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विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)-part-i

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विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७)

एहि अंकमे विशेष:-
रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॉ. गंगेश गुंजन मृत्युपूर्व हुनकासँ साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे।
एहि अंकमे अछि:-
१.संपादकीय संदेश
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता – कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका – विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा “रामरंग” सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
३.पद्य
३.१.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (नवम खेप)
३.२. गजेन्द्र ठाकुर- 15 टा पद्य
३.३. सतीश चन्द्र झा- दू टा कविता
३.४.ज्योति- पनभरनी
३.५. पंकज पराशर – सत्तनजीब
३.६. मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण

४. मिथिला कला-संगीत- हृदयनारायण झा
५-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी
६-लेखन – पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]
७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)-
The Comet-English translation of Gajendra Thakur’s Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( तिरहुता आ देवनागरी दुनू लिपिमे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Tirhuta and Devanagari versions both ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे
Videha e journal’s all old issues in Tirhuta and Devanagari versions

१.संपादकीय

मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा गणतंत्र दिवसक अवसरपर कविता महोत्सवक आयोजन कएल गेल। मैथिलीमे रमण कुमार सिंह, सारंग कुमार, रवीन्द्र लाल दास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कामिनी कामायनी आ गंगेश गुंजन जीक काव्य-पाठ भेल। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा मैथिलीमे विद्यापति सम्मान आ भोजपुरीमे भिखारी ठाकुर सम्मान एक-एकटा, जे प्रत्येक 51-51 हजार टाकाक सम्मान राशिक होएत, साहित्यकार/ कलाकार/ संस्कृतिकर्मीकेँ देल जाएत। अकादमी द्वारा मैथिली आ भोजपुरीमे अलग-अलग पत्रिकाक सेहो प्रकाशन होएत जाहिमे कथा, कविता, लेख, निबन्ध, समीक्षा आ सर्जनात्मक टिप्पणी प्रकाशित कएल जाएत।
मैलोरंग सेमीनारमे सुभाषचन्द्र यादवजी फील्डवर्कक आधारपर लोककथा लिखबाक आग्रह कएने छलाह कारण अपन दादी-मैयाँसँ सुनल कथा क्षेत्रमे पसरल कथाक विभिन्न स्वरूपकेँ ग्रहण करबामे सक्षम नहि होइत अछि। विदेह द्वारा एहि सम्बन्धमे काज शुरू भ’ गेल अछि आ शीघ्र एकर परिणाम ई-पत्रिकामे देखबामे आएत।
संगहि “विदेह” केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनवरी २००८) ७३ देशक ७११ ठामसँ १,४६,१६१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे।
गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in
२.संदेश
१.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल “विदेह” ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।
२.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह|
३.श्री रामाश्रय झा “रामरंग”(आब स्वर्गीय)- “अपना” मिथिलासँ संबंधित…विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।…शेष सभ कुशल अछि।
४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह “मौन”- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका “विदेह” क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि “विदेह”क सफलताक शुभकामना।
७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- “विदेह” पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।
१२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- “विदेह” ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी।
१३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।
१४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका “विदेह” प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ’ गेल।
(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।
विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
२.गद्य
२.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता – कुमार मनोज कश्यप (कथा)
२.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ)
२.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ)
२.४. मैथिली भाषाक साहित्यी- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)
२.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका – विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3
२.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ)
२.७. डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या
२.८. रामाश्रय झा “रामरंग” सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार
२.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार
१. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता – कुमार मनोज कश्यप
चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द
सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान।
प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित।
भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति।

कबाछु
ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय ।
‘शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक । बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक । आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक ।
चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक । एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै । ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै ।
ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल । पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत । लेकिन नहि । ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै— ‘शी-इ-इ !
आब अनठेनाइ असंभव छलै । ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै । चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक ।
बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्य क्ति सभ बैसल रहैक । एहन अवस्थाआ में चम्पीचवलाक धृष्टपता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक ।
‘की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै ।
चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै । देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक । ‘बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै ।
ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—’एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?’
चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल । ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार । चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्लीब बुझेलै ।
‘देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक ।
‘हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक ।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै ।
चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक । ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय । लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक ।
ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो । ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक ।
लघुकथा-
कुमार मनोज कश्यप ।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

विवसता

अपन जन्मभूमि के प््राति मोह ककरा नहिं होईत छैक? जाहि धरा पर पहिल बेर पायर राखल, जकर धूरा-माटि मे खेल-खेल कऽ समर्थ भेलंहु, तकरा प््राति लगाव तऽ स्वभाविके आछ। अपन राज्यक सीमा मे प््रावेश कईयो कऽ गाम नहिं जाई से ने हमर मोन मानत आ ने गाम-परिवारक लोक। अहु बेर सरकारी यात्रा सँ मुस्किल सँ पलखति पाबि रातियो भरि लेल गाम जेबाक विचार कय बिदा भऽ गेलंहु बस धरबाक लेल। भोरे आपसे एबाक छल, तैं कोनो समान लऽ जेबाक दरकारे नहिं।

सभ गामक चौक पर अहाँ के ओहन रिक्सावला भेट जायत जे चौक सँ बस लग-पासक गामक सवारी उठबैत आछ – आर कतहुँ नहिं जायत ओ – कतबो बेगरता होऊक लोक कें। चौक पर बस रुकिते ओ सभ रिक्सा लऽ कऽ तेना दौड़ैत आछ सवारी लेवाक हेतु जेना कोनो तिर्थ-स्थानक पण्डा। जकरा सवरी भेटि गेलैक से विजयी आ आन सभ हारल – मुदा पेᆬर सँ आगला प््रातियोगिता लेल डाँड़ बन्हने।

कैकटा रिक्सावला हमरो पाछु दौड़ल, मुदा आई हमरा पायरे जेबाक मोन भऽ रहल छल, तैं मना कऽ देलियई। समान कोनो छलैहे नहिं आ साँझक सोहाओन मौसम, कियैक नहिं आनंद लेल जाय एकर। सभ सँ पैघ बात जे गामक एहि चिर-परिचित धुरियायल रस्ता पर चलि कऽ एक बेर पेᆬर हम अपन बितल दिन मोन पाड़ऽ चाहि रहल छलंहु। आततक स्मरण बड़ मनभावन भेल करैत छैक।

सड़क पार कय हम चलऽ लगलंहु गामक ओहि रस्ता पर जे कहियो बड़ आत्मीय छल हमर। किछु आभास भेला पर पाछाँ तकलंहु – एकटा रिक्सवला निरीह भावें रिक्सा लऽ कऽ चल अबैत हमरा पाछाँ। लऽग आबि बाजल -” हाकीम! तऽ नहिंये करबै रिक्सा? जे मोन हुअय से दऽ देब खुशी सँ, मुदा बैस जाऊ हमर रिक्सा पर।” हम कहलियै – ”बेकार मे हमरा पाछाँ नहिं पड़, आई हमरा पायरे जेबाक ईच्छा भऽ रहल आछ । घुरि जो तों।” रिक्सावला के आँखि मरल माँछ जेना थिर भऽ गेलै हमरा उपर। कल्पैत स्वर मे बाजल- ”ऐं यौ हाकिम! अंहु सन हाकिम-हुक्काम जँ पयरे चलऽ लगतै, तऽ हमरा सभ गरीब-गुरबा अपन परिवारक पेट कोना पोसतै?”

हमर पैर एकाएक थमकि गेल। बिना किछु बजने हम बैसि गेलंहु ओकर रिक्सा पर।

वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि।
बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल

“ की होइतैक ? ओतयसँ तान्त्रिक धड़फड़ाइत सोझेँ राजदरबार गेलाह, राजाकेँ सम्पूणर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड़ भेटतैक की से सोचि उ पाँच हजार जन छौ महीनातक एकरा खनिते रहि गेलैक । बहुतो हाड़खोर भेटलैक । सभकेँ गङ्गाजीमे अनुष्ठानपूर्वक प्रवाहित कयल गेल — जेना फुलाक बिर्सजन होइत छैक । तहियासँ ई खधिया उत्खननक कारणेँ एहन बड़का पोखरिक रुपमे परिणत भऽ गेल । किएक तऽ एहिमे बहुतो हाड़खोर भेटल रहैक तैं एकर नाम बादमे हड़ाहा पोखरि भऽ गलैक । ”
अत्यन्त उत्क ण्ठासँ हमर स्वर सुखा गेल छल — “ तखन ? ”
मोदिआइन बाजलि — “ इहए छैक अहि पोखरिक कथा । आब अहाँ खा पी कऽ सुतू । थाकल छी । ”
थाकल तऽ हम ठीके रही । भरि दिनक शहर प्रदक्षिणाक कारणेँ शरीर गलिकय क्लान्त भऽ गेल छल । थकानक कारणेँ बीच–बीचमे आँखि सेहो निन्नसँ मुना जाइत छल, मुदा मलाहिनक कथे एहन छलैक जे बेर–बेर उताहुल आ’ उत्तेजित कऽ दैत छल । ततबेमे सन्याेहो समाप्त कऽ मिसरजी दोकानमे प्रवेश कयलन्हि आ’ मोदिआइनकेँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन, बौआकेँ बढ़ियाँसँ खुआ–पिआकय सुता देबन्हि । हम ओम्ह‍रे खा लेब । राति अबेर कऽ फिरब । दू स्टेयशन आगाँधरि जएबाक अछि । गाड़ी सेहो आबक समय भऽ गेल छैक । तैं हम आब जाइत छी । ”
हम दौड़िकय हुनका लग पहुँच गेलहुँ आ’ जीद्द करय लगलहुँ — “ हमहुँ जायब । ”
मिसरजी एहिबेर कहुना तैयार नहि भेलाह । मोदिआइन सेहो समझओलकि — “ कहाँ जायब थाकल–ठेहिआयल शरीर लऽ कऽ रातिमे । चारि–पाँच घण्टाभमे मिसरजी चलिये अओताह । चलू, खा कऽ सुतू । भाँटाक तरुआ बना दैत छी, दूध आ’ भात खा लियऽ । ”
मिसरजी स्टेरशनदिसि बिदा भऽ गेलाह । मोदिआइन चुल्हिमे बैसिकय भाँटा तड़य लागलि । भितरका कोठरीमे मोदी बैसल खोंखि रहल छल । हम कनेक काल एकसरे चौकीपर बैसल अन्हामरमे डूबल दड़िभङ्गा शहरकेँ देखैत रहलहुँ । बीच–बीचमे सोझे मलाहिन ठाढ़ भऽ जाइत छलि । हम सोचय लगलहुँ अखन रातुक एहि निस्तब्ध अन्हा रमे जे पोखरि हेरायल विलीन अछि तकरे एक कातमे ओ बैसति छलि हएत अही दोकानक घराड़ी लग कतहु उ हम चौकीपर बहुत कालधरि नहि बैसि सकलहुँ । ससरिकय चुल्हिदिसि मोदिआइनलग पहुँचि गेलहुँ । मोदिआइन बाजलि — “ बौआ, भूख लागि गेल ? बैसू उ आब लगचिया गेलैक, कनेक्के देरी अछि । तुरत्ते सभ किछु तैयार भऽ जायत । ”
हम कहलिऐक — “ मोदिआइन, महाभारत कालक लोक कहुँ एतेक दिन तक जिअत ? साँचे रहैक ओ मलाहिन ?”
ओ बाजलि — “ किया नहि जीअत ? प्रेतात्माोक रुपमे जुगजुगान्तरतक जिबैत अछि लोक । अपन प्रियजनसभक लगमे रहय चाहैत अछि । कोनो ने कोनो पिआस, कोनो ने कोनो पूरा होमयसँ बाँकी कामना भीतरी आकांक्षा ओकरासभकेँ अमर जकाँ मृत्यु्लोकमे दृश्य–अदृश्य राखि घुमा रहल रहैत छैक । ”
हम धड़फड़ाकय पुछि बैसलिऐक — “ तऽ अखनो होयतैक ओ मौगी ?”
मोदिआइन तरकारी नीचा उतारैत बाजलि — “ होयतैक उ लिय, अहाँ खाऊ”
ओ उठिकय पीढ़ी अनलकि आ’ हमरा बैसयलेल देलकि । एकदम नया स्थान आ’ परिवेशमे अपरिचितसनक महिलाद्वारा देल गेल दूध, भात, गुड़ आ’ भाँटाक तरुआ खाइत हमरा किछु कोनादन आ’ असहज जकाँ लागल । असगरपन अनुभव भेल । घर मोन पड़ि गेल । माय–बाबु, भाय–बहिन सभ केओ याद आबि गेलथि । अखनतक तऽ सभ केओ खा कऽ सुति रहल होयताह । नहि जानि, मिसरजी कखन घुरताह ? आ’ कत्तहु नहि अयलाह तखन ? हमर मोन घबड़ाय लागल । हमरा सुतय लेल एकगोट कम्म लपर नील रङ्गक चद्दरि मोदिआइन ओछा देने छलि । एकटा मैल तकिया ओहिपर रखैति ओ चौकीये परसँ हमरादिसि तकलकि आ’ बाजलि — “ बौआ, खाउ ने उ किया ने खाइ छी ? जल्दी–जल्दी खाउ । भरिपेट खायब । याऽ देखू, ओछाओन ओछा देलहुँ अछि । अहाँक सुतयलेल ।”
हम जल्दीये खा कऽ उठि गेलहुँ आ’ हाथ धो कऽ ओछाओनपर पड़ि रहलहुँ । मोदिआइन भाडा़–वर्त्तन माँजि आङ्गनमे गोलियाकय राखि देलकि । तकराबाद ओ एकगोट डिबिया लेसिकय चुल्हि लग राखि देलकि आ’ लालटेनकेँ मिझा देलकि । आब ओहिठाम चुल्हि लगक एकगोट धुआँ उगलैत लाल धधड़ाबला डिबियाक क्षीण प्रकाश मात्रहिं रहैक । बाहर निर्जन निस्तब्ध रात्रि आ’ असंख्य कीरासभक तीख महींन आवाज व्या प्तब छलैक । मोेदिआइन एकबेर कोठरीमे चारुभर घुमिकय देखलकि । शायद सभ किछु ओकरा ठीकेठाक लगलैक । ओ बाजलि — “ हँ, तऽ आब सुतू । डर तऽ नहि लागत ने, बौआ ?”
हम भीतरसँ साहस बटोरिकय कहुना मुड़ी हिलबैत कहलिऐक — “ नहि, हमरा डर नहि लागत “
जाइत–जाइत ओ फेर बाजलि — “ हम सटले भीतुरका कोठरीमे छी । जरुरी बुझायत तऽ मोदिआइन कहि कऽ सोर करब । ठीक छ़ै ?”
ओकरा जाइते जेना राति आओर निस्तब्ध भऽ गेल होइक ।
डिबियाक लाल शिखा कखनो–कखनो हिलि जाइक तऽ कोठरीमे सभ किछु — सम्पूीर्ण छाँहसभ सेहो हिलय लगैक । भीतपरक छाँहसभ, ढ़कियाक, मोटरीक, लाठीक, बोराक छाँहसभ कखनो–कखनो दहिन–बाम करैक, हिलोरि मारिकय झुलैक तऽ कखनो एक्के ठाम थर्‌थराय लगैक । डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक । खाली धुआँक मोटगर रासि चारुदिसि चढ़ैत उठैत रहैक । धीरे–धीरे हमरा मोनमे डरक सञ्चाबर होमय लागल । एना एकसर हम कहियो नहि सुतल रही । मलाहिनक खिस्सा ओहिना स्पैष्ट– देखाय लागल । हमर हृदय डरसँ काँपय लागल । देहक सभ रोइयाँ काँट जकाँ ठाढ़ भऽ गेल । तखने लागल जेना बाहरक निस्तब्धता भङ्ग भऽ गेलैक आ’ पानिमे केओ छपाकसँ कुदलैक । हमरा बड्ड डर भऽ गेल आ’ हम जोड़सँ चिचिअयलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ उ”
मोदिआइन भीतरेसँ पुछलकि — “ की भेल, बौआऽऽऽ ़ “
हम कहलिऐक — “ हड़ाहा पोखरिमे केओ छपाकसँ कुदलैक अछि । ”
ओ हमरा अन्ठाेकय सुतक लेल कहैति बाजलि — “ सुतू, सुतू । पानिमे माछ कुदलैक अछि “
मोदी एकभरसँ खोंखि रहल छल । बुझाइत छलैक जेना ओ अखने मरिये जयतैक । मोदिआइन नहि जानि कथी बाजलि आ’ मोदीक छातीपर मालिस करय लागलि । मोदी घेघिआइत बजलैक — “ ओह उ बाप रे उ एहिसँ तऽ मरियो जइतहुँ ऽऽऽ । ”
मोदिआइन कनेक पिताइत कहलकैकि — “ मोदी उ रातिमे ई की अमङ्गल बात बजैत छह । मालिससँ तोरा दम फुुलनाई कम भऽ जयतह । कहुना सुति रहह । ”
कनेक कालक बाद भीतर कोठरीक हलचल शान्त भऽ गेलैक । अन्ततः ओसभ शायद सुति रहल छल । मोदीक साँस भारी आ’ घेघिआइत चलि रहल छलैक । रातुक भयावह निस्तब्धता, डिबियाक प्रकाशक छोट घेराक बाहर चारुतरफकेर अन्हाआर गुजगुज परिवेश, निशाचरी कीरासभक तीख आ’ महींन ध्वानिक गुञ्जरन तथा एम्हेर–ओम्हरर हिलैत, डोलैत आ’ थर–थर करैत छाँहसभ । हम फेर भयभीत होमय लगलहुँ । मस्तिष्कमे बेरि–बेरि उत्पन्न होइत मलाहिनक प्रेतात्माजक कल्प‍नाक चित्रसँ हमर दम फुलय लागल । दिनभरिक बौअइनीक कारणेँ शरीर ओहिना थाकल आ’ मलीन छल, आँखि भारी छल, झपलाइत छलहुँ मुदा डरसँ निन्न भऽ नहि रहल छल । आँखि लगिते कनेक सपना जकाँ देखाइत छल आ’ फेर डरसँ िन्‍ान्न टुटि जाइत छल । जागलोमे आ’ सपनोमे एकहि रङ्गक डराओन आकारसभ आगाँ ठाढ भऽ जाइत छल । हम फेर एकबेर जोड़सँ डेराकऽ चिचियाऽ उठलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ “
मोदिआइन ‘ की भेल ? की भेल ? ’ कहैत दौड़लि आयलि । मोदी खोंखिते रहय । मोदिआइन बाजलि — “ बौआकेँ डर लागि गेलन्हि । बेचारा उ अच्छाे कोनो बात नहि, हम अहीं लग बैसैति छी । ”
मोदिआइनक हमरालग अबिते हमर डर आब पूरे हेरा गेल छल । निन्न धीरे–धीरे जाँतय लागल छल कि मोदिआइन पुछलकि — “ बौआ, खिस्सा सुनक मोन करैत अछि ? सुनब तऽ सुनाऊ”
हम हुलसिकऽ कहलिऐक — “ सुनाउ ने, मोदिआइन “
मोदिआइन कथा सुनाबय लागलि । जेना कि ओकर आदत रहैक ओ एक्के सुरमे बजैति चलि जाइति छलि । हमरा बुझाय लागल जेना दूरसँ ककरो स्वर लगातार हमर कानमे पड़ि रहल होय । डर हेराऽ गेल छल तैं आब घरक भीतपरक हिलैत–डोलैत छाँहसभ खेल आ’ कौतुक जकाँ लागय लागल छल । दिनभरिक परिश्रम रग–रगमे निन्नक सञ्चायर कऽ रहल छल । हडा़हामे बीच–बीचमे छप–छप सेहोे होइत रहलैक जे हमरा दूरसँ अबैत पृष्ठपभूमिक आवाज जकाँ लगैत रहल । स्टे‍शनपरक भिनसुरका कोलाहल, हुलिमालिक दृश्य, लालदरबार, हथिसार, आ’ शहरक अन्यान्य दृश्यसभ हमर थाकल मस्तिष्कसँ रङ्ग जकाँ धोआइत मलीन्‍ा होबय लागल । बीच–बीचमे हम औंघाइयो जाइत छलहुँ । सपनामे चित्रसभ एकटापर दोसर–तेसर अबैत पड़ैत देखाय लगैत छल । आ’ अही बीचमे मोदिआइन निरन्तर अपन सुरमे हमरा खिस्सा सुना रहलि छलि । ओकर स्वरमे सम्मो–हन छलैक । बिहारिक पश्चात् जेना बर्षाक बुन्नसभ खसैत रमणगर लगैत रहैत छैक ठीक तहिना हमर कानमे ओकर कोमल महीन आवाज टप्टप् कऽ पड़ि रहल छलैक । ओ कहैति गेलि — “ बहुत पहिनेक गप्पत थिक । बहुतो पहिनेक ऽऽ भारतबर्षमे हस्तिनापुर नामक एकगोट बड़ीटा राज्यक राजधानी रहैक । ओतक राजा रहथि धृतराष्ट्रग — बूढ आ’ आन्हर उ आन्हर रहथि तैं गद्दीपर नहि बैसि सकलाह । परिणामस्वरुप राजा बनक प्र्रश्नकपर हुनक बेटा आ’ भातिजसभमे कलह मचि गेलन्हि । धृतराष्ट्ररक रानी गान्धाहरी अत्यन्त पतिव्रता रहथिन्ह । जहिना हुनक पति अपन आँखिसँ विश्वपक सुन्द‍र रचना देखयमे असमर्थ रहथिन्ह तहिना ओहो अपन आँखिक उपयोग नहिये करब उचित बुझलन्हि आ’ तैं सदैवक हेतु अपनोेेे आँखिमे पट्टी बान्हि लेलन्हि । हुनका एक सय बेटा भेलन्हि जे बादमे धृतराष्ट्र क पट्टी कौरव कहायल । जेठकाक नाम रहन्हि दुर्योधन । धृतराष्ट्रआक पाँचटा भातिज । सभसँ जेठ रहथिन्ह युधिष्ठिनर । ई पाँचो भाईँ पाण्डटव कहयलाह । बेटा आ’ भतिजामे राजक लेल कलह बहुत बढ़ि गेलाक कारणेँ धृतराष्ट्र् बूढ़–पुरानसभसँ सरसलाह कऽ भतिजासभक हेतु अलगे राज छुटियाकऽ दोसर राजधानीक बना देलखिन्ह, इन्द्रप्रस्थण “
“ हस्तिनापुरसँ उत्तर–पूूर्व खाण्डहवप्रस्थ् जङ्गलकेँ फाँड़िकऽ इन्द्रप्रस्थ–क स्थापना कयल गेल छल । ओहिसँ पहिने खाण्ड वप्रस्थ क जङ्गलमे विभिन्न जातिसभ अपन–अपन वस्तीणमे निवास करैत छल । ओहीमे बहुतो ठाम आर्य परिवारसभक वस्तीुसभ सेहो रहैक । इन्द्रप्रस्थनक स्थापनामे ई सभ वस्तीतसभ उजड़ि गेल । जङ्गलक आदिवासीसभ तऽ उत्तरभर भीतर आओर घनगर जङ्गलमे चलि गेल मुदा नया नगरक स्थापनासँ खेती–पाती कऽ कऽ बसल परिवारसभ बहुत कठिन परिस्थितिमे फँसि गेल । घरदुआर उजड़ि गेलैक । उजड़ल बेघर परिवारसभमे एकगोट क्षत्रिय परिवार सेहो रहैक । ओहि परिवारमे एकगोट बालिका छलि जकर नाम जकर नाम जकर नाम अच्छाप, राखि लियऽ रहैक नारी उ नारी माने बुझैत छिऐक , बौआ ?”
“ हम किया ने बुझबैक, नारीक अर्थ छिऐक — मौगी “
मोदिआइन बाजलि — “ हँऽऽ , नारी माने हमरे सनक मौगी उ बौआ, अहाँ तऽ बहुतो बुझैत जनैत छिऐक “
बड्ड संतोष भेल । मोदिआइनक प्रशंसा हमरा प्रफुल्लिित कऽ देलक । आँखि निन्नसँ भारी भऽ गेल छल । घरोमे मायसभ सुतय कालमे एहने खिस्सासभ कहैत रहय आ’ सुनिते–सुनिते हम निन्न पड़ि जाइत रही । अखनो हमरा घरे जकाँ नीक लागि रहल छल । जेना हम घरेमे खिस्सा सुनि रहल होइ । साँचे कही तऽ हमरा लागल जेना इएह कथा हमर माय हमरा कहियो सुनोने रहय । हमरामे आऽलादक निसा चढ़ैत चलि गेल, एकगोट अवर्णनीय आनन्दहमे सन्हियाइत चलि गेलहुँ । हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ, खाली मोदिआइनक कोमल कण्ठेचटाक आवाज आ’ ओहि आवाजद्वारा चित्रित भऽ रहल कथाक दृश्यसभ मात्रहिं हमर चेतनामे बाँकी रहि गेल ।
“ नारी तहिया एकगोट छोटि नग्निआका बालिका छलि । इन्द्रप्रस्थ केँ राजधानी बनाबयलेल असंख्यम लोकसभ ओतय आबय लगलैक । भीड़ बढ़य लगलैक । रातिदिन एक कऽ काज आगाँ बढ़ैत गेलैक । धीरे–धीरे नम्हकर–नम्हेर विशाल भवनसभ ठाढ़ होमय लागल । फुलवारी–वाटिकासभ लगाओल सजाओल गेल । मूर्त्तिकारसभ सुन्द्र आ’ नीक–नीक आकर्षक मूर्त्तिसभ गढ़ि–गढ़ि कऽ विभिन्न स्थानसभपर ठाढ़ कयलन्हि । इन्द्रप्रस्थगक शोभा आ’ सुन्दररता इन्द्रपुरीकेँ सेहो मात करय लागल । नव निर्मित नगरमे नव–नव वस्त्रापभूषणधारीसभ आबिकय रहय लगलाह । गान–बाजानसँ नगर बजार रमणीय भऽ गेल । बहुतो हाथी, घोड़ा, सजल–बजल बड़का–बड़का रथसभ आयल । अस्त्रय–शस्र्ाजसँ सुसज्जित वीर रक्षकीसभ सेहो आयलि । बालिका नारी विस्मिसत भए आँखि फारि–फारिकय एहि सभ विराट परिवर्त्तनकेँ निहारति रहलि । सड़कपर नाङ्गटि कुदैति, अपनेसनक अन्य बाल–बालिकासभक हुलिमे एतएसँ ओतय दौड़ैति नयाँ–नयाँ चमत्कािरिक दृश्यसभक ओ अवलोकन करैति गिेल । मुदा ओकर माय–बापक स्थिति किछु भिन्न रहैक । ओसभ अत्यन्त दुखित रहथि । घर–घराड़ी सभ किछुक हरण भऽ गेल छलन्हि । नगर स्थापनाक क्रममे बहुतो लोक जन–मजूरीमे लागि गेल रहय आ’ कतेक दोसर पेशाकेँ अङ्गीकार कऽ नेने रहय । बहुतो महिलासभ गणिका वृतिमे चलि गेलि छलि ़ पेट तऽ कहुना येनकेन प्रकारेण पोसा जाइत रहैक मुदा अपन स्वतन्त्रन खेती–पातीमे लागि आयल ओतक पूर्वनिवासी खेतिहर वृतिबलासभ अत्यन्त दुखित आ’ क्षुब्ध छल । तथापि नियतिकेँ स्वी‍कारब छोड़ि दोसर कोनो उपाय बाँकी नहि रहैक ।
एक दिन अभूतपूर्व शोभा–सिन्दूधरक आयोजन भेलैक आ’ पाण्डडवसभ नगरमे प्रवेश कयलथि । ओही दिन ओसभ गृहप्रवेश सेहो कयलन्हि उ बड्ड हुलि, बड्ड लोक — बड्ड विशाल आयोजन रहैक उ अनेकन् यज्ञ भेल, ब्राऽमण आ’ पुरोहितसभ उच्चह कण्ठरसँ वेदक पाठ कयलन्हि ़ अस्त्र –शस्त्र क प्रदर्शन भेलैक । उपस्थित सैनिक आ’ नागरिकलोकनि पाडण्वओसभक जयजयकार कयलखिन्ह । यज्ञ–धूमसँ आच्छा्दित आकाश बड़ी कालधरि जयध्वतनिसँ प्रकम्पिउत होइत रहल । बालिका नारी अत्यन्त कौतुकमय भऽ उत्सुजकतासँ एहि सम्पूकर्ण आयोजन आ’ प्रदर्शनक अवलोकन कएलकि । ओ देखलकि जे पाण्डथवसभ अत्यन्त सुन्दनर रहथि आ’ द्रौपदीक रुपक वर्णन तऽ सम्भूवे नहि छल । ओहुना हरेक घरमे पहिनहिंसँ एकर चर्चा रहैक । बालिका नारी छलि तऽ बड्ड छोटि मुदा तैयो ओ भाँपि गेलि जे पाँच प्रतापी युद्ध–कुशल पुरुष–रत्नँसभक सिम्ा्ब लित प्रेमपात्री हएबाक कारणेँ द्रौेपदीक नाक, भृकुटि आ’ ग्रीवा गर्वसँ चढ़लि छलैक ।
पाण्ड वसभ इन्द्रप्रस्थदसँ दिनानुदिन अपन विस्ताएर होइत बढ़ैत राज्यपर शासन करय लगलाह । इन्द्रप्रस्था धीरे–धीरे एकगोट राजधानीक अपेक्षित गति धऽ लेलक । ओतक नागरिकसभ अपन–अपन वृति आ’ काजमे लागि गेल । नहुँए–नहुँए नगरक नूतनता समाप्त‍ होमय लगलैक । विस्थापित भऽ गेल परिवारसभ सेहो एक–एक कऽ अपनाकेँ स्थापित करैत स्थायी नागरिकक रुपमे परिणत होइत गेल । ओहोसभ क्रमशः पूर्ण रुपेण नागरिकताक नव स्वरुपकेँ ग्रहण करय लागल छल । नारी बालिकासँ नम्हनर होइत गेलि । डाँड़मे डराडोरि लऽ कऽ वस्त्र खण्डि बान्हय लागलि ।
एम्होर हस्तिनापुरक दुयोर्धनक दरबार आ’ इन्द्रप्र्रस्थिक युधिष्ठि रक दरबारमे भीतरे–भीतर नित्यप्रति प्रतिस्प–र्धा बढ़िते चलि गेलैक । दुयोर्धनकेँ पाण्ड्वक उन्नति असह्य होमय लगलन्हि ़ ओम्ह्र पाण्डथव सेहो प्रतिरक्षाक तैयारीमे जुटि गेलाह । दुनूूमे युद्धे तऽ शुरु नहि भऽ गेलैक मुदा सामरिक तैयारीसभ होमय लागल ़ हस्तिनापुर आ’ इन्द्रप्रस्थडक बीचमे एकप्रकारसँ शीतयुद्धक वातावरण बनि गेलैक । देखाबयलेल उपरसँ दुनू औपचारिकतामे नीके सम्बहन्धन रखने रहथि । दुनू परिवार सामाजिक एवम् धार्मिक अनुष्ठानसभ पारिवारिक रुपमे सम्मिपलित भऽ कऽ सम्प न्न करथि मुदा तरेतर दिनानुदिन बैर–भाव बढ़िते गेलन्हि । दुनू दिसक बूढ़–पुरानसभ एकरा शान्त करक अनेकन् प्रयत्नल कयलथि मुदा सफल केओ नहि भऽ सकलाह ।

(अगिला अंकमे)
उपन्यास- चमेली रानी
जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर।
चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी
पुजारीजीक जबाब सुनि दरोगा अइँठल मोछ केँ औरो अइँठलक, फेर अपनासंग आयल सिपाही केँ ताकीत केलक–”कृपलबा! तुम सावधानी से इन दो लोगन पर नजर रख। हम अंदर चेकीन करता हूँ।”
दरोगा मंदिरक पाछाँ बनल खोपरी दिस बिदा भेल। कृपलबा नामक सिपाही ससरि क’ पुजारीजी लग आयल। पुजारीजीक आगाँ थार मे राखल पेड़ा पर ओकर आँखि जेना गरि गेलैक। ओ ओहीठाम बैसि रहल, बाजल–”ई सरौं, अपनो मरिहें औरो हमरो जान खतम करिहें। पुजारी बाबा, थार मे की बा? बड़ा गम गम करेला।”
पुजारीजी स्वामी दिस ताकैत छलाह। दुनू केँ आँखिक भाषा मे गप भ’ रहल छल। सिपाहीक प्रश्न सुनि पुजारीजी हड़बड़ाइत पटिया पर बैसि गेलाह आ कहलनि–”परसाद थिकै सिपाहीजी। भोग लगाउ।”
पुजारी जी दूटा पेड़ा कृपलबा नामक सिपाहीक हाथ मे राखि देलथिन आ कान केँ दरोगाक गतिविधि पर पथने चुप भ’ रहलाह। हुनक माथ पर चिन्ताक सिकुरन स्पष्ट झलकै छल।
दरोगा पहिले दुनू खोपड़ी केँ बाहर घुमि जाँच-पड़ताल केलक। मूड़ि नमरा क’ चारू कातक हाव-भाव के निहारलक। फेर आयल ओहि कोठलीक दरबजा लग जाहि मे काके आ मैना छलीह।
दरोगा सटायल केबाड़ केँ भराम दए खोलि भीतर ढुकि गेल। अन्दर काके आ मैना कोन अवस्था मे छलीह, दरोगा की देखलक से दरोगा जानए। मुदा, दरोगा चिचियाति आ बफारि कटैत बाहर आयल आओर पलटनिया दैत पुजारीजी लग पहुँच गेल। हँफैत बाजल–”हे पुजारी बाबा, ई मंदिर बानु? ई भगवान का फ्लेट बानु? अन्दर कोन खेल होत बा। हम जे देखली, राम राम, आब अहाँ से का कहीं। हमार त’ नजरिए झौआ गेल बा।”
गर्मी आ उमस पराकाष्ठा पर छलै। दरोगाक शरीर मोट आ भारी-भरकम। ओ काके आ मैनाबला कोठली सँ भगैत आयल छल। ओकर सम्पूर्ण देह पसीना सँ लथपथ छलै।
पुजारीजी फेर हाथ जोड़ैत बजला–”सरकार, कोठली मे हमर बालक आ हुनकर कनिआँ। हमर बालक बिआहो ने करैत छल। कतेक परतारने त’ अहि बेर शुद्धक समय मे दिल्ली सँ एलाह। हुनकर बिआहक त’ दसो दिन ने भेलनि। कहू त’ अहाँ की कर’ भीतर गेलौं? छिया, छिया।”
–”अरे, हमनी का करब? हमनी के ड~यूटी बड़ा बेढंगा बा।” कहैत दरोगाबैसक उपक्रम कर’ लागल। ओ पहिने एक हाथ रोपलनि, फेर दोसर हाथ रोपि, देहक बैलेन्स ठीक केलनि। तखन लूद द’ बैसि गेलाह।
पुजारीजी अन्दाज केलनि जे दरोगाक वजन तीन, साढ़े तीन मन सँ कम नहि हेतैक।
कृपलबा दुनू पेड़ा केँ मुँह मे ठुसि नेने छल। पेड़ाक साइज बेस पैघ छलै। ओ कहुना क’ पेड़ा घोंटबाक प्रयास क’ रहल छल।
दरोगा पटिया पर बसैत देरी पेड़ाबला थार केँ दुनू आँंखिये निहार’ लागल। ओ बाजल–”पेड़ा बानु?”
–”हँ सरकार! अहीं सभहक लेल बाबाक परसाद थिक। भोग लगबियौ।”
कहैत पुजारीजी पेड़ाक थार घुसका क’ दरोगाक आगाँ मे क’ देलथिन।
–”सुगन्धी त’ बड़ा नीमन बा। गाय का दूध मे बनल ह’ तो?”
–”हँ सरकार! सामने देखिऔक मुसहर टोली। सदाय भाइ सभ महादेवक भक्त। सभहक दूरा पर मुलतानी गाय। तखन दूधक कौन कमी। खाक’ देखल जाए।”
दरोगा एकटा पेड़ा मुँह मे देलक–”वाह! वाह!! पुजारीबाबा। सबाद बड़ा अच्छा बा। बहुत दिनन के बाद अइसन पेड़ा खाई के मौका मिललबा।”
दरोगा थारक सभटा पेड़ा उदरस्त क’ लेलक। पेड़ा मे पुष्ट सँ नवका भांग मिलाओल रहैक। पुजारीक देल पानि सेहो दरोगा पीब गेल। तखने पुजारीजी पुछलथिन–”हाकिम, ई नट-नटिन बला की मजरा थिकै?”
दरोगा पहिने पूरा मुँह बाबि ढेकार केलक। फेर बाजल–”आब रौआ से का छिपायब। वायरलेस पर अरजेन्ट खबरि आयल बा। ओ नट-नटिन बड़का डकैत। कोनो मारवाड़ी के लाखो टाका का जेबर गहना लेके भागल बा। सोंचली, सरौं के पकड़ब त’ आधा माल डकार जायब, आधा माल जमा करब। के सार बुझिहेंए? बहुत दिन हो गेइल, कोनो बड़का माल हाथ नहिखे आईलबा।”
पुजारीजी मोने-मोन बजला–‘बस एक घड़ी आओर। भांग जखन भिजतौक तखन नट-नटिन केँ तकिहेंए रे सार।’
दरोगाक माथ सुन्द होबए लगलै। ओ डपोरशंख जकाँ चुपे एककात देख’ लागल। किछु काल पहिले काके आ मैनाबला दृश्य ओकर मानस पटल पर थिड़क’ लागल। ओकरा अपन बियाहक गप मोन पड़’ लगलै। जखन ओ पहिल बेर अपन कनिआँक मुँह देखलक–कारी, उठल आ मोटका थूथून। Åपरका दाँत निचला ठोरकेँ छपने, डिग्गासन पितरिया आँखि। ओकरा जिनगी सँ विरक्त भ’ गेलैक। ओ संन्यास लेबा लेल तैयार भ’ गेल।
मुदा, एखन जे दृश्य देखलक। वाह! छौकड़ी राधा रानी त’ छौकड़ा किसन-कन्हैया। मन केँ हर्षित क’ देलक।
रंग त’ अनलक नवका भांग। किछुए कालक बाद भिसिण्ड तोंदबला दरोगा पटिया पर चित पड़ल नाक सँ डिगडिगिया बजा रहल छल। थोड़बे हटल कृपलबा बीड़ी मुँह मे दबने बेहोश पड़ल, मोंछ के चिबा रहल छल।
ई सब कार्य पूर्ण अनुशासित आ पटुताक संग होशियार व्यक्तिक देख-रेख मे भ’ रहल छल। कनेक आओर सांझ जकाँ भेलै त’ कतहु सँ पाँच युवक आ पाँच युवती, कुल दस, कमरियाबला पिअरका वस्त्रा पहिरने कामर केँ कन्हा पर उठौने आयल। आगन्तुक युवक-युवतीक उमेर काके आ मैनाबला छलै। सब तहिना चुस्त-दुरुस्त आ शांत।
तुरंते पुजारीजी, स्वामीजी, काके एवं मैना कमरियाबला ड्रेस मे आ कामर केँ उठौने तैयार होइत गेलाह। डालरबला दुनू बोरा केँ छोट-छोट मोटरी बना क’ सब कमरियाक कामौर मे लटका देल गेलै। सब वस्तु ल’ क’ कमरिया टोली मे जोर सँ हुंकार देलक पाछाँ कमरियाक टोली ओहि मंदिर सँ प्रस्थान केलक। मंदिर मे रहि गेला फोंफ कटैत दरोगा आ टिटहीबसंत सिपाही कृपलबा।
कमरियाक टोली भरि राति चलैत रहल। टोलीक नेतृत्व केनिहार आ पुजारी बनल अमृतलाल। अमृतलाल जाहि जाति या संप्रदायक प्रतिनिधित्व करै छल ओ पुस्त दर पुस्त सँ चोरि विद्या मे पारगंत होइ छल। अमृतलाल भुखन सिंहक खास पियादा रहए। ओ चतुर आ भुखन सिंहक विश्वासी मातहत छल। कठिन अवसर पर भुखन सिंह अमृतलाल केँ खास किस्मक काज करक लेल नियुक्त करै छलाह। प्रस्तुत अभियान मे अमृतलाल अपन निपुणताक सहज परिचय द’ रहल छल।
अमृतलाल केँ ओहि इलाकाक पूर्ण ज्ञान छलैक। ताहि कारणे कमरियाक टोली कोनो गाँव वा शहर मे प्रवेश नहि केलक। बाघ-बोन, गाछी-बिरछी, मरचरही, धारक कछेर होइत भोरहवा मे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचल। ओतए सभ तरहक इन्तजाम छलैक। भरि दिनक विश्रामक बाद कमरियाक टोली फेर दोसर राति अमृतलालक नेतृत्व मे चलैत रहल आ भोर होइत चमेलीरानीक अड्डा पर पहँुचि गेल।
स्वामीजी सभटा डालर सुरक्षित अर्जुन केँ सुपुर्द क’ चमेलीरानी सँ भेंटकरबाक उद्देश्य सँ बिदा भेलाह। रस्ते मे हुनका चमेलीरानी सँ भेंट भ’ गेलनि।
चमेलीरानी झुकिक’ दुनू हाथ जोड़ि स्वामीजी केँ प्रणाम केलनि आ कहलनि–”बज्जर काका, ददू अहाँ के अबिलम्ब बजौलनि अछि।”
ददू अर्थात~ भुखन सिंह, चमेलीरानीक धर्म-पिता। स्वामीजी अर्थात~ बज्जर कका भुखन सिंहक दाहिना हाथ। चमेलीरानीक आग्रह पर भुखन सिंह ठाकुर नांगटनाथ सिंह नामक अभियान मे बजz नाथ केँ पठौने छलाह।
चमेलीरानी बज्जर कका केँ बड़ आदर करैत छलि। सदिखन हिन्दी आ अँग्रेजी बाजैवाली चमेलीरानी भुखन सिंह, बज्जर कका एवं औरो पैघ हस्ती लग मैथिलीए टा बजैत छलीह। चमेलीरानीक व्यवहार मे नम्रता आ कोमलता बज्जर कका केँ बड़ सोहाइत छलनि।
बज्जर कका चमेलीरानीक प्रणामक प्रतिउत्तर मे हाथ उठा क’ आशीर्वाद देलनि आ कहलनि–”काके आ मैनाक संग काज करबा मे नीक लागल। फेर कहिओ हुनका संगे कोनो अभियान मे जेबा मे हमरा प्रसन्दता होयत। सब ठीक बिटिया, हम अबिलम्ब बिदा भ’ रहल छी।”
बज्जर ककाक प्रस्थानक बाद चमेलीरानी ओतए पहुँचली जतए काके आ मैना कमरियाबला ड्रेस मे चुपचाप मूड़ी गारने बैसल छलीह। किछु दिन पूर्व हुनका दुनू संगे बड़ पैघ अत्याचार भेल छलनि तकर वृत्तांत सेहो सुनि ली।
ठाकुर नांगटनाथ सिंहक अभियानक पहिने चमेलीरानीक संसार मे बहुत किछु परिवर्तन भेल छलै। पछिला ट्रेन डकैतीक बाद हुनक जे अर्जुन संगे वार्तालाप भेल छलै से हमरा ज्ञात अछि। तकर बादे चमेलीरानी खास किस्मक निर्णय लेलनि। ओ अर्जुन सँ विवाह केलनि। बिआहक अवसर पर कीर्तमुखक पाँचो बेटा उपस्थित छल। ओहि पाँचोंक समक्ष चमेलीरानी अपन योजनाक स्पष्टीकरण केलनि। सभहक विचार मे मेल-मिलाप भेलै। सब मिलि क’ सभहक सहयोगे कार्य करबाक हेतु तत्पर होइत गेलाह।
कलकत्ता आ मदzास सँ दूटा स्पेशल जपानी ट्रेनर केँ आनल गेल। अहि ट्रेनर केँ पैघ तनखाह आ सब तरहक सुविधा उपलब्ध कराओल गेल। आधुनिक युगक सब आधुनिक उपकरण आनल गेलै। खास स्थान पर ओइ दुनू जपानी ट्रेनरक देख-रेख मे अत्यधिक कठिन आ परिश्रमबला ट्रेनिंग आरंभ भेलै। ट्रेनिंग लेनिहार छल कीर्तमुखक पाँचो बेटा आ चमेलीरानी। ट्रेनिंग छह मास तक चलल। पाँचो भाइ अर्थात~ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुलवा आ सहदेवा संगे चमेलीरानी अपनशरीर एवं मनक पूर्ण तैयारी केलनि जे अगिला योजना केँ क्रियान्वित करबा लेल जरूरी छलै।
अही छह मासक भीतरे पाँच सुरक्षित स्थानक चयन भेल। प्रत्येक स्थान मे दू बीघा जमीन कीनल गेल। फेर ओकर तैयारी कएल गेलै। करीब एक सय छात्रा-छात्राा केँ रहबाक लेल अलग-अलग हाWस्टल, व्यायामशाला, सुन्दर मैदान इत्यादिक संगे भवन पाँचों ट्रेनिंग कैम्प केँ लेल बनाओल गेल। पाँचो ट्रेनिंग कैम्प केँ नवीनतम उपकरणक संगे कम्प्यूटरीकरण कयल गेल। सम्पूर्ण प्रान्त मे चोरि, डकैती, रंगबाजी, अपहरण, गुटबाजी आदिक गृह-उद्योग पसरल छल। अत: पाँचो ट्रेनिंग सेन्टरक हेतु पाँच सय युवक-युवती केँ ताकए मे कोनो अरचन नहि भेलै। युवक-युवतीक चयन मे अति सावधानी राखल गेलै। सबहक उमेर चौदह सँ बीस वर्षक अन्दरे रहै तकर ध्यान राखल गेल।
आब ओहि पाँचो कैम्पक उद्देश्य, कार्यक्रम आ अपन प्रान्तक लेल समर्पण इत्यादिक बखान आगाँ कयल जायत। सम्प्रति काके अर्थात~ सहदेवा एवं मैनाक संग भेल अत्याचार केँ स्पष्ट करी।
सहदेवा जाहि कैम्पक इनचार्ज छल ओहि मे मैना ट्रेनिंग ल’ रहल छलीह। ओही ठाम दुनू केँ नैन-मटक्का भेलै। एकर सूचना तत्काल चमेलीरानी केँ देल गेल।
चमेलीरानी अबिलम्ब दुनूक बियाहक तिथि निश्चित केलनि। फलाँ तारीख क’ सहदेव वल्द कीर्तमुख निवासी मिरचैयाक मैना वल्द बेनाम निवासी अनामकक बियाह होयत। सभ केँ हकार, सभ केँ स्वागत।
पैघ मंडप बनल। सजाबट, खेबा-पिबाक नीक इन्तजाम, पाँच सयक लगभग गेस्ट। बियाह भेल। सहदेव आ मैना सभकेँ प्रणाम करैत आ आशीर्वादक मोटरी उठबैत कोहबर दिस प्रस्थान केनहिए छल कि नांगटनाथ बला योजनाक सूचना आयल–”सूटकेस बैंकाक से चलने वाला है।”
योजना मास पूर्वे बनि चुकल छलै। ओहि मे सहदेव केँ काके बनि क’ तथा मैना केँ भाग लेबाक छलैक। अस्तु, कोहबर मे जेबा लेल तैयार ओ दुनू बज्जरकका संग निर्मली पहुँच गेल। भेलै ने अत्याचार?
चमेलीरानीक इशारा पाबि सहदेव आ मैना हुनक सोझा मे आबि ठार भ’ गेल। हे भगवान! अब कोन हुकुमनामा चमेलीरानी सुनौती से नहि जानि।
चमेलीरानीक ठोर पर मृदुल हँसी। ओ हुकुम देलखिन–”अहाँ दुनू हमर कोठली मे जाउ। ओतए सब किछुक इन्तजाम छै। एक मास धरि अहाँ दुनू ओहिकोठली मे निवास करी से हमर आदेश।”
सहदेव चुपे रहला। मुदा, मैना दबले मगर देखार, खिखिया उठली। ओ दुनू चमेलीक स्पेशल कक्ष मे प्रवेश केलनि।

(अगिला अंकमे)
डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे।
कृति-
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.
अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८.
लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मैथिली भाषाक साहित्य२
मैथिली भाषाक अधिकांश साहितय मानक मैथिली मे उपलब्ध३ अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा’, ‘साधुभाषा अथवा शिष्टा भाषा’ सेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्य’क्ति क भाषा छन जाहि आधार पर एकरा ‘मानक मैथिली’ कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। ‘दक्षिणी मानक मैथिली’ समस्तीइपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्तमर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, करिहार आदि जिला क केन्द्रीनय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्दाा सँ पूव सेहो हिन्दू लोकति बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्य त: बाडव्लाा बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडिया आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्तजरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चम्पा’रण आ पश्चिमी चाचारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्पा।रण आ उत्तलर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्‍लाम धर्मविलम्बीफ अपन पडोसी हिन्दूप क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्दीऍं ूिज्ञित रहैत अछि।
वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अद्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्जी। आलिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्तु आधुनिक परिप्रेक्ष्यन मे एहि जातिक नामनिशान नहि भेटैत अछि।
मैथिली व्याककरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्टआताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्ड -5, भाग-2) (1902), ‘एन इण्ट्रोगडक्शलन टू द मैथिली लैंग्वे ज ऑफ नौश विहार (1800) तथा ‘सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्ट्से एण्डस सब डायलेक्टय ऑफ द विहारी लैंग्वेकज (1883) मे विस्ता रपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्धस भ’ रहल अछि। मैथिली व्याककरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्मज होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा मोरा, मुदा बाडव्लाय मे दू ‘आपनी’ आ ‘भूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्दी मे सेहो दूइए रूप प्रयुक्तग होइत अछि ‘आप’ आ ‘तुम’। मात्र भषा-शास्त्रमक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्युफत व्या‘करण आ शब्दा वलीक विभन्न ताहि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्य‘ भाषा-भाषी लोकतिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रतयुत अपन एक स्वेतन्त्रि साहित्यिक आ सांस्कृातिक परम्पीरा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्व तन्त्रत अस्तित्व‘ अछि। मैथिली भाषा आ व्यााकरणक सम्ब न्धस मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्कृथत आ अंग्रेजी व्या्करणक आधार मानिक’ मैथिली मे छोट-पैध अनेक व्या करण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्धु् झा (1878-1955) क ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ (1945) क ऐतिहासिक महत्वव अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिख लनि जे संस्कृ त-प्राकृतक श्रेष्ठय व्याककरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्या करण केँ आधार मानिक’ गोविन्दल झा (1923) ‘लघुविद्योतन’ (1963) आ ‘उच्चजतर मैथिली व्यासकरण’ (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्यं कृति मे ‘मैथिलीक उद्गम ओ विकास’ (1968) आ ‘मैथिली भाषा’ (1909-2000) ‘द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्वे ज (1960) सर्वाधिक उल्ले6खनीय कार्य कयलनि अदछ।
अन्यल स्वितन्त्रा साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्वकतन्त्रस प्राचीन लिपि थिक जकरा ‘तिरहुता’ वा ‘मिथिलाक्षर’ वा मैथिलाक्षर’ वा ‘मैथिली लिपि’ कहल जाइत अछि। तिरहुता नाससँ ज्ञात होडत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास ‘तीरमुक्तस’ वा ‘तिर्हुत’ नामक व्यजवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्तफ कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्थत ‘ललित-विस्तमर’ मे एहि लिपि केँ ‘वैदेही लिपि’ क नाम पर अभिहिस कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडव्लीत असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्तुुत: मिथिलांचल मे उपलब्धा प्राचीन संस्कृलत ग्रन्थि एही लिपि मे उपलब्ध अछि जकरा बाडव्लास, असमिया आ ओडियाक पण्डित लोकति केँ पढबा मे सुविधा होइत छवि। पटना सँ प्रकाशित ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’ (1960-61) मे अनेक किस्मक मे एहि लिपिक तात्विक अघ्यियन प्रस्तुोत कयलनि, किन्तुफ दुर्योग रहल जे पुज्ञतकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्वमर झा (1923-1977) ‘मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखिक’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्त्री यता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-पैश्राानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्व थिक। उनैसम शमाब्दी(क मल्य,चरि ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्तमान सन्दषर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्थैन पर देवनागरी लिपि व्यिवहार कयल जाय लागल अछि।
मैथिली साहित्यह क इतिहासकार लोकति एकरा सामान्यएत: तीन काल आदिकाल, मघ्यिकाल आ आधुनिककाल मे विभक्तह क’ अघ्यएयन कयलनि अछि। किन्तु ओंकर समय सीमाक निर्धारण से इतिहासकार लोकति मे मनैक्य क सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्याीन मे रासिक’ एकरा निम्नास्थव काल खण्ड् मे विभाजित करब श्रेयस्कसर प्रतीत होइत अछि:
i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि।
ii. मघ्याकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि।
iii. आधुनिक काल
i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि।
ii. स्वाटतन्त्र योत्त.र काल 1947 सँ अर्द्यपर्यन्ता।
सन् 1857 ई. का सिपाही विद्रोहक पश्चा त् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्याक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्तम ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्चापत् क्षिप्रताअबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्वन नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्कृपति क सुरक्षाक प्रति उत्सुिकतिा देखौलक आ दोसर भाग युग क आलोकक स्वा्गत कयलक। एहि सांस्कृ तिक अनुष्ठाकन मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्या सम्पकन्न‍ आ समृद्ध होइत अछि।
पश्चिमी शिक्षक प्रचार, रेल-तारक व्य‍वहार, रचायत शासनक व्यकवस्था मुद्रण कलाक आविष्काेर आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्यभ पर पडल आ ओ स्ढत परम्पनरादिकेॅा तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्यपक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्पहर चन्दाा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-19) अवदान सर्वाधिक महत्व-पूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधार पर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्चारत् परिवर्तित परिस्थितिक सहल प्रक्रिया छल। वस्तु त: चन्दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलहि। अपन गद् रचनादि द्वारा ओ लोकति आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्चरल से नव आलोक पसरल साहितय सेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्ललवित भेल।
सर्वप्रथम तँ ओ रहस्यलवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्वे‍षण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकति छथि। एहि सिद्ध लोकतिक सम्ब न्ध‍ बौद्ध लोकतिक महायान शाखाऍं छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्दन अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्यादय डा. हरप्रसाद शास्त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषता दि अछि जे बाडव्ला्. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे रारबल जाइत अछि। एहि कारण सॅा एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्तु त: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्था: मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकति एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्त अछि। तथापि ई स्वा्भाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वस उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्तत अछि। तथापि ई स्वामभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्वि उपलब्धस अछि जे मागधी अपभ्रंश सँ विकसित वर्तमान भाषादि मे सेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह।
बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन न्रकारक साहित्यर उपलब्ध भ’ ीहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सर्कैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्च य आ डाकार्णव। एकर स्वईचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिभिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधार पर एकर रचयिता लोकतिक समय आठम शताब्दीक सँ तेरहस शताब्दीर धरि निश्च्य कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्वब नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधार पर एकरा मैथिली, बाडव्लात, असमिया, हिन्दीा, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्येरक भाषा-भाषी अपन सम्परत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकति एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वान्चतलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल सेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्योअतिरीश्व र (1280-1340) वर्णरत्ना्कर (1940) मे एकर सम्पूचर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्भीतर साहित्य क रूप मे कयल गेल छल। बाडव्लाै आ आसमी मे तँ साहित्यि-रचनाक प्रयास एक शताब्दीम पाछॉं जा क’ प्रारम्भय भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलहि। एकर अतिरिक्त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्प रा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्प्रा चौदह म शताब्दीत धरि चलैत रहस। विद्यापति अपन दू पुस्तकक-‘कीर्तिलता’ (1924) आ ‘कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्यप-मिश्रित अपभ्रंश शिला ‘प्राकृत पैडालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट् कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. ‘प्राकृत पैड;लम मे उदाहरण स्वररूप अनेक शब्द2 एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा ाकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्णि चौधरी (1924-1984) ‘मिथिलाक सांस्कृ तिक इतिहास’(1961) क परिशिष्टी-ग मे प्राकृत पैडलम मे व्यपवहृत 115 शब्दाादिक सूची देलनि अछि तथा एहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्थ1 मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्यकक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यए मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि।
दोसर प्रकारक साहित्य1 जे उपलब्धप भ’ रहल अछि ओ थिक ‘डाकवचनाबली’। एहि वचनाबली मे स्थाानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्यो तिष एवं कृषि सम्बेन्धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेरैत अछि। ई जनसामान्यध मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्तावर आसामसॅ ल’ कए राजस्थारन धरि सम्पूआर्ण आर्यवर्त मे विस्तृमत अछि। एकर रचयिताक सम्बतन्ध् मे विद्वान लोकति मे मतैक्या नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्नर भिन्ना भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्नय-भिन्न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्डनरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्ह र आबिक’ देशक विभिन्नि भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्तुं एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्तिलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्विरूप प्रत्येतक संस्कररणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्यपक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्योैतिषक प्राचीन ग्रन्थापदि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्द्ररहम शताब्दीिक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्यकन्त् प्राचीन अछि तथा ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ क भाषासँ साम्यश रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनाबली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्रमिथिला आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध सारबी आदिक भाषा प्राचीन मैथिलीथिक। कालान्तछर मे ई सम्पूैर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्प्रा मे नूतन रूप धारण क लेलक अछि।
मात्र डाके एहन व्य क्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्यारत इएह छथि। सप्त रत्नाणकरकर्ता महामहोपाहसाय चण्डेलश्वूर अपन ‘कृतचिन्तािमणि’ नामक ज्योएतिष निबन्धतक प्रशानग्रन्थह मे अवहद्ध भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिंता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्थनसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्थ आब अनुपलब्धभ अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्ति ग्रन्थद ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ अदृत कयल गेल अंछि। परन्तुई डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब सेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकति हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्डे श्वरर सदृश विद्वान् सेहो प्रमाण स्वारूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह।
तेसर प्रकारक जे साहित्यज उपलब्धद अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्यातन आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्दशक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीखमॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्तए लोरिक, सलइेस. बिहुला, मरािया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्ठि मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे कयों दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्पगरा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्पकष्टख प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्प रा मात्र उपयोगी साहित्यखक लेल नहि, प्रत्युभत मनोरंजनक लेल सेशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि।
डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ ‘इण्डियन एण्टीकक्वेरटी’ खण्डल-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्ता ‘समबिहारी फोक सॉंग्स ’ (1884), ‘टू भरसन्सल ऑफ द सांग्सक आफ गोपी चन्दक’ (जे. ए. एस. बी. खण्ड‍ 54, भाग-1 अर ‘द वर्थ आफ लोरिक’ (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिणे उल्लेेखनीय अछि। एम्हतर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसॅा एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलान्चमलक विभिन्नथ जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्तुरति इस देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वामभाविक अभिव्यनक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यिक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक जीवनक स्वाछभाविक अभिव्य क्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्यजक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्पतन्ने, तत्काृलीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्यरवस्था कयलक। कालन्तयर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्रत-त्यौ-हार, धार्मिक, सांस्कृ्तिक लोकोतसव इत्यािदिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्नव प्रक्रियादि सँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृातिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लाक-नाट्य।
मिथिला और मैथिली साहित्यसक ऐतिहासिक ग्रन्थों के अवगाहन सँ ज्ञान होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्डट वला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकतिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्यआकार लोकति केँ प्रोत्‍साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। ज्यो तिरीश्वार ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देवर (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्यरक विकास अत्यडन्तत दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकति केँ साहित्यलक प्रति अधिक अभिरूचि छलनि जकर फलस्व रूप साहित्ये मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकति प्रोत्सातहित कयलनि जाहि मे उल्ले खनीय छथि कवीश्वँर चन्दाे झा आ महाकविलास दास आ साहित्यि रत्नािकर मुंशी रघुनन्दमनदास (1860-1945)। ई साहित्यप मनीषी लोकतिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिकताक शुभारम्भर होइत अछि।
सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्तिक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्योितिरीश्व र ठाकुरक ‘वर्णरत्नाककर’ आ ‘धूर्तसमागम’ (1960)। ई दुनू पुस्त क चौदहम शताब्दी‍क आरम्भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्नािकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल एशि।यारिक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्याकय डा. हरप्रसाद शास्त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्त। सम्पा दक ख मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्यामय डा. हरप्रसाद शास्त्री कहने रहथि, ‘ई ग्रन्थ काव्यश नहि, काव्योोपयोगी ग्रन्थम कहि सकैत छी। यदि ज्यो्तिरीश्वरर वास्त्व मे इच्छारपूर्वक काव्यग ग्रन्थथ लिखितथि तँ एकर स्वटरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्थयकारक सहज कवित्व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहु पर सेहो कस्तु‍री मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्थ ल-स्थ लक वर्णनकेँ देखिक’ कादम्बखरी प्रभृति संस्कृवत गद्य-काव्य क स्मलरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकाश्क उन्न त गद्य-साहित्यण केँ देखिक’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्दी‍ पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्यत रचना प्रारम्भे भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्लेिख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्ब‍न्धीर अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्डाीर, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्थ, मे उपलब्धम अछि।
प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्थि भावी कवि आ कत्थ क लोकतिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्थच बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक होतॅ कोन-कोन विषयक उल्लेथख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक होतँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्यशक अछि। ई ग्रन्थ् सातकल्लोिल मे विभाजित अछि जेना नगस्व र्णन, नायिका वर्णन, आस्था न वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्म्शान वर्णन। सबसँ महम्व क बातईथिक जे ई पुस्तरक गद्य मे अछि तथा उत्तथर भारतक कोनो भाषा साहित्या मे एतेक प्राचीन ग्रन्थन नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्तथ अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्येमक अभाव मे अन्धतकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्वमरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता है। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक।
ज्योरतिरीश्वदरक दोसर रचना संस्कृकत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक ‘धूर्त समागम’ । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्प राक द्योतक थिक, ओतहितत्काधलीन समाजक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्हकल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संगपुष्टत थन्वाट ली गाच एम्हजर-ओम्हूर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्दकर भवनक प्रागंण मे मन्दन-मन्द‍ गति सँ अवगार्हन क’ रहल अछि।
वर्णरत्नाचकर आ धूर्तसमागम क रचना नोकभाषाक आलोकमय भविष्युक सूचक छल। भाषा-साहितयक एहि अभ्युतदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्यु त ई तँ साहित्यिक जडवाद सँ असन्तुयष्ट जनताक स्वाेभाविक प्रवृतिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जरमन राजा लोकति केॅा चमत्कृआत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्साकहनक फलस्वनरूप भाषा-काव्यतक विकास भेल। ई विकास एहि बातकद्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्यो जनमानसक व्यािपक भाषा बनिगेल ओहि मे व्यिवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्य हैत। मैथिली साहित्याक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्पवष्टू बोध होइछ। वस्तुित: ज्योीतिरीश्पकरक रचनादि मैथिली गंगाक ‘हरद्वार’ थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्यँ धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमच लागल एकर पश्चाचत् उमापति उपाघ्या्य सर्वाधिक लोकप्रिय नाटककार भेलाह जनिक ‘पारिजातहरण’नाटकऍं असमक शंकरदेव (1499-1568) आत्याधिक प्रभावित भेलाह।
मैथिली साहित्यज केँ ई सौभाग्यह अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्प्न्न‍ व्याक्तित्व क प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्यईप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्युकत पूर्वान्चाल मे बंगाल, आसाम आ ओडिसा धरि ख्याेति अर्जित कयलक आ समस्तह भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक ग्थ्न्ामक विषय-वैविघ्य केँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्युहत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्त्क रहथि। ओ एकहि संग शास्त्रतकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्तक लेखक, अर्थशास्त्रा विद्, नीतिशास्त्रन विचक्षण, धर्म-व्यूवस्थािपक, निबन्ध-कार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आपुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्नतस्थन संस्कृतत ग्रन्थानदिक रचना कयलनि यथा- भूपरिक्रमण (1976), शैवसर्वस्वचसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडि;णी (1902), शैवसर्वस्वकसार (1980), शैव सर्वस्वञसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्याावली (अप्रकाशित), संस्कृ0त-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमन्ज9री (1966) आ अवहटट् रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्धतताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाम्पकलक अन्तजर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं राग तरडि;णी आ बंगालक अन्तधर्गत क्षणदा गीत चिन्ता्मणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्पुतरू, कीर्तनालल्दृ आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्ठअक पद। एहि पदक संख्याच एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिलक अधिरकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्याकवली, गयापतलक आ वर्षकृत्यल पुस्तअकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस मेल तथापि हिलक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्थापवली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि।

वस्तुअत: एहन प्रतिभासम्पान्नी महाकविक कृतिकेँ घ्या्न मे राखि अद्यापि साहित्यु चिन्तकक लोकति जतेक अपुसन्धा‍न आ आलोचना प्रज्ञतुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सर्केछ ले ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ ‘पुरूषार्थचतुष्ट य’क प्रतिपादण कयलनि अछि। हिनक सम्पूलर्ण कृतिक मुख्य उद्देश्य् अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्पौष्टतता, कर्तव्य्परायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्कृेतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ समय। जाहि मानव मे पर्युक्तआ गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ अपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्टसय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्सेनषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैठुण्य्क परिचय दैत अछि। लोक मे स्वध-धर्म आ राष्ट्रस-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्ल्वित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल।

विद्यापति अपन साहित्या-साधनाक माघ्यि मे मैथिली-साहित्य भंडार केॅा भरबाक लेल अनेक विधा करचनाकयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्य -निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंृखगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदाविद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्येक्ष रूप सॅ विचार करैत छी तखन स्पटष्टा भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्तपन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्टअयक उदेदश्यचसँ समग्र रचनादि कयते रहथि।

एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्या मे जे परम्प राक शुभारम्भा कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकति अपनाक’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक उवं यपरवर्ती कविलो‍कति एहि साहित्य्क बहुमूल्यष सेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकति मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्द्र कला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्द0 कवि (1450-1530), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्दक 1550), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या1म सुन्द4र (1500), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्या)म सुन्दभर (1500), हरिदास (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्लग (1640) इत्या5दि उल्लेषखनीय छथि।
(अगिला अंकमे जारी)

विदेह

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