VIDEHA

विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-2

In विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-i on फ़रवरी 12, 2009 at 4:10 अपराह्न

विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-2
आलेख- रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा, जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी

डॉ.बलभद्र मिश्र, सेवा निवृत्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी, पूर्णियाँ
लब्ध धौत प्रतिष्ठ पंजीकार- स्व. पं मोदानन्द झाजी- एक संस्मरण

स्व. पंजीकार जी विलक्षण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति छलाह। हिनक संपर्क भेलासँ पूर्वहि सुनैत आएल छलहुँ कि शिवनगर (पूर्णियाँ, संप्रति अररिया जिला) निवासी पं. मोदानन्द झा जी पुबारिपारक एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पंजीकार तऽ छथिए, संगहि संपूर्ण मिथिलाक मूर्धन्य पंजीकारक श्रेणीमे हिनकहु नाम लेल जाइत छलन्हि।
पंजीकारजी प्रतिवर्ष सौराठ सभा गाछी जाइत पुबारि-पछबारि पारक भेल विवाहक सिद्धान्तक लिपिबद्ध आदान-प्रदान करैत छलाह, जाहिसँ हिनक पंजी-पुस्तिका वृहदाकार होइत वंश परिचयक विशाल भंडारसँ सुशोभित अछि।
पंजीकारजी महाराज दरिभंगाक अध्यक्षतामे आयोजित “पंजीकार धौत परीक्षा” मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कऽ “लब्ध धौत प्रतिष्ठ” भेल छलाह, जकर निर्णायक मण्डलमे महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झाजी सम प्रभृति विद्वान लोकनि छलाह।
पंजीकारजी कतेको ठाम सम्मानित भेलाह, जाहिमे “अखिल भारतीय मैथिल महासभा”क विद्वत् मंडलीसँ आदृत होइत विशिष्ट स्थान पौने छलाह। हिनक कृति एवं विलक्षण प्रतिभाक आलोकमे हिनक जीवनहि कालमे “चेतना समिति” स्वयम् आमंत्रित कऽ पंजीकारजीकेँ सादर सम्मानित करैत भेल।
जखन हमर विवाह १९५५ ई.मे पोर्णियाँ भेल तहियासँ पंजीकारजीक मृत्युसँ तीनमास पूर्व तक संपर्क बनल रहल। एहि तरहेँ पंजीकारजीक प्रति जे सुनैत आयल छलहुँ तकर यथार्थ अनुभूति हमरा पंजीकारजीक संगतिमे भेटल।
कतेको विवाह सिद्धान्त लिखबाक अवसर हमरा बुझना गेल कि- भलमानुष (जाति-पाँजि) व्यक्तिक वंश परिचय पंजीकारजी केँ जिह्वाग्र छन्हि।
यद्यपि वर कन्याक अधिकार देखबाक क्रममे पंजीकारजी केँ “पंजी पोथा” उलटबाक आवश्यकता नहि छलन्हि, तथापि कतहु गलती नहि भऽ जाय ई बुझि पोथा उलटबाक उपरान्ते अपन लिखित निर्णय दैत छलाह।
पंजीकारजी सदाचार सम्पन्न होइत सभ दिन अहं भावसँ निर्मुक्त रहलाह। हिनक रहन-सहन वेश-भूषा एवं टपकैत ओजस्विताकेँ देखि केओ अपरिचित व्यक्ति हिनक गुणसँ परिचित भऽ जाइत छल।
हम स्वयं पंजीकार जीक सद्विचार, सद्व्यवहार, सदाशयितासँ विशेष प्रभावित भेलहुँ। पंजीशास्त्रक गहन अध्ययन रहले सन्ताँ पूबारि-पछबारिक समन्वय करबाक स्तुत्य प्रयास जीवन भरि करैत रहलाह।
खुशीक गप्प जे पंजीकारजीक बालक श्री विद्यानन्द झा (मोहनजी) पंजीकारिताकक्षेत्रमे निष्ठापूर्वक अपन मनोयोग रखने छथि, जाहिसँ स्व. पं.मोदानन्द झा जीक आत्मामे अवश्ये शान्ति भेटैत होयतन्हि।
अन्ततः हम यैह कहब जे स्व. पंजीकारजीक प्रत्युत्पन्न मतित्वक आगाँ हम जे किछु कहि गेलहुँ से सूर्यकेँ दीप देखेबाक समान बुझल जाय।
एहन स्वनामधन्य पंजीकार स्व. पं. मोदानन्द झा जीकेँ मरणोपरान्त एक संस्मरणक रूपमे अपन श्रद्धा-सुमन अर्पित करैत हमर शतशः प्रणाम।

नरेश मोहन झा, तुलसिया, किशनगंज

विद्वद्वरेण्य पञ्जीकार मोदानन्द झा

वर्ष १९५४-५५क वार्ता थीक। गृष्मावकाश छल। गामहिं छलहुँ। एक दिन वेरू प्रहर मे दरवज्जहिपर छलहुँ। एक व्यक्ति, अत्यन्त गौरवर्ण, मध्यम ऊँचाई, देदीप्यमान ललाट, प्रशस्त काया, धूपमे चलबाक कारणेँ ललौंछ मुखमण्डल, पैघ-पैघ आँखि, उपस्थित भेलाह। देखितहिं बुझबामे आएल जे कोनो महापुरुष अएलाह अछि। हमर पिता पं. लीलमोहन झा सेहो दलानेपर छलाह। ओऽ परम आह्लादित भए उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। झटकि कऽ अरियाति अनलखिन्ह। हमरा सभ जतेक नवयुवक रही- सभकेँ कहलन्हि- प्रणाम करहुन्ह। हमरो लोकनि उल्लसित एवं अनुशासित भए प्रणाम कएलियन्हि। बाल्टीमे जल, जलचौकी ओऽ अढ़िया आनल गेल। हुनकासँ पए धोएबाक आग्रह कएल गेलन्हि। हमर पिता जे परोपट्टाक श्रेष्ठ समादृत व्यक्ति छलाह- स्वयं लोटामे जल लए हुनकर पएर धोअय लगलखिन्ह। पुनः अंगपोछासँ पएर पोछि पलंगपर बिछाओल साफ सुन्दर विछाओनपर बैसेलखिन्ह। आऽ हुनक पएर धोयल जलसँ समस्त घर-आङनमे छिड़काव भेल। एहि बीच सरवत आएल- पान आएल। घरक सभ सदस्यमे एक अद्भुत उल्लास-जेना कोनो इष्टदेव आबि गेल होथि। ओहि बैसारमे तँ बहुत काल धरि कुशलादिक वार्ता होइत रहल। संध्याकाल धरि तँ हमर दरवज्जापर गाम भरिक ब्राह्मणक समूहक समूह उपस्थित होमऽ लागल। ओहि मध्य हमर पिता परिचय करौलन्हि। कहलन्हि- ई थिकाह पंजीकार प्रवर श्री मोदानन्द झा जी लब्ध धौत, शिवनगर, पूर्णियाँ निवासी। हमरा लोकनिक वंश रक्षक। हिनकहिं प्रतापे हमरा लोकनि अपन कुल ओऽ जातिक रक्षा कऽ पबैत छी। हिनक पिता पञ्जीशास्त्र मूर्धन्य पञ्जीकार भिखिया झा बड़ पैघ विद्वान् ओऽ सदाचार पालक। ओहि योग्य पिताक यशस्वी पुत्र छथि पञ्जीकार प्रवर मोदानन्द बाबू। नाम सुनितहिं अकचकयलहुँ। हम पूर्णियाँ कॉलेजक जखन छात्र रही तँ समस्त कुटुम्ब वर्ग बिष्णुपुर गामक मित्रवर्ग जे नवरतन पूर्णियाँमे रहैत छलाह तनिकासँ हिनक नाम बड़ श्रद्धापूर्वक उच्चरित होएत सुनने छलहुँ। अहि साक्षात्कार भेल सन्ता बुझि पड़ल जे जे किछु हिनकर मादे सुनने छलहुँ से बड़ कम छल। निश्चय ई व्यक्ति परम आदरणीय छथि। सांध्यकालीन बैसारमे गामक सभ श्रेष्ठ व्यक्ति अपन-अपन वंशक नवजन्मोत्पत्तिक विवरण लिखबैत गेलखिन्ह। पञ्जीकारजी तत्परतापूर्वक सभक परिचय बड़ मनोयोगसँ लिखैत रहलाह। तखन हमरा बुझाएल जे कोना कऽ हमरा लोकनिक वंश परिचय पछिला हजार वर्षसँ साङ्गो-पाङ्ग उपलब्ध रहल अछि। हमर गाम पञ्जीकार गामसँ १०० कि.मी.सँ अधिके पूर्वमे अवस्थित अछि। यातायातक कोनो सम्यक व्यवस्था पूर्वमे नहि रहल होएतैक। नाना प्रकारक असुविधाक सामना करैत एतैक भू-भागमे पसरल मैथिल ब्राह्मणक यावतो परिचय संग्रहित करब, सुरक्षित राखब आ बेर पड़लापर उपस्थित करब अत्यन्त दुःसाध्य कार्य। यात्रा ओ परिस्थिति जन्य कष्टक थोड़ेको अनुभव नहिं कऽ केँ अपन कर्तव्येक प्रधानता दैत निःस्वार्थ भावसँ धर्मशास्त्रक रक्षामे तत्पर एहि इतिहासक संरक्षण सन पुनीत कार्य करैत रहब हिनकहि सन व्यक्तिसँ संभव। प्रातः काल पूज्य पितासँ एकान्तमे पुछलियन्हि जे एतेक कष्ट उठा कऽ परिचय संग्रह करबाक प्रयोजन की? बुझौलन्हि जे अपना लोकनि जे सनातन धर्मावलम्बी से सभटा कार्य मनु, याज्ञवल्क्य, शतपथ, शंख इत्यादि महान् ऋषि लोकनिक देल व्यवस्थापर चलैत छी। मनु विवाहक सन्दर्भमे कहने छथि जे कोनो कन्या ओ वरक विवाह स्वजन, सगोत्र, सपिण्ड ओ समान प्रवरमे नहि हो। एहि हेतु आवश्यक अछि जे सपिण्ड्य निवृत्तिक ज्ञान हो। ताहि हेतु पुरुषाक विवाहादिक विवरण सम्पूर्णतः उपलब्ध हो। एहि धर्मक रक्षा तँ विन पञ्जीकारहिं सम्भव नहि। अन्यथा वर्णशंकरक प्रधानता होएत ओ जातिय रक्षा नहिं होएत। पञ्जीकारक नहिं रहने वंशक इतिहासक ज्ञान नष्ट भए जाएत।
विश्वास जमि गेल। हुनका प्रति मनमे जे आस्था छल से चतुर्गुण भऽ गेल। तकर बाद जखन कखनो ओऽ अएलाह हम ओहि देवत्व भावेँ हुनक सम्मान कएल। ओहो पितृवत स्नेह देलन्हि। ओऽ अपन व्यक्तित्वक धनी छलाह। सदाचार पालनमे तत्पर। जखन कखनो हुनकर गामपर जएबाक अवसर भेटल- गमौलहुँ नहि। कतेको बेर हुनकर गाम शिवनगर गेल छी। हुनक ओऽ साफ परिछिन्न दलान। रमनगर फुलवाड़ी। पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओऽ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि। कर्मिष्ठ पुरुषः।

नागेन्द्र झा, नवरत्न हाता, पूर्णियाँ

स्व. पञ्जीकार मोदानन्द झासँ सुनल परुए महेन्द्रो मूलक पूर्णियाँ जिलाक शिवनगर ग्रामवासी छलाह। ई पञ्जी प्रबन्धक नीक ज्ञाता छलाह। महाराज दरभङ्गाक चलाओल धौत परीक्षोत्तीर्ण छलाह।
ई लेख पञ्जीकारक विषयक थिक। अतः पञ्जी शब्दक अर्थ की से बूझब आवश्यक। पञ्ज शब्द आएल अछि संस्कृतमे तथा भाषोमे पञ्च शब्दक प्रयोग ५ संख्याक अर्थमे भेटैछ। तैं पञ्ज शब्द ५ संख्यासँ सम्बद्ध अछि। भाषामे हाथक पाँचो आङ्गुर तथा ताशक ५ कैं पञ्जा कहल जाइछ।
पञ्जीमे ५ संख्याक कि प्रयोजन? उत्तर- हमरा लोकनि अर्थात् मैथिल ब्राह्मण “पञ्चदेवोपासक” छी। कोनो तरहक शुभ कार्यमे पूजा पञ्चदेवतैक पूजासँ आरम्भ होइछ। तहिना धर्मशास्त्रक अनुसारे कहल गेल अछि जे “मातृतः पञ्चमीं त्यक्त्वा पितृतः सप्तमीं भजेत्”। अर्थात् प्रकृति (माय)सँ पाँचम स्थान स्थिति कन्याक सङ्ग विवाह नहि करी। ई निषेध कयल गेल।
विवाह सृष्टि प्रयोजनार्थे होइछ आ सृष्टिमे प्रकृतिक प्रयोजन तैं मायसँ पाँचम स्थान स्थित कन्यासँ विवाह निषिद्ध भेल तथा एहि निषेधक कारणसँ सम्भव थिक जे एकर नाम “पञ्जी” राखल गेल हो अथवा कन्यादानमे वरक दू पक्ष, कन्याक दू पक्षक अर्थात् दुनू मिलाकेँ चारि पक्षक निःश्शेष व्याख्या जाहि पुस्तकमे लिखल जाय आओर पञ्जीकार ओकरा स्वीकार करथि अर्थात् हस्ताक्षर करथि ओऽ भेल पञ्जी।
संस्कृतमे पञ्जी (पञ्जिका) शब्दक अर्थ थिक जे पूर्णतः पदक व्याख्या जाहिमे लिखल गेल हो। अर्थात् ओऽ रजिस्टरो भऽ सकैछ, पुस्तकोक रूपमे भऽ सकैछ, हैन्डनोटोक रूपमे भऽ सकैछ। सरकारी रजिस्ट्री ऑफिसमे रजिस्टर रहैछ। हाटपर मवेशीक बिक्री भेलापर विक्रीनामा लिखल जाइछ। एकर निदान “याज्ञवल्क्य” साक्ष्य प्रकरणमे स्पष्ट कयने छथि जे बेचनिहार, खरीददार आऽ साक्षी सभक पूर्ण पता रहै जैसँ भविष्यमे कोनो तरहक विवाद नहि उठै।
ई अभिलेख (रेकर्ड) वस्तु विक्रयोमे तथा दानमे सेहो राखल जाय। ई तँ कन्यादान प्रकरणमे वर-कन्या दुनूक वंशक पूर्ण सपिण्डक अभिलेख जाहिमे लिखल जाय से भेल पञ्जी आऽ ओहि पञ्जीमे जे वर-कन्या सपिण्डक अभ्यनाट नहि छथि से लिखनिहार पञ्जीकार कहवैत छथि।
एहि स्थितिमे ईहो ज्ञात होबक चाही जे पञ्जी प्रथा कहियासँ चलल, कियैक चलल?
ई प्रथा हरिसिंह देवक समयसँ प्रचलित भेल अछि। कियैक आरम्भ भेल से कथा स्व. पञ्जीकारे मुहसँ सुनल अछि, जे निम्न थिक।
पञ्जी प्रबन्धक आरम्भक बीज- एक ब्राह्मणी रहथि। ओऽ जाहि गाममे रहथि ओऽ ब्राह्मण बहुल गाम छल। लोक कि पुरुष वा कि स्त्री बिनु पूजा-पाठ केने भोजन नहि करथि। ओहि गामक एक पोखरिपर एक शिवमन्दिर छल। उक्त ब्राह्मणीक नियम छल जे जाऽ धरि उक्त शिव-मन्दिरक महादेवक पूजा नहि करी ताऽ धरि जलग्रहण नहि करी। ई शिव पूजार्थ मन्दिर गेली ओहि समय एक चाण्डाल सेहो पूजार्थ गेल रहए। हिनका देखि हिनकासँ दुराचरणक आग्रह कएलक। ई परम पतिव्रता छलीह। ओकरा दुत्कारैत कहलनि जे ई मन्दिर थिकैक तू केहेन पापी छैं, जो भाग नहि तँ तोहर भला नहि हेतौ। ई कहिते छलीह की शिवलिङ्गसँ एक सर्प फुफकार करैत अवैत ई चाण्डाल भागल।
संयोगवश बाहरसँ एक ब्राह्मणी, ओहि दुनूक वार्तालाप सुनिते छलीह। गामपर आवि मिथ्या प्रचार ओहि चाण्डालक संग कऽ देलनि। गामक लोक हिनका बजाय कहलनि जे अहाँकेँ प्रायश्चित करए पड़त। एहि लेल कि अहाँ चण्डालक सङ्गम कएल। ई कहि उठलीह जे के ई कहलक, हमरा तँ ओकरासँ स्पर्शो नहि भेल अछि। मुदा लोककेँ विश्वास नहि भेल। प्रायश्चित लिखल गेल (यदीयं चाण्डालगामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु) ई लिखि हुनक दहिन हाथपर एक पिपरक पात राखि आऽ तैपर लह-लहानि आगि राखल गेल। ई पाकि गेलीह। तखन हिनका ग्राम निष्कासनक दण्ड देल गेल। कनैत-खिजैत लखिमा ठकुराइन नामक पण्डिताकेँ सब बात कहलनि। श्रीमती ठकुराइन प्रायश्चित्त लिखनिहार पण्डितकेँ बजाय कहल जे प्रायश्चित्त गलत लिखल गेल। हम प्रायश्चित्त लिखब। तखन ठकुराइन लिखल जे “यदीयं पतिभिन्न चाण्डाल गामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु”। ई वाक्य पूर्ववत् दहिन हाथक पिपरक पातपर राखल गेल तँ ई नहि पकलीह। तखन ई वार्ता महाराज हरिसिंहदेवक ओतय गेल।
तखन उक्त महाराज पण्डित मण्डलीकेँ आमन्त्रित कऽ पुछलनि जे उक्त स्त्रीक पति चण्डाल कोना? तखन विद्वतमण्डली उक्त स्त्रीक पतिक विवाहक शास्त्रानुकूल विचारि देखलनि तँ हुनक विवाह अनधिकृत कन्यासँ भेल तैँ हिनकर पति चण्डाल भेलाह। एकर बाद महाराजक आदेशसँ मैथिल ब्राह्मण लोकनिक विवाह पञ्जी बनल।
मैथिल ब्राह्मणमे १६ गोत्रक ब्राह्मण छथि। एकर बाद गाँव-गाँवमे उक्त गोत्रान्तर्गत जे जे लोक छलाह तनिका-तनिका गामक नाम देल गेल एवं मूल कहौलक। पञ्जी मूलक अनुसार बनल, गोत्रक अनुसार नहि। एक गोत्रमे अनेक मूल अछि। गोत्रक नामपर पञ्जी बनैत तँ गामक पता नहि लगैत।
हमर मतसँ पञ्जी-प्रबंध धर्मशास्त्रक अंग थिक। तैं एकर लिखनिहार, अभिलेख (रेकर्ड) रखनिहार एवं एक पढ़निहार व्यक्ति पञ्जीकार (रजिस्ट्रार वा धर्मशास्त्री) थिकाह। कलियुगानुकूल पूर्व समय जेकाँ पञ्जीकारक परामर्श बिनु लेनहुँ विवाहक निर्णय कऽ कन्यादान कऽ लैत छथि जे परम अनुचित थिक।
जे पञ्जीकार हमरा लोकनिक लोकान्तर प्राप्त पूर्व पुरुषक अभिलेख (रेकर्ड) राखि आ वैह विद्या पढ़ि अपन जीवनयापन करैत छथि हुनक आर्थिक स्रोत एक मात्र ईएह जे हमरा लोकनिक सन्तान (वर वा कन्याक) जखन समय आओत तखन हुनक परामर्श शुल्क दऽ ग्रहण करी। से वर्षमे कतेक होइछ। यदि ईएह रास्ता रहत तँ ई विद्या लुप्त भऽ जायत।
एहि पञ्जीक मूल्य सरकारोक न्यायालयमे कम नहि छैक जेकर निम्नांकित एक उदाहरण देखू-
उदाहरण- एक राजपरिवार वंशविहीन भऽ लुप्त भऽ गेल। हुनक सब सम्पत्तिमे सँ किछु सम्पत्ति महाराज दरभंगाकेँ भेल आऽ किछु सम्पत्ति बनैलीक राजामृत राजपरिवारक उत्तराधिकारीसँ कीनि लेल।
एकर बाद महाराज दरभंगा न्यायालय जाय बनैली राज्यपर ई कहि जे ओऽ (वनैली राज्य) अनधिकृत किनने छथि। मोकदमा बहुतो दिन चलल। दुनू पक्षसँ दिग्गज वकील लोकनि छलाह। उत्तराधिकारक हेतु दुनू पक्षकेँ ई पञ्जी-प्रबन्ध मान्य भेल। जाहिमे बनैली राज्यक पञ्जीकारक रूपमे उक्त पञ्जीकार जनिक विषयमे ई लेख लिखल जाऽ रहल अछि, हिनक पूज्य स्व.पिता तथा ई, दुनू गोटें मोकदमाक बहसक लेल नियुक्त भऽ पञ्जी-प्रबन्ध पुस्तकक अभिलेख न्यायालयक जजकेँ देखओलनि। एकर बाद बनैली राज्य “डिग्री” पओलक त्तथा ई दुनू पिता-पुत्रक मान्य सम्मान कयलक।
एहिसँ सिद्ध भेल जे उक्त पञ्जीकारक पञ्जी सुरक्षित रहि पञ्जीकारक योग्यतोकेँ सिद्ध कएलक।
हिनक निर्लोभताक वर्णन सेहो देखू:-
एक राजदरबारमे कन्यादान उपस्थित छल। ताहिमे परामर्श (सिद्धान्त)क हेतु अनेको पञ्जीकार बजाओल गेल रहथि ताहिमे ईहो रहथि। राजदरबारक बात रहैक। राजाकेँ अपन कन्याक हेतु ई वर पसिन्द रहथिन। ई पञ्जीकार अन्य पञ्जीकारसँ वार्तालापमे कहलथिन जे औ पञ्जीकारजी! ऐ वरक अधिकार तँ नहि होइत छैक। ओऽ उत्तर देलथिन जे अहाँ बताह भेलहुँ हेँ। राजाक बात थिकैक। राजाकेँ काज पसिन्द छनि। एहिमे अरङ्गा नहि लगबियौक। नीक पारश्रमिक भेटत। ई मोने-मोन विचारलन्हि जे ऐ पापक भागी (रुपैय्याक लोभमे पड़ि) हम कियैक होउ। किछु कालक बाद बाह्यभूमि (पैखाना) जेबाक बहाना बनाय ओतयसँ भागि अयलाह।
हिनक नैष्ठिकता सेहो तेहने छल। सब दिन स्नानोत्तर सन्ध्या, तर्पण, गायत्री जप, शालिग्रामक पूजा बिनु कएने विष्णु भगवानक चरणोदक तथा तुलसीपात बिनु खएने! अन्न-जल नहि करैत छलाह।
एकर अतिरिक्त कार्तिक मास जखन अबैक तखन भरि मास धात्रीयैक गाछतर हविष्यान्न भोजन करथि। ऐ सँ हुनक पूर्ण नैष्ठिकताक पता चलैत अछि।

डॉ. रत्नेश्वर मिश्र- मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा

दस वर्षक अल्पायुमे हुनका वर्तमान मधुबनी जिलान्तर्गत सौराठ गाम विद्याध्ययन लेल पठाओल गेलनि। ओतय हुनक गुरु आ आश्रयदाता रहथिन ख्यातनाम पंजीकार पं.विश्वनाथ प्रसिद्ध निरसू झा, जनिकर पिता लूटन झा मोदानन्द झाक मौसा रहथिन। पंजीशास्त्रक अध्ययन लेल सामान्यतः पन्द्रह वर्षक कालावधि समुचित मानल गेल छैक मुदा मोदानन्द झा दसे-एगारह वर्षमे गुरु-कृपासँ निष्णात भेलाह। ओना ओऽ पन्द्रह-बीस वर्ष धरि लगातार गुरु सान्निध्यमे सौराठ रहलाह आऽ बादोमे आजीवन, विशेष रूपसँ वार्षिक वैवाहिक सभाक अवसरपर सौराठ अबैत-जाइत रहलाह आऽ ताहि क्रममे बाटमे दरभंगा स्थित हमर नरगौना निवासपर ओऽ कनियो देर लेल अवश्य आबथि। हमर पिता डॉ. मदनेश्वर मिश्र लेल हुनका विशेष स्नेह आऽ सम्मान रहनि आऽ हमर एक पितृव्य पं. नागेश्वर मिश्रक ओऽ सम्बन्धमे साढ़ू रहथिन। हमर एकटा पीसा स्व. दिगम्बर झा हुनकर पितियौत रहथिन। जे हो, विध्याधयन समाप्त समाप्त भेलापर राज-दरभंगा द्वारा आयोजित धौत परीक्षामे १९४० मे ओऽ सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयलनि। हुनका संग उत्तीर्णता प्राप्त केनिहार अन्य दू महत्वपूर्ण पंजीकार छलाह ककरौरक हरिनन्दन झा आऽ सौराठक शिवदत्त मिश्र। एहि सफलता लेल महाराज सर कामेश्वर सिंहक हाथे तीनू गोटाकेँ धोती देल गेलनि, मुदा सर्वोच्च घोषित भेलाक कारणेँ मोदानन्द झाकेँ दोशाला सेहो देल गेलनि। पारम्परिक मिथिलामे धौत परीक्षामे उत्तीर्ण भेनाय बड़का सम्मान होइत छल मुदा ताहूमे सर्वोच्चता पायब तँ अनुपमे छल। तहियासँ अनवरत ओऽ अपन जीवन-पर्यन्त मिथिलाक प्रायः सर्वाधिक समादृत पंजीकार रहलाह।
मोदानन्द झाकेँ पाबि पंजीकारक व्यवसाय धन्य भेल। १९६२ मे निरसू झाक दिवंगत भेलापर ओऽ सौराठ प्रतिवर्ष नियमपूर्वक वैवाहिक सभामे मात्र अपन नाम बढ़यबा लेल नहि बल्कि अपन गुरुक ऋण अदाय करबाक विचारसँ सेहो जाथि। ताधरि निरसू बाबूक दुनू बालक छोट रहथिन आऽ पंजीकारी नहि करथि। हुनकर जेठ बालक प्रोफेसर (डॉ.) कालिकादत्त झा, जे सम्प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक संस्कृत विभागक अध्यक्ष रहथि आऽ विगत लगभग दस-पन्द्रह वर्षसँ दरभंगामे रहि रहल छथि (पहिने मगध विश्वविद्यालय, गयामे रहथि) आब सक्रिय रूपेँ अधिकार जँचबा आ सिद्धान्त लिखबाक काज करय लागल छथि। ताहिसँ पहिने मोदानन्दे बाबू अपन गुरुक ओहिठाम अयनिहार लोकनि लेल सिद्धान्तादि लिखथिन। ततबे नहि ओऽ निरसू बाबूक पुत्र लोकनिकेँ पंजी-ज्ञान सेह् देलथिन आ आइयो कालिकादत्त बाबू गुरु रूपहि हुनका प्रति श्रद्धा रखैत छथि।
मोदानन्द बाबू पंजीकारीक व्यवसायसँ जे धनार्जन करथि ताहिसँ सन्तुष्ट छलाह। सिद्धान्त लिखबासँ तथा विदाइसँ हुनका पर्याप्त कमाइ होइन आओर खेत-पथारसँ सेहो नीक आय होइत छलनि।
कमाइसँ बेसी हुनकर अभिरुचि ज्ञानक विस्तारमे आ पंजीसँ सम्बन्धित विषयपर शोध करबामे छलनि। मैथिलीक महान् विद्वान, आलोचक आ समीक्षक डॉ. रमानाथ झाक संग ओऽ पृथक-पृथक विभिन्न मूलक विख्यात छवि, विद्वान् आ राजा-जमीन्दार सबहक वंश-परिचय तैयार करबा दिस प्रवृत्त भेलाह आ तकरहि परिणाम छल पूर्णियाँक प्रसिद्ध बनेली राजवंशक परिचयात्मक पुस्तक अलयीकुल प्रकाशक प्रकाशन। आन एहन प्रकारक कृत्य नहि तैयार कयल जा सकल तकर हुनका क्षोभ छलनि। हुनकर शोधपरक सोचक अंग छल एक अन्य परियोजना जाहिक अन्तर्गत विशिष्ट गाममे बसनिहार मैथिल ब्राह्मण सभक बीजी पुरुष धरिक परिचयात्मक विवरण तैयार करब अभीष्ट छल। ओऽ सर्वप्रथम कोइलख गामक सम्बन्धमे एहन रचना लिखलनि। ओऽ हमरा तकर कतिपय अंश सुनेबो कयलनि। हुनकर इच्छा रहनि जे उक्त रचनाक प्रकाशन हो मुदा से आइ धरि नहि भऽ सकल अछि। उपर्युक्त दुनू प्रकारक शोध परियोजनाक पंजीकार समाजमे सामान्यतः आलोचना भेलैक कियैक तँ ओऽ अपन रचनामे एहनो विवरणक सन्निवेश करय चाहैत रहथि जे पंजीकारीक व्यवसायमे प्रकाशित करब वर्जित कहल जाइत छैक- वस्तुतः ओऽ विवरण सभ दूषण पञ्जीक अंग होइत छैक जाहिमे व्यक्ति आऽ परिवार विशेषक सम्बन्धमे ज्ञात अशोभनीय आ अप्रकाश्य बात उल्लिखित रहैत छैक। एहि क्रममे एक तेसर परियोजना, जाहिपर ओऽ उन्नैस सय पचासहिक दशकमे कार्य आरम्भ कयलनि छल, ओहन पञ्जीकार परिवार लग उपलब्ध पाण्डुलिपिक संग्रह करब जाहि परिवारमे आब क्यो पंजीकारीक व्यवसायमे नहि रहि गेल रहथि आ हुनकर पंजी-पोथी सभ नष्ट भऽ रहल छलनि। पिताक मृत्यु भऽ गेलासँ हुनकर दरभंगा सम्पर्क घटि गेलनि आ पूर्णियाँमे पारिवारिक सम्पत्तिक प्रबन्धनमे अपेक्षाकृत बेसी समय लगबय पड़नि। तथापि हुनकर शोध-दृष्टि बनल रहलनि आऽ ओऽ अपेक्षा करथि जे सामाजिक विज्ञानमे आधुनिक शोध तकनीकसँ परिचित क्यो व्यक्ति हुनका संग रहि उपर्युक्त परियोजना सभ तँ पूर्ण करबे करथि पंजीसँ सम्बन्धित आनोआन विषयपर काज करथि। हुनकर ई अभिलाषा नहि पूर्ण भेलनि मुदा हुनक पुत्र मोहनजी, जे पञ्जीकारीक पैत्रिक व्यवसायमे लागि क्रमिक रूपेँ कौलिक प्रतिष्ठाक विस्तार कय रहल छथि। आ अनुकरणीय रूपसँ पितृभक्त सेहो छथि, एहि दिशामे भविष्यमे क्रियाशील भऽ सकैत छथि।
स्वयं शोधपरक दृष्टि आ रुचि रखनिहार मोदानन्द बाबू जिज्ञासु लोकनिक मदति करबालेल सदति तत्पर रहैत रहथि। हमरा कमसँ कम दू अवसरपर एकर लाभ भेटल। हम १९८७-८८मे बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटनाक अनुरोधपर बिहारक एक पूर्व मुख्यमंत्री पं. विनोदानन्द झाक जीवनी लिखि रहल छलहुँ मुदा हुनकर वंश-परिचय कतहु प्राप्य नहि छल। आधा-छिधा भेटबो कयल तँ प्रामाणिक नहि। हम कैकटा पंजीकारसँ एहि सम्बन्धमे जिज्ञासा कयलहुँ मुदा व्यर्थ। मात्र मोदानन्द बाबू सूचना देलनि जे हुनकर एक परिजन स्व. गिरिजानन्द झा गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण आ पंडा सभक वंशावली तैयार करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि आ अपना संग शिवनगर स्थित हुनकर घरमे जाऽ ओहि संग्रहमे विनोदानन्द झाक वंश परिचय तकबाक चेष्टो कयलनि, मुदा हुनकर पंजी-पोथी सभ व्यवस्थित आ संगठित नहि भेलाक कारणेँ से संभव नहि भेल। जे हो, हमरा ई अवश्य ज्ञात भऽ गेल जे यदि स्व. गिरिजानन्द झाक पोथी-पंजी व्यवस्थित नहि कयल गेलनि तऽ गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण लोकनिक पूर्वजसँ सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचना सभ लुप्त भऽ जेतैक कियैक तँ गिरिजानन्द बाबूक परिवारमे आन किनकहु पंजीकारीक व्यवसायमे रुचि नहि छनि। दोसर अवसर छल जखन भारतीय इतिहास शोध परिषदक अनुरोधपर हमरा पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा ग्राममे उत्पन्न सुविज्ञात इतिहासकार प्रोफेसर जगदीश चन्द्र झाक अंग्रेजीमे लिखल विलक्षण पोथी “माइग्रेशन ऐन्ड एचीवमेन्ट्स ऑफ मैथिल पंडित्स: दि माइग्रैन्ट स्कौलर्स ऑफ मिथिला (८००-१९४७)क १९९० मे समीक्षा लिखबाक छल। ओहि पोथीक परिशिष्टमे कम-सँ-कम तीन पंडित (१) महामहोपाध्याय नेनन प्रसिद्ध दीनबन्धु झा, (२) म.म.भवनाथ झा आ(३)म.म.गुणाकर झा केर वंश परिचय देल छल किन्तु लेखककेँ हुनका लोकनिक मूल ज्ञात नहि भऽ सकलनि। मोदनन्द बाबू क्षण भरि ध्यानस्थ भेलाह आ कहलनि जे ई लोकनि क्रमशः खौवालय सुखेत, नरौने पूरे आ खौवालय नाहस मूलक छलाह। एतय ई कहब आवश्यक जे मूल आ एक-दू खाढ़िक व्यक्तिक नाम देल रहलापर आन सम्बन्धित सूचना देव संभव छैक मुदा उपर्युक्त उदाहरणमे तँ उनटा बात छैक आ तैयो मोदानन्दे बाबू सन पंजीकार छलाह जे वांछित सूचना तत्काल देबामे समर्थ भेलाह। ओ ओहि पुस्तकमे उल्लिखित पन्द्रह खनाम मूलक प्रसिद्ध विद्वान् गोकुलनाथ, हुनक पिता पीताम्बर आ पुत्र रघुनाथक विषयमे बतौलनि जे ओ तीनू मिथिलाक बारह सडयन्त्री अथवा सर्वज्ञाता विद्वान् मे सँ छलाह। गोकुलनाथक पितामहक नाम रामभद्र छलनि, रामचन्द्र नहि। एतबहि नहि ओ इहो बतौलनि जे मिथिलाक एक घुमक्कड़ विद्वान् ककरौर वासी पड़वे महेन्द्रपुर मूलक गुणाकर झाक एक वंशज धीरेन्द्र झा सेहो छलाह जे आइसँ लगभग चारि सय वर्ष पूर्व बंगाल जाय ओतुक्का ब्राह्मण सभक पंजी-सूचनाक संशोधन-संवर्द्धनक क्रममे अनेक ब्राह्मणेतर व्यक्ति सभकेँ ब्राह्मणक रूपमे पंजीमे परिगणित कय देलथिन। अपन पंजी-पोथीमे उक्त धीरेन्द्र झा अपनाकेँ आ अपन पिताकेँ पंजी पंचानन कहि सम्बोधित कयलनि अछि। एहन कतेको सूचना मोदानन्द बाबू जिज्ञासु व्यक्ति सभकेँ दैत रहैत छलथिन।
ओ अपन समाजमे अपन विद्वता, उदारता आ सहज सम्प्रेषणीयताक कारणेँ सर्वत्र समादृत रहथि। हम जखन छट छलहुँ, आइसँ प्रायः पचास वर्ष पूर्व, ओ हमर गाम विष्णुपुर अथवा पूर्णियाँ शहर स्थित हमर डेरा आबथि तऽ सम्पूर्ण परिवार हुनकर सम्मानमे सन्नद्ध रहैत छल। ओ सभक छुइल भोजन कहियो नहि कयलनि। बेसी काल सभ सामग्री दऽ देल जाइन तऽ ओ अपन पाक अपनहि करथि। हमरा बूझल अछि जे कैक बेर हमर सभसँ जेठ पित्ती, पूर्णियाँक अत्यन्त समादृत ओकील आ भरि बिहारमे सभसँ बेसी अवधि धरि सरकारी ओकील रहनिहार स्व. कपिलेश्वर मिश्र अपन हाथें हुनका लेल पाक करथिन। हमरा परिवारमे तऽ हुनका सदैव सम्मान भेटबे करैत रहनि मुदा अन्यत्रो कम नहि। एक बेरक घटना सुनबैत ओ कहने छलाह जे ओ वर्तमान बांग्ला देशक एक मैथिल ब्राह्मण बहुल गाम बोधगाम गेल छलाह जतय हुनका प्रचुर विदाइ तऽ भेटबे कयलनि ओतुका लोक सभ हुनकर पएर पखारि चरणोदक सेहो लेने रहनि।
मोदानन्द बाबू अपन चिन्तनमे एक तरहेँ प्रगतिशील आ सुधारक सेहो रहथि। हुनकर चेष्टा रहनि जे पंजीकार लोकनि मात्र अधिक सँ अधिक धनार्जन मे लागि अपन वृत्तिक प्रतिष्ठार्थ सेहो सोचथि। हुनका ई नीक नहि लगनि जे पंजीकार सभ एक दोसराक प्रति द्वेष भावसँ कार्य करथि। हुनकर इच्छा रहनि जे सभ मिलि पंजी आओर पंजीकारक संस्थाकेँ जीवन्त बनाबथि तथा समाजमे हुनका सभकेँ जे आदर प्राप्त रहनि तकर लाभ लए समाजकेँ दिशा निर्देश देथिन। ओ राजदरभंगाक निर्देशमे चलि रहल पंजी व्यवस्थाक प्रजातंत्रीकरणक पक्षमे रहथि जाहिसँ ब्राह्मण समाजक सभ वर्गक प्रतिनिधि मिलि ओहिना परमानगी दय जातीय स्तरीकरणमे समय-समयपर वांछित परिवर्तन करथि जेना राज दरभंगाक तत्वावधानमे अतीतमे कैक बेर कयल गेल छलैक। जे कोनो ब्राह्मण परिवार पंजी-व्यवस्था विहित रीतिसँ नीक वैवाहिक सम्बन्ध करथि तनिकर स्तरोन्नयन करबाक ओ पक्षमे रहथि। १९६६ मे हमर पित्ती डॉ. रामेश्वर मिश्रक विवाह जखन सोनपुर (उजान) वासी प्रसिद्ध श्रोत्रिय ब्राह्मण स्व. दुर्गेश्वर ठाकुरक कन्यासँ स्थिर भेलनि तँ मोदानन्द बाबू राजसँ परमानगी प्राप्त करबामे तऽ सहयोगी भेबे केलथिन, सौराठमे अधिकांश पंजीकारक बैसक बजाय सभक सहमतिसँ हमर प्रपितामह लाल मिश्रक सभ सन्तति लेल कन्हौली पाँजिक स्थापना सेहो करबौलनि। ओ प्रायः खभगड़ा (अररिया जिला) वासी स्व. बालकृष्ण झाक परिवार आ कतिपय आनो परिवार लेल एहने स्तरोन्नयनक पक्षमे रहथि। हुनकर मन्तव्य रहनि जे जमीन्दारी प्रथाक उन्मूलनसँ आन अनेक संस्थाक संग पंजी व्यवस्थाक सेहो बड़ क्षति भेलैक। जमीन्दार लोकनि परम्परा आ संस्कृतिक सम्पोषक रहथि मुदा आब हुनकर स्थान लेनिहार सरकार अथवा कोनो आन संस्था से काज ताहि रूपेँ नहि कऽ पाबि रहल अछि। पंजीकार लोकनिक दुर्दशाक एक कारण जमीन्दारक समाप्ति सेहो भेल। हुनका सन्तोष रहनि जे पटनाक मैथिली अकादमी सन संस्था हुनक जीवन पर्यन्तक सेवाक मान्यता दय हुनका सम्मानित कयने छलनि, मुदा से संभव भेल छल अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. मदनेश्वर मिश्रक व्यक्तिगत प्रयाससँ, अन्यथा आन किछु श्रोत्रिय, योग्य आ कुलीन परिवारकेँ छोड़ि अनेकशः मैथिल ब्राह्मण परिवारेकेँ जखन पंजीकार अथवा हुनका द्वारा कयल सिद्धान्तक प्रयोजन नहि रहलनि तऽ ब्राह्मणेतर समाज आ प्रायशः तकरहि प्रतिनिधि सरकार पंजीकारक स्थितिमे सुधारक कोनो यत्न कियैक करत।
मिथिला विभूति स्व. मोदानन्द झाक स्मृतिक संरक्षणार्थ ई सर्वतोभावेन वांछनीय अछि जे पूर्णियाँमे हुनका द्वारा सुविचारित शोध परियोजना सभपर काज करबाओल जाय, स्व. गिरिजानन्द झा सन मिथिला भरिमे पसरल पञ्जीकार लोकनिक ओतय उपलब्ध ओ पंजी-पांडुलिपि सभक संग्रह कयल जाय जे आब कतिपय कारणसँ उपयोगमे नहि रहि गेल अछि, मैथिल मूल ग्राम सभक अभिज्ञान प्राप्त कयल जाय तथा ज्ञात अथवा अज्ञात मैथिल ब्राह्मण परिवारक विशिष्टताक प्रचारार्थ परिचयात्मक विवरणिका तैयार करबाओल जाय। पंजी व्यवस्था निश्चयतः पतनोन्मुख अछि मुदा मोदानन्द बाबूक बताओल मार्गपर जौं शोध कार्य कयल गेल तऽ मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासक अभूतपूर्व सेवा होयत।
ज्योति
ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि http://www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ”मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
एम पी टूर
पहिल दिन
23 दिसम्बर 1991 सोम दिन :
हमसब अपन शिक्षक द्वारा निर्देशित पूर्व सूचित कार्यक्रमानुसार 2ः30 बजे दोपहरमे स्टेशन पहुंचलहॅं। ओतऽ अपन सहयात्री साथी सबसऽ भेंट करक उत्सुवकता तऽ स्वभाविक छल। संगहि अपन अभिभावक द्वारा शिक्षक सबलग चिन्ता व्यक्तस केनाइर् सेहाे आश्चर्यजनक नहिं छल। अगर किछु नब छल तऽ शिक्षकगण़ किछु विद्यार्थी एवम् भ्रमण करैलेल चुनल गेल स्थान।हमर सबहक जिज्ञासा तहन कनिक धैर्य पौलक जखन गाड़ी प्लेणटफाॅर्म पर आयल आ हम सब रिजर्व बॉगीमे अपन सामान रखलहुं।गाड़ी ठीक साढ़े तीन बजे विदा भेल। हमहु सब अपन अभिभावक सबके टाटा करैत अपन नब टोलीमे जुटि गेलहुं।दू तीन घंटाक भीतर चक्रधरपुर आबैत आबैत हमर सबहक बढ़िया चिन्हा परिचय भऽ गेल।एक स बढ़ि कऽ एक नब प््रा तिभा उभरैत गेल।कियाे नृत्यर सऽ सबके मनाेरंजन केलक तऽ कियाे माउथ आॅरगन सऽ सुन्दर धुन सुनेलक। चुटकुला किस्सा आ गीतके तऽ अन्ते नहिं।बीच बीच मे बाहरक दृष्यक अवलाेकन सेहो करी लेकिन ओ अतेक मनोरंजक नहिं छल जेहेन बॉगीक माहौल छल। तैयो जखन स्टेशन पर गाड़ी रूकै तऽ अपन हल्ला हुच्चड़ हम सब कम कऽ दएत छलहुं। इ शिक्षक सबहक आदेश छल।अहि तरहे आहि के दिन चिन्हा परिचय आ यात्रा मे बीतल।स्टेशन पर सऽ खरीदल नास्ता आ रेलवेक भोजन सऽ काज चलल। राइतमे सुतै काल हमरा सबके बहुत हंगामा होएत छल। सब एक दोसरक एअर पिल्लो के नाब निकाइल दैत छल। जॅं नाब भीतर दिस राखू त पिन भोइक कऽ हवा निकाइल दैत छल। कोनो तरहे बिना तकिये के सूतक छल तखन कियै पिन भाेकवाकऽ तकियाके आगाेंलेल खराब करितहु तैं नाब निकालक मौका देनाइ बेसी ठीक लागल।काल्हि जल्दी उतरक छल तैं कम सऽ कम समान निकालने रही जे हरबरी मे किछु छुटै नहिं।
जितेन्द्र झा- जनकपुर
अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद अपन बिभिन्न माग सहित भारतक राजधानी नयां दिल्लीस्थित जन्तर मन्तरमे धर्ना देलक अछि । सोमदिन देल गेल एहि धर्नामे भारतक विभिन्न स्थानसं आएल मैथिल आ संघ संस्थाक प्रतिनिधि सहभागी रहथि । जन्तर मन्तरमे भेल एहि धर्नामे मिथिला क्षेत्रक विकासक लेल अलग मिथिला राज्य बनाओल जाए से माग कएल गेल । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद एहि अवसरपर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलके ज्ञापन पत्र सेहो बुझौलक । ज्ञापन पत्र बुझेनिहार प्रतिनिधि मण्डलमे डा भुवने•ार प्रसाद गुरमैता, डा रबिन्द्र झा, डा धनाकर ठाकुर,डा कमलाकान्त झा, चुनचुन मिश्र, भवेश नन्दनसहितके सहभागिता छल । परिषदक धर्नामे दिल्लीमे रहल विभिन्न राजनीतिक दलसं सम्बद्ध नेतालोकनि सेहो सहभागी रहथि। परिषदक नेपालक पदाधिकारी आ कार्यकर्ता सेहो धर्नामे सामेल रहथि । धर्नामे भीख़ नंहि अधिकार चाही हमरा मिथिला राज्य चाही से नारा लगाओल गेल रहए । परिषद मैथिली भाषाक आधारपर राज्य बनएबाक माग करैत आएल अछि ।
कोना बचाएब संस्कृतिक विरासत ?

मिथिलाक परम्परा आ धरोहरिके मौलिक विशिष्टता गुमिरहल कहैत विज्ञसभ चिन्ता ब्यक्त कएलनि अछि । संस्कृतिक अपन अलग स्थान बांचल रहए से डा गंगेश गुन्जक कहब छन्हि । मैथिली संस्कृतिक विभिन्न पक्षपर नयां दिल्लीमे २५ दिसम्बरक’ सम्पन्न गोष्ठीमे बजैत गुन्जन मैथिली संस्कृतिक संरक्षणपर जोड देने रहथि ।

नाटककार महेन्द्र मलंगिया मिथिलाक लोकसंस्कृतिमे रहल टाना टापर, घरेलु उपचार, शकुन सहितके विषयके फ़रिछियाक’ प्रस्तुत कएने रहथि । मैथिली संस्कृतिक संरक्षणलेल एहिमे समाहित गुणके उजागर करब आवश्यक रहल मलंगिया कहलनि । मिथिलामे सातो दिन सात तरहक वस्तु खाक’ यात्रा गेलासं शुभ यात्रा हएबाक चलन आ एहने चलनमे रहल वैज्ञानिकता दिश ध्यान जाएब आवश्यक रहल ओ कहलनि ।

साहित्यकार देव शंकर नविन मैथिली भाषा संस्कृतिके मुल भावना विपरित होबए बला काजके अपमानित कएल जाए से कहलनि । मैथिलीक मौलिकताके लतियाक’ कएल जाए बला कोनो काजके बहिष्कार कएल जाए नविनक विचार छन्हि । गायक, साहित्यकार सहित सभके मैथिली गीत संगीत, भाषा संस्कृतिके प्रतिकुल असर होब बला काज नई करबालेल ओ आग्रह कएलनि । नक्कल आ स्तरहीन प्रस्तुतिके अपमानित करबालेल नविन आग्रह कएलनि ।

मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष अनिल मिश्र मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके विकासक सम्भावना बढाओल जाए से कहलनि । साहित्य, लोक संस्कृतिके समॄद्ध कएल जाए से कहैत ओ मैथिली भोजपुरी एकेडमी एहिदिशसं एहिलेल काज हएबाक प्रतिबद्धता ब्यक्त कएलनि । मिथिला संस्कृति लेल कएल जाएबला काज आपसमे बांटि लेल जाए से मिश्रक सुझाव छन्हि । संस्कृतिक विरासतके रेखाङकित करैत रोड मैप बनएबापर ओ जोड देलनि । संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान भेटए ताहिलेल प्रयास कएल जएबाक ओ जनतब देलनि । दिल्ली प्रसारित सरकार दुरदर्शनमें मैथिलीक स्थानलेल दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षितके ज्ञापन पेश कएल जएबाक आश्र्वासन देलनि ।
सुभाषचन्द्र यादव एकमात्र वक्ता रहथि जे अपन विचार पहिनहिये सँ लिखि क’ देने रहथि से एतए प्रस्तुत अछि।-
मैथिली लोक-कथा
सुभष चंद्र यादव
मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक , जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब आनक भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि ।
मैथिली मे लोक-गीत, लोक – गाथा आ लोक – देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक – कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक युश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक – साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संश्क्षण जरूरी अछि ।
लोक – साहित्यक संश्क्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक , भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी । तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि ।
लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि । ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि । जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उअपस्थित कयल गेल अछि ।
लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोक – कथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक , से कम आयल अछि ।
रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि । लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि — ‘एकटा बुढ़िया रहय ‘ आ ‘ एकटा चिनता खेलिऐ रओ भैया ‘।
एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि । दुनू क विमर्श , आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि । दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि ।
पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा , रानी , आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक ।
कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि – हाथी – हाथी – हाथी ! समुद्र सोखू समुद्र । समुद्र ने अगिन मिझाबय , अगिन । अगिन ने रानी डेराबय , रानी । रानी ने राजा बुझाबथि , राजा । राजा ने बरही डाँड़थि , बरही । बरही ने खुट्टी चीड़य , खुट्टी। खुट्टी ने दालि डिअय , दालि । की खाउ , की पीबू , की लऽ परदेस जाउ।
जाइत अछि । चुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक । फेर तऽ चुट्टीक डरँ हाथी , हाथीक डरँ समुद्र , समुद्रक डरँ आगि , आगिक डरँ रानी , रानीक डरँ राजा , राजाक डरँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक ।
ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनन छलाह । ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक । लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि । हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू चुट्टी धरि जाइत अछि । बुढ़िया केँ चुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक । लेकिन लोक – कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि ?
एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि , सएह एहि कथाक आत्म – वाचन थिक । एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि । राजा- रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा – मोतीक दान नहि लैत अछि । दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि । तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही । भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही । दान लेब नीक नहि । स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही ।
कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक ।
’एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया ’ न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि । मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक रूपमे चलैत छैक , जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक ।
बरदवला भाइ !
परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता
भुखै मरै छै बच्चा
एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया
तइलएपकड़ने जाइए ।
फेर घोड़ावला अबै छै , हाथीवला अबै छै , खुद्दी-वला अबै छै । मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि ।ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक;=छोड़बाक बदला मे बरद , घोड़ा , हाथी देबऽ लेल तैयार छैक ,लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि । जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक , तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि ।
मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि । मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक ; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल । इएह कथाक आत्मवाचन थिक ।
कथा ई प्रतिमान उप़स्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक । एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही।

श्याम भद्र मैथिली भाषाक अपन संचारमाध्यम हुअए से माग कएलनि । एहिलेल संगठित प्रयास करबालेल ओ कार्यक्रममे आग्रह कएलनि । बिहारमे अतिरिक्त भाषाके श्रेणीमे मैथिलीके राखल गेल कहैत भद्र रोष प्रकट कएलनि । मातृभाषाक श्रेणीमे मैथिली नई भेलासं विद्यार्थी मैथिली नई पढि रहल हुनक दाबी छन्हि ।

रंगकर्मी प्रमिला झा मेमोरियल ट्रष्ट घोंघौरक ट्रष्टी श्रीनारायण झा मैथिलमे प्रतिबद्धताक कमी हएबाक विचार व्यक्त कएलनि । हिन्दीमे लिखनिहार मैथिल स्रष्टा अपन मैथिली भाषामे किया नईं लिखैया नारायणक प्रतिप्रश्न रहनि । मैथिलीके समांग आ समान दुनु रहैत स्थिति सन्तोषजनक नइ रहल ओ कहलनि । अष्ट्‌म अनुसूचिमे मैथिली आबि गेलाक बाद आब सहज रुपे भाषा संस्कृतिक काज आगु बढए नारायण कहलनि ।

गोष्ठीमे मैथिलीलेल काज कएनिहार संस्थाक वर्तमान भूत भविष्यपर सेहो वक्तासभ बाजल रहथि । मैथिलीमे रंगकर्मक विकासके बात होइतो एहिमे काज कएनिहारके प्रोत्साहनलेल कोनो पक्षसं ध्यान नई देल गेल कहल गेल । प्रमिला झा नाटयवृति शुरु भेलाक बादो एक्कोटा नव पुरस्कार/वृत्तिक शुरुवात नई भ’ सकल मैलोरंगक प्रकाश झा कहलनि । तहिना झा एकगोट मैथिल दोसर मैथिल पर विश्र्वास करए त सभ तरहक समस्या समाधान हएत कहलनि । मैथिलबीचके आपसी विश्र्वासके ओ विकासक मूलमन्त्रके संज्ञा देलनि ।

अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषदक कृपानन्द झा सरकारी स्तरपर मैथिलीके संरक्षण नई भेट रहल कहैत रोष प्रकट कएलनि । मैथिलीक संरक्षण लेल मिथिला राज्य स्थापना हुअए – झा कहलनि । मैथिली भाषा संस्कृतिदिश लागल संस्था आर्थिक संकटसं ग्रस्त रहल कहैत ओ गोष्ठीमे सहभागीके ध्यानाकर्षण करौने रहथि ।

विद्यापति संगीत संरक्षणलेल योजनाबद्ध काज हएब आवश्यक रहल गायिका अंशुमालाक विचार छन्हि । दिल्ली युनिवर्सिटीमे संगीतसं एम फ़िल क’ रहल अंशुमाला विद्यापति संगीतले स्थापित करबालेल व्याकरणक आवश्यकता पर जोड देलनि । मैथिलीमे लोकसंगीत आ युवाबीचके दुरी बढब चिन्ताक विषय रहल ओ कहलनि । ‘लोकसंगीत नई बुझनिहार लडकीसं वियाह नई करब एहन चलन हएबाक चाही’ मैथिली संस्कृति संरक्षणलेल अंशुमाला सुझाव दैत बजलिह ।

गोष्ठीमे सहभागी रंगकर्मी अपन कथा ब्यथा सेहो सुनौने रहथि । दिल्लीमे रहिक’ रंगकर्म क’ संघर्षरत कलाकार बाध्यताबश गुणस्तरहीन काज क’ रहल मैलोरंगक दीपक झा कहलनि । एहिद्वारे कलाकारके अपमानित करबाक काज कियो नई करए दिपकके आग्रह छन्हि ।

संस्कृति बचएबाक अभियान

मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके संरक्षण सम्बर्द्धनक लेल योजनाबद्ध काज करबा पर जोड देल गेल अछि । मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत : संरक्षण आ विकासक सम्भावना विषयपर बजैत वक्तासभ एहन विचार रखलनि अछि ।
मैथिली लोक रंग दिल्लीक आयोजनमे २५ दिसम्बरक’ सम्पन्न मैथिलोत्सवमे बजैत वक्तासभ मैथिली संस्कृति रक्षाक लेल ठोस कार्ययोजना बनाओल जाए से कहलनि । मैथिलोत्वसमे भेल संगोष्ठीमे लोक नाटय, खानपान, हस्तशिल्प, लोक नॄत्य, लोक विश्र्वास, पुरातात्विक संरक्षण, चित्रकला, पाण्डूलिपि, पावनि तिहार, देवी देवता, रीति रिवाज, मठ-मन्दिर, पहिरन-ओढन, लोकसाहित्य, लोकवाद्य, शिष्टाचार,मेला सहितक विषयपर वक्तासभ बाजल रहथि ।

गोष्ठीमे कथाकार अशोक, कमलमोहन चुन्नु, नाटककार महेन्द्र मलंगिया, मोहन भारद्वाज, सीयाराम झा सरस, सुभाष चन्द्र यादव, गंगेश गुन्जन, मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष प्रो अनिल मिश्र, डा अनिल चौधरी, देवशंकर नविन सहित वक्तासभ मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक विभिन्न विषयपर बाजल रहथि ।
भारतीय भाषा संस्थान मैसुरक सहयोगमे मैलोरंग नयां दिल्लीक राष्ट्रिय नाटय विद्यालयमे कार्यक्रम आयोजन कएने छल।

मैथिलोत्वसमे मैलोरंग रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्ति सेहो वितरण कएलक । एहिबेरक नाटयवृत्तिक पओनिहारिमे पहिल मधुबनीक मधुमिता श्रीवास्तव, द्वितीय कोलकाताक वन्दना ठाकुर आ तृतीय दिल्लीक नेहा वर्मा छथि।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाटय निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीलाक स्मृतिमे स्थापित प्रमीला मेमोरियल ट्रष्ट,घोंघौर एहि नाटयवृतिक स्थापना कएने अछि ।

मैथिलोत्वसमे संगोष्ठी, वृति वितरणक बाद सांगीतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल छल । सांगीतिक कार्यक्रममे सुन्दरम, घनश्याम, दिवाकर, प्रभाकर, गुन्जन, अंशुमाला, कल्पना मिश्रा, राखी दास,रीतेस सहितक कलाकार दर्शकके मनोरन्जन करौने रहथि ।

उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज
बहादुरगंज स’ रिपोर्ट- बाढक स्थिति बडे खतरनाक रहल, आब कोना के ओ बीत गेल। हमर सभक गाममे कोनो राहत कर्मी नै अएला, नेता सभ चुनाव मे अबै छथ, मुदा रौदी दाही मे नै।
गाममे सरकारी स्कूल अछि, सप्ताहमे दू दिन खुजल रहै ये, कशीबारी मे। चारि दिन बन्दे रहै ये, अहा पत्रकार छी हितेन्द्र भैया ई मुद्दा तैं भेजी रहल छी। गामक लोक खेती बारी करै ये , धान,गेहूँ परवल खीरा, करैला, कद्दू ,तारबूज ,गोभी, बैगन आ मछली मारै ये।
विराटनगर नेपाल मे सेहो लोक सभ सम्बन्धी सभ छथि, 20 किमी दूर बहादुरगंजमे हास्पीटल अछि, गाममे झोलाछाप हास्पीटल अछि जे झोलाछाप डाक्टरक झोरामे रहै ये। पिछला साल एक गोटे के बहादुर गँज हास्पीटल् ले गेलौ, डाक्टर सभ पानी चढा देलकै , तीन दिन तक पानी चढैते रहलै, कियो खेनाइ नै देलकै, ओ पेट फूलि क मरि गेल।
घर सभ फूसक आ घासक, धानक पुआरक बनल छै, अगिलग्गेमे से सभ जरैत रहैत छै।
एक-एक्अ आदमी के 5-6 टा बच्चा जिबैत रहैत छै, 9-10 बच्चामे।
विराटनगर लग गाम मे मौसाक घर गेलौ, ओतए सरकार मैथिली या नेपाली बाजय लेल कहने अछि, सभ गोटे ओत मैथिली बाजै छथि, भारतमे स्थिति खराप।
नेपालमे मैथिली के नीक स्थितिक कारन अछि ओतुक्का मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मन आ कर्न कायस्थ मे सीमित नै अछि, ओतय महतो यादव सभ मैथिली के अपन बुझैत छथि. भारतमे कतेको ठाम मात्र दू जातिमे सीमित अछि, तेसर के अशुद्ध कहल जै छै से ओ अपनाके मैथिली से दूर केने छथि,जाति-पाति से अपन उन्नति जे हुए मुदा समाजक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मैथिलीक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मिथिला के उन्नति नै हैत

जाति-पाति से कुंठाग्रस्त लोक नीक रचना नै लिखि सकताह आ घृनामे जरैत रह ताह।

नेपालमे घर फूसोके छै मुदा बेसी लकडी आ टीना के छै। ओत खेती बारी भारते जेका छै। ओतहुओ हास्पीटल दूरे छै।
ओते रिक्शा टेम्पू नै चलै छै, खाली बस चलै छै। ओत गाम्मे सेहो बिज्ली छै, गाममे मुदा रोड नै छै, ऊबर खाबर छै, बरसातमे कीचड्क्ष भे जाइ छै। शहरमे रोड ठीक छै। विराटनगर से 20 किलोमीटर दूर नया बजार हटियामे आधा बजार मे बजार आ आधामे दारू बिकाइत छै, जतए छोट से पैघ बच्चा सभी दारू पीबै छै।
आर समाचार बाद मे।

अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व
-नवेन्दु कुमार झा
मिथिलांचलक सांस्कृतिक धरोहर महाकवि विद्यापतिक जयन्तीक प्रतीक्षा मिथिलावासी वर्ष भरि करैत छथि। कार्तिक धवल त्रयोदशीकेँ प्रति वर्ष मनाओल जाएवला एहि वार्षिक उत्सवमे पूरा मनोयोगक संग मिथिलावासी शामिल होइत छथि। एहि क्रममे राजधानी पटनामे आयोजित होमएवाला विद्यापति स्मृति पर्वक प्रतीक्षा सेहो राजधानीक मिथिलावासीकेँ रहैत अछि। मुदा एहि वर्ष एहि आयोजनपर जेना ग्रहण लागि गेल अछि। बढ़ैत संसाधनक बावजूद आयोजक एहि सांस्कृतिक उत्सवक स्वरूप वर्ष-दर-वर्ष छोट कएने जा रहल छथि। ई आयोजन आब इतिहास बनबाक द्वारपर ठाढ़ अछि। पछिला चौबन वर्षसँ प्रति वर्ष आयोजित होमएवाला त्रिदिवसीय कार्यक्रम एहि वर्ष एक दिवसीय होएबाक संवाद अछि। पटनाक हार्डिंग पार्कसँ सचिवालय मैदान आ मिलर हाई स्कूल मैदान होइत ई आयोजन जखन भारत स्काउट मैदान धरि आएल ता धरि ई उम्मीद छल जे ई समारोह अपन पुरान गौरवकेँ फेरसँ प्राप्त करत मुदा जखन एहि समारोहक स्थान परिवर्तित कऽ कापरेटिव फेडरेशन परिसर आबि गेल तऽ स्पष्ट भऽ गेल जे आब आयोजक मात्र खानापूर्ति करबाक लेल एकर आयोजन करैत छथि। आ एहि बेरक सूचनापर गौर करी तऽ स्पष्ट होइत अछि जे आब एहि समारोहक आयोजन मात्र औपचारिकता रहि गेल अछि। कोसी क्षेत्रमे आएल बाढ़ि आयोजक सभकेँ एकटा बहाना बनि गेल अछि आ एहि बहाने एहि समारोहक गौरवपूर्ण इतिहासकेँ समाप्त करबापर लागल छथि।
बाढ़ि मिथिलांचलक नियति अछि। शायदे कोनो वर्ष होएत जखन कि एहि प्राकृतिक आपदाक सामना नहि होइत अछि मुदा एहि बेर कोसीमे आएल बाढ़िसँ आयोजक संस्था चेतना समितिक कर्ता धर्ताकेँ अपन गाम-घर दहाएल तँ हुनक दर्द जागि उठल आ कार्यक्रमक समय-सीमा घटा देलनि। दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आदि मिथिलांचलक कतेको क्षेत्र सभ साल बाढ़िक मारि झेलैत अछि मुदा बिना रुकावट सभ साल तीन दिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजन होइत रहल अछि। ओहि क्षेत्र सभक चिन्ता समितिकेँ शायद नहि रहैत छल। ज्यो बाढ़िक समस्याक प्रति एतेक गंभीर छलाह तँ पूर्वमे कतेको बेर आएल बाढ़िक बाद एहि आयोजनकेँ छोट कएल जा सकैत छल से आइ धरि नहि भेल। ज्यो अहू बेर आयोजक एहि समस्याक प्रति गंभीर रहितथि तँ एहि समारोहक माध्यमसँ राजधानीक मिथिलावासीक सहयोग बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल लऽ सकैत छलाह। एहन रचनात्मक डेग संस्था उठाएत से संस्थाक कर्ता-धर्ताक आदति नहि रहलनि अछि। एहिसँ समितिकेँ सामूहिक श्रेय भेटैत से तऽ संस्थाक महानुभाव लोकनिकेँ कतहु मंजूर नहि छलनि। ओ तँ व्यक्तिगत श्रेय लेबापर विश्वास करैत छथि।
दरअसल चेतना समितिक जुझारू पदाधिकारी सभमे आब काज करबाक चेतना नहि बचल अछि। नहि तँ ओ एहिपर जरूर चिन्तन करितथि जे एहि समारोहमे प्रतिवर्ष दर्शकक संख्या किए कम भऽ रहल अछि। जखन संस्थाक स्तरसँ दर्शककेँ जोड़बाक कोनो प्रयास नहि भऽ रहल अछि तँ एहिमे दर्शक दिससँ प्रयास होएबाक बात सोचब निरर्थक अछि। ओना आयोजक कतेको वर्षसँ एहि समारोहकेँ विराम देबाक प्रयासमे छथि। कखनो चुनावक बहाना बना तँ कखनो कानून व्यवस्थाक बहाने एहि कार्यक्रमक स्वरूपकेँ छोट क देलनि। एहि वर्ष तँ कोसीक विभीषिका तँ मानू हुनक सभक मनोनुकूल वातावरण दऽ देलक। प्रारम्भमे त्रिदिवसीय आयोजनक तैयारीक बाद एकाएक एकरा एक दिवसीय करब मात्र औपचारिकता लागि रहल अछि जाहिसँ कि जे किछु मैथिली प्रेमी छथि अगिला वर्शसँ अपनहि एहि कार्यक्रमसँ कटि जाथि आ दर्शकक अनुपस्थितिक बहाना बना कार्यक्रमकेँ बंद कऽ देल जाए। ई विडम्बना कहल जा सकैत अछि जे पटनामे शुरू भेल विद्यापति स्मृति पर्वक देखा-देखी प्रदेश आ देशक आन क्षेत्रमे वर्ष दर वर्ष पूरा उत्साहक संग आयोजित भऽ रहल अछि आ एहि ठामक आयोजनक अस्तित्वपर संकट आबि गेल अछि। वास्तवमे चेतना समिति आब किछु फोटोजेनिक चेहरा सभक अखाड़ा बनि गेल अछि जे एकर कार्यालय विद्यापति भवनकेँ अपन दलान बुझि अपनहिमे कुश्ती करैत रहैत छथि। कोसीक विभीषिकाक दर्द मठाधीश लोकनिक संग-संग सभ मिथिलावासीकेँ अछि। कोसीक बाढ़ि पीड़ितक दर्द एहि आयोजन माध्यमसँ सभ मिथिलावासीकेँ जोड़ि सामूहिक रूपेँ बाटल जा सकैत छल। ज्यो से नहि तऽ बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल प्रदेश आ देशक कतेको क्षेत्रमे सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक कएल गेल आयोजन व्यर्थ छल।
मिथिलाक कतेको महान विभूति सभक प्रयासँ शुरू भेल राजधानीक ई सांस्कृतिक उत्सव पूरा देशमे एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। एहि आयोजनकेँ इतिहास बनेबाक प्रयास करब चिन्ताक विषय अछि। पहिने कार्यक्रमक स्थान छोट करब आ आब एकर समय सीमा घटएलासँ राजधानीक मिथिलावासी मर्माहत छथि। एकरे परिणाम अछि जे छोटे स्तरपर सही राजधानीसँ सटल दानापुर आ राजीवनगरमे किछु वर्षसँ आयोजित भऽ रहल विद्यापति पर्व आब लोकप्रिय भऽ रहल अछि। आब राजधानीक मिथिलावासी चेतना समितिक बदला एहि दुनू स्थानपर होमएवाला आयोजनक प्रतीक्षा करैत छथि। शायद अहूसँ चेतना समिति सचेत होएत आ विद्यापति स्मृति पर्वक अपन पुरान गौरवकेँ पुनर्स्थापित करबाक प्रयास करत।

मुखीलाल चौधरी
सुखीपुर – १, सिरहा
हाल ः बुटवल बहुमुखी क्या पस बुटवल
दिनाड्ढ २०६५ जेष्ठ २९ गते बुधदिन ।

धीरेन्द्र बाबु,
नमस्कादर
बहुत दिनक बाद अपनेक कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” चिठ्ठी पठारहल छी ।
आशेटा नहि वरण विश्वा स अछि, प्रकाशित होएत ।
दिनाड्ढ २०६५ जेठ १४ गते मंगलदिन जनकपुरधाममें लोकार्पण भेल “समझौता नेपाल”क दोसर प्रस्तुटति गीति एल्व म “भोर” क गीतके संगही समझौता नेपालक निर्देशक नरेन्द्रमकुमार मिश्रजीक साक्षात्का‍र दिनाड्ढ २०६५ जेठ १८ गते शनिदिन कान्तिंपुर एफ़एम़के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” सुनबाक मौका भेटल । संघीय गणतान्त्रि क नेपालक भोरमे समझौता नेपालद्वारा प्रस्तुकत केल गेल गीति एल्बलम भोरके लेल समझौता नेपालक निर्देशन नरेन्द्रदकुमार मिश्रजीके हार्दिक बधाई एवं शुभकामना । आगामी दिनमें समझौता नेपाल मार्फत गीति यात्राके निरन्तनरततासँ गीत या संगीतके माध्यएमसँ मिथिलावासी आ मधेशी संगही सम्पूबर्ण आदिबासी थारु में जागणर लावय में सफल होवय आओर मिथिलावासी, मधेशी, आदिवासी थारु संगही सम्पूहर्ण देशवासीमें सदाशयता, सदभावना, सहिस्णुतता आ स्नेकहमें प्रगाढता बढावमें सफलता प्राप्तू होवय, एकर लेल साधुवाद ।
गीतकार सभहक गीत उत्कृरष्टह अछि, कोनो गीत वीस नहि सभटा एकाईस । एकसँ बढी कय एक । गीतकार सभहक गीतके सम्वयन्धगमें छोटमें अलग अलग किछु कहय चाहैत अछि
रुपा झाजीक गीत शिक्षा प्रति जागरुकता आ चेतानक सन्दे श द�रहल अछि । ज्ञान प्रकाश अछि आओर अज्ञान अन्धगकार । अन्धरकारसँ वचवाक लेल ज्ञान प्राप्त केनाइ आवश्यरक अछि । “केहनो भारी आफत आवौ, ज्ञानेसँ खदेड” पाति कोनो समस्याध किएक नहि विकराल होय ज्ञान आ वुद्धि सँ समाधान करल जा सकैत अछि ।
पुनम ठाकुरजीक गीत सब सन्तातन समान होइछ, बेटा—बेटीमे भेदभाव नहि होयबाक आ करबाह चाहि सन्देठश द�रहल अछि । “मुदा हो केहनो अबण्डर बेटा, कहता कुलक लाल छी ” सिर्फ एक पातिस आजुक समाजमें बेटा—बेटी प्रति केहन अवधारणा अछि, बतारहल छथि ।
मिथिलाके माटि बड पावन छै । संस्काणर आ अचार–विचार महान छै । आओर वएह माटिक सपुत साहिल अनवरजी छथि । जई माटिमें साहिल अनवरजी जकाँ मनुक्‍ख छथि ओही माटिमे सम्प्र दायिकताक काँट उगिए नहि सकैछ । उगत त मात्र सदभावना, सदाशयता, माया—ममता, स्नेकहक गाछ । जेकर गमकसँ सभकेओ आनन्दिहत रहत आ होएत ।
“जतय हिन्नुतओ राखि ताजिया, मान दिअए इसलामके
छठि परमेसरीक कवुलाकय मुल्लो जी मानथि रामके”
सँ इ नहि लागि रहल अछि ? कि मिथिलाके पावन माटिमें सहिश्णु ताक सरिता आ बसन्तेक शीतल बसात बहिरहल अछि । धन्य छी हम जे हमर जनम मिथिलाक माटिमें भेल अछि ।
धीरेन्द्रि प्रेमर्षिजीक गीत सकारात्मथकतासँ भरल अछि । समस्याे किएक नहि बडका होबय आ कोनो तरहके होय निरास नहि होयवाक चाहि आओर सदिखन धैर्य—धारणकय सकारात्मेक सोच राखिकय आगाँ बढवाक चाहि । संगहि जाहि तरहसँ माँ–बाप अपन सन्ताकनक लेल सदिखन सकारात्मकक दृष्टिँकोण राखैत छथि, वएह तरहसँ संतानक कर्तव्यत होइछ जे ओ सभ अपन वुढ माँ–बाप प्रति वहिनाइते दृष्टिककोण अपनावैत । गीतके शुरुके जे चार पाति
“संझुका सुरजक लाल किरिनिया, नहि रातिक इ निशानी छै
छिटने छल जे भोर पिरितिया, तकरे मधुर कहानी छै” ।
सकारात्मेकताक द्योतक अछि । एकर संगहि
“सोना गढीके इएह फल पौलक, अपने बनि गेल तामसन
वाह बुढवा तैओ वाजैए, हमर बेटा रामसन” इ पातिसँ मा–बापके अपन सन्तादनक प्रति प्रगाढ माया ममताक बोध करारहल अछि ।
नरेन्द्र कुमार मिश्राजीक गीत इ बतारहल अछि कि संसारमे प्रेम, स्नेबह, माया–ममता अछि तएँ संसार एतेक सुन्द र अछि । यदि प्रेम, स्नेंह, माया–ममता हटा देल जाय त संसार निरस भ�जाएत आ निरस लाग लागत । तएँ हेतु एक दोसरक प्रति प्रेम, स्नेंहक आदन–प्रादान होनाइ आवश्याक अछि ।
“आखि देखय त सदिखन सुन्द्र सृजन
ठोर अलगय त निकलय मधुरगर बचन”
पाती सँ प्रेम आ स्नेरह वर्षा भ�रहल अछि, लागि रहल अछि ।
वरिष्टँ साहित्यगकार, कवि, गीतकार द्वय डा़ राजेन्द्रो ॅविमल� जी आ चन्द्रिशेखर ॅशेखर� जीके गीत अपने अपनमे उत्कृरष्टर आ विशिष्ट अछि । हिनका सभक गीत सम्बनन्धॅमे विशेष किछु नहि कहिके हिनका सभक गीतक किछु पाति उधृत कयरहल छी, सबटा बखान कैय देत ।
डा़ राजेन्द्री विमल जीक पातिक
“जगमग ई सृष्टिृ करए, तखने दिवाली छि
प्रेम चेतना जागि पडए, तखने दिवाली छि
रामशक्ति आगुमे, रावण ने टीकि सकत
रावण जखने डरए, तखने दिवाली छि”
अपने अपनमे विशिष्टडता समाहित केने अछि ।
ओही तरहे चन्द्रषशेखर ॅशेखर� जीक गीतक निम्न। पाति अपने अपनमे विशिष्ट अछि
“साँस हरेक आश भर, फतहक विश्वा सकर
बिहुँसाले रे अधर, मुक्त हो नैराश्य‍–डर
रोक सब विनाशके, ठोक इतिहासके
दग्धसल निशाँसके, लागल देसाँसके”
हमर यानी मुखीलाल चौधरीक गीतके सम्बिन्धामे चर्चा नहि करब त कृतघ्ननता होएत । हमरद्वारा रचित गीत भोरक संगीतकार धीरेन्द्रक प्रेमर्षिद्वारा परिमार्जित आ सम्पातदित केल गेल अछि । तएँ एतेक निक रुपमे अपने सभहक आगाँ प्रस्तु त भेल अछि । हमर गीतके इएह रुपमे लाबएमे धीरेन्द्रत प्रेमर्षिजीक उदार या गहन भुमिका छैन्हआ । एकर लेल प्रेमर्षिजीके हम मुखीलाल चौधरी हार्दिक धन्यरवाद ज्ञापन करए चाहैत छी ।
सभटा गीतके संगीत कर्णप्रिय लगैत अछि । सुनैत छी त मोन होइत अछि फेर–फेर सुनी । कतबो सुनलाक वादो मोन नहि अगहाइत अछि । एतेक निक संगीतक लेल धीरेन्द्रइ प्रेमर्षिजीके हार्दिक बधाई आओर अगामी दिन सभमे एहोसँ निक संगीत दय सकैत, एकर लेल शुभकामना आ साधुबाद ।
सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका इत्याादिक संयोजन कय बड सुन्दगर आ हृदयस्पछर्शी गीति एल्बीम “भोर ” जाहि तरहसँ हमरा सभहक आगाँ परोसने छथि, एकर लेल भोरक संयोजक रुपा झा जीके हार्दिक बधाई । अन्तनमे सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका, संयोजक आ समझौता नेपालक निर्देशकके हादिक वधाई ।
डॉ.शंभु कुमार सिंह
जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।

आलेख: मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या

स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तन पर लिखल गेल अछि। एहि नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्ग मे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा एहि विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कयलनि जाहिसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय।

स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ एहि कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब हैब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। एहि काल प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कयल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कए सोझाँ आयल अछि। एहि कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नहि भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जयबाक संभावना ओ पराश्रित भ’ कए पतित होयबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक शिकार हैबाक आशंका , वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कयलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि।

भारतीय समाजमे नारीक स्थान

समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जाहि प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नहि चलि सकैत अछि ओकरा चल’ क लेल दुनू पहियाक ठीक होयब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ी केँ चलयबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनू मे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नहि भ’ सकैत अछि।

एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलैक। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलैक। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओहि समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नहि होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नहि करैत छलाह। नारी सहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता, आ सावित्री सन देवी घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलैक। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषी सँ गौरवान्वित छल। ओहि युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओहि समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। एहि लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः” अर्थात जतय नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतय देवता विचरण करैत छथि। एहि प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि।

समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनतिक क्रांति भेल एहि सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नहि रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कए रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे सेहो महान परिवर्तन भ’ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़’ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नहि छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लाग’ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह।

जखन मुसलमानी शासन एहि देशमे दृढ़ भ’ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भ’ क’ शासन करय लगलाह, तखन दरबारमे जतय महफिल जमय लागल, सुरा क दौर चल’ लागल ततय पायलक झनकार सेहो होम’ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कय ओकर नख- शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह। हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त एहि कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नहि रहि गेल।

आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतय सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आयल ओतय नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलैक। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य त’ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नहि हैत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माण मे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समय आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कयल जाय। विधवा-विवाह हो वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हो, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हो वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओहि सभ कुप्रथाकेँ समाप्त कर’ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार क’ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओहि गौरवकेँ प्राप्त क’ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। एहि दिशामे जतय धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ एहि भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छथि।

नारीक कारुणिक स्वरुप

नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। एहि हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा होएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ ल’ क’ आइ धरि परिवार मे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतय धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि भारतमे अन्य सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्रचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कयल जाइत छल। एतय धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होयबक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नहि छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नहि उठैत छल। स्पार्टा मे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”1

भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था विशेष कए मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनहुँ, घर-घर मे कयल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनहुँ कर्तव्यक पूर्ति नहि क’ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होम’ लागल तत्पश्चात् नारी मे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ क’ देलक।

पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओहि सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजिकरण। व्यावहारिक रुपमे एहि सभटा क्रिया पर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्ध मे हस्तक्षेप करब ने केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानैत छथि। एकैसम शताब्दीक तथाकथित समतावादी समाजहुँमे नारी पर होम’ वला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नहि भेल अछि, जखन की एहि अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भ’ गेल अछि।

नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। एहि कारण सँ पारिवारिक स्वरुप मे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भ’ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास क’ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कयलक आ क’ रहल अछि एहि संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन- अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कयने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कयल जा सकैत अछि।

शारीरिक प्रताड़ना

शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नहि अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”2
एकटा नवविवाहिता जाहि संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना ल’ क’ नव घरमे अबैत अछि ओतय पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेला पर ओकरा कतके असह्य वेदना होइत हैतेक तकर अनुमान हम आसानीसँ नहि लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि।

• मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कय आयल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि—

• सुगियाः “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला,जलखै ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ क’ के एलाह जे जलखै दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”3

विडम्बना ई थिक जे इ समस्या केवल ग्रामीण , गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नहि अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारहुँ मे नारीक कमोबेश यैह स्थिति अछि।

यौन उत्पीड़न

मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होम’ वाला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण सँ महिमामंडित क’ जाहि सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कयने अछि ओहिमे स्त्रीकेँ सेहो पता नहि चलि सकल जे ओ शोषित भ’ रहल अछि। उत्सर्गक नाम पर पुरुष ओकरासँ सभ किछु माँगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कतहुँ महानतासँ विभूषित होयबाक गर्वक मोहसँ ओकरा पर अपनाकेँ निछावर करैत रहल त’ कतहु परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतय ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतहि दोसर दिस ओकर यैह गुण , ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल।

नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक यातनाहुँ सँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओहि टकामेसँ बिजली अपन कमीशन माँगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कय बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भ’ जाइत छथि आ कहैत छथि कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध त’ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भ’ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे—-“धुर औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?4

वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार करल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कयने छथि। एहि एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कयल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नहि क’ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क क’ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोग पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ।

सूर्यः हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ…….
कुन्तीः (उत्तेजित स्वरमें) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ?
सूर्यः (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा क’ देवताक पूजा करैत अछि– मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना क’ स्वर्ग ल’ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक ?
कुन्तीः (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक करैत छी ?

सूर्यः (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना क’ राखैक लेल।
कुन्तीः (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भ’ जाइत होइत त’ ओ मनुक्खे भ’ क’ रहैत होयत।
सूर्यः हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? 5

अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (1992) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। एहि घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार कहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक—–

किसुनः “तोहर तँ गप्पे अनटटेल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फकेल रहतैक?”6

तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जाहि करणेँ ओ समाजमे मुँह देखयबाक योग्य नहि रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक।
महेन्द्र मंगगियाक ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’ मे सेहो एहि विषय पर दृष्टिपात कयल गेल अछि—-

मनोजः “हँ, एना सकपकेलेँ किएक ? दरोगा साहिब इएह ओ शैतान छी जे कतेको बेटी-पुतोहुक इस्त्रीकेँ लोभ आ बलात्कारसँ भ्रष्ट करैत आयल अछि। गाममे हरदम एकटा ने एकटा उधवा मचबैते रहैत अछि जाहिसँ लोक अशांत अछि।”7

एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भ’ रहल छथि एहि विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कयने छथि।

बाल विवाह
बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओहि प्रथासँ अछि जाहिमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कइल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालहिसँ जाहि विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होम’ सँ पूर्व जँ विवाह नहि कयल गेल तँ एहि सँ माता-पिताकेँ महापाप होइत छैक। एहन विवाह कतके हास्यास्पद अछि से एहि बातसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे हमरा कोनहुँ मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनहुँ निर्देश नहि देल गेल अछि । तथापि ई व्यवस्था आइयहुँ मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जाहि परिस्थितिसँ भेल हो मुदा एहि कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भ’ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भ’ जाइत छैक। एहि समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भ’ गेल छैक किएक तँ बाल- विवाहक कारणेँ ने त’ ओ शिक्षा प्राप्त क’ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। एहि प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कए रहि गेल अछि। एहिमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भ’ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन नारकीय भ’ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या ल’ क’ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कयने छथि, एहिमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ क’ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे क’ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भ’ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखनहि बाल्यावस्थाकेँ पार कए युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाब’ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नहि छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कए आगिमे स्वाहा क’ देल जाइत छैक। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ–

मधुकला— “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’8

मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनहु समाजमे बाल विवाह भ’ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नहि फुजैत छैक।

दहेज

मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सबसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आयल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देब’ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नहि आनि सकैत छथि तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुन’ पड़ैत छैक। बात-बात मे ओकरा अपमानित कयल जाइत अछि। ओ भाँति-भाँतिक लाँछन सेहो लगाओल जाइत छैक। एतबे नहि ई प्रक्रिया ता धरि चलैत रहैत छैक जाधरि ओ सासुर वलाक इच्छाक पूर्ति नहि क’ दैछ।

दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइत छैक तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कार मे भेटैत अछि—

ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” 9

पर्याप्त दहेज नहि देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था भ’ जाइत छैक से स्वतः अनुमान कयल जा सकैछ। एतबे नहि एहि पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइत छैक जे ओ दोसरहुकेँ एहि परिणामक भविष्य भोक्ता रूपमे देखि सिहरि जाइत छैक—
ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?……अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”10

जाहि परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छैक ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन- देन उचिक बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोग’ पड़ैत छैक जे “कनियाँ – पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भ’ जाइत अछि, जाहिसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नहि भेटैत छैक। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भ’ कनियाँ- पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर इ वेदना आ अतृप्त लालसा—

निर्मला— “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि…..? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक…कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”11

पर्याप्त दहेज नहि लयबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कयल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि क’ लैत अछि। एतबे नहि कखनहु-कखनहु तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नी केँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो क’ दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जाहिमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह क’ देलक। एतय दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि—-

षोडसीः “हम जीबय चाहै छी राजा, जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी।
वृद्धाः चुप पपिनियाँ।
षोडसीः हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”12

एहि कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भ’ नाटककार स्वयं कहैत छथि—
“आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।”13

भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ एहि चौंकाब’ वला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आँकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतय प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जाहिमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भ’ रहल छैक।

वेश्यावृत्ति

वेश्यावृत्ति भारतीय समाजक कैंसर थिक। एहि ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि। जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छैक आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छैक। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कयल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नहि बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ एहि धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आयल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छैक आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भ’ समाजमे जीवित रहबाक हेतु एहि धन्धाकेँ स्वीकार क’ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नहि छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक कुत्सित मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नहि देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करय पड़ैत छैक।

आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नहि बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करय लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार कर’ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नहि रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः-

सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत)
अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी,
अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक
हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ
बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”14

नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कयने छथि।

नवलः “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब रातिक पहरमे जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’15

चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भ’ जाइत अछि–

रघुनन्दनः “तुम्हारी और तुम्हारी खुबसुरती के अलावा मेरे लिए सोचने का मसाला ही कौन सा है ?
मोतीः (सलाम करैत) मैं निहाल हुई मेरे राजा।
रघुनन्दनः निहाल यों हुआ जाता है ? मेरे पहलू मे बैठो, मेरे जलते हुए जिगर पर मरहम डालो। तर होने दो मेरे प्यासे लबों को, अपने लवों और शरबते अनार से।”16

एहि तरहँ हम देखैत छी आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कयल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार एहि रोगक पर्दाफाश कयलनि ओ संगहि चेतावनी द’ रहल छथि एहि कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु।

स्त्री – पुरूष संबंधक नव आयाम

वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भ’ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कयल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जाहिसँ स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कयलक । हमरा समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। एहि तरहेँ ओकरा आपसी संबंधमे आयल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाज पर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलैक आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कयल जाइत छलैक। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलैक एहि कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाब’ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग क’ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयहु ओकरामे ओतेक साहस नहि छलैक जो अपन संग भ’ रहल अन्यायक प्रतिकार क’ सकय।

जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलैक आ नारी शिक्षित होमय लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सोहो प्रभावित होमय लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनैलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लैक तखन ओकरा लेल आवश्यक भ’ गेलैक जो ओ अधिकारक रक्षा करय आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकय। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हो, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होम लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा एहि दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। एहि नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरी सँ हुनक विवाह कर’ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होयबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी एहि अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घर सँ बाहर भ’ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि—–

बमबाबा— “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ नहि काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौक—एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”17
एहि तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा ,पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँ मे हस्तक्षेप बढ़’ लागल एहि तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक।

पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना

आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्रविकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भ’ रहल अछि। ओ परिवारर ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नहि द’ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भ’ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। एहि हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नहि देल जा सकैछ प्रत्युत ओहि समाज व्यवस्थाक अछि जाहिमे हमर परंपरा बनल अछि जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भ’ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कयलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल छथि। पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि—

रजनीः— “हुँह….मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान- मर्यादाक तकर दशांशो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि दँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”18

व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि ल’ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन- वासनाक पूर्तिक समस्या एहिसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिक पूर्ण भ’ सकैछ , किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हैत। एहन नारी व्यवहार शून्य भ’ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जाहिसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भ’ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सब सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि—

ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि…. लाल भैयाक लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी….जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”19

समाजक नींव परिवार छैक आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगहिसँ परिवार सुखी भ’ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एकहुँ पंगु भ’ जायत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। ताहि हेतु आब पुरुषहुँ केँ सोच’ पड़तैन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भ’ गेल अछि।

शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण

कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नहि बुझल जायत जाधरि ओहि देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नहि हेतैक। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदय, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार।

वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्राहिक भाँति शिक्षित कयल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजर’ पड़ैत छलैक। अथर्व वेदमे लिखल छैक जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त कर’ मे तखने सफल भ’ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भ’ चुकल हो। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त कयने छलीह। एतय धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कयने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि एहि प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि।

वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओहिमे नारीक सहयोग कोनो कम नहि छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। एहि तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि।

उत्तर वैदिक कालमे समयक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होम’ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेज’ मे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलैक, ई विचार प्रबल भ’ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होम लागल।

कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भ’ गेल। मैथिल समाजमे एखनहुँ नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नहि रहि जाइत अछि। एहि संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ-

“जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पयर नहि बढ़ा सकय एको कौड़ी अरजि नहि सकय, एतेक तक जे ककरहुँसँ भरि मुँह बाजि नहि सकय तकरा जँ नाँगड़ि कही बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही त’ कोनो अनुचित नहि।”20

स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नहि रह’ चाहैत छथि कालीनाथ झा ‘सुधीर’ क नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका एहि लेल तिरस्कृत करैत छथि—

कमला- “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी – पत्री लिखब । तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”21

‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कयल जाइत अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नहि क’ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कय समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त क’ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट कयने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कयल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! — बेटी तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”22

एहि तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जाहि नारी शिक्षाकेँ आरंभ कयल गेल ओहिमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ एहि विषय के प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे परिवर्तन आनबाक प्रयास कयने छथि। एहि प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओहि कुड़हड़िक धारकेँ तेज क’ देने अछि जाहिसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाय संभव भ’ गेल अछि।23

निष्कर्ष

मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष क’ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जाहिमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनहुँ मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कयल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। एहि उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाय तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ ल’ क’ । यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध – विवाह, बिकौआ प्रथा एखनहुँ समाजसँ उठि नहि गेल अछि तथापि एहि दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भ’ कए कतोक नाटक मध्य एहि समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कयने छथि जाहिसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय।

मुदा एतय एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि ? एहि कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नहि कयलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कए नष्ट भ’ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भ’ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भ’ रहल अछि। एहि कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीकेँ जतेक आदर्शवादी ढ़ंगसँ चित्रण कयल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नहि।

संदर्भ

1. डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—172
2. स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर 2001, अंक—1
3. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—43
4. एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, 1977,पृष्ठ—133
5. वएह, पृष्ठ—26
6. रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, 1992,पृष्ठ—20
7. लक्ष्मण रेखा खण्डित, महेन्द्र झा, उपेन्द्र झा, ग्राम- मलंगिया, दरभंगा, पृष्ठ—68
8. त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, 1950,पृष्ठ—41
9. लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—25
10. वएह, पृष्ठ—63
11. कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—21
12. सप्तपर्णा, सं. डॉ. देवेन्द्र झा, पृष्ठ–21
13. तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ—16
14. नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—20-21
15. नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, 9/1 खेलात घोष लेन, कलकत्ता, 1971,पृष्ठ—9
16. दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—46
17. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47
18. एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,1985, पृष्ठ—16
19. लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—63
20. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—18
21. कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—3
22. बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47
23. के. एम. पन्निकर,
मिथिला मंथन- सुशान्त झा
१.
मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि।
मिथिलांचलक ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत।
बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि।
किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि। कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि, ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40 प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए।

तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक।

किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि।

मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प।

मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी।
२.
प्रवीण आई अमेरिका चलि गेल। ओकरा एल एंड टी के प्रोजेक्ट पर शिकागो पठा देल गेलै। लेकिन ओकरा संग पढ़ैवाली पूनम के भाग्य ओहन नहि छलैक। ओ दू बच्चा के मां बनि अपन स्वामी के सेवा में अपन जिंदगी बिता रहल अछि। बितला समय याद करैत छी त लगैत अछि जे पूनम के संग बड़्ड अन्याय भेलैक। बात सन् 95 के हतैक, हमर बोर्ड के रिजल्ट आबि गेल छल। ओहि समय पूनम आ प्रवीण छट्ठा में पढैत छल। जाहि स्कूल में पढ़ैत छल ओहि में चारि टा मास्टर छलैक जे बेसीकाल खेतिए बारी में लागल रहैत छलैक।

पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल आ प्रवीण सेकेंड…लेकिन छट्ठा के बाद प्रवीण के बाबू जी ओकरा ल क कटक चलि गेलखिन्ह जतय ओ एकटा दुकान में काज करैत छलखिन्ह। पूनम के घरक हालत अपेक्षाकृत ठीक छलैक, ओकर बाबूजी सरकारी सेवा में छलखिन्ह, लेकिन पूनम दसवीं से आगू नहि पढि सकल। ओकरा इंटर में मधुबनी के झुमकलाल महिला कालेज में नामो लिखा देल गेलैक लेकिन बाद में ओ आगू नै पढ़ि सकल। लेकिन प्रवीण राउरकेला सं इंजीनरिंग केलाक बाद एल एंड टी में प्लेस्ड भ गेल आ कंपनी ओकरा शिकागो पठा देलकै।

एक दिन हमर दीदी पूनम के पूछवो केलकैक जे ओ कियेक ने बीए में नाम लिखेलक, त पूनम के जवाब छलैक जे ओकर मां-पप्पा के बीच ओकर पढ़ाई के ल क नित दिन घोंघाउज होइक। ओकर बेसी पढ़नाई पूनम के विवाह में बाधा बनि रहल छलैक। तीन बहिन में सबस पैघ पूनम के दहेज एकटा बड्ड पैघ समस्या छलैक। दू साल के बाद पूनम के विवाह भ गैलैक आ जे पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल ओ जीवन के दौड़ में सदा के लेल सेकेंड भ गेल। पूनम के तमाम टैलेंट आब सिलाई-कढ़ाई आ स्वेटर के नब डिजाइन सीख में खप लगलैक।

आई हमरा गाम में प्रवीण के टैलेंट के धूम मचल छैक। मिथिला के तमाम दहेजदाता ओकर दरवाजा पर आबि चुकल छथि, लेकिन सवाल ई जे कि पूनम के आगू नै पढ़ि पबै में कि सिर्फ दहेज टा एकटा कारण छलैक या किछू आउर…? मानि लिय जे दहेज नहियों रहितैक त की पूनम के अपन घर लग नीक कालेज भटि जयतैक ? हम सोचैत छी जे यदि पूनम के जन्म कर्नाटक या केरल में भेल रहितैक त भ सकैछ ओ इंजिनीयर बनि जाईत आ एल एंड टी ओकरो शिकागो भेजि दैतैक। लेकिन ई सवाल एखनो नीतीश कुमार अतबा अर्जुन सिंह के एजेंडा में नहि छन्हि। नै जानि कतेको लाख पूनम आई चिचिया-चिचिया क ई सवाल अहि व्यवस्था सं पूछि रहल अछि।

हमर ई पोस्ट हिंदी के हमर ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com)…ओहि पर एकटा टिप्पणी अछि जे सब साधन सबके नहि देल जा सकैत छैक, आगू बढ़य बला के खुदे के जिजीविषा हुअके चाही। लेकिन हमर कथन ई अछि जे प्रवीण के संग कोनो जीजिविषा नहि छलैक-ई पुरुष प्रधान समाज के एकटा दुखद अध्याय छैक जे हजारो प्रवीण के त कोटा स ल क बंगलोर तक डोनेशन पर भेज देल जाइत छैक लेकिन लाखों पूनम एखनों आशाके बाट जोहि रहल अछि। की ई सरकार के कर्तव्य नहि छैक जे ओ पूनम सब के उचित पढ़ाई के व्यवस्था करैक..?.

ई कतेक दुर्भाग्य केर बात अछि जे बिहार में एखन हाईस्कूल खोलै पर प्रतिबंध लागल छैक। एखन 5 किलोमीटर के दायरा में बिहार में एकटा हाईस्कूल छैक। कोनो लड़की के लेल ई कोना संभव छैक जे ओ पांच किलोमीटर पढ़य लेल हाईस्कूल जाय। आब बिहार सरकार हाईस्कूल में लड़की सबके साइकिल द रहल छैक लेकिन की सिर्फ हाईस्कूल तक के पढ़ाई उपयुक्त छैक..? दोसर बात ई जे बिहार सनहक राज्य में जतेक सामान्य ग्रेजुएशन के सीट नै छैक, कर्नाटक आ महाराष्ट्र में ओहि स बेसी इंजिनीयरिंग के सीट छैक।

एखन तक राज्य में एकोटा महिला विश्वविद्यालय आ तकनीकी विश्वविद्यालय नै छैक। हुअके ती ई चाही छल जे बिहारल में 20-25 साल पहिनहि हर जिला- आ ब्लाक में एकटा कालेज खोलि देबाक चाही छलैक। आब के जमाना त इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज खोलक छैक। एहन हालत में ओहि खाई के के भरत जे बिहार आ दोसर राज्य के बीच में बनि गेलैक अछि। फेर वेह सवाल सामने अछि- की अबैयो बला समय में पूनम इंजिनीयरिंग कालेज में जेती….?

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: