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विदेह १ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २१-part-ii

In विदेह १ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २१ on जनवरी 13, 2009 at 4:47 अपराह्न

विदेह १ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २१-part-ii

३.पद्य
३.१.१.रामलोचन ठाकुर २.निमिष झा ३. जितमोहन झा
३.२. १.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (छठम खेप)२. श्यामल सुमन
३.३. १.राजेन्द्र विमल २.रेवतीरमण लाल ३.दिगम्बर झा “दिनमणि”४.बुद्ध-चरित
३.४. १.रूपा धीरू २.ज्योति
३.५. १.विद्यानन्द झा २.नवीननाथ झा ३.विनीत उत्पल
३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३. विभूति
३.७. १. रामभरोस कापड़ि २. रोशन जनकपुरी ३.पंकज पराशर
३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी
१.रामलोचन ठाकुर २.निमिष झा ३. जितमोहन झा
श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)।
पास करबाक लेल

उत्तर पुस्तिका आपस रखिते
पुछि बैसैत छथि मैम
अर्धवसना बाब्ऽकेशी
वय विलम्वित नवल वेशी
सोनाक वर्ग शिक्षिका-
देखलहुँ, बड़ कमजोर अछि नेना अहाँक
कने नीक जकाँ करिऔक गाइड…

– कमजोर त ई नहि अछि मैम
आ जहाँधरि छैक बात करबाक गाइड
से स्कूल त ताही लेल पठाओल जाइत अछि
अंग्रेजीक एक पत्र मे पचासी
आ दोसर मे किएक अबैत छैक पचीस
सोचबाक बात इहो की नहि थिक?

विहुँसैत बजैत छथि मैम
पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृतिक सेविका
वैश्वीकरण मेनका-
खाता त देखबे कएल
लिखने अछि मात्र दूटा पेज

-तें ने कहल हम
कमजोर ओ नहि अछि
पढ़बैत छिऐक स्वयं हम
लिखबे नहि कएलक
से बात भेल अन्य
परंच एहिठाम नम्बर नहि देल गेलैक
से भेल नहि बोधगम्य…
ओहिना बिहुँसैत पुछैत छियनि हम
देखबैत पुस्तिकाक पंक्ति विशेष

आश्चर्य चकित सन भेल कहै छथि मैम-
गलती लिखने अछि
संयुक्त परिवार सुखी परिवार!
– त एहि मे गलती की छैक?
रिक्तस्थान मे ओ लिखि देलक संयुक्त
मैम, संयुक्त परिवार आ
बसुधैव कुटुम्वकम् केर संस्कारमे पालित
हमर पौत्र केना लिखि पाओत
छोट परिवार नीक…

– मुदा
– पोथी मे सएह छैक
इएह ने कहब अहाँ
आ पास करबाक लेल
उएह सिखए पड़तैक
आर की-की सिखए पड़तैक एकरा
जिनगी मे करबाक लेल पास?

मैम चुपचाप निहारैत रहि जाइत छथि
हमर मुह निर्निमेष
विदा लैत छी हम
कहैत- वेश!!
(२६.१०.२००८)
हर्जे की

चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की।
आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥
आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी।
आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥
शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ।
शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥
देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स।
संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥
सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ।
राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥
रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ।
जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥
गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण।
मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥
नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा।
देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥
(२६.१०.२००८)
किछु क्षणिका (हाइकू)
१.भोजक पान
सासुरक सम्मान
पुनिमाक चान
२.हाथीक कान
नटुआक बतान
एक समान
३.दूरक चास
गामक कात बास
कोन विश्वास
४.बाँझीक फूल
महकारीक फल
के कहै भल
५.दादुर-गान
डोकाक अभियान
वेथे गुमान
६.हिजरा-नाच
ओकिल केर साँच
की ६ की पाँच
(२६.१०.२००८)
२. निमिष झा

हाइकू

चाँदनी राति
नीमक गाछ तर
जरैछ आगि।

गरम साँस
छिला गेलैक ठोर
प्रथम स्पर्श।

परिचित छी
जीवनक अन्तसँ
मुदा जीयब।

बहैछ पछबरिया
जरै उम्मिदक दीया
उदास मोन।

पीयाक पत्र
किलकिञ्चत् भेल
उद्दीप्त मोन

श्रम ठाढ़ छै
श्रमिक पड़ल छै
मसिनि युग।

मृत्युक नोत
जीबाक लेल सिखु
देब बधाइ।
३.
जितमोहन झा घरक नाम “जितू” जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि।
दिलक कलमसँ पॉँच गोट शेरो शायरी (भाग-१)

चाँदक लेल सितारा हजार छैन !
मुदा सितारा के लेल चाँद एक !!
ओहिना अपनेक लेल हेता हजारो !
मुदा हमरा लेल अहि सिर्फ एक !!

हाथक लकीर पर एतवार क लेब !
भरोसा हुवेंतँ हर हदकेँ पार क लेब !!
हरेब आर पेब सभ नशीवक खेल अछि !
दिल जिनका अपनाबे हुनकेसँ प्यार क लेब !!

दिलजे डूबलतs आशाके गाम आँखमs मचैल गेल !
एक चिराग की बुझल सौ चिराग जैल गेल !!
हमर आर हुनकर राह बस एतबे देर एक छल !
दुई कदम चललों की राहे बदैल गेल !!

नोरसँ पलक भींगे लैत छलो !
याद हुनकर आबैत अछितँ कैन लैत छलो !!
सोच्लों की बिसैर जै हुनका !
मुदा हर बेर ई फैसला बदैल लैत छलो !!

अपन आगाजसँ आजू तलक जिंदगी, अहिकें याद मs गुम छल !
तयों पता नै किये ई एहसास अछि, जेना की चाहत हमर कम छल !!

१. गगेेश गुंजन २. श्यामल सुमन
. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस “राधा” जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर “विदेह”मे गुञ्जनजीक “राधा”क पहिल खेप।-सम्पादक। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक पढबाक लेल बुधिबधिया, गुंजनजीक नाटक आइ भोर पढ़बाक लेल आइ भोर आऽ गुंजनजीक दोसर उपन्यास पढ़बाक लेल पहिल लोक क्लिक करू। ( हुनकर पहिल उपन्यास “माहुर बोन”क मूल पाण्डुलिपि मिथिला मिहिर कार्यालयसँ लुप्त भए गेल, से अप्रकाशित अछि। गुंजनजी सँ अनुरोध केने छियन्हि जे जतबे मोन छन्हि, ततबे पाठकक लेल पठाबथि, देखू कहिया धरि ई संभव होइत अछि।)
गुंजनजीक राधा
विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल।
अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक ।
आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल-
जगमगाएल अछि। सुस्वागतम!
लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी।

राधा (छठम खेप)
प्राणाधार,
से ई सात इनार गहींर सं सबोधि रहलौंहें,
बचाब’ लोक लज्जा !
केहन ई मनक पराभव
ल’ सकी ने नाम अहांक पुकारि,
भ’ स्वच्छन्द
लोकक सोझां मे निर्धोख आ साधिकार,
सिनेहोक धरु केहन जरल कपार
केहन भेल हमरो अदृष्ट अपरम्पार ।
मन कोना बौआइत रहैत अछि
खुजल बाछी जकां एकसर बने-वन,
तकैत माय, यमुनाक काते कात,
हुकड़ैत व्याकुल भेल, वन-झांखुर सं चंछबैत देह
तकैत मायक नेह ,
दुखबैत कांच-कोमल सीप सन-सन खूर अपन,
आ मनुक्खक नेनेक ठोढ़ सन सुन्नर-सरस
चुम्बन ल’ लै योग्य कंपैत अपन शिशु-थुथून
ई सोचि मन लाजो करैये जे
केहन सन ई कामना हमरो बताहि,
अहां तं अहां भेलौं, हमर कोनो की माय अहा?
आ कि संतान हम आहांक,
ने हम बाछी ने अहां गाय, कोना आयल-ए,
भाव एहन हृदय मे, कत’ सं जानि नहि,
किछु ने ज्ञात, मुदा ई बात केहन दिव्य-विचित्र,
एखनहि भ’ रहल अनुभूतिक आनन्द जे
हम स्वयं छी गौ अहां हमरा पर ओंगठल ठाढ़ भ’
अपन परिचित विशेष भंगिमा मे
एक दिसि केने गर्दनि टेढ़
दोसर दिसि दुनू हाथें ध’ क’ मुनने आंखि,
लागल ठोर सं तन्मय भनें बंसुली रहल टेरि,
हमर से देह गायकेर आ अहांक आत्मीय पीठक,
इहो की संयोग केहन विचार,
ईह मुदा हमहूं छी कतेक बकलेल केहन बताहि
की सब भाव आबय आबि क’ अन्हर उठाबय,
हमर एहि असकर मनक पसरल
ब्रजक भरि आंगन
पड़ल सभ किछु जेना हो दुखित
हो उदास
जेना सुखा रहल हो कंठ कएक कए युग सं
प्रतीक्षा मे प्रतीक्षा मे अशाबाटी मे,
टंगल हो ताही पर गनि गनि क’ देह-प्राणक
एक-एक धुकधुकी
आयुक सभटा उत्कंठ सीदित क्षण!
सौंसे प्रकृति मे मात्र एक ई मन

इयेह टा गुम्म गीत गबैत मिलनक
भरि उमेरक वियोगी अंगना मे बैसलि,
कुसमय कान मे घोरैत कौआ कुचरबाक मधु बोल!
आशाक केहन तुन्नुक डोरि
तहि पर टंगल हमर शरीर भारी, तथापि
नहि टुटैये नहि टुटैये, धन्य आसक डोरि,
एहि चित्तक प्रतीक्षा आशाबाटीक ई
विलक्षण खेल देल सिखाय,
केहन कारी हृदय भेल, कृष्ण ?

किछु पड़ैये मन अहूं के एको मिसिया
एको मिसिया स्नेह ,सम्बोधन ?
अहीं कें टुटैत रहैत छल मुंह-
अनन्तो नाम ल क’ फुसफुसा क’ कहब ,
गे ब्रजवासिन छौंड़ी !आदिवासिन कत’ छलें नुकायलि?
कोन जंगल-पहाड़ मे भ’गेल रहें अलोप
भरि दिन, भ’ गेलौंहें अकच्छ तोरा ताकि-ताकि…
बा अचानक आबि पाछां कान मे कू-उ-उ क’ देब
ठोढ़ सटाय हमर जीवन कें देहक बाटे , भरि देब
तेहन दुर्लभ अलौकिक झुरझुरी सर्वांग, जे
बनि महातीर्थक भोरहरियाक दिव्य मंदिर
गनगनाय लागय भक्त सबहक अनवरत
बजाओल जाइत मंदिरक घंटी सं टनाटन
हमर सम्पूर्ण अस्तित्वे निनादित क’, पल खसिते
ने जानि सत्ते कत’ भ’ जाइत रही अलोप…
हमरा प्राण कें विकलताक एकपहिया टुटल
बएलगाड़ी पर बैसा क’ जेना कही-ताकू आब हमरा,
ताकि लिय’, हम छी कोन ठाम, कत्त ?
केहेन बैसलि शान्तचित्त हमरा, अनेरे
ई उपद्रव क’ कोना क’ दी अशान्त
अछि किछु एको मिसिया यादि, एकहु रत्ती मन ?
से कियेक हएत, आब ताहि सं अहांक कोन संबंध
तकरा सं कोन अहां कें काज,
विकल जे भेल, होइत रहओ।छटपटाइत रहओ,
अहांक नाटक अपन अगिला-अगिला दृश्य सबहक
करैत रहओ ओरियाओन, निरन्तर।
नव-नव निर्मम रसक अनुसंधान मे
लागल रही, बड़ दिव ।
कहां किछु लोक लेल चिन्ता
कोनो मुंहछुआओनो एक बेर “कियेक छौ मन हूस छौंड़ी” ?”
छौंड़ी !” नाम तं अछिये ने कोनो हमर राधा,
केहन मायावी केहन अभिनय असंभव लोक अहां यौ,
मोहि बैसब बेबस भेल अपनहि स्नेही, आप्तक
अनवरत करब हरान
हिनकर भ’ गेलय हिस्सक,
बड़े आबय मजा लोक के क’ विकल अस्थिर
कोनहुं प्रकारें क’ दी किछु बेचैन आ
अपने पार ।
नाटक अहुंक धरि अछि कृष्ण अपरम्पार,
हे सरकार !
कखनो उठितो अछि मनक महासागरमे अपनेक,
हमर नामक कोनो टा पोठीयोक तरंग ?

कत’ सं किछु छूटि जाइत छैक जीवन
कोन क्षण मनक महल ढनमना ढहि जाइछ
आ सब किछु बुझाय लागत-व्यर्थ,
होयवाक अपन किछु मतलब सौंसे पृथ्वी पर
भेटत ने तकने ,ने इच्छे रहत बांचल शेष जे
ताकी अपन से संसार ,
पछिलो पहर धरि छल अपने संग
मनक सजल सपना सब कें अप्पन मखमले सन
आस-विश्वासें भरल आंचर सं झारैत
ओकरा पर पड़ल अवहेला उपेक्षाक गर्दा
सस्नेह बड़ मने बहुत भावें भरल संपूर्ण
सभकें ल’ चल जाए उधिया जेना अनचोखे कोनो बिहाड़ि,
आंगन मे सुखाइत डोर पर कोनो आंगी जेकां
नहि जानि कोन दिशा आ कोन ठाम,
ने बूझल हो मुदा
बिसरबो ने हो संभव ओहि आंगीक अर्थ जे
नहि छल मात्र एकटा वस्त्र कुंडाबोर लाल
स्नेह सिंचित कोनो छुच्छे देहक झंपना
ओकर तानी भरनीक एक-एक ताग, तागक तंतु,
लालीक संग आयुक छन अनन्त
भरि भुवनक अनन्तो रंग-रस-भीजल
आ आंगी अंगिये नहि, ल कृष्णक स्पर्श
हुनके दिव्य आंगुर हाथ आ ठोढ़क कहैत किछु शब्द,
बजैत बंसुरीक ध्वनि-प्रतिध्वनि,
चेतनामे सतत लगबैत गुदगुद्दी
ओ छल स्वर्गिक क्षणक संगक स्पर्श
हुनकहि अमृत
ओएह छथि हमर पहिरन ,
कृष्णें पहिरने रही हम, उड़ा देलक जे बिहाड़ि
आंगनक डोरि सं नहि, जेना देहे सं,
भेल छी उघार ,लाजें छी नुकायल, भेलि दोबरि
एहि टटघर मंडैया मे,
जे अछि स्वयं दस ठाम सं भूरे भूर अपने उघार
हमर की देह झांपत, की करत लज्जाक रक्षा ?
कहै लेल तं अपने मड़ैया ई खास
मुदा सेहो भेल कोन कार्यक ,
मामूली विरड़ो-वसात सं पर्यन्त ने बचा सकल,
केहन अजगुत !
तं कि कृष्णे छथि से हमर आंगी हरण कर्ता बिहाड़ि ?
कियेक क’ गेला एना उघार ।
भने धेलनिहें ई ढब नव,
ककरो सतयवाक उपद्रव-उपाय…
मुदा की भ’ जाइछ एहि मन कें अनेरे ?
के अपन, ककरा लेल एतेक उदास,
श्रीकृष्ण ?
१७/४/०५.न.दि.

२.श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर जिला सहरसा बिहार। स्नातक शिक्षा:अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा। प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर। स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन।
प्यास
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
भूख लागल अछि एखनहुँ, उमरि बीत गेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल!
नेह डूबल वचन केर आश टूटल!!
दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल!
गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
आयल पावनि-त्योहार, गाम जाय केर विचार!
घर मे चर्चा केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!!
नहि नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल!
कनियाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द करू खेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात!
लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!!
घर लागय अछि जेल, मुदा करब नहि फेल!
नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!!
हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल!
१.राजेन्द्र विमल २.रेवतीरमण लाल ३.दिगम्बर झा
दिनमणि

राजेन्द्र विमल (1949- )।चामत्कारिक लेखन-प्रतिभाक स्वामी राजेन्द्र विमल नेपालक मैथिली साहित्यक एक स्तम्भ छथि। मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि। सुललित शब्द चयन एवं भाषामे प्राञ्जलता डा. विमलक लेखनक विशेषता रहलनि अछि। अपन सिद्धहस्त लेखनसँ ई कोनहु पाठकक हृदयमे स्थान बना लैत छथि। कथा आ समालोचनाक सङ्गहि मर्मभेदी गीत गजल लिखबामे प्रवीण डा. विमलक निबन्ध, अनुवाद आदि सेहो विलक्षण होइत छनि। कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। खास कऽ मानवीय संवेदनाक अभिव्यक्तिमे हिनक कलम बेजोड़ देखल जाइत अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। जनकपुरधामक देवी चौक स्थित हिनक घर सदति साहित्यक जिज्ञासुसभक अखाड़ाजकाँ बनल रहैत अछि।
डा. राजेन्द्र विमलक गजल
१.
नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी
फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै
कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने
गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै
चान भादवक अन्हरिये
कटैत अहुरिया
नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे
बिछा चानीक इजोरिया
कोजगरामे आइ
खेलए झिलहरि लहरिपर
ओलरि जाइ छै
हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै
नदी उफनाएल उफनाएल
कतबो रहौ
एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान
पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै
के जानए कखन ई बदलतै हवा
सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै
जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै
सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै
रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार
सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू
मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय
सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै
२..
जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी
प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी
जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ
पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी
स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय
हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी
अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो
रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी
रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत
रावण जखने डरए तखने दिवाली छी
डा. रेवतीरमण लाल
मधुश्रावनी
मधुश्रावनी आएल
मन-मन हर्षए
चहुँदिस साओन
सुन्दर घन वर्षए
काँख फुलडालि
मुस्कथि कामिनी
मलय पवन
सुगन्धित शीतल
दमकए दामिनी
नभ मंडलमे घनघोर
मानू जल नहि वर्षए
ई विरही यक्षक नोर
झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए
जल थल अछि चहुँओर।
दिगम्बर झा “दिनमणि”

चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए
घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल,
से सब आइ धरैलैए
मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं
घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं
अनुसन्धानक कारवाइमे
सवहक होस हेरेंलैए
विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै
बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै
क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने
परदेस पड़ेलैए


हम सुना रहल छी तीन धार
भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़।
गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत।
जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत।
हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं
हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥
हम सुना
ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव,
हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव।
हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि,
तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना,
हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै,
स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै।
मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब,
तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना


चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि।
सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥
चलै मन…
मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता।
पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥
बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि।
चलै मन..
महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल
छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल।
हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन..
हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम।
चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम।
शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन…
शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा।
सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा।
हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन…

१.रूपा धीरू २.ज्योति
रूपा धीरूकेँ मैथिली साहित्यमे कम्मो लिखि कऽ सुयश प्राप्त छन्हि। गृहणीक भूमिका कुशलतासँ निभाबयबाली रूपाक साहित्य साधारण महिलाक सजीवतासँ चित्रण करैत अछि। लेखनक अतिरिक्त रूपा संगीतसँ सेहो जुड़ल छथि। नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे रहैत ई मैथिली, नेपाली, भोजपुरी आऽ हिन्दी भाषाक सयसँ बेशी गीतकेँ अपन स्वरसँ सजओने छथि। गायन क्षेत्रमे हिनका प्रतिष्ठाक संग-संग साधारण लोकक गीतकेँ गाबए वाली गायिकाक रूपमे चिन्हल जाइत छन्हि। रेडियो कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ताक रूपमे हिनकर ख्याति सर्वाधिक छन्हि। “हैलो मिथिला” नामक रेडियो कार्यक्रमक माध्यमसँ रूपा मैथिली उद्घोषणाकेँ एकटा नव परिचय आऽ ऊँचाई देलन्हि अछि।
अङ्गेजल काँट- रूपा धीरू

नहि जानि बहिना किएक
आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह
आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ
छहोछित्त कऽ देबवला
मर्मभेदी वाण।

बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा
ऐँ हइ बहिना!
एहन काँट भरल गुलाबकेँ
अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह
तोरा गड़ैत नहि छह?
तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह
मुदा हम मौन भऽ गेल रही
आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह।
हँ बहिना, ठीके
हमरो तोरेजकाँ
अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक
सपना रहए
आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ
अपन जिनगीपर
मुदा की करबहक…!
मोन पाड़ह ने
छोटमे जखन अपनासभ
ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ
बेसी काल हमहीँ जीतैत रही
मुदा जिनगी जीबाक खेलमे
हम हारि गेल छी बहिना।
काँट काँटे होइ छै बहिना
गड़ै कतहु नहि
मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी
मालिन जँ काँटकेँ
नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना?

2. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति

वृद्धक अभिलाषा
एक वृद्ध रोपि रहल छल गाछ आमके
कियो पुछलकै जे की लाभ हैत अहॉंके
अपने छी जीवनक अंतिम छोर पर
फरनाइ तऽ हैत अहॉंक मरलापर
ओ वृद्ध जवाब देलैथ विनम्रता सऽ
अपन काज सऽ बिना अडिग भऽ
बाप दादाक रोपल कलम जे भोग केलहुं
बस सैह ऋणके लौटाबक प्रयास केलहुं
आगामी पीढ़ीके अपन हाथे खुआयब की नहिं
कम सऽ कम ई गाछ फरैत रहत जा धरि
अपन बाल बच्चामे मिठास घोरैत रहब
भने ताबे अपने जीवैत रहब नहिं रहब

१.विद्यानन्द झा २.नवीननाथ झा ३.विनीत उत्पल
१.श्री विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आऽ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।

॥श्री गणेशाय नमः॥
कोशीक ताण्डव

पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँदिशि करै किलोल।
अन्न-वस्त्रसँ वंचित भए बसथि केम्प धनजोर॥
नेना-भूटका ओ समरथुआ क्यों नहिं रहल सरपोक।
पतिएँ पत्नी, पुत्र पौत्रसँ छिन्न-भिन्न चहुँओर।।
विपदा मारल देह नचारी गेल अन्न-अन्न बेहाल।
जल विचि बसिकऽ प्यास मरै अछि प्राण पावि दुत्कार॥
नर ओ नर रिपु संग निभै किनको मुख नहिं मपान।
विधिना स्पलैन्हि अपर विधान हुनकर नहिं परिमाण॥
कष्टक अन्त नहिं कहुखन देखलहुँ कष्टहिं वितय प्राण।
भूखक ज्वाला दग्ध करै अछि- स्नेह-प्रेम-सम्मान॥
पिता पुत्रसँ झपटि खाए छथि- रोटी-नोन महान।
जठरानल धधकल अछि सभतरि नहिं बुझथि संतान॥
सर्व स्वांत कएलैन्हि कोशी माता नहिं किछु बांचल जोर।
पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँ दिशि करए किलोल॥
एहि विचि देखलहुँ अद्भुत “ देखना” “मारिचक” भरमार।
मौका पावि लूटि रहल अछि सेवा भेल व्यापार॥
दुनियाँ दौड़ल बाँहि पसारिक, बैसोलक घड़जोड़ि,
अन्न-वस्त्र ओ आलिङ्गन दए, कएलक भाव-विहोर॥
सचमे! दुनियाँ एखनहुँ बाँचल- सत्य भेल नहिं थोड़।
श्रृष्टि विधाता रक्षा करता, नहिं होउ कमजोर- नहिं होउ कमजोर।

१.केम्प- शिविर
२.धनजोर- सम्पन्न, धनी
३.सरपोक- खतरा मुक्त, चिन्तामुक्त
४.नर-रिपु- सर्प इत्यादि
५.मारिच- मायावी राक्षस
६.घड़जोड़ि- एक संग

२.नवीन नाथ झा (नवनीत)- जन्म २०.०१.१९४०, बी.ए.ऑनर्स सह एल.एल.बी., पिता- श्री बैद्यनाथ झा, गाम- भटोत्तर (चकला), जिला पूर्णिया

१.
दया करू माँ

अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽ केँ अपनाबू माँ।
अहीँके चरण-कमलमे रमल छी माँ,
दुःखी मन दोसर राह नै, सुझै अछि माँ
चोट बहुत खायल छी माँ, दुनियासँ ठुकराईल माँ
दया करु माँ, दया कऽ केँ अपनावू माँ॥१॥ अहाँ…

माँ अपन आँचरक शीतल, सुरभित,
हवासँ ताप एवम् कष्ट हरु माँ,
परञ्च, मिलल नहि प्रतिदान कनेको,
हर पगपर स्वार्थक लीला,
चलन जगतक निराले माँ
अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ॥२॥
(जगत) संसार माया जालमे फँसल अछि माँ,
दुनियां आतंकसँ आक्रान्त अछि माँ,
अज्ञानताक-अंधकारसँ भरल अछि माँ
अनुशासनक कमी खलै अछि माँ॥
अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ…॥३॥
अपन परायाक ज्ञान घटल अछि,
अधर्मक, अकर्मक बाजार गर्म अछि
एहि जगसँ अज्ञानताक-अंधकार दूर करू माँ-
अहींक शरणमे आएल छी माँ, ताप रहहोँ…॥४॥
दुखी जनक दुःख दूर करू माँ
सत्कर्मक भाव जन-जनमे
अविलम्ब आबिकेँ अहीं भरू माँ।
अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ॥५॥
विश्व कल्याणक भाव सभमे जगा दियो माँ,
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् क ज्ञान सभमे भरि दियो माँ
वसुधैव कुटुम्बक विचार सन्चारित कऽ दियो माँ
अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ
“अस्तु”
३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक।
१.मिथिला हमर देश
मिथिला हमर देश अछि
हमर रग-रग मे
मिथिलाक पाइन
वा हवा बसल अछि
तहि सं जखन मोन
परैत अछि
बड़ाई करि दैत छी
निंदा करहि सं पाछुओ नञि रहैत छी
ई मिथिला हमर जन्मस्थान छी
ई मिथिला हमर पूर्वजक पहचान छी
नीक वा अदलाह
ई मिथिला हमरे सं नाम छी
अहां जेहन काज करब
अहां जेहन संस्कार पायबि
अहां जेहन संस्कार देब
ओहि सं मिथिलाक जान छैक
ताहि सं नहि ओहेन काज करू
ताहि सं नहि ओहेन आस करू
जकरा सं नहि सिर्फ मैथिल आ मिथिलाक
मुदा, मिथिलावासीक मन कs ठेस लागे।
२.वंशक चिराग
गाम-घरक जखन
हालचाल जनैत छी
सुनैत छी
फलां मातृक मे छैक
नाना-नानी कs संग
कोनो घर नहि
भेटता
जे अपन पाइर पर
अपन बच्चाक
पालन-पोषण कs सकता
‘दैत छी गप
लिय लपालप’ फेकरा
ओत-प्रोत सब घर भेटता
दस मिनटक मजा कs सजा
माई आ मातृक लोक भोगता
जखन अहां जमाई बनि कs
सासुर मे अधिकार
जमबैत छी
तखन अपन कर्तव्य कs
किया बिसरि जाइत छी
अहां देले छी बच्चाक जन्म
अहांक वंशक चिराग अछि ओ
अपनहि सं पालन-पोषण
करहि मे संतुष्टिक लेल
करहि परत मेहनत आ दिनराति एक।
३.फूइस आ सत
फूइस, फूइस आ फूइस
एकटा कs नुकाबै लेल
हजार टा
फूइस बाजय परत
मुदा, सत गप मे
अहिने गप
किया नहि
होइत अछि
एहन होइत अछि
एकटा सत बाजबाक संग
हजार सत
आगू आबैत अछि
एहन लोक मे दूई टा
गप होइत
अछि
सत या फूइस
अहां कोन दिस
ठाढ़ छी या होइब
ई अहांक विवेक, बुद्घि वा निर्णयक
क्षमता पर अछि
ई गप सत अछि जे
फूइसक महल
भूरभूरा कs खसि जाइत
सतक एकहि झोंक सं।
४.बिकाइत छैक
कहियो अहि देश मे
कमला बिकाइत छथि
खबर छपलाक बाद
बवाल मचि गेल छल
राजस्थानक कमला
एक महीस सं
कम दाम मे
बिक गेल रहथि
लोक वेद एकटा स्त्रीगणक
बिकबा पर
हायतौबा मचौउलथि
आइ सेहो स्मरण मे अछि ओ गप
मुदा, एखनो मिथिलाक
पुरुषक दशा देखियऊ
लड़की सं ब्याह नहि करैत छथि
दहेजक नाम पर बिका जाइत छथि
लड़कीक बाप हाथे।
५.महागरीब
एक दिनक गप अछि
छोटका नुनू आ भौजी मे
बताबती भs गेल
भौजी कहलखिन
ई धुर, अहां सभ
गरीब छी
नहि अछि मकान
नहि भेटैत अछि भइर पैट भोजन
हमर नहियर गप
कछु आओर अछि
छोटका नुनू कs नहि रहल गेल
ओहो किया पाछु रहितथि
मिथिलाक बड़बोलापन मे
डुबकी लगौने कहलखिन
सुनू भौजी, सब बाप
अपन बेटीक ब्याह
अपन सं ऊंच मे करैत छैक
यदि हम गरीब छी
त अहांक नहियर अछि महागरीब।

१.वृषेश चन्द्र लाल २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३. विभूति
१.वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। मैथिलीमे हिनक “आन्दोलन” कविता संग्रह प्रकाशित छन्हि।
नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि।
घुराकए एक क्षण जिनगी देखा दैत अछि।
धँसल डीहपर लोकाकए फेर स्वप्न महल
पाङल ठाढ़िमे कनोजरि छोड़ा दैत अछि॥
बजाकए बेर-बेर सोझे घुराओल छी हम
हँसाकए सदिखन हँसीमे उड़ाओल छी हम
बैसाकए पाँतिमे पजियाकए लगमे अपन
लतारि ईखसँ उठाकए खेहारल छी हम
सङ्केत एखनो एक प्रेमक बजा लैत अछि
जरए लेले राही जड़िसँ खरा दैत अछि
उठाकए उपर नीच्चा खसाओल छी हम
जड़ाकए ज्योति अनेरे मिझाओल छी हम
लगाकए आगि सिनेहक हमर रग-रगमे
बिना कसूर निसोहर बनाओल छी हम
झोंक एक आशकेर फेरो नचा दैत अछि
उमंगक रंगसँ पलकेँ सजा दैत अछि
२. धीरेन्द्र प्रेमर्षि
चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन
पसर खोललकै चरबाहासुन
नव उत्साहक सनेस परसैत
करै कोइलिया सोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
दादीक सूनि परातीक तान
तोड़ल निन्न सुरुज भगवान
सूतलसभकेँ जगबऽ लए पुनि
गूँजि उठल महजिदमे अजान
कहैए घण्टी मन्दिरक
मनमे उठबैत हिलोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
हम्मर-तोहर इएह धुकधुक्की
फैक्ट्रीक साइरन, ट्रेनक पुक्की
खालि कर्मक जतऽ भरोसा
दुख-सुख जिनगीक चोरानुक्की
घरसँ बहरैहऽ पाछाँ जा
ता मन करह इजोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
अन्यायक संग लड़बालए तोँ
प्रगतिक पथपर बढ़बालए तोँ
मिथिलाकेर अम्बरपर बिहुँसैत
चानक मुरती गढ़बालए तोँ
गौरवगाथा सुमिरैत अप्पन
हिम्मत करह सङोर
उठह जनकपुर भेलै भोर
३. महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक।
बाबा-स्तुति
बाबा बटेश पूजित वशिष्ठ, अपनेक सदिखन दरकार औ।
औढ़रदानी गङ्गाधर बाबा, जन-जनके सरकार औ॥…॥
बाबा बटेश, गङ्गातटवासी, दुःखियाके सुनू पुकार औ।
जन्मल-बाढ़ल, दुःखदैन्य भेटल, मनमे गङ्गाक दरकार औ॥
औढ़रदानी दरजू झट दऽ, भक्तक करु उद्धार औ।
जाकड़-जमा कतहि कछु नाहिं, चाहक अछि भरमार औ॥…॥
विमल “विभूति” दऽ के बाबा, करु विलटल उपकार औ।
होयत हँसारति जगमे बाबा, विश्वम्भर सरकार औ॥
औढ़रदानी अर्थ घटे नहिं, एतवहि अछि दरकार औ।
आशुतोष-औढ़रदानी भऽ, भक्तक करु उद्धार औ॥…॥
१. रामभरोस कापड़ि २. रोशन जनकपुरी ३.पंकज पराशर
१.रामभरोस कापड़ि
गजल
करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि
चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि
उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि
पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि
बहैत पानिआओ किनार कतौ खोजत ने
अगम अथाह सन्धान, एखन बाँकी अछि
फाटत जे छाती सराबोर हएत दुनियाँ “भ्रमर”
ई झिसी आ बरखा प्रलय, एखन बाँकी अछि।
२.रोशन जनकपुरी
डर लगैए
नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए
साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए
कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर
शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए
हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे
हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए
आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ
घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए
आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी
घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए
चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ
आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए
३.डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
पएर
बेमायसँ कांट बनल
जकरा लेल नहि जुड़ल कहियो
केहनो सन पनही
नहि किनुआं
नहि दनही
२.
चाननक ठोप लगौने कहैत छथिन पंडितजी
मुँहसँ ब्राह्मण आ पएरसँ शूद्रोत्पत्तिक कथा
एकटा केर उगलल
आ दोसर केर मर्दनक कथा
३.
बाध-बोन, खत्ता-खुत्ती
बाजार-हाटसँ गाम-गमाइत
बौआइत कतय-कतय नहि जाइत अछि पएर
मुदा पाहुन बनल भरि पोख नौ-छओ
पबैत अछि मुँहें टा
४.
पएर दुक्खीक कथा कहैत
कतेक मधुराह भऽ जाइत छनि
आइ-माइक बोल
आ अपन मथदुक्खीक व्यथाकेँ
मोनेँमे नुकौने रहि जाइत छथिन
सासुक पएर जँतैत
सोहाग-सुन्नरि बहुआसिन

हिसाब
हिसाब कहिते देरी ठोरपर
उताहुल भेल रहैत अछि
किताब

जे भरि जिनगी लगबैत रहैत छथि
राइ-राइ के हिसाब-
दुनिया-जहानसँ फराक बनल
अंततः बनि जाइत छथि
हिसाबक किताब

सरकार
एक तम्मा चाउर मँगबा लेल अंगने-अंगने बौआइत बाबी
लोकतंत्रक महान (!) “मतदान पर्व” दिन सेहो
उपासले जाइत छथि वोट खसाबऽ लेल बुढ़ारियोमे मरौत काढ़नेँ

कोन सरकार बनैत अछि बड़का नगरमे?
कतयसँ अबैत अछि एतेक रास पुलिस-दारोगा?
एतेक हरबा-हथियार एतेक रास घरतोड़ा मशीन?
एतेक रास चसकल राकस सबहक झुंड?
जे कोनटा-फरकामे हहारोह मचौने
निधोख ब्यौंत लगबैत अछि घरढुक्कीक निमित्त

बाबीक एकमात्र पुत्र मुइलनि हैजा-फौतीमे
जमीन गेलनि कोशी बान्हमे- भेटलनि दूध महक दाढ़ी
आ बाबी रहलीह सब दिन छुच्छक-छुच्छे

पछिला एक माससँ प्रखण्डक सरकार सबकेँ
वृद्धा पेंशनक लेल निहोरा करैत बाबी
काल्हि मुखिये लग बन्हकी लगाकेँ अपन हँसुली
कोनहुना कयलनि वृद्धा पेंशनक जोगाड़
आ उपासल पेटक ओरियाओन

मुखिया सरकार, सरपंच सरकार, गामक सबटा नमधोतिया सरकार
अओ सरकार! कथी लेल पुछैत छी
कोन कलमसँ लिखैत छी आइयो ओहिना
निधोख हमरा सबहक कपार?

१.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी
श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ – ०७ – १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ”हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन।
धोखा (१७.०९.९१)
दुनियाँ तँ ई धोखा अछि
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम
ऊगि रहल पनिसोखा अछि। दुनियाँ…
कौआ कर्र-कर्र करकराय रहल,
आँगनमे धान सुखाय रहल।
पेपर रेडियो टी.वी.पर
नेतहुँ तँ शोर मचाय रहल।
हो जिन्दा मुर्दा गाय-महीश
वृद्धा-पेंशन हो या खरात-
हर ठाम कमीशन खाय रहल,
हँसि-हँसि कय गाल बजाय रहल।
आजुक युग के ई शोभा अछि,
ई मान बराईक नोभा अछि। दुनियाँ..
दुनियाँमे अछि सब चोर-चोर,
जकरा हिस्सा नईं भेंटि रहल-
मचबै सगरो तऽ वैह शोर।
काटय केउ सेन्ह अन्हरियामे,
लूटय तऽ केउ इजोरियामे
केउ ठूसय हीरा वोरियामे
बन्दूक बनैत अछि गोहियामे
अछि सबहक सरदार सिपाही
ऊठय निश्चिन्त ओढ़ढ़ियामे
ईमान जतय घर टाटक अछि
ई महल अटारी पापक अछि
दुनियाँ तँ ई धोखा अछि
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
ऊगि रहल पनिसोखा।

(१६.०९.९१)
लिखलौं कतेक पत्र कर जोरि जोरि कऽ
बूझब ओ छल नोरक जगहकेँ छोड़ि-छोड़ि कऽ
लिखलौं…
झहरै तऽ बूँद सावनमे, खुब झूमि-झूमि कऽ
बरसै तऽ नोर नित, कपोल चूमि-चूमि कऽ
लिखलौं…
मुरझाय बन तराग बाग तऽ ओ गृष्ममे,
पावस उमंग घोरि रहल, आईपवनमे,
लिखईत छी पाँति हम, ई कलम बोरि-बोरि कऽ।
लिखलौं कतेक…
भेटत नम बूँद फेर, जखन हिम जे पिघलि जैत,
आओत कोना ओ बाढ़ि औ! सरिता सेहो सुखैत
ई लिखि रहल छी आई, आँखि फोड़ि-फोड़ि कऽ।
लिखलौं कतेक…
तोरि-गेरि-तोरि कऽ

मुहब्बतमे तऽ तरपब भाग्यमे लिखला प्रभुसबके
रही जौं दूर प्रियतमसँ सजाये मौत त ओ थिक। रही…२
यक्षक विरह छल वर्षकेँ जनलक जगत सगरो-
जहाँ वर्षो विरह के बात छै-
वनवास त ओ थिक। जहाँ…२
ई उपवन ओ शिखा पर्वत आ कल-कल बहि रहल सरिता
अगर अली अछि नज उपवनमे त सुन्दरता कतय ओ थिक। मुहब्बत…
चितवन हो यदि चंचल आ तन
यौवनसँ हो भारी
मगर पावसमे पहु परदेश हो
यौवन कहाँ ओ थिक।
मुहब्बत…

परदेश
रुन-झुन बाजय पायल हमर फूजल बान्हल केश
औ मोर पाहुन धेलहुँ योगिन वेश।
डाढ़ि-डाढ़िपर फुद-फुद्दी सभ फुदकि रहल,
खढ़-खढ़केँ समटि बनौने केहन महल
करै परिश्रम मिल कय दुनू नईं छन्हि कोनो क्लेश।औ..
बिजुलीसँ चमकै घर, मुदा अन्हरिया यौ।
टिम-टिम दीप करै छै ओतय अन्हरिया औ
दिन गनैत छी बीति रहल अछि राति कहाँ अछि शेष औ…
सीता शक्ति राम सौम्य जग-प्राण बनल।
पौलनि जगमे नाम घूमि जंगल-जंगल॥
महल त्यागि वनवाश गेलन्हि बना तपस्विन वेश!
औ मोर…
जतबय दुःख हम कहब अहाँ ततबै बुझबै
नहिं पहुँचत जौं पत्र अहाँ नहिंये जनबै
जड़तै तेल कोना नईं घरमे पहु जकर परदेश।
औ मोर…

(२०.१०.९१)
रहि-रहि आँचर उड़ि जाय किया
अहाँ आँचर समटि लजई किया। रहि-रहि..
देखि बागमे सुमन व्यवहार करू,
उठा निज नयनकेँ चारि करू,
अली हर कलीसँ फुस-फुसाय किया। रहि रहि..
चमन छी अहाँ खिलि रहल अय सुमन।
लटसँ लिपटि घूमि चूमन पवन
पड़य जतय नजरि लिपटि जाय किया! रहि रहि…
भार सहय कोना करि केहरि अहाँक
राग माधुरी सुनाबय पायल के झनक
देखि अहाँ के हिरदय जुराय किया।
रहि रहि आँचर..

परदेश गेलहुँ
हमरो छोड़लहुँ, छोड़लहुँ माय के छोड़ि देलहुँ घरद्वार
परदेश गेलहुँ…
सोनू-मोनू झगड़ा कय-कय हमरो माथ भुकाय रहल
बहिकिरनी तऽ नईं अछि घरमे, कहू करत के हमर टहल?
बौआ सब बौआय रहल अछि, पढ़तै कथी कपार!
परदेश गेलहुँ..
जन-वन किल्लौल करै छै, कोना जेबै हम दरबज्जा
बौआ दौड़ल छल सड़कपर, गेलहुँ रोटी भेल भुज्जा
माय छथि बूढ़, छी एसगर घरमे कोना उठत ई भार!
परदेश गेलउँ। हमरो…
अहाँ जनै छी लोक केहन अछि, के कऽ देतै हाट-बजार,
साल-साल त बाढ़ि अबै छै,उजरै छै सबके संसार,
हेतै समुद्र आँगन-घर सगरो,के कउ देतै पार!
परदेश गेलउँ। हमरो छोड़लौ…
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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