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विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५- part 3

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विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५- part 3

भानस भात
– नीलिमा
मखानक खीर

सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा
बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। जखन खौलय लागय तँ ओहिमे चिन्नी, काजू, किशमिश सभ दऽ कय अन्तिममे इलाइची पाउडर खसाऽ कऽ मिलाऽ कऽ उताड़ि लिअ। मखानक खीर तैयार अछि।
नोट:- मखानकेँ सुखलो भुजि कऽ कुटि सकैत छी वा घीमे सेहो भूजि कए कूटि कऽ पाउडर बना सकैत छी।

मेथीक परोठा
सामग्री:-आटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, रिफाइन-२५० ग्राम, मेंथी साग-५०० ग्राम, हरिअर मेरचाइ-४टा, आदी- १ इन्चक टुकड़ा, धनी-पात आऽ नोन-अंदाजसँ।
विधि- मेंथीकेँ साफ कऽ कए धोऽ लिअ। मेंहीसँ काटि कए लोहियामे कनी तेल दऽ कय मेंथी पात खसा दियौक। कनी भाप लागि जाय तँ ओहिमे काटल हरियर मेरचाइ, आदी घसल, धनी-पात काटि कय आऽ नून मिला कय एहि मिश्रणकेँ बेसन फेँटल आँटामे मिला दियौक। आँटाकेँ कनेक कड़ा कऽ सानि लिअ। पराठा बेल कए तवापर कम आँचपर रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। खास्ता मेथीक पराठा तैयार भऽ गेल।
नोट:- अहाँ काँच मेंथी पात कऽ मेंही काटि कऽ, पियाजु सभ मिला कऽ सेहो आँटा सानि सकैत छी।

मुगलई कोबी
सामग्री:-कोबीक टुकड़ा-१/२ किलो, पियाजु महीन काटल-१कप टमाटर, कद्दूकस कएल-१ कप, हरियर मेरचाइ-आदीक पेस्ट-१ चम्मच, नून स्वादानुसार, लाल मिरचाइक पाउडर-१/२ चम्मच, धनियाँ पाउडर-१ चम्मच, हरदि- १ चम्मच, गर्म मसल्ला-१/२ चम्मच, अमचूर-१/२ चम्मच, जीर-१/२ चम्मच, मलाई-१/२ चम्मच, टोमेटो सॉस- १ चम्मच, रिफाइन तेल-२ चम्मच।
विधि:- कोबीक टुकड़ा धोऽ कऽ चालनिमे आधा घंटाक लेल राखि दियौक, जाहिसँ एकर पानि निकलि जाय। फेर लोहियामे तेल गर्म कऽ कोबीकेँ हल्का गुलाबी फ्राइ कऽ लिअ आर एकटा पेपरपर निकालि लिअ, जाहिसँ तेल निकलि जाय। एक पैनमे तेल ढारू। ओहिमे जीर दऽ कए पियाज आऽ आदीक पेस्ट दऽ कय भुजि दियौक। आब सभ टा मसल्ला दऽ कय कनी देरमे आर भुजियौक। मलाएकेँ मैश कऽ दऽ दियौक, सॉसकेँ सेहो दऽ दियौक आर नीकसँ मिला दियौक। आब एहिमे कोबीक टुकड़ा दऽ कय चम्मचसँ मिला दियौक। फेर एक बाउलमे ओकरा निकालि कऽ ऊपरसँ गरम मसल्ला आर धनियाँ (धनी) पात सजा दियौक आर पड़सि लिअ।

केसर पुलाव
सामग्री:- २ कप बासमती चावल, १ कप मटरक दाना, १ टुकड़ा दालचीनी, १ बड़ी इलायची, ४ टा लौंग, ४ कप पानि, २ टेबुल स्पून घी, १/२ केसर, २ टीस्पून गरम पानि, एकटा पियाजु लम्बा-लम्बा काटल, १ टी स्पून जीर, २ टी स्पून नून।
विधि:-केसरक गरम पानिमे फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कए फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कऽ फुलय लेल दऽ दियौक। कुकरमे घी गरम कऽ कए ओहिमे प्याज दऽ कए ब्राउन होय धरि फ्राइ कऽ कए प्लेटमे निकालि लिअ। आब एहि गरम घीमे दालचीनी, जीर, इलाइची, लौंग आर नून दऽ दियौक। मटरकेँ दऽ कए कनी चलाऊ आर चाउरकेँ पानिसँ निकालि अहीमे दऽ दियौक। ऊपरसँ पियाजु आ केसर सेहो दऽ दियौक। ४ कप पानि दऽ कय एक सीटी आबए तक पकाऊ। गरम-गरम केसर पुलाव, रायता वा कोनो रसगर तरकारी संग खाऊ।

मूरक परोठा

सामग्री:- आँटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, मूर-२५० ग्राम, रिफाइन तेल-१०० ग्राम, जमाइन-मंगरैल-अंदाजसँ। आदी-१ इन्च टुकड़ा, धनी-पात-दू डाँट, हरियर मेरचाइ ४ टा, नून- अंदाजसँ।
विधि:- मूरकेँ धोऽ कऽ कद्दूकस कऽ लिअ। लोहियामे कनी तेल दऽ दियौक। गर्म भेलापर ओहिमे मूर आ सभ मसल्ला खसा दियौक आ ढ़क्कनसँ झाँपि दियौक। कनी भाप आबि जाएत, ओकरा निकालि कऽ ठंढ़ा हेबय दियौक। आब एहि मिश्रणमे नून मिला कय बेसन मिलल आँटामे मिला कऽ सानि लिअ। गोल-गोल पातर-पातर बेल कऽ ताबापर दुनू दिस रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। मूली पराठा तैयार भऽ गेल।
मूरक परोठा बनेबाक एकटा आर विधि अछि, अहाँ मूलीक कद्दूकस कऽ कए ओहिमे सभ मसल्ला मिला लिअ। आब ओकड़ा गाड़ि कए एक दिस राखि लिअ। आब आँटाक गोलीमे थोड़े मूलीक मिश्रण लऽ कऽ नून मिला कऽ भरि लिअ आ बेल कऽ ताबापर रिफाइन दऽ कऽ सेकि लिअ।
नोट:-एहि तरहेँ काँच अनरनेबा आ बन्धा कोबीक परोठा सेहो बना सकैत छी।

३.पद्य
३.१. १.आशीष अनचिन्हार २.मधुप
३.२. १.महेश मिश्र “विभूति”
३.३.-१.ज्योति-२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा
३.४. विनीत उत्पल
३.५. पंकज पराशर
३.६. १.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्द्रि यादव

१.आशीष अनचिन्हार२.मधुप
आशीष अनचिन्हार-
१. मनुख
मनुख काज करैत जान अरोपि कए
आफिसमे, रोडपर
वा कतौ
भरि लैए टका जेबीमे
निकलि जाइए मार्केटिंग करबाक लेल
कीनि लबैए
रेडीमेड खुशी वस्तु-जातक रूपमे
की मनुख
रेडीमेड भेल जा रहल अछि?
२.गजल
जीवनमे दर्दक सनेश शेष कुशल अछि
नहि कहब विशेष शेष कुशल अछि

अन्हरा सरकार चला रहल राजकाज
छैक बौकक ई देश शेष कुशल अछि

देह बदलैए आत्मा नहि सूनि लिअ
एहने छैक सरकारक भेष शेष कुशल अछि

मुक्का आ थापड़क उपयोग के करत
खाली आँखिए लाल टरेस शेष कुशल अछि

गजल कहब असान नहि एतेक आशीष
आब चलैत छी बेश शेष कुशल अछि

मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ)

चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि
अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद
गामहुमे परिवार अपन आनन्द
अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त।
घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन
उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न।
मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम
काशीवासी ’तजि वनता’ आराम।
अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत
छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत।

(चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ
उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक
चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ।
मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आऽ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।)
१.महेश मिश्र “विभूति”
महेश मिश्र “विभूति”
सन्तोष (०६.०२.६५)

सन्तोष सरितमे नित नहाय,
बल्कल पहिरी तँ लाज न हो।
बेदाग होय कर्तव्य करी,
हाथी नवीश सँ काज न हो॥

कहू! व्यर्थ झगड़िके धन अरजी,
सत् कर्म बिना सब काज हो।
एक दिन बिन कैंचाके जगसँ,
प्रस्थान करू, तँ लाज न हो॥

भऽ जाय फकीरी वोहि सँकी?
मस्तक ऊँचा सदिकाल रहे।
कहू? भला वो अमीरी की,
लानत जेहि पर कङ्गाल कहे॥

भऽ जाय अमीरी वोहिसँ की?
सत् कीर्ति समुज्ज्वल कर्म करू,
निशि दिन सद्भाव निबाहू जँ।
भगवान् भला करता निश्चय,
कहियौन हुनकहि, नहिं काहूसँ॥

हुनकर लीला अनदेखल अछि,
फल प्राप्त करै छथि विश्वासी।
सुनितहुँ छथि सबहक परमप्रभु,
कारण; वो छथि घट-घट वासी॥

उद् बोधन : ढाढ़स (३१.०७.६३)

मत होउ निराश एक झटका पर,
नित कर्मक ध्यान धरू मनमे।
दुनियाँमे एहिना होइतैं छै,
ई सोचि पुनः उतरू रनमे॥
बहुतोंके एहिना मेल एतऽ,
किन्तु; की साहस छोड़ि देलक।?।
साहस थीक सम्बल आशाके,
जगमे हारल पुनि लाहु लेलक॥
नभमे देखू वो चन्दाके,
जे पूर्ण विकासक क्रमपर अछि।
एक दिन पूनम परिपूरित भऽ,
पुनि ग्रास ह्रास भऽ जाइत अछि॥

नयन निहारि निरखू जगके,
के रहल समान निशि दिन जगमे।?।
उत्थान-पतन क्रम कर्मक अछि,
निर्भीक बनूँ, बिचरू महमे॥

जी तोड़ि परिश्रम करथि कोय,
फल नीक नाहिं, तँ दोष कोन।
विधना के एहिना लीला छन्हि,
तँ, एकरामे किनको दोष कोन॥?॥

बड़ आश केलहुँ शुभ आशाके,
सम्भव केलहुँ नहिं काज कोन।
फलदाता दरजल नाहिं यदि,
तँ, एकरामे किनको लाज कोन॥?॥

भेटत वोतबहि, जे लिखल अछि,
पाथर परके रेखा बुझियौ।
कर्तव्य करू नित निकक हित,
भेटत निश्चय, भागक लेखा बुझियौ॥

श्रम-साध्य मजूरी भेटतैं छै,
ई शास्त्र-पुराण, सुधि जन कहि गेल।
औकतेलासँ भट्टा पाकयऽ?
ई कथ्य युगाब्दक रहि गेल॥

वोपदेव इतिहास-पुरुष,
अमर लेख्य पाणिनी तिनकर।
धीर धैर्य धारण करियौ,
यथा भाग भावी जिनकर॥

पाण्डव के राज भेटल छीनल,
नल दमयन्तीके याद करू।
सिंहासनारुढ़ सियावर भेला,
वसुदेव कोना आजाद करू॥

मधुर स्वप्न (०७.११.६२, रवि श्री विजयादशमी)

मधुर स्वप्न की देख रहल छी,
दत्यतासँ सँदूर भऽ के।
चिरनिशा के गर्भमे,
तल्लीनतासँ निकट भऽ के॥

दुक्खसँ जँ दूर छी तँ,
कहू कोन उपचार हो।
मूक मुद्रा एना कऽ के,
अति दुःखक नेँ विस्तार हो॥

या कहू अन्तर्निहित,
दुःखसँ दुःखी छी मनहि-मन,
से कहू सङ्कोच तजि के,
की स्वप्न देखब छनहि-छन॥

मौन रहला पर कोना के,
बुझि सकत पर वेदना।
वेदना के व्यक्त कऽ के,
छाड़ि दी निज कल्पना॥

मधुर स्वप्नक की महत्ता,
कहि दियऽ दू शब्दमे।
हम भ्रमित छी दशा लखिके,
किछु कहू, किछु शब्दमे॥?॥

या कहू किछु विसरि गेने छी,
अहाँ निज ख्यालसँ।
मधुर स्वप्नक ज्वलित ज्वाला,
त्यागि दी अन्तरालसँ॥

सजनि! पता दी अपन क्लेशक,
विषम वेदना मानस के।
वा बहु भाँति व्यथित छी अपने,
हृदयान्तर्गत तामस से॥

कोना वेदना उमड़ल अछि जे,
अगम-अथाह, पता नहिं आय।
अतिशय क्लेशक दुःसह भारसँ,
दबयित छी दयनीय भऽ हाय॥

कहू-कहू! मानस के ओझरी,
मधुर स्वप्न के त्यागू आय।
मधुर यदि दुःखदाई हो,
तुरत त्यागी, कथमपि नहिं खाय॥

अहाँ बेसुधि, हम ससुधि भऽ
कोना जीवन-रथ चलत।
सामंजस्यानन्दक प्रयोजन,
जीवनक रथ अथ चलत॥

सिन्दूर-दानक गीत: “अनुरोध” (१४.०५.६३, सोम)

“प्रिय पाहुन सिन्दूर-दान करू”

सुन्दर सरस समय शुभ सरसल, सिन्दूर हाथ धरू।
उषा निहारथि कमल हस्तके, अविलम कर्म करू॥…॥
नव निर्मित नगरीमे सिञ्चित किञ्चित ख्याल करू।
विलम छाड़ि, सिन्दुर लऽ करमे, हिय प्रभुनाम धरू॥…॥
दर्शक सब व्याकुल होय निरखय, स्वातीक जल बरसू।
नवजीवनके सृजन करथि प्रभु कर्मक ध्यान धरू॥…॥
कबलौं प्रभु अनुरोध करायब शुभ-शुभ कर्म करू।
मनःपूत मनसाके कऽ के, भवनदमे विहरू॥…॥
शुभ शङ्कर-गौरी मैयाके शुभाशीष हिय मध्य धरू।
विनय “विभूति”क एतवहि प्रभुसँ, युगल जगत् विचरू॥…॥

बादरीक आगमन (२६.०५.६३)

“नभमण्डलमे पवनक रथपर, कारी-कारी बादरि आयल”।
बिजुरि छटकै, ठनका ठनकै, देखि-सुनि जनमन खूब डेरायल॥
चहु दिशि उमड़ल कारी बादरी, बादरि आबिके जल बरसायल।
प्रलयनाद मेघक सुनि-सुनि, वृद्ध जनी सब नेनहिं नुकायल॥
हकरै बालक वृद्ध जनी सब, लोक कहै सब माल हेरायल।
बाँस-आम गीरल अनगिनती, क्यो कहै हमरो महिंस हेरायल॥
लोक कहै बहु भाँति मनोदुःख, प्रिया कहै मोर प्रिय नहिं आयल।
कामिनी कलपथि, प्रिय नहिं गृह छथि, विजुरिक धुनि-सुनि जियरा डेरायल॥
रोर मचल अछि चहु दिशि जन-जन, एतबहिमे अति जल झहरायल।
त्रिषित भूमि “विभूति”मय भेली, तरु-तृण वो जन-मन हरसायल॥

जगक प्रमान (०९.०६.६३)
डोली उठल बिन खोलीके दुवारसँ,
घुरि नहिं आओत, प्रमान हे।

काँच कचम्बा काटि कुढ़ावोल,
उघल सबटा सामान हे॥

श्वेत वस्त्रसँ मृतक सजाओल,
नित प्रति होत जहान हे।

अचरज के नेँ बात बुझि ई,
ई थिक ध्रुवक समान हे॥

चारि जने मिलि कान्ह लगाओल
गमन करत शमशान हे।

पुत्र-प्रणय के परिचय देता,
करता अग्निक दान हे॥

सच् होय अछि “पुत्रार्थे भार्या”
होय छथि पुत्र महान् हे।

कहथि “विभूति” बनब विभूति,
एहि थिक जगक प्रमान हे॥

“अपटुडेट बलिष्ठ युवकसँ” (१५.१२.१९६२)

करू किछु काज बाबू औ,
रतन धन आय पौने छी।
धरा पर अवतरित भऽ के,
एना की मन गमौने छी॥?॥

करू उत्साह किछु मनमे,
चलू सन्मार्गपर निशि-दिन।
चुकाऊ कर्ज माताके-
जे भेटल अछि अहाँके रिन॥

बढ़ाऊ डेगके आगू,
समय तँ कटि रहल अछि औ।
पुनः ऋण बढ़ि रहल अछि जे,
सधाउ आय, नेँ राखू शेष तनिको औ॥

पड़ल माता कराहति छथि,
दया के बेच देने छी।
तनिक तँ लाज राखू जे,
एना की मन गमौने छी॥?॥

सुयश पायब समाजीसँ,
धवल यश देश व्यापी औ।
पिता-माता सुकीरति लहि,
अभय वरदान देता औ॥

“अनुरोध” (२८.०९.१९६२)

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि,
हिय व्यथित, वाणी सबल नहिं,
बुद्धि व्याकुल, व्याल चहु दिश
ज्वाल ऊरमे बढ़ि रहल अछि।
की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

दशा पातर, हाल दयनीय,
आननक सुकुमारताके।
मौन शब्दातीत मुद्रा;-
से हृदयमे चुभि रहल अछि।
की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

प्राण आकुल, विकल की छी,
व्यथा-ज्वालमे जरि रहल छी,
शूल बज्रक पतित नगसँ
बमरि-झहरिके खसि रहल अछि!
की कहू कहलो नेँ जाय अछि॥

हृदय दारुण दुःख सहिके,
मात्र प्राणे शेष बाँचल।
एना विह्वल हाल कऽ के,
व्यथा द्विगुणित दऽ रहल छी॥
की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

चन्द्रमुख-मण्डल सुलोचन,
कच-विकच बेहाल की अछि।
वेदनासँ व्यथित भऽ के,
व्यथित अनका कऽ रहल छी।।
की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

बस आश एक, अनुरोध केवल,
मधु-मधुर मुस्कान के।
हेरि चानक स्वच्छ आभा,
करु मुकुल, विकसित प्राण के॥

पुनः मञ्जुल मृदुलाअ के,
हेतु अनुरोधी बनल छी।
मानिनी भऽ मान राखू,
दशा लखि के अति विकल छी॥
१.ज्योति२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा

ज्योति
बाबा अमरनाथ
ठोप ठोप पानि जमा भऽ
धीरे धीरे परतमे जमिकऽ
पहाड़क उपर गुफाक अन्हारमे
अमरनाथ बाबा भौतिक रूप मे
होइत छथि प्रतिवर्ष उद्भवित
भक्त क आह्वादन सऽ उत्प्रेरित
जेना एक शीतल अलौकिक प्रकाश
समेटने सम्पूर्ण सागर आ आकाश
जटामे लागैत निहित आकाशगंगा
हिमानी शिवलिंग दूधिया श्वेतरंगा
देवी पावर्तीके जीवन रहस्यक ज्ञान
अहि पावन ठाममे शिव केलखिन प्रदान
हिमक आरो प्रतिमा होएत अछि उपस्थित
स्वयम् गणपति देव शिव पार्वती सहित
नुकायल छल हिन्दुक ई महातीर्थस्थान
ताकैवला चरवाहा छल एक मुसलमान
१. एना किए ?- सन्तोष मिश्र

एकटा स्त्रीा ,
हमर घरकें सबहे काज कऽ दैअ
समय–समय पर आबिकऽ
हमर जरुरत पुरा क दैअ
एहिके बाध ओ
परतरि दैअ
मुदा एना किए ?

जहिया हम असगरे रहैछी
तहिया ओ हमरा संग राति बितऽबैय
कखनो तिर त कखनो तार
कहियो राईके बनादै पहाड़
कखनो हमरा लेल आाखिमे नोर
आ कखनो हमरासँ दूर
मुदा एना किए ?

कि ईहे त प्रेम नहि ?
कि ईहो प्रेम छै ?
हमरा कोनो बेगरता होए
ओ सेहो पुरा कऽ दैअ
गलती जौ भऽगेल हमरासँ
त डटबो करैए
मुदा एना किए ?

ओकर आँखिमे,
एकटा भावना रहैछैक
ओकरा विश्वारस रहैछैक हमरे पर
तैयो ओ हमरा डटैत रहैए
मुदा एना किए ?

किछु जौं कहि दिऐ त
भऽजाइए टोका–चाली बन्दर
ओकर मूँह बन्दद भइयोक
ओकर आँखि,
अपन प्रेमक गीत कहैए
मुदा एना किए ?

किछु समय बाद
जेना किछु भेले नहि हुए
जेना ओ हमरासँ चिन्तीुते नहि हुए
तहिना ब्यरवहार करैए
मुदा एना किए ?

नवीननाथ झा

नारीये सतयुग आनत यौ

अपन पीयुष अनुदानसँ, जन-जनकेँ पान करायत औ,
आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ।
उषाकालक उद्भव भऽ रहल अछि, अरुणोदयक पावन मुहुर्त अछि,
कल्याणक वेदी सजल कतो, नर समूहक मेला अछि कतो,
एहेन सुन्दर उपवनमे, युग-परिवर्तनक बिगुल बजाओत औ।
आएल वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखन नहि नारीये सतयुग आनत औ॥१॥
करलक जीव सृष्टिक संरचना, चेतनाक संचार लाएत औ,
प्रसव-वेदनाकेँ सहलक, माँ बनिकेँ प्यार देलक औ,
श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा बनि, ई अनुकम्पाक परम्परा निभौलक औ,
आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥२॥
देव युग्मोमे प्रथम नारी, तत्पश्चात् नरक नाम आएल औ
यथा-उमा-महेश, शची-पुरन्दर, राधा-कृष्ण, किया नै हुएवो सीता-राम
मानुषी रूपमे देवी थीकि, ई तथ्यकेँ ज्ञात कराएत औ।
आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥३॥
नारी-हृदय अछि निर्मल-कोमल, प्रेमक भंडार छुपल अछि सभटा,
मानवताक सिंचन करवा लेल, निकलल अहिसँ अमृत-धारा,
मुर्छित बसुन्धरा पर पुनः जागृति अवश्मेष आएत औ,
आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥४॥


युगनिर्माणी संकल्प

आइ कमर कसिकेँ आएल अछि, दुनियाक युगनिर्माणी,
बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए मनमानी।
धनक लेल वासना भड़काबैवला, सुनू औ!
दुराचार-अपराधकेँ, उकसावैवाला सुनू औ,
केविल, टी.वी. आओर सिनेमामे सुधार आब होएत,
ई विनाशकारी शैली आब हमरा सभकेँ अपनावैक नहि अछि,
बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमे देबए हम मनमानी॥१॥
जे किशोरक मनकेँ भड़कावै,ई कोन मनोरंजन भेल?
जे अपराधकेँ उकसावै, ई कोन मनोरंजन थीक?
लूट-पाट, हिंसा, हत्या, अहिलेल होएत अछि,
दुराचारक घृणित क्रिया, अहि लेल होइत अछि,
ईएह महामारी समाजक लेल, जड़िसँ मिटेबाक दृढ़प्रतिज्ञ छी,
बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए हम मनमानी॥२॥
घर-घर जे अश्लील चित्र अछि, तकरा जरा कए हम दम लेब,
बच्चा सभकेँ भड़कदार वस्त्र नञि पहिराएब हम,
बुक स्टॉलपर जहरीला साहित्य नञि बिकाय लए देबए,
मानवीय मूल्यक आगू नञि गलत भावकेँ टिकए लेल देबए,
कतो नञि रहए लेल देबए कोनो कुत्सित कथा-कहानी।
बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥३॥
आन्तरिक कविक भाव
पत्र-पत्रिकामे पुनः होएत प्रेरक गाथाएँ
अपराधक लेल प्रमुखताक नञि होएत प्रथाएँ
सहज विधेयात्मक होएत पुनः दृष्टि कलाकारक
हुनका नञि होएत चिन्ता, मात्र धन वा बजारक।
माँक बिसरल प्रतिष्ठा पुनः बढ़त ई अवश्य जानू।
बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥४॥
फिल्म नैतिक मूल्यकेँ उकसाबएवाली होएत,
कविता नारीक मान-प्रतिष्ठा बढ़ावैवाली होएत।
कतहु नहि होएत मादक-धुनपर नृत्य सिहराबएवाली,
मानव-चिन्तनक विष भरए लेल नञि होएत संचार कनेको,
पुनः प्रतिष्ठापित करबाक अछि, पुरान गरिमामयी कहानी,
बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥५॥
व्यक्तित्व
पाठक आओर दर्शकक सत्चिन्तनकेँ उभारए लेल पड़त आवश्यक छी,
शुभ समाजक लेल समर्पित जँ व्यक्तित्व नञि होएत,
ओऽ कवि कलाकारक नवयुगमे अस्तित्व नञि होएत,
आए ईएह संकल्प लऽ केँ बढ़ि चलू सृजन-सेनानी।
बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥६॥


जीव की छी? अहम् प्रश्न
उत्तर
जीवन एक जोखिम छी, जीवन एक समर छी।
जीवनकेँ एहि रूपमे स्वीकार करब, तकर अलावे कोनो चारो तेँ नहि अछि।
सत्ये कहैत छी, जीवन एक तथ्यपूर्ण रहस्यमयी भाव छी।
जीवन एक तिलस्मी छी, जीवन एक भूल-भुलैया छी।
एक तरहेँ ई एक गोरख धंधा सेहो छी।
जिनकर जिम्मा गंभीर पर्यवेक्षण करबाक दृष्टि छैक (अछि)
ओ जन जोहि भावनाक तहतक पहुँच सकैत अछि,
जीवनसँ जुड़ल भ्रान्ति, कुहासा सेहो,
मिटाएल जाऽ सकैत अछि, अनेकानेक खतरासँ सेहो बाँचल जाऽ सकैत अछि
जेना ९यथा)- हँसैत, हँसाबैत, हलका, फुलका रंगमंच,
मानिकेँ, विनोदपूर्वक मंचन करैत,
आनन्दपूर्वक समय व्यतीत करबाक दृढ़ निश्चयी-भाव,
लऽ केँ चली तँ-
जे कि पूर्णानन्दक सर्व इच्छा छी॥ जीवन एक जोखिम छी॥
जीवन एक गीत छी,
जे गीतकेँ हम पंचम स्वरमे गाबि सकैत छी,
कल्प विशेषज्ञ बनल जाऽ सकैत अछि॥ जीवन एक जोखिम छी॥
जीवन एक अवसर छी!
एहि अवसरकेँ हाथसँ गँवा नहि देबाक अछि,
कारण ई शुभ अवसर जीवनमे ईश्वरक अनुकम्पासँ,
कमसँ कम एक बेर अवश्यमेव भेटबेटा करत
ई निःसंदेह अछि॥ जीवन एक शुभावसर सेहो छी॥


गायत्री महामंत्र
प्रार्थना करैत छी हुनकासँ (परमात्मासँ)
ओऽ प्राणस्वरूप, दुखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक,
देवस्वरूप परमात्माकेँ हम अपन अन्तरात्मामे धारण करी।
ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्गमे प्रेरित करताह,
जे अवश्यंभावी अछि।
ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्ग, सत्मार्गपर चलबालेल सुबुद्धि देथि॥
गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहाएल अछि॥१॥
गायत्री भारतीय धर्मशास्त्रक ओऽ समस्त दिव्यज्ञानक प्रकाश अछि,
गायत्रीकेँ बीजाक्षरक विस्तार मानल गेल अछि।
गायत्री माँकेँ आँचर पकड़एबला साधक,
कखनो निराश भऽ नहि सकैत अछि।
ई मंत्रक चौबीस अक्षर , चौबीस शक्तिक एवं सिद्धिक मार्ग अछि,
गायत्री मंत्रक उपासना करएबला साधकक-मनोकामना,
अवश्यमेव सफलीभूत होइत अछि।।
गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥२।।
गायत्री वेदमाता कहल जाइत अछि,
गायत्री मानव-मात्रक पाप-नाशनी थिकी,
अक्षर चौबीस परम पुनीत अछि,
एहिमे बसल शास्त्र, श्रुति, गीता-
महामंत्रक जतेक जगमाहि, एकोटा गायत्री सम नञि अछि।
गायत्री भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥३॥
ॐ अव्ययवाचक शब्द छी। अतः ई शब्द परमात्माक अतिरिक्त कोनो,
प्राणीकेँ प्रयोजित नहि होइत अछि,
ॐ शब्दकेँ ब्रह्म सेहो कहल जाइत अछि।
भू: भुवः स्वः- ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशक द्योतक अछि॥४।।
तत्- परमात्माकेँ भाव ध्यानक दिस आकर्षित करैत अछि॥
सवितुः – सविता वै प्रसवनामीशे निश्चयेव समस्त सृष्टिक
ईश्वररे सविता अछि थीक।

प्रेम आनन्दक अभिव्यक्ति छी

प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि।
प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी।
प्रेम जीवनक सत्यरूपमे नियामक छी।
जीवन आओर जगक विकासक सोपान छी।
हर क्षेत्रमे प्रेमक विशिष्टताकेँ नकारल नहि जाऽ सकैत अछि
प्रेम, धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र तकमे-
समाओल गेल अछि, पिराओल गेल अछि।
प्रेम मानव जीवनक अनिवार्य एवं अपरिहार्य
अंग मानल गेल अछि, से सत्ये जानू॥
प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी॥
प्रेम एक सार तत्व अछि,
जे अणुसँ अणुमे, परमाणुकेँ परमाणु मिलाबैत अछि।
पैघ-पैघ ग्रहकेँ एक दोसरसँ आकृष्ट कराबैत अछि,
पुरुषकेँ स्त्रीक ओर, स्त्रीकेँ पुरुषक ओर,
मनुष्यकेँ मनुष्यक ओर, पशुकेँ पशुक ओर,
मानू तँ समस्त संसारकेँ एक केन्द्रक ओर खिचैत अछि
प्रेम सर्वोपरि सुख आओर आनन्द छी।
प्रेम जीवनक सार वस्तु छी॥
प्रेम यथार्थमे निःस्वार्थक भावनाक प्रतीक छी,
प्रेमकेँ दैवी भावनाक संज्ञा सेहो दऽ सकैत छी,
प्रेममे सदैव आदर्शक चरमोत्कर्ष अछि॥
प्रेम जीवनक महानतम धरोहर छी॥
प्रेम पुरस्कार नञि चाहैत अछि,
प्रेम सदैव प्रेमक वास्ते होइत अछि,
प्रेम प्रश्नकर्ता नञि अछि,
प्रेम भिखमंग नञि,
प्रेमक प्रथम सिद्धान्त जे याचना नञि करैत अछि
प्रेम सत्ये अर्थमे आत्माक पुकार छी,
प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि
प्रेम सत्ये अर्थमे जीवनक सार छी॥
विनीत उत्पल

३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक।
बच्चा नीक छै
ई बच्चा नीक छै
कतेक नीक एकर पैमाना नहि छै
सुसंस्कृत-संस्कारवान छै कतेक
एकरो पैमाना नहि छै

बेसी बजै नहि छै
दुनियादारीक नव वस्तुक
बूझाबक इच्छा नहि छै
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै

माय कए दूध पिबाक लेल
तंग नहि करैत छै
नहि भेटैत छैक तखनो चुप छै
ताहि लेल ई बच्चा नेक छै

दुनियाक गम देखक
अपन दुखक सोचिकऐ
ई बच्चा कानब बिसरि गेल
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै

माय-बापक झगड़ा देखि कए
घर में अशांति सं घबराइल ई बच्चा
केकरो किछु नहि कहैत छै
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै

जे राटायल से रटत
अपन दिमाग सं किछु नहि पूछत
किताबी कीडा छै ई बच्चा
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै

सोचैक क्षमता नहि छै
माय-बाप स
पूइछ कए करैत अछि सब काज
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै

दुधमुंहा बच्चाक जना
नहि किछु बाजैत छै
नहि किछु काज करैत छै
ताहि लेल ई बच्चा नीक छै।

जिनगी एकटा तमाशा

जिनगी एकटा तमाशा छै
कखनो उतार कखनो चढ़ाव
कहियो खुशी कहियो गम
एकरे नाम जिनगी छै

जिनगी एकता तमाशा छै
केकरो जीत पर केकरो दुःख
केकरो हारि पर ककरो सुख
सुख-दुखक सार जिनगी छै

जिनगी एकता तमाशा छै
एक ठाम फेल तए
दोसर ठाम पास
पास-फेलक झमेला जिनगी छै

जिनगी एक तमाशा छै
केकरो कानला से हँसब
केकरो हंसबा स कानब
हंसबाक-कनबाक खेल जिनगी छै।

स्त्रीगण

स्त्रीगण कए दोयम दर्जा मानले स
पुरूष समाज कए की मिलैत छैक
किछु संतुष्टि किछु घमंड
सोचैत छि हमही सर्वश्रेष्ठ

मुदा, ई फुइसियोका गैप स
नहि किछु भेटत
केकरो दुःख दैके
अहां कए सुख भेटैत छैक

त सुन लियअ एकटा गप
अहां कहियो सुखी नहि रहबै
स्त्रिगन स सीखू
सामंजस्य बनाबैक लेल प्रबंधनक गप
आउर धैर्यक क्षमता

कहबाक में ई सभ
छोट गप लागैत छै
मुदा अहांक क्षमता नहि छैक जे
नौ महीना एक जीवनक भारि साधि

भोरहि स साँझ धरि
भनसाघर में रंग-बिरंगा
तीमन
बनबै सकब

कतबैयो दियो तर्क
कलेजा पर हाथ धरि कए
एक बेर
सोचब अहां

आउर
एक स्त्रिगनक क्षमता में अन्तर
दिल ओ दिमाग खुइल जाइत
अहांक घमंड चुइर-चुइर भ जाइत

अहां कए मानहि परत
तुच्छ छी अहां
दोयम दर्जा त अहां छी
अपन खामी छिपा बैक लेल धौंस जम्बैत छी .

सभ्य समाज

तथाकथित सभ्य
समाज में
प्रेम करैक अधिकार
नहि छैक लोक कए

अहां प्रेम करबै ते
घर सं बारल भए जाइब
समाज में प्रतिष्ठा खत्म भए जाइत
अहां होयब घृणाक पात्र

अहां माय सं प्रेम कए सकैत छी
अहां पिता सं प्रेम कए सकैत छी
अहां बहिन सं प्रेम कए सकैत छी
अहां भाई सं प्रेम कए सकैत छी

अहां घर सं प्रेम कए सकैत छी
अहां पढाई सं प्रेम कए सकैत छी
अहां करियर सं प्रेम कए सकैत छी
अहां कुत्ता सं प्रेम कए सकैत छी

मुदा, नहि कए सकैत छी
प्रेम
स्वर्णिम भविष्यक लेल
आन जातिक युवक आ युवती सं

ई ‘सभ्य’ समाजक परिभाषा छैक
माय-बापक पसिन सं ब्याह करू
माय-बापक पसिन से प्रेम करू
माय-बापक पसिन से बच्चा जनमाऊ.
पंकज पराशर,

डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.।
पुरइनि
जन्म कालेसँ छुटैत रहल अछि
हमर जीवन केर एक-एकटा खोंइचा
अपने देहक एक-एक अंग
छोड़ैत रहल अछि हमर संग साँपक केचुआ जकाँ

हमर जीवनदाता नाभिसँ नालबद्ध पुरइनि समा गेल
मायक कोइखिसँ धरतीक कोइखमे

कारी-कारी हमर जन्मौटी केश
लाल मोलायम हाथक नह छुटि गेल
हमरा देहसँ रोज-रोज छुटैत जा रहल दुनिया जकाँ

उज्जर दुधहा दाँत हमर पृथ्वीक कोन काज आयल हेतनि?

मासे-मास कटैत केश आ अठवारे कटैत नह
भरिसक काज अओतनि कोनो इतिहासवेत्ता केर

हमर केश, हमर नह आ दुधहा दाँत
दुनियामे अबिते देरी अलग भ गेल हमरासँ
संग-संग संसारमे आयल पुरइनि जखन
संग नहि देलक तँ ककरोसँ कोन याचना
कोन अपेक्षा!

लाहौर
(सुन्दर दास रोड, लक्ष्मी चौक आ लाला छतरमल रोडपर टहलैत)
कोनो ध्वनि तरंगकेँ अनुमति नहि छैक एहिठाम भारतसँ अयबाक
पासपोर्टपर लागल वीजाक मोहर चुपचाप अभयदानक मुद्रामे हाथ पकड़ैत कहैत अछि-
कहियो साठि-पैंसठि बरख पूर्वक रहल वर्तमान आब इतिहास बनल अछि
जतयसँ बाहर भेल बहुत रास ध्वनि तरंग आइयो इतिहासपर आंगुर उठबैत अछि

जिस लाहौर नहि वेख्या ओ जम्या ही नइ- के कहैत छल?
के लाहौरसँ जन्म लेबाक सार्थकताकेँ जोड़ैत छल?
मोनमे तरंगित प्रश्न असंख्य हिन्दुस्तानीक जनम अकारथ केर कथामे ओझराइत
अनारकलीसँ निकसैत ग्वाल मंडीमे भुतिया जाइत छल

जखन-जखन इस्लामाबादसँ उठल बिहाड़ि
बिड़रो बनि पसरैत अछि तरेगन भरल आकाशमे
लहोर-लहोर कहि आर्तनाद क उठैत अछि बिलटल हृदयक हाहाकार
दरबार-दरबार सबमे गिरफ्तार इतिहासक स्वर-पहाड़-
पंजाबीमे, पश्तोमे, उर्दूमे अभिव्यक्तिक अवलंब
अनुगूंजित होइत अछि बुल्लेशाहक स्वर…लहोर-लहोरक उच्च स्वरमे

कतेक नपना सबसँ नापल गेल पानि
पानि-पानि भेल धरतीक सीनापर फांक-फांकक बखरामे
बटखरा सबसँ जोखल जाइत रहल पूर्वज सिंचित नोर
खूनम-खून भेल आत्माक कछेरपर देखैत गिद्धक झुंड
लोल भरि-भरि कए भरैत रहल घोघ नरमुंडसँ

मतिर्भिन्ना लकीर रेड क्लिफक गवाहीमे लाहौरक बताह सबकेँ
“टोबा टेक सिंह” मे रूपांतरित करैत वधस्थलपर चीत्कारोल्लसित
टैंक केर मुंहपर अमृतसरक अमृतविहीन हेबाक गवाही दैत
आइ धरि हमरा जेबीमे कोनो रेडियोधर्मी तत्व जकां पासपोर्ट-वीजा बनल छल

बसरा

नष्ट कऽ देल गेल ओहि नगर सबटा खेसरा
कतहु नहि बाँचल आब ओ बसरा

विश्व चौधरीक जुत्तामे लागल धूरामे
स्वचालित हथियारक मोनबरहू नलीमे
तकैत अछि अपनाकेँ बसरा

कंधारी कान्हपर स्थायी कठिहारी बनौनिहार
जुत्ता सबहक नोंकसँ उड़ल धूरा
नष्ट कऽ दैत अछि नोरो केर स्वच्छता

नोरक विशाल नदी बहि रहल अछि
बसरामे बगदादमे काबुलमे कंधारमे
ईरानमे सीरियामे क्यूबामे लीबिया आ फिलिस्तीनमे
जाहिमे हेलडूब करैत कोन भविष्यक आसमे जीबि रहल छी?
पुछैत अछि बसरा केर कोइख-माथ सुन्न स्त्रीगणक समूह

कतेको नेना मानव-कंकालसँ भयभीत हेबाक वयसमे
बेचि रहल अछि व्यापारीकेँ बीछ-बीछ कए मानव अस्थि

ई कोन युद्ध छल जाहिमे बेर-बेर अश्वत्थामा हाथीक मृत्युकेँ
द्रोणपुत्रक मृत्यु कहि कए प्रचारित कयल गेल
ई कोन युद्ध छल जाहिमे कतहु अस्तित्वे नहि छल
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा कतहु?

एक दिन जखन साँझमे घर घुरैत छल
फौजिया अल सईद
तँ देखलनि कइक हजार सालक
कइक लाख हुनक पुरखाक आँखिसँ खसैत
अविरल नोर-प्रपात
आ कखन बिला गेल ओहिमे ओ
से नहि देखि सकल दजला-फुरात!
१.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्द्रँ यादव
१. बिनीत ठाकुर
बाँहिके गोदना कविता

रैहगेल निशानी आब बाँहीके गोदना
अनाहकमे मारल गेलै बुधनीके बुधना

उमेरोनै बेसी भेलरहै मात्र बिस
मरैतकाल ए १ राम बजलैनै ईश
फटलैजे बम त शरीर भेलै चिथरा
दैवोनै गवाही त कहबै की ककरा

लागल छै गाराभुकुर बुधनिके चिन्तार
के करतै आब पुरा ओकर बच्चालके सिहन्तास
ऐ देशेके लागलछै शतिके श्रात
एत सिधा सोझा जनताके केउ नै माई बाप

भरल नोर मे
केहन सपना हम मीता देखलौँ भोर मे
माय मिथिला जगाबथि भरल नोर मे
कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल
छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल

कनिको बातपर हमरा तूं करै विचार
की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार
जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ
कर हिम्मत तूं पुत्र छियौ हम तोहर साथ

अछि तोरापर बाँकी हमर दूधक कर्ज
करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज
लौटादे हमर आब अपन स्वाभिमान
पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छौ महान

२. निमिष झा
चिर्रीचिर्री भेल मोन
अहाँके सफलताक शिखर पर देखऽ चाहैत छलौं
भीडसँ पृथक अहाँक परिचय खोजैत छलौं
ई हमर सपना नहि
प्रेमक भावना नहि
जीवनक आदर्श छल
एहि बाट पर संगे चलबाक नियार छल
मुदा आब तऽ ठिके ओ नियार सपने भङ्ग गेल
खुलल आँखिसँ देखलौं सबटा भ्रमसन लागल
क्षणभंगुरमें विलीन भेल एकटा अतीतसन लागल ।

जोरसँ कानि नहि सकैत छी
मोन निचोरी कऽ निकलल नोर कें
रोकि नहि सकैत छी
क्षतविक्षत छातीक ई व्यरथा
ककरो कहि नहि सकैत छी
व्योथासँ भरल मन, जीवन लऽ
बनाबटी हँसी हँसैत छी
वेदना नुकाऽ खुशीक भ्रममें
जिबाक असफल प्रयास करैत छी ।

चुल्हाअ आ चौका आब अहाँक संसार बनल
सिन्दूअर आ चुरी अहाँक परिचय
ई नेल आ हतकडीसँ दूर
हम अहाँके सम्पू र्णता दैत छलौंह
मुदा अहाँ तऽ सीतक सिन्दूणरसँ दबल छी
नुपूरक जञ्जि रमें बन्ह याल छी
किया चारि किलाक बन्दीब बनि गेलौंह अहाँ ?

हमर सपनासँ आब अहाँ विभोर नहि हैब
चाहियो कऽ हमर आकाँक्षां अहाँक तन्द्रा भङ्घ नहि करत
हम स्वीककार कऽ चुकल छी
ई सब हमर असफलता अछि
हमर सपनाक चिता अछि
अहीँक लेल देखल सपना सब
अहाँक जीवन लक्ष्यनमें
सम्पू र्ण सपनाके रुपान्त रण नहि कऽ सकबाक प्रमाण अछि ई ।

जीवनक लक्ष्यप आ उद्देश्य
अहाँक तरबासँ पिचाइत गेल
अहाँ उज्व्सँ ल प्राप्तिगक लेल दूर भऽ गेलौंह
मुदा हम आ हमर मोन
इजोरियोमें अन्धोकारमय अछि
सदाक लेल ई मोन फाटि गेल अछि
चिर्रीचिर्री भऽ गेल अछि ।

३. अमरेन्द्रय यादव-
टमटमियाँ घोडा
अमेरिका जे इराक पर
अपन खैमस्तीइ झाडलक अछि
ताहिसँ हमरा कोन काज ।
म्‍ााओवादी जे बन्दुरक उठौने अछि
आ गणतन्त्राक लेल
लडि रहल अछि
तकर हमरा कोन मतलब ।
सौंसे मुसहरी जे
भुखक सुली चढि रहल अछि
आ घर—घरक बेटी पुतौह जे
चुल्हाुक आँच बनि रहल अछि
तकर हमरा कोन चिन्‍ता ।
हम तऽ अहाँक टमटमियाँ घोडा छी बाबुजी ।
अहाँक वीर्यसँ लऽ कऽ खुन पसिना धरिक
लगानी अछि हमरा पर ।
हम कोना बिसरि सकैत छी
अहाँक ओ आदेश
अहाँक ओ महत्वासकाँंक्षा
हँ बाबुजी
हमरा चढबाक अछि
अहाँक सपनाक पहाड पर ।
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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