VIDEHA

विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०)-part-ii

In विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०)-part-i on अप्रैल 4, 2009 at 5:03 पूर्वाह्न

विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०)-part-ii

कमलानन्द झा
हिन्दी विभाग
सी.एम. काॅलेज
दरभंगा
फोन-09431857789
06272-256343
पुस्तकक नाम – उदाहरण
सम्पादक – देवशंकर नवीन
प्रकाशक – प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मन्त्रालय
भारत सरकार
पृष्ठ – 274
मूल्य – 200 टाका मात्रा
देवशंकर नवीन
ए-2/198, फेज-5, आयानगर एक्सटेंशन, नई दिल्ली 110047
अदद्दी पेनेनकें मजगुतुत करबाक आवश्यकता
मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने
देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट
बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ
अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ‘परसुख देबामे परमसुख’क आनन्द
लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल
जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क’, अपन सब किछु गमाइओ क’,
दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः
इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा
धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए
आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर’बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन,
केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर’बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे
नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ’रमे परसौतीक काज करबाब’वाली स्त्राीकें दाय कहि
क’ सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक
थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ’रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय
कहबाक परम्परा अछि।
अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य
थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति
अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे
लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर
बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामथ्र्य, आ पलखति
रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे
मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़
भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै’ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु
आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह
होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक,
तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि
पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।… तें पूजा पाठमे
लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ
होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा
आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि
लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे
लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक
मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।…लक्ष्यपूर्ति त’ नहिएँ भेल, उनटे लोक
धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल,
परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि।
कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो
व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल।
डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी… आदि
समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें
जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार
ह’र-फार, चैकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह…। सम्पूर्ण
समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए
किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह।
सिरपंचमी दिनक ह’र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव
हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो… बिना सर्वजातीय,
सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात
तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ’ गेल
अछि।
मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब’रक कानमे हुनकर खानदान
लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क’
सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि
तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत
अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क’ रहल
अछि। नदीमे ठाढ़ भ’ कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा
एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि
होएत। नेत अइ स’ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल।
ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक
विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक
अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष,
शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम,
सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा,
विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क’ पबै’ए। मिथलाक उदारता
आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा
कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने
ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल
तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा
काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल…ई समस्त बात
सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल।
कोनो स’र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे
टोलमे लोक बिलहै छल।…कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक
नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत… मुदा तकर अछैत एहि पद्धति
आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल
जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक
सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि
गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि
गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ’रमे एक साँझ भोजन
करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम
अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककंे उद्बुद्ध करै छल जे बेटी!
आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन
शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि
कए अपन विवेकसँ चलिह’, आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह’।
इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द’ कए तय
होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि;
गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि?
मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट
वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक
लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त’ मान्यताक सन्दर्भ
बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई
बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक
सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट
घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः
इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू
सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर
नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट
देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष
भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़
ब’र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि,
अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्, सकल समाजक सम्मुख ओ
व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि–हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन
पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी
राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर
आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब!
अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम,
चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव,
संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि।
कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त’हमे जाइ
तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु
जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक
कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल’ क’ अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि।
अधिकांश समय भनसे घरमे बितब’ पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस’ नहि
दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब’ लगलथि।
आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक
जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत।
वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक
अछि।… आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?…
घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो
क्रियाक विकृति प्रचारित भ’ जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल
पेटू होइत अछि, से सब जनै’ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक
अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा
कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह,
तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल।
स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे
हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक
मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक
आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत
अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष
पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा
(आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक
अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि… सबहक
स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व
छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क’ सकै छलाह। ई लोकनि
आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे
जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल।
हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे
सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी,
सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन,
कराम, खाट, सीक, अरिपन… सब किछु लुप्तप्राय भ’ गेल। एते धरि जे ई शब्द आ
क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस’र
चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल,
पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे
कमे काल अबै’ए।
मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत–कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक
उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें
हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि
जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे
अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन
पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि
देखेलै। ‘रंग उड़ल मुरूत’ कथामे मायानन्द मिश्र आ ‘रमजानी’ कथामे ललित
मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।…
ख’ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल।
सीक’क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ’ गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल
नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना
प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा
लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए
लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड
खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए
पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच’ लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक
विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू
खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकाॅर्ड
क’ कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क’ कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट
क’ कए लाक सुन’ लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर’ लागल।
… अर्थात् जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर
अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग
अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर
विकासक सम्भावना स्थगित रहत।
अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द’
कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा
जखन मिथिलाक लोके ओ ‘लोक’ नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ
लोक-परम्पराक रक्षा के करत?

(समाप्त)
कथा-
फानी-श्रीधरम
पंच सभ एकाएकी कारी मड़रक दुअरा पर जमा हुअ’ लागलछल । दलान पर चटाइ बिछा देल गेल रहै । देबालक खोधली मे राखल डिबिया धुआँ बोकरि रहल छल । मात्र रामअधीन नेताक अयबाक देरी रहै
बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने?
डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय ।
झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“
डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“
सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै…
सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो…के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो…हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।”
बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै ।
ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै…। ”
दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’
रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय ।
“हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप…फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?”
“आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।”
“रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।…” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।” नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै ।
डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत!
रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।”
“कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल ।
मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ लागि जाए त’ नीके किने ?”
मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !”
पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।”
बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क”
सभ चुप्प!
फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।”
महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै ।
रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।” नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।”
“है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“
महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।” सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।”
आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक ।
अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय ।
“छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी केँ हल्लुक कर’ चाहलक ।
एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल।
होलीपर विशेष

विद्या मिश्र
मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) – विद्या मिश्र
हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल…25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि।
हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए।

पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलैत छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा।

मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि।
एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि…आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि…. आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल।
1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन
1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र

श्री सुभाषचन्द्र् यादव केर कथा-संकलन आद्योपान्तै पढ़लहुँ लेखक महोदय अपन भावनाक बेवाक प्रस्तुभत करबाक नीक प्रयास केने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्नप-‍मध्य म- वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्वेयदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि । परम्पराक नीक चिन्हसॅं लेखक अपना-आपकेँ जोड़ने छथि आ परम्पराक विद्रोह करबामे कखनो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्पनरा, परिवेश, खेत, खरिहान, गाम-घर, सौन्दपर्य, यात्रा-वृतान्त् आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि।

सुभाषजीक कथा-संग्रहपर हमरा जनैत दू दृष्टिकोणसँ विवेचित कएल जा सकैत अछि:

(क) भाषा विन्यारस आ शब्दाृवलीक दृष्टिकोणसँ:

(ख) कथा-वस्तुाक दृष्टिकोण सँ।

आब उपर-लिखित दृष्टिकोण पर विचार करी: भाषा विन्या स आ शब्दालवलीक दृष्टिकोणसँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कय एक नीक परम्पपराक प्रारम्भ् केलन्हि अछि।

मैथिली भाषाक सबसँ पैघ समस्या‍ एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्कृनतनिष्ठ ब्राह्मण एवं कायस्थ लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृत शब्दणकेँ घुसा-धुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति एवं सर्वहाराक शब्दत विन्याणस, व्यावहार आदिकेँ नजरअंदाज कऽ परम्प रा सँ कटि जाइत अछि। सर्वहारा वर्ग सँ कटि स्त्रीगण आदि अपना-आप केँ भाषाक ताग सँ बान्हजल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब परम्पतरा सँ ई लोकनि अपन नाता समाप्तभ क लैत छथि ।

मैथिली भाषाक समस्या केवल जाति अथवा समुदाय मात्र सँ नहि अछि । विभिन्नम सांस्कृपतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषा केँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक लोकक द्वारा प्रयुक्त मैथिली केँ सर्वाधिक नीक आ शेष लोक द्वारा प्रयुक्तक मैथिलीकेँ निम्ने श्रेणीक मैथिली बुझल ज्ञाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल ज्ञाइत अछि तकरा पंचकोसीक लोक दछिनाहा, पूबमे व्यवह्रित मैथिली केँ पुबहा एवं पच्छिम विशेषरूपसॅं सीतामढ़ीमे प्रयुक्तह मैथिलीकेँ पच्छिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि ।

एहि सब कारणेँ मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोईटी, धानुख आदि मैथिली भाषा बाजय बला एहेन बुझाइ छन्हि जेना ओ लोकनि भाषाक मुख्यचधारा सॅं अलग-थलग होथि । लोकविध अथवा फॉकलोर एतेक सम्पजन्नि होइतो स्थायन बनाबएमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि।

नामकरणक उदा हरण अगर ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्थब लोकनि संस्कृरत निष्ठा नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जखन की पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्टाे अछि। पंजाबी भाषा मे नाम निर्धारित होइत अछि। गुरू ग्रन्थकसाहेब एखनहुँ धरि ‘गुरग्रन्थृ साहेब’ कहल ज्ञाइत अछि। स्मोरण सिमरन थीक। की स्त्री की पुरूष, की छोट की पैघ जातिक सभ अपना आपकेँ भाषा, संस्का र आ संस्कृकति सँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि।

अतेक सम्पन्नछ फॉकलोर रहितहुँ मिथिलाक फाकलोर पर विशेष कार्य नहि भऽ रहल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एकटा उल्लेमखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाषजी पंचकोसिया नहि छथि; या दोसर ई ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थल सेहो नहि छथि। लेकिन अपन परिवेशक प्रयुक्ति शब्द , वाक्यस फकरा, नाम आदिक वर्णन ताहि रूपमे कएने छथि । किताबक सभ पन्ना पढि लेलाक बाद अपन ढेठ गाम, गामक परिवेश इत्याेदि स्मारण होबए लागत। लोकमे प्रयुक्तअ खांटी देसी नाम जेना कि मुनियां, कुसेसर, उपिया, अखिलन, बिहारी, बौकू , सिबननन, समसरन रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजना‍थ, संकुन आदि पाठक केँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूप सॅं लऽ जाइत अछि भाषा सेहो एकदम देसी। कोनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि।

एहि तरहक यथार्थवादी परम्पिराक प्रारम्भह केला सँ मैथिली सम्पन्नज हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक सख्या बढ़त। अनेरे संस्कृहतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीमे पाठकक संख्या लगभग शून्य जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्वमयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियो पढ़यवला नहि। वेबक विकासक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिला सँ बाहर रहनिहार मैथिल आइ काल्हि किछु सामग्री केँ सर्फ कए देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सभ सामग्री मैथिली मे पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन काज अंग्रेजीजीमे व्यीक्तह करैत छथि।

सुभाषजी जकां अगर आरो लेखक, कवि इत्यािदि आगु आबथि यथार्थवादी परम्पराक शुरुआत हैत। मैथिली मे नव-नव शब्दा‍वली विकसित हैत, सब क्षेत्र सम्प्र दाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष लोकक हाथक खेलौनाना सँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत।

आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्तु पर कनी विचार करी । कथा-वस्तुरक दृष्टिएँ सेहो लेखक अपन परिवेश सँ बान्हसल छथि। कथा सम मे लेखक केँ परम्पराक नीक तत्वरक प्रति सिनेह, पाखण्ड्क प्रति विद्रोह एक निम्नकमध्याम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर सुन्ददर नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समूचा यात्रा- वृतान्त़, मोनक अन्तर्द्वन्द , सुन्द रताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत।

’’ बनै‍त बिगड़तैत’’ कथा मे माय-बापक मनोदशा जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक जकाँ कैल गेल छैक। कथाक मुख्यपात्र माला टाहि-टाहि करैत कौवाक आवाज सँ डरैत अछि। ओकरा हरकाक दैत उड़बए चाहैत छैक। लेकिन ‘ ओ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — बज्ज र खसौ, भागबो ने करै छै”।

परदेस मे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु एना लिखैत छथि।

कौवा कखनियों सॅं ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै, संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक । ने चिट्ठी-पतकरी दै छै ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माप-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।

’’ हे भगवान, तूहीं रच्छाै करिहऽ । हाहा हाहा’’— माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबऽ चाहै छै।‘’

आ माला के बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्याम सँ अपन विस्म य व्यओक्ता करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्नत करैत छथि:

माला सब बेर अहिना करै छै1 सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक । कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सन्तोर नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्का र बनि गेल छै।

सत्तो केँ छगुन्ताग होइ छै। यैह माला कहियों अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।‘’

अही तरहें लेखक अपन खिस्सा ‘कनियाँ पुतरा” मे लड़कीक निश्छल व्यकवहार सँ आत्मिविभोर भय, लड़की सँ एहेन सम्ब न्धक बना लैत छथि जेना ओ लड़कीनक माय अथवा पिता होथि। ट्रेनक भीर भरल बोगी मे ठाढि लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत बुझना जैत छैक जेना ‘ऊ ककरो आन संगे नै बाप— दादा या भाय-बहीन सॅं सटल हो।‘

लड़कीक भविष्य पर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्ययम सँ सोचए लगैत छथि:

ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पमना कऽ रहल छी । अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ। ‘’

‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्व पदर्गीय दब्बूैपनीक मनो‍दशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक कप ओहि कथाक पात्र नवीन केँ थमा दैत छैक तँ सूत्रधार बाजि उठैत भछि : ‘’सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सॅं उतरि कऽ ओकर हाथ आ कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सॅं तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जाएत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै— ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै, ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहि कहि सकलै— हाउ यू डेयर ? तोहर ई मजाल। मुदा ओ कहि नहि सकलै। साइत निम्नकवर्गीय दब्बू पनी आ संस्का—र ओकरा रोकि लेलकै।‘’

(अगिला अक‍मे जारी)

2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन

विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी।
हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि।
एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये !
अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर !
पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे।
कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि।
सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ।
विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक।
बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज।
उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक।
एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे।

३. पद्य
३.१. सतीश चन्द्र झा- शब्द

३.२. 1.बुद्ध चरित 2.महावीर

३.३.ज्योति- एक हेरायल सखी

३.४.कामिनी कामायनी: चक्काल

३.५. पंकज पराशर

३.६.सुबोध ठाकुर

सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।

शब्द-

चिकड़ि रहल अछि शब्द आबि क’
निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे।
अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा
नहि बूझत किछु बात राति मे।
केना करु हम बंद कान के
उतरि जाइत अछि हृदय वेदना।
बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय
छीटल शब्द हमर अछि सेना।
कखनो कोरा मे घुसिया क’
बना लैत अछि कविता अपने
जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे
शब्द शब्द के हाथ पकड़ने।
कविता मे किछु हमर शब्द के
नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै।
सबटा नग्न, उघार रौद मे
नेन्ना सन बैसल अबोध छै।
कखनो शब्द आबि क’ अपने
जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे।
कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता
जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे।
क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’
पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी।
शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी
छी हमही किछु कवि अज्ञानी।
1.बुद्ध चरित 2.महावीर
बुद्ध चरित

पूर्व बुद्धचरित

ई पुरातन देश नाम भरत,
राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज।
एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन,
पत्नी माया छलि,
कपिलवस्तुमे राज करथि तखन।

माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल,
एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे,
पैसि छल रहल हाथी मुदा,
मायाकेँ भए रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट,
वरन् लगलन्हि जे आएल अछि मध्य क्यो गर्भ।

गर्भक बात मुदा छल सत्ते,
भेल मोन वनगमनक,
लुम्बिनी जाय रहब, कहल शुद्धोधनकेँ।
दिन बीतल ओतहि लुम्बनीमे एक दिन,
बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक,
आकाशसँ शीतल आऽ गर्म पानिक दू टा धार,
कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल,
बरसि आकाशसँ।
यक्षक राजा आऽ दिव्य लोकनिक भेल समागम,
पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी।
धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल,
छोड़ि “मार” आनन्दित छल सकल विश्व,
“मार” रुष्ट आगमसँ बुद्धत्वप्राप्ति करत ई?

माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक,
ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक,
भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ,
मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कए।

महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म,
चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त,
वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक,
बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत,
राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक।
बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर,
देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर,
बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल,
उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब।
वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक,
भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि।
दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार,
फेर ढ़ेर रास होम जाप,
करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि,
घुरि नगर प्रवेश कएल माया,

हाथी-दाँतक महफा चढ़ि।
धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य,
अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग,
सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ।
मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता,
मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा।
उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर,
अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक,
शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक।
सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह,
समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म।
उत्सवक संग बितैत रहल दिन किछु दिन,
सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक,
सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक,
सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक,
क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट।
सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र,
निकलि आयल पथपर दर्शनक सिद्धार्थक,
चारू कात छल मनोरम दृश्य,
मुदा तखने आएल पथ एक वृद्ध।
हे सारथी सूतजी के अछि ई,
आँखि झाँपल भौँहसँ श्वेत केश,
हाथ लाठी झुकल की अछि भेल?
कुमार अछि ई वृद्ध,
भोगि बाल युवा अवस्था जाय
अछि भेल वृद्ध आइ,
की ई होएत सभक संग,
हमहू भए जाएब वृद्ध एक दिन?
सभ अछि बुझल ई खेल,
फेर चहुदिस ई सभ करए किलोल,
हर्षित मुदित बताह तँ नहि ई भीड़,
घुरि चलू सूत जी आब,
उद्यानमे मोन कतए लाग!

महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न,
पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र,
मुदा एहि बेर भेटल एकटा लोक,
पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास,
रोगग्रस्त छल ओऽ पूछल सिद्धार्थ,
सूत जी छथि ई के की भेल?
रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल,
कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन,
सूत जी घुरू भयभीत भेलहुँ हम आइ,
घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन,
शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम।
आमोद प्रमोदक कए आर प्रबन्ध,
रथ सारथी दुनू नव कएल प्रबन्ध।
फेर एक दिन पठाओल राजकुमार,
युवक-युवती संग पठाओल करए विहार,
मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक,
हे सूतजी की अछि ई दृश्य,
सजा-धजा कए चारि गोटे धए कान्ह,
मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नहि जान।
हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख,
नहि बाजि सकत, अछि ई काठ समान।
कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक,
छोड़ए ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त।
घुरू सारथी नहि होएत ई बर्दाश्त,
भय नहि अछि एहि बेर,
मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर,
अज्ञानी सन कोना घुमब उद्यान।
मुदा नव सारथी घुरल नहि द्वार,
पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम।
युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी पुरोहित पुत्र,
करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन,
मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति,
पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की?
हे मित्र क्षणिक ई आयु,
बुझितो हम कोना गमाऊ,
साँझ भेल घुरि युवतीसभ गेल,
सूर्यक अस्तक संग सांसारक अनित्यताक बोध,
पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न,
शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन।
किछु दिनक उपरान्त,
माँगि आज्ञा बोन जएबाक,
संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार,
देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग,
दुखित बैसि उतड़ल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ,
बैसि जोमक गाछक नीचाँ धए ध्यान,
पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु।
छल ओऽ मोक्षक ताकिमे मग्न,
सुनि ओकर गप देखल होइत अन्तर्धान।
गृह त्यागक आएल मोनमे भाव,
बोन जएबाक आब एखन नहि काज।
घुरि सभ चलल गृहक लेल,
रस्तामे भेटलि कन्या एक,
कहल अहाँ छी जनिक पति,
से छथि निश्चयेन निवृत्त।
निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग,
सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा,
रहथि ओतए शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच।
कहल – लए संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल,
करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव।
हे पुत्र कएल की गप,
जाऊ पहिने पालन करू भए गृहस्थ,
संन्यासक नहि अछि आएल बेर,
तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक,
तखन दूर करू चारि टा हमर भय,
नहि मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय,
धन सेहो क्षीण नहि होए संगहि।
शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात,
तखन हमर वियोगक करू नहि पश्चाताप।
कहि सिद्धार्थ गेलाह महल बिच,
चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकललि बाह्य,
सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान,
कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाऊ,
सभ भेल निन्नमे भेर कंथक आएल,
चढा सिद्धार्थकेँ लए गेल नगरसँ दूर,
नमस्कार कपिलवस्तु,
घुरब जखन पाएब जन्म-मृत्युक भेद।
सोझाँ आएल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ,
लेलन्हि रत्नजटित कृपाण काटल केश,
मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ।
अश्रुधार बहल छंदकक आँखि,
जाऊ छंदक घुरु नगर जाऊ,
नहि सिद्धार्थ हम नहि छी सुमन्त,
छोड़ि राम घुरल अयोध्या नगर।
घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर,
तखने एक व्याध छल आयल,
कषाय वस्त्र पहिरने रहए कहल सिद्धार्थ,
हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र,
अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहिर,
छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि।
सिद्धार्थ अएलाह आश्रम सभ भेल चकित,
देखि नानाविध तपस्या कठोर,
नहि संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग,
अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि,
निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि,
स्वर्ग नहि मोक्षक अछि हमरा खोज,
जाऊ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ,
नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाऊ,
सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचलाह आगु।
एम्हर कंथकक संग छंदक खसैत-पड़ैत,
एक दिनमे आएल मार्ग आठ दिनमे चलैत,
घरमुँहा रस्ता आइ कम नहि अछि भेल अनन्त,
घुरि सुनेलक खबरि कषाय वस्त्र पहिरबाक सिद्धार्थक,
गौतमी मूर्छित, यशोधरा कानथि बाजि-बाहि,
एहन कठोर हृदय सिद्धार्थक मुखेटा कोमल रहए,
ओकरो सँ कठोर अछि हृदय हमर जे फाटए अछि नञि,
शुद्धोधन कहथि दशरथक छल भाग्य,
पुत्र वियोगमे प्राण हमर निकलए नञि अछि।
पुरहित आऽ मंत्रीजी निकलि ताकू जाय,
भार्गव मुनिक आश्रममे देखू पूछू ओतए।
जाय जखन सभ ओतए पूछल भार्गव कहल,
गेलथि अराड मुनिक आश्रम दिस मोक्षक लेल बेकल।
दुनू गोटे बढ़ि आगाँ देखैत छथि की,
कुमार गाछक नीचाँ बैसल ओतए।
पुरोहित कहल हे कुमार पिताक ई गप सुनू,
गृहस्थ राजा विदेह, बलि, राम आऽ बज्रबाहु,
केलन्हि प्राप्त मोक्ष करू अहाँ सेहो।
मुदा सिद्धार्थ बोनसँ घुरताह नहि,
मोक्षक लेलन्हि अछि प्रण तोरताह नहि।
हे सिद्धार्थ पहिनहु घुरल छथि बोनसँ,
अयोध्याक राम, शाल्व देशक द्रुम आऽ राजा अंबरीष,
हे पुरहित जी घुरू व्यर्थ समय नष्ट छी कए रहल,
राम आऽ कि आन नहि उदाहरण समक्ष,
नहि बिना तप कोनो क्यो बहटारि सकत,
ज्ञान स्वयं पाएब नव रस्ता तकैत,
घुरल दुहु गोटे गुप्त-दूत नियुक्त कए।
सिद्धार्थ बढ़ि आगाँ कएल गंगाकेँ पार,
राजगृह नगरी पहुँचि कए भिक्षा ग्रहण,
पहुँचि पाण्डव-पर्वत जखन बैसलथि,
राजा बिम्बसार आबि बुझाओल बहुत,
सूर्यवंशी कुमार जाऊ घुरि,
मुदा सिद्धार्थ कहल हर्यंक वंशज,
मोहकेँ छोड़ल घुरि जाएब कतए,
राजा सेहो होइछ कखनहुँ काल दुखित,
दास वर्गकेँ सेहो कखनहुँ भेटए छै खुशी।
करू रक्षाक प्रजाक संग अपन सेहो,
सिद्धार्थ वैश्वंतर आश्रम दिश बढ़लाह,
मगधराज चकित।
अराडक आश्रममे ज्ञान लेल गेलाह शाक्य,
कहल मुनि अविद्या अछि पाँचटा,
अकर्मण्यता आलस्यक अछि अन्हार,
अन्हारक अंग अछि क्रोध आऽ विषाद,
मोह अछि ई वासना जीवनक आऽ संगक मृत्यु,
कल्याणक मार्ग अछि मार्ग मोक्षक,
मुदा सिद्धार्थ कहल हे मुनिवर!
आत्माक मानब तँ अछि मानब अहंकारकेँ,
अहाँ गप नहि रुचल बढ़ल आश्रम उद्रकक से।
नगरी गेलाह राजर्षिक जे आश्रम छल,
मुदा नहि उत्तर भेटलक ओतहु सिद्धार्थक।
गेलाह तखन नैरंजना तट पाँचटा भिक्षुक भेटल,
छह बरख तप कएल मुदा प्रश्न अनुत्तरित छल।
स्वस्थ तनमे भेटत मनसक प्रश्नक उत्तर,
प्रण कएल ई निरंजनामे कएल स्नान ओऽ,
बाहर बहराए अएलाह तखने कन्या गोपराजक,
श्वेत रंग नील वस्त्रमे नन्द बाला जकर नाम छल,
आयलि पायस पात्र लेने तृप्त भए सिद्धार्थ भोजन कएल।
पाँचू संगी देखि ई सिद्धार्थक संग छोड़ल,
मुदा ओऽ भेलाह सबल बोधिसत्वक प्राप्तिक लेल,
दृढ़ प्रण लए पीपरक तर ओऽ आसन देलन्हि,
काल सर्प कहल देखू ई नीलकंठक झुण्डकेँ,
घुमि रहल चारू दिस अहाँक,
प्रमाण अछि जे बोधिसत्व प्राप्त करब अहाँ।
सुनि ई तृण उठाए कएल प्रतिज्ञा तखन,
सिद्धार्थ पाओत ज्ञान आऽ तखने उठत छोड़ि आसन।
ब्रह्मांड छल प्रसन्न मुदा दुष्ट मार डरायल,
कामदेव, चित्रायुध पुष्पसर नाम मारक,
सिद्धार्थ प्राप्त कए ज्ञान जगकेँ बताओत,
हमर साम्राज्यक होएत की तखन,
पुत्र विभ्रम,हर्ष, दर्प छल ओकर,
पुत्री अरति,प्रीति,तृषा के सेहो कए संग।
चलू ई लेने ढाल प्रतिज्ञाक,
सत् धनुषपर बुद्धिक वाण चढ़ाए,
जीतत से की जीतए देबए हमरा सभ आइ।
हे सिद्धार्थ यज्ञ कए पढ़ि कए शास्त्र,
करू इन्द्रपद प्राप्त भोगू भोग।
छोड़ू आसन देब वाण चलाए।
नहि देलन्हि सिद्धार्थ एहिपर ध्यान,
मार तखन देलक वाण चलाए,
मुदा भेल कोनो नहि परिणाम।
शिवपर सेहो चलल रहए ई वाण,
विचलित भेल रहथि ओऽ सेहो,
के अछि ई से नहि जान,
हे सैनिक हमर विकराल-विचित्र,
त्रिशूल घुमाए, गदा उठाए,
साँढ़क सन दए हुंकार,
आऊ करू विजित अछि शत्रु विकराल।
राति घनघोर अन्हरियामे कतए छथि चन्द्र,
तरेगणक सेहो कोनो नहि दर्श!
मुदा सभ गेल व्यर्थ पदार्पण भेल अदृश्य,
मार जाऊ होएत नहि ई विचलित।
देखू एकर क्षमा प्रतीक जटाक,
धैर्य अछि एकर जेना गाछक मूल,
चरित्र पुष्प बुद्धि शाखा धर्म फलक प्रतीक।
स्थान जतए अछि आसन पृथ्वीक थिक नाभि,
प्राप्त करत ई ज्ञान सहजहि आइ,
पराजित मार गेल ओतएसँ भागि।
रातिक पहिल पहरिमे शाक्य मुनि,
पाओल वर्णन स्मरण पूर्व जन्मक सहजहि,
दोसर पहरमे दिव्य चक्षु पाबि,
देखल कर्मक फल वेदनाक अनुभूति,
गर्भ सरोवर नरक आऽ स्वर्ग दुहुक,
पाओल अनुभव देखल खसैत स्वर्गहुसँ,
अतृप्त भोगी जन्म, जरा, मृत्यु।
बीतल तेसर पहरि चारिममे जाए,
पाओल ज्ञान बुद्ध भए पाओल शान्ति।
शान्त मन शान्त छल पूर्ण जगत,
धर्म चारू दिस बिन मेघ अछार,
सूचना देल दुन्दभि बाजि अकाश,
सकल दिशा सिद्धगणसँ दीप्तमय छल,
स्वर्गसँ वृष्टि पुष्पक इक्षवाकु वंश ई मुनि छल,
बैसल एहि अवस्थामे सात दिन धरि मुनि शाक्य,
विमान चढ़ि अएलाह तखन देवता दू टा,
करू उद्धार जगतक दए मोक्षक शिक्षा।
आऽ भिक्षुपात्र लए अएलाह फेर एक देव,
कएल स्मरण अराड आऽ उद्रकक बुद्ध,
मुदा दुहु छल छोड़ल जगत ई तुच्छ।
आब जाएब वाराणसी भिक्षु पाँचो संगी जतए,
कहल देखि बोधिक गाछ दिस स्नेहसँ।

उत्तर बुद्धचरित
बुद्ध चललाह असगरे रस्तामे भिक्षु एक भेटल

तेजमय अहाँ गुरु के छथि अहाँक
हे वत्स गुरु नहि क्यो हमर
प्राप्त कएल निर्वाण हम,
सभ किछु जानल जे अछि जनबा योग्य
लोक कहए छथि हमरा बुद्ध
जा रहल छी काशी दुखित कल्याण लेल
दूर सँ देखल वरुणा आ गंगाक मिलन
गेलाह बुद्ध लगहिमे मृगदाव वन।
पाँचू संगि हुनक रहथि ओतहि
देखैत अबैत विचारल क्यो नहि अभिवादन हुनक
मुदा पहुँचिते ई की गप भेल
सभ हुनक सत्कर छल लागि गेल
आसन दए जखन बैसेलन्हि हुनका सभ क्यो
उपदेश देब शुरु करितथि मुदा तखने बाजल कियो
अहाँ तँ तत्वकेँ नहि छी बुझैत
तप छोड़ि बीचहि उठल छलहुँ किएक
बुद्ध कहल घोर तप आ आसक्ति दुनुक हम त्याग कएल
मध्य मार्गकेँ पकड़ि बोधत्व प्राप्त कएल
एकर सूर्य अछि सम्यक दृष्टि आ
एकर सुन्दर रस्तापर चलैए सम्यक संकल्प
ई करैए विहार सम्यक आचरणक उपवनमे
सम्यक् आजीविका अछि भोजन एकर
सेवक अछि सम्यक व्यायाम,
शान्ति भेटैए एकरा सम्यक स्मृति रूपी नगरीमे
आ सुतैए सम्यक समाधिक बिछाओनपर ई।
एहि अष्टांग योगसँ अछि सम्भव ई
जन्म, जरा, व्याधि आ मृत्युसँ मुक्ति।
मध्य मार्ग चारिटा अछि ध्रुव सत्य
दुख, अछि तकर कारण, दुखक निरोध, आ अछि उपाय निरोधक
कौंडिन्य आ ओकर चारू संगी सुनल ई,
प्राप्त कएल सभ दिव्यज्ञान ।
हे नरमे उत्तम पाँचू गोटे
भेल ज्ञान अहाँ लोकनि के?
कौंण्डिन्य कहलन्हि हँ, भेल भंते,
कौंडिन्य भेलाह तखन प्रमुख धर्मवेत्ता
तखनहि यक्षसभ पर्वतपरसँ कएलक सिंहनाद,
शाक्यमुनि अछि कएलक धर्मचक्र प्रवर्तित,
शील कील अछि क्षमा-विनय अछि धूरी,
बुद्धि-स्मृतिक पहिया अछि सत्य अहिंसासँ युक्त,
एहिमे बैसि भेटत शान्ति ई बाजल सभ यक्ष।
मृगदावमे भेल धर्मचक्र प्रवर्तन।

फेर अश्वजित आ ओकर चारि टा आन भिक्षुकेँ
कएल निर्वाण धर्ममे बुद्ध दीक्षित,
फेर कुलपुत्र यश प्राप्त कएल अर्हत पद
यश आ चौवन गृहस्थकेँ
कएल बुद्ध सद्धर्ममे दीक्षित
घरमे रहि कऽ भऽ सकै छी अनाशक्त
आ वनमे रहियो प्राप्त कऽ सकए छी आशक्ति
एहिमेसँ आठ गोट अर्हत प्राप्त शिष्यकेँ
बिदा कए आठो दिशामे चललाह बुद्ध
पहुँचि गया जितबाक रहन्हि इच्छा
सिद्धिसभसँ युक्त काश्यप मुनिकेँ।
गयामे काश्यप मुनि कएलन्हि स्वागत बुद्धक,
मुदा रहबाक लेल देल अग्निशाला रहए छल महासर्प जतए,
रातिमे मुदा ओ सर्प प्रणाम कएल बुद्धकेँ
भोरमे काश्यप देखल सर्पकेँ बुद्धक भिक्षापात्रमे
कए प्रणाम ओ आ हुनकर पाँच सए शिष्य
संग अएलाह काश्यक भाए गय आ नदी
कएल स्वीकार धर्म बुद्धक
प्राप्त कएल गय उत्तुंगपर निर्वाणधर्मक शिक्षा
लए सभ काश्यपकेँ संग बुद्ध पहुँचल राजगृहक वेणुवण,
बिम्बसार सुनि आएल ओतए देखल काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य बनल
पूछल बुद्ध तखन काश्यपसँ छोड़ल अहाँ अग्निक उपासना किएक भंते
काश्यप कहल मोह जन्म रहि जाइछ देने
आहुति अग्निमे कएने पूजा पाठ ओकर,
बुद्धक आज्ञा पाबि कएल काश्यप दिव्य शक्तिक प्रदर्शन
आकाशमध्य उड़ि अग्निक समान जरि कए,
तखन बिम्बसारकेँ देल बुद्ध अनात्मवादक शिक्षा
विषय, बुद्धि आ इन्द्रिक संयोगसँ अबैछ चेतनता
शरीर इन्द्रिय आ चेतना अछि भिन्न
आ अभिन्न सेहो।
बिम्बसार भऽ प्रसन्न दान बुद्धकेँ वेणुवन देल
तथागतक शिष्य अश्वजित नगर गेल भिक्षाक लेल
कपिल संप्रदायक लोक देखि तेज पूछल अहाँक गुरु के?
कहल अश्वजित सुगत बुद्ध छथि जे इक्षवाकुवंशक
सएह हमर गुरु कहए छथि बिन कारणक नहि होइछ किछुओ
उपतिष्य ब्राह्मणकेँ प्राप्त भेल ज्ञान कहलक ओ मौद्गल्यायनकेँ
मौद्गल्यायनकेँ सेहो प्राप्त भेलैक सम्यक दृष्टि सुनिकेँ
सुनि वेणुवनमे उपदेश त्यागल जटा दंड
पहिरि काषाय कएल साधना प्राप्त कएल परम पद
काश्यप वंशक एकटा धनिक ब्राह्मण छोड़ल पत्नी परिजन
प्रसिद्धि भेटल हिनका महाकाश्यप नामसँ।
कोसलक श्रावस्तीक धनिक सुदत्त आएल वेणुवन
गृहस्थ रहितो प्राप्त भेल तत्वज्ञान ओकरा
उपतिष्य संगे सुदत्त गेल श्रावस्ती नगर
जेत केर वनमे विहार बनएबाक कएल निश्चित्
जेत रहए लोभी ढेर पाइ लेलक जेतवनक
मुदा देखि दैत पाइ हृदय परिवर्तित भेल ओकर
सभटा वन देलक ओ विहारक लेल
विहार शीघ्रे बनि गेल उपतिष्यक संरक्षकत्वमे।

बुद्ध फेर राजगृहसँ चलि देलन्हि कपिलवस्तु दिस
ओतए पिता शुद्धोधनकेँ देल बौद्ध रूपी अमृत
कोनो पुत्र पिताकेँ नहि देने रहए ई
कर्म धरए अछि मृत्युक बादो पछोड़
कर्मक स्वभाव, कारण, फल, आश्रयक रहस्य बुझू,
जन्म, मृत्यु, श्रम, दुखसँ फराक पथ ताकू

आनन्द, नन्द,कृमिल, अनुरुद्ध, कुन्डधान्य, देवदत्त, उदायि
कए ग्रहण दीक्षा छोड़ल गृह सभ
अत्रिनन्दन उपालि सेहो कएल ग्रहण दीक्षा
शुद्धोधन देल राजकाज भाए केँ
रहए लगलाह राजर्षि जेकाँ ओ
फेर बुद्ध कएल प्रवेश नगरमे
न्यग्रोध वनमे बुद्ध पहुँचि
चिन्तन कल्याणक जीवक करए लगलाह।

फेर ओ ओतए सँ निकलि गेलाह प्रसेनजितक देस कोसल
श्रावस्तीक जेतवन छल श्वेत भवन आ अशोकक गाछसँ सज्जित
सुदत्त कएल स्वर्णमालासँ स्वागत बुद्धक
कएल जेतवन बुद्धक चरणमे समर्पित।
प्रसेनजित भेल धर्ममे दीक्षित
तीर्थक साधु सभक कए शंकाक समाधान
कएल बुद्ध हुनका सभकेँ दीक्षित।
ओतएसँ अएलाह बुद्ध फेर राजगृह
ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण,अंगदकेँ उपदेश दए,
कएल सभकेँ संघमे दीक्षित।
ओतएसँ गंधार जाए राजा पुष्करकेँ कएल दीक्षित
विपुल पर्वतपर हेमवत आ साताग्र दुनू यक्षकेँ उपदेश दए
अएलाह जीवकक आम्रवन।
ओतए कए विश्राम घुमैत-फिरैत
पहुँचल आपण नगर,
ओतए अंगुलीमाल तस्करकेँ
कएल दीक्षित प्रेमक धर्ममे।
वाराणसीमे अस्तितक भागिन कात्यायनकेँ कएल दीक्षित
देवदत्त मुदा भए ईर्ष्यालु संघमे चाहलक पसारए अरारि
गृध्रकूट पर्वतपर खसाओल शिलाखंड बुद्धपर
राजगृह मार्गमे छोड़ल हुनकापर बताह हाथी
सभ भागल मुदा आनन्द संग रहल बुद्धक
लग आबि गजराज भए गेल स्वस्थ कएल प्रणाम झुकि कए
उपदेश देल गजराजकेँ बुद्ध
देखल ई लीला राजमहलसँ अजातशत्रु
भए गेल ओहो शिष्य तखन बुद्धक।
राजगृहसँ बुद्ध अएलाह पाटलिपुत्र
मगधक मंत्री वर्षाकार बनए छल दुर्ग
बुद्ध कएल भविष्यवाणी होएत ई नगर प्रसिद्ध
तखन तथागत गेलाह गौतम द्वारसँ गंगा दिस
गंगापार कुटी गाममे
देल उपदेश धर्मक
फेर गेलाह नन्दिग्राम जतए भेल छल बहुत रास मृत्यु
दए सान्त्वना गेलाह वैशाली नगरी
निवास कएल आम्रपालीक उद्यानमे
श्वेत वस्त्र धरि अएलीह ओ
बुद्ध चेताओल शिष्य सभकेँ धरू संयम रहब स्थिरज्ञानमे लऽ बोधक ओखध
प्रज्ञाक वाणसँ शक्तिक धनुषसँ करू अपन रक्षा।
आम्रपाली आबि पओलक उपदेश
भेलैक ओकरा घृणा अपन वृत्तिसँ
माँगलक धर्मलाभक भिक्षा,
बुद्ध कएलन्हि प्रार्थना ओकर स्वीकार,
संगहि आएह भिक्षाक लेल अहाँक द्वार ।
सुनि ई गप जे आएल छथि बुद्ध आम्रपालीक उद्यान
लिच्छवीगण अएलाह बुद्धक समीप
बुद्ध देलन्हि शीलवान रहबाक सन्देश,
लिच्छवीगण देलन्हि भिक्षाक लेल अपन-अपन घर अएबाक आमन्त्रण,
पाबि आमन्त्रण कहलन्हि बुद्ध
मुदा जाएब हम आम्रपालीक द्वार
कारण हुनका हम देलियन्हि अछि वचन।
लिच्छवीगणकेँ लगलन्हि ई कनेक अनसोहाँत,
मुदा प्पबि उपदेश बुद्धक,
घुरलाह अपन-अपन घर-द्वार।

पराते आम्रपालीसँ ग्रहण कए भिक्षा
बुद्ध गेलाह वेणुमती करए चारि मासक बस्सावास।
चारि मास बितओला उत्तर,
रहए लगलाह मर्कट सरोवरक तट।
ओतहि आएल मार,
कहलक हे बुद्ध नैरंजना तटपर अहाँक संकल्प
जे निर्वाणसँ पूर्व करब उद्धार देखाएब रस्ता दोसरोकेँ,
आब तँ कतेक छथि मुक्त, कतेक छथि मुक्ति पथक अनुगामी,
आब कोनो टा नहि बाँचल अछि कारण
करू निर्वाण प्राप्त।
कहलन्हि बुद्ध, हे मार
नहि करू चिन्ता,
आइसँ तीन मासक बाद,
प्राप्त करब हम निर्वाण,
मार होइत प्रसन्न तृप्त
गेल घुरि,
बुद्ध धऽ आसन प्राणवायुकेँ लेलन्हि चित्तमे
आ चित्तकेँ प्राणसँ जोड़ि योग द्वारा समाधि कएल प्राप्त।
प्राणक जखने भेल निरोध,
भूमि विचलित, विचलित भेल अकास,
आनन्द पूछल करू अनुग्रह लिच्छवी सभपर,
किएक ई धरा आ आकास,
दलमलित मर्त्य आ दिव्यलोक।
बुद्ध कहलन्हि आबि गेल छी हम बाहर,
छोड़ि अपन प्रकोष्ठ,
मात्र तीन मास अनन्तर
छोड़ब ई देह,
निर्वाण मे रहबा लेल सतत ।
आनन्द सुनि ई करए लागल हाक्रोस,
सुनि विलाप लिच्छवी गण जुटि सेहो,
विलापमे भऽ गेलाह संग जोड़ ।
बुद्ध सभकेँ बुझा-सुझा,
चललाह वैशालीक उत्तर दिशा।
पहुँचि भोगवती नगरी,
देल शिक्षा जे विनय अछि हमर वचन,
जे बोल अछि विनयविहीन,
से अछि नहि धर्म।
तखन मल्लक नगरी पापुर जाए,
अपन भक्त चुंदक घरमे कएल भोजन बुद्ध,
दए ओकरा उपदेश बिदा भेलाह कुशीनगरक दिस।
संगे चुन्दक पार कएल इरावती धार
सरोवर तटपर कए विश्राम,
कए हिरण्यवती धारमे स्नान,
कहल हे आनन्द,
दुनू शालक गाछक बीच करब हम शयन।
आजुक रातिक उत्तर पहर,
करब प्राप्त निर्वाण।
हाथक बनाए गेरुआ,
दए टाँगपर टाँग,
लऽ दहिना करोट कहल हे आनन्द,
बजा आनू मल्ल लोकनिकेँ,
भेँट करबा लेल निर्वाण पूर्व,
शान्त दिशा, शान्त व्याघ्र-भालु,
शान्त चिड़ई शान्त सभटा जन्तु।
आबि मल्ल लोकनि कएल विलाप,
मुदा बुद्ध दए सांत्वना घुरेलन्हि सभकेँ।
आएल सुभद्र त्रिदंडी संन्यासी तकर बाद,
पाबि अष्टांग मार्गक शिक्षा,
कहल सुभद्र हे करुणावतार
अहाँक मृत्युक दर्शनसँ पहिने हम करए
चाहैत छी निर्वाण प्राप्त,
बैसल ओ पर्वत जेकाँ
आ जेना मिझा जाइत अछि दीया
हवाक झोँकसँ,
तहिना क्षणेमे कएलक निर्वाण प्राप्त।
छल ई हमर अन्तिम शिष्य,
सुभद्रक करू अन्तिम संस्कार ।
बीतल आध राति,
बुद्ध बजाए सभ शिष्यकेँ,
देल प्रातिमोक्षक उपदेश,
कोनो शंका होए तँ पूछू आइ,
अनिरुद्ध कहल नहि अछि शंका आर्य सत्यमे ककरो।
बुद्ध तखन ध्यानक एकसँ चारिम तहमे पहुँचि,
प्राप्त कएल शान्ति।
भेल ई महापरिनिर्वाण,
मल्ल सभ आबिउठेल बुद्धकेँ स्वर्णक शव-शिविकामे,
नागद्वारसँ बाहर भए कएलन्हि पार हिरण्यवती धार,
मुदा शवकेँ चन्दनसँ सजाए,
जखन लगाओल आगि, नहि उठल चिन्गारि,
शिष्य काश्यप छल बिच मार्ग,
ओकरा अबिते लागल चितामे आगि।
मल्ल लोकनि बीछि अस्थि धऽ स्वर्णकलशमे,
आनल नगर मध्य,
बादमे कए भवन पूजाक निर्माण,
कएल अस्थिकलश ओतए विराजमान।
फेर सात देशक दूत,
आबि मँगलक बुद्धक अस्थि,
मुदा मल्लगण कएल अस्वीकार,
तँ बजड़ल युद्धक युद्ध,
सभ आबि घेरल कुशीनगर,
मुदा द्रोण ब्राह्मण बुझाओल दुनू पक्ष।
बाँटि अस्थिकेँ आठ भाग,
द्रोण लेलक ओ घट आ पिसल गण छाउर बुद्धक,

सभ घुरलाह अपन देश आब।
अस्थि कलश छाउर पर बनाए स्तूप,
करए गेलाह पूजा अर्चना जाए,
दसटा स्तूप बनि भेल ठाढ़,
जतए अखण्ड ज्योति आ घण्टाक होए निनाद।
फेर राजगृहसँ आएल पाँच सए भिक्षु,
आनन्दकेँ देल गेल ई काज,
बुद्धक सभ शिक्षाकेँ कहि सुनाऊ,
होएत ई सभ समग्र आब।
हम ई छलहुँ सुनने एहि तरहेँ,
कएल सम्पूर्ण वर्णन नीक तरहेँ।
कालान्तरमे अशोक स्तूपसँ लए धातु कए कएक सए विभाग,
बनाओल कएक सए स्तूप,
श्रद्धाक प्रतीक।
जहिया धरि अछि जन्म, अछि दुख,
पुनर्जन्मसँ मुक्ति अछि मात्र सुख,
तकर मार्ग देखाओल जे महामुनि,
शाक्यमुनि सन दोसर के अछि शुद्ध।

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ’ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ’ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ’ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ’ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: