भ तयार भ गेलहु“ । मिसरजी बजलाह — बौआ, कथिलए हडबडा गेलहु“ ? … एखन बड्ड देरी छैक । भल त राजदरबार देखायल अछि । … हे वा देखियौक † ”
ओ दहिना खिडकीलग आबिकय दूर देखाइत ललका दरबारदिसि आङगुर देखोलथि । हमहु व्यग्रतास गर्दनि उचका–उचकाकय दरबारदिसि ताकय लगलहु“ । रेल बेगस“ दौडि रहल छलैक सिसो, बास आ’ आमक फुलबारी दरबारके छेकि देलकैक । … एक–दूटा कद्र छोटका–छोटका शहरिया सनक घरसभ देखाय लागल — ईंटाक दिवाल मुदा उपर खर वा खपडाक एकतल्ला घरसभ । एकचारी खसाकय बनाओल काम चलाउ दलानहेतु बरमदा निकलल घरसभ सेहो देखाय लागल । मिसरजी हमरा सम्झाबय लगलथि — बुझलिऐक, ओ ललका नौलक्खा दरबार थिकैक । … नौ लाख रुपैया लागल छैक बनाबयमे”
गोलगला गञ्जी पहिरने एखनतक एकदम निश्चल भ क एकगोटे श्लोक पाठ करैत बैसल छलाह । जेना हुनका असह्य भ गेल होइन्हि ओ चट् प्रतिकार करैत कहलखिन्ह — के कहलक जे ई नौलक्खा दरबार थिकैक ? … ओ दरबार त राजनगरमे छैक । एकरा बनाबयमे डेढ करोड रुपैया लागल अछि, डेढ करोड ”
अपन बात समाप्त करैत ओ एकबेर डिब्बामे चारुकात सगर्व दृष्टि घुमोलथि, जेना ओ दरबार हुनक अपन निजी निवास स्थान होन्हि आ’ लागत कम आ“कि मिसरजी हुनक हैसियतक अपमान कएने होइथिन्ह । यात्रीसभक ध्यान अपनादिसि सहजे आकृष्ट पाबि ओ महानुभाव अत्यन्त कुशलतापूर्वक खैनीक थूक खिडकी दने पिच्च द थूकैत आगा“ बढलाह — महाराजाधिराज बड्ड शौखस एहि दरबारक निर्माण करोलथि । हिन्दुस्तानमे ओहन कारीगरसभ नहि छलैक, तैं इटलीस कारीगरसभ मगाओल गेल । भीतरमे सभतरि ललका संगमरमर छाडल अछि, … आ’ सेहो इटलीयेस मगाकय … बडका–बडका ऐना छैक, आदमीस दोब्बर कदक ऐनासभ … शीशाक सभ समान बेल्जियमस“, पर्दा आ’ टेबुल–कुर्सी तथा पलङ्गपरक कपडा, ओछाओन आ’ चद्दरिसभ प्रान्सिसी सिल्क, मखमल आ’ साटिनक थिकैक । काठक सम्पूर्ण समान फर्निचरसभ इङ्गल्याण्डस“ आयल छैक, बुझलिऐक ? … डेढकरोड पडल छैक, डेढ करोड ”
आखि फाडने सभ हुनकर गप्प सुनि रहल छलन्हि कि गाडीक गति किछु मध्यम भ गेलैक । यात्रीसभ फेर हडबडकय अपन मोटरी–चोटरीसभ मिलाबय लागल । हम फेरु ठाढ भ गेलहु“ । मिसरजी हमरा अन्तिम चेतावनी देलन्हि — हमरा किन्नहु नहि छोडब । … बड्ड हुलि रहैत छैक स्टेशनपर ”
साचे स्टेशनपर बड्ड धक्कमधुक्का रहैक । डिब्बामे अकस्मात् कुल्लीसभक प्रवेश हुलिके आओर कसमकस बनाय देलकैक । कोलाहल एहन जेना कतहु अकस्मात् अगिलग्गी भ गेल होइक । एकटा छोटका कुल्ली हमरालग आयल आ’ कहलक — ई मोटा हम बाहर पहुचा देब । … अधे पैसामे ”
बड्ड कलपि क ओ हमरा कहने छल । ओकरा देहपर एकगोट चिथडीयेटा रहैक । हम मिसरजीदिसि तकलहु । ओ बडी जोडस चिकरलखिन्ह — भाग … π ”
सभस कठीन छल प्लेटफारमस बाहर निकलनाई । एकटा छोटका फाटक, सेहो अधे खोलल । बीच्चेमे … पूर्ण अधिकारयुत्त भंङ्गमा लय एकगोट कर्मचारी ठाढ छल । ओकर ट्वीलक उजरा पेन्ट आ’ कोट रौदमे खूब चमकि रहल छलैक जेना प्लास्टर लगाकय चून पोतल होइक । कपडास“ बेशी ओकर कारीझाम मुहमे लागल तेल आ’ कपारपर बाहर निकलल माथक नाइट कैपक लोलपरक पेटेन्ट चमडा रौदमे खूब चमकि रहल छलैक । एकबेर त दहिना कातस निकलल हुलि हमरा धकेलैत मिसरजीक हात छोडा देलक । हम खूब जोडस““ मिसरजीक माथदिसि तकैत चिचिअयलहु““ — मिसरजी… .. ”
फाटकपर ठाढ टिकटचेकर एकबेर पूर्ण अधिकारयुत्त गम्भीर वाणीमे सभके डटलक — एक–एक क क आउ … ठेलमठेल नहि करु ”
कहुना क मिसरजीके“ पकडयमे सफल भ गेल छलहु“ मुदा एकबेर फेरो बडी जोरस धक्कमधुक्का आ’ ठेलमठेल भेलैक । हमरा फेरो धकिया क अलग ठेल देलक । अपन जान आ’ काख तरक मोटरी कहुना क बचबैत हम फाटकस बाहर निकललहु“ । मिसरजी कहलन्हि — आब मोदियाइन ओतय चलू । … ओहिठाम स्नान–ध्यान करब, … खायब–पिअब आ’ … फेर हम अहाके शहर देखाबय ल जायब । ”
स्टेशनस बाहर ओतेक भीडभाड आ’ ठेलमठेल त नहि मुदा नीक चहल–पहल, हल्ला–गुल्ला आ’ दौड–धूप अवश्ये रहैक । स्टेशनक पछबरिया इनारपर चारुकात सयो आदमी रहल हएतैक — केओ पानि घिचैत त केओ भरैत, … केओ नहाइत त केओ दातके दतमनिस रगडैत । … बहुतो ओहिना बहुत व्यस्त जका घोलघालमे लागल चिचिया रहल छल । इनारेलगक एकगोट हलुवाईक दोकानपर पुरी छना रहल छलैक । एकटा छौंडा हात घुमाघुमाकय बीच–बीचमे गहिंकीसभके सोर क रहल छलैक — आउ … आउ शुद्ध घीकेर पुरी खाउ पंेडा, लड्डू … ” सटले हलुवाई स्टुलपर बैसल कराहीमे खौलैत घीस“ फटाफट खूब फूलल गमगम करैत पुरीसभ छानि रहल छल आ’ उपर काठक चौकीपर बैसलि प्रायः ओकर कनिया“ पुरी तौलि रहलि छलैकि । मिसरजी शायद हमर लोभायल भावके“ तारि गेल छलाह । ओ हमरा कहलन्हि — मोदियाइन ओतय खूब स्वादिष्ट भोजनसभ भेटैत छैक । … दामो कम ”
(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी

एक

”रे हे अरजुनमा! नकुलवा कँ संग नेने ने जाहिन्ह! देखै नहि छिहिन्ह जे ओकरा दाढ़ी-मांछ पनैप गेलैहें। ओ कहिया बालिग हेतै?“
अर्जुन घुमि कँ पाछां तकलक। ओकर बाप कमचीबला मचान पर बैसल बड़बड़ा रहल छैक। बाप यानी कीर्तमुख।
कीर्तमुख कँ सात वर्षक भीतर पांचटा बेटा जनम लेलकै। ताहि कारणे ओकर जिगरी यार कन्टीर विचार देलकै जे पांचो पाण्डव बला नाम बेटा सबहक राखि दहक। सुभिता हेतौ।
पहिल बेटा युधिष्ठिर छलै। युधिष्ठिर मुसरी घराड़ी पर अड्डा बनौलक आ सब बंदोबस्त क’ ठीक-ठाक क’ लेलक। उड़ैत चिड़ैया पकड़ि क’ बियाहो क’ लेलक। आब मुसरी घराड़ी सँ जीरो माइल तक ओकर एकछत्रा राज छैक।
दोसर बेटा भीमा। निसानक पक्का। एक माणिकचंद सुपारी राखि दियौ। पाइन्ट टू टू पिस्तौल होइ वा एके सैंतालिस राइफल। मजाल की जे निसान चुकि जाए। पछिला इलेक्शन मे कानू सिंह, जे स्वयं पैघ अनुभवी डकैत रहि चुकल छल, ओकर जौहर कँ चिन्हलक। कहलकै”मेरा बडीगार्ड बन जाओ।“ भीमा आब सरकारी नौकरी मे सरकारी आवास मे रहैत अछि। कानू सिंहक मनीस्टर बनलाक बाद भीमाक रुतबा बहुत बढ़ि गेलैक अछि। ओ मालदह जिलाक रतुआ धोबिके बेटी रधिया पर आँखि गरौने अछि। एक ने एक दिन बियाह हेबे करतैक। भीमाक गलमोच्छा मे घी चुपड़ल रहैत छैक आओर देहाती लोक ओकरा देखिते डरि क’ पाथर बनि जाइत छै।
तेसर बेटा अर्जुन। देखब त’ मोन होयत कि देखिते रही। परम सुन्दर कायाक मालिक। मजबूत कद-काठी, लम्बा बरछीसन जुल्फी आओर गरदनि मे झुलैत चानीक तमगा। अर्जुन हाइवे पर डकैतीक काज करै अछि। एखन तक कोनो बड़का माल हाथ नहि लगलै अछि। मुदा, आस पर दुनिया जीवै अछि।
चारिम बेटा नकुल। कद-काठी मे ठमकल। थोड़ेक तोतराइत सेहो अछि।
बाप के कहलकै”चिन्ता नहि करह। तोहर पाँचो बेटा मे हमही नामबला हेब।“ हमर काटल अहुरिया काटि क’ प्राण त्याग करत।
पाँचम बेटा सहदेवा। सबसँ बेसी सुन्नर। पान सन कोमल। कीर्तमुखक आँखि मे सिनेहक नोर। हे परमेश्वर! एकर जीवन कोना कटतैक। जन्मेकाल ओकर माय शनिचरी मरि गेलैक। नीके भेलै। जाहि स्पीड सँ ओ बेटा सबहक जन्म द’ रहल छल से अधिक दिन जिबैत रहैत त’ कीर्तमुख कँ बेटा सबहक नाम पाण्डव बला छोड़ि धृतराष्ट्र बला राख’ पड़ितैक।
आब शनिचरीक खिस्सा सुनू। बेतिया मे एकटा अंग्रेज हाकिम छल डेम्सफोर्ड। ओकर एक खबासिन छलै रूपकुम्मरि। साहेबक मोन, अंग्रेजक राज, शराबीक नजरि आ ताहू पर रूपकुम्मरिक लहकैत जवानी। रूपकुम्मरि कँ एकटा बेटी जन्म लेलकै। चमड़ी अंग्रेज सन, रूप हिन्दुस्तानी। आजादीक समय जखन डेम्सफोर्ड इंग्लैंड वापस जाय लागल त’ रूपकुम्मरि कँ बीच बाजार मे एकटा घर कीनि देलकै। ऊपर सँ चानीवला एक सौ रुपया द’ क’ ओ अपन पाप कँ हल्लुक केलक।
रूपकुम्मरिक बेटी कँ बड़का-बड़का आँखि। ओकर नाम की हौउक? डेम्सफोर्ड गेलाक बाद बहुतो वीर रूपकुम्मरिक दलान मे कुश्ती केलक। ओही मे सँ कियो ओकर बेटीक नाम राखि देलकैसुनयना।
सुनयना कनेक चेस्टगर भेल, दोकान-दौरीक काज करए लागलि, तखनहि ओकरा पर विधाताक लाठी बजैर गेलैक। रूपकुम्मरि डेम्सफोर्डक वियोग बहुत दिन तक नहि सहि सकलि। चटपट विदा भ’ गेलि।
आब की होअए? मुदा सुनयनाक गात मे अंग्रेजक सोनीत। ओ कनेको ने घबड़ायल, ने ओझड़ायल। ओ बीच बाजारक घर बेचि, बेतिया शहरक एक कात मे, एक छोट सन घर कीनि लेलक। संगहि सतुआक दोकान सेहो खोलि लेलक। आब सतुआक सोहनगर गमक आ सुनयनाक रूपक पसाही, दोकान नीक जकाँ चलय लगलै। समय बितैत गेलै। सुनयना कँ एकटा बेटी भेलै। बेटी कोना भेलै से ककरो नहि बुझल छैक आओर अहूँ के बुझक काज की? बेटीक जन्म शनि दिन भेलैक आ ओकर नाम पड़लै शनिचरी। ओहि काल मे दिन-दुनिया कंग्रेसियाक पाँजर मे दबकल छल। सुस्लीस्ट पार्टीबला कखनहँू झोपड़ी मे त’ कखनहँ गाछ पर नुकायल रहैत छल। हँ, बेतियाक सुनयनाक सातुक दोकान सुस्लीस्ट भाइ लोकनिक अड्डा बनि चुकल छल। आठ आनाक साउत-नोनक घोर पीबि ओ सब विचार करैत छलाह, जुगुत लगबै छलाह जे अगिला इलेक्शन मे कोना कंग्रेसिया कँ पछाड़ब।
समय ककरो रोकने ने रूकै छै। आब सुनयना पचासक धक मे आ शनिचरीक बुझू सोलहम।
सुस्लीस्ट भाइ सब ओहिना थाकल-चूरल। मुदा, ओहि दिन एकटा विलक्षण बात भेलै। साँझक समय, कनिएँ काल पहिने बिहारि उठल छलै, फेर एक अछाड़ पानि सेहो बरसल छलै। ओहीकाल एक कम उमिरक सुस्लीस्ट भाइ सुनयनाक दोकान पर आयल। सुनयना परिचय-पात पुछलकै, आगत-स्वागत केलकै त’ पता चललै जे हिनकर नाम रामठेंगा सिंह ‘चिनगारी’ छनि।
चिनगारीजीक गाम मिरचैया, बछबाड़ा टीसन सँ आध कोस पच्छिम। गाम मे हुनका सात बीघा जमीन आओर दूरा पर दूटा महीस। चिनगारीजी पहिने कम्युनिस्ट बनलाह। मुदा चक्काजामक मिटिंग मे सिपाहीक से ने डांग हुनका पीठ पर पड़लनि जे तत्काल कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ि चिनगारीजी सुस्लीस्ट बनि गेलाह। ओ पार्टीक मीटिंग मे बेतिया आयल छलाह। एतए अबिते पता लगलनि जे बैकुण्ठ भगत, माने सुस्लीस्टक शिरोमणि, एकटा धाकर कँग्रेसिया नेताक चालि मे फंसि क’ पार्टी छोड़ि काँग्रेस मे प्रविष्ट क’ गेल छथि।
आब की होअय? चिनगारीजी भुतियाति-भुतियाति सुनयनाक सातुक दोकान मे पहुँचि गेलाह। सुनयना चिनगारीजी कँ देखिते मोने-मोन किछु निश्चय केलनि आ पुछलकनि”औ चिनगारीजी, रौआ ठीक-ठाक बोलब। रौआक बियाह भेल हए कि ना?“
चिनगारीजी टकटकी लगाक’ शनिचरी कँ निहारि रहल छलाह। इच्छा भेलैन्ह जे आध-मन भारी झूठ बाजी। कहियैक जे हमर की, हमर बापोक बियाह नै भेल रहन्हि। मुदा सम्हरि गेलाह। मात्रा एक पावक झूठ बजलाह जे एखन तक कुमारे छथि।
सुनयना आओर शनिचरी मिलि क’ चिनगारीजीक खातिर करै लागलि। राति मे सुतै सँ पहिने सुनयना चिनगारीजी कँ बुझबैत कहलकनि”रौआ, हमर बात के धियान से सुनल जाओ। सुस्लीस्टक जमाना आ गेल बा। उचक्का, जेबकतरा आ डकैत सब अही देश के नागरिक। सबकँ समान अधिकार। तू बड़ काबिल त’ एक भोट, हम मूरख त’ एक भोट। रौआ भोट कँ संग-संग जात कँ चिन्ही, पाँत कँ चिन्ही। बाध-बोन मे गोइठा छिड़िआल बा। ओकरा जमा करी आ सब चैक-चैराहा पर जला दीं। समूचा प्रदेश मे आग अपने-आप पसरि जाइ।“
सुनयना थोड़ेक सुस्ता क’ फेर बाजलि”रौआ, सुनली की ना? आजादीक तपतपायल एकटा बुढ़बा नेता राजधानी मे आ गेल वा। जा, जाके ओकरा गोर मे नोर बहाब’। ओकर आशीर्वाद पड़ी त’ पटना के साथ-साथ दिल्लीक राज तोहार।“
औरो सुनल जाओ। सुनयनाक फिरंगी भूत ओकर माथ पर चढ़ि के बाजि रहल छल।
दृ”पुरना कँग्रेसिया मर-खप गेल। ओकर लड़िकन नेता बनैक वास्ते मैदान मे उतरल वा। सरौं सब आँखि मे सुरमा लगाबयबला, सोना कँ चेन मे रूद्राक्षक माला पहिरैबला आऊर मौगिक माफिक माथक बीच मे सौंथ करैबला, आब राजनीति का करिहेएँ। कँग्रेसियाक जमाना खत्मे बुझीं आओर सुस्लीस्टक जमाना दमकैबला बनल बा।“
चिनगारीजी सुनयना सन महान गुरुआनिक उपदेश सुनि नतमस्तक भ’ गेलाह आ एक दिन सुनयनाक बेटी शनिचरीक हाथ पकड़ने बछबाड़ा टीसन पर पहुँचि गेलाह।
बछबाड़ा टीसन पर पहुँचलाक बाद चिनगारीजी कँ होश भेलनि‘अरौ बाप रौ बाप। गाम कोना जायब। घर मे कनियाँ आ तकर एकटा बेटा।’
चिनगारीजी बछबाड़ा टीसनक उतरबरिया सिगनल लग शनिचरी संग बैसल तम्बाकू थूकै छलाह आ सोचैत छलाह‘मानलहुँ नेतागिरी मे थोड़ेक जोश हेबो करैत छैक। मुदा, ई कोन जोश भेलै? गाम जाइत देरी बुझू जे नाम गेल, जाइत-पाति मे धाख गेल आ नेता बनबाक सपना चूर-चूर भऽ गेल। शनिचरी कँ अपना संग आनि बड़का आफद बेसाहि लेल।’
राति एक पहर बीति गेलै। चिनगारीजी कँ ओहुना चारू कात अन्हार देखाइ पड़ैत छलनि। कहबी छै, भगवान बेर पर सबहक मददि करैत छथिन्ह। खास क’ ओकर जकरा नेता बनैक होइक, देशक बागडोर संभारक होइक। चिनगारीजी कँ एकाएक मोन पड़लनिकनही मोदियानि।
कनहि मोदियानिक डेरा हाइवे सँ पाव भरि जमीन पाँछा आओर रेलवे पटरी सँ कनिकबे हटल, तीन बटिया रस्ताक मोहार पर बेस पाँच-छः कट्ठा जमीन मे पसरल रहैक। पाँचटा महींस, सात-आठ टा गाय आओर बोतू संगे एक दर्जन बकरी। एखन तक लाइन होटलक चलती नहि भेल छल। कनही मोदियानिक ओहिठाम खेबा-पिबाक सब इन्तजाम। सोनहाइत दूधक खीर वा पच्चहतरि नम्बर बला दारू। जे चाही से भेटत। नगद सेहो, उधार सेहो। रात्रि-विश्राम, नेवारबला खाट, गंगाकातक पवित्तर छौंड़ी, सब किछु ओतए उपलब्ध छलै। ट्रक ड्राइवर, पनपैत छोटका बड़का नेता, सबहक जमघट छल कनही मोदियानिक लग।
जखन शनिचरीक हाथ धेने चिनगारीजी कनही मोदियानिक डेरा पर पहुँचला त’ राति एके पहर बाँकी छलैक। इजोरिया उगि गेल रहैक। इजोरिया मे शनिचरी ओहिना चमकैत रहअय जेना सिनेमा मे हिरोइन।
कनही मोदियानि मे सबसँ बेसी खूबी छलै ओकर धैर्य आ अकाश तक देखैक गुण। ओ धियान लगाक’ चिनगारीजीक सब गप सुनलक। फेर बाजल”वाह! तूँ सरिपों चिनगारी छह। नेता बनैक सबटा नक्षत्रा तोहर कपार मे लिखल छह।“
फेर कनही मोदियानि शनिचरीक चतरायल जवानी कँ निहारि मुँह मे मिसरी घोरैत बाजलि”ताँ एकरा हमरा जिम्मा छोड़ि जा। तुरंत पटना जा क’ ओहि बुढ़वा नेताक शरणागत हुअ’। हम शनिचरी कँ पेटार मे झांपि क’ राखब। ताँ जखन विधायक बनि जेबह, त’ अबिह। शनिचरी कँ तहतर्ज हम वापिस क’ देबह। तोरा कोनो खरचा नहि लगतह। हँ, पटना जेबा लेल, नेता बनै लेल, एखन एक सौ टाका दैत छिअ। घट’ त’ औरो मांगि लिह’।“
चिनगारीजी गदगद भ’ क’ कनही मोदियानिक चरण धूलि माथ मे लगौलनि आ बिदा भ’ गेलाह। कनही मोदियानिक उधारी मे सब दिन बरक्कत भेलैए।
चिनगारीजी पटना पहुँचलाह। ओहि बुढ़बा, अजादीक लड़ाइक विख्यात सिपहसलारक चरण मे समर्पित भेलाह। ओना, पहिने सँ ओहि नेताजीक अपियारी मे बहुतो बुआरी, सौउरा आ कबई सब कुदि रहल छलै। चिनगारीजी ओही झुंड मे सन्हिया गेलाह।
प्रान्तक राजनीति कँ के कहअय, देशक राजनीति मे भयंकर भूकम्प एलैक। अहि देशक प्रजातंत्रा अपन असली तंत्रा कँ प्रगट केलक। सुस्लीस्ट भाइ लोकनि सब दिन तिरस्कृत रहला, एलेक्शन जीत गेलाह।
कँग्रेसिया पिछड़ि गेल, बुझू रसातल मे चलि गेल। चारू कात एकेटा गप। होली बीतल गाली मे, कँग्रेसिया खसल नाली मे।
ठक्कन मोची, चनमाँ साफी, किरांइ मुसहर, जगुआ केऔटक संगहि संग राम ठेंगा सिंह ‘चिनगारी’ सब विधायक आ फेर मनीस्टर। चिनगारीजी विधि मंत्री बनलाह। शपथ लेबा काल हुनक ठोंठ मे बग्घा लागि गेलनि। मंत्रीक कुर्सी पर बैसलाह त’ पोनक गिरगिट माथ मे पैसि गेलनि आ विधिक अर्थ बुझै मे हुनका जे
(अगिला अंकमे)
१.मैथिली भाषा आ साहित्य – प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
१.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मैथिली भाषा आ साहित्य
ऋगवेदक भाषाक अध्ययन-अनुशीलन, चिन्तन-मनन, विवेचन-विश्लेषणसँ अवबोध होइत अछि जे वैदिक युगमे तीन उपभाषा प्रचलित छल- “उत्तरक भाषा”, “मध्यक भाषा”, आ “पूर्वी मध्यक भाषा”। ब्राह्मण ग्रन्थक अवगहनोपरान्त एहन प्रतीत होइत अछि, ओही भाषा सभकेँ क्रमशः “उदीच्च”, “मध्यदेशीय”, एवं “प्राच्य” भाषाक नामसँ सम्बोधित कएल गेल। प्राच्य बोली अर्द्ध मागधी आ मागधी प्राकृतक साक्षात माय छलीह। “पूर्वी हिन्दी” आ “कौसली” क स्रोत अर्द्ध मागधी थिक। एखन मागधी अपभ्रंशक अत्याधुनिक प्रतिनिधित्व बाङ्ला, असमिया, ओद्इया, मैथिली, मगही आ भोजपुरी कऽ रहल अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे स्पष्ट भऽ जाइछ जे मैथिली आर्यभाषा परिवारक एक प्राचीनतम भाषा थिक। एकर उत्पत्ति पूर्वी प्राकृतक पूर्वी कोष्ठ मगध विदेह प्राकृतसँ भेल अछि। प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे एकर अनेक नाम प्रकाशमे आयल अछि। विश्वकवि विद्यापति (१३५०-१४५०) एकरा “अवहट्ठ”, लोचन (१६५०-१७२५), “मिथिला अपभ्रंश”, बेलिगत्ती (beligatti),”तिरहुतिया”, वा “तिरहूतियन” आ सुभद्र झा (१९०९-२०००), “मिथिला अपभ्रंश” नामे सम्बोधित कयलनि। मिथिलाक भाषाक उल्लेख “आइने अकबरी”मे सेहो भेल अछि जतय एकरा पृथक भाषाक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। आधुनिक कालमे मैथिली नाम सर्वाधिक प्रचलित अछि। ई नाम जे लोकप्रियता अर्जित कएलक तकर सब श्रेय छनि हेनरी थॉमस कोलव्रुककेँ जे सर्वप्रथम एशियाटिक रिसर्चेज भाग-७, पृष्ठ १९९ पर हुनक संस्कृत आर प्राकृत सम्बन्धी निबन्धक अन्तर्गत भेटैत अछि। तत्पश्चात् सिरामपुर मिशनरी द्वारा अपन सोसायटीक १८१६ ई.क छठम मेम्वायरमे अन्य आर्य भाषा सभक संग तुलना करैत मैथिली शब्दक उल्लेख कयलनि अछि(इण्डियन एण्टीक्वेरी १९०३, पृ.२४५)। पाछाँ जा कऽ एस.ड्ब्लू. फेलन, विशप कैम्पबेल (१८१४-१८९१), डॉ. हार्नेले (१८४१-१९१५) आऽ केलाग आदि विद्वत्-वृन्द स्थल-स्थलपर मिथिलाक भाषा मैथिलीक चर्चा कयलनि अछि। पाश्चात्य विद्वत्-वृन्दमे मैथिलीक सबसँ उल्लेखनीय सेवा डॉ. जार्ज अव्राहम ग्रियर्सन (१८५१-१९४१) कयलनि। वस्तुतः ग्रियर्सन द्वारा मैथली शब्दक प्रचार कयल गेल आ मिथिलाक भाषाक अर्थमे कयल जाय लागल।
(अगिला अंकमे)

२. डॉ. देवशंकर नवीन
डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)।
सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)।
सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक।
बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो
(राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ)
सोनामामी संग देवकान्तक वार्तालाप, मानवीय मनोवेग, प्रेमपाशमे बान्हल दू व्यक्ति, आ सामाजिक मर्यादा, पारम्परिक सम्बन्धक खुट्टीमे जकड़ल मानवक मोनक उद्वेगकें रेखांकित करैत अछि। व्यवस्था आ मर्यादाक बन्धन आ मनोवेगक स्वच्छन्द-कामनामे कतहु एक आरि-खेत नहि होइत अछि। एहि दृश्यकें ÷आदिकथा’क घटना-सूत्रा रेखांकित करैत अछि।
सुशीलाक एहेन चरित्राांकन मिथिलाक अयथार्थ आदर्श आ अव्यावहारिक मर्यादाकें नाँगट केलक अछि, एहिसँ रूढ़ि-पोषक लोकनि व्यथित जते भेल होथि, मुदा मैथिलीमे नव-चिन्तन पद्धतिसँ उपन्यास-कथा लिखबाक परम्पराक नव सूत्रापात भेल आ नव पीढ़ीक, नव दृष्टिक उद्योगसँ मिथिलाक ई बर्बरता समाप्त भेल–से प्रसन्नताक बात थिक।

राजकमल चौधरीक दोसर उपन्यास थिक — आन्दोलन। एहिमे नाटकीय शैली पर विशेष जोर अछि। मुदा उपन्यास इहो मनोविश्लेषणात्मके अछि। नाटकीय शैलीक गद्यमे मनोविश्लेषणक सुविधा ताकब आसान नहि होइत अछि, मुदा राजकमल चौधरीक कथा-कौशलकें ई सब सुविधा तकबामे कोनो तरद्दुत्त नहि होइ छनि। सुगठित शिल्पमे सामाजिक यथार्थक मौलिक चित्रा अंकित करब हिनकर रचनाक मूल स्वभाव थिक। व्यतीत आ वर्त्तमानक घटना-चक्रक आश्रयसँ सम्भाव्य दिश इशारा एहेन कौशलसँ करै छथि जे ओ रचना एकदम सहज आ नागरिक जीवनक दैनिक व्यवस्था जकाँ लगैत अछि।
कथानक एकटा बेरोजगार युवक ÷कमल’क कलकत्ता महानगरमे रोजगार प्राप्ति हेतु प्रवेश आ कलकत्ता प्रवासक क्रममे उपस्थित विभिन्न दृश्यावलोकनक क्रमबद्ध नियोजन पर आधारित अछि। मूल कथा भाषा-प्रेमसँ ओत-प्रोत मैथिली आन्दोलनक विविध चरणकें रूपायित करैत अछि। विवरण-विस्तारमे एहि आन्दोलनक नग्न स्वरूप सोझाँ अबैत अछि। मैथिल जातिक मत-भिन्नता, ईर्ष्या-द्वेष, धोखाधरी इत्यादि अपूर्व कलात्मकतासँ चित्रिात भेल अछि। कथा-सूत्राक विस्तारमे पात्राक अवतारणा आ उपकथाक समावेश परम विश्वसनीय आ सहज यथार्थक संग भेल अछि। उपन्यासकारक कहब छनि जे आजुक मनुक्खमे तीन प्रवृत्ति मुख्यतः देखल जाइ’ए– क्षुधा, आत्मरक्षा आ यौनपिपासा। एहन तीन प्रवृत्तिक चित्राांकन लेखकक प्रधान प्रयत्न रहल अछि। — वस्तुतः एहि उपन्यासमे ई तीनू प्रवृत्ति बेस फरिच्छ भेल अछि। उपन्यासक पात्राकें जाहि जीवन्त रूपें रचनाकार एतए ठाढ़ कएने छथि, ताहिमे मैथिल चरित्रा आ मिथिलाक परिदृश्य पूर्ण विवरणक संग उपस्थित भ’ जाइत अछि। राजकमल चौधरीक सृजन-कर्मक ई खास विशेषता थिक जे हुनका ओतए व्यक्ति आ व्यक्तित्व बड़े महत्त्वपूर्ण भ’ उठैत अछि। व्यक्तिक जीवन-लीला, रहन-सहन, सोच-विचार, आहार-व्यवहारकें अंकित करैत ओ सम्पूर्ण परिदृश्य गढ़ि दै छथि। तें राजकमल चौधरी द्वारा सृजित चरित्राक मानसिक उद्वेग आ भौतिक करतब पर विवेकपूर्ण दृष्टि राखि ली, तँ हुनकर सम्पूर्ण रचनाक समालोचना भ’ जाएत। हिनकर सकल पात्राक आचरण आ मनोवेग, ओकर आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि। कोन परिस्थितिक कोन मनोवेगमे मनुष्य कोन आचरण करै’ए–से पूरापूरी एतए व्यक्त होइत अछि। एहि तरहें चारित्रिाक विश्लेषण करैत उपन्यासक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बूझल जा सकैत अछि।
राजकमल चौधरीक सगरो रचना-विधानमे पात्राक सृजन आ चरित्राांकन स्पष्ट आ विलक्षण अछि, मनोविश्लेषण आधारित क्रिया-कलाप आ आहार-व्यवहार तार्किक आ समीचीन अछि। समस्त पात्राक जीवन-प्रक्रिया आ रहन-सहनमे मनोविश्लेषणक सुविधा छिड़िआएल रहैत अछि, जकर आधार पर ओकर अर्जित जीवन-दृष्टिक सूक्ष्म अध्ययन कएल जा सकैत अछि। कोनो व्यक्तिक चिन्तन-व्यवस्था कोन विवशता आ व्यवस्थामे निर्मित भेल; कोन क्रिया-कलाप ओ कोन परिस्थितिमे पूर्ण केलक– से जानि सकबाक सुविधा मनोवैज्ञानिके धरातल पर स्पष्ट होइत अछि। चरित्राांकनक इएह उत्कर्ष आ इएह कौशल एहि उपन्यासक प्रभावकें वैराट्य दैत अछि। भाषा, विषय, विवरण, शिल्प…सब किछु मानवीय, सहज, सामाजिक, जीवन्त, प्रामाणिक आ विश्वसनीय!
आन्दोलन उपन्यासक नायक ÷कमल’ मिथिलाक सुशिक्षित, परम विवेकशील आ प्रतिभावान युवक छथि। आत्म-स्थापनक उद्देश्यें कलकत्ताक महानगरीय परिवेशमे बौआ रहल छथि। नीलू सन अल्प वयस किशोरी अथवा नवयुवतीक उन्मादित समर्पण अथवा अल्हड़ आमन्त्राण नकारि देलनि; मुदा वासनाक राक्षससँ मुक्ति पाब’ लेल अन्हार आ बदनाम गली धरि चल गेलाह।
आदर्श आ सद्पात्राताक प्रतिमूर्ति भुवनजी मातृभाषा आ मातृभूमिक प्रसार-प्रगतिमे तल्लीन छथि, मुदा कोनो खास कारणें हुनकहुमे विचलन आबि गेल छनि। निर्मला सन अत्याधुनिक सुकामा, सुवर्णा स्त्राी भुवनोजीकें हिला दै छनि। भुवनजीक पत्नी निरक्षरा आ कुरूपा छनि। निर्मला जी सन सुकामा स्त्राीक यौवन, रूप लावण्य, आधुनिक चटक-मटक पर हुनकर लहालोट हैब स्वाभाविक आ यथार्थ थिक।
मानव सभ्यताक इतिहासक कहै’ए जे मनुष्य अपन विराट छवि ठाढ़ कर’मे तल्लीन रहै’ए, विराट भ’ जाइ’ए, मुदा मानवीय कमजोरी ओकरा संग रहै छै। अइ उपन्यासमे उपन्यासकार भुवनजीक छवि अति विशिष्ट आ निविष्ट रूपमे ठाढ़ कएने छथि। मुदा जँ सएह टा रहितए, तँ भुवनजी कोनो दन्तकथाक नायक बनि जैतथि। समस्त वैशिष्ट्यक अछैत मानवोचित दुर्बलता रेखांकित क’ कए उपन्यासकार वस्तुतः भुवनजी आ कमलजी–दुनूकें यथार्थसँ जोड़लनि अछि।
सुशीला बहुगामिनी स्त्राी छथि, नित्य प्रति नव-नव पुरुखक बाँहिमे झूलए चाहै छथि। दोसर स्त्राी छथि सुशीला, ओहो अनेक पुरुखक संगें समागम करै छथि। मुदा तें, दुनू स्त्राी समान नहि छथि। पर-पुरुख समागम सुशीलाक विवशता छनि, अर्थोपार्जनक आधार छनि, जीवन-यापनक ठहार छनि, माइ-बाप संग अपन भरण-पोषण हेतु अन्न-वस्त्रा चाही। देहे टा पूँजी छनि, तकरहि भेजबै छथि, कूटि-पीसि गुजर करै छथि। मुदा निर्मलाक विवशता अर्थाभाव नहि छनि। ओ कामातुरा छथि। यौन-पिपासासँ व्याकुल रहै छथि। कोनो सम्पूर्ण पुरुखक सम्पूर्ण भोग लेल तत्पर रहै छथि। … एकटा देह बेचै छथि, एकटा देह बिलहै छथि। एकटा आत्मबुभुक्षाक तृप्तिमे कोनो नैतिक-अनैतिक काज लेल तत्पर छथि, दोसर यौनपिपासा शान्त करबा लेल उताहुल।
आन्दोलन उपन्यासक केन्द्र-बिन्दु थिक आत्मबुभुक्षा, यौनपिपासा, आत्मसुरक्षा। सत्य थिक, आ राजकमल चौधरीक मान्यता छनि, जे मानव जीवनक
आदिम आवश्यकता इएह तीन होइत अछि। ओना मनुष्य की, प्राणी मात्राक आदिम प्रवृत्ति इएह तीन टा होइत अछि। शेष सभ प्रवृत्ति–ईर्ष्या, द्वेष, राग-विराग, लोभ-लालच, पक्ष-विपक्ष, झंझट-फसाद, खून-खुनामय… सब किछु लोक एतए आबि कए, जीवन जीबाक क्रममे विकसित करै’ए; उल्लिखित तीनू प्रवृत्ति मनुष्य जन्महिसँ संग नेने अबैत अछि। अही तीनू प्रवृत्तिक निपटानमे किओ अपन छवि कुतुबमीनार सन ऊँच क’ लैत अछि, किओ अपन कुतुबमीनार सन छविकें सड़ल पानिक नाली बना लैत अछि। आन्दोलन उपन्यासकें अइ आलोकमे देखब समीचीन थिक।
उपन्यास उत्तम पुरुषमे लिखल गेल अछि। कथानायक कमलजी जीवन-संग्राममे जुटल छथि, आत्म-स्थापनमे लागल छथि; भाषाई आन्दोलनमे अपनाकें बलिदानी घोषित केनिहार मैथिल लोकनिक समस्त र्छंिकें प्राथमिक आ मौलिक अनुभव जकाँ देखि-भोगि रहल छथि। मैथिल जातिक र्छंि-पाखण्ड, राग-द्वेष, वासना आ नपुंसकताकें, आ एहि वृत्तिकें छपा रखबाक मनुष्यक कौशलकें निकेनाँ चीन्हि रहल छथि; इएह कथानायक अइ उपन्यासक कथावाचक छथि। कलकत्ता महानगरमे जीवन-यापन करैत विभिन्न आय-वित्त आ बुद्धि-वित्तक प्रवासी मैथिलक क्रिया-कलापसँ परिचित छथि। निर्मलाजी आ सुशीलाजी जाहि वर्गक मैथिल स्त्राीक प्रतिनिधि छथि, ताहि दुनू वर्गकें निकटसँ देखने छथि। कमलजीक नजरिमे निर्मलाजी छथि क्लयोपैट्रा, रूपोद्धता, प्रति निशि नव प्रेमीकें साँपसँ कटबा क’ मरबा दै वाली विकटकामा। सुशीला छथि निश्छल, निस्पन्द, क्रिया-शून्य, सभ किछु हेरएने बिसरएने रस्ता पर ठाढ़ि, जे केओ पुरुख आबए आ किछु टाका द’ जाए! सुशीला छथि ओ नारी, जे नुका-चोरा क’ नहि, धोखा-धड़ीसँ नहि, एकदम सफा-सफी अपन अस्तित्वकें बेचि रहल छथि!
श्यामा नयनाभिरामा कुसुम-सुषमा-रंजिता सौख्यधामा नहि, देह पर मैल, फाटल साड़ी, ओछान पर पुरान, मँहकैत चद्दरि, आँखिमे निर्लज्जता, भाव-शून्य, निष्काम, पाथर बनि गेल पुतली। छिः छिः, सुशीला आ निर्मलाजीमे कोनो तुलना भ’ सकैछ (आन्दोलन/पृ०. ३९)!
राजकमल चौधरीक रचना संसार पर बहुतो गोटए बहुत तरहक बात कहलनि अछि। हिनकर औपन्यासिक-कौशल पर कतोक गोटएकें एकसूत्राताक अभाव देखेलनि।… समग्रतामे देखी तँ भारतीय नागरिक, अथवा मैथिल नागरिकक सम्पूर्ण जीवन परिदृश्य हिनका नजरिमे कौड़ी जकाँ जगजिआर अछि। सामाजिक जीवन व्यतीत करबा लेल संस्थापित समाज-व्यवस्था, भारतीय लोकतन्त्रा, मानवीय जीवन-पद्धति, जीवन-यापनक बुनियादी सीमा-शर्त, जिजीविषाक अपरिहार्य वृत्ति, मानवीय मनोवेग, मनुष्यक अभिलाषा, अस्तित्वक अविचल यथार्थ… सब बिन्दु, पर विरोधाभास आ विडम्बनाक जुलूस देखाइत अछि। राजकमल चौधरी अही जुलूसमे देखलनि जे सिद्धान्त आ व्यवहार, वचन आ आचरण, जीवन आ लेखनमे कोनो तरहक पारस्परिक सम्बन्ध-बन्ध, स्थापित नहि अछि। लोकतान्त्रिाक व्यवस्थामे मानवीय सम्वेदनाक रक्षा हेतु जे आचार संहिता घोषित भेल अछि; अथवा मिथिलाक नैतिक शिक्षामे जे पाठ पढ़ाओल गेल अछि; तकर अनुपालन अइ भाग्य विधाता वर्गक कोनहु टा आचरणमे नहि भ’ रहल अछि; आ व्यावहारिक स्तर पर जे भ’ रहल अछि, से मानवीय जीवन पद्धति लेल कोनो अर्थें उपयोगी नहि अछि। एहि विचित्रा विडम्बनाकें राजकमल चौधरी उठबैत रहलाह आ जस के तस रखैत गेलाह; अही कारणें हिनकर उपन्यास विडम्बनासँ भरल, परस्पर विरोधाभासी आचरणसँ भरल समाज-व्यवस्थाक चित्रा-खण्डक कोलाज लगैत अछि। पारम्परिक पद्धतिसँ शिक्षित-दीक्षित समीक्षक लोकनिकें जें कि राजकमल चौधरीक उपन्यास अथवा कथामे कथासार अथवा कथानक नहि भेटै छनि, तें हुनका लगै छनि, जे एहि रचनामे एकसूत्राताक अभाव अछि। एहेन समीक्षक लोकनिकें प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा नवसाक्षर लेल प्रकाशित कहानीक पोथी पढ़बाक चाही, जाहिमे समस्या, समस्याक कारण आ समस्याक समाधान खोंसैत कहानी लिखल जाइत अछि आ अन्तमे पूछल जाइत अछि–त’ अहाँकें एहि कहानीसँ की शिक्षा भेटल?
सत्य थिक जे वस्त्राक भीतर हरेक मनुष्य नाँगट होइत अछि। वस्त्रा पहिरैत अछि परदा लेल। ओना तँ सबहक सब बात लोककें बुझले रहै छै। हरेक सन्तानकें बूझल रहै जे हम अइ दुनियाँमे कोना एलहुँ आ हरेक माइ-बापकें बूझल रहै छै जे ओ अपन सन्तानक विवाह किऐ करौलनि अछि। मुदा एकटा मर्यादाक खुट्टी छै, जाहिमे सामाजिक पशु बान्हल रहैत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालमे, आ एम्हर आबि कए त’ आओर बेसी, ई बात लागू भ’ गेल अछि। मनुष्यक भौतिक नग्नता पर नहि, मानसिक आ वैचारिक नग्नता पर। सब व्यक्तिक स’ब बात स’ब कियो जनैत अछि, मुदा स’ब व्यक्ति अपन ओहि समस्त आचरण पर, वृत्ति पर परदा देबा लेल कोनो ने कोनो नैतिक बातक परदा देब’ चाहै छथि। कहि नहि, मनुष्य स्वयंकें ठकबा लेल एते बेसी बिर्त्त किऐ रहै छथि! दुनियाँक लोक तँ सबटा बात बुझिते रहै छै।
(अगिला अंकमे)
1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘

बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक
आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल। शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेलडा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि।
मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रतिजग्गापिकनीकके बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपनाकेँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे जरैत रखबा लेल ओ ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सबएकरा अजगू त बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास भेलनि। सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत करब।सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा केँ साकारकरबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने केँ विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिकआवास पर होअय। पहिल आयोजन 24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमेअशोकक डेरा पर राखल गेल छल जेस्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणेँ। आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहिआयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयकस्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21 जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखकेँ भोरे दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहकअसुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष चर्चा होएत।अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक विचार अछि। अहाँक आगमुनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कमार चैधरी।

एही प्रकारेँ सगर रातिक अवधारणाकेँ प्रभास कुमार चैधरी साकार कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाआगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहिसाँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल। डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त, भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक पाठ कएल।साहित्यकारकस्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जेसमाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएलजाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यककए देल गेल।एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर
दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल। एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वाराप्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाककथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीकाविश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँकथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपेँ आयोजनक भार लेल जे श्री विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेलअछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखलजा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि। दरभंगाक आयेजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहिअवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं। प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सनकार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसारदरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवशआयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाकेँ सौपि देने छलाह। प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि। ओना मजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि।
कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल।संयोजक मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाकेँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्दचैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमकेँ मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह। विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र प्रकाशित भेल। श्वेत पत्रमे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमकेँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ विराटनगर,नेपाल पहुंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना। पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुंचि गेल। सुपौलसँ बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल। ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल । किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटेअपनाकेँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण अछि-
1.अस्वास्थ्य,
2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘
3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं
4.कार्यालयीन व्यस्तता।
एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणेँ आब सम्मिमलित नहि भए पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु, सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट मंतव्यसँ चर्चाकेँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाकेँ पूर्णतःसमेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणेँ डा.भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी एवं अनुत्पादक भए गेल अछि। सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछतेँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि-
1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि,
2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘
3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर।
पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाकसंख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर बहेरामे संग भेलाह।ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँकए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि।
एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त विचारकेँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चाबहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब खटकैत रहैत अछि।कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गाण छक। तेँ कवि लोकनि गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवंअपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणेँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि।
एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूकेँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगतपोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक प्रभाव। रचनाकारकेँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर। कवि सम्मेलनमे आयोजककेँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि । सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकारजकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माकेँ भरि राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारकबीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुचैत छथि। कथा पढैत आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि। जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरणबनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभलक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह। सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची, जमदेशपुर देवघर पूर्णियां आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,इहो शुभ लक्षण थिक।मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही। सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 केँ भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट। ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि-
‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलनबढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेँबुू जे लेखकीय ल तझअस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराकेँ बल देल। सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।मैथिली निरपवाद रूपे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत। साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। –
(अगिला अंकमे)
प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र(१९४५- ), पूर्व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा। अनुवादक, निबन्धकार। प्रकाशन: तमिल साहित्यक इतिहास, भवभूति (दुनू अनुवाद)।
मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र
पूर्णियाँ जिलाक पंजीकार परिवारमे उत्पन्न पं. मोदानन्द झा आधुनिकताक कसौटीपर अनुदार मुदा पारम्परिकताक कसौटीपर उदार, विद्वान आ विद्वत्ताक सत्संगति लेल आतुर, विलक्षण प्रतिभासँ सम्पन्न व्युत्पन्नमतित्व वाला मिथिलाक अत्यन्त सम्मानित पंजीकार छलाह। पंजीशास्त्र हुनका पूर्णतः अधिगत छलनि आ ओ पंजीसँ जुड़ल ककरहु कोनो जिज्ञासाक समाधान लेल सदैव तत्पर रहैत छलाह। ओ वस्तुतः मिथिलाक विभूति छलाह जनिकर स्मृतिक संरक्षणार्थ जे किछु कयल जायत से थोड़ होयत।
पूर्णियाँ जिलाक रसाढ़ ग्रामक रहनिहार पं मोदानन्द झा पड़वे महेन्द्रपुर मूलक ब्राह्मण छलाह आओर विस्तृत कृषि-भूमिक कारणे बादमे शिवनगर ग्राममे रहय लगलाह। रसाढ़ आ शिवनगर दुनू धर्मपुर परगनान्तर्गत अवस्थित अछि। १९१४ ई.मे उत्पन्न ओ अपन माता-पिताक एक मात्र पुत्र छलाह। परम्परासँ हुनकर परिवार पंजीकारहिक छलनि आ हुनक पिता भिखिया झा ई व्यवसाय करितो रहथिन। ओ मुदा नीक कृषक रहथि आ हुनकर बेसी समय ओहिमे लगनि। हुनका २०० एकड़सँ बेशीक जोत रहनि। ओ अपने प्रायः शिक्षितो नहियें जकाँ रहथि, मुदा अपन पुत्रकेँ नीकसँ नीक शिक्षा दिआयब हुनकर अभीष्ट रहनि। मोदानन्द झा स्वयं बुझबा जोगरक भेलापर अपन कौलिक व्यवसाय आ प्रतिष्ठाक पुनरुद्धार करबा लेल कृतसंकल्प भेलाह।
अपन बाल्यावस्थाक संस्मरण बजबाक क्रममे ओ प्रायः बाजथि जे ओ बड़ए प्रसन्नता आ आह्लादक समय छल। ओ माता-पिताक दुलरुआ त छलाहे, काका-काकी तथा आन सम्बन्धी आ कुटुम्बी जनक स्नेह सेहो हुनका प्रचुर प्राप्त छलनि। ओ दैनिक कृत्य आ विद्यालयसँ बाँचल समयमे माछ मारथि आ ई बहुत दिन धरि हुनकर प्रिय मनोरंजन रहनि। ओ एक बेर बहुत गम्भीर रूपेँ बीमार पड़लाह। वस्तुतः तहिया पूर्णियाँ जिलामे मलेरिया आ कालाजार महामारीक रूपमे पसरल छल। आ कहबी छलैक जे “जहर खाउ ने माहुर खाउ, मरैक होइ तऽ पूर्णियाँ जाउ”। हुनकर माता एक सम्पन्न कुलक महिला रहथिन आ ओ अपन पुत्रक रुग्णताक समाप्ति लेल किछु करबा लेल तत्पर छलीह। हुनकहि जिदपर २०० रुपया पीस दऽ कलकत्तासँ डाक्टर मँगाओल गेल। चारि पंडित अहर्निश हुनकर रुग्णावस्थामे दुर्गा सप्तशती आ गीताक पाठ करैत रहलाह। हुनकर माता स्वयं ताधरि अन्न ग्रहण नहि कयलथिन जा हुनकर पुत्र पथ्य ग्रहण करबा जोगरक नहि भेलनि। कलकत्तासँ आयल डॉक्टरक तऽ अन्य विदाइ कैले गेलनि, पाठ केनिहार ब्राह्मणो लोकनिक आ पुत्रक आरोग्य-लाभक उपलक्ष्यमे गाम-टोलक लोक सभकेँ भोज सेहो खोआओल गेल। मुदा पिताक आकांक्षा छलनि पुत्रकेँ विद्वान् देखबाक आ विद्यार्थीक लेल गण्य करक-चेष्टा, वक ध्यान, श्वान-निद्रा तथा अल्पाहारी आदि लक्षणसँ जन्मतः परिपूर्ण मोदानन्द झा लेल समय अयलनि गृह-त्यागी होयबाक।
(अगिला अंकमे)
1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति
संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा,जनकपुर, नेपाल

हिमालय पर्वत ऋंखलाक करिब मध्य भागमे चीनक तिब्बतसँ दक्षिण, भारतक बिहार आ उत्तर प्रदेशसँ उत्तर आ पूर्व तथा पश्चिम बंगालसँ पश्चिम एकटा आयताकार देश नेपाल अछि । २४० वर्षपूर्व गोराखक एकटा लडाकू राजा पृथ्वीनारायण शाह हिंसक बलसँ दक्षिण–पूर्व आ पश्चिमक देशसभपर आक्रमण करैत गेल आ सुन्दर उपत्यका काठमाण्डूसहित एकटा नमहर देश बनौलक । एकर सीमा दक्षिणमे कतऽ धरि रहैक, तकर आधिकारिक रुपसँ कतहु उल्ल्ेख नहि अछि । खस शासकद्वारा शासित गोरखा राज्यक दमनपूर्ण विस्ताकरक वाद एकर नाम कहिया नेपाल रहल से निर्णायक प्रमाण नहि भेटैछ । दक्षिणमे मिथिला आ अवधसन ऐतिहासिक गणराज्यपर सेहो ई हिंसापूर्ण ढंगसँ षडयन्त्रपूर्वक आक्रमण कएलक । एहि क्रममे व्रिटिशकालीन भारतकद्वारा प्रतिरोध आ युद्ध कएल गेलाक वाद १८१६ क सुगौली सन्धिसँ ई वर्तमान सीमाङ्कित देश, बनल जाहिमे १८६० क सन्धिसँ दानस्वरुप प्राप्त पश्चिमक ४ जिलासँ एकर वर्तमान स्वरुप निर्धारित भेल ।

ड्ड देशक राजनीतिक शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक छैक आ एकर राज्य–संरचना एकात्मक । एकर शासकीय प्रवृति निरंकुशात्मक छैक आ सामाजिक आर्थिक व्यवस्था सामन्ती छैक ।

ड्ड एकर सामाजिक मानवशास्त्रीय संरचना ९क्यअष्य(बलतजचयउययिनष्अब िक्तचगअतगचभ० मंगोलाइड केकेशियन प्रजातिसँ बनल अछि, जाहिमे निग्रोवाइड आ एस्टोल्वाइड प्रजाति सेहो अल्प संख्यामे बसल अछि । कैकेरियनक आर्य शाखा तँ मुख्य रहैत अछि ।

ड्ड हिमालय क्षेत्र आ पहाड क्षेत्रमे लिम्बु, राई, तामाङ, नेवार, मगर, गुरुङ, शेर्पा जाति तथा जनजातिक वास छैक तँ दक्षिणक समतल मैदानी भूभाग तराइृमे आर्यमूलक जाति जनजातिसभक वास छैक । दुनू क्षेत्रमे पिछड़ल जनजाति, आदिवासीसभक वास सेहो छैक, जाहिमे मिश्रित मूलक संख्या उल्लेखनिय छैक ।

मूख्यतः कर्णाली प्रदेशक आर्य मूलक खस जातिक गोरखा राज्य वर्तमान सम्पूर्ण नेपालपर शासन करैत अछि । तेँ ई राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक प्रभाव विस्तारक क्रमे प्रत्येक जातीय क्षेत्रमे प्रवेश कऽ सामाजिक, भाषिक, जातीय संरचनाकेँ तोड–मडोर कऽ देने छैक आ नेपालकेँ कथित रुपेँ राष्ट्र कहि प्रस्तुत करैत छैक । वस्तुतः सामाजिक विकासक अध्ययनमे देखल जाए तँ नेपाल एकटा नहि, विभिन्न राष्ट्रसँ बनल एक देश अछि, जतऽ एक्कहिटा खस जातिक एकल राज्यशासन छैक ।

२. मिथिला

नेपालक दक्षिणी समतल भूभागकेँ तराई अथवा मधेश कहल जाइत छैक । एतऽ अवध आ मिथिलासन पौराणिक महिमामण्डित ऐतिहासिक समृद्धताप्राप्त गणराज्य छल, जकरा मुगल व्रिटिश शासन दमन करैत गेल आ अन्ततः शाहवंशीय राजाक सङ्ग वाँटि लेलक । १८१६ क सन्धि मिथिलाकेँ खण्डित कएलक । जाहि मिथिलाक सीमा कोशीसँ पश्चिम, गण्डकसँ पूर्व, गंगासँ उत्तर आ हिमालसँ दक्षिण छलैक, तकर आइ इतिहास छैक, भूगोल नहि छैक । जेँ कि एकर भाषा, संस्कृति, जीवित छैक तेँ बाटल–बाँटल शरीरक आधारपर कहि सकैत छी–सिमरौनगढ़सँ पूर्व, झापासँ पश्चिम आ महाभारत महाड़सँ उत्तर मिथिला जीवित अछि–अहिल्याजकाँ जीर्णोद्धारक प्रतीक्षामे अछि, उद्धारक बाट जोहि रहल अछि ।

३. संविधान

देशमे शासन व्यवस्था कायम करबाक लेल बनाओल गेल मूल कानूनकेँ संविधान कहल जाइत छैक । सभ कानून, ऐन, नियम एकरे सीमाक भीतर रही बनाओल जाइत छैक । लोकतन्त्रक मुख्य आधार आ एकटा प्रमाण संविधान होइत छैक ।

नेपालमे २००४ सालमे पहिलबेर कोनो संविधान नामक चीज प्रस्तुत भेल रहैक । ओना ताहिसँ पूर्व १९१० मे एकटा ऐन सेहो बनल रहैक । तत्पश्चात २००७ सालमे अन्तरिम शासन विधान आ २०१५ सालमे नेपाल अधिराज्यक संविधान आएल । २०१५ सालक संविधान एकदलीय पञ्चायती व्यवस्था देलक आ तकर अन्त्य २०४६ सालक आन्दोलन कएलक । २०४७ सालमे एकटा अन्तरिम सरकार बनाकऽ तकराद्वारा नेपाल अधिराज्यक संविधान २०४७ लागू कएल गेल । ई सभ संविधान राजतन्त्रात्मक एकात्मक, एकात्मक अछि आ राज्य सत्तापर, राज्यपर, प्रशासनपर एक धर्म, एक भाषा, एक जातिकेँ प्रमुखता आ अधिकारक मान्यता देने छल । राजाद्वारा प्रदत्त ओ संविधानसभ राजाक अधिकारकेँ सर्वोपरि मानैत आएल छल । मुदा ०६२÷०६३ मे भेल जनआन्दोलन भाग–२ सँ ई मान्यता ढहैत गेल आ एखन देश संविधानसभाद्वारा अर्थात जनताक प्रतिनिधिद्वारा निर्मित संविधानक निर्माण करत ।

४. संविधानसभा

संविधान बनएबाक लेल जनताद्वारा चुनल प्रतिनिधिसभक समूह एवं सभाकेँ संविधानसभा कहल जाइत छैक । सार्वभौमसत्ता सम्पन्न जनता अपनाकेँ अनुशासित आ शासित रहबाक लेल जाहि तरहक शासन–व्यवस्थाकेँ चलएबाक लेल अपने पठाओल प्रतिनिधिद्वारा कानूनक ग्रन्थ तैयार करबाबैक आ घोषणा करबबैक, ताहि जनप्रतिनिधिमूलक सभाकेँ संविधानसभा कहैत छैक ।

५. संविधानसभाक अनुभव

(क) उत्तर अमेरिका ः ब्रिटेनद्वारा शासित अमेरिकाक १३ राज्य स्वतन्त्र भेलापर ५५ सदस्यीय संविधानसभा निर्माण कऽ तकर अनुमोदन अमेरिकी जनतासँ करबाकऽ अप्रिल ३०, १९८९ मे घोषणा कएलक ।

(ख) फ्रान्स ः अपनहि देशक सामन्ती नायक सम्राट सोलहम लुइक विरुद्ध संविधानसभा वना १७९१ मे लागू कएलक ।

(ग) रुस ः १९१८ मे संविधानसभा तँ बनल मुदा संविधान लागू नहि भऽ सकल ।

(घ) भारत ः ब्रिटिस शासनसँ मुक्तिक लेल ३८९ सदस्यीय संविधानसभा बनल मुदा पाकिस्तानक विभाजनक बाद रहल २९९ सदस्यीय सभाद्वारा आ डा.राजेन्द्र प्रसादद्वारा ई घोषित भेल ।

(ङ) दक्षिण अफ्रिका ः गोर आ कारीक बीच भेल संघर्ष संविधानसभाक मार्फत अन्त्य भेल । सर्वपक्षीय सम्मेलनमार्फत ४९० सदस्यीय संविधानसभाक निर्माण भेल आ संविधान बना जनअनुमोदन कराओल गेल आ घोषणा कएल गेल ।
विभिन्न देशक अनुभवक आधारपर नेपालमे बननिहार संविधानसभामे निम्न तरहक विशेषता होएब वाञ्छनीय रहितैक –

(क) जनसंख्याक अनुपातमे निर्वाचन क्षेत्र निर्कारण कएल जाइक आ प्रत्येक जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, दलित, महिला, मधेशीक ओहि अनुपातमे क्ष्ोत्र आरक्षित कऽ प्रतयक्ष निर्वाचनसँ जनप्रतिनिधिक पठा संविधानसभाक निर्माण कएल जइतैक ।

(ख) अन्तरिम संसदसँ संविधान मस्यौदा तैयार कऽकऽ ओकरा जनमतसंग्रहद्वारा निर्माण कएल जइतैक, मुदा प्रत्यक्ष मतादान वा समानुपातिक प्रणाली दुनू कायम कएल गेलैक । एहिसँ अत्पविकसित देशक जनतामे भ्रम आ अनावश्यक गड़बड़ी उत्पन्न मऽ सकैत छैक ।
आब पूर्ण समानुपातिक प्रणाली बहुतो राष्ट्रिय दलक संगहि प्रत्येक जातीय, जनजातीय, क्षेत्रीय समूहकसभक सेहो मांग रहलाक कारण ओकरे लागू कएनाइ सार्थक संविधानसभाक आधार तैयार कऽ सकैत अछि ।

६. समावेशीकरण तथा समानुपातिक समावेशीकरण

सत्ताक स्वरुप, शासन, प्रशासनमे देशक प्रत्यक जाति, जनजाति, अःल्पसंखयक जाति, विभिन्न भाषिक समूह, सांस्कृतिक समूह, आदिवासी, महिला, क्षेत्र आदि सभक प्रवेश नहि भेल तँ शासन पद्धति जनासँ दूर रहि जाइत अछि आ ताहूमे लोकतन्त्र तँ मात्र कथित सभ्रान्त वर्गक खास जातिक हाथक दमनक माध्यम बनि जाइत अछि । तेँ जातीय, भाषिक संख्याक समानुपातिक समावेशीकरणसँ मात्र लोकतान्त्रि शासन पद्धति मजबूत आ दीर्घजीवी भऽ सकैत अछि ।

(क) जनसंख्याक समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण कऽ ओहि क्षेत्रसँ ओहि ठामक मूल जाति, भाषाभाषीक मात्र प्रतिनिधित्व कराओल जाए ।

(ख) जनसंख्याक समानुपातिक रुपमे सरकारक प्रत्येक अंगमे अथवा न्यूनाधिक रुपमें सभ क्षेत्र, वर्ग, जाति, लिगंक उपस्थित कराओल जाए ।

(ग) सुरक्षा, प्रहरी, प्रशासन, राजनीति, राजनीतिक संस्था प्रत्येकमे समानुुपातिक रुप्मे प्रवेश कराओल जाए वा न्यूनाधिक रुपमे प्रारम्भ कराओल जाए आ किछु जातिक लेल प्रारम्भमे आरक्षित कएल जाए ।
एहि तरहेँ देखलापर आगामी शासन पद्धति समानुपातिक होएबाक लेल संविधानसभा समानुपातिक भेनाइ आवश्यक अछि आ तकरा लेल अन्तरिम संसद आ अन्तरिम सरकार, निर्वाचन आयोगकेँ सेहो समानुपातिक भेनाई आवश्यक अछि आ ओअि तरहक सुरक्षाक व्यवस्था कएनाइ सेहो आवश्यक अछि ।

७. एहि तरहेँ वनल संविधानसभा नेपालक नव राज्य संरचना कऽ सकैत अछि आ संघीय संरचनादिस लऽ जा सकैत अछि –
(क) राज्य (प्रान्त, प्रदेश) ः भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म आदिक आधारपर बनल अथवा बनाओल राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक अधिकारसम्पन्न राजनीतिक भूक्षेत्रकेँ राज्य कहैत छैक ।

(ख) संघ – एहन, राज्य सभस वनल राजनीतिक शक्ति सम्पन्न केन्द्रीय सत्ता के संध कहै छ । आंशिक सार्वभौमिकता, स्वतन्त्रता, आत्म निर्णयक अधिकार प्राप्त सभ मिल क सार्वभौम सत्ता केन्द्रके प्रदान करैछ आ एहि राज्य संरचना के संघीय संरचना कहल जाइत अछि ।

८. नेपाल संघीय होएबाक आवश्यक अछि – कारण ः–

(क) नेपाल विभिन्न प्रजाति, जाति, जनजाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के देश छै । एहि सभ के देशक मूलधारमे लएवाक लेल ।

(ख) लोकतान्त्रिक व्यवस्थाके समानुपातिक समावेशीकृत करबाक लेल ।

(ग) संघीय सरकार आ राज्य सरकार भेला स प्रत्येक नागरिक अपन योग्यता व्यवस्था अनुकूल उपयोग करबाक लेल ।

(घ) राज्य भीतर अनेक प्रशासनिक न्यायिक निकाय विकेन्द्रित विकाश राज्य क्षेत्रक कार्य सम्पादन ओहि राज्यक जनताके निर्णय अनुसार हौइछै ।

(ङ) ओहि राज्यक भीतरक प्राकृतिक सम्पदा जल, जमिन, जंगल खनिज पदार्थ पर ओहि राज्यक जनताक अधिकार होइछ, ओकर अधिकतम प्रयोग ओतहिक जनता करैछ ।

(च) उदयोग आदि विकास कार्य पर राज्यक नियन्त्रण रहैछ आ ताहि के लेल अन्य राज्य स, विदेश स सम्बन्ध स्थापित क सकैअ ।

(छ) ओहि राज्यक प्रमुख भाषा प्रशासन, न्यायिक क्षेत्र आदि मे निर्वाध रुपमेँ प्रयोग क सकैअ जहि स राज्यक जनता सामाजिक न्याय, मानवीय विकास स वंचित नहि भ सकैअ ।

(ज) अपन मातृभाषा, स्वत ः कायम भेल सम्पर्क भाषा, ग्रहित शिक्षाक भाषाक सुविधा भेल स प्रशासनिक, शैक्षिक वैदशिक सुरक्षा सेवा आदि मे निक संख्या मे राज्यक युवा, शिक्षित वर्ग प्रवेश होएत ।

(झ) कोनो खास प्रजातिक, राष्ट्रक, जातिक, जनजातिक, भाषाभाषिक, धार्मिक, सांस्कृतिक समुदायक इतिहास, संस्कृति, भाषा, भेष, कला , साहित्य, परम्परा केँ सरक्षण आ सम्बर्धन कए पहिचान के सुनिश्चत आ सुरक्षित करबाक लेल ।

(ञ) कोनो प्रजातिय, जातीय, धार्मिक, भाषिक समुदाय के दोसर वर्ग स शोषण दमन स मुक्ति के लेल ।

(ट) पृथकवादी आन्दोलन के रोकवाक लेल ।

(ठ) एकात्मक राज्य व्यवस्था परुर्ण रुप स असफल भगेल अछि । तै संघीय संरचना आवश्यक अछि ।

९. संघीय संरचनाक आधार ः–

संघक भीतर राज्यक संरचना क आधार निम्न होइछ

(क) ऐतिहासिक रुप स निर्मित राष्ट्र (…..–जाति ) के आधारपर
(ख) प्रकृतिक रुपस निर्मित भूखण्डके आधार पर ।
(ग) जातीय वाहुल्यता के आधारपर
(घ) धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदायक अधार पर
(ङ) संस्कृति के आधार पर अथवा सांस्कृतिक सामिम्प्यता के आधार पर ।
(च) भाषा क आधार पर
(छ) प्रकृतिक सम्पदाक आवण्टन के आधार पर ।
(ज) विकसित नया अवस्था, सोचक, आधारपर ।

१०. एहि आधारसभ के देखैत आ नेपालमेँ चलैत जातीय आन्दोलन सभ केदेखैत आ ओकर मांग सभ के देखैत नेपालके निम्न संघीय राज्यमे विभाजित कएनाई आवश्यक छै ः–

(क) लिम्बुवान किरांत राज्य
(ख) खुम्बुवान
(ग) नेवा राज्य नेवार राज्य
(घ) तामाङ साम्बलिंग
(ङ) तमुवान गुरुङ राज्य
(च) मगरात मगर राज्य
(छ) खसान खस राज्य
(ज) थरुहट थारु राज्य
(झ) अवध अवधी राज्य
(ञ) भोजपुरी भोजपुरी
(ट) मिथिला मिथिला (विदेह)

संघीय विधाजनक लेल नया, तथ्यपूर्ण जनगणना आवश्यक अछि, आ ऐतिहासिक रुप स वसल जाति के सामुहिक निर्णय के आधारपर राज्यक नामाकरण कएनाई आवश्यक अछि ।

सम्पूर्ण नेपाल मे खस जातिक मिश्रित अवस्था भेलो स कोनो जातीय क्षेत्रक इतिहास आ ओकर भावना नहिं मेटाएल अछि ।

११. मिथिला – संघीय संरचनामे मिथिला राज्य किएक चाहि ः–

(क) मिथिला प्राग्ऐतिहासिक भूमि अछि आ पुराणवर्णित देश अछि ।
(ख) मिथिला आर्यजातिक आधार क्षेत्र आ आर्य संस्कृतिक निर्माण भूमि अछि ।
(ग) कोशी गण्डक, गंगा, हिमालय के विचमेँ स्थित ई भूमि निश्चित भूखण्ड प्राप्त कएने अछि ।
(घ) ऐतिहासिक कालखण्डमे एकरापर अनेक आक्रमण होइतोमे ई आर्य जातिक वाहुल्यताक क्षेत्र छै ।
(ङ) एकर अपन वहुत समृद्ध संस्कृति छै ।
(च) एकर भाषा हजारौं वर्ष पूर्वक इतिहास देखवैत अछि आ वहुत समुद्ध अछि ।
(छ) मिथिला गणराज्यक इतिहासक साक्ष्य अछि ।
(ज) एकर खस आर्थिक जीवन प्रणाली छैक ।
(झ) सामुहिक, देवी देवता स ल “क” पारिवारिक देवता प्रति आस्थाक संस्कार छै ।
(ञ) मिथिलामे अखनो लोक निर्मित, नियम कानून छै समग्रमेँ मिथिला के एकटा सझिया मनोभावना छैक जाहिस ई एकटा राष्ट्र छै आ एकरा संघीय संरचनामे राज्य होएबाक पूर्ण नैसर्गिक अधिकार छै ।

११…..

(क) मिथिलाक सम जातीके, राजनीतिमे, प्रशासनमे समानुपातिक उपस्थिति के लेल ।
(ख) उद्योग, कृषि, पर्यटन, जंगल, जल सभ स अधिकतम् लाभ, लेबाक लेल ।
(ग) नदी नियन्त्रण, सिंचाई सडक वाँध, विद्युत आदि के लेल संघीय सरकार स आ विदेश स सम्बन्ध स्थापित कए मिथिला वासी के उत्थान लेल ।
(घ) मिथिला स उठाओल कर … के उचित व्यवस्थापन कए राज्यक द्रुत विकाश केल ।
(ङ) मिथिलामे प्रयोग होइत सभ भाषा मे सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालय सभमेँ कामकाज करवाक लेल ।
(च) सरकारी सेवामे कामकाज करबाक अवसर के लेल । अर्थात वेरोजगारी समस्या समाधानमे सहयोग कएवाक लेल ।
(छ) मिथिलाक पावनि तिहार मे छुट्टि पएवाक लेल ।
(ज) मिथिलाक दलित, उत्पीडित, पिछडल वर्ग, जनजाति आदिवासी, महिला, अल्प संख्यक केँ लेल विशेष अवसर के लेल ।
(झ) मिथिलाक लोकगाथा (सहलेश, लोरिक) लोकनृत्य लोकधुन लोककला, लोकगीत, लोकनाट्य आदि के रक्षा आ प्रचार प्रासरक लेल ।
(ञ) पौराणिक मिथिलाक राजधानी जनकपुर सहित मिथिलाक एक खण्ड, एकर लिपि, साहित्य भाषा, संस्कृति जीवन शैली सभ जीवित अछि तै रक्षाक लेल आ विश्वस्तर मे एकर सभ्यताके, विशेषताके फैलावक लेल ।
(ट) नेपाल मे भेल कोनो लोकतान्त्रिक आन्दोलन, जातीय मुक्ति के आन्दोलनमे मिथिलाके अग्र, उग्र भूमिका रहलैक, सपूत वलिदान देल कै तै संघीयता के लेल अधिक रक्त श्राव रोकवाक लेल ।

१२. मिथिला राज्यक सीमा ः–

(क) प्राचीन, मिथिलाक सीमा छलैक –उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूर्वमे कोशी, पश्चिम मे गंडक । ई मिथिला १८१६ क सुगौली सन्धि पश्चात् खंडित भेल । अखन एकर जीवित भूगोल पर जीवित इतिहास छै, जीवित लिपि भाषा, जीवित संस्कृति जीवन्त जिवन शैली, जीवन्त मनोभावनाक अधिकार अनुसार सीम्रौन गढ स पूर्व, झापा स पश्चिम महाभारत पर्वत श्रृंखला स दक्षिण आ नेपाल भारत वीचक सीमा स उत्तर मिथिला छैक, आ मिथिला राज्य होएबाक चाहि ।

(ख) झापा मधेश मे रहितो मे एत सतार, राजवंशी जनजातिक बसोवास छैक, आ ओकर अपन इतिहास, संस्कृति, मांग आ संघर्ष छै तै ओतए, नव आगन्तुक खस भाषी के छोडि ओकर सभके आत्म निर्णयके अधिकार अनुसार मिथिलामेँ समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए ।
(ग) वारा, पर्सा भोजपुरी भाषाक क्षेत्र छै । मैथिली भाषा स फरक छै परन्तु एकर संस्कृति, आर्थिक जीवन मिथिला के समान छै । खसवादी सत्ताके दृष्टिकोण व्यवहार एकरो प्रति ओहने छै तै एकरो आत्मनिर्णय के आधारपर मिथिला मे समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए ।

१३. मधेश आ मिथिला ः–

(क) मेची स महाकाली तकके सम्पूर्ण समतल मूमि – मधेश एकहि सत्तास दमित अछि, दलित अछि, उत्पीडित अछि, प्रताडित अछि, उपेक्षित अछि । सम्पूर्ण मधेशी एकहि मनोविज्ञान एकहि मनोदशा लक जीवित अछि । एकरा प्रतिक शोषणक स्वरुप समान छैक तै तकर संघर्षक निशाना एकहिटा भाषीक वर्ग छै ।
(ख) खस प्रभुत्ववादी सत्ता, मैथिली , भोजपुरी अविधि कहिक उपेक्षा, अवहेलना नहि करे छै समष्टिमे मात्र मधेशी कहै छै ।
(ग) थारु जातिके खस शासक पहाडी नहि बुझै छै आ थारु अपना के मधेशी बुझ स भय महसुस करै छै । तथापी ओ संघीयता के संघर्षमे प्रमुख शक्ति भसकै छै । आ इएह सोच स मधेशमे वसल प्रत्येक जनजाति, द्रोणवार, सतार राजवंशी, झागड सभके देखनाइ आवश्यक छै आ ओकरा सबके एहि संघर्षमे स्थापित कएनाई आवश्यक छै ।
(घ) मधेशक आन्दोलन खस सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन छै आ मिथिलाक आन्दोलन माथिक, सांस्कृतिक, जातीय आन्दोलन निहित राजनीतिक अन्दोलन छै तै संघीयता के आन्दोलन के अन्तरवस्तु लेने छै ।
(ङ) मधेश आन्दोलन केन्द्र स्थल मिथिला क्षेत्र रहैत अछि आ मानव अधिकार राजनीतिक अधिकरा प्राप्तिके आन्दोलन के केन्द्र सेहो मिथिला क्षेत्र रहैत अछि । तै मधेश आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडनाई आ मिथिला आन्दोलन के मधेश आन्दोलन के रुपमेँ विकसित कएनाई रणनीतिक सोच राखव आवश्यक छै ।

१४. मिथिला आ गणतन्त्र ः–

मिथिला राज्यक लेल अथवा मिथिलाक मुक्तिके लेल नेपालमे संघीय शासन आवश्यक शर्त छै । संघीय शासन के लेल गणतन्त्र आ लोकतन्त्र आवश्यक शर्त छै आ अन्तत ः लोकतन्त्र के स्थापनाके लेल, एकर सशक्तता के लेल, एकर दीर्घायु के लेल गणतन्त्र आवश्यक छै ।

१. गणतन्त्र – जन्मक आधारपर विशेषाधिकार सहित शासक विना के शासन पद्धति सत्ताक स्वरुप के गणतन्त्र कहैत छै । सार्वभौमिक जनता जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र प्रमुख निर्माणक पद्धति के गणतन्त्र कहैत छैक अर्थात् राजा विना के शासन पद्धति ।

२. नेपाल गणतन्त्रात्मक देश हाएवाक चाहि – कारण ?

(क) कथित एकिकरण वलातु सैनिक वल स हिंसा द्वारा भेल छै ।
(ख) राजतन्त्रक मूल चरित्र निरंकुश, निर्मम, अत्याचारी होइत आएल छै ।
(ग) सत्तामे ,सेनामे, प्रशासनमे, न्यायलयमे दमनकानरी नीति स पकड वना क आम वर्ग केँ निर्मम शोषण दमन करैत छै ।
(घ) कोनो प्रकारक, नया सोच, वैज्ञानिक चिन्तन जनअधिकार आ प्रगति विरोधि भेनाई राजतन्त्रक मूल ऐतिहासिक चिन्तन आ चरित्र छै ।
(ङ) एक देश–एक राज्य, एक राज्य –एक राष्ट्र, एक राष्ट्र – एक जाति, एक जाति – एक धर्म, एक धर्म – एक संस्कृति, एक संस्कृति– एक भाषा, एक भाषा – एक भेष आदि प्रकारक निरंकुश एकात्मक नीति लैत आएक छै ।
(च) लोकतन्त्रके स्थायित्व, मानवअधिकारक वहाली, कानूनी राज्यक स्थापना स्वतन्त्र, न्यायपालिका के लेले राजतन्त्र उच्छेदन आवश्यक छै ।
(छ) जनतके बलीदानी संघर्ष स आएल लोकतन्त्र के साथ सदा घोर षडयन्त्र करैत आएल छै ।
(ज) निम्न जाति आ वर्ग के सन्तान दुर राखि दानवीय व्यवहार कएनाई के दैविक अधिकार बुझै छै ।
(झ) कोनो प्रजाति जाति , जनजाति, भाषाभाषी के पहिचान के दमन करैत आएल छै आ दमन मे सेना, प्रशासन, अदालत, मातृहन्त केँ प्रयोग करैत आएल छै ।
(ञ) मधेशी के सदा विदेशी सावित करै मे व्यस्थ रहै त आएल छै ।
(ट) मिथिला के साथ वहुत वडका धोखा, षडयन्त्र, गद्दारी करैत आएल छै , जहन मिथिलाक सेना स सहयोग ल क भंग कए देने छै ।
(ठ) जातीय अधिकार के सुनिश्चित, सुरक्षित रखवाक लेल आवश्यक संघीय संरचनाके स्थापनाक लेल गणतन्त्र आवश्यक छै ।

१५. सघीयता आ वर्गीय आन्दोलन ः–

किछु राजनीतिक आ बौधिक वर्गमे भ्रम रहैंछ आ भ्रम श्रृजना करैछ जे संघीय आन्दोलन वर्गीय आन्दोलनकेँ कमजोर करैत छै आ संघीय आन्दोलन जातीय सम्प्रदायिक सद्भाव के दूषित छै । मुदा ई भ्रम मात्र अछि । शोषण के स्वरुप आ गति जतेक स्पष्ट आ तीब्र होइछ आ वर्गीय आन्दोलन के गुण लैत जाइत अछि आ सम्पन्न वर्ग आ “सभ्य” जाति के भितर निर्मित शोषण आ शोषितक चरित्र लबैत अछि त ओ मात्र अधिकार आन्दोलन नहिं, जाति, क्षेत्र हितक आन्दोलन मात्र नहिं मानव विकाशके क्रम मे भेल वर्गीय आन्दोलन अछि । (आ कोनो वर्गीय आन्दोलनकारी के संघीय आन्दोलनके समर्थन करबाक चाहि) मिथिला आन्दोलन सेहो वर्गीय आन्दोलन अछि जतए एकटा राष्ट्र, समृद्ध संस्कृति, भाषा, साहित्य, शोषण आ दमनके शिकार अछि ।

१६. मिथिला आ जातीय आन्दोलन ः–

जाति स्वरुप, चरित्र, इतिहास, आ ओहि जातिपर होइत शोषण दमके मात्रा, जातीय आन्दोलनके दिशा र स्वरुप निर्धारण करैछ । (सामाजिक संरचनाके भित्ररके विभिन्न जातिकै तह, हिन्दु धर्माबलम्बीके विभिन्न जातपर होइत भेदभाव, आ शोषण सेहो आन्दोलन के समय आ स्वरुप निर्धारण करैछ । तथापि छोट आ सामयिक अन्तर विरोध एकर मुख्य आन्दोलन के असर नहिं क सकैछ आ प्रधान अन्तर विरोध के समाधान मात्र ओहि अन्तर विरोध के समाधान क सकैछ । मिथिलाके भित्तरकेँ विभिन्न द्वन्द्व मुख्य द्वन्द्व के समाधान कर में आएल वाधा राजनीतिक वैचारिक आन्दोलन के मार्फत मात्र अन्त्य कएल जाए सकैछ ।

१७. मिथिला आ जनजातीय आन्दोलन ः–

जनजाति स्वतः शोषित दमित आ अविकसित होइत अछि । ओकरा पर सदियौं स शोषण भ रहल अछि । मुदा आब आहो अपना अधिकार के लेल अनवरत संघर्ष क रहल अछि । नेपालमेँ जनजाति कोनो विकसित आ कोनो अविकसित अछि । दुनु के स्वायत्तता चाही । किछु जनजाति सैनिक प्रहरी सेना स जुडल अछि । मुदा अधिकारस वंचित । ओ पहाड मे आ मे आ मधेश मे सेहो अछि । मधेशक आन्दोलन दुनु के अधिकारके लेल कएल संघर्ष मे सहयोग कएलक अछि । मिथिला क्षेत्र मे जे जनजाति अछि तकरा मिथिला राज्य समानुपाति अधिकारस वंचित नहिं करत से ओकरा विश्वास नहिं भैरहल छै आ पहाडके जनजाति स मिथिला तथा मधेश आन्दोलन के निक जकाँ नहिं जोडल जा रहल अछि । दुनु ठामक जनजाति के विश्वास मे लेनाई आवश्यक अछि ।

१८. मधेश, मिथिला आ थारु आन्दोलन ः–

जनजाति में थारु क संख्या वेसी छै आ मात्र मधेश में लगभग पूर्व स पश्चिम तक अधिकांश जिल्लामें । ई जाति अलग पहिचानक जाति छै क एकर अपन भाषा आ किछु संस्कृति अलग छै । जाहि क्षेत्र में स्थित छै ताहि ठामक भाषा स जुडल छै । शारिरिक बनौट मंगलाइड सन छै मुदा सांस्कृतिक सम्बन्ध मधेश के साथ जुडल छै । ई स्वतन्त्र आन्दोलन नहिं क सकैअ आ मधेशी आन्दोलन स जुड स डराइछै । मधेशी आन्दोलन के अंगा खस सत्ता एकरा प्रयोग करै छै । कहिओ आ कोनो आन्दोलन के विरुद्ध में उतारि दैत छै । वहुत सज्जन जनजाति भेला के कारण ई आसानी स ओहि षडयन्त्र में फंसि जायत छै आ मधेश आ मधेशी कें विरुद्धमे ठाढ भ जाइत छै । एकरा जनजाति आन्दोलन स निक जकाँ जोडनाई वहुत जरुरी छै, तहन एकरा मिथिला आन्दोलन में समानुपाति अधिकार आ समानुपाति अधिकार क्षेत्र के लेल विश्वास में ल एकर विश्वास प्राप्त केनाई आवश्यक छै ।

१९. नेपालक मिथिला आ भारतक मिथिला ः –

सुगौली सन्धि मिथिला के दु खण्डमें त वांटि देलक, मुदा राजनीतिक सीमा स मिथिलाक भाषा, संस्कृति साहित्यक सम्बन्ध नहि तोडि सकल । आई दुनु देशमें मिथिला राज्यक मांग उठि रहन छै । अइस हुनु देशक शासक वर्ग के किछु भय भरहल छै । दुनु देशक मिथिला आन्दोलन के भावनात्मक सम्बन्ध छै आ दुनु के नैतिक समर्थन छै जे नैसर्गिक छै । दुनु राजनीतिक स्वतन्त्रता कायम राखए चाहैछै, दुनु अखण्डता के सम्मान करै छै । ई वात दुनु देशक सत्ता के वुझक चाही आ हमरा सभ के कर्तव्य जे दुनु सत्ताके बुझा देवक चाही । संघीय संरचनामें दुनु मिथिला अलग अलग राज्याधिकार चाहेछै, जेना वंगाल, पंजाव इत्यादि वंगला देशकें आ पाकिस्तान में सेहो छै ।

२०. आत्म निर्णय के अधिकार आ मिथिला ः–

व्यक्तिगत, जातिगत क्षेत्रगत, राष्ट्रगत रुपमें स्वतन्त्र पहिचानकें साथ राजनीतिक प्रशासनिक निर्णय के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकार अछि । आर्थिक जीवन अपने शैली में संचालन केनाई आत्मनिर्णय के अधिकार क्षेत्र छै, अनुशासित स्वतन्त्रता के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकारके मूल मर्म छै । कोनो व्यक्ति दोसर व्यक्ति पर, कोनो जाति दोसर जाति पर कोनो राष्ट्र दोसर राष्ट्र पर अनाधिकार के प्रयोग कएनाई के पूर्ण नियन्त्रण आत्मनिर्णयक अधिकार कै । क्षेत्रीय, जातीय, राष्ट्रिय दमन, शोषण, शासन, प्रशासन स मुक्ति के अधिकार मात्र आत्म निर्णय के आत्म निर्णायक अधिकार छै ।
मिथिला एकटा स्वतन्त्र ऐतिहासिक राष्ट्र छलै तै एकरा आत्मनिर्णय के अधिकार छै, जे राजनीतिक सीमा मे प्रशासनिक शासकीय दमन स मुक्त होएक ।

२१. मिथिला आ जातीय स्वायत्तता ः–

सीमित राजनीतिक आर्थिक अधिकार सहित के खास क्षेत्र में खास जाति अर्थात राष्ट्र के प्रादेशिक शासन के जातीय स्वायत्तता कहल जाइछै । ई आत्म निर्णय के अधिकार के अर्ध तथा नियन्त्रित प्रयोग छै । आत्म निर्णय के अधिकार के स्वायत्तता में घेर देनाई आ स्वायत्ततताके जातिगत रुपमें प्रयोग केनाई अव्यवहारिक छै खासक मिश्रित सामाजिक संरचनाके देशमें आ क्षेत्रमें । मिथिला संघीय संरचनामे पूर्ण राज्यधिकार प्रयोग करए चाहैत अछि कोनो केन्द्रीय सत्ता स निर्धारण कएल सीमित अधिकार सहित कें कथित स्वायत्तता नहिं ।

२२. मिथिला आ दलित आन्दोलन ः–

ई हरेक दमन आ उत्पीडन स मूक्ति के युग छै । राजनीतिक आर्थिक शोषण मात्र नहिं, सामाजिक उत्पीडन स मुक्ति के लेल प्रत्येक देश में, प्रत्येक राष्ट्र मे, प्रत्येक समाज में आन्दोलन तीव्र भगेल छै । एकरा समयमे स्वीकार कएनाई प्रत्येक लोकतन्त्रवादीके कर्तव्य छै । सामाजिक न्याय उपलब्ध करबैत राजनीतिक रुपमे प्रत्येक अंग में सम्मानपूर्वक उपस्थित कएनाई राज्य के कर्तव्य छै । मिथिला स्वयं उपेक्षित उत्पीडित अछि । तैं एकरा कतहु के दलित आन्दोलनके हार्दिक समर्थन सहयोग करैत मिथिलाक दलित मुक्तिके आन्दोलन में सामेल होइत, ओकर अगुवाई करैत मिथिला राज्य के स्थापना में गति स अगा बढत ।

२३. मिथिला आ राजनीतिक दल ः–

देशमें वर्तमान में सकृय राजनीतिक दल सभ मे संघीय संरचना के विषयमे स्पष्ट धारणा वाहर नदि आएल अछि । संविधानत ः स्वीकार कएले पर एहि विषय मे पार्टीक संघ विरोधी धारणा बाहर अवैत अछि । संघीय संरचना बनाएब, ताहिमे कपटपूर्ण अभिव्यक्ति अबैत अछि । किछु दल के नीति इ रहि आएल अछि जे सम्पूर्ण मधेश के एकटा राज्यके रुपमे आवक चाही । ई संघीय मान्यता नेपाल मे कतेक व्यवहारिक हेतै ? पौराणिक मिथिला के संशोधनसहित के एकटा राज्य बना कए मधेश में अन्य राज्य सेहो उपयुक्त होएत । हरेक क्षेत्र के आन्दोलित कए समग्र मे मधेश के खसवादी प्रभुत्व स मुक्त कएल जा प्रत्येक दल आ कथित वुद्धिजिवी संघीय संरचना के स्वीकार करैत, मुक्त मधेश के मान्यता दैत मिथिला राज्यके स्थापना मे सहयोग करैक, ईहए संघीय मान्यता अनुकुल हेतै ।

२४. मिथिला आ महिला आन्दोलन ः–

मिथिला सदा नारी के सम्मान करैत आएल अछि । तै नारी अधिकार के कुण्डित नहिं कए सकैअ । महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण द्वारा महिला आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडिक ल जेनाई जरुरी छै । किछ दशक स मिथिलाके महिला के अनावश्यक अन्तरमुखी वनावल गेल छै आ एहि मे नेपालक जडिआएल सामन्ती सामाजिक राजनीतिक व्यवस्थाक खास भूमिका छै । तैं मिथिला के लोकतान्त्रिक राज्य निर्माण मे अधिकार सम्पन्न महिलाके भूमिका अति आवश्यक छै ।
२५. मिथिला आ कथित पिछडल आ आगा बढल वर्ग ९ द्यबअपधबचम ायच धबचम ० ः–
मिथिलाक डोम सेहो सम्पत्तिशाली छल । एकरा साथ अछुत क व्यवहार नहिं छलै । गणराज्यक नायक जनकक कालमे समतामूलक समाजक प्रमाण भेटछ । तथापि मिथिला एकटा देश छल जतए सब जाति जातक बसोबास स्वभाविक छल आ अछि । अखन लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे सभ जाति जातके समानुपातिक समावेशीकृत उपस्थिति मिथिला राज्यके प्रत्येक अंग आ निकाय में रहत से घोषित नीति अछि । मिथिला कोनो एकटा जाति के नहिं, कथित उच्च जाति के कथमपि नहिं । योग्यता क्षमता अनुसार समानुपातिक रुपमें सहभागी केनाई आवश्यक अछि । इएह मिथिला निर्माण के आधार रहत ।

२६. मिथिला आ मानक मैथिली ः –

मानव शास्त्री आ भाषा शास्त्रीक अनुसार केव भाषा नहिं बजैअ, सब बोली ९मष्बभिअतक० बजैअ । समरुप बोली के समग्र रुप भाषा होइछ । मुदा जाहि बोलीक बेसी संचार होइछ जाहि बोली मे विशेष रचना प्रकाशित होइछ, जाहि बोली के बेसी पाठक होइछ जाहि बोलीक व्यक्ति सत्ता पर नियन्त्रण करैछ जाहि बोली द्वारा प्रकाशन, न्याय सम्पादन होइछ, जाहि बोलीके विद्धान व्याकरणक रचना करैछ, वएह बोली भाषा बनिक समाजपर प्रभाव पारैत अछि । तै कोनो बोली कथित उच्च वर्गके भए सकैछ, तै ओकरा मानक भाषा बुझनाई ओतेक उचित नहिं आ अइस कोनो जाति के राज्ययन्त्रपर नियन्त्रण के शंका केनाई उचित नहि । तै मिथिला में वर्तमान में वाजए जाए बाला प्रत्येक बोली के सम्मान करत, सभ भाषाके सम्मानकरत आ वहु भाषिक नीति राखि राज्य संचालन करत ।

२७. मिथिला राज्य स्थापना के लेल नीतिगत कार्यक्रम ः–

(क) जनता, लोकतन्त्र, मानवअधिकार के विरोधी, जाति, भाषाक अधिकार के प्रधान शत्रु राजतन्त्र अछि । तै जनताके मित्र शक्ति लोकतन्त्रवादी, मानव अधिकारवादी, कानूनी राज्यक पक्षधर आदि शक्ति आ संगठन स मिलक गणतन्त्र लएवाक लेल अथक संघर्ष आवश्यक छै ।

(ख) प्रत्येक जाति, जनजाति, आदिवासी, दलित उत्पीडित वर्ग पिछडल वर्ग, अल्प संख्यक जाति, मानव अधिकरावादी सबस मिलक, संघीय संरचना केल कठोर संघर्ष आवश्यक अछि ।

(ग) मधेशक प्रत्येक जाति, जनजाति, भाषा भाषीक समुह, महिला मुस्लिम सभके साथ कार्यगत एकता करैत खस सत्ता स सम्पूर्ण मधेश के मुक्त कएनाई बेसी आवश्यक छै ।

(घ) संघीय संरचनाक मर्म, भावना अनुसार मधेशमे आत्म निर्णायक आधार पर मिथिला क्षेत्रक प्रत्येक वर्ग के आन्दोलित कए मिथिला राज्यके लेल सहमति जुटएनाय आवश्यक अछि ।

२८. कार्यदिशा ः–

१. संघीय संरचना विना मुक्त मधेशक कल्पना तथा मुक्त मधेश विना मिथिला राज्यक कल्पना असम्भव होएत से बुझि चेतना मूलक कार्यक्रम सम्पूर्ण मधेशमे आवश्यक अछि ।

२. खस सत्ता वर्गिय समुदाय के दिमाग स ई भय हटैनाई जरुरी छै आ चेतना देनाई जरुरी छै जे कोनो जाति, भाषा के संरक्षण, सम्मान संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । जन अधिकार सम्पन्न लोकतन्त्र संघीय संरचनामे मात्र संभव छै ।

३. कोनो सत्ता, दलीय सरकारक निरंकुशता के न्यून करवाक लेल संघीय संरचना मात्र आधार छै ।

४. संघीय शासन प्रणाली सं देश खण्डित नहिं होइछ । अर्थात संघीय शासन देश के विखण्डन स बचवैत अछि । अर्थात् संघीय संरचना विखण्डनवाद के स्थायी समाधान अछि ।

२९. मिथिला राज्य निर्माण वाधक चिन्तन ः–

अन्तरिक

१(क) मिथिला के लेल कोनो राजनीतिक संगठन नहि अछि । आ एहके लेल कोनो संघर्ष नहिं अछि ।
(ख) भाषा संस्कृति करे लेल कोनो एकिकृत संगठन नहि अछि ।
(ग) कोनो स्थापित नेतृत्व नहिं अछि ।
(घ) भाषा, संस्कृति के आन्दोलन के लोकतान्त्रिक आन्दोलन, मानव अधिकार वादी आन्दोलन स जोडक, लएजवाक चिन्तन या प्रयास नहिं अछि ।

(ङ) एहिके लेल किछ भ रहल आन्दोलन, वौद्धिक व्यक्तित्व सभक मात्र अछि, जिनकामे स्वाभिमान कम, अहंकार वेसी, संयोजन करवाक क्षमता कम फुट करवाक क्षमता वेसी छन्हि ।

वाह्य

(क) खस जाति समग्र संघ के विरोधी चिन्तन रखैत अछि अपना के सदा केन्द्रीय सत्ताके भागी बुझैछथि आ नेपाल के अपन पुर्खा के अर्जन सम्पत्ति बुझै छथि ।

(ख) समग्र मधेश एकराज्यक नारामे सत्ताधारी वर्ग विखण्डन के गंध देखैत अछि आ मिथिला तथा संघीय संरचना के विरुद्ध सोचेत अछि ।

(ग) संघीय आन्दोलन के नेतृत्व कएनिहार, दल या व्यक्ति के हिन्दी भाषा प्रति आसक्ति स मातृभाषा प्रेमी विचकैत छथि आ खसवादी सेहो एहिमे किछु रहस्मय दुर्गन्ध सुंधवाक प्रयास करैत अछि ।

निश्कर्ष ः–

नेपाल के सत्ताधारी, वर्ग संकट के घडि स गुजरि रहल अछि । देश अखन अधिकार प्राप्तिकँ नयाँ मोडपर ठाढ अछि । अधिकार स वंचित उत्पीडित वर्ग, जाति आन्दोलनमे कुद पडल अछि । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र माग एकर अचूक औषधि छेक । प्रत्येक प्रभुसत्तावादी सामन्ती चिन्तन एहि आन्दोलन के पाछा धकेल चाहैत अछि आ आन्दोलन ओकरा किनार पर खसवैत आगा बढि रहल अछि । आउ, समाजक स भ वर्ग, आन्दोलन मे भाग लिअ आ नैसर्गिक अधिकार स्थापित करु ।

शीतल झा
जनकपुर

सन्दर्भ सामाग्री ः–

(क) संविधानसभा, संघीय संरचना, मिथिला राज – अवधारण १– शीतल झा
(ख) संघीय स्वशासन तिर ……………वृषेश चन्द्र लाल
(ग) संघीय शासन व्यवस्थाको आधारमा राज्यको पुन ः संरचना – अमरेश नारायण झा
(घ) मूल्यांकन मासिक ।
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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