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विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-part-1

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विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५-पर्त 1

‘विदेह’ ०१ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) एहि अंकमे अछि:-
एहि अंकमे अछि:-

चित्र: ज्योति झा चौधरी
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१.१. सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता (कथा)
२.२.उपन्यास- केदारनाथ चौधरी
२.३.१. श्या मसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि
२.४.१. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्तक हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्द्र लाल ३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत’ आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा (कथा)
२.६. आलेख-रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा-जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा
२.८. मिथिला मंथन- सुशान्त झा
२.९. भानस भात-नीलिमा

३.पद्य
३.१. १.आशीष अनचिन्हार २.मधुप
३.२. १.महेश मिश्र “विभूति”
३.३.-१.ज्योति-२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा
३.४. विनीत उत्पल
३.५. पंकज पराशर
३.६. १.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्द्रु यादव

४. मिथिला कला-संगीत-छवि झा/ कुमुद सिंह
५. गद्य-पद्य भारती (तेलुगु कथा, गुजराती पद्य)
६. बालानां कृते-१.उमेश कुमार-२.ज्योति झा चौधरी
७. भाषापाक रचना लेखन- १.कृषि-मत्स्य शब्दावली २.बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण।मानक-मैथिली
8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti
१.संपादकीय

चित्र: प्रीति ठाकुर
प्रिय पाठकगण,
विदेहक नव अंक ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in |
एहि अ‍ंकसँ डॉ शम्भु कुमार सिंहक आलेख प्रतियोगी परेक्षार्थीक लेल शुरु कएल गेल अछि।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति एहि महत्वपूर्ण नाट्यवृत्तिक संचालनक भार मैलोरंग केँ देल गेल । प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट,घोंघौर आ ओकर प्रबंध न्यासी श्री श्रीनारायण झा द्वारा ।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाट्य निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीला जी जीवन पर्यंत भंगिमा, पटना संग जूड़ि बाल रंगकर्म के बढ़ावा दैत रहलीह । प्रमीलाजीक स्मृति मे स्थापित प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट, घोंघौर हुनकर बाल रंगमंच मे अविस्मरणीय योगदानक लेल एहि नाट्यवृत्तिक स्थापना केलक अछि । एकर मूल मे मैथिली रंगमंच पर महिला रंगकर्मीक प्रोत्साहन संग हुनकर सामाजिक सम्मान अछि । एहि नाट्यवृत्तिक संचालनक भार ट्रस्ट द्वारा लोक कलाक लेल समर्पित संस्था मैलोरंग के प्रदान कयल गेल अछि । वर्ष 2006 सँ नियमित रूप सँ ई नाट्यवृत्ति ज्योति वत्स (दिल्ली), रंजू झा (जनकपुर), स्वाति सिंह (पटना), प्रियंका झा (पटना), वंदना डे (सहरसा) के प्रदान कयल गेल छनि ।
वर्ष 2008क लेल समूचा मिथिला (भारत+नेपाल) मे चालीस गणमान्य रंगकर्मी/संस्कृतिकर्मी केँ नामक अनुशंसाक लेल पत्र पठाओल गेल छलनि । ओही अनुशंसाक आधार पर प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव (मधुबनी), द्वितीय : वंदना ठाकुर (कोलकाता), तृतीय : नेहा वर्मा (दिल्ली), आ चतूर्थ : विजया लक्ष्मी शिवानी (पटना) अयलीह । किछु पारिवारिक कारण सँ वंदना जी एहि बेर वितरण समारोह मे अयबा सँ असमर्थ भ’ गेलीह तेँ ई क्रम बदलि गेल आ वंदना जीक स्थान अगिला बेरक लेल सुरक्षित राखल गेल अछि ।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति-2008
तृतीय :विजया लक्ष्मी शिवानी : पटना
शिवानीक जन्म दरभंगाक रसियड़ी गाम मे भेलनि । ई पिछला तीन साल सँ लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल छथि । शिवानी अरिपन, भंगिमा सन चिर-परिचित रंग संस्था सँ जुड़ल छथि । एहि बीच अहाँ नदी गोंगियायल जाय, मिनाक्षी, घुघ्घू, आगि धधकि रहल अछि, से कोना हेतै ?, अलख निरंजन आदि महत्वपूर्ण नाटक मे अभिनय करैत अपन नीक छवि बनेलहु अछि । मनोज मनुज, कौशल किशोर दास आ अरविन्द अक्कू जीक निर्देशन मे काज करैत शिवानीक इच्छा छनि जे वरिष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक निर्देशन मे सेहो नाटक करी । वरिष्ठ रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र जी सन रंगकर्मी बनबाक हिनक मोन छनि । विजया लक्ष्मी शिवानीजीक कहब छनि जे – समकालीन समस्या मैथिली नाटक मे एयबाक चाही जकर अखन तक कमी अछि । पारिजात हरण हिनकर प्रिय नाटक छनि आ शिवानी नबका तुरिया के कह’ चाहैत छथि जे इमानदारी सँ रंगकर्म करबाक चाही ।
द्वितीय :नेहा वर्मा : नई दिल्ली
नेहाक जन्म बेगूसरायक न्यू चाणक्य नगर मे भेलैन । ई बच्चे सँ रंगमंच सँ जूड़ल रहलीह अछि । नवतरंग, इप्टा, यात्रीक संग कार्य करैत एखन मैलोरंग दिल्ली सँ रंगकर्म क’ रहल छथि । नेहा अनिल पतंग, परवेज़ यूशुफ, संतोष राणा, विजय सिंह पाल, अभिषेक, मनोज मधुकर आ प्रकाश झाक निर्देशन मे नाटक केलीह अछि । हिनका द्वारा कयल गेल प्रमुख नाटक अछि सामा-चकेवा, जट-जटिन, डोम कछ, गोरखधंधा, काठक लोक, कमल मुखी कनिया, एक छल राजा आदि । आगू लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल रहबाक हिनकर इच्छा छनि । हिनकर प्रिय नाटककार आ निर्देशक महेन्द्र मलंगिया छथिन आ रंजू झा (जनकपुर) क अभिनय हिनका प्रभावित करैत छनि । काठक लोक प्रिय नाटक आ प्रगतिशील सोचक संग बेसी युवा के होबाक कारण मैलोरंग नेहाक मनपसंद रंग संस्था छनि । अपन आत्मसमर्पण आ संस्कारक संग रंगकर्म सँ जुड़बाक हिनकर आग्रह छनि नबका कलाकारक लेल । नेहा सी. सी. आर. टी. द्वारा जूनियर स्कॉलर्शिप प्राप्त कयने छथि । अखन राष्ट्रीय कथक केन्द्र सँ कथक मे पोस्ट डिप्लोमाक संग खैरागढ़ विश्वविद्यालय सँ एम. ए. क’ रहल छथि ।
प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव : मधुबनी
मधुमिताक जन्म मधुबनीक सूरत गंज मुहल्लामे भेलनि । बचपने सँ हिनका नृत्य आकर्षित करैत छलनि । विगत दस साल सँ ई मैथिली रंगमंच पर सक्रिय छथि । मधुबनीक इप्टा संग रंगकर्म करैत अहाँ इप्टाक राज्य आ राष्ट्रीय स्तरक महोत्सव मे सेहो शिरकत केने छी संगहि अहाँ सॉंग आ ड्रामा डिभीजन संग सेहो संबद्ध छी । मुकाभिनयक लेल अहाँ इंटर कॉलेज यूथ फेस्टीवल-03 मे तेसर आ वर्ष 06 मे लोक नृत्यक लेल पहील स्थान प्राप्त केने छी । अहाँ ओकरा आङनक बारहमासा, ओरिजनल काम, टूटल तागक एकटा ओर, छुतहा घैल, गोनूक गबाह, दुलहा पागल भ’ गेलै, बिजलिया भौजी, बिरजू-बिलटू संग कतेको हिन्दीक नाटक केने छी । मंचीय नाटक संग नुक्कड़ नाटक मे सेहो मधुमिता बढ़ि चढ़ि क’ भाग लैत रहलीह अछि । झिझिया, झड़नी, जट जटिन डोम कछ एहन कतेको लोक नृत्य, एकल अभिनय, फिल्म सिरियल आदि मे अभिनय क’चुकल मधुमिता नेहरू युवा केन्द्र, एस.एस.बी संग कतेको संस्था सँ सम्मानित कयल गेल छथि ।

संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in

२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ’ गेल।

२.गद्य
२.१.१. सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता (कथा)
२.२.उपन्यास- केदारनाथ चौधरी
२.३.१. श्या मसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि
२.४.१. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्तक हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्द्र लाल ३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत’ आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा (कथा)
२.६. आलेख-रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा-जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा
२.८. मिथिला मंथन- सुशान्त झा
२.९. भानस भात-नीलिमा
कथा
१. एकटा प्रेम कथा-सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।
एकटा प्रेम कथा
कहियो-कहियो ओहि लड़कीक फोन अबै । रिसीभर उठा कऽ ‘हलो’ कहिते ओम्हरसँ आवाज अबै- ‘कने, प्रेमी केँ बजा देबै ?’
ई सुनिते खौंझ आ तामस सँ जी जरि जाय ।खौंझ आ तामस खाली ओही लड़कीक फोनसँ होइत हो, से बात नहि। तामस सब पर होइ जे ककरो बजा देबा लेल फोन करै । ओ तऽ कहुना लड़किए रहय । फोन जँ लड़की आ जनीजातिक हो तऽ मरद-पुरुखक रवैया ओहुना कने लरम आ मोलायम होइत छै ।
जहिया पहिल बेर ओकर फोन आयल रहै तऽ हम पुछने रहिअइ- ‘अहाँ के छी ?’ हमर मतलब ओकर नामसँ रहय । लेकिन ओ अपन नाम नहि बतेलक । बाजल- ‘हम नया बजारसँ बाजि रहल छी । खाली एतबे कहला सँ ओ बूझि जेतै ।’
‘फोने पर रहब आकि फेर करब ?’-हम अनमनायल जकाँ पुछलिऐ ।
‘पाँच मिनटमे फेर करै छी ।’ –कहि कऽ ओ फोन राखि देलक ।
हम मन मारि कऽ ओहि कोठली गेलहुँ, जकर खिड़की सँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै । ओकर मकान हमर मकानक पंजरामे रहै । ‘प्रेमी ! रे, प्रेमी !’ हम दू-तीन बेर जोर सँ हाक देलिऐ । ओ कोठलीसँ बाहर निकलल तऽ कहलिऐ- ‘नया बजारसँ फोन छौ ।’ ओ हमर घर दिस आबय लागल । आब या तऽ ओ छहरदेवाली फानि कऽ चोट्टे चल आयत या कने आगाँ बढ़ि कऽ बिना फानने भीतर चल आयत किऐ तऽ ओहिठाम छहरदेवालीक ऊँचाइ भरिए ठेंगहुन छै ।
ओ घर ढुकिते रहय कि फोनक घंटी बजऽ लगलै । फोन सुनऽ लेल बाहर सँ क्यो अबै तऽ हम ओहि कोठलीसँ निकलि जाइ । आन लोकक फोन सूनब या ओकरा पर पहरेदारी करब हमरा शिष्ट आचरण नहि बुझाइत रहय । कोठलीसँ बाहर निकलैत आ घरक भीतर एम्हर सँ ओम्हर जाइत-अबैत जे सुनबा मे आयल ताहि सँ ई बुझायल जे प्रेमी साँझ खन ओहि लड़कीसँ भेंट करतै । ओ लड़की के छलै आ प्रेमी सँ ओकरा कोन काज छलै, से जनबाक इच्छा तऽ बड्ड रहय, मगर प्रेमी सँ ई सब पूछब मोसकिल छलै । ओ अठारह-बीस सालक जवान रहय आ हम ओकर बापक उमेर के । ओहुना ओ घुन्ना स्वभावक लड़का रहै । ओ इंटरक विद्यार्थी छलै, लेकिन पढ़ाइमे ओकर मन नहि लगै । ओ टी.भी. देखय, गाना सुनय, क्रिकेट खेलय आ दोस-महिम सँ गप्प लड़ाबय ।
नहि जानि ओहि दिन साँझकेँ प्रेमी ओहि लड़की सँ भेंट केलकै कि नहि; लेकिन दुइए-चारि दिनक बाद लड़की फेर फोन केलकै । वएह पुरान आग्रह । बाजक ओहने ढंग । कने संकोच, कने घबराहट आ कने डर । बेर-बेर पुछलो पर ने तऽ ओ अपन नाम बतेलकैआ ने काम । तखन एतबा जरूर कहलकै जे ओ प्रेमीक मामा कत’ सँ बाजि रहल अछि । तऽ की ओ प्रेमीक ममिऔत बहीन छिऐ ? जँ ममिऔत बहीन छिऐ तऽ बेर-बेर वएह टा किऐ फोन करै छै ? क्यो दोसर किऐ नहि करै छै ? मामा, मामी, ममिऔत भाइ -एहि मे सँ क्यो तऽ कहियो करितइ । हमर मन मे कतेको सवाल आबय, मगर जवाब कोनो नहि । संदेह आ असमंजस उपलाइत रहय ।
आइ-काल्हि लड़कीक घरक लोक दिलफेक किसिमक लड़का सभक फोनसँ चिंतित आ फिरीशान रहैत अछि । मगर एतय मामला उन्टे छलै।
कहियो काल हमरा बुझाय जेना प्रेमीक रुचि लड़कीमे नहि छै। फेर सोची जे से रहितइ तऽ प्रेमीक उदासीनता लड़कीसँ बहुत दिन धरि छिपल नहि रहितइ । जँ प्रेमी ओकरा नहि चाहितिऐ तऽ लड़की बेर-बेर फोन किऐ करितइ ?
तकर बाद फोन आयब बन्न भऽ गेलै । किछु दिनक बाद पता लागल जे प्रेमी मोबाइल कीन लेलक अछि । आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सब तरहक गप्प करैत हैत । भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो । हमरा लेल आब ई मामला सभ दिनक लेल अज्ञात आ रहस्यमय भऽ गेल रहय ।
लेकिन नहि, जीवनमे कोनो चीज अंतिम नहि होइत छै। भरिसक एक साल बीतल हेतै । एक दिन सांझुक पाँच बजे फोनक घंटी बजऽ लगलै । हेतै ककरो । हम अन्यमनस्क भाव सँ सोचलहुँ । कैकटा भटकल फोन अबैत रहैत छै । मगर नहि, ओम्हरसँ कोनो लड़कीक आवाज एलइ, पातर-मधुर आवाज आ फोन कटि गेलै। हम सोचमे पड़ल रही कि फोनक घंटी फेर बज्ऽ लगलइ ।
हलो !’-हम रिसीभर उठा कऽ कहलिऐ । ‘
कने, प्रेमीकेँ बजा देबै ?’
अरे ! ई तऽ वएह लड़की छिऐ । अपन नाम आ काम बतेने बिना प्रेमीकेँ बजा देबाक अनुरोध करयवाली । ओ बहुत दिनक बाद फोन केनेछल, तैं खौंझ तऽ नहि भेल, लेकिन मनमे थोड़े उदासीनता पसरि गेल ।
‘देखइ छिअइ।’-हम कहलिऐ ।
‘पाँच मिनट मे हम फेर करै छी ।’
‘ठीक छै ।’—हम विरक्त सन कहलिऐ।
देखिऐ या नइँ देखिऐ, एहि दुविधामे पड़ल-पड़ल हम ओहि कोठलीमे पहुँच गेल रही, जाहि कोटलीक खिड़कीसँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै । लेकिन पहिने जकाँ हम प्रेमीकेँ हाक नहि देलिऐ । आइ-काल्हि प्रेमीक माय-बाप एतहि छै । खिड़की सँ ओहि पार तकिते ओ दुनू अभरल । मकानक मरम्मत होइत रहै । प्रेमीक कतहु अता-पता नहि छलै । भरिसक कोठलीक भीतर हो । हम ठाढ़ भेल देखैत रहलिऐ । भऽ सकैत अछि प्रेमी कोठलीसँ बाहर निकलि आबय । आयल तऽ फोन दिआ कहबै ।एक बेर भेल जन सँ पुछिऐ प्रेमी छै कि नहि, फेर छोड़ि देलिऐ । सोचलहुँ फोन उठेबे ने करबै । लेकिन एहन भऽ नहि सकल । ओ पांच मिनटक अंदरे फोन केलकै आ हम उठाइयो लेलिऐ ।
‘प्रेमी नहि छै । कतहु निकलल छै । ओकर माय-बाप आयल छै । घरक काज चलि रहल छै ।’—अपन निष्ठामे खोटक अनुभव करैत हम एक साँसमे ई सब कहि गेलिऐ । ओ निराशा आ सोचमे डूबल बाजल—’अच्छाऽ !’ हम पुछलिऐ-‘अहाँ के बाजि रहल छी ?’एकर ओ सोझ जवाब नहि देलक । बातकेँ ओ जहिना घुमेनाइ-फिरेनाइ शुरू केलकै, हमरा बुझा गेल ओ पहिनहि जकाँ सवालकेँ टारि देत । लेकिन आब ओ बेसी अनुभवी, पटु आ सियान भऽ गेल छल । ओकरामे साहस आ निर्भीकता आबि गेल छलै ।
‘अकल, हम नया बजारसँ बाजि रहल छी ।’-ओ आवाज सँ हमर उमेर ठेकना लेलक, तैं अंकल कहि रहल अछि;हम सोचलहुँ । ओकर अंकल कहनाइ कने खटकल, फेर लगले सामान्य भऽ गेलहुँ ।
‘ठीक छै, नया बजारसँ बाजि रहल छी, मगर छी के, से न बताउ ?’-अपन स्वरमे बहुत नरमी अनैत हम धीरे-धीरे कहलिऐ ।
‘हम प्रेमीक ममिऔत बहीनक सखी भेलिऐ ।’-आब ओ सहज भेल जाइत रहय । तइयो अपन नाम तऽ ओ नहिएँ बतेने रहय । हमरा लागल ओ जरूर नाज-नखरावाली, शोख आ चंचल होयत। ओकर गप करबाक ढंग मोहक रहै।
‘अहाँ अपन नाम नहि कहब ?’-हम जेना गोहारि केलिऐ ।
‘रितु ।हमर नाम रितु अछि ।’-हमर अभ्यर्थना सँ जेना ओ पघिल गेल रहय । आब ओकरा कोनो हड़बड़ी नहि छलै आ ओ निचेन सँ गप्प कऽ रहल छल ।
‘किछु कहबाक हो तऽ कहू, हम ओकरा कहि देबै ।’-हम प्रेरित केलिऐ । ओ सोचमे पड़ि गेल फेर पुछलक- ‘अहाँकेँ ओकर नवका मोबाइल नम्बर बूझल अछि ?’
हम कहलिऐ- ‘न्न, मगर हम पूछि कऽ राखब ।
‘ ‘ओकरा कहि देबै काल्हि एगारह बजे फोन करबै ।’
मन पड़ल काल्हि तऽ हमरा दस बजे कतहु निकलबाक अछि, तैं कहलिऐ-‘एगारह बजे नहि, दस बजे करब।’
‘ठीक छै ।’-ओ कहि तऽ देलकै, लेकिन हमरा लागल जेना ओकरा अपन बात पर संदेह होइ । ओ फोन राखि देलक । फोन पर रहल ओकर संग आब छूटि गेल छल ।आइ ओ बड़ी काल धरि आत्मीय जकाँ गप्प केने रहय । फोन राखि देलाक बादो हम ओत्तहि ठाढ़ रहि गेल रही, जेना किछु और कहबाक हो, किछु और सुनबाक हो । हमरा छगुन्ता भेल, ओहि लड़की लेल हम किऐ उदास भऽ रहल छी ?
दस बजे । काल्हि दस बजे। कोनो मंत्र जकॉं इ हमर भीतर बजैत रहल आब प्रेमी केँ ताकय पड़त । काल्हि दस बजे सँ पहिने बतबय पड़त जे ओकर फोन आबऽ वला छै । साँझे मे कहि देनाइ ठीक हेतै । भोरमे छुट्टी नहि रहत ।जँ ओ खिड़कीसँ देखा गेल, तखन तऽ कोनो बाते नहि, नहि तऽ ओकर खोजमे चक्कर काटय पड़त । साँझ केँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि । पहिने ओत्तहि देखबै ।नहि भेटल तऽ ओकर घर जाय पड़त । लेकिन घर पर तऽ ओकर माय-बाप छै ! माय-बापकेँ लड़कीक फोन दिआ कहब ठीक नहि हेतै । खैर, देखल जेतै । अखन तऽ बहुत समय छै । भऽ सकैत छै ओ खिड़कीसँ देखाइए जाय । हम बेर-बेर खिड़की लग जाय लगलहुँ । ओतय जाइ, कनी काल ठाढ़ रही आ थाकि कऽ घूरि जाइ । अपन छाहे जकाँ ओ लड़की हमर संग-संग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत । रितु आ प्रेमीक चुम्बकत्व हमरा आविष्ट कऽ लेने छल । ओहि दिन प्रेमी नहि भेटल । राति मे हम सपना देखैत छी जे ओ दुनू आयल अछि । घरमे हम असकर छी । दुनू केँ कोठलीमे बैसा कऽ हम बाहरमे टहलि रहल छी । कोनो चीजक खसला सँ निन्न टूटि जाइत अछि। रौद भऽ गेल छै । मन पड़ैत अछि आइ दस बजे रितुक फोन एतै । प्रेमीकेँ कहबाक अछि । हम बिछान छोड़ि उठि जाइत छी।
तृष्णा- राजेन्द्र विमल
आइ फेर बहु-बदला भेलैए कहाँ दन!…गे दाइ, गे दाए!
रजदेबाके बहु सिकिलिया आ देबलरैनाके बहु सोनावती। सिकिलिया ओना छै मोसकिलसँ अढ़ाइ हाथक मौगी मुदा सउँसे गोर देहमे गजगज मासु करै छै। देखिते होएत जे काँचे चिबा जाइ। टोङि देबै, बन्न दऽ सोनित फेकि देतै। देहपर जेना इस्त्री कएल होइ; छिहलैत आऽ गतानल अंगअंग। देबलरैनके मुँहसँ तँ कहिया सऽ ने लेर चूबैत रहै-लसलस। देबलरैना-बहु सोनाबती, रोलल-छोलल, पोरगर करची सन लचलच करैत देह। रजदेबाके ततराटक लागि जाइक- देखैक तँ देखिते। एक्के टोलमे दसे घरक तऽ फरक हएतै दुनूक घरमे। छिनरझप्पबाली सोनावतियो केहन मन सरभसी जे जखने रजदेबासँ नयन मिलै कि छट्ट दऽ बिहुँसि उठै अंग-अंग- जेना लौका लौकि गेल होइ भीतरे भीतर। उपर सऽ सतबरती जे बनैय। रजदेबा माने राजदेव मंडल, अंचल अस्पतालमे चपरासी अछि। बाप ओकरा जनमऽ सँ पहिनहि सरग सिधारि गेल रहथिन्ह। पोसल केऽ तऽ माए। एकटा बहीन रहै चंचलिया। सभ कहै कुमरठेल्ली। सउँसे गाम अनघोलकएने रहै छौंड़ी। कहियो खेसारीक झारमे पकड़ल जाइक, कहियो राहरि खेतमे केयो देखि लैक। कहिने कते आगि भगवान देहमे देने रहथिन्ह। चंचलियाक माय कहै जे ई देहक आगि थोड़बे रहैक, पेटक आगि रहै, पेटक। आब जे रहौक, मुदा ओ मारलि गेलि। ओकरा लऽ कऽ दू टा मनसामे झगड़ा भऽ गेलैक। जगदिसबा कहै जे हमर धरबी अछि, मनमोहना रिक्साबला कहै जे हम्मर माल अछि। चंचलिया दुन्नूकेँ दूहै छलि। से बरदास्स नहि भेलै मनमोहना रिक्साबलाकेँ। ताड़ीक झोंकमे रिक्साक पुरना चेनसँ तेना ने ततारऽ लगलै जे होशे ने रहलै। सउँसे देहसँ सोनित बहि रहल छलै आ ओ मुँह बाबि देने छलि। परिवारमे विधवा माय छलै, स्वयं छल, सिकिलिया छलै आऽ पाँच बरखक बेटा रहै। बेटा बड्ड सुन्नर आ बड़ ठोला! चंचलिया तऽ संसारसँ उठिए गेलै। आब परिवारक सुखाएल आँतक घघरा मिझएबाक लेल सोनित सुखएबाक जिम्मेबारी रजबेक छलै। जूआमे चुपचाप कान्ह लगा देलक आ बहए लागल। बहु रहै चमचिकनी, फरदेबाल आ फसलीटीबाली। रोज गमकौआ तेल चाही, स्नो-पाउडर चाही। रङसँ ठोर नइँ रङब, लिपेस्सी चाही। सिनेमामे चसकलि। जी-मुँह चलिते रहइ। पनपियाइमे घुघनी-मुरही, कचरी भरि पोख। दुसंझी। रोज-रोज माछु-मासु गमकैत रहउ आङनभरि- ने किछु तऽ डोका-ककरि। आकि कछुएक झोर। कतेक दिनसँ एक जोर परबा पोसक लेल रगड़ा कए रहलि छलि साँयसँ। छमकि कए एमहर, छमकि कए ओमहर। राति-राति भरि झूलन देखए, सलहेसक नाचमे खतबैया टोलक झुलफिया या नटुआक नाच आ सतरोहनाक बिपटइ देखि-देखि कऽ लहालोट भऽ जाए। रजबाकेँ ई सभ सतखेल्ली मौगिक लच्छन बुझाइक, तेँ रोज बतकुटौअलि होइ। रिक्साबला देबलरैनासँ यारी रहै रजदेबाकेँ। देबलरैना सिकलियाके बड़ पसिन्न। कारण रहै जे देबलरैना सेहो सलहेसक नाचमे ढोलकिया रहै। ईह ढोलक बजबैकाल ओकर कनहा जे उपर-नीचाँ होइ छल- गुम-गुमुक-गुमुक…गुम गुमुक गुमुक! .. बेर-बेर झुलफी मुँहपर खसि पड़ै जकरा ओ ओहिना छोड़ि दैक। मुँहपर बुनकिआएल ओसक बूँद सन पसेना! ओ मोनहि मोन अपन साँय रजदेबासँ देबलरैनाक मिलान करै। … कहाँ देबलरैना, कहाँ रजदेबा। रजदेबाक मुँहपर चौबीस घंटा जेना विपत्तिके झपसी लधने रहै। घोघनमुँहा एक रत्ती ने सोहाइ सिकिलियाकेँ। मगर करओ तऽ की करओ? सिङार-पटार कए एकान्तमे एसगर बिछाओनपर पड़ि रहय आ कल्पना करए-साँय जे बदलतै! देबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ। .. मानली जे ताड़ी-दारू पीबै हइ, त की भेलइ। सुनइ छिऐ जे कहाँदुन ताड़ी-दारु पीलै हइ मनसासुन तऽ ओकरा देहपर राछच्छी सबार भऽ जाइ छै, मौगीके छोड़ने ने छोड़ै छै।..धौर, केनाकऽ सकैत होतै देबलरैना बहु।..रजदेबा ला धन्न-सन! बिछाओनोपर जाएत त खाली घरेके समेस्सा। ..रङ आ लस!! .. देहो हाथ छूबैतऽ खौंझा कऽ छूटत!..
देबलरैनाके बँसुरीके आवाज सुनएलै। ..दारू पीकऽ अबै छै तऽ आङनमे बैसिकऽ बँसुरी टेरऽ लगै छै।..अहाहाहा..की राग, की तान।..सोनाबतीके तऽ लीरीबीरी कऽ दै छै। फेर दुनू परानीमे मुँहाठुट्ठी होइत-होइत पिटापिटौअल शुरू भऽ जाइत छै।..सोनाबतीके कहब छै जे मरदाबा जे कमाइ हए से तऽ दारू पानीमे उड़ा दै हए, सिनेमामे गमा दै हए आ सूतऽ लागी हरान रहै हए।..पेटमे अन्न नैआ..
“मनसा तऽ रजदेबो हइ”- सोचैए सिकिलिया- “ओकरा सूतऽ के मन नै होइ हइ?..केरबा आमसन मुँह लटकओने रहैए!” सिकिलियाके अपने हँसी लागि जाइ छै।
“दोसजी कहाँ गेलखिन”?- अरे, ई बारह बजे रातिमे सोनाबती!!..
“की हइ, हे”?- बाँसक फट्टक खोलिकऽ सिकिलिया बाहर अबैत अछि।..छौंड़ाक बाप तऽ नै एलैगऽ अस्पताल सऽ।..लैटडिपटी (नाइट ड्यूटी) हइ।..”
“बहीन की कहियो दुखके बात। आइ फेनू मनसा मारलकगऽ।“
“कइला?”
“धुर। की जान गेलिऐ कोन बढ़मकिटास हइ देहपर।..हमर तऽ जान लऽ लेलक।..अन्न-पानी जरि गेलै, जी-जाँघमे खौंत फुकने रहै छै चौबीस घंटा।– बलू, चल नऽ सूतऽ।..सुतना बेमारी धऽ लेलकैगऽ।“..सोनाबती घौलेघौले बजैत रहल। जोर-जोरसँ घोल-चाउर भेलै तँ बुढ़िया रजदेबामाइ टुघरि कऽ अङनामे आएल- गे, की भेलउ गऽ? चुप, लबरी। साँइयो बहुके बातके कहूँ एते घोलफचक्का भेलै गऽ?”
सोनाबती घेओना पसारलकि। रित्ती रित्ती कऽ फाटल, सतरह ठामसँ गिरह बान्हल अपन नूआ आ अङिया देखओलकि। घरबाली अन्न बेत्रेक मरै छै आ ओ दारु-ताड़ी पीबिकए बेमत्त भेल रहै छै। घरमे लाल बुद्दी नं दै छै। दारू पी कऽ सेजपर ओकर गत्रगत्रमे दाँत गड़ा दै छै!
“इस्स!” रजदेबाबहुके मुँहसँ अनायासे बहार भऽ गेलै। भीतर चीनीक गरम पाक जेना टघरि रहल छलै। ओ गत्रगत्र देबलरैनाक हबकबाक कल्पनामे हेरा गेलि।
“हे बहीन!..मनसा नै भोगतओ तँ ई देह लऽ कऽ की करबा।..एक दिन अँचियापर तऽ सबहक देह जरै छै!”- रजदेबा-बहु समझओलकै। रजदेबामाइ दुरदुरओलकै। ताबत डिप्टीसऽ रजदेबो घूरि अएलै। आङनमे ठहाठहि इजोरियामे चमकैत सोनाबतीक मुँह चमकैत देखलक। नयन मिललै, सोनावती विहुँसि देलकि, जेना रजनीगंधा फूल झरझरा गेलै। मोनप्राण गमैक उठलै। रजदेबा बाजल किच्छु नैं। बस पुछलकै- “की भेलौ गऽ भौजी?” सोनावती फेर सउँसे खेरहा दोहरओलकि।…
सिकिलिया चौल कएलकै- “साँय बदलबे?”
“सहे तऽ ने उपाइ हइ।..तोहर डागदरसनके साँय हउ गजै छे।..अस्पतालमे काम करै हउ। ने दारू, ने पानी। घरगिरहस्थी डेबने हउ। भरिमुँह कोनो छौंड़ी मौगी जरे बोलबो ने करइ हउ। अपन काम से काम। एहन महाभारथ पुरुख हमर भागमे कहाँ?..”
सिकिलियाकें देह जरि गेलै- हइ गोबरके चोत महाभारत कहाँदुन! मनसरभसी। अपना साँय महकै छनि आ छौंड़ाक बाप जरे केना रसिया-रसिया, सिलिया बतिआइ हए।
“बहीन, तौँ घर जा।..तोहर साँयके दोसरकेँ सम्हारि देत ओ? जे अपन साइँयो के कसमे ने रखलक, से मौगी कथिके?” आ सिकिलिया रजदेबाक बाँहि पकड़ि घरदिशि घीचय लागलि। रजदेबामाइके पित्त लहरि गेलै। सोनाबत्ती कनिकाल थरभसाएलि, फेर बाजलि-“दोस जी!..हम आइ घरे नैं जबे..फेन “निम्मन सऽ कूटत।..” ओकर आकृति कातर छलै।
“अहाँ जाउ। लोक फरेब जोड़त”।
रजदेबा समझओलकै। ओ घूरि गेलि। सभ अप्पन-अप्पन फट्टक लगा लेलक। मुदा, भोरे उठल रजदेबा जँगलझार लेऽ तँ देखलक जे देबलरैनाके बहु दरबज्जापर एकटा फेकल तरकुन्नीपर ओंघराएलि छै, घर नैं गेलउ।..कनिकाल ओ टुकुर-टुकुर ओकर मुँह तकैत रहल। केना निभेर भऽकऽ सूतलि छै, दुधपीबा पिहुआजेकाँ। नूआँ-बस्तर अस्त-व्यस्त। बिन तेलकूँड़क जट्टा पड़ल, भुल्ल भऽ गेल पैघ पैघ केश, भुँइयापर एमहर-ओमहर जौंड़ जेकाँ लेटाएल।
ओकरा देवलरैनापर बड्ड तामस भेलै। सोन-सनक सोनावती अन्न-वस्त्र बेत्रेक झाम भऽ गेलै- बीझ लागल ताम-सन। एखनो जँ नहा धो देल जाइक आ सिङार कऽ दै तऽ झकाझक भऽ जएतै। मुदा दोस तऽ दारू पीकऽ मस्त रहै छै। सलहेसक नाचमे ओकर ढोलकक गुमकीपर खतबैया टोलक कतेको छौंड़ी-मौगी ओकरापर जान दओ छै। दोसजी, खत्ता-पैन, चर-चाँचर, राहरि-कुसियारक खेत, भुसुल्ला घर, पोखरिक भीर जत्तहि पओलक, तत्तहि छौंड़ी-मौगी लऽकऽ…। राम-राम।..एहन गुनमन्तीके एना काहि कटबै हइ, दोसजी निम्मन नहि करै हइ!
बड़ समझओलकै रजबा सोनाबतीके। सोनाबती नैं गेलै। देबलरैनाके धन्न-सन। खोजैत-खोजैत एक्के बेर सुरुज जखन नीचाँ अएलै तऽ बँसुरी टेरैत आएल। सोनाबतीके भरिपाँज पकड़ि कए चुम्माचाटी लेबए लागल।– सबहक सामने! दरूपिबाके कोन लाज आ बीज। रजबामाइके हँस्सी लागि गेलै। सोनाबत्ती मनसाकेँ धकेलि देलकै, मनसा धाँय दऽ चारूनाल चित्त खसल। बिच्चे आङनमे।..चटाक!…मनसा उठिकए एक चाट देलकै। मौगी घेओना पसारलकि। मनसाकेँ धन्न-सन।..दोसजी अस्पतालमे रहै।
सिकिलियाक बेटाके “मैंगोफ्रूटी”क खाली डिब्बा कतहु सड़कपर फेकल भेटि गेल रहै। ओ ओहिमे पानि धऽधऽ पीबै छल। सिकिलियाक नजरि पड़लै-“केहन लगइ हउ?” छौंड़ा हँसि देलकै- आमके रस नहिंता!..पीबे?”
सिकिलियाक मोन भेलै- एक बेर ओहो पीबि कए देखैत। ओ बड़का-बड़का बाबू-भैया सबके पीबैत देखने रहै।..मुदा, ओइमे तऽ पतरसुट्टी फोंफी लागल रहै, एइमे कहाँ हइ?.. ओ बड़ा ललचाएल दृष्टिसँ फ्रूटीक डिब्बाकेँ देखि रहलि छलि।
“दोस्तिनी, पीयब?”-देवलरैना टुभ दऽ पूछि बैसल। दोस्तिनीक आँखिमे फ्रूटीक लालच, पतिसँ उलहन, अभावजन्य वेदना लक्काबाज देवलरैनाकेँ झक् दऽ लौकि गेलै।
“चलू दोस्तिनी, फ्रूटियो पीयब, सिनेमो देखब आ होडरोमे खाएब। घूमैत-घूमैत राति तओले च्हलि आएब”।– देवलरैना बजलै आ फेर कोन जादूके बान लगलै कहिने, सिकिलिया चट दऽ ओकर रिक्सापर बैसि गेलि। सभ मुँहे तकैत रहि गेलै। ओ जे गेलै सिकिलिया से फेर ६ महीना नैं घुरलै। सोनाबती रजबाके घरसऽ टकसऽ के नाम नैं लै। पऽर भेल, पंचैती भेल। दुनू मौगीमे सँ कोनो अपन-अपन साँय लग घुरबाक लेल तैयार नहि भेलि।
छओ मासक बाद दुनू अपन-अपन मनसा लग कनैत-कनैत घूरलि-ढाकीक ढाकी सिकाइत नेने। सिकिलिया आ सोनाबती एक दोसरक गरदनि पकड़ि झहरा देमए लागलि। सिकिलियाक घेओनाक आशय छल- देबलरैनाके मुँह महकै छै, ओ बदमास अछि, गुन्डा अछि, निसेबाज अछि, लापरवाह अछि; स्वार्थी अछि आदि-आदि। सोनावती छाती पीटिपीटि बेयान करै छलि- रजबा गुम्मा अछि, बहुसँ बेसी मायकें मानै अछि, दिनराति पाइ लेऽ खटै अछि आ सभ पाइसँ घरे चलबै अछि, बहु ले कहियो कचरी- मुरही नै अनने अछि। कहियो सिनेमा नैं जाइ अछि, बहुकें चुम्मा नैं लैत अछि..आदि…आदि…
दुनू अपन-अपन ओरिजिनल साँय लग घूरि गेलि।
मनोविज्ञानक प्रोफेसर सत्यनारायण यादव कहलैन्हि- यार, जे भेटैत छै, तकर मोल नै बुझाइ छै। जकर पति गंभीर छै ओकरा चंचल पतिक लेल मोन पनिआइ छै, जकर चंचल छै से गंभीर पतिक लेल सिहाइए..इएह क्रम छै…नो वन इज परफेक्ट..
एक दिन सिकिलिया आ सोनावती सुनू एक-एकटा कोनो मनसा संगे उरहरि गेलै- ओहो एक्के दिन। रजदेबामाइ भोरेसँ आसमान माथपर उठा लेलकि- “जुआनी कक्कर ने उमताइ हइ..फेनू बान्ह हइकि नै।..समाज आ पलिवारके बन्हन टूटि जतइ तऽ मनसा-मौगी जिनगी भरि अहिना भँड़छि-भँड़छि कए मरि जतइ…
प्रो. सत्यनारायणक व्याख्या छैन्हि-
म्यान इज पोलिग्यामस बाइ नेचर..इट इज सोसाइटी ह्विच च्यानलाइजेज सेक्स एनर्जी..सओ मुँह, सओ बात!..सबसँ बड़का सत्य जे सोनाबती, सिनकिलिया दुनू उरहरि गेल!

अमित कुमार झा, चैनपुर, सहरसा

बुढ़ी माता

अपन परिवार- माँ, बाबूजी, भाइ, बहिन) संग पटनाक शेखपुरामे रहैत रही, बाबूजी पी.डब्लू. डी. मे एस.डी.ओ. एकटा प्रसिद्ध ईमानदार अधिकारी रहथि, सभसँ पैघ भैया पी.एच.ई.डी.दुमकामे पोस्टेड रहथि। हम सेंट जेवियर्स स्कूल, गाँधी मैदानसँ बारहमा करैत रही, पढ़ाइ-लिखाइमे बहुत नीक रही, पढ़ाइ-लिखाइक अलावा कोनो काज नहि रहए, ओइ पढ़ाइ-लिखाइक कारण हम बहुत कम उम्रमे नीक पद- मैनेजर बिरला ग्रुप- पर छी, हमर किछु दोस्त रहए जे ओहि समयक पैघ राजनीतिक परिवारसँ संबंधित छलाह- एहि विषयमे बादमे कहब- आइक तिथिमे सेहो बहुत पैध स्थानपर छथि। बारहमाक संगहि राम मनोहर राय, एस.पी.वर्मा रोड, पटनासँ मेडिकल एन्ट्रेंसक तैयारी सेहो करैत रही।
मुख्य घटना मोन पड़ैत अछि जनवरी १९९५ क – कोचिंग क्लास ५.३० बजे भोरे सँ होइत रहए, हम घरसँ अन्हारे- ४.३०-४.४५ निकलैत रही। पटनामे जनवरी मासमे बहुत ठण्डी पड़ैत छैक, ओहि समयमे आर बेशी ठंडी पड़ैत रहए। ठंडा, ऊपरसँ अन्हार सुनसान रस्ता, बहुत डर सेहो लगैत रहए, लेकिन एक नया जोशमे सभ किछु बिसरि जाइत रही। ११ जनवरी १९९५ केँ कोचिंगमे ’मोड्युल टेस्ट’ रहए, ई कारण हम ४ बजे घरसँ कोचिंग निकलि पड़लहुँ- कारण ठंढाक कारण लेट नहि होए। हम जहिना पुनाइचक-हड़ताली मोड़क बीच मेन रेलवे लाइन लग पहुँचलहुँ, अचानक एक टा घोघ तनने, करिया कम्बल ओढ़ने बुढ़ी माता सामना आबि गेलि, हम तँ डरसँ साइकिलसँ खसि पड़लहुँ, देखलहुँ तँ ओ बहुत बुढ़ आरो कमर लगसँ झुकल लागल। हम उठि कऽ ठाढ़ भेलहुँ, गरदा सभ झाड़ि कऽ जहिना चलय लऽ चाहलहुँ तँ ओऽ आवाज देलक,..सुन..अ..बौवा…
डरसँ हालत खराब भऽ गेल..चारू दिससँ सनसन जेकाँ अवाज महसूस हुअ लागल। डरल-डरल ओकरा लग गेलहुँ..।
पुछलक…कतए जाऽ रहल छी!!! ताऽ तक ओऽ अपन घोघ नहि हटेने रहए।
डरसँ अबाज तँ जल्दी नहि निकलल…;लेकिन हिम्मत कऽ कए जवाब देलहुँ, कोचिंग जाइ छी।
फेर पुछलक..कथी के पढ़ाइ करैत छी..!! बातसँ अपनापन लागल।
हम कहलहुँ-डॉक्टरीक तैयारी करैत छी..
अच्छा बैस..दोसर पढ़ाइमे मोन नहि लागए छौ- निर्देश दैत-..कनी देर रुकि जो तखन जहिये।
ताऽ तक समय लगभग ४.४५ भऽ गेल रहए..एक दू टा आदमी सभ सड़कपर सेहो नजरि आबए लागल। लेट होइत रहए एहि कारण हिम्मत कए कऽ कहलहुँ…हमरा लेट भऽ रहल यऽ..हमर आइ परीक्षा अछि।
कोनो बात नहि..जवाब भेटल
बड़ असमंजसमे पड़ि गेलहुँ..की करी..नञि .करी..एक मोन होय रहए, चलैत लोककेँ अवाज दी, मुदा सड़क फेर सुनसान भऽ गेल।
तखने ओऽ अपन घोघ हटेलक..हुनकर…चेहराकेँ देखिते लगभग बेहोश भऽ गेलहुँ..बुढ़—झुर्रीदार चेहरा…ओहिपर मर्द जेकाँ…दाढ़ी…मोँछ…हे भगवान आइ-धरि एहन नञि देखने रही…हमर हाव-भावकेँ देखि ओऽ बजली…हमरा देखि कए डर लागए छौ..नञि डर। हम दोसर किओ नञि छियौ…पता नञि किए ओऽ किछु अपन जेकाँ लागए लागल…ताऽ तक लगभग ५ से ऊपर टाइम भऽ गेल…रोडपर दूध/ न्यूजपेपर बला हॉकर सभ नजरि आबए लागल…
किछु कालक बाद अवाज भेटल- आब तू जो..घुरैत काल अबिहेँ…हम हवाक भाँति/ तीर सँ बेशी तेजीसँ निकललहुँ…बहुत लेट भऽ गेल रही…साइकिलकेँ अपन क्षमतासँ बेशी तेजीसँ चलबए शुरू कए देलहुँ, जहिना गाँधी मैदान/ सब्जी बागक मुँहपर पहुँचलहुँ…देखलहुँ जे जबरदस्त एक्सीडेन्ट भेल रहए, पूरा रस्ता पुलिस ब्लॉक कऽ देने रहए- एक्सीडेंट लगभग २० मिनट पहिने भेल रहए, जाहिमे चारि टा लोक आऽ एकटा चाहक दोकानदार मारल गेल…ओऽ चारू टा हमरे इंस्टीट्यूटक छात्र रहए जे नीक चाह पीबए खातिर रुकल रहए लेकिन…!!
हमहुँ ओहि चाहबलाक दोकानपर रोज रुकैत रही- अगर बुढ़ीमाता नञि भेटितए तँ हमहुँ ओहि समयमे चाहक दोकानेपर रहितहुँ …फेर पता नञि…)- चाह पिबैक तँ आदति नहि रहए मुदा ठंढ़ाक चलते पीबि लैत रही।
कहुना इंस्टीट्यूट पहुँचलहुँ..ओहिठाम घटनाक सूचना पहुँचि गेल रहए…इंस्टीट्यूट दू दिनुका लेल बन्द कऽ देल गेल। छात्रक घरबलाकेँ सेहो सूचित कए देल गेल, हमहुँ बुझल मोनसँ घर घुरए लगलहुँ, घर घुरैत काल वैह बुढ़िया ओहीठाम भेटल…ओहिना घोघ तनने…लग जाऽ कए सभ घटना सुनेलाक बादो ओऽ कोनो जवाब नहि देलक…किछु कालक बाद कहलक…
बौआ हमरा भूख लागल यऽ!!
की खेबए!!! हम पुछलियए।
चूड़ा आऽ शक्कर..जवाब भेटल।
संयोग एहन रहए जे ताऽ तक हम सभ तरहक समान किनबाक वास्ते कोनो दोकानपर नहि गेल रही, कारण घरमे काज करए लेल बहुत आदमी रहए दोसर घरक सभसँ छोट रही। तैयो दोकानपर गेलहुँ आरो बुढ़ी-माता लऽ चूड़ा-शक्कर कीनि कए अनलहुँ।
किछु देरक बाद हम पुछलहुँ..कतए जेबही, हम पहुँचा देबौ।
“कतहु नञि”, जवाब भेटल।
“रहबीहीं कतए”, हम पुछलहुँ।
“यैह जगह” सीधा जवाब भेटल।
“खाना कतए खेबहीं”…पुछलापर जवाब भेटल- “ तूँ खुआ, बेशी बक-बक नञि कर, खाइ लेल दे फेर तू पुछिहेँ जे पूछए के छौ”- बिल्कुल रुखल जवाब सेहो भेटल। संगहि स्नेहसँ कहलक- “तूँहो खो”।
हम तँ अजीब मुश्किलमे पड़ि गेलहुँ..ओकरा अकेले छोड़ि कए जाइ के मोन सेहो नञि करैत रहए…आखिर की करी…बहुत सोचलाक बाद निर्णय लेलहुँ..जे हुअए एकरा अपना संग लऽ जाइ…रिक्शापर बुढ़िया आरो साइकिलपर हम, घर पहुँचि ओकरा गेटपर ठाढ़ कऽ बाहर ठाढ़ कऽ हम घर गेलहुँ, सभ कहानी अपन माताजीकेँ बतेलहुँ, बुढ़िया बाहरमे ठाढ़ छै, सेहो कहि देलहुँ। सभसँ पैघ समस्या जे बुढ़ियाकेँ आखिर कतए राखी…माताजी कहलखिन- नीचाँमे एकटा रूम खाली छै- ओहिमे जगह देल जाए, सभ बेबस्था-बिछोना, कम्बल, साफ साड़ी-कऽ कए ओकरा घरमे बैसेलहुँ। साँझमे बाबूजी ऑफिससँ अएलाह तँ हुनका सभ कहानी बतेलहुँ।
बाबूजी कहलन्हि-“बुढ़िया कहिया तक रहतहु”।
“नञि पता”- हम कहलहुँ।
फेर माताजी सभ सम्हारि लेलन्हि ..आरो बाबूजीकेँ समझा देलखिन। बुढ़ी-माताक सेवा करब हमर रोजक ड्यूटी भऽ गेल। कोचिंग जाइसँ पहिने आधा घण्टा, आबए के बाद १ सँ डेढ़ घण्टा हमर समय बुढ़ी माता लग बीतए लागल। खानाक अलग-अलग फरमाइश होइत, सभ किछु पूरा करैत एक सप्ताह बीतल, एक दिन अपना लग बैसा हमर बारेमे पूछए लागल- जेना अपन दादी-दादा-अग्रज- बुढ़ी माता दिससँ कहल गेल- तूँ दोसर पढ़ाइ- मेडिकल छोड़ि कऽ– कर। बहुत नाम हेतौ, खूब पैसा कमेबे, माँ-बाप तोरापर नाज करतौ, १० वा दिन रातिमे बिना किछु बतेने पता नञि कतए चलि गेलय- आइ तक नहि भेटलीह…एखन तक हम इन्तजार करए छी जे बुढ़ी माता एकदिन जरूर भेटतीह।
बुढ़ी माताक बात बिल्कुल सही भेल जखन १४-१५ घण्टा पढ़ाइ करबाक बावजूद सी.बी.एस.ई. मेडिकलमे वेटिंग आबि गेल। बी.सी.ई.ई.मे डेयरी ब्रान्च भेटल, एम.डी.ए.टी.मे १००% चान्स रहए- ९०% एक्यूरेट प्रश्न सही कएने रही- मुदा परीक्षा-केन्द्र मिल्लत कॉलेज, दरभंगा केन्सिल भऽ गेल..एहि कारणसँ हम फ्रस्ट्रेशनमे रहए लगलहुँ। पढाइ-लिखाइ बन्द कए देलहुँ…जे एतेक पढ़ाइ करए के बाद जखन सफलता नहि भेटल तँ आब कहियो नहि हएत।

फेर हमरा बुढ़ी-माताक बात याद भेल, संगहि बाबूजी सेहो कहलन्हि- अपन ट्रैक चेन्ज करू, लगभग ओही समय यू.जी.सी.सँ ३ टा नया कोर्स पटना आऽ मगध विश्वविद्यालयकेँ भेटल- बायो-टेक्नोलोजी, जल आऽ पर्यावरण प्रबंधन आऽ बी.सी.ए.। एन्ट्रेन्स परीक्षापर नामांकन प्रक्रिया शुरू भऽ गेल। बी.सी.ए. हमरा किछ ढंगक कोर्स बुझाएल, एन्ट्रेन्स देलहुँ आऽ पास कऽ गेलहुँ। यू.जी.सी. बी.सी.ए.क प्रथम बैचक पहिल छात्र हम रही जे अन्तिम परीक्षा ८९% सँ पास केलहुँ। बाबूजी कहलन्हि- आब यू.पी.एस.सी.क तैयारी करू, ढंगक सरकारी नोकरी लिअ, लेकिन हमर सोच किछु आरे रहए। “अगर अपन प्रतिभा/ क्षमताक उपयोग करबाक यऽ तऽ सरकारी नोकरी नञि करू”। फेर एम.सी.ए. केलहुँ, मोन भेल जे एम.बी.ए. कएल जाय- बहुत कठिन रहए आइ.टी.सँ एम.बी.ए. करब। मुदा बुढ़ी माताक कृपासँ एम.बी.ए. सेहो कऽ लेलहुँ। कैम्प्स सेलेक्शनमे रिलायन्सक ऑफर भेटल। जोइन केलहुँ, फेर एच.डी.एफ.सी. बैंकसँ ऑफर भेटल तँ बैंक जोइन कऽ लेलहुँ। हृदयमे इच्छा रहए जे टाटा-बिड़लामे नोकरी करबाक चाही। बुढ़ी माताक कृपासँ इच्छा पूरा भऽ गेल आऽ बिड़ला ग्रुपसँ नीक स्थानक ऑफर आबि गेल। जोइन सेहो कऽ लेलहुँ आऽ एखन तक एतहि छी..आब इच्छा यऽ दिल्ली/ मुम्बइक बहुत सेवा केलहुँ…आब अपन बिहार/ मिथिलाक सेवा कएल जाय..बुढ़ी माताक कृपासँ ओहो भऽ जेतए…लेकिन सभसँ पैघ इच्छा अछि बुढ़ी-माताक दर्शनक..पता नञि होएत कि नञि…
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
माहुर
..1..

दृ”आह! भैया आबि गेला। हाथ मे पोटरी छनि। अबस्से ओहि मे ‘मीट’, अरे! नहि माता दुर्गाक परसाद हेतनि!“
रंजना बाजलि छलीह। ओ दौड़ैत आंगन सँ बाहर एलीह। हुनका भाइजीक हाथ मे ठीके पोटरी छलनि जाहि मे ‘मीट’ रहैक। भाइजी अपन हाथक पोटरी रंजनाक हाथ मे देब’ चाहलनि। फेर, ने जानि हुनका की मोन पड़लनि जे अपन पोटरी बला हाथ क¢ँ पाछाँ घीचि लेलनि। ओ बूत बनि ठार भ’ गेला। भाइजीक ठोर मे कंपन होब’ लगलनि, आँखि सँ ढबढब नोर बह’ लगलनि आ हुनक समग्र शरीर थर-थर काँपए लगलनि।
भाइजी अर्थात आकाश सँ हुनक एकमात्रा छोट बहिन रंजना हुनका सँ बारह बर्खक छोट छलथिन जे आब पन्द्रहम मे पयर रखने छलीह। ओ सलवार-कुर्ती पहिरने छलीह। हाथ मे चूड़ीक स्थान पर घड़ी बान्हल छलनि। पुछू किएक? रंजना विधवा छलीह।
पछिला आषाढ़ मे रंजनाक विवाह कमीशन प्राप्त सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट भास्कर चैधरी सँ भेल रहनि। एक महिनाक अवकाश समाप्त भेला पर भास्कर चैधरी अपन ड्यूटी पर कश्मीर पहुँचल छला। ओतहि आतंकवादीक संग मुठभेर मे शहीद भ’ गेलाह। रंजना विधवा भ’ गेलीह।
आकाश लगक शहर दरिभंगाक एक बैंक मे कार्यरत रहथि। ओ गामहि सँ स्कूटर पर बैंक जाथि आ आबथि। अष्टमी रहैक आ बैंक दशहराक छुट्टी मे बन्द छलै। गामेक दुर्गा स्थान मे बलिप्रदान कएल छागरक भड़ाक माँउस पुजेगरीक आदेश सँ बिकाइत छलै। ओही ठाम सँ आकाश एक किलो ‘मीट’ आ की परसाद जे कहियौ कीनि क’ अनने रहथि।
सम्प्रति जे दृश्य उपस्थित भेल छलै ओहि मे आकाश हाथ मे मीटक पोटरी टंगने थरथराइत ठार रहथि। हुनका आँखि सँ दहो-बहो नोर बहि रहल छलनि। हुनक पत्नी, पांच बर्खक बेटी सुजाता, माता-पिता सभ कियो ढलानक एक कात
ठार डबडबाएल आँखिए देखैत चुपचाप आकाश दिस ताकि रहल छलथिन। रंजना ठीक आकाशक सामने छलीह। हुनक बाल सुलभ सदृश मुख-मंडल पर बड़ी टा प्रश्न चिन्ह बनि गेल छल। काजर पोतल आँखि मे रंजनाक समग्र भविष्य धह-धह धधकि रहल छल। त¢ँ नोरक एकोटा बून्न देखाइ नहि पड़ि रहल छल। परिवारक क्रंदन बीच रंजना एक अजीबे दृष्टि सँ अपन भ्राता, आकाश क¢ँ निहारि रहल छलीह।
बड़ी काल सँ अंटकल आकाशक कंठ सँ कुहरैत शब्द बाहर भेलदृ”हे भगवान! हम ई की कएल? कियक हम ‘मीट’ कीनल?“ एतबा बाजि आकाश मीट’क पोटरी क¢ँ नाला मे फेकि, दुनू हाथे माथ पकड़ि, नीचा जमीन पर बैसि हबोढेकार कान’ लगलाह।
आब रंजना क¢ँ छोड़ि परिवारक सामूहिक क्रंदन सँ स्थान पीड़ादायक बनि गेल। मात्रा रंजना अविचल ठार रहलीह आ शून्य नजरि सँ सभ किछु देखैत रहलीह।
हम कोन तरहक खिस्सा सुनाब लगलहुँ। इहो कोनो खिस्सा भेलै? रंजनाक विवाह लड़ाइक सिपाही संग भेल छलनि। ताहू मे एहन सिपाही सँ जनिक नियुक्ति कश्मीर मे आतंकवादी सँ भिड़न्त मे भेल होअय। तखन त’ प्राण जायब करीब-करीब निश्चिते छलै। त¢ँ रंजना विधवा बनलीह। अहि मे अजगुत बला कोनो बात नहि भेलै। दुखक बात जँ रहै त’ एतबेटा जे जाहि जाति मे रंजनाक जन्म भेल रहनि ओहि जाति मे पुनर्विवाहक नियम नहि रहैक। ओहि जातिमे आ सनातन सँ आयल परम्परा मे विधवाक निदान हेतु कोनो टा व्यवस्था नहि रहैक। रंजना विधवा भेलीह त’ भेलीह। पूर्वजन्मक पाप ओ नहि भोगती त’ के भोगत? त¢ँ ई मात्रा ओहने आ ओतबेटा बात भेल जेना मनता मानल कोनो पाठीक बलि पड़ल होअय। आब अहाँ कहबै जे ई कोन तरहक मिलान भैलै? नहि अरघै अछि, त’ सुनू।
मनता मानल पाठी-छागरक बलि पड़ै काल बलि देनिहार, कबुला केनिहार एवं बाँकी सभटा तमाशा देखनिहार एतबे ने सोचैत छथि यौ जे हरदि, मिरचाइ आ मसल्ला मे भूजल एकर माँउस मे कतेक सुआद हेतै? तहिना विधवा भेलि रंजना द’ सभ सोच’ लागल छथि जे ई आब सासुर त’ जेतीह नहि, गामहि मे रहतीह। गाम मे सभहक टहल-टिकोरा करतीह, अदौरी-कुम्हरौरी खोंटतीह, अँगने मे भानस-भात करतीह, एकरा-ओकरा संग तीर्थाटन जेबा काल भनसिया बनि क’ जेतीह आ छौंड़ा सँ लगाति बूढ़बा तकक करेजक तपन मेटौती। त¢ँ बरसामबाली काकी कहने रहथिन यौ, भगवान सभहक सभटा इन्तजाम बैसले-बैसल ‘क’ दैत छथिन। दूर जो, मनसा सभहक लप-लप करैत जिह्वा आ आँखिक खोराकक पूर्ति सदिकाल सँ बाल-विधवे सँ पूर्ति होइत रहलै अछि। ई कोनो नुकायल गप्प छैक?
आब अहीं कहू जे मनता मानल पाठी आ विधवा भेलि रंजना मे की फर्क? कोनो तरहक शिकायत करब सेहो युक्ति संगत नहि होयत। त¢ँ आब नीक होयत जे अहि खिस्सा क¢ँ अही ठाम विराम द’ क’ ओही गाम मे ओही दिन घटल दोसर घटनाक जानकारी प्राप्त करी।
गामक नाम भेल पानापुर। पानापुर मे सभ जाति, समुदाय एवं सम्प्रदायक लोकक निवास। गाम आर्थिक रूपे सम्पन्न। ओहि गाम मे छल एकटा दुर्गा मंदिर, जे दस-बीस कोस दूर तक प्रसिद्ध छल। पैघ पोखरिक पूबरिया भीड़ पर तीन-चारि बीघा मे पसरल मंदिर आ मंदिरक परिसर। मंदिर मे दुर्गाक भव्य प्रतिमा। तकरबाद मंडप, पुजारीजीक आवास आ सदिकाल खल-खल हँसैत, स्वच्छ, विशाल समतल भूमि। दशहराक समय मे अही स्थान पर मेला, नौटंकी, नाच-गान आदि आयोजित होइत छल।
दुर्गा मंदिरक पुजारी छलाह काली कान्त ओझा। दुब्बर-पातर, साँची धोती, खोंसल ढेका, छाती पर उगल पंक्तिबद्ध हड्डीक उपर दू भत्ता फहराइत जनउ, गौ-खूँर बरोबरि टीक, पयर मे खराम आ ललाट पर सेनुरक ठोप। पुजारीजी सज्जन आ मृदुभाषी छलाह। वैष्णव त’ओ छलाहे आ सप्ताह मे अधिक दिन उपासे मे रहैत छलाह। मुदा हुनक पत्नी अढ़ाइ मोनक पट्टा छलथिन। थुलथुल देह, खुजल कारी केश, नाक सँ मांग तक पतिव्रताक निशानी स्वरूप सेनुरक डरीर, पान-जर्दा दुआरे कारी भेल दाँत आ बीड़ी त’ ओ नैहरे सँ पिबैत आयल रहथि। जँ जुमनि त’ नित्य माँउस-माँछ चाहबे करी। दू अगहनी जोड़ दू रब्बी गुण दू बरोबरि मंदिरक बर्ख भरिक अन्न-टाकाक आमदनी पर हुनक पूर्ण एकाधिकार छलनि।
पुजारीजी पत्नीक सोझा मे आब’ मे कँपैत छलाह। शारीरिक दुर्बलता अथवा धार्मिक अजीर्णता, कारण जे हौउ, पुजारी जी सदिकाल पत्नी सँ डेरायल रहैत छलाह। तखन पुजारीजी के संतान स्वरूप पुत्राक प्राप्ति भेलनि कोना? ई रहस्यक विषय अवस्से छल। मुदा अहि रहस्यक छेदन नीति शास्त्रा ज्ञाता कइएक बेर क’ चुकल छथि। हुनका लोकनिक अनुसारे पति-पत्नीक ग्रह-नक्षत्रा कतबो उल्टा-पुल्टा किएक ने हौउक, प्रचुरता एवं परिपक्कता बेला मे कखनहुँ काल अर्द्ध-विराम पूर्ण विराम भैए जाइत छैक। पुजारीजीक पुत्राक नाम रहनि यदुनाथ ओझा। पैघ भेला पर यदुनाथक उपनयन भेलनि आ बर्ख भरिक भीतरे विवाह सेहो भ’गेलनि।
यदुनाथक पत्नी अर्थात पुजारीजीक पुतहु जखन दुरागमन भेला पर सासुर अयलीह त’ हुनक अनुपम सौन्दर्यक दुआरे सम्पूर्ण पानापुर गाम महमही सँ गमकि उठल। यदुनाथ त’ अपन बापक कार्बन काॅपी छलाह। मुदा हुनक पत्नी जनिक नाम छल कामिनी, तनिका जे देखलक सैह विभोर होइत बाजल छलदृ”माइ गे माइ! एतेक रूप पुजारी जीक सन्दुक-पेटार मे झाँपल कोना रहतैक? कोनो अनहोनी ने भ’ जाइक?“
अष्टमीक निस्तब्ध राति। पानापुर गामक सभटा मनुक्ख भरि दिन नाच तमासा देखलक, इच्छा भरि नशा केलक आ भरि पेट माँउस-भात खाए थाकि क’ झुरझमान भ’ सुति रहल। मुदा चोर-उचक्का, अत्याचारी एवं व्यभिचारी किस्मक लोक क¢ँ राति मे निन्न होइते ने छैक। ओहन लोक रातिए मे अपन इच्छा-पूर्तिक जोगार करैत अछि। ओहने राक्षस प्रवृतिक श्रेणी मे छल बिदेसरा कुएक। गाम मे एकटा अस्पताल अवस्से छलै। मुदा डाक्टर महिना, दू महिना मे कहिओ काल अबैत छलाह। गामक स्वास्थ्य विभाग कुएकक जिम्मा छल। ओना सड़क-छाप बहुतो कुएक छल। मुदा बिदेसरा कुएक सभ सँ तेज-तर्रार मानल जाइत छल। ज्वर-धाह राति-विराति कखनो-ककरो भ’ सकैत छलै। ताहि कालक भगवान छल बिदेसरा कुएक। ककरा मे एतेक साहस रहै जे बिदेसरा कुएक सँ तकरार करितय। नाड़ी देखै लेल अथवा सूइया भोंकै लेल बिदेसरा कुएक ककरहु आंगन मे कखनहुँ प्रवेश क’ जाइत छल। ओकरा कोनो रोक-टोक नहि रहैक।
जहिया सँ यदुनाथ दुरागमन करा क’ अयलाह आ सुन्दर कनिआँक कारणें गाम भरिक छौंड़ा सभहक बीच इर्खाक मूर्ति बनलाह तहिया सँ बिदेसरा कुएक हुनका मे अधिक काल सटले रहैत छल। चाह-नास्ताक संग चोटगर-मिठगर गप-सप कहि बिदेसरा कुएक यदुनाथक मोन क¢ँ मोहैत रहल आ अन्ततः हुनकर अभिन्न मित्रा बनि गेल। एहना मे जिगरी यार बिदेसरा कुएकक फर्माइस यदुनाथ पूर्ति कोना नहि करितथि? ओही अष्टमीक राति बुझू निशा पूजा निमित्ते, दुनू यार बैसल रहथि। स्थान छल यदुनाथक शयन-कक्ष। पुजारीजीक आवास मे पहिने छल कनेटा खुजल दरबज्जा। तकरबादक कोठली मे पुजारीजी पत्नीक संग रात्रि विश्राम करैत छलाह। तकर सटले भंडार आ भनसाघर। सभ सँ अन्त मे जे कोठली छल सैह भेल यदुनाथक शयन-कक्ष। दुरगमनिआँ पलंगक एक कात टेबुल आ कुर्सी। देवाल पर सिनेमाक अभिनेत्राीक नयनाभिराम फोटोक बीच भगवतीक फोटो। खिड़की-केबाड़ पर्दा सँ झाँपल।
दू गोट कुर्सी पर यदुनाथ आ बिदेसरा कुएक आमने-सामने बैसल छल। बीचक टेबुल पर एकटा फूलदार विदेशी शराबक खुजल बोतल, पानि सँ भरल जग आ दू गोट शीशाक गिलास राखल रहैक। ताही काल यदुनाथक कनिआँ कामिनी छिपली मे भुजल माँउस टेबुल पर रखलनि आ पतिक अगिला आदेशक प्रतीक्षा मे एक कात ठार भ’ गेलीह। हुनक गोरकी बाँहि मे सटल करिका ब्लाॅउज ककरो एक बेर आरो देखीक’ लोभ मे पटकि सकैत छल। बिदेसरा कुएक अपन नजरिक नोक क¢ँ कामिनीक उठल ब्लाॅउज मे भोंकैत बाजलदृ”यार, एतय सभ ठर्रा पिबैत अछि। मुदा अहाँ लेल हम दरिभंगा सँ सय टाका मे असली अस्सी प्रतिशत प्रूफ अल्कोहलबला ‘जीन’ मंगौलहुँ अछि। आब बिलम्ब नहि क’ एकरा टेस्ट करियौ।“
दू टा गिलास मे शराब ढारल गेल, पानि मिलाओल गेल, गिलास टकराओल गेल आ तखन दुनू यार पिअब शुरू केलनि। माँउस निघंटि गेल। कोनो बात ने, कामिनी छिपली भरी भूजल माँउस फेर सँ अनलनि।
यदुनाथ पहिले पैग मे डोलि गेल छलाह। शराब पचेबाक ने हुनका काया रहनि आ ने प्राइटिस। दोसर पैग समाप्त करैत-करैत यदुनाथक आँखिक डिम्हा सँ टर्चक फोक्सिंग बाहर होब’ लगलनि। तेसर पेगक आरम्भे मे कामिनी फेर सँ भूजल माँउस आन’ चलि गेल रहथि। जाबे ओ घूमि क’ एलीह ताबे हुनक नाथ पलंग पर चित बेहोश पड़ल रहथिन आ हुनकर थुथून सँ सा¢ँ-सौंक अबाज प्रसारित भ’ रहल छल।
कामिनीक हाथ मे तेसर खेपबला भूजल माँउसक छिपली छलनि। ओ थकमकाइत ठार भ’ गेलीह आ पलंग पर पड़ल अपन स्वामी क¢ँ टकटक देख’ लगलीह। किछु समय लेल कामिनीक मस्तिष्कक सोचक यंत्रा मे ब्रेक लागि गेलनि।
बेगूसराय सँ खगड़िया जेबाक ‘हाइ वे’क दक्षिण गंगाक तटपर बसल छल पिहुआ नामक गाँव। ओही गामक मंदिरक पुजारीक कन्या छलीह कामिनी। गंगाजल सँ घोअल मंदिरक पवित्रा परिसर मे कामिनीक जन्म आ पालन-पोषण भेल रहनि। सासु-ससुरक सेवा एवं पतिक आदेशक पालन करबाक बीज मंत्रा ल’क’ कामिनी सासुर आयल रहथि। मुदा सासुरक वातावरण किछु अलगे तरहक रहैक। सासुक बीड़ी पिअल मुँहक गंध सँ कामिनी क¢ँ मितली होब’ लागनि, असरधा होनि। मुदा ओ अपना क¢ँ रोकथि आ बुझबथिदृकोनो बात नहि। नव स्थान मे एना प्रायः होइते छै। सभटा अपने आप ठीक भ’ जेतै! केवल धैर्यक निर्वाह चाही। यद्यपि ई बात हुनका कियो सिखौने नहि छलनि। मुदा आन-आन नव विआहलि कन्या जकाँ एकर विश्वास हुनकर संस्कार मे पहिने सँ छलनि जे पति हुनकर रक्षक छथि, परमेश्वर छथि। तखन चिंता कथिक? मुदा एखन त’ हुनकर रक्षक, परमेश्वर बेसुध भेल पड़ल छथि। एखुनका बयस तक कामिनी क¢ँ नीक-बेजायक कोनो टा ज्ञान नहि भेल छलनि। त¢ँ कामिनीक लेल एखुनका परिस्थिति अप्रत्याशित आ ओझरायल सन छल। ओ काठ बनलि ठार रहि गेलीह।
१. श्याकमसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि
श्या.मसुन्दर शशि

विचार
मिथिलाक तवाही,सरकारी षडयन्त्रश त ने अछि ??
संविधानसभाक निर्वाचन पश्या ष त् मधेस चैनक स्‍ाांस लेत ,मिथिला आरामसँ अपन विकास आ कला—संस्कृनतिक संरक्षण सम्बनर्द्धनमे जूटि जाएत,तेहन विश्वातस राजनितिक वृत्तमे ब्यााप्तल छल । राजनितिक विश्लेनषकसभके कहब छलनि जे अधिकार वास्तेज मधेसभरि उठल पसाही निर्वाचन पश्यान त् संसदमे धुधुआएत आ सडक शान्ता भ जाएत । सशस्त्रध समूहक बन्दुमक सेहो सहज निकास पाओत । मुदा से धरि भेल नहि । मधेसक अन्याान्य भाग थोर बहुत शान्तोम भेल मुदा मिथिलाक अवस्थाक बद्सँ बद्त्तर होईत गेल । खासकऽ मिथिलाक सीमामे पडएवला धनुषा,महोत्तरी,सर्लाही,सिरहा आ सप्तअरीक अवस्थाँ त बेहाल भ गेल । तथ्यांिक दिस दृष्टिउगत करी त विगत तीन महिनामे एहि क्षेत्रमे लगभग एक सय सर्वसाधारणकेँ हत्याव भेल अछि । अपहरण,लूट,चोरी,डकैती आ मारि पिटक त लेखा जोखा करब मुस्की‍ल । सडकसँ संसदधरि पहुचिनिहार मधेसी जनअधिकार फोरमकेँ नेतालोकनि उपराष्ट्र पति, उपप्रधानमन्त्रीी,मन्त्रीद आ कि—कहाँदनके पाछाँ पडि, सडककेँ भावना बिसरि गेलाह अछि । किछुकेँ पाछाँ नहि पडवाक नाटक कएनिहार तराई मधेस लोकतान्त्रि क पार्टी, काँग्रेसकेँ नव संस्कलरण जकाँ प्रतीत भ रहल अछि । जेकरा अशान्तर होएवाक चाहैत छल से अर्थात संसद, शान्तन अछि । सडककेँ शान्तिकपूर्ण आन्दोपलनकारीसभ एखनो संसददिसि आशाक नजरिसँ ताहि रहलाह अछि जे कखन हमरालोकनिकेँ अधिकार भेंटत ? अपन सहनशीलताके उत्क र्षधरि आम मधेसी आ मैथिल अपन नेता आ संविधान सभासदसभक शुभसंकेतक प्रतिक्षा करबाक प्रण जकाँ कएने अछि । सम्भसवत ः तें सडक शान्तम अछि । मुदा ई खामोसी विहायडिक संकेत सेहो भ सकैत अछि । तेँ मधेसी दल,सशस्त्रे समूह आ सरकार विहाडिक संकेत समयमे अकानथि त वेस । अन्येथा आब उठएवला पसाहि जूटक नहि फूटक हएत ।
साढे तीन करोड जनताक ६सय सभासद्, साढे छ महिनाधरि राजकोषक दानापानी चैनसँ हजम करैत रहलाह,मन्त्री —जन्त्रीस आ कि—कहाँदन बनवाक जोगाडमे लागल रहलाह । आब हुनकासभकेँ आँखि खुजलनि अछि जे—बापऱ़़ेसंविधान कहिया लिखब ? हमरालोकनि त संविधान लिखवा वास्तेल पठाओल गेल छलहुँ । आ आब बनल अछि विभिन्नप समितीसभ । जे से, पुजारीके जेना देरीसँ मोन पडलनि जे हम पुरुष छी तहिना हमरासभक सभासद्लोकनिकेँ देरिएसँ सहि मोन त पडलनि जे हमरालोकनि संविधान सभासद् छी,सांसद नहि ।
हमरालोकनि बात कऽ रहल छलौं ,मिथिलामे व्या प्तज अशान्तिभक विषयमे । जेनाकि पूर्वमे अनुमान लगाओल जा रहल छल जे संविधानसभाक निर्वाचन पश्यामिथित् मधेस शान्तश भऽजाएत आ संसद अशान्ति होएत । से भेल नहि । राजनितिक शास्त्र क सिद्धान्तयकेँ औठा देखबैत मधेसक सशस्त्र समूहसभक सकृयता आओर बढि गेल । मिथिला भरि हत्याश,हिंसा,लूट,अपहरण,चन्दास असुलीलगायतके घटनामे अपेक्षाकृत बृद्धिए भेल । सरकारद्वारा वार्ताक आह्वानक बाबजुदो हत्यात हिंसाक घटनामे कमि नहि आवि रहल अछि । आम नागरिक मात्र नहि राजनितीक विष्लेकशक लोकनि सेहो खोजी क रहलाह अछि जे आखिर एकर पाछाँ की कारण भ सकैछ ? राजनितिज्ञलोकनि सेहो छगुन्ताल मे छथि । दोसर दिस आम नागरिककेँ मोनमे एक गोट प्रश्नस उठि रहल छैक जे निर्वाचनकेँ क्रममे चुपचाप बैसल मधेसक सशस्त्र समूहसभ,फेरसँ किया आ कोना सकृय भ उठल ? संगहि किछु शंका उपशंकाक जन्मा सेहो भेल अछि ।
एक गोट सहज सवाल जे सभकेँ झकझोडि रहल अछि ओ ई जे—कि माओवादी नेतृत्व क वर्तमान सरकार नितिगत रुपसँ मधेसकेँ अशान्तझ राखए चाहैत अछि, मधेसक अशान्तिउक फायदा उठा पुनः औपनिवेसिक शासन त ने करए चाहैत अछि ??यदि से नहि त मधेसमे व्या—प्तध हिंसाके किए नहि रोकल जा रहल अछि । मधेस आन्दोएलनकेँ क्रममे कएल गेल समझौताक कार्यान्व—यन किए नहि कएल गेल ? फेरसँ मधेसी जनताकेँ ठकबालेल ? एक दिस सशस्त्रल समूहसंग वार्ताक नाटक करब आ दोसर दिस कार्यकर्ताकेँ हत्या करब ,कराएव । एहना स्थिेतीमे वार्ताक वातावरण केाना बनत ?
दोसर दिस मधेसक सशस्त्रा समूहक ताजा गतिविधी सेहो प्रश्नरक घेरामे अछि । की मधेसमे उत्पाधत मचा रहल दू दर्जनसँ अधिक समूह मधेसेक वास्ते काज क रहल अछि ? यदि ई समूहसभ मधेसक वास्तेे काज क रहल अछि तँ संविधानसभाक निर्वाचनकेँ बेरमे कत्त छल ?ओ समूहसभक मांग की अछि ?सैन्ये संरचना केहन छैक ?आ ओ समूहसभ कोन ठाम सरकारसंग लडाई कएलक अछि ? आ सभसँ महत्वापूर्ण जे मधेसक वास्तेउ संघर्षरत्त ओ समूहसभ मधेसमे चोरी,डकैती,हत्या ,हिंसा,अपहरण क रहल आपराधिक समूहसंग केहन व्याआवहार क रहल अछि । मधेसक मसिहा कहएवला एहि समूहसभक काज मधेसके सुरक्षा देब सेहो होएवाक चाही ने ?
एहि तरहे देखल जाय तँ मधेसप्रति वर्तमान सरकार आ मधेसक नामपर सशस्त्रह संघर्ष करएवला समूह, दुनूक दृष्टिहकोण नकारात्म्क छैक । दुनू मिलीक मधेस आ मधेसीकेँ शोषण,दोहन आ तवाह करवाक काज क रहल अछि । मधेसक नामपर सशस्त्रर संघर्ष करएवला किछु समूह सर्वसाधारण व्यरक्तिआकेँ अपहरण करैत अछि,फिरौती लैत अछि आ पुलिससंगे आधा आधा भाग बण्डाक लगवैत अछि । सशस्त्र् समूहसभ पहिने हथियार खरीद करबाक नामपर चन्दास असुली अभियान चलबैत छल । आब त ईहो कहल जाईत छैक जे —हमरा कार्यकर्ताके पुलिस पकडने अछि ,ओकरा छोडएवाक वास्तेल चन्दाक चाही ।
धनुषाक महेन्द्र नगरमे एक गोट घटना हालहि घटल अछि—अपहरणकारीके पकडल जएवाक मांग सहित उमाप्रेमपुर आ किसाननगरके ग्रामीणसभ महेन्द्रलनगर ईलाका प्रहरी कार्यालय घेराउ कएने छल । स्थिउती बेसम्हामर भेलाक बाद पुलिसके गोली चलावए पडलैक आ एहि क्रममे संजय कुमार साहनामक एक युवक घायल सेहो भेल ।
एहि तरहे यदि पुलिस अपहरणकारीके संरक्षण दैत छैक त अपराध कोना नियन्त्र ण हेाएत ? जनकपुरमे एक सरकारी कर्मचारीके हत्याणक बाद सरकार मिथिलाक एहि पाच जिल्ला्मे विशेष सुरक्षा रणनिती बनौलक अछि । एहि सरकारी रणनितिससँ अपराध घटओ वा नहि मुदा मिथिलाक जनता आओर तवाह हएत से धरि पक्काक अछि ।
सन्द र्भ ःराम—जानकी विवाह महोत्साव
दुलहा बनल श्रीराम हे ऽऽऽ़़़़
अगहन शुक्लश पञ्चऽमी । दुनिया भरिक हिन्दुससभक वास्तेत प्रतिक्षाक दिन । कारण एहि शुभ तिथीमे मार्यादापुरुषेात्तम श्रीराम आ आदर्श नारी सीताक विवाह भेल रहनि । जाहि तिथीक एतेक बिकलतासू प्रतिक्षा कएल जाईत हो,ओ स्था़न कतेक पवित्र होएत ?कल्पहना कएल जा सकैत अछि । स्वातभावत ः राम—जानकीक विवाह भेल धरतीकेू स्प र्श कऽ लोक धन्यत धन्य होवए चाहैत छथि । सोचियौं जे जनकपुरवासी कतेक भाग्यवमानी छथि,जनिकर जन्मस एहि पावन धरतीपर भेल छनि ।
ओ पावन धरती आ एहि धरतीक प्रतिपालकसभ एहि सप्ता ह अपन प्रिय सीता आ पूज्यथ श्रीरामक विवाह धूमधामसू कएलनि अछि । एक सप्तापह धरि चलल एहि विवाह महोत्सयवमे ने मात्र जनकपुर आ मिथिलावासी अपितु भूगोलक कोना कोनाक हिन्दुतसभ अपन अराध्यह देवक विवाहमे सहभागी भेलाह । मिथिलामे सीताके बेटी आ बहिनक रुपमे मान—सम्मापन कएल जाईत छनि । स्वाहभावत ःदुलहा रामके जयाय आ बहिनोक रुपमे । ईतर मिथिलावासीके आश्चार्य लागि सकैत छनि जे जहन श्रीरामके डोला(प्रतिमा) विवाह वास्तेर जानकी मन्दियर प्रवेश करैत अछि त मैथिलानी गितिगाईनसभ हुनका गाडी पढैत छनि आ पुछैत छनि—
रामजीसू पुछय मिथिलाक नारी
बतावऽ बबुवा एक गोर ,एक कारी
बतावऽ बबुवाऽऽऽ़़़़़
अर्थात हे राम । जवाफ दिय,एक भाय गोर(लक्ष्मतण)आ एक भाय कारी(राम) कोना भेलौं । यदि एके गोट पिताक दुनू पुत्र छी त एके रंगक होएवाक चाही ने ??? मैथिलानीसभक पुछवाक तात्प र्य छनि जे अहाूक दूगोट पिता त ने छथि ?राम सीताक विवाह एहन विलक्षण आ मनोरम वातावरणमे होईत अछि ।
राम जानकी विवाह महोत्सतवके प्रशंगमे जानकी मन्दिारके महन्थ। रामतपेश्वबर दास वैष्णगव सीताक पिता अर्थात जनकके रुपमे प्रस्तूतत भेल करैत छथि आ राम मन्दि‍रके महन्थव राम गिरी रामक पिता अर्थात दशरथके रुपमे । सात दिवसीय एहि विवाह महोत्सिवमे धनुष यज्ञ,तिलक,मटकोर,सेनुरदान आ मर्यादी भोज(राम कलेवा)सेहो होईत अछि । दुलहा पक्षीय श्रीराम युवा कमिटीक युवा—युवती एवं सरकारी कार्यालयके प्रमुखलोकनि बरियातीक रुपमे सहभागी भऽ ढोल पिपही एवं अंग्रेजी वाजाक धूनपर डिस्कोस सेहो कएलनि । जनकपुर नगर पालिकाक पदाधिकारी आ नागरिक समाजक अगुवालोकनि सरियातिक रुपमे बरियातिसभके स्वासगत कएलनि । हूसी मजाक आ रंग अविरक मर्दन त मिथिलाक वैवाहिक विधिक अभिन्न अंङ्गे अछि । सेहो भेल । माने सीता दाईके विवाहमे ओ सभ किछु भेल जे हम अहाू अपन बेटी,बहिन वा भतिजीक विवाहमे करैत छी ।
मिथिलाक वैवाहिक रितिरिवाजके सभसू आह्लादक पक्ष अछि, एहिमे गाओल जाएवला गीत । साूच कही त मैथिलके विवाहमे पोती पतरा लऽ उपस्थि्त पुरोहितोसू बेसी महत्वओपूर्ण होईत छथि,गितगाईन दाई—माईलोकनि । आ जहन राम सीताक विवाह भऽ रहल होईत अछि त मैथिलानीलोकनि बड आवेशसू गाओल करैत छथि—
मिथिलाक धिया सिया
जगत जननि भेलि
दुलहा बनल श्रीराम हेऽऽऽ
अंकुर काशीनाथ झा, गाम — कोइलख, मिथिलांचल

नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि॥

विगत किछु दिन सऽ नेता के प्रति लोकक सोच बदैल गेल अछि। नेता सबहक जे छवि सामने ऐल अछि ओ लोक के प्रभावित कम केलक। एहि मे नकारात्मक संदेश बेसी अछि। जिनका लोक सब एक दिन समाज के मार्गदर्शित करबाक लेल आगू आनई छैथ। एकटा पहचानक संग ठाढ़ करई छैथ। आई हुनका वैह लोकसब गरिया रहल छथिन।
आब प्रश्न उठैत अछि जे एकटा जिम्मेवार आ पथ प्रदर्शक व्यक्ति के प्रति लोकक मोन में नकारात्मक सोच कियैक घूसि गेलैन अछि ? दरअसल एकाएक ऐना नहि भेल अछि। बल्कि पछिला किछु साल में नेता सबहक हावभाव, विचार, स्वभाव आ काज करबाक नीति में ऐल परिवर्तनक ई दुष्परिणाम अछि। एकरा लेल नेता स्वयं हद तक जिम्मेवार छथि। ओ सब नेता शब्दक परिभाषा के बदैल कऽ राखि देलैन अछि। ओ सब राजनीति के मात्र एटा व्यवसाय बुझऽ लगला अछि। ओ सब चुनाव के एकटा व्यवसायिक परीक्षा जंका प्रयोग करैत छैथ। समय के संग परीक्षा में भीड़ बढ़ि गेल अछि। तांहि भीड़ सऽ आगू निकलबाक लेल आ खबरि मे रहबाक लेल मजबूर भऽ कऽ नेता जी सब विकासक काज छोड़ि फालतू आ तर्कविहीन बयान दैत रहैत छैथ। हुनका सब के एहि गप सऽ कोनो मतलब नहि छैन जे हुनकर वक्तव्यक असरि कते दूरगामी आ घातक भऽ सकैत अछि। ई घटना ककरो सऽ नुकैल नहि अछि, जे राज ठाकरे एकटा चुनावी परीक्षा में फेल भेला के बाद अपन मुखारबिन्दू सऽ एहेन शिगुफा छोड़लैन जे महारष्ट्र के हालात बदैल गेल। गैर जिम्मवारपूर्ण बयानवाजी केला पर कोनो तरहक सख्त सजै नहि भेटबाक कारण नेताजी सबहक हौसला आरो बढ़ि जैत छैन। यैह कारण अछि जे देशक केन्द्रीय मंत्रीजी सब आतंकी घटना में लिप्त संगठन सिमी पर सअ प्रतिबंध हटेबाक वकालत करैत छैथ। हुनकर सबहक निर्लज्जता तऽ तखन आर हद फानि जैत अछि जखन अमर सिंह आ अंतुले साहब एक टा शहीदक शहादत पर प्रश्नचिह्न लगा दैत छैथ। एहिना एक बेर तऽ एहेन लागल जे केरल के मुख्यमंत्री जी सठिया गेला अछि। मुख्यमंत्री जी एकटा शहीदक परिवार के गारि दई सऽ परहेज नहि केलनि। एकर सबहक ऐके टा कारण छै। वोट इकट्ठा कऽ चुनावी परीक्षा में पास भेनाई। ई सब कऽ कऽ जखन नेताजी सब चुनावी परीक्षा पास करैत छैथ तऽ ओकर बाद हुनकर सबहक एक टा मात्र लक्ष्य रहैत छैन। कोनो तरहे बेसी सअ बेसी रूपया कमेनाई। जखन गप पैसा के आगू पाछू घूमअ लागैत अछि तखने एहि तरहक खेला होयत अछि।
ऐना में सार्वजनिक तौर पर एकटा सवाल उठैत अछि जे एहि स्थिति में आम लोक की करैथ। जे सब किछु देखई आ सहै लेल मजबूर छैथ। मुंबई में भेल आतंकी हमला के बाद अचानक हुनकर सबह ओ तामस जे सालो सअ मोन में दबल छलैन, बारह निकैल गेलैन। किछु गोटे मीडिया के सामने आबि कऽ अपन तामस निकालला तऽ किछु गोटे एकबद्ध भऽ किछु कालक लेल सड़क पर उतरला। एहि सअ बेसी कओ की सकैत छलाह। लोक लाचार छैथ। विवस छैथ। कियैकि विकल्पहीन छथि। हुनका ककरो नै ककरो तऽ नेता बनेबाक छैन्हे। लोकतांत्रिक ढ़ांचा एहेन छैक, जई में नेता जरूरी छई। आ ओ नेता आम जनता द्वारा चुनेवाक छई। बेसी सऽ बेसी आम जनता एक के बदैल कऽ दोसर के चुनि सकैत छथि। मुदा रहता ओहो नेता। मात्र शरीर बदलैत छैक। शरीर बदलला सऽ कृत्य मे कोनो बेसी बदलाव नहि होयत छैक। किछु बदलाव के जॉ उम्मीद कैल जैत अछि तऽ जरूरी नहि अछि जे ओ बदलाव सकारात्मके हुवै। नेता केनो विशेष व्यक्ति नहि होयत छैक। बल्कि ई नाम अछि ओ विशेष वर्ग के, जकर अलग धर्म होयत छैक। अलग इमान होयत छैक। आ अलग पहचान होयत छैक।
एकरा लेल एकटा गप अकाटय अछि, आ ओ अछि जे एहि विशेष वर्ग के भ्रष्टता आ विवेकहिनता के हद तक पहुंचाबई में हमर, अहां के आ हमरा सब के कनी कनी योग्दान अछि। कियैकि जान अनजान मे जॉ कियौ एहि सऽ कनी अलग हटि कऽ काज करैयो चाहैत छैथ तऽ हुनका सहजतापूर्वक स्वीकार नहि कैल जैत छैन। ओहि समय लोकक मोन में परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आ पार्टीवाद एहेन किटाणु घोसिंया जैत छैन जे तत्काल हुनका पथ विचलित कऽ दैत छैन। आ एकरे परिणाम दूरगामी आ घातक होएत अछि। फलस्वरूप बाद मे हम सब पछतैत रहैत छी। जे आई सबहक समने अछि।
१. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्तर हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्द्र लाल
३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत’ आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा
दू पत्र
_________अयोध्यानाथ चौधरी
अन्तत; आइ हम दिनेशकेँ पत्र लिखवाक लेल उद्यत भेलहुँ अछि । कागत-कलम सब दुरुस्त १९६९, माने ठीक ३६ वर्षक बाद । एतेक नम्हर अन्तराल ! की बूझत ओ ? खीझ होइत अछि हमरा जे जीवनमे एंकटा उत्साही पत्र लेखक किएक नहि वनि सकलहुँ हम ? एकटा सफल दायित्व किएक नहि निभा सकलहुँ हम ? जकरा हम पत्र लिखाक हेतु उद्यत भेलहुँ ओ हो त कहियो लिखवाक वात सेचि सकैत छल । खैर शरुआत हमरेसँ रहओ । ओकरा हेतु हमर पत्र एकटा अप्रत्याशित घटना सावित हेतैक – ’अ सरप्राइज’ आ, जौं ओ जीवित नहि हो ………… ? बहुत नम्हर अत्नराल भेलैक ने ! पत्र फिर्ता आबि सकैत अछि ………….ओहि पर “डेड’ जा मृत कानो संकेत रहि सकैत छैक । एतेक निराशाजनक वात नहि सोचवाक चाही । ओहना स्थितिमे पोस्टमैन पत्र फारि-फेकिकऽ अपन मथ-दुक्खी सँ मृक्त भऽगेल रहत ।
ई समय पत्र लिखवाक अनुकूल +{बहुत अनुकूल वुझा रहल अछि । दशमीमे सब गाम अबैए- ओकरो जरुर गाम आवक चाही । तावत ओकर पत्नी, बेटा वा वेटी केओ ने के ओ पत्र सहेजिकऽराखि देने रहतैक । जाइ जमानामे हम सव – ’ग्रैजुएशन’ केने रही, ओइ हिसाव सँ ओ जरुर कोनो नोकरी मे हैत किएक त’ नीक विद्यार्थी रहय । पता नहि – पटना वोकारो, टाटा, दिल्ली कतऽ अइ….. आकि सुदुर दक्षिण केरला, मद्रास-नहि जानि कतऽ ?/
चारि वर्ष संगे अभिन्न रहवाक कारणे ओकरा पत्र लिखवामे एकटा ’पेन फ्रेन्ड’ क मजा आओत । सबसँ पहिने तँ’ ओकरा परिवाक हुलिया लेवऽ पडत । ओकरा परिवारमे के सब छैक ? के कतऽ की करैत छैक ? पत्रक सिलसिला जौ चालु भऽ जायत त कालान्तरमे इ हो बूझऽ मे आवि जायत जे ओकरा एकटा मनोनुकूल पत्नी भेटलैक की नहि….. आकी कोनो ना शेष जीवन वितावऽक क्रममे अइ ।
याददाश्त वा फेहरिस्त रहत । तहिया सी. एम. कलेजक आलीशान आर्ट्स व्लक नव हेवाक कारणे विल्कुल कोनो सुन्दर कागज पर पारल रंगीन नक्शा वुझाइक – पार्क जकाँ । जतऽ जाउ जेना पक्षीक झुण्ड आ कलरव पसरल । विशाल पुस्तकालय । वागमतीक मनोरम आ खतरनाक किछेर । रहस्यमयं गर्ल्स-कामन-रुम । विभिन्न विषयक अलग ’डिपार्टमेन्ट’ आ ओ रहस्यमय कोठली, उपर हेवाक कारणे, छात्रसब कौखन कार्यवश, कौखन अनेरो, कोनो ’सरसँ भेटवाक वहानामे उपर भीड कऽदैक । परन्तु’ जखन ’हुसैन’ साहव माने वाइस प्रिन्सपल अपन ’चैम्बर सँ ’ बहार भऽ केवल तर्जनी उठवैत छलाह तखन सब सिड़हीसँ नीचा भगैत छल – कान – कपार फुटवाक – टांग टुटवाक कोनोटा डर नहि । हमरा सभक ग्रूपमे एकटा रीनिता नामक लड़की छलि ’जकरा मात्रे’ कार प्रतिदिन कालेज पहुँचा जाइक । लक्ष्मी आ सरस्वतीक अपूर्व संयोग ! मांजल अंग्रेजी वजैत आ लिख्यैत छलि । फस्ट इयरमे ’विदेह’मे जे ओकर लेख छपैलक से लाजबाव रहैक – शीर्षक छल “Exclusively ours “| लेख मार्फत ओ ओकरा सभक कोठलीक पर्दा हटा भीतरक बहुत रास रहस्योदघाटन कएने छलि । मुदा ओ एक बर्षक बाद नहि जानि कतऽ चल गेलि ? धनीक बापक वेटी रहए । प्राय: ओ कलेज झुझाअन लागल हेतैक ।“ Exclusively ours” एखनो कहियो काल पढि लैतछी मुदा शीर्षकक तात्पर्य वुझवामे एखनो माथमे बल देवऽ पडैत अछि ।
एकटा और घटना जकर हम सब कहियो नहि विसरि सकब । हम सव विश्वस्त छी जे जौ पत्र लेखनक शुरुआत मित्र दिनेश राय दिससँ होइत त ओहो ओइ घटनाक चर्च जरुर करैत । हम सव भाग्यवान रही जे ओहो कोनो ’नन्दी’ टाइटलवाली हमरे सभक ग्रुपक छलि आ वंगालिने छलि । ओकरा आँखिमे वास्तवमे एहन एकटा चमक छलैक जे आई ३६ वर्षसँ कतौ अन्तऽ नहिं अभरल, पता नहि ओ आँखि कतऽ अइ ? ओइ बड़का – बड़का आँखिमे ओ चमक विद्यमाने छैक वा मलीन भेलैक अछि ? जे किछु । मुदा सारा काजेज ओ जादुई आँखि देखने छल – देखैत छल । अनहोनी भाऽ गेलै । एकटा हमरे सवहक सहपाठी लड़का ओकरा नाम पर – ओकर नाम लैत जहर खा लेलक मुदा समये पर अस्पताल पहुचाओल गेल आ जान वचि गेलैक । जंगली आगि जकाँ वात सौसे पसरि गेल । मुदा ओकरा लेल धन-सन । कोनो प्रतिक्रिया ने कोनो हलचल ने – सव किछु विल्कुल सामान्य । असलमे एक तरफा प्रेम छलैक । वात ओकरो तक जरुर गेल हेतै –लेकिन ओ वेहद गम्भीर जे छलि । Eng. Hons. Group मे टॉप कैलक । मुदा ओ जमाना वड़ वेजाए छलैक । लड़का – लड़कीमे बार्ताक संचार नहि होइत छलैक । लाख कोशिशक वाद हमरा आ दिनेशक मुँहसँ कंग्राच्युलेसन शब्द नहि फुटल – नहिए फुटल ।
कालेज आ संवेदनशील घटना – संवेदनशील घटना आ कालेज – जेना एक दोसरक पर्याय रहैक । कतेक वात भेल । कतेक घटना घटल । मुदा पहिने पत्राचारक क्रम त शुरु होवऽ । दिनेश वहुत वातक जानकारी करा सकैए – ओहि पानि क’ जे अइ । जन्मभूमि आ कर्मभूमि नेपाल भेलाक कारने बहुत रास अपन लोक छुटि गेल । ओना सीमा नहि बुझाइत छैक मुदा सम्पर्क जे टुटिगेल अछि । मुदा एकटा वात । एहि सन्धि-स्थल पर जीवाक अपन मजा छैक । कौखन उत्तराभिमुख, कौखन दक्षिणाभिमुख । दूटा संस्कृति मिश्रित जीवनक उत्फुल्लता – जुनि पुछू । पहाड़क गीत खोलामे झहरिकऽ समुद्रक लहरिमे विलन भऽ जाइत अछि । भास दू-मुदा भाव एके –ऐन-मेन । “जहाँ जहाँ वान्छौ तिमी, म पाइला वनि पच्छयाई रहन्छु “ तु जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा” ।
पहाड़क गीतक सन्दर्भमे १९७१ ई. क एकटा सांझ मोन पडैत अछि । काठमान्डौ सँ दूर उत्तर वालाजुउद्यानसँ उपर पहाडीपर English Language Trainning Institute द्वारा आयोजित वनभोज समारोह । नाच करैए ओ सव । कोन लड़का-कोन लड़की-नाचमे फर्क नहि वुझायत । निर्विकार । निर्विकार भऽ नाचत आ गाओत । मुदा एम्हर, अपना समाजमे लज्ज कलाके प्रस्फुटिता नहि होवऽ दैत छैक । गीत गओलक राममणि । सम्पूर्ण मण्डली अभिभूत आ मंत्रमुग्ध भऽ गेल । पहाडमे केवल निर्जीव पाथरे नहि होइत छैक । एकटा प्रशिक्षार्थी – एकटा शिक्षिकाक आँखिसँ नोर झहडऽ लागल आ समस्त वातावरण जेना जड़ भऽ गेल ।, ओ गीत एखनो कहियो काल हंमरा मन-प्राणके जेना आन्दोलित कऽ जाइत अछि – “कोई जव तुम्हारा हृदय तोड़ दे ………. “ दुर्गम पहाडी गाममे एहनो गीत गाओल जाइत अछि- आ ओतुक्को लोक ओकर तात्पर्य बूझि विभोर भऽ जाइत अछि – हमरा आश्चर्य लागि गेल ।
ओइ दिन हम पहाडक आँखि नोरायल देखने रही । स्पस्ट । निस्सन्देह । हमरा जनैत सैकड़ौ-हजारो वर्ष पहिने, कोनो युगमे ओइ गीत सँ बहुत बेसी, कैएक गुना वेसी दर्द-भरल गीत सुनि पहाड जे करुण क्रन्दन केने हैत तकरे फलस्वरुप एतेकं नदी नालाक जन्म भेल हैत । बहुत सम्भव गायक स्वंय Adam छल हैत आ सुननिहार ओकर प्रेयसी Eve ।
राममणि शर्मा ओहि दिन सँ हमर अभिन्न भऽ गेल । ओकर आ और कतेक साथी सभक पता हमरा डायरीमे ओहिना पड़ल अछि । आव त डायरीक पन्न जीर्ण-शीर्ण भऽ पीयर भऽगेल अछि । आइए ३४ वर्षक वाद एकटा पत्र हम और लिखव, एखने लिखव ………।

१ जनवरी ,’०५
जनकपुरधाम

दिनेश भाइ,
नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना । आशा अछि लिफाफ पर हमरनाम पढलाक बाद हमरा चिन्हऽ मे एको क्षण देरी नहि लागल हैत । ओना किछु चौकल जरुर हैव । से त स्वभाविके ……….। कोनो अपराध वोध नहि भऽ रहल अछि । एकटा प्रश्न पुछै छियऽ । जीवन एना जटिल किएक भेल जा रहल छैक ? कतेक वेर विचार करैत छलहुँ ………… आई लिखैछी, काल्हि पक्के लिखव ………. मुदा आई ……. जावत दुनूपत्र हम लिखि नहिलेव, तावत हमराअ चैन नहि ……….. चैन नहि ………….।
शान्ति सदन, ढुहवी-१
(धनुषा)

बृषेश चन्द्र लाल-
एकदन्तष हाथी आ नौलखा हार
कछमछी छुटिते नहि छैक । जखनसँ मकवानपुरक सेनगढ़ी दरबार देखिकए फिरलि अछि ओकर मस्ति.ष्कुपर
इन्द्रछकुमारी छाएलि छैकि । १४ बर्षक इन्द्र कुमारी बाल राजकुमारी । लगैत छैक जेना ओ सभकिछु प्रत्य क्ष देखि रहलि हुअय । सोन।चानीक महीन कढ़ाईसँ युक्त चमकैत नीच्चा तक सोहराइत घघरा, नितम्ब तक लटकल कारी केशमे कलात्मसक
गुहल चोटीसँ सज्जिात माथपर हीरा जड़ित मुकुट, डरकशसँ नापल गोल गिरहसनक डाँड़, बाँहिपर चमकैत बाजुबन्दी, हीरा।
मोती आ रंगबिरंगी रत्न जड़ित हारसँ सुशोभित कनेक्केत उठल वक्ष, कानमे झुमैत झुमका आ कर्णफूल आदि।आदि ।
राजकुमारीक जाज्व ल्यन सौन्दरर्यक काल्पकनिक प्रतिमूर्त्ति ओकर मानसपटलपर निरन्त र बिम्बिलत भ। रहल छैक । ओहि राजकुमारीक दैवी सौन्दलर्यक चर्च कोना गोरखा पहुँचल हएतैक ? सभकिछुमे राजकीय सत्ता तथा शस्त्रज।शक्तिक बढ़ोत्तरीक योग।ह्रास देखि निर्णय लेबएबला धूर्त्त गोरखा युवराज पृथ्वीजनारायण शाह आ ओकर सशस्त्रक मण्डिली एहि मादेँ कोना अपन प्रतिक्रिया देखओने होेएतैक ? कोना पहिने राजाक खोपीसभारुरुआ फेर तकरबाद भारदारीसभामेरुे मकवानपुरक राजा हेमकर्ण सेनक सुता राजकुमारी इन्द्रयकुमारीसँ पृथ्वी नारायणक विवाहक प्रस्तासवक योजना बनल हएतैक ? । आदि।इत्याादि प्रकरणसभक दृश्युसभ ओकरा आगाँ जेना सजीव भए एक।एक कए आबए लागल छैक ओ फेर करोट बदलैति अछि । ओही कोठरीमे लगले मायसंगहिं दोसर चौकीपर सुतलि आ कनेक्केै काल पहिनेतक फुसुर।फुसुर बतिआइत बड़की भौजी ओकर कछमछी पकड़ि लैति छथिन्ह , । “मणिदाइ, निन्नआ नहि होइअ ? किछु होइअ की ?”
“नहि, किछु नहि उ” । भाउजक प्रश्ननसँ ओ अकचका जाइति अछि ।
“ तँ ओना किआ अहुरिया कटैति छी ?”। बड़की भौजी जेना कछमछी ठेकानि नेने रहथिन्ह ।
“नहि, किछु नहि होइअ । खाली वहए मकवानपुरगढ़ीक दृश्य आगाँ चलि अबैत अछि । ़़़ हेमकर्ण,
इन्द्रिकुमारी आ दिगबन्धिन सेनक खिस्साव मोन पड़ि जाइत अछि उ” । ओ अपनाप्रति भाउजक चिन्ताफकेँ हटाबक कोशिश करैति अछि । मुदा बड़की भौजी अपन स्वा भाविक व्युसत्पान्नाता छोड़यबाली नहि छथिन्हच । चट् दागि दैति छथिन्हक, ।“ आ की केओ ओतय मोनमे उतरि गेल अछि ? माय, देखथुन्ही , मणिदाइक मोनमे केओ चढ़ि गेल छन्हि् बेटासभकेँ शिघ्र वर खोजय कहथुन्हज । देखै छथिन्हउ, कोना करोट पर करोट फेरै छथिन्ह उ” माय बुझाइअ औंघा गेलि छथिन्हि । ननदि।भाउजक गप्पीमे ओ कोनो उत्तर नहि देलखिन्हर ।
मणिकेँ भौजीक एखुनका परिहास नीक नहि लगलैक । चुप्पेम आंखि मुनि लेलकि । सोचय लागलि, ।“खाली
बिआहेटा कोनो जीवन छैक ? बिआह तँ मुदा प्रारम्भे अछि । बिआहक बादक सहयात्रा ने थिक जीवन उ की नारी सभदिन अनचिन्हाीरे सहयात्रीक प्रतीक्षा करैति रहति ? आ कतेको इन्द्रयकुमारी अहिना जीवनक यात्राक पहिलुके पड़ाओपर अपन सहयात्रीक प्रतिक्षा करैति त्रासदीक खाढ़िमे ढ़केलि देलि जाएति ।आ ओकर सहयात्रीसभ ओकरा अनभुआर जंगलमे एसगर ठाढ़कए भगैत रहत । संग नहि देबकलेल अनर्गल आ अनसोहाँत असम्भओव शर्तसभ आगाँ बढबैत रहत ? बेटीसभ अहिना चीज।वस्तुग जकाँ निर्जीव नारी बनि तील।तील क। जड़ैति रहति ?” आक्रोश जेना मणिकेँ भीतरसँ आओर छटपटा दैछ । ओ एकबेर फेरो करोट फेरैति अछि । बड़की भौजी प्रायः सुति रहलि छथिन्हण । राति बेशी चढ़ि गेल छैक । ओहो अपनाकेँ शून्यि करक यत्नज करैति अछि । निन्न हेतु मनसँ बल करैति आँखि मुनि लैति अछि ।
राजकुमारी इन्द्र कुमारीक कक्ष । पलंगपर बैसलि राजकुमारी । उदास मुदा आंखि आक्रोशित लालतेस उ मुहँ लड़कओने ४/५ सखीसभ चारुकात घेरने । ककरो पदचापक ध्वानि अबैछ । सभ साकांक्ष भ। जाइछ । राजकुमार दिगबन्ध न सेन प्रवेश करैत अछि । फिकिरसँ गलल मोनपर उदासी स्पनष्टभ छैक । सखीसभ् स्थिारसँ बहरा जाइछ । दिगबन्ध न । बहिन उदास नहि होअअ उ निर्णय भ। गेलैक । हमरासभ अपन बहिनकहेतु सभ किछु न्यो छावर क। देब । बहिनक भविष्य आ एहि क्षेत्रक मर्यादाक आगाँ एकदन्तम हाथी आ नौलखा हार मूल्योहीन आ तुच्छ‍ अछि । इन्द्रबकुमारी । ( दौड़िकए अपन भायक छातीमे माथ सटाए कनैति ) नहि, भाई नहि । आब सेन राज्य् आओर मानमर्दित नहि हएत ।बहुत भ। गेलैक । एकदन्तौ हाथी आ नौलखा हार हमरा।आहाँक नहि एहि राज्ययक सम्पतत्ति छैक । जनताक सम्पतत्ति एकगोट राजाक बेटीकेँ दहेजमे नहि दिआ सकैत अछि । ओ सभक धरोहर छैक । एकदन्तप हाथी केओ कमाएल नहि अछि , एहि क्षेत्र विशेषक हेतु प्रकृतिक विशेष आ अनुपम उपहार थिकैक । एहन गल्तीप जुनि करब ।
दिगबन्धबन । अपन जमायकेँ संतुष्टक नहि करय सकब एहि महाभारतक आगोसक सम्पूार्ण मध्यलक्षेत्रक मर्यादाक विपरित हएत । इतिहासमे हमरासभकेँ कोसल जाएत बहिन जे सेन राजा अपन बेटीक बिरागमन दहेजक आभावमे ८ राजा, रानी, युवराजक व्याक्तिगत कोठरीके पहिने नेपाली दरबारी भाषामे खोपी कहल जाइक ।
ट्ट दरबारक सल्लाहहकारसभके भारदार कहल जाइक ।
नहि क। सकल । जीवनधरि बेटी विवाहोपरान्तन नैहरेमे रहि गेल । नहि बहिन नहि आब समय नहि
छैक तैयारी मे लागलजाय ।
इन्द्रयकुमारी । आ ई नहि जे सेन राजा अपन अबुझ जमायक अनर्गल माँगक आगाँ झुकि गेल जे सम्पू र्ण राज्यीक सम्प्त्ति सेनवंश एकगोट बुनल षड़यन्त्रपक कारणेँ गोरखाक राजाकेँ विवश भ। चढ़ा। देलकैक ।हम नहि
जाएब । हमहुँ अपन सम्पूंर्ण जीवन न्योबछावर क। देब दुनियाँकेँ देखा देबैक जे एहि क्षेत्रक नारी चीज
नहि सृष्टिुक बीज अछि । मानक माथ आ त्यानगक शिर्ष अछि ।
दिगबन्ध्न । आह, बहिन उ एहन जीद्द जुनि करु । भ। सकैछ , एहिसँ एहि राज्यकक सुरक्षापर सेहो असर पड़य ।
इन्द्रधकुमारी । तँ करु युद्ध राज्‍यक अस्मििताक लेल युद्ध करब, आवश्यषक पड़लापर शहीद हएब आहाँक धर्म थिक ।
राज्यरक सुरक्षापर कोनो असर पड़ैत अछि तँ उठाउ तरुवारि हम नारी छी । नारीक अस्मिएताहेतु , अपन
पवित्रताहेतु अपनाकेँ न्योकछावर करब हमर धर्म थिक ।नारी सभ किछुसँ दबि जाएत मुदा ओकर पवित्रता
ओकर स्वा भिमान आ नारीत्त्वक ओकर प्राणेासँ बढ़िकए थिकैक । हमरा उपहारक वस्तुत नहि बनाउ, भाई उ
दिगबन्धान कक्षक चारुकात आहत बाघ जकाँ धुमय लगैत अछि ।धम्मढ द। बहिनक पलंगपर बैस जाइत अछि आ ओकर माथ झुकि जाइत छैक ।
इन्द्रथकुमारी । आहाँ तँ अँड़ल रहिऐक भाई कोना झुकि गेलिऐक ? कर्त्तव्य पर बहिनक ममताक छार पड़ि गेल अछि ।
सेन राज्युक राजकुमारकेँ राज्यलक गौरव रक्षा करब पहिल काज छैक । बहिनक ममता नहि ।हम तहिये
कहने रही । गोरखाक रितिरिवाज, राज्यक प्राप्तिपकहेतु किछु करक चलन, ठगी संस्कामरक बारेमे सोचि लिअ ।
लिगलिगक चौरीमे चोरी क। बनल राजाक प्रस्तायवमे जरुर किछु षड़यन्त्रि हएत । मुदा हम तँ १४हे बर्षमे
आहाँसभक बोझ बनि गेल रही । शायद कोनो त्रुटि भेल रहय तैँ एहन खानदानमे हमरा फेकक निर्णय कएल
गेल ।
दिगबन्ध न । नहि , बहिन उ अनजानमे भेल गल्तीाक कारणेँ हृदयमे आओरो प्रहार नहि करु । अपन गल्तीेक आगिसँ ई अपने दग्धन आ तप्तो अछि । आहाँ हमरासभक गौरव छी । हमसभ तँ उत्तरक सभसँ शक्तिशाली राज्य।क रानीक रुपमे आहाँकेँ देखय चाहलहुँ ।
इन्द्ररकुमारी । शक्तिये प्राप्तन कएलाक कारणेँ केओ नीक नहि भ। जाइछ, भाई । गुम्ब जपर बैसल कौआ सभसँ नम्ह्र नहि भ। जाइत अछि ।
दिगबन्धरन । इन्द्र।कुमारी , हमर सोनसन बहिन उ (स्वभरमे किंकर्त्तव्यक विमूढ़ता स्प ष्ट‍ अछि ।)
इन्द्ररकुमारी । एकदन्तर हाथी आ नौलखा हार दैये देलापर आहाँक बहिन खुश रहत ? निर्बाध सासुर भोगत तकर कोनो निश्चि्त ठेकान छैक ? काल्हि कतहुँ आओर किछु नहि माँगि लेअय ? सबसँ पहिने ओसभ विवाह होइते
चतुर्थीयोसँ पहिने बरिआतीये संग बिदागरीक माँग कएने रहए । हमरासभक रितिरिवाजपर अपन चलन
लादक कोशिश कएने रहए । एकरा संस्कृदति आ परम्पएरापरक आक्रमण बुझू । आब दहेज मँगैत अछि ।
अड़ाकए । काल्हि फेरो कोनो नया बहन्नाि खोजि लेत । भाई, हमरा तँ बुझाइत अछि ओ एहि औपचारिक
वैवाहिक सम्ब्न्धेक लाभ उठाए राज्यापर चढ़ाई क। देत ।एखन झुकक नहि तनक समय थिकैक, भावनामे
नहि कर्त्तव्यहमे बहक बेर छैक ई । बहिनसँ पहिने मातृभूमिक रक्षाक चिन्तान करु दिगबन्धैन उठि जाइत अछि । ओकर गाल लाल भ। गेल छैक । बान्हरल मुठि उपर उठि जाइत छैक ।
दिगबन्ध न । एकदम ठीक कहलहुँ बहिन उ आहाँक साहससँ हम गौरवान्वि त आ प्रेरित छी । बाबूसँ एखने निवेदन करैत छिअन्हि‍ । ( तिब्र डेगेँ बहरा जाइत अछि । )
इन्द्रिकुमारीक आँखि क्रोध आ आक्रोशसँ लाल भ। गेल छैक । बुझाइत छैक जेना बाहर निकलयलेल आरत होइक । ओ अपन कसल मुठिसँ घघरा उठाकए दाँत कटकटअबैति झारि दैति अछि ।
ङ्ग ङ्ग ङ्ग ङ्ग
मणि धड़फड़ाकए उठलि । मुठि ओकरो कसल रहैक । बड़की भौजी तखने प्रवेश करैति रहथिन्हब । अपना
हिसाबेँ अर्थ लगाइये लेलखिन्हर, । “मणिदाई, सपनाइत छलहुँ ? सुतलमे कसैत देह देखिते हमरा बुझा गेल छल ।देह दुःखाइत हएत ” । फेर हँसैत कहलखिन्ह।, । “बादक इन्तहजाम तँ भायसभ करताह । छोटकी चाय बना नेने अछि । नेने अबैत छी ।” मणि किछु नहि बाजलि । बड़की भौजी बाहर निकलि गेलि रहथिन्ह् । ओ पलंगसँ चुपचाप उतरि ब्रसमे पेष्ट” लगाबए लागलि ।
कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
नव-वर्ष

शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ। धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ़ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल आछ़़ नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ। मुदा सब केयो थोड़बे?

शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा पुछिये देलकै ओकरा सँ -” बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?”

”बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।”- बाल-मन कें बुझेबाक प््रायास केलक सुकना।

चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लागि गेलै- ”हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक??”

सुकना एहि अबोध कें कोना समझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक।

बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक।
एत’ आ ओत’- अनलकान्त

आइ-काल्हि कनाट प्लेस मे चलैत-चलैत हमरा लगैत अछि, अपना गामक दशहरा•मेला मे घूमि रहल छी। नइँ, ओत’ मेला मे रंग-बिरही चीज कीनि पबैत रही, नइँ एत’ शो-रूम मे ढुकि पयबक साहस क’ पबै छी। किलोक किलो रसगुल्ला-जिलेबी तौलबैत आकि मारते रास खिलौना ल’क’ जाइत लोककेँ डराइत-ललचाइत देखैत रही ओत’ आ एत’ विशाल-भव्य मॉल आ नेरुलाज-मैकडोनाल्ड सँ चहकैत फुदकैत बहराइत अर्द्धनग्न अप्सरा केँ इन्द्र-बेर संग रभसैत, डेटिंग फिक्स करैत ईर्ष्या आ क्रोध सँ देखै छी।

राष्ट्रपति भवनक पिछुआडक जंगल मे एक दिन एक टा बेल गाछ लग
कनेकाल ठमकल रही। ओकरा जडि़ मे किछु माटिक महादेव फेकल छल, किछु
निर्माल्य आ कातक झोंझि मे कोनो साँपक छोड़ल केंचुआ पुरबाक सिहकीमे डोलि रहल छल। हमर आँखि क्षणभरिक लेल मुना गेल। ओत’ एहने सन एकटा बेल गाछ तर हमर बालपनक प्रियाक गर्दनि भूत मचोडऩे छलै। ओकरा मौनी मे कामधक चूड़ा ओहिना नजरि पड़ै अछि!… मुदा हम कतहुँ हेरायल-भोतिआयल नइँ रही।हम राष्ट्रपति भवनक पिछुआडि़क जंगल मे ओही बेल गाछ लग ठाढ़ रही। हमराओही आसपास मे एक टा अस्तबलक रिपोर्टिंग करबाक छल जत’ सँ करिया घोड़ाक नालक स्मगलिंग होइत छलै। से ओहि बेरहट-बेरा मे भुखायल सन हम अपन रिपोर्ट पूरा करबाक ओरिआओन क’ रहल छलहुँ कि अचानक एक टा गमक हमरा विचलित क’ देलक। गाम मे नवका धान-चूड़ा कुटैकाल जे गमक बहराइत छल, एकदम वैह गमक छल! आसिनक बसात अगहनी भ’ गेल छलै।… मुदा हमर मन बताह हेबाक सीमा धरि अवसादग्रस्त भ’ गेल।

ओहिना एक साँझ कुतुब मीनार लग सँ गुजरि रहल छलहुँ। एक टा छौंड़ी अपन संगी छौंड़ा केँ जोर-जोर सँ बता रहल छलै जे ओकर सपना मीनारक एकदम ऊपर सँ दिल्ली देखैत रहबाक छै। हम सर्दिआयल भुइँ पर लगाओल पुआरक सेजौट परक सपना मन पाडय़ लगलहुँ कि तखने हमरा मोबाइल पर बीड़ी साँग बाजल। छोटकी मामक फोन छल। ओ कनैत-कनैत बाजलि, ”देखियौ यौ भागिन बाबू, आब हम की करबै!… बैमनमा सब हुनका सी.बी.आई. सँ पकड़ा देलकनि। फुसियेपाइ लेबाक नाटक मे ओझराक’…।” हमर मामा इनकम टैकस कमीशनर। हम एक-दू बेर गेल छी हुनका ‘रेजीडेंस’ पर, मुदा हमरा डेरा मोबाइल पर हुनका लोकनिक सर्दिआयल स्वर आ किछु एसएमएस टा आयल अछि। तखन अपना
भीतरक भाव नुकबैत हम की आ कोना बाजल, से मन नइँ अछि। हमर अदना-सन पत्रकार काज नइँ अयलनि, अपने पाइ वा जे कथुक एकबाल!… से बात जे-से। मोबाइल स्वीच-ऑफ क’ हम जेब मे रखनहि रही कि हमर मन-प्राण एक टा टटका गमक सँ सराबोर भ’ गेल। धनिया, सरिसो सभ देलाक बाद झोर मे टभकैत माछक तीमन सँ घर-आँगन मे जे गमक पसरि जाइत छै, सैह गमक हमरा मतौने जा रहल छल। हम अगल-बगल हियासल जे कतहु ककरो घर वा झुग्गी मे रन्हा रहल होयतै, मुदा ओहि झोलअन्हारी मे हमरा चारूभर जंगल-झाड़ आ करकटक अम्बार छाडि़, किछु तेहन नइँ देखा पड़ल जत’ ओहि गमकक स्रोत ठेकानि सकितहुँ। अंतत: हम अपन जेब मे हथोडिय़ा देब’ लगलहुँ जे माछक इंतजाम भ’ सकै छै वा नहि!…

हाले मे हम अपन सेठक कृपा सँ महीनबारी गुलामी सँ मुक्त कयल गेल छलहुँ। आब हम तथाकथित ‘स्वतंत्र’ दिहाड़ी मजदूर छी। आ दिहाड़ी पर खट’वलक कपार मे जे बौअयनी लिखल रहै छै, से हमरो संग छल। आ तेँ ओत’ सँ एत’ आयल मैथिल लोकनि सँ भेंटघाट सेहो किछु बेसी भ’ रहल छल। से एक टा एहने भेंट मे हमर एक ग्रामीण कहलनि, ”बाउ, ई नगर तेजाबक नदी थिक जाहि मे अपन मैथिले टा नहि, कोनो मनुक्ख बाढि़ मे भसिआइत माल-जाल, घर-द्वार आ लोकवेद जकाँ निरुपाय अछि।”

कि मधेपुरा-सिंहेश्वर दिस सँ आयल एक टा युवक बाजल, ”हौ भैया!,बाजार, मशीन आ सीमेंट तर दबैत-मरैत लोकक नगर छियह ई।”

”हँ, भाइ, ठीक कहलह! मुदा ओत’ दलदलो मे जकरा जगह नइँ भेटलै, ओ एत’, बारूदक ढेरी पर सही, एक टा नव मिथिला तँ बसबै छै!…” बजैत-बजैत हम हकम’ लागल रही आ भीतर पसेना-पसेना भ’ गेल रहय।

से लगातार एहने सन मन:स्थिति सँ गुजरि रहल छलहुँ हम। आ, यैह पछिला पखक गप्प थिक। एक साँझ विद्यापति बाबाक बरखीक हकार पूर’ हम नोएडा गेलहुँ। ओत’ बहुत दिन पर भेटलाह, बतौर कलाकार दरभंगा सँ आयल मिथिला नरेशक अंतिम पुरोहितक परपौत्र महानंद झा। आयोजक सँ पूरापूरी विदाइ
असूलि अटैची डोलबैत फराक भेले छलाह कि हम नमस्का कयलियनि। बहुत बरखक भेंटक बादो चिन्हलनि आ एक कात ल’ जाक’ हाल-चाल पूछ’ लगलाह।
गप्पक क्रम मे ओ बेर-बेर एम्हर-ओम्हर ताकथि। कि हम पुछलियनि, ”किनको तकै छी की?”

”हँ यौ! दरभंगक कमीशनर साहेबक बेटा एत’ प्रोफेसर छथि। ओ हमरा अपना ओत’ ल’ जाइवला छलाह। देखियौ ने, हुनकर आग्रह देखि हम अपन सभ प्रशंसककेँ निराश क’ देलियनि। सांसद जी धरि सँ लाथ क’ लेलहुँ। असल मे होटल मे हमरा जहिना जेल बुझाइ अछि, तहिना नेता सभक ठाम मेला बुझाइछ। तेँ हम कतहु जाइ छी तँ अपने कोनो समाँगक घर रहै छी।” चेहराक बेचैनीक बादहु महानंद जीक स्वर समधानल छलनि।

”से तँ नीके करै छी!” हुनक बेचैनी कम करबाक लेल हम आश्वस्त कयलियनि, ”कहने छथि, तँ अबिते हेताह!”

”से आब नइँ लगै अछि। चारिए बजेक टाइम देने रहथि। कोनो मीटिंग मे फँसि गेल हेताह। …देखियौ ने, हम ने पते लेने छी, ने फोन नंबर। आब तँ अवग्रहमे पडि़ गेलहुँ।” हुनक परेशानी आब सभ तरहेँ प्रकट भ’ रहल छल।”

हमरा साफ लागि रहल छल जे ओ होटलक खर्च बचब’ लेल ठहार ताकि रहल छथि। एम्हर हमरा ई डर किछु बजबा सँ रोकै छल जे नइँ जानि कते दिन धरि मेहमानी डटाओताह। अंतत: पुछलियनि, ”कहियाक वापसी अछि?”

”परसू साँझ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस पकड़बाक अछि। टिकटो आर.ए.सी.
27 सँ कन्फर्म भेल वा नइँ, मालूम करबाक अछि।” आ हमरा हाथ मे मोबाइल देखि झट जेब सँ टिकट बहार कयलनि, ”देखियौ तँ मोबाइल सँ, टिकटक स्टेटस
की छै?

दुइए दिनक बात निश्चित जानि हम हिम्मत कयलहुँ, ”ई कोना देखै छै, से हमरा नइँ पता! हमर कनियाँ देखि सकै छथि। आ से तखने हैत जँ अहाँ हमरो अपने समाँग बुझी आ हमरे घर दू दिन लेल चली।”

”आ से की कहै छिये! अहाँ तँ अपनो सँ अपन समाँग छी। हम तँ घरेक लोक बुझै छी अहाँ केँ। ठीक छै, अहींक घर जायब। ओ प्रोफेसर आब आबियो जयताह तँ हम नइँ जायब हुनका ओतय। ओ तँ कमीशनर साहेब अपनहि फोन क’ कहलनि चलै काल तेँ सोचल!!… धौर, छोड़ू आब ओहि गप्प केँ। आ ओ हमरा संग चलबा लेल अगुआयले सन छलाह।

हम नइँ चाहैतो अपना परतारि रहल छलहुँ जे एतक पैघ कलाकार दू दिन हमरा घर रहताह। से बसक भीड़ो मे ठाढ़ हम हुनके स्वागत-सत्कार मादे सोचि
रहल रही।

किछु काल बाद हम सब यमुना विहारक स्टैण्ड पर बस सँ उतरलहुँ। मेन रोड छोडि़ अपना गली मे ढुकले रही कि गलक ओहि छोर परक चाह दोकानवला छौंड़ा गणेश पाछाँ सँ चिकरिक’ सोर पाड़लक। ओकरा दोकान मे हमर अबरजात किछु बेसी छल। अपन भाषा भाषीवला लगाव सेहो रहय। आ ओ छौंड़ा एक तरहेँ हमर मुँहलगुआ जकाँ भ’ गेल रहय। हम ओकरा गाम-घर सँ भले परिचित रही, मुदा हमरा मादे ओ नइँ जानि सकल रहय। मुदा तखन हमरा पाछाँ घुरिते ओ पुछलक, ”अहाँक घर सहरसा लग, बिहरा छी ने!”

”से के कहलकौ?” हम अकचकाइत पुछलिऐ।

”अहीं गामक भोला कामति। ओ हमर मामा छिये।” गणेश बिहुँसि रहल छल, जेना ओ कोनो बडका जानकारी हासिल क’ लेने छल।

”कत’ छौ भोला?”

”भोर मे आयल रहै। दुपहरिया मे चलि गेलै। भोरे अहाँ केँ बस पकड़ैत अचानके देखलकै ने तँ बाजल, ”ई तँ धीरू भैया लागै छौ रे गणेसबा!” हम कहलिऐ, ”हँ, धीरजी…बड़का पत्रकार छिये! तों कोना चिन्है छक?… ” आ तखन ओ मारते सब टा कहलक।… आगाँक बात ओ छौंड़ा हमरा संग मे अपरिचित देखि नइँ बाजल।

”गेलौ कत’ भोला?” हम बात केँ भोला दिस मोड़लहुँ।

”ओ बदरपुर मे रहै छै। काल्हि-परसू धरि फेर अयतै। एत्तै दोकान शुरू करैवला छै! “

एते काल मे हम ओकरा दोकानक भीतर राखल बेंच पर बैसि चुकल रही।महानंद जी सेहो। गणेस चाह बनब’ लागल छल।

सहसा महानंद जी बजलाह, ”एत’ तँ डेग-डेग पर अपन मैथिल भेटि रहलाह अछि आ से मैथिली मे बजैतो छथि। अपना दरभंगा-मधुबनी मे चाह-पानवलाक कोन कथा, रिक्सावला धरि केओ मैथिली मे जवाब नइँ देत।

हमरा किछु बाजब जरूरी नइँ बुझायल। चाहक पानि एखन खदकिए रहल छलै कि गणेश पुछलक, ”किछु खयबो करबै, सर? “

”हँ! कहि हम महानंद जी दिस तकलहुँ, ”अंडा लैत छी की?… लैत होइ तँ आमलेट-टोस्ट बनबा ली!”

”हँ, लिय!” क्षणभरि बिलमक’ ओ बजलाह, ”यौ धीरजी, आब दूध-दही लोक केँ भेटै नइँ छै। सागो-पातक दाम नइँ पुछू, आगि लागि गेल छै।तिलकोड़क तरुआ कते साल भ’ गेल, जीह पर नइँ गेल। तखन ईहो सब नइँ खाइ
तँ जीबी कोना? फेर विज्ञानो कहै छै जे ई पोष्टिक चीज छिये।”

हमरा हँसी जकाँ लागि गेल। तत्काल किछु बाजल नइँ। चलै काल गणेश केँ लग बजा किछु तिलकोड़क पात पार्ककक कात सँ आनि देब’ कहलहुँ। महानंद जी उछलि गेलाह, ”अयँ! एत तिलकोड़क पात! आब तँ दरभंगो मे नइँ देखाइ छै!”

आ तहिना हमरा कनियाँ हाथक दर्जन सँ बेसी तरुआ चट क’ बजलाह,
”असली मिथिला तँ आब दिल्ली आबि गेल। दरभंगा मे आब कहाँ छै ओ बात,
कहाँ छै ओत’ ई मैथिलानीवला हाथ!…”

हम सभ दू दिन हुनक खूब स्वागत-सत्कार कयल। ओ ओहि अंतराल मे
अनेक बेर, अनेक तरहेँ, एहन-एहन अनेक बात बजलाह। हमसभ कृत-कृत!
जयबा काल हमर कनिया हुनक आर.ए.सी. वला आधा बर्थक नंबर सेहो पता क’
देलकनि आ बाट मे खयबा लेल पराठा-भुजियक एक टा पैकेट पकड़ौलकनि। ओ
खूब-खूब आशीष दैत बहार भेलाह।

हुनका अरियातैत हम गली सँ गुजरि रहल छलहुँ। गणेशक दोकान लग
एखन पहुँचले रही कि भोला पर हमर नजरि गेल। तखने ओहो हमरा देखलक आ बाढि़क सोझाँ आयल। हम दुनू गोटे एक-दोसरा सँ लिपटि गेलहुँ।

कि तखने ओकरा पाछाँ लागलि एक स्त्री सेहो मुस्किआइत लग आयलि।अबिते ओ हमर पयर छूबि लेलक। हम तुरत चिन्हि नइँ सकलहुँ। हमरा अकचकायल देखि वैह बाजलि, ”हमरा नइँ चिन्हलहक कका!… हम मीरा!”

”ओ!… सैह तँ हम अँखियासै रही।.. ” हमरा सोझाँ ओकर अठारहक बयस वला विधवा-जीवन नाचि गेल छल।

आगाँ भोला बाजल, ”हमरा दुनू आब संगे छियह। कयाह तँ सिंहेसरे मे
केलिऐ, लेकिन गाम जाइ के हिम्मत नइँ भेलह।”

हमरा अतिशय प्रसन्नता भेल। मुदा तकरा व्यक्त करबा लेल शब्द नइँ भेटि रहल छल, ”बड़ बढिय़ाँ! चलह दुनू गोटे पहिने डेरा। बगले मे छै।… हम झट हिनका बस मे बैसा केँ अबै छियह।”

कि भोला पनबट्टी खोलि अपना हाथक लगाओल पान देलक। महानंद जी
सेहो खयलनि। फेर महानंद जीक संग मेन रोड दिस बढ़लहुँ।

बस• प्रतीक्षा मे ठाढ़ महानंद जी सँ हम कहलहुँ, ”ई मीरा हमर पितिऔतक बेटी छी। बचपने मे विधवा भ’ गेल छलि।… आइ तकरा सोहागिनि देखि मन पुलकित भ’ गेल।”

सहसा महानंद झा पुछलनि, ”ई भोला कोन जातक थिक?”

हमरा कनपट्टी पर जेना चटाक द’ बजरल! ”कीयट”…

”अयँ यौ, ओत’क सब टा गौरव-गाथा बिसरा गेल? बाप-दादक नाँ-गाँ…पाग-पाँजि-जनेउ सब? …ब्राह्मणक विधवा बेटी कीयट संग! …दुर्र छी!” आ महानंद झा भोलक देल पान बगलक नाली मे थुकडि़ देलनि।

हमर मन घिना गेल। हम नहुँए, मुदा कठोर स्वर मे बजलहुँ, ”अहाँ केँ पता अछि हमर कनियाँ कोन जातक थिकी? …जकरा अहाँ सभ मलेछ कहै छिऐ!…”

महानंद झाक मुँह लाल भ’ गेलनि, मुदा बकार नइँ फुटलनि। तखने बगल मे आबिक’ रुकल एक टा ऑटो मे झट द’ बैसैत ‘स्टेशन’ शब्दक उच्चारण करैक संग मुँह घुमा लेलनि। ऑटो आगाँ बढि़ गेल।

हमर मन कहलक, ”ओ तत्काल एत’ सँ भागबकक• लेल हवाइ जहाज पकडि़ लेथि, मुदा हमर कनियाँ देलहा पराठा-भुजिया नइँ फेकि सकताह।

सहसा दुर्गंधक तेज भभक्का लागल। जेना ओत’क कोनो सड़ल पानिवला
पोखरि गन्हा रहल हो!…

प्रेमचन्द्र मिश्र-(१९८२- ) अनाम कथा

भरत झा बजलाह जे चलु कुल मिलाकय बात बरियातीक ६५ टा आ आब दिनक निर्णय कएल जाएत। तखनहि प्रेमचन्द्र बजलाह जे ई निर्णय गामपर बाबूजी करताह कारण जे हमरा बहुर सर-कुटुम छथि आ सभकेँ सूचना (नोत-हकार) सेहो देनाय छैक। भरत झा बजलाह- ई सत्य अछि, कोनो बात नहि, हम दिन ताकैत छी आ फोन कय देबनि वा भेट कऽ लेल जाएत। बस किछु समय पश्चात् पतराक अनुसार दिन भेल- २०, २१ अप्रील आ २,३ मई। ई सूचना देल गेल, फेर बड़हरा (गाम)सँ किछु दिन बाद सूचित भेल जे २१ अप्रील क ठीक रहत, तदुपरान्त प्रेमचन्दकेँ पिताजी गामसँ कहलथिन जे कपड़ाक खरीदारी दिल्लीमे कऽ लिअ आ जेवर सभ एहिठाम (गाममे) खरीदब। कपड़ा खरीदल गेल, विवाहक, कनियाक लेल, कनिया बहीन लेल, भौजीक लेल, मायक लेल आ विधकरीक लेल आ घरक प्रत्येक सदस्यक लेल।
२१ अप्रील कय दिनक विवाह छल। कन्या पक्ष आ वर पक्षक बीच सहमति छलनि जे दिनक विवाह छैक ताहि हेतु हाथ धरएके लेल समयसँ पहुँचब आ बात भेल जे दू आदमी हाथ धरैक लेल अएताह। एम्हर वर पक्षक ओहिठाम सबेरेसँ चहल-पहल छल। गाम-गामक बच्चा वा स्त्रीगण दू दिन पहिनेसँ आयल छल। पुरुष लोकनि सेहो सबेरे पहुँचलाह कारण जे दिनक विवाह छै ताहि हेतु बरियाती सेहो जल्दी जयबाक विचार छल आ दूरी वा सड़कसँ सभ अवगत छलाह। गामक धाय-माय सेहो एक अँगनासँ दोसर अँगना कय रहल छली। ताबत धरि लगभग २ बाजि गेल घड़ीक अनुसार लेकिन कन्या पक्षक कोनो पता नहि देखि बच्चा सबक भीतरक उत्साह कम भऽ रहल छल! करीब चारि बजेक लगभग एकटा आदमी राजू, दिलीप झाक जेठ सार, संवाद लऽ कय अयलाह जे किछु विलम्ब भय गेल ताहि लेल क्षमा करब। लगभग ५ बजेक करीब एकटा मार्शल (गाड़ी) दरबाजापर लागल। ओहि गाड़ीसँ चारि टा सज्जन उतरलाह आ एकटा चारि सालक बच्चा सेहो, कुल मिला कय पाँच! ई देखितहि दाइ-माइ कनफुसकी करए लगलीह जे कहने छलथिन दू आदमी आ पहुँचलाह पाँच! पुरुष वर्ग आगन्तुकक सेवामे जुटलाह। विश्वनथवा सभकेँ पानिसँ पएर धोबि कय अपन काज सम्पन्न कयलक। तावत कियो ठंढ़ा पानि अनलक आ ई काज सभ पूरा भेलाक बाद पुरुष वर्ग बजलाह जे अँगनामे दाय-माय सब कने अहाँ सभ अपन काज जल्दी करू, कारण जे पहिलेसँ विलम्ब भऽ गेल अछि। अँगनामे गोसाउनिक आ ब्राह्मणक गीत शुरू भेल। सभ दाय-माय अँगनाक माँझमे मरबापर गीत गावैत छलीह तावत एकटा बच्चा एकटा लोकल ब्रिफकेश लऽ कय पहुँचल। प्रेमचन्द पश्चिम दिशाक घरमे पलंगपर बैसल भौजी आ बहिनसँ वाच कय रहल छलाह। ब्रिफकेशकेँ देखि विभा (बहीन) भौजीसँ कहलथिन अहाँ सभ बात करू, हम कनी ब्रिफकेशक समान देखैत छी आ ओऽ मरबा दिश निकलि पड़लीह! तावत धरि एकटा बुजुर्ग महिला ब्रिफकेश खोललन्हि। प्रेमचन्द्रक नजरि पड़ि गेल तौलियापर जे पीयर रंगक दु-सूतीक छल। ई देखते दाय-माय एक दोसरकेँ मुँह दिश देखऽ लगलीह जे ई केहेन आदमी अछि, आयल अछि मार्शलसँ आ कपड़ा देखियौ। तौलियाकेँ देखिते प्रेमचन्दक क्रोध आसमानकेँ छूबि लेलक। ओऽ दू डेगमे बरन्डा फानि कय मरबापर पहुँचलाह आ कपड़ा साड़ी आ ब्रिफकेश देखैत बजलाह जे दाय-माय ई बन्द करू आ गीत-नाद सेहो। हम विवाह नहि करब। ई सुनिते बिभा हुनका सम्हारैत बजलीह, बौआ की भेल अहाँकेँ? अपन क्रोधकेँ शान्त करू, दलानपर लोक सभ की कहताह। दू मिनटमे अँगनामे गीतक बदलामे सन्नाटा भय गेल। आब दाय-माय गीत की कहती, सभ कहलथिन जे अहाँ चुप रहू, की हेतै। अहाँ एतेक खर्च कएलहुँ, तिलक नहि लेलहुँ आ कपड़ा वा समानक लेल की हल्ला करैत छी। प्रेमचन्दक जवाब छलनि, जे हम विवाह नहि करब। ई बात भय रहल छल की गीतक अवाज बन्द सूनि ४-५ टा बुजुर्ग पुरुष वर्ग दरवाजासँ अँगना पहुँचलाह आ ई दृश्य देखि सभ हुनका बुझाबय लगलाह आ कहलथिन दाय-माय अहाँ सभ आगू काज करू! आ ओ लोकनि प्रेमचन्दकेँ पुनः पछबरिया घरमे लय गेलाह। किछु पुरुष वर्ग आगन्तुक देख-भाल कय रहल छलाह। पुरुष-वर्ग मे सँ एकटा काका पुछलथिन जे बौआ की भेल, शान्तिसँ बाजू। बिभा एकटा गिलासमे पानि दैत कहलन्हि जे कपड़ा सभ नीक नहि छैक काका। काका बजलाह जे ई तँ छोट बात अछि। ई तुक्षताक प्रतीक छी! अहाँ शान्त रहू, अहाँकेँ केहेन चाही हम मँगवा दैत छी। एक घंटामे बजारसँ उपलब्ध भय जायत! प्रेमचन्द जवाब देलखिन जे काका, बात कपड़ाक नहि अछि, कारण जे हम स्पष्ट कहने छलियनि जे हमरा किछु नहि चाही। लेकिन जँ अपने किछु अनबए तँ समान नीक कम्पनीक चाही। ई तँ हमरा बेवकूफ बनओलथि! हमरा बातक दुःख अछि! जँ अपनेकेँ हमरा बातपर विश्वास नहि अछि तँ भौजी (महारानी) केँ पुछल जाय! आ अबाज देलखिन यै भौजी, अहाँ एम्हर आऊ! भौजी शब्द सुनिते महारानी उपस्थित भेलीह आ बजलीह जे बौआक बात १००% सही छनि। कन्यागत गलत काज कयने छथि, एहिमे कोनो सन्देह नहि! ई बात पूरा होमयसँ पहिने बिच्चेमे प्रेमचन्द बजलाह जे हम विवाह नहि करब कारण जे कि पता ? ओ हमरा लड़कीमे सेहो ठकताह। लेकिन बात आब इज्जत आ मान-मर्यादाक अछि, जँ विवाह नहि होएत तँ दुनू पक्षक इज्जत बर्बाद भय जायत! एक-दिश इज्जत, मान-मर्यादा आ दोसर दिशसँ दू-टा जिनगीक प्रश्न। समस्या जटिल अछि, कोनो सन्देह नहि! लेकिन छी तँ मैथिल आऽ मान-मर्यादासँ पैघ जिनगी नहि अछि। जे मान-मर्यादा ककरो लेल अभिशाप बनि जाइत अछि! हम सभ मैथिल जे किछु छी, बाप-दादाक पाग छी, जिनगीक कोनो मोल नहि! मोनमे एक हजार प्रश्न अबैत अछि जे हम मैथिलगण विश्वमे सभसँ बेशी चतुर छी आ तखनो सभसँ पाछू छी, तेकर की कारण अछि? हमरा नजरिमे जे हम सभ भूतकेँ बेशी महत्व दैत छी आ भविष्यकेँ गला दबा दैत छी, सेहो बहुत आसानीसँ हमरा लोकनिकेँ कनियो हिचकिचाहटि नहि होइत अछि! प्रेमचन्दक एकेटा उत्तर छलनि जे किछु बीति जाएत, हम विवाह नहि करब। कारण जे हमरा आब हुनका सभ (कन्यापक्ष) पर विश्वास नहि अछि। दाय-माय गीत तँ गबैत छलीह लेकिन श्वरमे उदासी गीत छल। गोसाउनिक (हे जगदम्बा जगत माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे), लेकिन श्वर सुनयमे लागैत छल जेना उदासी गाबैत छथि। अँगनाक माहौल खराब भय गेल छल। लगभग एक घंटा बीति गेलाक उपरान्त जखन कोनो तरहसँ मानैत नहि देखि भीम मिश्र (प्रेमचन्दक पिताजी) बजलाह- आब हमरोसँ बर्दाश्त नहि भय रहल अछि आ हमरो निर्णय अछि से अहाँ सुनू- जँ अहाँ विवाह नहि करब तँ हम आत्म हत्या कय लेब। आब अहाँक हाथमे गेंद अछि! निर्णय अहाँकेँ लेबाक अछि जे की करब। पहिल निर्णय विवाह ओहि लड़कीसँ करब आकि दोसर निर्णय हमर दाह-संस्कार करब? कारण हम अपन जिबैत अपन पुरुखाक इज्जत नहि गवाँ सकैत छी। ई कहि ओ ओहिठामसँ उठि चलि पड़लाह। हुनका उठिते सभ पुरुषवर्ग ठाढ़ भय गेलाह आ एकक बाद एक दरबज्जा दिस बिदा भेलाह। हुनका (भीम मिश्र) केँ बुझबैत जे अहूँ एना नहि करू, ओ बात मानताह अहाँक आ अहाँसँ पैघ हुनकर अपन भविष्य नहि छनि। सभ मड़वापर ठाढ़ गप्प करैत छलाह। एतबेमे प्रेमचन्द घरसँ निकललाह आ आँखिमे दहो-बहो नोरक मुद्रामे पिताक पएर पर खसैत बजलाह जे हमरा माफ करू आ करुण स्वरमे बजलाह, जखन श्रवण कुमार मातृ-पितृक लेल अपन प्राण न्योछावर कय देलन्हि तँ हम अपन पिताक लेल अपन भविष्यक बलिदान दैत छी। लेकिन किछु शर्त अछि, भीम मिश्र बजलाह- मंजूर अछि। पहिल शर्त हम कन्यागतक समान नहि लेब दोसर हुनकर गाड़ीपर नहि जाएब तेसर देल गोरलगाइक रुपैया नहि लेब। ई शब्द सुनैत सभ दाय-माय समेत उपस्थित पुरुषवर्ग आ नेना-भुटकाक हृदय सेहो करुण भय गेल! प्रेमचन्दकेँ उठबैत भीम मिश्र करुण स्वरमे बजलाह- हे दाय-माय। जल्दी-जल्दी अपन काज करू। हजामकेँ अबाज दैत कहलथिन- अहाँ जल्दीसँ स्नानी चौकी धो कऽ आनू। फेर अबाज देलखिन- भोगी पाहुनकेँ जल्दीसँ खानाक व्यवस्था करू! ई शब्द सुनितहि सभ बिहारि जेना काज करए लगलाह आ लगभग २०-२५ मिनटमे सभटा काज भऽ गेल। एतबामे जयदेव मिश्र बसकेँ दरबज्जापर लगबैत सभ बरियातीकेँ बसमे बैसबैत बजलाह- भीम भैया हम बसमे सभकेँ बैसा लेलहुँ। अहाँ- मार्शल दिश इशारा करैत- बैसू। प्रेमचन्दक आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार जकाँ नोर बन्द होइके नाम नहि लैत छलनि। बड़की भौजी एक आँखिमे काजर कऽ आबथि जा दोसर आँखिमे करतीह ताधरि ओ काजर नोरक रूपमे परिवर्तित भय नीचाँ चलि आबनि। हुनकर बुझु अधा आँचर नोरमे भीजि कय गुलाबी साउथ शिल्कक साड़ी काजरमय भय गेलनि आ हुनका किछु खबरि तक नहि! एहि तरहेँ ओहिठाम हाथधरीक विध पूरा भेल आ बर आ बरियाती प्रस्थान कयलक!
ड्राइवर गाड़ीकेँ तेज चलाबयके प्रयास करैत लेकिन गामसँ तीन कि.मी. क बाद रस्ता सेहो नीक नहि। गाड़ी आगू जायके नाम नहि लैत छल जेना सभटा केँ मुहक्षी मारि देने हो। कोनो तरहेँ वर आ बरियाती गन्तव्य तक पहुँचल। ओहिठामक दृश्य तँ बहुत रमणीय छल। नीक पंडाल जे बहुत नीक सुसज्जित नीक-नीक मधुर स्वरमे मैथिली कैसेट सँ स्टीरियोक अवाज मोन मोहित कय रहल छल। ई दृश्य देखि बरियाती लोकनिकेँ विश्वास नहि भेलनि जे एहिठाम हमर बैसबाक व्यवस्था अछि! ओ सभ तुलना करए लगलाह ब्रिफकेश आ कपड़ाक जे वरक लेल गेल छल आ ओहि सजावटक। हुनका लोकनिकेँ विश्वास नहि होइत छलनि जे समान एहिठामसँ गेल अछि। तावत अवाज आबए लागल जे अपने सभ बैसल जाऊ, सरकार ठाढ़ कियैक छी? ओम्हर सँ दिलीप झाकेँ कियो अवाज देलखिन जे हजमा कतऽ गेलाह। बरियातीकेँ पएर धो कय शुद्धिकरणक विध पूरा करबाऊ! पंडालमे सभटा आधुनिक सुविधा उपलब्ध छल! किछु नवतुरिआ लोकनि पेपसी आ पेयजल तँ कियो बिगजीक समान बन्द डिब्बामे ल कय उपस्थित भेलाह! बरियाती लोकनि शहरी मजा लऽ रहल छलाह। लेकिन प्रेमचन्दक आँखिसँ नोर बन्द हो से नामे नहि लऽ रहल छल। ओ मोने-मोन अतेक दु:खी छलाह जेना शमसान घाटमे कोनो मुर्दाक अन्तिम संस्कार हो। करीब बीस मिनटक बाद गामक नवतुरिआ लड़की आ नेना भुटका पंडालक पाछूसँ अबाज देलथिन जे वरकेँ कहियन्हु कनि पागक लटकैत भागकेँ आगूसँ उठा देथिन ताकि ओ लोकनि वरकेँ देखि सकथि। किछु नवतुरिआ लड़का सभ मजाक करैत छल वरक प्रति- एतवामे आज्ञा-डाला आयल आ ई विध सेहो पूरा भेल। ओम्हर परिछनक लेल आय-माय अयलीह आ परिछनक लेल प्रेमचन्द बिदा भेलाह मुदा हुनकर डेग आगू नहि होइन। चलथि जेना महुअकक चालि हो, किछु जवान लड़की मजाकमे बाजथि जे बड़ शान्त आ सुशील छथि वर, तँ कियो किछु जे खाना खाऽ कय नहि आयल छथि। प्रेमचन्द कोनो जवाब नहि देथि जेना गामपर सभटा क्रोध छोड़ि आयल होथि। कारण छल पिताक देल वचन जे जाधरि अपने लोकनि रहबए हम किछु नहि बाजब आ तकर बाद जँ आगू ओ गलती करताह तँ हम नहि छोड़बनि हुनका सभकेँ। परिछन भेल आ विवाहक शुरुआत भेल। ओम्हर बरियाती लोकनिक स्वागतमे कोनो कमी नहि। सभ समान पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध छल। विवाहक अन्तिम विध छल सोहाग देब। सभ बरियातीगण प्रस्थान करत। एहि बीचमे दुनू पक्ष वार्ता कयलनि जे द्विरागमन संगे होय कारण भीम मिश्रकेँ कनी डर भऽ रहल छलनि, लोककेँ चिन्हबामे देरी नहि लगलनि, जे एकरा सभकेँ लड़काकेँ एकटा नीक कुरता देबाक उपाय नहि छैक आ पंडाल लगैत अछि जेना पैघ घरक काज हो। विवाह तँ भेल मुदा दू सालक बाद अगर द्विरागमन हो तँ ई किछु देत तँ अपमान वा कलहक कारण। द्विरागमनक दिन पक्का भऽ गेल एगारहम दिन। सोहागक उपरान्त श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ बजाकय एकान्तमे ५-७ टा गणमान्यक संग बुझेलखिन जे संगे द्विरागमनक हम बात कय लेलहुँ आ अहाँकेँ इच्छा अछि जे किछु नहि लेबाक अछि तँ आब ओ लड़की हमर आदमी भेलीह, पुतोहु भेलीह। हम अपन आदमीकेँ एहनठाम नहि छोड़ब कारण जे ओ हिनके रूपमे रंगि जेतीह। ई सभ बुझबैत श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ भरोसा दैत कहलथिन जे हम अपन पुतोहुकेँ अपना रंगमे रंगि लेब। अहाँ चिन्ता नहि करब आ चतुर्थी दिन गाम जरूर आयब तखन बात करब। ई शब्द कहैत ओ विदा भय गेलाह।
प्रेमचन्द आब कोबरघरमे छथि। विधकरी आ किछु घरक सदस्यगण सेहो छथि। ओ उदासीक कारण पुछलथिन। ओ किछु नहि बजलाह। करीब ५-७ बेर अलग-अलग दाय-मायक शब्द सुनिकय उत्तर देलखिन जे एखन नीन्द आबि रहल अछि, भोर भेलापर बात करब। ई बात सुनैत सभ एका-एकी घरसँ बाहर भेलीह। कोबरमे नीचाँमे बिस्तर लगाओल गेल। प्रेमचन्द सुतबाक प्रयास जरूर केलन्हि, मुदा आँखिसँ नोर पुनः आबय लगलनि। करीब २०-२५ मिनटक बाद एकटा जनानी कोबरमे प्रवेश कएलक लेकिन हुनका ऊपर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, आँखिसँ अश्रु पूर्ववत निकलैत रहलनि। ओ जनानी किछु काल धरि ठाढ़ रहल आ तावत पाछूसँ अवाज भेल जे प्रणाम करू, ठाढ़ भय की कय रहल छी। मुदा प्रेमचन्दक ऊपर कोनो असर नहि कारण ओ पहिने कहने छलाह जे हम भोर भेलापर किनकोसँ बात करब। तखने हुनका बुझना गेलनि जे हमर पएरकेँ कियो स्पर्श कय रहल अछि आ लहठीक खन-खनाहटि सेहो आयल। ई अवाज सुनैत आ पएरक स्पर्श अनुभव करैत ओ पहिनेसँ बेशी अनभिज्ञताक परिचय देलखिन आ जहिना छलाह ओहिना रहि गेलाह जेना हुनका कोनो खबरि नहि। बस पएर स्पर्शक दू-मिनट बाद ओ जनानी वापस भेल। ओ मोनमे सोचैत छल जे ई जरूर नव विवाहिता छलीह। लेकिन ई बात गुप्र राखएमे नीक जे हम सुतल छलहुँ, हमरा कोनो बातक खबरि नहि। किछु समय पश्चात् भोर भेल। भोरमे निन्न आबए लगलनि। ओ घर बन्न कए सूतय लेल चलि गेलाह। कोबरमे दू पहर बितलाक बाद गामक दाय-मायक झुण्ड तँ कखनो दू-चारि गोटेक आवाजाही छल। आब सभकेँ पएर छूबि प्रणामक सेहो प्रावधान अछि कारण जे हम मैथिल छी। साँझमे मौहकक विध पूर्ण भेल। पुनः रात्रिमे बिस्तरपर विश्रामक लेल गेलाह। लगभग दस-पन्द्रह मिनट बाद अनुभव भेलनि जे पुनः कोनो जनानी प्रवेश कए रहल अछि। ओ पुनः पएरक स्पर्श कय रहल अछि आ ओ अहिठाम बैसल अछि। प्रेमचन्दकेँ निन्न तँ नहि लागल छलन्हि मुदा निन्नक बहन्ना जरूर भेटलन्हि कारण विवाहक रात्रिमे ओ नहि सूतल छलाह। ओ दिनमे दुपहरिया बादसँ जागल छलाह। करीब दू घण्टा बैसि ओ जनानी पुनः वापस भेलीह। पुनः तेसर राति ओ जनानी पुनः अएलीह आ पूर्ववत अपन कर्ममे लिप्त भय गेलीह, यानी चरण-स्पर्श कए बैसि रहलीह। लगभग चारि-पाँच घंटा धरि ओ बैसलि रहलीह आ पएर धय निकलबाक कोनो चेष्टा नहि कय रहलि छलीह, जेना हुनकर प्रतिज्ञा हो जे आशीर्वाद कानमे जरूर सुनी। एतबेमे प्रेमचन्दकेँ एकटा शरारत सुझलनि आ ओ बहन्ना केलन्हि जेना पूरा निन्नमे होथि। ओ करोट बदलि कय पएरकेँ स्थानान्तर कय देलथिन। एकरा बाद ओ जनानी पुनः ओहिठामसँ हिलय के कोशिश नहि केलक। प्रेमचन्द तँ करोट लेलन्हि मुदा ओ जनानी पूर्ववत छलि जेना माटिक मूर्ति हो जेकरा कियो ओहिठाम बैसल अवस्थामे राखि बिसरि गेल हो। चारिम राति पुनः ओहि जनानीक प्रवेश भेल आ ओ अपन कर्तव्यमे पूर्ववत छल। प्रेमचन्द बजलाह- हमरा कोन कारणसँ परेशान कय रहल छी? अहाँ के छी? हम की कपट देने छी जे अहाँ प्रति रात्रिमे आबि हमर पएरकेँ स्पर्श करैत छी? हमर निन्नकेँ कोन कारणसँ खराब कय रहल छी? ई बात सुनिते ओ जनानी लाजसँ शरीरकेँ सकुचा लेलक। जेना लजबिज्जीक पातमे किछु स्पर्श भेलापर ओ सिकुरि जाइत अछि ठीक ओहि प्रकारसँ ओ बाला सिकुरि गेलीह। कोनो उत्तर नहि भेटलापर प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना बना कए फोंफ काटए लगलाह। किछु समय उपरान्त ओ बाला कोबरसँ निकलि गेलीह। करीब दू-तीन घंटा पश्चात् विधकरी कोबरमे प्रवेश कय अवाज देलन्हि जे मिसरजी उठथु, नहा लथु। नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ स्नान भेल। हरक पालोपर बैसाकए नवविवाहिता संग पुनः विवाह शुरू भेल- चतुर्थीक विध सभ। आजुक दिन नुनगर-चहटगर भोजन भेटलन्हि आ प्रेमचन्द घरक लेल प्रस्थान करबाक तैयारीमे छलाह तँ रिश्तामे ज्येष्ठ साढ़ू कहलन्हि जे साढ़ू भाइ, हमरो जेबाक अछि। संगे चलब। हम हुनके दू-पहियापर बैसि गाम अयलहुँ। किछु काल पश्चात् पुनः गाममे भोजन कय प्रेमचन्द एम्हर-ओम्हर निकलय के प्रयास जरूर केलन्हि, लेकिन ओ ओहिठाम सँ निकलि नहि सकलाह। पुनः साँझमे पिताजी आ ज्येष्ठ भ्रातृगणक दवाबमे सासुर घुरि कए अएलाह। रात्रि-भोजनक पश्चात् विश्रामक लेल कोबर गेलाह। करीब मध्यरात्रिमे पुनः ओहि बालाक प्रवेश भेल। ओ अपन काजमे व्यस्त छलीह। प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना कयलनि। फेर मोन पड़लनि जे गामसँ जखन आबय लगलाह तँ बड़की भौजी किछु ज्वेलरी देने छलथिन जे ई कनियाँकेँ मुँहबजना छी, दऽ देबय, तखन सुतब। जेबीसँ निकालि कय ओ बालाकेँ कहलथन, ई अहाँक समान अछि, लऽ लेब। हमरा निन्न आबि रहल अछि, सूति रहल छी।
निन्न की होयतनि, शरीर तँ लगभग चारि-पाँच दिनमे आधा भय गेल रहनि। दिमागमे सोच जे पैसि गेलनि! ने खेनाइ-पिनाइ नीक जेकाँ ने निन्न। एकदम चिरचिरा स्वाभावक भय गेल छलाह। मध्यरात्रिमे प्यास लगलन्हि तँ पानिक लोटा ताकि रहल छलाह। ओ बाला हुनका एकटा गिलासमे लगभग ठंढा भऽ गेल दूध बढ़ेलखिन। प्रेमचन्द कहलथिन जे ई दूध छी, हमरा प्यास लागल अछि, ई राखि देल जाओ। मुदा ओ नहि रखलन्हि। हुनका संग समस्या छल जे ओ घोघमे छलीह, भरि रातिक जागलि छलीह आ कहियो बाजल नहि छलीह। ई सभ कारणेँ ओ हाथमे दूधक ग्लास लऽ तपस्याक मुद्रामे ठाढ़ रहलीह। प्रेमचन्दकेँ लगेमे लोटामे राखल पानि भेटलन्हि आ ओ पानि पीबि कए पुनः सुतबाक प्रयासमे छलाह। हुनका की जिज्ञासा भेलनि जे देखियै ई बाला कतेक काल धरि ठाढ़ भय गिलाससँ भरल दूध रखैत अछि। लगभग एक घण्टा बीति गेल मुदा ओ तपस्यामे लीन छथि ई देखि प्रेमचन्दकेँ दया आबि गेलनि आ दूधक गिलास हाथसँ लय दू-चारि घोंट पीबि गिलास राखि देलन्हि। पुनः परिचय भेल। प्रेमचन्दक प्रश्नक उत्तरक समय ओ बाला थर-थर काँपि रहल छलीह, जेना कसाइकेँ देखि छागरक आँखिमे डर।
प्रेमचन्द- नाम?
-सोनी।
-कतेक पढ़ल छी?
-दसम बोर्ड फेल छी।
-सत्य या झूठ?
-ई ध्रुव सत्य अछि।
ई बात सुनिते प्रेमचन्दक आँखिमे पुनः गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित भय गेलन्हि तँ सोनी रुदन अवस्थामे बजलीह- हम अपनेसँ झूठ नहि बाजि सकैत छी। हमरा क्षमा करू। हमरा जे सजा देब से कम अछि। आ हुनको आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि।
-अपने शरीरसँ विकलांग तँ नहि छी?
-नहि।
-अपने कोनो बीमारीसँ ग्रसित तँ नहि छी?
-नहि।
-अपने जिबैत किनका लेल छी?
-अहाँ हमर गरदनि दबा दिअ तँ हमरासँ बेशी भाग्यशाली कियो दोसर नहि होएत।
-अपनेक सभसँ पैघ लक्ष्य?
-अहाँक खुशी।
-अपने कानि रहल छी, कारण?
-अहाँक कष्ट देखि बर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि।
-अहाँ जुनि कानू सोनी। एहिमे अहाँक कोनो दोष नहि अछि।
-आइ हम मरि गेल रहितहुँ तँ अहाँकेँ कष्ट नहि भेल रहैत।ई तँ ईश्वरक बनायल विधिक विधान छी! एकरा कोनो शक्ति नहि काटि सकैत छैक।
-देखू, एहि दुनियाँमे दू तरहक लोक होइत अछि- आशावादी आ पुरुषार्थवादी। हम आशावादी पुरुष नहि छी, पुरुषार्थवादी छी आ आशावादीसँ घृणा करैत छी। कारण आशावादी पुरुष या औरत मेहनती नहि होइत अछि। अपने कोन तरहक छी?
-हम धार्मिक प्रवृत्तिक छी आर धर्ममे बहुत विश्वास अछि, ताहि हेतु आशावादी छी!
ई सुनि प्रेमचन्दक मोनमे आर बेशी तकलीफ बढ़ि गेलन्हि। एहि तरहेँ चतुर्थीक राति दुनू नव-विवाहित जोड़ी कटलन्हि। प्रेमचन्द फेर अपन गाम घुरि गेलाह।
साँझ भेल, भौजीसभकेँ भेलन्हि जे प्रेमचन्द पुनः गाम जएताह। मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखि पुछल गेलन्हि तँ उत्तर आएल जे आब द्विरागमनक लेल हम उपस्थित होएब सासुरमे, नहि तँ आब दिल्ली घुरि जाएब। अन्यथा हमर पीड़ाकेँ बढ़ाओल नहि गेल जाऊ। हमरा आब जीवित रहय के कोनो इच्छा नहि अछि। कोनो मनोरथ नहि अछि। हमर कोनो भविष्य नहि अछि!
द्विरागमन भेल, कनियाँ सासुर अयलीह। भड़फोरीक पश्चात् प्रेमचन्द दिल्ली उपस्थित भेलाह। अपन कम्पनीक काम-काज सम्हारलथि। काजपर तँ जाथि मुदा अन्तरात्मामे कतेक प्रश्न अबन्हि। कारण जे जीबाक आशाक किरण लगभग अन्तिम चरणमे पहुँचि गेल छलन्हि। आब कोनो मनोरथ नहि, नहिए जिनगीक कोनो लक्ष्य बाँचि गेल छलन्हि। आ एकर कारण मैथिल समाजक किछु महानुभावक विचार आ कृत्य अछि, संगहि मैथिल समाजक किछु प्रावधान सेहो जिम्मेदार अछि। एहि प्रकारेँ नहि जानि कतेक मैथिल नव-युवक-युवतीकेँ अपन करुण जिनगी जीबाक लेल मजबूर होमए पड़ैत अछि।
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

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