VIDEHA

‘विदेह’ ३३म अंक ०१ मई २००९ (वर्ष २ मास १७ अंक ३३)- part III

In Uncategorized on मई 14, 2009 at 9:16 पूर्वाह्न

विवेकानंद झा,वरिष्ठ उप-संपादक छथि नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेडमे।
1.कविता आ की सुजाता/ 2.चान आ चान्नी

कविता आ की सुजाता

बूझल नहि
कखन कत्त आ कॊना
हमरा आंखि मे बहऽ लागल
कविता
नदी बनि कऽ
भऽ गेल ठाढ़
पहाड़
करेज मे
जनक बनि कऽ
देखलिए
चिड़ै चुनमुन
नहि डेराइत अछि
आब
खेलाइत अछि
हमरा संग
गाछीक बसात
अल्हड़ अछि
मज्जर विहीन
भूखले पेट
नचैत अछि
झूमैत अछि
कारी मेघ माथ पर
अकस्मात कानि उठैछ
सुजाता सुन्नरि
नॊर संऽ चटचट गाल
चान पर कारी जेना
चान आ चान्नी
अहां कें नहि लगैछ
जे चान आ चानक
शुभ्र धवल इजॊत
आ ओहू सऽ नीक हेतै
इ कहब
जे चान आ ओकर चाननी आकी इजॊरिया
दू टा नितांत भिन्न आ फराक चीज थिकै

ईश्वर जखन बनौलकै चान
तऽ सुरुज संऽ मंगलकै
कनेक टा इजॊत
आ ओहि इजॊत कें चान
कॊनॊ जादूगर जेकां
इजॊरिया बना देलकै
जेना प्रेम जाधरि रहैत छै
करेज में
कॊनॊ जॊड़ा कें
लैला मजनू बना दैत छै
चंद्रमॊहन के चांद
आ अनुराधा कें फिजां
बना दैत छै
आ फेर तऽ वएह अन्हरिया व्यापि जाइत छैक चहुंदिश

मुदा हम तऽ कहैत रही
जे जहिया
सुरुज संऽ पैंच लेल इजॊत के चान
कॊनॊ कविराज जेकां
अपन सिलबट्टा पर खूब जतन संऽ
पीस पीस कऽ
चंदनक शीतल लेप सऽन इजॊरिया बना देलकै
तहिया संऽ रखने छै
अपना करेज मे साटि कऽ
मुदा बेर बेखत बांटितॊ छै
तें खतम हॊइत हॊइत एकदिन
अमावश्याक नौबति सेहॊ आबिए जाइत छैक
आ फेर सुरुज संऽ ओकरा मांगऽ पड़ैत छैक
कॊनॊ स्वयंसेवी संगठन जेकां पैंचक इजॊत
लॊक कें सीधे सरकार रायबहादुर सुरुज लग
जयबाक सेहंता तऽ छै
मुदा साहस कतऽ संऽ अनतै ओ
एतेक अमला फैला छै सुरुजक चहुंदिश
जे करेजा मुंह में अबैत छै
हुनका लग कॊना जाऊ सर्व साधारण
ओ तऽ धधकै छथिह्न आधिक्यक ताप संऽ

खैर हम जहि चानक गप्प कऽ रहल छी
ओकरा संऽ डाह करैत छै मेघ
सदिखन संऽ ओ ईर्षाक आगि मे जरैत आयल अछि
भगवान मङने रहथिह्न वृष्टि मेघ संऽ चान लेल
मुदा ओ नहि देने छल
एक्कहु बुन्न पानि
झांपि देने छल चान कें
हमरा बूझल अछि ओ
बनऔने हॊयत धर्मनिरपेक्षता आ सांप्रदायिकताक बहाना
लॊक हित में काज नहि अबैत ह्वैतेक ओकरा
मुद्दा ओकर ह्वैतेक किछु आउर

मुदा हऽम तऽ एम्हर
मात्र एतबे
कहऽ चाहैत रही
जे हमरा केओ चान
आ अहांके चान्नी
जुनि कहय
की जखन मेघ
झांपैत छै चान कें
तऽ पहिने मरैत छै
इजॊत
आ बाद में मरैत छै चान
आ हम नहि चाहैत छी
जे हमर इजॊत
हमरा संऽ पहिने खतम हॊ
हमरा संऽ पहिने मरय
कखनहुं नहि किन्नहुं नहि
सत्ते

1

মধূলিকা চৌধবী said…
1.कविता आ की सुजाता/ 2.चान आ चान्नी
dunu kavita mon ke praphullit karae bala,
ee kavi bes badhi dahar, bunni achhar dekhne chhathi, anubhavak prachurtak bina ehan uchcha kotik kavita likhab sambhav nahi
Reply05/07/2009 at 02:09 PM
2

বশ্মি প্রিযা said…
विचारक प्रस्फुटन अछि ई दुनू कविता, आ तेँ विशिष्ट बनबैत अछि एकरा।
Reply05/07/2009 at 02:04 PM
3

कृष्ण यादव said…
देखलिए
चिड़ै चुनमुन
नहि डेराइत अछि
आब
bad nik vivekanand ji
Reply05/06/2009 at 11:30 PM
4

Keshab Mahto said…
Vivekanand ji dhanyavad etek nik kavitak lel.
Reply05/05/2009 at 12:02 PM
5

विद्यानन्द् झा said…
विवेकानन्द जी नव कवि लोकनि मे विशिष्ट स्थान बनओताह से एहि दुनू कवितासँ पता चलि रहल अछि।
शुभकामना।
Reply05/05/2009 at 12:01 PM

सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।

मध्य वर्गक सपना
भीजि क’ आयल छलहुँ हम
आँखि मे किछु स्वप्न धेने।
मोन के पौती मे भरि क’
स्नेह के संदेश रखने।

किछु कहब हम बात अप्पन
किछु अहाँ सँ आइ पूछब।
फेर हम निष्प्राण भ’ क’
बाँहि मे विश्राम खोजब।

पी लितहुँ हम नोर आँखिक
ठोर पर उतरल अहाँ के।
नेह सँ परितृप्त करितहुँ
साटि छाती मे अहाँ के।

ल’ लितहुँ चुम्बन हृदय सँ
गाढ़ रक्तिम ठोर पर हम।
की करै छी ? लोक देखत,
अहाँ कहितहुँ , हँसि दितहुँ हम।

भागि चलितहँु फेर सँ हम
संग ल’ सुन्दर विगत मे।
कल्पना के पाँखि ल’ क’
उड़ि जयतहुँ उन्मुक्त नभ मे।

होइत जौं ई सत्य सपना
देवता के जल चढ़बितहुँ।
हे प्रिये ! होइतै केहन जौं
किछु समय के रोकि सकितहुँ।

भेंट होइते सभ बिसरलहुँ
हम केना क’ बात मोनक।
छै कहाँ रहि गेल वश मे
स्वप्न देखब मध्यवर्गक।

अछि जतेक सामथ्र्य अप्पन
क’ रहल छी कर्म सभटा।
मोन मे अछि सोच कहुना
किछु रहय बाँचल प्रतिष्ठा।

अर्थ दुर्लभ वस्तु जग केँ
अछि एकर भरि मास खगता।
खर्च बढ़िते जा रहल अछि
बढ़ि रहल दानव बेगरता।

कात मे मुनियाँ कनै अछि
किछु नया परिधान कीनत।
नीक ब्राँडक जींस, जैकेट
पुत्रा बड़का आइ आनत।

माँग छल पायल अहूँ के
मोन मे अछि दू बरख सँ।
नीक कुर्ता लेब हमहूँ
जीब की हम आब सुख सँ।

साग – सब्जीक दाम पुछि क’
होइत अछि परिपूर्ण इच्छा।
जा रहल छी पाँव पैदल,
भाग्य अछि रेलक प्रतिक्षा।

देत के सहयोग अपनो
क’ रहल अछि लोक शोषण।
चीज शौखक अछि सेहन्ता
क’ रहल छी मात्रा भोजन।

नाम सँ के आब चिन्हत
अर्थ केँ सम्मान होइ छै।
झूठ के सम्बन्ध सगरो
के कतय किछु प्राण दै छै।

कामना भगवान सँ अछि
जन्म दोसरो, संग भेटय।
उच्च नहि त’ दीन .. निर्धन
वंश कुल मे जन्म भेटय।

माँटि पर बैसल अहाँ संग
खेल करितहुँ, स्नेह सदिखन।
काल्हि के नहि आइ चिन्ता
छुच्छ जीवन, तुष्ट जीवन।
1

VIDEHA GAJENDRA THAKUR said…
सतीश जी । मध्य वर्गक सपनाकेँ नीक जेकाँ रेखांकित केलहुँ।
Reply05/09/2009 at 10:28 AM
2

कृष्ण यादव said…
खर्च बढ़िते जा रहल अछि
बढ़ि रहल दानव बेगरता।
satish ji bad nik santulit aa prerak,
muda hilkor utha delahu
Reply05/06/2009 at 11:32 PM
3

Arvinda kummar said…
Manak ego nirakar bhawna ke pradarshit karai vala ati vilakshan
Reply05/06/2009 at 05:35 PM
4

Subodh thakur said…
Apnek rachna Madhyam vargak jingi k parkram kay rahal achi a sarpahaun madhyam varg apan pur jeevan sapna pura karaike lel ashavan rahait jingi kati lait chati
Reply05/06/2009 at 05:13 PM
5

Anshumala Singh said…
Satish Jik Kavita bad nik lagal, hridaysparshi.
Reply05/05/2009 at 12:03 PM
सुबोध ठाकुर, गाम-हैंठी बाली, जिला-मधुबनीक मूल निवासी छथि आ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट प्रैक्टिशनर छथि।

मनक तरंग
सनन-सनन सन बहए छल पवन
शब्दक हिल्कोरक संग डोलि रहल छल मन
सोचल किए नहि शब्दकेँ छन्दक रूप देल जाए,
कविता एक अनमोल बनाओल जाए,
लिखए बैसलहुँ हम तखन

सनन-सनन सन बहए छल पवन

विरहक वेदना मोनमे जतेक छल
मानस-पटलपर तखने सभटा उभरल,
शब्दक रूपी बूँद से बुझबए लेल अगन
लिखए बैसलहुँ हम तखन
सनन-सनन सन बहए छल पवन

नहि हम अति विद्वान छी
परञ्च लग-पास परिलक्षित दृश्यसँ अनजान छी,
करए लगलहुँ सभकेँ बुझबए लेल तँए जतन,
सनन-सनन सन बहए छल पवन

हृदयक आह्लादसँ,
विनती कएलहुँ सन्ध्या कालक प्रह्लादसँ
जुनि बनाऊ आर ककरो परदेशी कठोर साजन
सनन-सनन सन बहए छल पवन

नहि जानि की हम लिखलहुँ
लिखए काल हम किछु नहि बुझलहुँ
जुनि बुझब एकरा झूठ वचन
ई अछि शब्द रूपी मनक तरंग
सनन-सनन सन…

1

Arvind said…
Subodh ji ke kavita me manak ek nirakar bhawna achi
Reply05/06/2009 at 05:37 PM
2

Kundan Jha said…
flow chhal kavita me.
Reply05/05/2009 at 12:04 PM
ज्योति
महावतक हाथी
महावत आयल हाथी लऽ कऽ
भीख माॅंगैत दलान पर ठाढ़ भऽ
बच्चा सब मे मचल हलचल
लऽग जायमे डेरायताे छल
मुदा सबमे चाह छल सवारी के
भीड़मे अपन र् अपन पारी के
कियाे कानल जॅं जायमे भेल देरी
कियाे कानऽ लागल चढ़ैत देरी
अहि सबमे महावत सम्हारैत
अपन हाथी के रहल पुचकारैत
अतेक भयावह विशालकाय प््राMाणी
काेना अनुशासित छल की जानी
जेना आे बुझैत रहै भाषा मनुषक
वा भऽ गेल छल आेकरा हिस्सक
अपन वास्तविक वातावरण स वंचित
पराधीनता स नहिं हाेइत विचलित
जीविका हेतु करैत कतेक प््रातयत्न
जानवराे भऽ पाैलक मनुषक जीवन
मालिकक अत्यााचार के पीबैत विष
एक यात्रा पशुत्वु सऽ मानवत्व् दिस
1

Suresh Kumar Chaupal said…
Mahavtak hathi padhi bachchak bad kichhu gap mon pari gel.
Reply05/05/2009 at 12:07 PM
४. गद्य-पद्य भारती -सोंगर,मूल कोंकणी कथाः खपच्ची,लेखकः श्री. सेबी फर्नानडीस, हिन्दी अनुवादकः डॉ. चन्द्रलेखा डिसूजा,मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह

सोंगर

मूल कोंकणी कथाः खपच्ची
लेखकः श्री. सेबी फर्नानडीस

हिन्दी अनुवादकः डॉ. चन्द्रलेखा डिसूजा.

मैथिली अनुवाद :

डॉ.शंभु कुमार सिंह
जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।

सोंगर

13 सितम्बर, दिन मंगल। भोरे-भोर मोबाइल खनकल। हमरा ओछाओनक लगहिमे मोबाइलक प्रकाश एना झिलमिलाइत छल जेना भिनसरे कोनो अस्पतालक‘वैन’ रोगी केँ ल’ क’ निकलल हो। हम अपन आँखि मलैत मोबाइल उठौलहुँ…देखलहुँ तँ नम्बर चिर-परिचित छल। शैली केर। शैली माने हमर मिता, जे हमरे ऑफिस मे काज करैत अछि। बहुत नीक आ जिम्मेवारीक पद पर ओकर नियुक्ति भेल छैक। ओना देखल जाय तँ अपन स्वभाव सँ ओ एकदम सरल आ अपन काजसँ मतलब राखय वाली। नरम-नरम घोंघा-सन। जँ क्यो किछु कहि देलक तँ चुपचाप सुनि लए वाली। साँच पुछू तँ ओ हमरो बड़ नीक लागैत अछि। हमरा बुझने सभ कन्याकेँ शैलीए-सन हेबाक चाही। हम अपन मोनक बात कैक बेर ओकरा बतएनहुँ छी मुदा ओ ओकरा अनसुना करि दैत अछि। हम सभ एक दोसराकेँ लगधक सात बरखसँ जानैत छी। हमरा सभक दोस्ती विश्वविद्यालयमे पढ़बाकाल भेल छल। शैलीक हँसबाक अंदाज आ ओकर सरल स्वाभाव दुनू हमरा अतीव पसिन्न अछि। संभवतः यैह कारण रहल हेतैक जे हम ओकरा दिस झुकल चलि गेलहुँ। आइ तँ जेना ओ हमर मिता नहि अपितु हमर छाँह हो तहिना बुझाइत अछि। आइ ओ हमरा लेल हमर सभसँ करीबी बनि गेल अछि।
हेलो….. हम मोबाइल उठबैत कहलहुँ।
“शागू हम शैली बाजि रहल छी…. हम एखनहि अहाँसँ भेंट कर’ चाहै छी।”
शैलीक ई जबाब तँ जेना हमरा आँखिक निन्ने उड़ा देलक।
“मुदा बाद की थिक? से तँ साफ-साफ बताउ…….”
“बताएब, सभ किछु बताएब। मुदा अहाँ भेंट त’ दिअ।”
ठीक छैक भेंट क’ रहल छी… ऑफिस मे… 9:30 बजे।
“नहि, नहि एखनहि मिलबाक अछि।” शैली बाजलि।
“मुदा एखन…”
“नहि, नहि हम किछु नहि सुन’ चाहैत छी।” कहितहि ओकर बोली जेना काँप’लागलैक।
“देखू शैली कानू नहि प्लीज…..”
“हम की करी शागू! हमरा समझमे किछु नहि आबि रहल अछि।” ओ बाजलि।
हमरा शैली पर दया आबि गेल।
“ठीक छैक, हम एखनहि अहाँक ओतए आबि रहल छी। साढ़े आठ बजे धरि हम आबि जाएब, अहाँ घबराउ जुनि।” ओकर साहस बढ़बैत हम कहलिऐक।
“ठीक छैक, हम अहाँक बाट देखि रहल छी।” कहैत शैली मोबाइल बन्न क’देलक।
हे भगवान ! की भेल हेतैक ? ई सोचैत-सोचैत हम हाँइ-हाँइ केँ मुँह धोलहुँ, कल्हुके पहिरलाहा अंगा-पेंट पहिर निकलि गेलहुँ। घरसँ निकलतहि हमरा मोनमे कैक प्रकारक शंका-कुशंका केर चक्र चल’ लागल। आखिर की भेल हेतैक शैलीकेँ? की ओकर मोन खराब भ’ गेलैक? वा अचानक टकाक कोनो बेगरता पड़ि गेलैक? हम आर झटकि कए चल’ लागलहुँ। पौने आठहिं बजे हम शैलीक घर पहुँच गेलहुँ।
पछिला बेर जे शैली अपन घर गेल छलीह तँ ओ “वाल” (एक प्रकारक तरकारी) क लत्ती आनने छलीह। आब ओ लत्ती नरम-मोलायम पातक संग सोंगरक सहारे उपर दिस बढ़ि रहल छल, संगहि ओ अपन जड़ि जमएबाक जतन क’ रहल छल।
दरबज्जा खटखटएलासँ पूर्वहिं शैली दरबज्जा खोललक। ओ शायत हमर पयरक आहटि सुनि नेने छल। जहिना हम घरमे प्रवेश कएलहुँ, शैली दरबज्जा बन्न क’हमरासँ लिपटि गेल। शैलीक ई व्यवहार हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल। “शैलीक व्यवहार एहन किएक भ’ गेलैक?” हम मोने-मोन सोचलहुँ। जरूर किछु विशेष भेल छैक, तखनहि तँ ओ हमरा अपन हितचिंतक बुझि एना क’ रहल अछि? हम नहुँए-नहुँए ओकर पीठ सहलाबैत रहिलऐक।
“की भेल शैली? ऐना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छी? किछु बाजबो तँ करू?”
ओ शनैः-शनैः अपनाकेँ हमरासँ अलग कएलक आ हमरा मुँह दिस निहार’लागलीह।
हमरा बुझा रहल छल जे जरूर शैलीक संगे किछु अनिष्ट भेल छैक? ओकरा आँखिसँ नोर तेना बहैत रहैक जेना भदवारिक इनारसँ पानि बहराबैत छैक। हमरा मोन पड़ल अपन गामक “सेजांव” उत्सव जाहिमे लोक इनारमे कूदि जाइत छैक आ छपाक होइतहि पानिक छींटा एमहर-ओमहर पसरि जाइत छैक। शैलीक आँखिक पानि फेर उफन’ लागलैक। ओ फेर हमरासँ लिपटि गेल। एहिबेर ततेक नोर बहलैक जे हमर अँगा भीज गेल। ओकर शीतलता मानू हमरा हृदयकेँ सेहो भीजा देलक। हमहूँ बरफ जकाँ पिघल’ लागलहुँ। हमरा जीवनमे सदैव एकटा दृढ़ गाछक सदृश ठाढ़ रहएवाली शैली आइ सिगरेटक पुत्ती जकाँ ढ़हि रहल छलीह।
“शैली आखिर किछु बताउ त’! आब तँ हम अहाँक समक्ष छी।”
ई सुनतहि शैली आर फफकि-फफकि कए कानए लागलीह।
“देखू शैली, एना कानने कलपने सँ काज नहि चलत, जाधरि अहाँ किछु बताएब नहि हम कोना बुझू?”
“हम लूटि गेलहुँ शागू…. हम तबाह भ’ गेलहुँ…..फँसि गेलहुँ….हमर इज्जति पानि भ’ गेल…. हमरा लूटि लेल गेल…..।”
“अरे…..अरे…..शैली, ई अहाँ की बाजि रहल छी? बाज’ सँ पहिने अपन शब्दकेँ नापि-जोखि लेल करू।”
हमरा लेल ओकर ई बात बहुत दुखदायी छल। आइ शैली एना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छलीह? एहिसँ पहिने तँ ओ हमरा संगे शब्दक एहन खेल नहि खेलने छलीह?
“बाजू शैली, की भेल…”
“हमर कपारे मे आगि लागि गेल अछि….। हमर महीनवारीक दिन बीत गेल अछि, आ….। काल्हि हम डॉक्टरसँ चेकअप करौलहुँ त’…।”
ओ ई बात! तँ शैलीक परेशानीक ई कारण छैक। हम मोने-मोन सोचलहुँ।
“पछिला महीनवारीक कोन तारीख छल? हम पुछलिऐक।”
“दुइ अगस्त।” ओ बाजलि।
हम मोनहि-मोन गिनती लगएलहुँ….कैक दिन निकलि चुकल छलैक। हमरा किछु बाज’ सँ पूर्वहि शैली बाजल—सात दिन धरि हम बाट देखैत रहलहुँ काल्हिए डॉक्टरसँ देखएलहुँ, रिपोर्ट + + आएल छैक।
+ + केर माने भेलैक जे शैलीक कोखिमे नव ‘जीव’ अस्तित्वमे आबि गेल छैक। हमरा मिताकेँ बियाहसँ पहिनहि कल्याणक योग भ’ गेलैक। हम ई की सुनि रहल छी? कोना भ’ गेलैक ई सभ? हमरा माथ घूम’ लागल… कैक प्रकारक सवालसँ हमर माथ फाटल जा रहल छल। ओमहर शैली अनवरत रूपेँ कानि रहल छलीह। हे भगवान! शैलीक घरक लोककेँ जखन एहि बातक आभास हेतैक तखन की हेतैक?
एखन शायत शैलीकेँ सान्त्वनाक आवश्यकता छलैक। शैलीक कपार पर विपतिक पहाड़ टूटल रहैक आ हम पत्ता जकाँ काँपि रहल छलहुँ। जेना जाड़क दिनमे शीशीक तेल जमि जाइत छैक तहिना हमहुँ जड़वत भेल जा रहल छलहुँ। के छी जे शैलीकेँ एहि दशामे आनि देलक? ई जानब हमरा लेल आवश्यक भ’ गेल छल मुदा ताहिसँ पहिने ई जानब जे, जे किछु शैली कहि रहल छलीह से साँचे थिक वा…।
“शैली भ’ सकैछ अहाँक अंदाज गलत भ’ गेल हो..। भ’ सकैछ डॉक्टरक रिपोर्ट गलत हो….। अहाँ घबराउ जुनि। हम हरदम अहाँक संग छी, दुखमे, सुखमे सभमे।”हमरा बातसँ शैलीक मोन कने हल्लुक भेलैक। आइ धरि जे बात हम शैलीकेँ नहि कहबाक साहस केने रही से आइ एतेक आसानी सँ कहा गेल। शैली एकर माने की निकालने हेतैक से भगवाने जानथि। ओना शैली एखन जाहि मानसिक स्थितिसँ गुजरि रहल छलीह एहनमे हुनकासँ एहन सभ बात पर उमेदो करब उचित नहि छलैक।
“शैली अहाँ जे कहि रहल छी से गलतो तँ भ’ सकैछ? पहिने डॉक्टरसँ नीक जकाँ पूछि त’ लिअ।”
“आ जँ डॉक्टर फेर वैह बात कहलक तखन?” शैली बाजलि।
“ओ बादमे देखल जेतैक।” हम कहलिऐक।
“हम अपन जान द’ देब। मरि जाएब। हम आब जीब’ नहि चाहैत छी।”कानैत-कानैत ओ बाजलि।
“हमसभ आइए डॉक्टर लग जाएब।” हम कहलिऐक।
“कखन?” शैली तपाकसँ बाजलि।
“ऑफिसक बाद, छओ बजेक लगधक। आइ हमहुँ अपन ऑफिसक काज जल्दीए जल्दी निपटा लेब।” ई कहैत हम ओकरा सांत्वना देबाक प्रयास कएलहुँ। शैली हमरा मुँह दिस देखैत रहलीह। हम ऑफिससँ जल्दी निकल’ वला नहि छी से शैली नीक जकाँ जानैत छलीह। ओ सोचि रहल हेतीह जे “शायत हम हुनका समय द’ कए मुकरि जाएब।”
“अरे हम अहाँसँ प्रॉमिस क’ रहल छी हम अवश्य आएब। चाहे कतेको काज किएक नहि हो।”
शैली किछु पल केर लेल अपन आँखि बन्न क’ लेलक। जेना ओ सोचि रहल हो जे जँ हम नहि आएब तखन की हैत?
“शैली अहाँ जल्दी-जल्दी तैयार भ’ जाउ। हम बाहर अहाँक बाट जोहि रहल छी। कहैत हम ओकरा गाल पर हाथ फेरलहुँ आ ओकर आँखिक नोर पोछलहुँ।”
“अहाँ डरब नहि चलू देखैत छी जे आइ साँझ केँ डॉक्टर की कहैत छथि”—कहैत हम ओकर देहरी पार कएलहुँ। शैली शीघ्रहि अपन कपड़ा बदललक आ हम दुनू बाहर निकलि गेलहुँ।
अहाँ नाश्ता कएलहुँ की नहि? ई पूछब हम उचित नहि बुझलहुँ, तथापि पुछलहुँ—
“ऑफिसेक कैंटीन मे क’ लेब” ओ बाजलि।
ओहि दिन भरि रस्ता शैलीक पयर नहुँए-नहुँए आगू बढैत रहल। ओकर मोन जे टूटि गेल रहैक! हम ओकर ओहि मोनक टुटलका तागकेँ जोड़बाक प्रयास क’ रहल छलहुँ। हमरा मोनमे एक पल केर लेल भेल जे हम शैलीक हाथ अपन हाथमे थामि ली, मुदा बाट चलति एहि तरहक व्यवहार हमरा शोभा नहि देत, ई जानि हम अपन विचार दमित क’ देलहुँ।
गुमसुम शैली अपनहि विषयमे किछु सोचि रहल छलीह ई जानि हम ओकरा टोकलिऐक—-
हाँ…..25। शैली उत्तर छल।
“की भेल?” हम पुछलिऐक।
शैली मौन रहलीह।
हम फेर पुछलहुँ।
शैली मौन।
हमरा मोनमे भेल जे शायत शैली सीढ़ी चढ़ैत काल अपन उमिरक संबंधमे सोचि रहल छलीह। हम पाछू मूड़ि कए सीढ़ीक गिनती कएलहुँ ओ ठीक पच्चीसे छल। पच्चीस सीढ़ी आ पच्चीस साल, मेल बड़ नीक छलैक। पच्चीस सीढ़ी चढ़लाक पश्चात् ऑफिसमे प्रवेश आ पच्चीस सालक पश्चात् माय बनब……कुमारि माय? शायत एहि लेल ई क्षण ओकरा लेल सुखदायी नहि छलैक। कैंटीनमे हमरा दुनूक नास्ता-पानि भेल आ साँझमे मिलबाक बात क’ हम दुनू अपन-अपन ऑफिस चलि गेलहुँ।
पूरा दिन काज करैत हम शैलीएक संबधमे सोचैत रहलहुँ। बीचहिमे हम एकबेर ओकरा इंटरकॉम नम्बर सँ फोन केलिऐक।
शैली, केनह छी अहाँ? देखू धैर्य राखब, हम अवश्य आएब….कहैत हम फोन राखि देलहुँ।
दूपहरमे एकबेर फेर हमसभ लंचक समय मे मिललहुँ। ओ भोजन करबासँ मना करैत छलीह। हमहुँ उपासे करब। ऐहने नाजुक समयमे तँ मितकेँ मितक आवश्यकता होइत छैक। हम ओकरा सहारा द’ रहल छलिऐक ई सोचि हमरा खुशी भ’ रहल छल।
एखन घड़ीमे पाँच बजैत रहैक। ठीक ओहि काल शैली हमरा मोबाइल पर‘मिसकॉल’ द’ क’ समयक संबंधमे आगाह कएलक। साढ़े पाँच बज’ सँ पूर्वहि हम ऑफिससँ बाहर आबि गेलहुँ। शैलीओ केँ झटकि कए आबैत देखलिऐक।
“चली?”
हमर प्रश्न सुन’ सँ पहिनहि शैलीक पयर बढ़ि चुकल छलैक। हमसभ अस्पताल पहुँचलहुँ। हमरा आभासो नहि भ’ सकल जे कखन शैली हमर हाथ कसि कए पकड़ि नेने छलीह। ओ डरि रहल छलीह। ओकर हाथ काँपैत छलैक।
“डॉक्टर छथि?” हम स्वागत कक्षमे पुछलिऐक।
“हँ, हँ छथि” कहैत ओ स्वागत अधिकारी हमरा बगल कुर्सी पर बैसबाक इशारा कएलथि।
हम दुनू जा कए कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। हम डॉक्टरक कक्षमे हुलकी मारलहुँ, आ सामने नामपट्ट पर सेहो, लिखल रहैक—डॉ. गीता। हम बुझि गेलहुँ जे यैह डॉ. थिकीह। देख’ मे एकदम सुन्नरि, सौम्य। हम मोने मोन सोचलहुँ जे शायत डॉ. गीता कहतीह—“शैली अहाँ एकदम नार्मल छी” आ हुनक ई वाक्य शायद हमरा सभक मोनक भ्रम तोड़ि देत। एतबहिमे नर्स आवाज देलक—“अहाँ सभ अन्दर जाउ।”
डॉ. गीता एकदम मधुर आवाजमे पुछलथि—“कहू की तकलीफ अछि।” डॉक्टरक पश्न सुनि हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। डॉ. केर प्रश्न एखन चलिए रहल छलैक। हम हुनका दिस देखलिएनि की ओ हमरा कहलथि—“कनेक कालक लेल अहाँ बाहर जाउ”हम ओतए सँ उठि बाहर ओहि कुर्सी पर जा बैसलहुँ जतय पहिने बैसल रही। नर्स दरबज्जा बन्न क’ दैलकैक। हमरा मोनमे तखन कतेको प्रकारक प्रश्न सभ उठि रहल छल। थोड़बे कालक बाद डॉ. दरबज्जा खोललक। हमरा फेर बजाओल गेल। हमरा ओत’पहुँच’ सँ पहिने शैली डॉ. केँ किछु बता रहल छलीह। डॉ. हमर नाम पुछलथि—
“शागू गांवकर।” हम जवाब देलियनि। डॉ. हमर नाम पुरजा पर लिख लेलथि। हम देखतहि रहि गेलहुँ। हमरा अपनहि आँखि पर विश्वास नहि भ’ रहल छल। हम अपन आँखि आर कने बिदोड़ि कए देखलहुँ—हँ! ई शालीए रहैक। शैली, शाली कहिया भ’ गेलैक?
“हँ तँ अहाँ सभकेँ बच्चा एखन नहि चाही, यैह ने?” डॉ. हमरा दुनूसँ पूछलक।
“जी नहि। हमरा सभक आर्थिक परिस्थिति एखन बच्चा जन्म देबाक इजाजत नहि द’ रहल अछि।” शैली उर्फ शाली चोट्टहि बाजलि। हम ओकरा दिस साश्चर्य देखतहि रहि गेलहुँ।
“तँ ई निर्णय अहाँ दुनूक छी ने?”
“जी हँ, डॉक्टर! हमरा दुनूक यैह सम्मति अछि।” शैली बाजलि।
शैलीक जवाब मानू हमरा अंतर्मनकेँ झकझोरि कए राखि देलक। बच्चा ककरहुँ हो मुदा ओकरा प्रति कने ममता तँ हेबाक चाही?
डॉ. ओहि पुरजा पर आर किछु लिखलक आ हमरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबा लेलक। शैली, शाली गांवकर नामसँ हस्ताक्षर केने छल जे पूर्ण रूपसँ जाली छलैक। अपन हस्ताक्षर केलाक पश्चात् ओ कलम हमरा हाथमे थमा देलक। हम की करी, की नहि एहि अंदर्द्वन्द्वमे रही। शैली एकबेर हमरा दिस देखलक—हम बात बुझि गेलिऐक, हमहुँ हस्ताक्षर क’ देलिऐक। डॉ. अपन अलमारीसँ किछु दबाइक गोली आ एकटा करिया-सन शीशीमे दबाइ शैलीकेँ थमा देलकैक। शैली अपना पर्ससँ आठ सय टका निकाललक आ तीन सय हमरासँ माँगलक। हम ततेक ने नर्वस भ’ गेल रही जे शैलीए हमरा जेबीसँ ओ टका निकालि डॉ. केँ देलकैक।
शैलीक ई व्यवहार देख डॉ. केँ हँसी लागि गेलैक। “साँचे अहाँ दुनूक प्रेम बेजोड़ अछि।”
हमरा दुनूक बीच पति-पत्नीक संबंध अछि, ई विश्वास डॉ. केँ दिएबाक लेल शैलीक ई नाटक एकदम ‘परफेक्ट’ साबित भेलैक।
“मि. शागू! अपन पत्नीक ध्यान राखब, हिनका एहि समय अहाँक सख्त आवश्यकता छैक।” ई कहैत डॉ. गीता हमरा सभकेँ बिदा कएलथि। हम आ शैली बाहर एलहुँ। पेशेंट सभकेँ स्ट्रेचर पर ल’ जएबाक जे पथ होइत अछि ओहि बाटे हम सभ अबैत रही हमरा बुझाएल जे जेना हमर अपन संतुलन बिगड़ि रहल अछि। हम शायत अपनहि सँ उलझि गेल छलहुँ। किछु आगू चललाक पश्चात् शैली दबाइक दोकान पर पुरजा दैत किछु आर दबाइ किनलक। हमरा मोनमे एकटा जबरदस्त जद्दोजहद भ’रहल छल। “हम पापी छी, हत्यारा छी, हमरहि कारणेँ आइ एकटा ओहन शिशुक हत्या भ’ रहल छैक जे एखन धरि दुनियाँ मे आएलो नहि छैक” कोनहुँ बच्चाक लेल संसारक सभसँ सुरक्षित स्थान होइत अछि ओकर माइक कोखि, हम ओहि कोखिक लेल मृत्युक सौदागर बनि गेल रही। दबाइ सभ गर्भनाड़ीकेँ बन्न क’ नेना भ्रूणकेँ समाप्त करबाक प्रक्रिया भ’ रहल छलैक। हमरा लागल आइ हम एहन अपराध केने छी जकरा लेल भगवान हमरा कहियो माफ नहि करताह। मुदा जँ हम एहन नहि करितहुँ तँ शैलीओ तँ आत्महत्या क’ लेतिऐक? यैह सभ सोचैत हम बहुत कालक लेल एकदम गुम्म भ’गेल रही।
जखन हम कॉलेजमे पढ़ैत रही आ परीक्षामे कम अंक आबए तखन मैडम पापा केँ बजा कए आनए कहैत छलीह। तखन हम गलीक नुक्कुड़ पर जा कए “साइकिल पायलट”केँ दस-बीस टका द’ कए किछु कालक लेल भाड़ाक पप्पा बना कए ल’ जाइत छलहुँ। परीक्षाक अपन गलती छुपएबाक लेल भाड़ाक पप्पासँ नाटक करबैत छलहुँ….। आइ हम अपनहि नाटक करैत रही। शैली केँ बचएबाक नाटक। बातो तँ साँचे रहैक, घौर बला केलाक गाछमे जेना संतुलन बनएबाक लेल ‘सोंगर’ लगाओल जाइत अछि, तहिना आइ हम शैलीक संतुलन ठीक रखबाक लेल सोंगरक काज क’ रहल छलहुँ।
“चलू चलैत छी।” दबाइ ल’ कए घूरि आएल शैली बाजलि आ हम अपन विचारसँ बाहर निकलबाक प्रयास कएलहुँ। ओहि दबाइमे ओहि छोटका “जीब”क लेल“जहर” छलैक।
हम शैलीकेँ ओकरा घर धरि पहुँचा देलिऐक। शैली हमरा बैसबाक लेल कहलक। शायत ओ बुझैत छलीह जे आइ जे किछु भेल छैक तकर परिणामस्वरूप हमरा मोनमे की भ’ रहल हैत। आइ भोरसँ जे किछु भ’ रहल छैक तकर जड़ि केर संबंधमे हम ओकरासँ पुछबैक। मुदा काल्हि भेंट करब, ई कहि हम ओकर मोन हल्लुक क’ देलिऐक। “गुड नाइट” कहि हम चलि देलहुँ। राति शनैः-शनैः भीजल जाइत छलैक आ ओकरा संगहि हमर चिंतन सेहो गंभीर भेल जा रहल छल। हमर एकटा मोन हमरा लांछित करैत छल आ दोसर मोन मजगूत क’ रहल छल।
एहि अनजान शहरमे हमरा सिवाय शैलीक क्यो नहि छलैक। जँ हम आइ ओकरा सहारा नहि देतिऐक तँ ओ अपन इहलीला समाप्त क’ लेतिहैक। हे भगवान!हमरा माफ करब! जाहि भ्रूणकेँ अहाँ जनम देब’ चाहैत छलहुँ हम ओकरहि विनाश करबाक लेल शैलीक संग देलहुँ। कतेक पैघ गद्दार छी हम!
दोसर दिन शैली ऑफिस नहि अएलीह। हमहुँ ओकरा सँ मिलबाक साहस नहि जुटा पएलहुँ। एहिना कैक दिन बीति गेल। एक दिन अकस्मातहि हमरा शैली सँ ऑफिस मे भेंट भ’ गेल।
“शागू हम घर जा रहल छी।” शैलीक बात सुनि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ।
“मुदा एना अचानक?”
“काल्हि भेंट करब” ई कहैत ओ ऑफिस चलि गेलीह।
काल्हि शनि रहैक, से हम शैलीक घर जयबाक सोचलहुँ। आइ शुक्र दिन देर धरि ऑफिसक काज करैत रहलहुँ।
दोसर दिन हम शैलीक घर पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकरा घरमे ताला लागल छल। तालाक भूरमे एकटा पर्ची खोंसल रहैक। ओ संभवतः हमरे लेल हैत से जानि हम ओकरा खोललहुँ। हमरे चिट्ठी छल।
प्रिय शागू,
हम घर जा रहल छी। घरक लोक सभ हमर बियाह तय क’ देने छथि। अहाँक कएल गेल उपकारकेँ हम जिनगी भरि नहि बिसरब। हमरा जीवनक लेल अहाँ बहुत महत्वपूर्ण छी। हम बुझैत छी जे हमरा बिसरि जाएब अहाँक लेल एकदम असंभव हैत। मुदा हम आइसँ अहाँकेँ बिसरैत छी, संभव भ’ सकय तँ अहूँ हमरा बिसरि जाउ।

शैली
चिट्ठी पढ़ि हमरा लागल जेना एकटा जोरगर समुद्रक लहरि आएल आ हमरा पयरक निचलका सभटा बालु बहा कए ल’ गेल। हमरा आँखिसँ नोरक दूइटा बुन्न कखन ओहि चिट्ठी पर पड़ि पसरि गेल के हम नहि बुझि सकलहुँ। “काल्हि भेंट करब”कहएवाली शैलीकेँ काल्हि आ आजुक बीचक अंतर किएक नहि बुझि मे एलैक? शैली हमरा एहि तरहेँ किएक फँसौलक? शायत ओ सोचने हेतीह जे हम ओकरा बियाह करबा सँ मना क’ देबैक। जखन हम ओकरा गर्भपात करबैत काल नहि रोकलिऐक तँ एखन किएक रोकि देतिऐक?
शैली आब पहिनुक शैली नहि रहल। ओ आब बहुत समझदार भ’ गेल छलीह। आब समाजक सामना करबाक साहस ओकरामे भ’ गेल छलैक।
शैली शुक्र दिनक रातिएमे रेल सँ चलि गेलीह आ छोड़ि गेलीह हमरा लेल कैकटा अनुत्तरित प्रश्न सभ।
ओहि दरबज्जाक आगू हमर ध्यान गेल जतय शैली कहियो “वाल” केर लत्ती लगौने छलीह। ओ लत्ती आब खूब पैघ भ’ गेल रहैक। ओकर जड़ि चतरि गेल छलैक आ ओहि लत्ती पर आब कैकटा फूल-फल लागि गेल छलैक। एहि “आल” केर फूल-फल आ ओकर पातक तरकारी खएबाक लेल शैली एतए नहि छलीह। शैली बियाहक लग्न मंडपमे छलीह। ई सभ सोचैत हम देबालक कोनसँ सटि गेलहुँ एकदम “सोंगर” जकाँ।
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KUNDAN JHA said…
konkani kathak prastuti lel shabd nahi achhi shambhu ji, sebi fernandez aa chitralekha d’souza ke hamra taraph se dhanyavad ahank madhyam se day rahal chhyanhi
Reply05/05/2009 at 06:15 PM
2

Dr Palan Jha said…
Sebi Fernandes ker katha aadyopant padhlahu, bhavnatmak katha. Shambhu ji aa chandralekha jik aabhar je konknik ee katha maithili me padhi saklahu.
Reply05/05/2009 at 12:12 PM
3

प्रीति said…
नव तूरक लेखकक नूतन रचना, अनुवाद सेहो ओहने उत्तम।
Reply05/04/2009 at 09:47 PM

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